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040 Hindi Language Previous Year Questions for CTET & TET Exams

Hindi Language Previous Year Questions for CTET & TET Exams

Q1. कौन वर्ण घोष नहीं है?
(1) छ
(2) ए
(3) अ
(4) ड
Ans: (1) जिन ध्वनियों के उच्चारण में स्वर तंत्रियां झंकृति नहीं होती उन्हें अघोष कहा जाता है और जिनके उच्चारण में स्वर तंत्रियां झंकृत होती हैं उन्हें घोष कहा जाता है। अघोष वर्ण-क, ख, च, छ, ट, ठ, त, थ, प, फ, श, ष, स। घोष वर्ण- प्रत्येक वर्ग का तीसरा, चौथा और पाँचवाँ वर्ण तथा सभी स्वर वर्ण, य, र, ल, व और ‘ह’ घोष वर्ण है। (स्रोत-आधुनिक हिन्दी व्याकरण-डा . वासुदेव नन्दन प्रसाद)
Q2. किस शब्द में ‘ऋ’ स्वर नहीं है?
(1) कृष्ण
(2) कृपा
(3) दृष्टि
(4) रिवाज
Ans: (4) रिवाज में ऋ स्वर का प्रयोग नहीं हुआ है रिवाज ृ र्‌ ज – ‘इ’ स्वर कृष्ण ृ क्‌ ष्‌ ण कृपा ृ क्‌ प्‌ आ दृष्टि ृ द्‌ ष्‌ ट्‌
Q3. किन ध्वनियों के ‘अनुस्वार’ कहा जाता है?
(1) स्वतन्त्र रूप से उच्चारित ध्वनियाँ
(2) स्वर के बाद आने वाली नासिक्य ध्वनियाँ
(3) स्वर के साथ आने वाली ध्वनियाँ
(4) व्यंजन के बाद में आने वाली ध्वनियाँ
Ans: (2) स्वर के बाद आनें वाली नासिक्य ध्वनियों को अनुस्वार कहा जाता है। जबकि स्वतन्त्र रूप से आनें वाली ध्वनियाँ स्वर कहलाती हैं। अनुस्वार का उच्चारण नाक से होता है।
Q4. किस शब्द में ‘गुण सन्धि’ है?
(1) भारतेन्दु
(2) सिन्धूर्मि
(3) नारीश्वर
(4) लोकैश्वर्य
Ans: (1) उपर्युत्त विकल्प (1) भारतेन्दु में गुण सन्धि होगा। गुण सन्धि में जब ‘अ’ या ‘आ’ के बाद ‘इ’ या ‘ई’ आये तो दोनों का ‘ए’ हो जाता है। यहाँ पर भारतेन्दु का विच्छेद- भारत इन्दु→अ इ ृ ए है अतः भारतेन्दु में गुण संधि है। जबकि सिन्धूर्मि में दीर्घ सन्धि तथा लोकैश्वर्य में वृद्धि सन्धि है। (स्रोत-आधुनिक हिन्दी व्याकरण -वासुदेवनन्दन प्रसाद)
Q5. ‘वृक्षच्छाया’ का सन्धि-विच्छेद होगा–
(1) वृक्षः च्छाया
(2) वृक्षः छाया
(3) वृक्षच्‌ छाया
(4) वृक्ष छाया
Ans: (4) वृक्षच्छाया का सन्धि विच्छेद वृक्ष छाया होगा। यह व्यंजन संधि का उदाहरण है। जब स्‌ या त वर्ग (त, थ, द, ध, न) से पहले या बाद में श या च वर्ग (च, छ, ज, झ, ञ) कोई भी होता स को श और त वर्ग च वर्ग हो जाता है। (स्रोत-आधुनिक हिन्दी व्याकरण – वासुदेवनन्दन प्रसाद)
Q6. ‘श्मश्रु’ शब्द का तदभव रूप होगा–
(1) अश्रु
(2) मूँछ
(3) आँसू
(4) ससुर
Ans: (2) ‘श्मश्रु’ शब्द का तद्‌भव मूँछ होता है। (स्रोत- प्रामाणिक सामान्य हिन्दी – डा. पृथ्वीनाथ पाण्डेय पृ. (182))
Q7. विपरीत अर्थ का बोध कराने वाले शब्द को कहते हैं–
(1) विलोम शब्द
(2) पर्यायवाची शब्द
(3) समानार्थक शब्द
(4) एकार्थक शब्द
Ans: (1) किसी शब्द के विपरीत अर्थ का ‘बोध’ कराने वालें शब्द विलोम शब्द कहलाते हैं। जब एक शब्द एक से अधिक अर्थ प्रदान करे तब उसे अनेकार्थी कहते हैं। और जिन शब्दों के अर्थ में समानता हो उन्हें पर्यायवाची शब्द कहते हैं।
Q8. ‘वर्ण’ शब्द का अर्थ नहीं होता है–
(1) आकाश
(2) रंग
(3) जाति
(4) अक्षर
Ans: (1) वर्ण शब्द का अनेकार्थी, रंग, जाति व अक्षर होगा जबकि ‘आकाश’ ‘वर्ण’ शब्द से भिन्न है।
Q9. कौन-सा शब्द ‘कमल’ का पर्यायवाची नहीं है?
(1) अम्बुज
(2) जलज
(3) मनसिज
(4) पंकज
Ans: (3) ‘मनसिज’ ‘कमल’ का पर्यायवाची शब्द नहीं है। बल्कि यह कामदेव का पर्यायवाची है- कामदेव के अन्य पर्यायवाची शब्द है- मदन, मन्मथ मार, मनसिज, पंचसर, काम, अनंग आदि तथा कमल का पर्यायवाची- पंकज, नीरज, जलज, तोयज अम्बुज, अरविन्द, सरसिज आदि। (स्रोत-हिन्दी भाषा शब्द अर्थ-प्रयोग – हरदेव बाहरी)
Q10. ‘जिसका मन व ध्यान दूसरी तरफ हो’ के लिए एक शब्द होगा–
(1) बेश्यान
(2) मनन
(3) मनवा
(4) अन्यमनस्क
Ans: (4) जिसका मन व ध्यान दूसरी तरफ हो उसके लिए एक शब्द ‘अन्यमनस्क’ है।
Q11. अभिधा शब्द शक्ति में –
(1) लक्ष्यार्थ प्रकट होता है
(2) वाच्यार्थ प्रकट होता है
(3) व्यंग्यार्थ प्रकट होता है
(4) विचित्र अर्थ प्रकट होता है
Ans: (2) ‘अभिधा शब्द शक्ति में वाच्यार्थ प्रकट होता है’ वह शब्द शक्ति या शब्द का व्यापार जिससे साक्षात्‌ सांकेतिक या मुख्य अर्थ का बोध होता है। मुख्यतः प्रथम अर्थ का बोध करानें के कारण इसे मुख्य या अभिधा कहते हैं और इससे निकलने वाला मुख्य अर्थ ही वाच्यार्थ है। (स्रोत-भारतीय काव्य शास्त्री – निशा अग्रवाल)
Q12. ‘भाववाचक संज्ञा’ के अन्तर्गत आते हैं –
(1) गुण-दोष आदि
(2) पशु-पक्षी आदि
(3) दिशाएँ आदि
(4) आभूषण आदि
Ans: (1) जो संज्ञा किसी व्यत्ति या वस्तु के जाति या गुण का बोध करती है उसे भाववाचक संज्ञा कहते हैं या जो संज्ञा व्यत्तिवाचक जातिवाचक संज्ञा के गुणों का बोध कराती है उसे भाववाचक संज्ञा कहते हैं- जैसे- पाण्डित्य, लड़कपन, बचपन, मूर्खता आदि।
Q13. ‘मदन काली पतलून पहन कर खेलने आया’ में विशेषण है–
(1) पतलून
(2) काली
(3) मदन
(4) खेलने
Ans: (2) संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बातनें वाले शब्द विशेषण कहलाते हैं या जिस शब्द से संज्ञा की व्याप्ति मर्यादित हो उसे विशेषण कहते हैं। उपर्युत्त वाक्य में ‘काली’ शब्द पतलून की विशेषता बता रहा है अतः ‘काली’ शब्द में विशेषण है।
Q14. ‘वहाँ मोहन के……….कोई नहीं था’ वाक्य में रित्त स्थान पर प्रयुत्त होगा–
(1) और
(2) या
(3) अलावा
(4) अथवा
Ans: (3) वहाँ मोहन के अलावा कोई नही था। इस वाक्य में रित्त स्थान पर ‘अलावा’ शब्द प्रयुत्त हुआ है।
Q15. ‘हमें सफलता मिलने तक प्रयास करना चाहिए’ इस वाक्य में ‘तक’ है–
(1) क्रिया विशेषण
(2) समुच्चयबोधक अव्यय
(3) सम्बन्धबोधक अव्यय
(4) विस्मयादिबोधक अव्यय
Ans: (3) जो अव्यय संज्ञा के बहुधा पीछे आकर उसका सम्बन्ध वाक्य के किसी दूसरे शब्द के साथ बताता है उसे सम्बन्ध बोधक अव्यय कहते हैं। जैसे- तक, भर, बिना, बाद, द्वारा, लिए। इसलिए उपर्युत्त दिये गये वाक्य- ‘हमें सफलता मिलने तक प्रयास करना चाहिए’ में ‘तक’ शब्द सम्बन्धबोधक अव्यय का रूप है। (स्रोत-आधुनिक हिन्दी व्याकरण – वासुदेवनन्दन प्रसाद)
Q16. ‘को’ और ‘के लिए’ किस कारक के चिह्र है?
(1) करण कारक
(2) सम्प्रदान कारक
(3) अपादान कारक
(4) सम्बोधन कारक
Ans: (2) जिसके लिए कुछ किया जाय या जिसको कुछ दिया जाय, इसका बोध कराने वाले शब्द के रूप को सम्प्रदान कारक कहते है तथा ‘को’ और ‘के लिए’ का प्रयोग सम्प्रदान कारक के साथ होता है- कारक की संख्या 8 हैं जो निम्न है- 1. कर्ता – ने 2. कर्म – को 3. करण – से 4. सम्प्रदान – को, के लिए 5. अपादान – से (अलगाव के लिए) 6. सम्बन्ध – का, की, के, रा, री, रे 7. अधिकरण – में, पर 8. सम्बोधन – हे, अरे, अजी। (स्रोत- हिन्दी भाषा-शब्द अर्थ प्रयोग – डा . हरदेव बाहरी)
Q17. ‘उद्देश्य’ और ‘विधेय’ किसके अंग है?1. उद्देश्य :– वाक्य में जिसके बारे में कुछ कहा जा रहा हो या बताया जा रहा हो, उसे उद्देश्य कहते हैं। मुख्य रूप से कर्ता ही वाक्य का उद्देश्य है जैसे- चिड़ियों ने दाने चुंग लिए यहाँ चिड़ियों के बारे में कुछ कहा जा रहा है, इसलिए ये उद्देश्य है।2. विधेय :– वाक्य में उद्देश्य के बारे में जो कुछ कहा जाता है, उसे विधेय कहते हैं। साधारण रूप से क्रिया ही वाक्य का विधेय होता है। जैसे- सुमित सायकिल चला रहा है। वाक्य में सायकिल चला रहा है में सुमित (उद्देश्य) के बारे में कहा गया है। अतः यह विधेय है।
(1) रचना
(2) वाक्य
(3) शब्द
(4) अर्थ
Ans: (2) उद्देश्य और विधेय वाक्य के अंग हैं। वाक्य के दो अंग होते हैं– 1. उद्देश्य 2. विधेय।
Q18. ‘तेन्दुलकर ने एक ओवर में पाँच छक्के लगाए’-इस वाक्य में उद्देश्य है –
(1) तेन्दुलकर
(2) छक्के
(3) ओवर
(4) पाँच
Ans: (1) ‘तेन्दुलकर ने एक ओवर में पाँच छक्के लगाए’ में उद्देश्य तेन्दुलकर हैं, क्योंकि वाक्य में तेन्दुलकर कर्ता है और कर्ता ही उद्देश्य होता है इसलिए तेन्दुलकर उद्देश्य हुआ।
Q19. विराम चिह्न (;) का नाम है
(1) विराम
(2) अर्द्ध विराम
(3) अल्प विराम
(4) हंस पद
Ans: (2) विराम चिह्नों का नाम इस प्रकार है– 1. अर्द्ध विराम [ ; ] 5. निर्देशक चिह्न [ – ] 2. अल्पविराम [ , ] 6. विवरण चिह्न [:-] 3. पूर्णविराम [। ] 7. प्रश्नवाचक चिह्न [?] 4. योजक [_] 8. हंसपद चिह्न [^] (स्रोत-हिन्दी भाषा शब्द अर्थ प्रयोग – डा . हरदेव बाहरी )
Q20. किसी कठिन शब्द को स्पष्ट करने के लिए किस विराम चिह्न का प्रयोग होता है?
(1) निर्देशक
(2) विवरण चिह्‌न
(3) कोष्ठक
(4) उप विराम
Ans: (3) कठिन शब्द को स्पष्ट करने के लिए ‘कोष्ठक’ विराम चिह्न का प्रयोग करते है।
Q21. ‘अवसर का लाभ उठाना’ के लिए उपयुत्त है–
(1) आकाश-पाताल एक करना
(2) बहती गंगा में हाथ धोना
(3) फूला न समाना
(4) अंगारों पर पैर रखना
Ans: (2) ‘अवसर का लाभ उठाना’ एक मुहावरा है इसका अर्थ है – बहती गंगा में हाथ धोना तथा अंगारों पर पैर रखना का अर्थ है-जान बूझकर हानिकारक कार्य करना, आकाश पाताल एक करना का अर्थ सारा प्रयास कर डालना तथा फूला न समाना का अर्थ है- अत्यन्त प्रसन्न होना। (स्रोत- प्रमाणिक हिन्दी -पृथ्वीनाथ पाण्डेय)
Q22. ‘बाधा डालना’ मुहावरे का अर्थ है –
(1) रोड़ा अटकाना
(2) पाला पड़ना
(3) बरस पड़ना
(4) दाँतों में जीभ होना
Ans: (1) बाधा डालना का अर्थ है रोड़ा अटकाना या समस्या उत्पन्न करना
Q23. ‘अपना हाथ जगन्नाथ’ का अर्थ है–
(1) अपना हाथ पूजनीय होता है
(2) मनमानी करना
(3) अपने हाथ से काम करना ही उपयुत्त होता है
(4) अपने हाथ से दान करना
Ans: (3) अपना हाथ जगन्नाथ का अर्थ है अपने हाथ से काम करना ही उपयुत्त होता है।
Q24. ‘मैं तुम सबको खूब समझता हूँ, तुम सब एक जैसे हो’ के लिए उपयुत्त है –
(1) एक ही थैली के चट्‌टे-बट्‌टे
(2) चोर-चोर मौसेरे भाई
(3) केर-बेर का संग
(4) जैसे नागनाथ वैसे सांपनाथ
Ans: (1) मैं तुम सब को खूब समझता हूँ, तम सब एक जैसे हो, के लिए उपयुत्त है- एक ही थैले के चट्‌टे-बट्‌टे।
Q25. अधिसूचना का प्रकाशन कहाँ होता है?
(1) समाचार-पत्र
(2) राजपत्र (गजट)
(3) सूचना पट्‌ट
(4) उपरोत्त में से कोई नहीं
Ans: (2) सरकारी स्तर पर अधिसूचना का प्रकाशन अधिकतर भारतीय राजपत्रों (गजट) के लिए होता है। (स्रोत-आधुनिक हिन्दी व्याकरण एवं रचना – वासुदेव नन्दन प्रसाद, पृष्ठ 359)
Q26. निविदा सूचना का उद्देश्य होता है –
(1) सामान की नीलामी
(2) सामान की आपूर्ति करवाना
(3) निर्माण कार्य करवाना
(4) उपरोत्त सभी
Ans: (4) सामान्यतः निविदा सूचना का उद्देश्य किसी निर्माण कार्य में सामान की आपूर्ति करवाने तथा सामानों की निलामी करवाने के लिए होता है। (स्रोत-आधुनिक हिन्दी व्याकरण एवं रचना वासुदेवनन्दन प्रसाद)
Q27. किसी कार्यालय द्वारा एक साथ अनेक प्रेषितियों को भेजा जाने वाला शासकीय पत्र, ज्ञापन या आदेश कहलाता है –
(1) विज्ञापन
(2) परिपत्र
(3) अधिसूचना
(4) आवेदन
Ans: (2) जब, कोई सरकारी पत्र कार्यालय-ज्ञापन या ज्ञापन एक- एक साथ अनेक प्रेषितियों को भेजा जा रहा हो तब उसे परिपत्र कहते है। (स्रोत-आधुनिक हिन्दी व्याकरण एवं रचना – वासुदेव नन्दन प्रसाद (पृष्ठ-358))
निर्देश (प्र.सं. 2830) निम्न गद्यांश को ध्यान से पढ़िए और फिर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए कुसंग का ज्वर सबसे भयानक होता है यह केवल नीति और सद्‌वृत्ति का ही नाश नहीं करता, बल्कि बुद्धि का भी क्षय करता है। किसी युवा पुरुष की संगति यदि बुरी होगी तो वह उसके पैरों में बंधी चक्की के समान होगी, जो उसे दिन-रात अवनति के गड्‌ढे में गिराती आएगी और यदि अच्छी होगी तो सहारा देने वाली बाहु के समान होगी, जो उसे निरन्तर उन्नति की ओर उठाती जाएगी।
Q28. इस गद्यांश का शीर्षक होगा –
(1) अच्छी संगति
(2) कुसंग की महत्ता
(3) संगति
(4) युवा पुरुष
Ans: (3) ‘संगति’ गद्यांश का उपयुत्त शीर्षक होगा।
Q29. ‘कुसंग’ का अर्थ है –
(1) कक्षा के साथी
(2) कुशल साथी
(3) संगति के साथी
(4) बुरी संगति
Ans: (4) कुसंग का अर्थ बुरी संगति से है।
Q30. इस गद्य़ांश का केन्द्रीय भाव है –
(1) युवा पुरुष
(2) संगति का महत्त्व
(3) नीति और सद्‌वृत्ति
(4) उन्नति
Ans: (2) दिये गए गद्यांश का केन्द्रिय भाव संगति का महत्व है। क्योंकि गद्यांश में अच्छी और बुरी संगति को दर्शाया गया है। निम्न गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों (प्रश्न संख्या 1 से 7) में सबसे उचित विकल्प चुनिए : राजस्थान समाज के आगे मैं इसलिए नतमस्तक हूँ कि उसने ओरण की व्यवस्था सैकड़ों वर्ष पहले निकाली। ओरण यानि एक ऐसा जंगल जो केवल अकाल के समय में खुलेगा। इसका मतलब एक ऐसा कुआँ जो केवल आग लगने पर उसे बुझाने के काम आए। मतलब उसको पीने के लिए या नहाने के लिए नहीं लगाना है। ऐसे विशेष जंगल उन्होंने बनाए। इसका यह मतलब नहीं कि राजस्थान में अकाल नहीं आते। अकाल खूब आए लेकिन उनसे लड़ने की और उनको सहने की हमारी तैयारी पक्की रखी। लड़ना भी शब्द नहीं रहा। अकाल भी हमारे परिवार का एक हिस्सा है। प्रकृति आज थोड़ा-सा ज्यादा पानी बरसा गई है, कल थोड़ा कम गिरा देगी। तो उसके स्वभाव को देखना है। उन्होंने एक अन्दाज लगाया होगा अपने 500 पीढ़ियों के इतिहास में से। हर 13-14 साल में वर्षा कम हो जाती है, अकाल पड़ता है। तो अपने को 12-13 साल तक एक जंगल को बचा कर रखना है। ओरण का जो अलग-अलग बंद और खुलने का समय है वह भी तय किया गया। पूजा और मंदिर से भी जोड़ा गया, वह तो इसलिए कि उनको बड़े पैमाने पर कोई चीज करनी थी। वह धर्म से जुड़े बिना नहीं हो सकती थी।

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