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यूजीसी नेट/जेआरएफ परीक्षा‚ जनवरी-2017 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY) व्याख्या सहित तृतीय प्रश्न-पत्र का हल UGC NTA NET JRF Philosophy Previous Papers in Hindi 006.

UGC NTA NET JRF Philosophy Previous Papers in Hindi यूजीसी नेट/जेआरएफ परीक्षा‚ जनवरी-2017 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY) व्याख्या सहित तृतीय प्रश्न-पत्र का हल

1. अद्वैत के अनुसार जिस कलम से मैं लिख रहा हूँ‚ वह है :
(a) सत् (b) असत्
(c) सत् और असत् दोनों (d) न ही सत् न असत्
Ans. (d) : अद्वैत वेदान्त में व्यावहारिक जगत की वस्तुओं की सदसत-विलक्षण माना गया है। अर्थात् ‘न ही सत् है और न असत्। ‘कलम जिससे मै लिख रहा हूँ’ भी व्यावहारिक जगत की एक वस्तु है अत: वह भी ‘न सत् है और न असत् है’‚ अर्थात् सदसत् विलक्षण है।
(भारतीय दर्शन: आलोचन और अनुशीलन: चन्द्रधर शर्मा)
2. वैशेषिकों के अनुसार घट का असमवायी कारण निम्नलिखित में से कौन है?
(a) कपाल (b) कपाल संयोग
(c) उपादान (d) दण्ड-संयोग
Ans. (b) : वैशेषिक दर्शन के अनुसार गुण कभी किसी कार्य का समवायिया उपादान कारण नहीं हो सकता क्योंकि समवायि कारण केवल द्रव्य में होता है। गुण किसी कार्य का केवल असमवायि कारण ही होता है। ‘संयोग’ वैशेषिक दर्शन में एक गुण है। इसके अतिरिक्त किसी कार्य में असमवायि कारण वह गुण या कर्म है जो समवायि कारण में समवाय सम्बन्ध से रहते हुए कार्योत्पत्ति में सहायक होने से कारण हो जाता है। यहां ‘कपाल-संयोग’ घट का असमवायि कारण है‚ क्योंकि वह ‘कपाल’ में समवाय सम्बन्ध से रहता है। यहां घट ‘कार्य’ और ‘कपाल’ समवायि कारण है।
(भारतीय दर्शन की समीक्षात्मक रूपरेखा: राममूर्ति पाठक)
3. केवल नित्य मूर्तदृव्य को वर्णित करने वाले कूट का चयन कीजिए:
(a) क्षिति‚ मनस्‚ आकाश
(b) दिक्‚ काल‚ आत्मा
(c) क्षिति के परमाणु‚ तेज् और मरूत्
(d) काल‚ आत्मा और मनस्
Ans. (c) : क्षिति‚ जल‚ पावक (तेज) और मरुत (वायु) को नित्य‚ एवं मूर्त्तरूप इनके परमाणु रूप में कहा गया है।
4. मीठे में कड़वेपन का अभाव किस संबंध से रहता है?
(a) समवाय (b) संयोग
(c) विशेषणता (d) स्वरूप
Ans. (d) : मीठे में कड़वेपन का अभाव इसके स्वरूप के कारण होता है। मीठापन और कड़वापन एक तरह के गुण है। और गुण में अपने स्वभावानुसार कोई अन्य गुण नहीं हो सकता है। अत:
‘मीठेपन’ में कड़वेपन का अभाव उसके स्वरूप सम्बन्ध से जाना जा सकता है।
5. वैशेषिक मतानुसार‚ घट के संबंध में कुम्हार का दंड क्या है?
(a) समवायी कारण (b) असमवायी कारण
(c) निमित्त कारण (d) अन्यथा सिद्ध
Ans. (c) : न्याय- वैशेषिक दर्शन में समवाय पदार्थ के स्वीकरण के आधार पर कारण के तीन भेद माने गये है- समवायि कारण
(Inherent Cause)‚ असमवायि कारण (Nan-Inherent Cause) तथा निमित्त कारण (Efficient Cause)‚ समवायि कारण और असमवायि कारण तो कार्य से अभिन्न रहते है। परन्तु वह कारण जो अपनी शक्ति से उपादान कारण से कार्य उत्पन्न करता है वह निमित्त कारण है। जैसे कुम्भकार घट का निमित्त कारण है। उसका दण्ड और चाक‚ आदि भी सहकारी कारण होने के कारण निमित्त कारण हैं।
(भारतीय दर्शन: डॉ. नन्द किशोर देवराज)
6. कुमारिल के अनुसार जाति और व्यक्ति के बीच किस प्रकार का संबंध होता है?
(a) समवाय (b) तादात्म्य
(c) स्वरूप (d) संयोग
Ans. (b) : कुमारिल के दर्शन में संयोग एवं संयुक्त तादात्म्य में दो ही सम्बन्ध माने गये हैं। कुमारिल भाव और आभाव दोनों को पदार्थ मानते है। भाव का ज्ञान प्रत्यक्ष आदि से होता है आभावक ज्ञान अनुपलब्धि से होता है। भाव के दो अनिवार्य पक्ष सामान्य और विशेष जाति और व्यक्ति जिसमें परस्पर तादात्म्य अथवा भेदाभेद संबंध है। जाति और व्यक्ति दोनों में अभेद रहने पर उनमें भेद विद्यमान रहता है।
(भारतीय दर्शन का सर्वेक्षण: संगम लाल पाण्डेय)
7. लाइब्नित़्ज के पूर्व-स्थापित सामंजस्य सिद्धान्त के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सत्य है?
(a) शरीर और आत्मा एक-दूसरे के सामंजस्य से क्रियाशील रहते हैं और एक हो जाते हैं।
(b) शरीर आत्मा के बिना और आत्मा शरीर के बिना क्रिया करते हैं किन्तु दोनों ऐसे क्रिया करते हैं जैसे एक दूसरे को प्रभावित करते हैं।
(c) शरीर आत्मा पर और आत्मा शरीर पर क्रिया करते हैं।
(d) शरीर और आत्मा दोनों एक और समरूप हैं।
Ans. (b) : लाइबनित्ज के अनुसार‚ आत्मा और शरीर न तो अंतर्क्रिया का संबंध है और न ही संयोगवाद है। आत्मा और शरीर से सम्बन्धित उसका सिद्धान्त पूर्वस्थापित सामं जस्य-नियम है। आत्मा और शरीर क्रमश: चिदणुओं की क्रियाशील और अल्पव्र् िाâयाशील दो अवस्थायें है। ईश्वर ने इन दोनों में इस प्रकार सामंजस्य स्थापित कर दिया है कि एक-दूसरे से स्वतंत्र होते हुए भी चिदणुओं में संबंध बना रहता है।
(पाश्चात्य दर्शन का इतिहास-भाग-2- प्रो. दयाकृष्ण)
8. कांट के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए और सही कूट का चयन कीजिए:
(i) देश और काल वस्तुगत हैं और अपने ढंग से रहते हैं।
(ii) देश और काल वस्तुगत नहीं है‚ बल्कि वे केवल आभास और सापेक्षिक है।
(iii) देश और काल प्रागनुभविक हैं
कूट:
(a) केवल (ii) सत्य है।
(b) केवल (i) और (ii) सत्य हैं।
(c) केवल (iii) सत्य है।
(d) केवल (i) और (iii) सत्य हैं।
Ans. (c) : कांट के अनुसार‚ देश-काल प्रागनुभविक है और प्रत्यक्ष के आकार है। हम देश-काल से वस्तुओं के स्वरूप को निर्धारित नहीं कर सकते है। वस्तुत: देश एवं काल की आत्मनिष्ठ शर्तो से स्वतंत्र रूप में किसी भी वस्तु के स्वरूप का निर्धारण नहीं किया जा सकता है। इसीलिए काण्ट देश−काल को आनुभविक दृष्टि से यथार्थ और अनुभव-निरपेक्ष (अतीन्द्रिय) दृष्टि से अयथार्थ (प्रत्ययात्मक) मानता है।
9. देकार्त के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए और सही कूट का चयन कीजिए:
(i) सभी मानसिक अवस्थाओं को भौतिक अवस्थाओं में घटाया जा सकता है।
(ii) सभी भौतिक अवस्थाओं को मानसिक अवस्थाओं में घटाया जा सकता है।
(iii) मन और शरीर का संबंध तार्किक रूप से वैसा नहीं है जैसा कार और चालक का।
(iv) मनुष्य के संदर्भ में दैहिक और अदैहिक का भेद नहीं है।
कूट:
(a) केवल (iii) सत्य है।
(b) केवल (i) और (iv) सत्य हैं।
(c) केवल (ii) और (iii) सत्य हैं।
(d) केवल (ii), (iii) और (iv) सत्य हैं।
Ans. (a) : मन और शरीर का संबंध वैसा नहीं है जैसा कार और चालक का। देकार्त के मन-शरीर संबंध को ‘अंतर्क्रियावाद’ के नाम से जाना जाता है।
10. ‘जब तक हम भौतिक शरीर में आबद्ध हैं‚ सम्पूर्ण सत्य का अनुभव असंभव हैं‚’ यह विचार है
(a) के.सी. भट्टाचार्य का (b) राधाकृष्णन का
(c) जे. कृष्णमूर्ति का (d) गांधी का
Ans. (d) : गांधी जी के अनुसार ‘जब तक हम भौतिक शरीर में आबद्ध है‚ सम्पूर्ण सत्य का अनुभव असंभव है।’ गांधी जी भैतिकता से ऊपर आध्यात्मिकता को रखते है। और हम जैसे भौतिकता से आध्यात्मिकता की तरह अग्रसर होते हैं सत्य के और निकट होते हैं।
11. ह्यूम के परिप्रेक्ष्य में अभिकथन (A) और तर्क (R) पर विचार करते हुए सही कूट का चयन कीजिए:
अभिकथन (A):
वैयक्तिक अनन्यता कल्पना का कार्य है।
तर्क (R): सुख-दु:ख‚ संवेदन और कल्पना ये सादृश्य‚ सामीप्य और कारणता के द्वारा एक साथ संबंधित होते हैं।
कूट:
(a) दोनों (A) और (R) सत्य है और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) दोनों (A) और (R) सत्य हैं‚ लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सत्य है और (R) असत्य है।
(d) (A) असत्य है और (R) सत्य है।
Ans. (a) : ह्यूम के ‘अ-स्वामित्व सिद्धान्त’ के अनुसार‚ वैयक्तिक अनन्यता केवल एक काल्पनिक विचार है। यह हमारे संस्कारों और प्रत्ययों के साहचर्य से उत्पन्न होता है। अर्थात् सुख-दु:ख‚ संवेदन और कल्पना ये सादृश्य‚ सामीप्य और कारणता के द्वारा एक साथ संबंधित होते है। जो एकता को उत्पन्न करते हैं।
(AHISTOR OF PHILOSOPHY- FRANK THILLY)
12. शब्द और इसके अर्थ के बीच का संबंध स्वाभाविक नहीं है‚ यह मत है:
(a) बौद्धों का (b) वेदांतियों का
(c) मीमांसकों का (d) नैयायिकों का
Ans. (d) : नैयायिकों ने शब्द और इसके अर्थ के बीच का संबंध स्वाभाविक न मानकर कृत्रिम माना है। उल्लेखनीय है कि मीमांसा दर्शन भी शब्द और अर्थ में संबंध स्वीकारता है परन्तु न्याय दर्शन के विपरीत वह नैसर्गिक (स्वाभाविक) एवं नित्य सम्बन्ध को मानता है।
(भारतीय दर्शन की समीक्षात्मक रूपरेखा: राममूर्ति पाठक)
13. निम्नलिखित में से कौन सा युग्म इस विचार का समर्थन करता है कि ‘ज्ञान की सत्यता का सत्यापन किसी दूसरे ज्ञान से नहीं होता’?
(a) वेदांत और मीमांसा (b) मीमांसा और सांख्य
(c) मीमांसा और न्याय (d) वेदांत और न्याय
Ans. (a) : ‘ज्ञान की सत्यता का सत्यापन किसी दूसरे ज्ञान से नहीं होता’ यह ज्ञान के प्रामाण्य से सम्बन्धित स्वत: प्रामाण्यवादी मत है‚ जिसका समर्थन युग्म रूप में सम्बन्धित प्रश्न की विकल्प (i) वेदान्त और मीमांसा के दर्शनों में किया गया है।
14. जब किसी शब्द के तात्पर्य‚ अर्थ अथवा उसकी अभिव्यक्ति अपने मूल अर्थ के आंशिक रूप से भिन्न होती है‚ तो यह स्थिति है:
(a) अभिधा (b) अजहत् लक्षणा
(c) जहत्-अजहत् लक्षणा (d) व्यंजना
Ans. (c) : जब किसी शब्द के तात्पर्य‚ अर्थ अथवा उसकी अभिव्यक्ति अपने मूल अर्थ के आंशिक रूप से भिन्न होती है‚ तो यह स्थिति ‘जहत्- अजहत्- लक्षणा’ की होती है। ध्यातव्य हो लक्षणा तीन प्रकार से क्रमश: जहत् लक्षणा‚ अजहत्-लक्षणा‚ जहत्-
अजहत्- लक्षणा या भाग्य लक्षणा या भाग्य त्याग लक्षणा भी कहते हैं।
(भारतीय दर्शन: डॉ नन्द किशोर देवराज)
15. सूची-I का सूची-II सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूटों का उपयोग करते हुए सही उत्तर का चयन कीजिए:
सूची-I सूची-II
A. शब्दार्थ शक्ति जिसमें पदों i. तात्पर्य के पारस्परिक अर्थ की अपेक्षा हो।
B. शब्दों के अर्थों के बीच ii. आसत्ति संबंधों का अविरोध
C. उच्चरित शब्दों के अर्थ iii. आकांक्षा का अविलम्ब ग्रहण
D. विशेष अर्थ के सम्प्रेषण iv. योग्यता में शब्द की क्षमता
कूट:
A B C D
(a) ii i iii iv
(b) i iii iv ii
(c) iv iii ii i
(d) iii iv ii i
Ans. (d) : (a) शब्दार्थ शक्ति जिसमें पदों के पारस्परिक अर्थ को आकांक्षा अपेक्षा हो
(b) शब्दों के अर्थों के बीच संबंधो का अविरोध योग्यता
(c) उच्चरित शब्दों के अर्थ का अविलम्ब ग्रहण आसत्ति
(d) विशेष अर्थ के सम्प्रेषण में शब्द की क्षमता तात्पर्य आकांक्षा‚ योग्यता‚ आसत्ति और तात्पर्य से सम्पन्न पदों का समूह वाक्य है।
(भारतीय दर्शन: डॉ नन्द किशोर देवराज)
16. अ-गवय का निषेध एक भावात्मक सत्ता है और यह अ-गवय से भिन्न है‚ यह विचार है:
(a) नैगम नय (b) अपोहवाद
(c) प्रतिबिंबवाद (d) सप्तभंगीनय
Ans. (b) : बौद्ध दर्शन में ‘अपोहवाद’ सामान्य या जाति को ‘अपोह’ कहा गया है। ‘अपोह’ का अर्थ है सदृश्य वस्तुओ के समूह से निसदृश वस्तुओं को अलग करना। उदाहरण के लिए गवय का अर्थ है न अजौ अर्थात जो अ-गवय नहीं है। अर्थात अ-गवय का निषेध एक भावात्मक सत्ता है और यह अ-गवय नहीं है।
(भारतीय दर्शन का सर्वेक्षण- संगम लाल पाण्डेय)
17. ‘प्रत्यक्ष कल्पनापोढ़म’- प्रत्यक्ष का यह लक्षण निम्नलिखित में से किसके द्वारा प्रतिपादित है?
(a) दिङ्नाग (b) धर्म कीर्ति
(c) गंगेश (d) ईश्वर कृष्ण
Ans. (a) : ‘प्रत्यक्षं कल्पनापाठेम नामजात्यादयसंयुक्तम्’ -दिङनाग। ‘प्रत्यक्षम् कल्पनापोठम् अभ्रान्रम’-धर्मकीर्ति ‘ज्ञानाकरण कम् ज्ञानम् प्रत्यक्षम्’- गंगेश ‘इन्द्रियार्धसन्निकषौत्पन्नम् ज्ञानम् अव्यपदेशम् अन्यभिचारी व्यावसायत्मिकां प्रत्यक्षण’- गौतम ‘साक्षात प्रतीति: प्रत्यक्षम’- प्रभाकर। विशेषावधारण- प्रधान- प्रत्यक्षम्’- योग यह विभिन्न भारतीय दर्शनों में प्रत्यक्ष से सम्बन्धित दार्शनिकों की परिभाषा हैं।
(भारतीय दर्शन: डॉ. नन्द किशोर देवराज)
18. नैयायिकों के द्वारा प्रत्यक्ष की निर्विकल्पक स्थिति की सिद्धि होती है:
(a) प्रत्यक्ष के द्वारा (b) अनुमान के द्वारा
(c) उपमान के द्वारा (d) शब्द के द्वारा
Ans. (b) : नैयायिक प्रत्यक्ष की दो अवस्थाओं को मानते हैनिर्वि कल्पक और सविकल्पक। अत: प्रत्यक्ष ज्ञान भी सविकल्पक होता है। परन्तु इससे पूर्व वह निर्विकल्पक अवस्था में होता है। यह ज्ञान की पूर्व अवस्था है। प्रत्यक्ष की निर्विकल्पक स्थिति का हम अनुमान करते है।
(भारतीय दर्शन: आलोचन और अनुशीलन- चन्द्रधर शर्मा)
19. ‘याग न स्वर्गहेतु: क्रियत्वात’ उक्त अनुमान में किस प्रकार का हेत्वाभास है?
(a) बाधित (b) सत्प्रतिपक्ष
(c) विरुद्ध (d) सव्यभिचारी
Ans. (a) : बांधित हेत्वाभास में ‘हेतु’ अबाधित विषय नहीं होता। अर्थात् इसमे हेतु द्वारा प्रतिपादित साध्य प्रत्यक्ष आदि प्रबलतर अनुमानेत्तर प्रमाणों द्वारा बाधित होता है। जैसे- ‘त्याग न स्वर्गहेतु:
क्रियात्वात्’।
20. वैशेषिकों के अनुसार आत्मा तब ज्ञान का आधार नहीं हो सकती है‚ जब यह हो जाती है:
(a) ज्ञाता (b) ज्ञात
(c) बंधन में (d) मुक्त
Ans. (d) : न्याय- वैशेषिक में ज्ञान केा आत्मा का स्वरूप नहीं माना गया है‚ अत: मुक्तावस्था में ‘आत्मा’ ज्ञान रहित होती है।
21. यह मन है जिसके द्वारा देखा और सुना जाता है निश्चय ही प्रत्येक वस्तु प्राप्त की जाती है या बुद्धि के प्रकाश से उसकी खोज होती है जैसे अंधकार में एक वस्तु दीप के प्रकाश में प्रकाशित होती है‚ यह विचार निम्नलिखित में से किसका है?
(a) गंगेश (b) शंकर
(c) वल्लभ (d) कपिल
Ans. (b) : शंकर के अनुसार यह ‘मन है जिसके द्वारा देखा और सुना जाता है- निश्चय ही प्रत्येक वस्तु प्राप्त की जाती है……….। यह कथन शंकर का मत है।
22. निम्नलिखित में से कौन से पुरुषार्थ चार्वाक को स्वीकार्य है? नीचे दिए गए कूट का चयन कीजिए:
(a) अर्थ और काम (b) अर्थ‚ काम और धर्म
(c) मोक्ष और काम (d) काम और धर्म
Ans. (a) : चार्वाक दर्शन में ‘अर्थ और काम’ को ही पुरुषार्थ स्वीकार किया गया है। ‘धर्म और मोक्ष’ को यह अस्वीकार करता है। चार्वाक दर्शन ‘यावज्जीवेत सुख’ जीवते और ‘मृत्यु एवं अपवर्ग’ के दर्शन पर चलता है।
23. निम्नलिखित में से क्या भगवद्गीता का उपदेश नहीं है?
(a) कर्मो के फल का त्याग
(b) प्राकृतिक और निर्धारित कर्त्तव्यों का पालन
(c) सुख में सुखी और दु:ख में दु:खी होने के भाव से ऊपर उठना
(d) सभी अहं प्रधान इच्छाओं का ईश्वर के प्रति समर्पण नहीं होना चाहिए।
Ans. (d) : भगवद्गीता में निष्काम कर्म और ईश्वर-भक्ति में समर्पण के सिद्धान्त का प्रतिपादन करता है। जिसके अनुसार-
(1) फलासक्ति रहित होकर प्राकृतिक और निर्धारित कर्त्तव्यों का पालन करना- निष्काम कर्म।
(2) सुख में सुखी और दु:ख में दु:खी होने के भाव से ऊपर उठनास्थितिप्रज्ञ् ा पुरुष
(3) सभी अहं प्रधान इच्छाओं का ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण। स्वयं श्रीकृष्ण अर्जुन को भगवद्गीता में उपदेश देते हैं।
(भारतीय दर्शन: चटर्जी एवं दत्त)
24. निम्नलिखित में से कौन ‘ब्रह्मविहार’ के समूह से संबंधित नहीं है?
(a) मुदिता (b) करुणा
(c) एकाग्रता (d) मैत्री
Ans. (c) : ब्रहम विहार का समूह क्रमश: मैत्री‚ करुणा‚ मुदिता तथा उपेक्षा हैं। महायान सूत्रों में साधनामार्ग ध्यान चतुष्टय‚ समाधित्रय‚ पारमिताषट्टक‚ चार ब्रहम विहार और भूमिदशक के रूप में वर्णित है।
25. जैन दर्शन के अनुसार निम्नलिखित में से कौन एक त्रि-रत्न नहीं है?
(a) सम्यक् भावना (b) सम्यक् चरित्र
(c) सम्यक् दर्शन (d) सम्यक् ज्ञान
Ans. (a) : जैन दर्शन में त्रिरत्नं सम्यक‚ चरित्र‚ सम्यक् दर्शन‚ और सम्यक ज्ञान हैं।
26. ‘शब्द नित्य शब्दत्वात्’ उक्त अनुमान में किस प्रकार का हेत्वाभास है?
(a) साधारण सव्यभिचार (b) अनूप संहारी
(c) सत्प्रतिपक्ष (d) असाधारण सव्यभिचार
Ans. (d) : ‘शब्द नित्य शब्दत्वात्’ अर्थात् शब्द नित्य है‚ क्योंकि उसमें शब्दत्व है।’ में हेतु (शब्दत्व) का निजी गुण होने के कारण सजातीय दृष्टान्तों में अनुपस्थित है। अत: यहां असाधारण सत्यभिचार हेतु है। असाधारण सत्यभिचार हेत्वाभास में हेतु अत्यन्त संकीर्ण होता है। वह केवल पक्ष में होता है क्योंकि उसका निजी गुण है। वह विपक्ष एवं सपक्ष में नहीं रहता। वह सपक्षवृत्ति अर्थात् हेतु को पक्ष के साथ सपक्ष में भी रहना चाहिए का उल्लंघन करता है।
(भारतीय दर्शन की समीक्षात्मक रूपरेखा: राममूर्ति पाठक)
27. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित करते हुए समतुल्यता की खोज कीजिये और नीचे दिए गए कूटों का उपयोग करते हुए सही उत्तर का चयन कीजिए:
सूची-I सूची-II
A. [(p.q) ⊃ r] α i. [(p⊃q). (q⊃p)]
B. [p∨ (q.r)] α ii. ∼ p∨q
C. [p α q] α iii. [p⊃(q⊃r)]
D. [p ⊃ q] α iv. [(p∨q). (p∨r)]
कूट:
A B C D
(a) i iii iv ii
(b) ii iv iii i
(c) iv ii i ii
(d) iii iv i ii
Ans. (d) : A. [(p.q) ⊃ r] α iii. [p⊃(q⊃r)]
B. [p∨ (q.r)] α iv. [(p∨q). (p∨r)]
C. [p α q] α i. [(p⊃q). (q⊃p)]
D. [p ⊃ q] α ii. ∼ p∨q
(तर्कशास्त्र का परिचय: इरविंग एम. कोपी)
28. तर्क वाक्यों के परंपरागत विरोध वर्ग के संबंध में सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूटों में से सही उत्तर का चयन कीजिए:
सूची-I सूची-II
A. यदि ‘I’ असत्य है i. E अनिश्चित है
B. यदि ‘O’ सत्य है ii. ‘I’ अनिश्चित है
C. यदि ‘I’ सत्य है iii. ‘O’ अनिश्चित है
D. यदि ‘A’ असत्य है iv. ‘A’ असत्य है
कूट:
A B C D
(a) iv i iii ii
(b) iii ii iv i
(c) ii iii i iv
(d) i iv ii iii
Ans. (a) : A. यदि ‘I’ असत्य है iv. ‘A’ असत्य है
B. यदि ‘O’ सत्य है i. ‘E’ अनिश्चित है
C. यदि ‘I’ सत्य है iii. ‘O’ अनिश्चित है
D. यदि ‘A’ असत्य है ii. ‘I’ अनिश्चित ह
29. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूटों का उपयोग करते हुए सही उत्तर का चयन कीजिए:
सूची-I सूची-II
A. अच्छे प्रमाण के प्रभाव में i. पटिश्यो प्रिंसिपाई ऐसे निर्णय के लिए जन मानस को भावनात्मक अनुरोध करने से होने वाला दोष
B. यह तरीका हमेशा ही दोष- ii. इग्नोराटियो इलेन्ची पूर्ण नहीं होता क्योंकि इसमें अधिकारी की अपनी क्षेत्र क्षमता का महात्म्य होता है
C. तर्क वाक्य का सत्य iii. ऑर्म्यूमेंटम एंड पोपुलम स्थापित करने में ऐसे मान्य आधार वाक्य को प्रसारित करना जिसमें जो प्रश्न रूप तर्क वाक्य हो वहीं निगमनात्मक निर्णय के रूप में सामने आता है।
D. ऐसे विशेष निर्णय जिससे iv. ऑगर्यूमेंट्म एंड अन्य निर्णय को अभिप्रेत वेरेक्युन्डियम रूप से स्थापित किया जाए।
कूट:
A B C D
(a) i iii ii iv
(b) ii i iv iii
(c) iii iv i ii
(d) iv iii ii i
Ans. (c) : (a) अच्छो प्रमाण के अभाव में ऐसे निर्णय के लिए जनमानस को भावनात्मक अनुरोध करने से होने वाला दोष (iii) ‘लोकोत्तेजक युक्ति’ (Argumentum ad Populum) कहते है।
(b) यह तरीका हमेशा दोषपूर्ण नहीं होता क्योंकि इसमें अधिकारी की अपनी क्षेत्र क्षमता का महात्म्य होता है‚ यहाँ (iv) श्रद्धामूलक युक्ति
(Argumentum and Verecuncliam) है।
(c) तर्कवाक्य का सत्य स्थापित करने में ऐसे मान्य आधार वाक्य को प्रसारित करना जिसमें जो प्रश्न रूप तर्क वाक्य वही निगमनात्मक निर्णय के रूप में सामने आता है‚ ‘चक्रक दोष’ (Petitio Principil) कहलाता है।
(d) ऐसे विशेष निर्णय जिससे अन्य निर्णय को अभिप्रेत रुप से स्थापित किया जाए- ‘अर्थान्तर सिद्धि’ (Ignaratio Elenchi or Irrelevant Conelusion) कहते हैं।
(तर्कशास्त्र का परिचय इरविंग एम. कोपी)
30. यूनिवर्सल और एग़्जिस्टेंशल क्वांटिफिकेशन को सूची-
I एवं सूची-II के माध्यम से सुमेलित करते हुए नीचे दिए गए कूटों का प्रयोग करते हुए सही उत्तर का चयन कीजिए:
सूची-I सूची-II
A. [(x)  x] i. α [∼ (x)  x]
B. [(∃x)  x] ii. α [∼ (∃x)  x]
C. [(x) ∼  x] iii. α [∼ (x) ∼  x]
D. [(∃x) ∼  x] iv. α [∼ (∃x) ∼  x]
कूट:
A B C D
(a) i ii iii iv
(b) iv iii ii i
(c) ii iv i iii
(d) iii i iv ii
Ans. (b)
31. निम्नलिखित में से‚ ‘न ही फिलमोर ना ही हार्डिंग महान प्रेसिटेंड हुए’‚ की कौन सी सही प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है?
(a) (∼F). (∼ H) (b) (∼ F ∨ ∼ H)
(c) F ∨ H (d) ∼ (F.H)
Ans. (a) : ‘न ही फिलमोर ना ही हार्डिंग महान प्रेसिडेंट हुए’ वाक्य एक संयुक्त तर्कवाक्य है‚ जो ‘संयोजन’ के माध्यम से इस प्रकार जुड़ा है ‘वह ही फिलमोर महान प्रेसिडेंट थे और नही हार्डिंग महान प्रेसिडनृ थे यथा‚ (∼F). (∼ H) इसका प्रतीकात्मक रूप है।
(तर्कशास्त्र का परिचय: इरविंग एम. कोपी)
32. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूटों का उपयोग करते हुए सही उत्तर का चयन कीजिए:
सूची-I सूची-II
(आबवटेंन्ड) (आबवर्स)
A. कुछ ‘एस’‚ ‘पी’ नहीं है। i. कुछ ‘एस’ ‘नॉन-पी’ नहीं है।
B. कोई ‘एस’‚ ‘पी’ नहीं है। ii. कोई भी ‘एस’ ‘नॉन-पी’ है।
C. कुछ ‘एस’‚‘पी’ हैं। iii. कुछ ‘एस’‚ ‘नॉन-पी’ हैं।
D. सभी ‘एस’‚ ‘पी’ हैं। iv. सभी ‘एस’ ‘नॉन-पी’ हैं।
कूट:
A B C D
(a) i iv ii iii
(b) ii iii iv i
(c) iv i ii iii
(d) iii iv i ii
Ans. (d) : A. कुछ ‘एस’‚ ‘पी’ नहीं है। iii. कुछ ‘एस’‚ ‘नॉन-पी’ हैं।
B. कोई ‘एस’‚ ‘पी’ नहीं है। iv. सभी ‘एस’ ‘नॉन-पी’ हैं।
C. कुछ ‘एस’‚‘पी’ हैं। i. कुछ ‘एस’ ‘नॉन-पी’ नहीं है।
D. सभी ‘एस’‚ ‘पी’ हैं। ii. कोई भी ‘एस’ ‘नॉनपी’ है।
33. अभिकथन (A) और तर्क (R) पर विचार करते हुए सही
कूट का चयन कीजिए:
अभिकथन (A):
‘निष्कर्ष में व्याप्त पदों की संख्या का अंक आधार-वाक्यों में उपलब्ध व्याप्त पदों से एक कम होना चाहिए।’
तर्क (R): हेतु-पद निष्कर्ष में लुप्त रहता है।
कूट:
(a) (A) और (R) दोनों सत्य है और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सत्य है‚ लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) असत्य है और (R) सत्य है।
(d) (A) और (R) दोनों असत्य हैं।
Ans. (a) : मानक निरपेक्ष न्याय वाक्य के छह: नियमों में एक यह भी है। जिसके अनुसार प्रत्येक आधार-वाक्यों में उपलब्ध व्याप्त पदों की संख्या से निष्कर्ष में व्याप्त पदों की संख्या एक कम होती है अर्थात् ‘हेतु पद’ (Middle Term) जो कि किसी एक आधारवाक्य में व्याप्त होना ही चाहिए‚ निष्कर्ष में लुप्त होता है। अत: (A) और
(R) सत्य है और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(Introduction to lagic- I. M- Copi)
34. अभिकथन (A) और तर्क (R) पर विचार करते हुए सही
कूट का चयन कीजिए:
अभिकथन (A):
यदि आधार वाक्य विशेष है‚ तो निष्कर्ष भी विशेष होगा।
तर्क (R): (i) साकारात्मक विशेष तर्कवाक्य में कोई पद व्याप्त नहीं होता है।
(ii) दोनों आधार-वाक्य विशेष नहीं हो सकते‚ इसलिए दोनों आधार वाक्यों में मात्र भेद होना चाहिए।
कूट:
(a) (A) और (R) दोनों सत्य हैं और (R) (i), (ii), (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सत्य हैं‚ पर (R) (i), (A) की सही व्याख्या है।
(c) (A) और (R) दोनों सत्य हैं‚ पर (R) (ii), (A) की सही व्याख्या है।
(d) (A) सत्य है‚ पर (R) (i), (ii) दोनों ही (A) की सही व्याख्या नहीं है।
Ans. (c) : मानक निरपेक्ष न्याय वाक्य के नियम-6 के अनुसार यदि निरूपाधिक न्यायवाक्य जो कि वैध हो निष्कर्ष विशिष्ट हो तो उसके दोनों आधार वाक्य सामान्य नहीं हो सकते है। अर्थात् यदि एक आधारवाक्य विशेष है तो निष्कर्ष भी विशिष्ट होगा। हालांकि दोनों आधारवाक्य विशेष नहीं हो सकते हैं‚ इसलिए दोनों आधारवाक्य में ‘मात्रा’ में भी अन्तर होना चाहिए। ऐसा नहीं होने पर ‘सत्तात्मक दोष’ होता है। यद्यपि यह सत्य है कि सकारात्मक विशेष तर्कवाक्य में कोई पद व्याप्त नहीं होता और निषेधात्मक विशेष तर्कवाक्य में केवल एक पद व्याप्त होता है। परन्तु यह अभिकथन (A) की व्याख्या नहीं है। अत: केवल अभिकथन (A) की सही व्याख्या R
(ii) ही है।
35. यदि भाषा की सत्य-परिभाषा उपलब्ध हो‚ तो वह सत्य के सिद्धान्त की पर्याप्त स्थिति हो जाती है; यह विचार निम्नलिखित में से किस सिद्धान्त द्वारा सम्प्रेषित होता है?
(a) सत्य का सहभागिता का सिद्धान्त
(b) सत्य का रिडन्डेन्स का सिद्धान्त
(c) सत्य का सिमेन्टिक सिद्धान्त
(d) सत्य का व्यवहारवादी सिद्धान्त
Ans. (c) : ‘सत्य का सिमेन्टिक सिद्धान्त’ भाषा की सत्ता-परिभाषा पर अधिक जोर देता है। यदि भाषा की सत्य- परिभाषा उपलब्ध हो तो वह सत्ता के सिद्धान्त की पर्याप्त स्थिति हो जाती है।
36. निम्नलिखित में से कौन संशयवादी नहीं है?
(a) ह्यूम (b) पाईरो
(c) बेयल (d) देकार्त
Ans. (d) : पाईरो‚ ह्यूम और बेयल आदि संशयवादी दार्शनिक है। संशयवाद वह विचारधारा है जो कि किसी भी चीज को निश्चिततापूर्वक जानने से इन्कार करती है। वह सभी प्रकार के ‘ज्ञान’ के बारे में संशय करके उससे इन्कार करते हैं। संशय करना अलग बात है‚ क्योंकि देकार्त ने भी अपने बुद्धिवादी दर्शन की प्रतिष्ठा के लिए संशय किया किन्तु यहां ‘संशय’ साधन रूप था। परन्तु संशयवाद में ‘संशय’ साध्य की तरह इस्तेमाल होने लगता है। इसी अर्थ में पाइरो‚ ह्यूम और बेयल की केवल संशयवादी हैं।
37. देकार्त के अनुसार निम्नलिखित में से सत्य का कौन सा मानदण्ड हैं?
(a) स्पष्टता एवं एकरूपता (b) स्पष्टता एवं सुभिन्नता
(c) स्पष्टता एवं सम्पूर्णता (d) स्पष्टता एवं अपरोक्षता
Ans. (b) : देकार्त अपने बुद्धिवादी दर्शन के आलोक में सत्यता के मानदण्ड के रूप में स्पष्टता एवं सुभिन्नता को मानता है। यह प्रामाणिक ज्ञान की कसौटी है। देकार्त ने ‘स्पष्टता’ पद का प्रयोग ‘साक्षात् रूप में अनुभव किये जाने के अर्थ में’ और विवेकपूर्ण या सुभिन्नता (Distinct) शब्द का प्रयोग जो स्वत: जाना जा सके के अर्थ में किया है।
(पाश्चात्य दर्शन का उदभव और विकास: हरिशंकर उपाध्याय)
38. लाइब्नित्ज के संदर्भ में‚ निम्नलिखित युग्मों में से कौन सा सही है?
(a) बुद्धि के सत्य- अनिवार्यत: सत्य
(b) तथ्य के सत्य- पर्याप्त कारणता के नियम पर आधारित
(c) बुद्धि के सत्य- विरोध के नियम का आधारित
(d) तथ्य के सत्य- विरोधता के बिना जिसका निषेध न हो सके
Ans. (d) : लाइबनित्ज के अनुसार ‘तथ्य के सत्य’ विरोधता के बिना निषेध नहीं हो सकता है। लाइबनित्ज के अनुसार सभी अस्तित्ववादी वाक्य (सत्तामूलक कथन) ‘तथ्य के सत्य’ है न की बुद्धि के सत्य। इस सरल सिद्धान्त कई महत्वपूर्ण परिणाम हुए।
(पाश्चात्य दर्शन का उद्भव और विकास: हरिशंकर उपाध्याय)
39. प्रत्यय दो प्रकार के हैं‚ ’इन्द्रियों पर अंकित और कल्पना एवं स्मृतिजन्य;’ यह विचार निम्नलिखित में से किसका है?
(a) लॉक (b) बर्कले
(c) ह्यूम (d) लाइब्नित़्ज
Ans. (b) : वर्कले के अनुसार प्रत्यय दो प्रकार के होते है ‘इन्द्रियों पर अंकित और कल्पना एवं स्मृति के द्वारा निर्मित। बर्कले अपने दर्शन में प्रत्ययों को ही ज्ञान का विषय मानता है। जो या तो हमारी आत्मा द्वारा उत्पन्न किये गये है या ईश्वर द्वारा सृजित किये गये है।
(History of Philosophy- Frank Thilly)
40. लॉक के ज्ञान के सिद्धान्त के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार करते हुए सही कूट का चयन करें:
(i) प्रत्ययों को समझने की शक्ति पर ज्ञान आश्रित है।
(ii) ज्ञान तार्किक नहीं होता।
(iii) ज्ञान का अर्थ प्रत्ययों में सहमति एवं असहमति को देखना है।
कूट:
(a) केवल (i) कथन सत्य है।
(b) केवल (ii) कथन सत्य है।
(c) केवल (i) और (iii) कथन सत्य हैं।
(d) केवल (i) और (ii) कथन सत्य हैं।
Ans. (c) : प्रत्ययों की समझने के मानसिक शक्ति पर ज्ञान आश्रित है और (iii) ज्ञान का अर्थ प्रत्ययों में सहमति एवं असहमति है को देखना है लॉक के ज्ञान सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक प्रत्यय की अनुरूप बाह्य जगत में कोई न कोई वस्तु अवश्य होनी चाहिए अन्यथा वह ‘ज्ञान’ नहीं हो सकता है। इसे प्रत्यय प्रतिनिधित्ववाद कहते है।
41. भगवद्गीता के ‘स्थितप्रज्ञ’ के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन एक सही नहीं है?
(a) स्थितप्रज्ञ अपनी समस्त मनोकांक्षाओं का त्याग कर देता है।
(b) स्थितप्रज्ञ के मन में उद्वेग नहीं होता है।
(c) स्थितप्रज्ञ सुखों की प्राप्ति से सर्वथा नि:स्पृह है।
(d) स्थितप्रज्ञ हमेशा दूसरों का अच्छा करने के लिए सोचता है।
Ans. (d) : ‘स्थित प्रज्ञ’ ‘सुखे-दु:खे समेकृत्वा‚ लाभालाभौ जयाजयों तथा वह कभी यह सोचकर कर्म नहीं करता कि अच्छा करना है ‘स्थितप्रज्ञ’ तो स्वत: स्फूर्त रूप से जो भी कर्म करता है वह शुभ ही होता है। वह संसार के ‘लोक संग्रहार्थ’ कार्य करता रहता है‚ निष्काम भाव से। (भगवद्गीता- गीता प्रेस)
42. नीचे दो कथन दिये गये हैं जिसमें से एक को
अभिकथन (A) और दूसरे को तर्क (R) की संज्ञा दी गई है। (A) और (R) पर विचार करते हुए सही कूट का चयन कीजिये:
अभिकथन (A):
कांट का निरपेक्ष आदेश का नैतिक सिद्धान्त आकारित और कठोरतावदी है।
तर्क (R): यह भावनाओं की उपेक्षा करता है।
कूट:
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही है‚ परन्तु (R) गलत है।
(d) (A) गलत है‚ परन्तु (R) सही है।
Ans. (a) : काण्ट के नैतिकता के क्षेत्र में दिये गये ‘निरपेक्ष आदेश’ के सन्दर्भ में यह कहा जाता है कि यह मानवीय भावनाओ की उपेक्षा करते हुए केवल कर्त्तव्य को महत्व देता है। इसी अर्थ में इसे कठोरतावादी (Fegasistic) और आकारिक (Formal) कहा जाता है।
(नीतिशास्त्र का सर्वेक्षण: संगम लाल पाण्डेय)
43. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिये और निम्नलिखित में से सही कूट का चयन कीजिये:
सूची-I सूची-II
(लेखक) (रचनाएँ)
A. जी.ई.मूर i. फ्रीडम एण्ड री़जन
B. आर.एम. हेयर ii. इथिक्स
C. टी.एच.ग्रीन iii. द लॉजिक ऑफ मोरल डिस्कोर्स
D. पॉल एडवर्ड iv. प्रोलिगोमिन टू इथिक्स
कूट:
A B C D
(a) iv i ii iii
(b) i iii iv ii
(c) ii i iv iii
(d) i ii iii iv
Ans. (c) : A. जी.ई.मूर ii. इथिक्स
B. आर.एम. हेयर i. फ्रीडम एण्ड री़जन
C. टी.एच.ग्रीन iv. प्रोलिगोमिन टू इथिक्स
D. पॉल एडवर्ड iii. द लॉजिक ऑफ मोरल डिस्कोर्स
44. मिल के उत्कृष्ट परार्थवादी सुखवाद में निम्नलिखित में से कौन सा दोष है?
(a) अनियमित मुख्य पद दोष
(b) अनियमित अमुख्य पद दोष
(c) अव्याप्त मध्यम पद
(d) आलंकारिक भाषा दोष
Ans. (d) : मिल के उत्कृष्ट परार्थवादी सुखवाद में‚ उपयोगितावाद में अथवा सुखवाद में ‘अलंकारिक भाषा दोष’ है। मिल अपने उपयोगितावाद में अलंकारिक वाक्यों का प्रयोग करते हैं।
45. दंड के निरोधात्मक सिद्धान्त का उद्देश्य है
(a) किये गये अपराध के प्रति बदला लेना
(b) भविष्य में अपराध को रोकना
(c) अपराधी का सुधार
(d) वैयक्तिक स्वतंत्रता को पुष्ट करना
Ans. (d) : दण्ड के निरोधात्मक सिद्धान्त का उद्देश्य भविष्य में अपराध को रोकना है। ध्यातव्य हो कि दण्ड के तीन सिद्धान्त (1) प्रतिरोधात्मक या निरोधात्मक (2) प्रतिकारात्मक तथा (30) सुधारात्मक सिद्धान्त हैं।
(नीतिशास्त्र: सिद्धान्त और व्यवहार- प्रो. नित्यानन्द मिश्र)
46. ‘यह अच्छा है’ इस कथन की व्याख्या नियामक नीतिशास्त्री किस प्रकार करेगा?
(a) ‘यह’ जीवन का लक्ष्य है।
(b) ‘यह’ सामान्यतया लोगों द्वारा अनुमोदित है।
(c) मैं ‘यह’ का अनुमोदन करता हूँ।
(d) ‘यह’ करो।
Ans. (d) : नियामक नीतिशास्त्री ‘यह अच्छा है’ को ‘यह करो’ के अर्थ में व्याख्यायित करे। नियामक नीतिशास्त्री प्राय: ‘यह करो’ या ‘उसे न करो’ का विधान करता है।
47. अधोलिखित में से कौन सुखवाद की मूलभूत विशेषता को स्पष्ट करता है?
(a) ईमानदारी स्वयं में अच्छी है।
(b) ईमानदारी अच्छी है क्योंकि यह सुख में वृद्धि करती है।
(c) ईमानदारी अच्छी है क्योंकि यह मनुष्य की प्राकृतिक क्षमता है।
(d) ईमानदारी अच्छी है क्योंकि यह मनुष्य और पशु में भेद करती है।
Ans. (b) : सुखवाद की मूलभूत विशेषता है कि वह कार्य जो हमारे ‘सुख’ में वृद्धि करता हो वह शुभ या अच्छा होता है। इसी प्रकार ईमारदारी अच्छी है क्योंकि यह सुख में वृद्धि दार्शनिकों के मत अलग-अलग है परन्तु सभी ने ‘सुख’ को मापदण्ड माना है।
48. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिये और नीचे दिये गये कूट से सही उत्तर चुनिये:
सूची-I सूची-II
(चिंतक) (चिंतन)
A. कांट i. मूलभूत कर्त्तव्य
B. हीगेल ii. मेरा स्थान एवं तदनु सार कर्त्तव्य
C. ब्रेडले iii. मनुष्य बनो
D. रॉस iv. साध्यों के लिए राज्य के सदस्य की तरह कार्य करो
कूट:
A B C D
(a) i ii iii iv
(b) iv iii ii i
(c) ii iii i iv
(d) iii i iv ii
Ans. (b) : (a) ‘काण्ट (iv) साध्यों के लिए राज्य के सदस्य की तरह कार्य करो।’
(b) हीगेल (iii) ‘मनुष्य बनो’
(c) ब्रेडले ‘ (ii) मेरा स्थान एवं तदनुसार कर्त्तव्य’
(d) रॉस (i) मूलभूत कर्त्तव्य
(नीतिशास्त्र: सिद्धान्त और व्यवहार- प्रो.नित्यानन्द मिश्र)
49. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिये और नीचे दिये गये कूट से सही उत्तर चुनिये:
सूची-I सूची-II
(सिद्धान्त) (चिंतक)
A. परामर्शवाद i. रुडोल्फ कार्नेप
B. वर्णनसिद्धान्त ii. बटलर
C. निप्रकृतिवाद iii. आर.एम. हेअर
D. संवेगवाद iv. पी.टी. गीच
कूट:
A B C D
(a) iii iv ii i
(b) i ii iv iii
(c) ii i iii iv
(d) iv ii i iii
Ans. (a) : (a) परामर्शवाद (iii) आर.एम. हेअर
(b) वर्णन सिद्धान्त (iv) पी.टी. गीच
(c) निप्रकृतिवाद (ii) बटलर
(d) संवेगवाद (i) रुडोल्ड कार्नेप
50. मूर के अनुसार ‘शुभ’ अपरिभाष्य है क्योंकि
(a) इसमें अगणित गुण हैं।
(b) यह एक सरल पद है।
(c) यह एक अतीन्द्रिय वस्तु है।
(d) यह एक निरर्थक पद है।
Ans. (b) : मूर ‘शुभ’ को ‘अपरिभाष्य’ कहते है। उनके अनुसार इससे ‘सरल’ कुछ हो ही नहीं सकता। वह ‘शुभ’ को एक ‘सरल पद’ कहते है। और ‘सरल पद’ वह होते है जिसका और अधिक विश्लेषण न किया जा सके। जिनकी परिभाषा नहीं दी जा सकती है।
51. निम्नलिखित वेदान्तियों में से कौन सा युग्म जीवनमुक्ति के सिद्धान्त को न्यायोचित नहीं मानता?
(a) शंकर और रामानुज (b) रामानुज और मध्व
(c) शंकर और मध्व (d) वाचस्पति और प्रकाशात्मन
Ans. (b) : रामानुज जीवन मुक्ति नहीं मानते क्योंकि जब तक शरीर है तब तक कर्मो का आत्यन्तिक क्षय नहीं हो सकता और मध्व विदेहमुक्ति को मानते है जो देह पात्र के अनन्तर सम्भव है‚ वह जीवन्मुक्ति का निषेध करते हैं।
52. निम्नलिखित में से किस पूर्वमीमांसक का यह विचार है कि धर्म केवल साध्य मूल्य है साधन मूल्य नहीं?
(a) कुमारिल (b) प्रभाकर
(c) शबर (d) मुरारि मिश्र
Ans. (b) : प्रभाकर ‘धर्म’ को साध्य मूल्य मानते हैं‚ साधन को मूल्य नहीं। पूर्वमीमांसा का मुख्य प्रतिपाद्य विषय धर्म के स्वरूप की व्याख्या एवं परीक्षा करना है। वेद नित्य ज्ञान के भण्डार है‚ साथ ही साथ वे शाश्वत विधिवाक्यों और नियमों के आगार भी है‚ जिसके अनुसार आचरण करना धर्म है।
53. पतञ्जलि के ‘योगदर्शन’ के संदर्भ में सही अनुक्रम का चयन कीजिए:
(a) नियम‚ यम‚ प्राणायाम‚ आसन‚ प्रत्याहार
(b) यम‚ नियम‚ प्राणायाम‚ आसन‚ प्रत्याहार
(c) यम‚ नियम‚ आसन‚ प्राणायाम‚ प्रत्याहार
(d) आसन‚ प्राणायाम‚ प्रत्याहार‚ यम‚ नियम
Ans. (c) : योगदर्शन भी बन्धन का मूल कारण अविवेक को मानता है। चित्तवृत्तियों के विरोध से ही मोक्ष प्राप्त हो सकता है। उसके लिए साधना-पाद में अष्टांग मार्ग बतलाये गये है जो क्रमानुसारयम‚ नियम‚ आसन‚ प्राणायाम‚ प्रत्याहार‚ धारणा‚ ध्यान‚ समाधि है। प्रथम पांच को बहिरंग तथा शेष तीन को अन्तरंग साधन कहा गया है।
(दर्शन पुंज: विनोद तिवारी)
54. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिये और नीचे दिये गये कूट से सही उत्तर का चयन कीजिये:
सूची-I सूची-II
A. यदृच्छावाद i. वेदान्ती
B. प्रतीत्य सममुत्पाद ii. चार्वाक
C. ईश्वरवाद iii. बौद्ध
D. परमाणुवाद iv. जैन
कूट:
A B C D
(a) iii iv ii i
(b) ii iii i iv
(c) iii ii iv i
(d) iv ii iii i
Ans. (b) : (a) यदृच्छावाद (ii) चार्वाक
(b) प्रतीत्य सममुत्पाद (iii) बौद्ध
(c) ईश्वरवाद (i) वेदान्ती
(d) परमाणुवाद (iv) जैन
55. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिये और नीचे दिये गये कूट से सही उत्तर चुनिये:
सूची-I सूची-II
A. चार्वाक i. केवल प्रत्यक्ष‚ अनुमान‚ उपमान शब्द
B. बौद्ध ii. केवल प्रत्यक्ष
C. सांख्य iii. केवल प्रत्यक्ष और अनुमान
D. न्याय iv. केवल प्रत्यक्ष‚ अनुमान‚ शब्द
कूट:
A B C D
(a) ii iii iv i
(b) iii ii i iv
(c) i iii ii iv
(d) iv ii iii i
Ans. (a) : चार्वाक दर्शन में केवल प्रत्यक्ष‚ बौद्ध दर्शन में प्रत्यक्ष‚ अनुमान‚ सांख्य दर्शन में प्रत्यक्ष‚ अनुमान शब्द तथा न्याय दर्शन में प्रत्यक्ष‚ अनुमान‚ उपमान‚ शब्द प्रमाण को माना जाता है।
(भारतीय दर्शन- डॉ नन्द किशोर देवराज)
56. निम्नलिखित में से कौन भारतीय दार्शनिक ‘धर्मभूत’ ज्ञान और ‘धर्मीभूतज्ञान’ में अन्तर बताता है?
(a) वसुबन्धु (b) मध्व
(c) रामानुज (d) वल्लभ
Ans. (c) : रामानुज के दर्शन में ‘धर्मभूत’ और ‘धर्मीभूत ज्ञान’ का अन्तर किया गया है। ‘धर्मभूत ज्ञान’ विशेषणात्मक ज्ञान है। यह ज्ञाता का विशेषण है। यह जीव या ईश्वर को प्राप्त होता है। यह धर्म के रूप में आत्मा पर आश्रित है इसीलिए यह धर्मभूत ज्ञान है। ज्ञान द्रव्य एवं धर्म दोनों है। जीव और ईश्वर धर्मिभूत ज्ञान है। धर्मिभूत ज्ञान से धर्मभूत ज्ञान निकलता है।
(भारतीय दर्शन की समीक्षात्मक रूपरेखा: राममूर्ति पाठक)
57. निम्नलिखित में से भेदाभेद का सिद्धान्त किसका है?
(a) चित्सुख (b) कुन्दकुन्द
(c) जैमिनी (d) निम्बार्क
Ans. (d) : निम्बार्क भेदाभेदवादी या द्वैतवादी थे। इसके अतिरिक्त औडुलोमि‚ आश्मरथा‚ यादवप्रकाश‚ भर्तप्रपंच‚ भास्कराचार्य आदि अन्य भेदा भेदवादी परम्परा के दार्शनिक माने जाते हैं।
(भारतीय दर्शन का सर्वेक्षण: संगम लाल पाण्डेय)
58. निम्नलिखित में से कौन दार्शनिक अविकृत परिणामवाद का समर्थन करता है?
(a) निम्बार्क (b) शंकर
(c) वल्लभ (d) मध्व
Ans. (c) : शुद्धाद्वैतवाद के प्रतिपादक बल्लभाचार्य कारण और कार्य में शुद्ध अद्वैत या अभेद मानते हैं। ब्रह्मम जगत में परिणत होने पर भी आवेकृत रहता है। यह ब्रह्म का अविकृत परिणामवाद है।
59. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिये और नीचे दिये गये कूट से सही उत्तर का चयन कीजिये:
सूची-I सूची-II
A. तालमुड i. जोरोस्ट्रियनिज्म
B. त्रिपिटक ii. सिक्ख
C. ग्रंथ साहेब iii. जुड़ाइज़्म
D. जेन्दा अवस्था iv. बौद्ध
कूट:
A B C D
(a) iii iv ii i
(b) iv iii i ii
(c) ii i iv iii
(d) i ii iii iv
Ans. (a) : (a) तालगुड (iii) जुडाइज्म
(b) त्रिपिटक (iv) बौद्ध
(c) ग्रंथ साहेब (ii) सिक्ख
(d) जेन्दा अवेस्ता (i) जोरोस्ट्रियनिज़्म
60. निम्नलिखित में से किस धर्म में अग्निपूजा की जाती है?
(a) जुडेइज़्म (b) इसाई
(c) इस्लाम (d) जोरस्ट्रियनिज्म
Ans. (d) : जोरस्ट्रियनिज्म ‘धर्म’ में अग्नि की पूजा की जाती है। इसमें ‘अहरमज्दा’ को कल्याण का देवता माना जाता है तथा ‘अहिरमन’ को बुराई का देवता।
61. अभिकथन (A) और तर्क (R) पर विचार कीजिए और निम्नलिखित में से सही कूट का चयन कीजिये:
अभिकथन (A) :
गांधी सत्याग्रह को ब्रिटिश साम्राज्य से युद्ध का हथियार मानते हैं।
तर्क (R): वह अंग्रेजी शासकों से भयभीत थे।
कूट:
(a) (A) और (R) दोनों सही है और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सही है‚ परन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही है‚ परन्तु (R) गलत है।
(d) (A) गलत है‚ परंतु (R) सही है।
Ans. (c) : गांधी जी ‘संत्याग्रह’ को एक हथियार के रूप में प्रयुक्त करते हैं। उन्होंने इसका प्रयोग ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ आजादी की लड़ाई में किया। इसका मतलब ये नहीं वह अंग्रेजी शासकों से भयभीत थे। गांधी के द्वारा प्रतिपादित सत्याग्रह के सिद्धान्त में सत्याग्रही होने का अर्थ है पूर्णतया निर्भय होना‚ ईमानदार एवं निष्ठावान होना है।
(समकालीन भारतीय दर्शन- बसन्त कुमार लाल)
62. पर्यावरण नारीवाद के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
(a) यह संस्कृति को नारी कि रूप में और प्रकृति को पुरुष के रूप में पहचान देते हुए ध्Eिायों के वर्चस्व को प्रश्न करता है।
(b) यह संस्कृति को पुरुष के रूप में और प्रकृति को नारी के रूप में पहचान देते हुए पुरुष के वर्चस्व को प्रश्न करता है।
(c) यह संस्कृति को पुरुष के रूप में और प्रकृति को नारी के रूप में पहचान देते हुए नारी के वर्चस्व को प्रश्न करता है।
(d) यह संस्कृति को नारी के रूप में और प्रकृति को पुरुष के रूप में पहचान देते हुए पुरुष के वर्चस्व को प्रश्न करता है।
Ans. (b) : पर्यावरण नारीवाद में संस्कृति को पुरुष के रूप में और प्रकृति को नारी के रूप में पहचान देते हुए पुरुष के वर्चस्व को प्रश्न करता है।
63. निम्नलिखित में से किस दार्शनिक का यह विचार है कि ‘‘प्राकृतिक अधिकार’’ ऐसा पुत्र है जिसका कोई पिता नहीं है?
(a) एडमर्ड बर्क (b) बेंथम
(c) नीत्शे (d) मैक इनटायर
Ans. (b) : बेंथम के अनुसार‚ प्राकृतिक अधिकार ऐसा पुत्र है जिसका कोई पिता नहीं है। लॉक ने भी अपने दर्शन में प्राकृतिक अधिकारों की बात कही है।
64. गांधीवादी नीतिशास्त्र के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सही नहीं है?
(a) सत्य साध्य के रूप में
(b) अहिंसा साधन के रूप में
(c) साध्य और साधन दोनों का उचित होना चाहिये।
(d) एक उचित साध्य अनुचित साधन केा औचित्य प्रदान करता है।
Ans. (d) : गांधी जी के दर्शन में साध्य-साधन की स्वरूप पर भी विचार किया गया। गांधी जी के अनुसार ‘साध्य’ की पवित्रता जितनी जरूरी है उतनी ही साधन की पवित्रता है। गांधीवादी नीतिशास्त्र में सत्य को सवोच्च साध्य माना गया है। अहिंसा को साधन रूप में माना गया है। गांधी जी के अनुसार एक उचित साध्य साधन के औचित्य का निर्धारण नहीं कर सकता है बशर्ते एक उचित साधन यह सुनिश्चित करता है कि साध्य उचित होगा।
(समकालीन भारतीय दर्शन: बसन्त कुमार लाल)
65. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिये और और नीचे दिये गये कूट से सही का उत्तर का चयन कीजिये:
सूची-I सूची-II
(लेखक) (गं्रथ)
A. देसाई महादेव i. रिलिजन एंड सोसाइटी
B. गांधी ii. द स्टोरी ऑफ बारदोली
C. राधाकृष्णन iii. ह्वाई सोशलिज़्म
D. नारायण जय प्रकाश iv. द ह्वील ऑफ फॉर्च्यून
कूट:
A B C D
(a) i ii iii iv
(b) ii iv iii i
(c) ii iv i iii
(d) iii ii iv i
Ans. (c) : (a) देसाई महादेव (ii) द स्टोरी ऑफ बारदोली
(b) गांधी (iv) द ह्वील ऑफ फॉर्च्यून
(c) राधाकृष्णन (i) रिलिजन एण्ड सोसाइटी
(d) नारायण जय प्रकाश (iii) ह्वाई सोसलिज्म
66. ऑस्टिन के अनुसार यह किस वाक् क्रिया का उदाहरण है? ‘मैं तुम्हें मार दूँगा’?
(a) वचन-कर्म (b) वचनेत्तर कर्म
(c) प्रभावी वचन कर्म (d) अवचन कर्म
Ans. (b) : ‘‘मै तुम्हे मार दूँगा’’ में वचनेन्तर कर्म
(ILLOCUTIONARY) का उदाहरण है। जे. एल. ऑस्टिन वाक् क्रिया का विभाजन तीन रूपों में किया है। (1) वचन कर्म
(Locutionary) (2) वचनेत्तर कर्म (Illocutionary) और (3) प्रभावी वचन कर्म (Perlocutioary) जिन वाक्यों का प्रयोग एक निश्चित उद्देश्य के लिए किया जाता है उन्हे वचनेत्तर कर्म कहते है। वादा करना‚ प्रश्न पूछाना‚ चेतावनी देना‚ उत्तर देना आदि वचनेत्तर कर्म है।
(दर्शन पुंज: एक गहन दृष्टि-विनोद तिवारी)
67. निम्नलिखित में से कौन एक सूची ऑस्टिन के क्रिया और उसके वचनेतर शक्ति में भेद को स्पष्ट करती है?
(a) वर्डिक्टिव्स‚ एक्सरसिटिव्स‚ कामिसिव्स‚ बिहैविटिव्स और एक्सपोजेटिव्स
(b) वर्डिक्टिव्स‚ एक्सरसिटिव्स‚ कमिसिव्स‚ सिन्टैक्टिकल और एक्सपोजेटिव्स
(c) वर्डिक्टिव्स‚ एक्सरसिटिव्स‚ कमिसिव्स‚ सिमैन्टिकल और बिहैविटिव्स
(d) वर्डिक्टिव्स‚ एक्सरसिटिव्स‚ सिमैन्टिकल‚ सिन्टैक्टिकल और कमीशिव्स
Ans. (a) : ऑस्टिन के क्रिया और वचनेत्तर शक्ति में भेद को स्पष्ट करती है- क्रमश: वर्डिक्टिव्स‚ एक्सरसिटिव्य‚ कमिसिव्स‚ बिहैविटिव्स और एक्सपोजेटिव्स। यह वचन कर्म शक्ति
(Illocutionary Force) की पहचान पांच क्रिया रूपों के द्वारा है।
(समकालीन पाश्चात्य दर्शन: बसन्त कुमार लाल)
68. ‘‘होने का तात्पर्य एक चर का मूल्य होना है‚’’ यह विचार है
(a) क्वाइन का (b) फ्रेगे का
(c) रसल का (d) स्ट्रॉसन का
Ans. (a) : ‘होने का तात्पर्य एक चर के मूल्य का होना है’-
क्वाइन। क्वाइन के अनुसार किसी गुण या विधेय के होने से हम उसके निर्देश या सामान्य तक नहीं पहुँच सकते। किसी पदार्थ के प्रति सत्तात्मक प्रतिबद्धता के लिए प्रतिबद्ध चरों का प्रयोग होना नितान्त आवश्यक है। अर्थात् किसी वस्तु या इकाई के अस्तित्व के लिए यह आवश्यक है कि वह किसी प्रतिबद्ध चर का मूल्य हो।
69. रसल के अनुसार निम्नलिखित में से कौन अनिश्चित विवरण के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता?
(a) अयोध्या का वर्तमान राजा
(b) भारत का वर्तमान राष्ट्रपति
(c) भारतीय रिजर्व बैंक का वर्तमान गवर्नर
(d) भारत का वर्तमान प्रधानमंत्री
Ans. (a) : महावाक्य ‘तत्वमसि’ छांदोग्य उपनिषद से उद्धृत है। ‘सत्यं ज्ञानमनन्तरम् ब्रह्म’ महावाक्य तैतिरीय उपनिषद में‚ वृहदारण्यक उपनिषद में ‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’ उद्धृत है।
(भारतीय दर्शन आलोचन और अनुशीलन: चन्द्रधर शर्मा)
70. किसी शब्द का कोई मानक अर्थ नहीं है‚ इसके जितने प्रयोग हैं‚ उतने अर्थ हैं और ये अनगिनत हैं यह विचार है
(a) रसल का (b) फ्रेगे का
(c) विट्गेन्स्टाइन का (d) डमेट का
Ans. (c) : विट्गेन्सटाईन के अनुसार अर्थ को नहीं प्रयोग को देखो अर्थात् किसी शब्द का कोई मानक अर्थ नहीं है‚ इसके जितने प्रयोग है‚ उतने अर्थ है और अनगिनत है। इसी अर्थ में विट्गेन्सटाईन भाग का उपयोग सिद्धान्त देता है।
71. ‘मृत्यु हमारी सारी संभावनाओं का अंत है।’ यह कथन है
(a) हाइडेगर का (b) हुसर्ल का
(c) सार्त्र का (d) जॉस्पर्स का
Ans. (c) : सार्त्र के अनुसार ‘मृत्यु हमारी सारी संभावनाओ का अन्त है’। मनुष्य जब तक जीता है संभावनाओं के साथ-साथ। यह संसार चेतन आत्मा के लिए संभावनाओं का जगत है। वह यहां विभिन्न प्रकार से अपनी प्रतिभा को निखारता है।
72. अधोलिखित में से किसके अनुसार ‘सार को वैसा ही देखा जा सकता है जैसा ध्वनि को सुना जा सकता है’?
(a) हाइडेगर (b) मॉर्सेल
(c) हुसर्ल (d) सार्त्र
Ans. (c) : हुसर्ल के अनुसार ‘सार को वैसा ही देखा जा सकता है जैसा ध्वनि को सुना जा सकता है।’ हुसर्ल चेतना के दार्शनिक विश्लेषण के आधार पर ऐसे स्वत: सिद्ध वस्तुनिष्ठ सारभाव को ढूढ़ लेना चाहते है जो ज्ञान-विज्ञान का आधार हो।
(समकालीन पाश्चात्य दर्शन: बसन्त कुमार लाल)
73. निम्नलिखित में से कौन हुसर्ल के फेनोमेनॉलाजी का उद्देश्य नहीं है?
(a) ज्ञान और अनुभव के आधार की खोज
(b) उस संरचना का निरूपण करना जो तार्किक विचारों के सार की संरचना करते हैं।
(c) चेतन की अवस्था के संदर्भ में तटस्थता।
(d) प्रदत्त स्वीकृति पूर्वमान्यताओं की
Ans. (d) : हुसर्ल की फेनोमेनॉलॉजी का उद्देश्य- ज्ञान और अनुभव के आधार की खोज करना‚ उस संरचना का निरूपण करना जिसे तार्किक विचारों के सार की संरचना कहते हैं‚ चेतना की अवस्था के संदर्भ में तटस्थता तथा प्रदत्तता को उसकी पूर्वमान्यताओं से स्वतंत्र होकर उसके आद्य अर्थ में पकड़ना।
74. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिये और नीचे दिये गये कूट से सही उत्तर का चयन कीजिये:
सूची-I सूची-II
A. स्लिअरमारकर i. फेनोमेलॉजिकल हमर्यूनीटिक्स
B. हाइडेगर ii. रेडिकल हर्म्यूनीटिक्स
C. डेरिडा iii. माक्रिसस्ट हर्म्यूनीटिक्स
D. फ्रेड्रिक जेम्सन iv. रोमॉन्टिक हर्म्यूनीटिक्स
कूट:
A B C D
(a) i ii iii iv
(b) iv i iii ii
(c) iv ii i iii
(d) iv i ii iii
Ans. (d) :
(a) स्लिअरमारकर (स्लायरमाखर) (iv) रोमॉन्टिक हर्म्यूनीटिक्स
(b) हाइडेगर (i) फेनोमेनालॉजिकल हर्म्यूनिटिक्स
(c) डेरिडा (ii) रेडिकल हर्म्यूनिटिक्स
(d) फ्रेड्रिक जेम्सन (iii) मार्क्िसस् हर्म्यूनीटिक्स
(समसामायिक राजनीतिक सिद्धान्त: नरेश दधीचि)
75. निम्नलिखित में से कौन दार्शनिक हर्म्यूनीटिक्स को ‘सत्तामूलक मोड़’ देता है?
(a) पॉल रिकर (b) डेरिडा
(c) हेबरमास (d) हाइडेगर
Ans. (d) : हाइडेगर के फेनोमेनोलाजी का प्रभाव दर्शन क्षेत्र में इतना हुआ कि भाषा-दर्शन एवं समाज दर्शन दोनों में फेनोमेनोलाजिकल दृष्टि की एक विधा खुल गयी। भाषा दर्शन में ही अर्थ निरूपणता का एक नया आधार उपलब्ध हो गया और फेनोमेनोलाजी के प्रभाव में (Hermeneuties) शास्त्रर्थमीमांसा की एक शाखा विकसित हो गयी जिसे ‘सत्तामूलक मोड़’ कहते है। यू.जी.सी. नेट/जेआरएफ परीक्षा‚ जुलाई-2016 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY) व्याख्या सहित द्वितीय प्रश्न-पत्र का हल
1. वैशेषिक के अनुसार एक घट का असमवायीकारण है :
(a) पृथ्वी स्वयं (b) घट स्वयं
(c) घट के अंश (d) घट के अंशों का संयोजन
Ans. (d) : वैशेषिक दर्शन के अनुसार असमवायीकारण वह गुण या कर्म है जो समवायीकारण में समवाय सम्बन्ध से रहते हैं और कार्योत्पत्ति में सहायक होते हैं। कार्य और उसका असमवायीकारण दोनों ही समवायीकारण में समवाय सम्बन्ध में रहते हैं। ‘घट के अंशों का संयोजन’ घट का असमवायीकारण है‚ क्योंकि वह घट के अंशों में समवाय सम्बन्ध से रहता है।
2. पर्वत: वह्निमान धूमात् उपर्युक्त अनुमान में किस प्रकार का हेत्वाभास है?
(a) असाधारण सव्यभिचार (b) अनुपसंहारी
(c) बाधित (d) व्याप्यत्वासिद्ध
Ans. (d) : पर्वत: वह्निमान धूमात् अर्थात् पर्वत वन्ह्निमान
(अग्निमय) होने के कारण धूमवान है; यहाँ वह्नि और धूम की व्याप्ति नियत नहीं है क्योंकि लोहे के जलते गोले में वह्नि है किन्तु धूम नहीं है; वह्नि और धूम की व्याप्ति आर्द्रन्धनसंयोग रूपी उपाधि के कारण सोयाशिक है‚ क्योंकि गीली लकड़ी के जलने पर ही अग्नि से धूम उत्पन्न होता है। जहाँ ‘हेतु’ सोपाधिक होता है वहाँ ‘व्याप्यत्वसिद्धि’ हेत्वाभास होता है।
3. निम्नलिखित में से किस दर्शन के अनुसार एक वस्तु एक ही समय में ‘हो’ भी सकती है और ‘नहीं भी’?
(a) चार्वाक (b) वेदांत
(c) जैन (d) बौद्ध
Ans. (c) : जैन धर्म के सप्तभंङ्गी नय के तीसरे नय के अनुसार‚ ‘स्यात् अस्ति च नास्ति च’ अर्थात् एक वस्तु है भी और नहीं भी। अर्थात् एक विशेष अर्थ में वह वस्तु है और अन्य अर्थ में नहीं भी है।
4. चार्वाक के अनुसार अनुमान एक प्रमाण नहीं हो सकता क्योंकि :
(a) यह ईश्वर को सिद्ध नहीं कर सकता है।
(b) यह भ्रमातीत नहीं है।
(c) इसकी व्याप्ति को स्थापित नहीं किया जा सकता है।
(d) यह स्व व्याघाती है।
Ans. (c) : चार्वाकों के अनुसार‚ अनुमान का प्रमुख साधन व्याप्ति ज्ञान है‚ जिसे स्वयं अनुमान पर आधारित माना जा सकता है। चार्वाकों के अनुसार व्याप्ति की स्थापना सम्भव नहीं हो सकती है। अत: वह केवल प्रत्यक्ष प्रमाण को ही मानते हैं। चार्वाकों के अनुसार व्याप्ति की स्थापना प्रत्यक्ष के आधार पर सम्भव नहीं है‚ क्योंकि एक साथ सारी घटनाओं का निरीक्षण नहीं किया जा सकता है।
5. वैदिक परम्परा में यज्ञ को निम्नलिखित में से किसके निर्देशन में सम्पन्न किया जाता है?
(a) यजमान (b) ऋत्विक
(c) गृहकर्ता (d) ईश्वर
Ans. (b) : वैदिक परम्परा में यज्ञ को ‘ऋत्विक’ (पुरोहित) के निर्देशन में सम्पन्न किया जाता था। चारों संहिताओं के लिए अलग-अलग ऋत्विक (पुरोहित) है। ऋग्वेद के ऋत्विक को ‘होता’; यजुर्वेद के ऋत्विक ‘अध्वर्यु’‚ सामवेद के ऋत्विक को ‘उद्गाता’ तथा अथर्ववेद के ऋत्विक को ‘ब्रह्मन्’ कहा जाता है।
6. निम्नलिखित में से सही क्रम को बताने वाले कूट का चयन करें :
(a) ब्राह्मण‚ संहिता‚ आरण्यक‚ उपनिषद्
(b) उपनिषद्‚ संहिता‚ आरण्यक‚ ब्राह्मण
(c) संहिता‚ ब्राह्मण‚ आरण्यक‚ उपनिषद्
(d) संहिता‚ उपनिषद्‚ ब्राह्मण‚ आरण्यक
Ans. (c) : ‘संहिता’‚ ब्राह्मण‚ आरण्यक तथा उपनिषद्’ यह सही क्रम है। ‘संहिता’ में मंत्रों के संकलन प्राप्त होते हैं। ‘ब्राह्मण’ में यज्ञ यागादि के विविध अंगों का सर्वांगपूर्ण विवेचन है। ‘आरण्यक’ वनों में (अरण्य में) रहकर किये गये ऋषियों के चिन्तन है और वैदिक साहित्य के अन्तिम भाग के रूप में उपनिषद आते हैं जिनमें वैदिक दार्शनिक चिन्तन पराकाष्ठा को प्राप्त कर लेता है।
7. निम्नलिखित में से किस दार्शनिक सम्प्रदाय की यह धारणा है कि देहपरिमाण ही आत्मा का भी परिमाण है?
(a) चार्वाक (b) वैशेषिक
(c) योग (d) जैन
Ans. (a) : चार्वाको के अनुसार‚ देह और आत्मा कोई पृथक् तत्व नहीं हैं। बल्कि चार भूतों का मिश्रण ही है। अत: जीवित शरीर (देह) से भिन्न कोई आत्मा नहीं है। देह के नष्ट होने पर चैतन्य भी नष्ट हो जाता है। इसे ही देहपरिमाणवाद या देहात्मवाद कहते हैं।
8. नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिया गया है। उन पर न्याय दर्शन के परिप्रेक्ष्य में विचार करें और नीचे दिए गए कूट में से सही का चयन करें :
अभिकथन (A) : लक्षणा एक वृत्ति नहीं हो सकती है। कारण (R) : शक्ति एक वृत्ति है और शक्ति लक्षणा नहीं है।
कूट :
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत करता है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत नहीं करता है।
(c) (A) सही है और (R) गलत है।
(d) (A) गलत है और (R) सही है।
Ans. (d) : प्राचीन नैयायिकों ने वृत्ति के तीन भेद किये हैं−संकेत‚ परिभाषा और लक्षणा। संकेत को शक्ति‚ अभिद्या‚ वाचकता‚ मुख्य वृत्ति भी कहते हैं। लेकिन शक्ति‚ लक्षणा नहीं है। ‘शक्ति’ मुख्य वृत्ति तथा ‘लक्षणा’ गौड़ वृत्ति है। अत: (A) गलत है तथा (R) सही है। (भारतीय दर्शन : डॉ. नन्द किशोर देवराज)
9. निम्नलिखित में से किसके द्वारा ऋषिऋण से उऋण हुआ जा सकता है?
(a) ब्रह्मचर्य का पालन करके
(b) यज्ञ करके
(c) पुत्र उत्पन्न करके
(d) निर्धन की सहायता करके
Ans. (a) : ऋषिऋण से उऋण होने के लिए हमें स्वाध्याय और ‘ब्रह्मचर्य’ का पालन करना चाहिए। ‘यज्ञ करके’ देव ऋण से और पुत्र उत्पन्न करके पूर्वजों के ऋण (पितृ-ऋण) से मुक्ति मिलती है।
10. नीचे एक अभिकथन (A) और एक कारण (R) दिया गया है। इन्हें न्याय वैशेषिक दर्शन के परिप्रेक्ष्य में विचार कीजिए और नीचे दिए गए कूटों में से सही का चयन कीजिए :
अभिकथन (A) : मुक्त आत्मा जड़ ही है। कारण (R) : मुक्त आत्मा अपनी चेतना को भी खो देती है।
कूट :
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत करता है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत नहीं करता है।
(c) (A) सही है और (R) गलत है।
(d) (A) गलत है और (R) सही है।
Ans. (d) : मुक्तावस्था में आत्मा में विभिन्न गुणों का अभाव हो जाता है। वह अपनी पूर्वावस्था में लौट जाती है। आत्मा जड़ ही नहीं है। आत्मा वास्तविक स्वरूप में आध्यात्मिक और अभौतिक द्रव्य है। वास्तव में आत्मा की जड़ता की जो बात कही गयी है वह भौतिक जड़ता नहीं। आत्मा विशुद्ध रूप से चैतन्य नहीं है। चेतना उसका आगन्तुक गुण है। मुक्तावस्था में वह जड़‚ अभौतिक‚ आध्यात्मिक है।
11. वैशेषिक के अनुसार निम्नलिखित में से कौन-सा एक त्र्सरेणु के परिमाण का कारण है?
(a) परमाणुओं की संख्या (b) द्वयणुको की संख्या
(c) त्र्सरेणुओं की संख्या (d) त्र्सरेणु स्वयं
Ans. (c) : एक त्र्सरेणु के परिमाण का कारण वैशेयिक दर्शन में त्र्सरेणुओं की संख्या है। न्याय−वैशेषिक दर्शन परमाणुओं के द्वारा शृष्टि की उत्पत्ति का सिद्धान्त देता है। उसके अनुसार सर्वप्रथम दो परमाणुओं से द्वयणुक का निर्माण होता है फिर तीन द्वयणुकों से त्र्सरेणु का और चार त्र्सरेणु मिलक चतुर्णुक और इसी प्रकार शृष्टि होती है।
12. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूट में से सही कूट का चयन कीजिए:
सूची–I सूची–II
a. ब्रह्मसूत्र i. कणाद
b. मीमांसासूत्र ii. जैमिनी
c. वैशेषिक सूत्र iii. पतंजलि
d. योगसूत्र iv. बादरायण
कूट :
(a) i ii iii iv
(b) i iii ii iv
(c) iv ii i iii
(d) iv i ii iii
Ans. (c)
(a) ब्रह्मसूत्र (iv) बादरायण
(b) मीमांसासूत्र (ii) जैमिनि
(c) वैशेषिक सूत्र (i) कणाद
(d) योगसूत्र (iii) पतंजलि
13. किसका मत है कि ‘धर्म स्वीकार्यता’ है‚ सहिष्णुता नहीं?
(a) श्री अरविन्द (b) विवेकानन्द
(c) जे. कृष्णमूर्ति (d) राधाकृष्णन्
Ans. (b) : स्वामी विवेकानन्द के अनुसार ‘धर्म स्वीकार्यता’ है‚ सहिष्णुता नहीं। विवेकानन्द कहते हैं कि यदि एक धर्म दूसरे को केवल ‘सहन’ करता रहे तो उसमें ‘सार्वभौमिकता’ की दृष्टि नहीं जाग सकती। उसके लिए अन्य धर्मों के लिए भावात्मक दृष्टि अनिवार्य है। इसे तो विवेकानन्द ‘स्वीकृति’ (Acceptance) कहते हैं।
14. किसका मत है कि जगत ‘मानव आत्म रूप का पालना’ है?
(a) जे. कृष्णमूर्ति (b) के. सी. भट्टाचार्य
(c) विवेकानन्द (d) टैगोर
Ans. (d) : रवीन्द्र नाथ टैगोर‚ जगत की वास्तविकता पर विश्वास करते हैं। अत: उन्होंने जगत का विशद विवरण दिया है‚ जिसमें मानववादी अंश विद्यमान हैं। उनके अनुसार‚ जगत‚ ‘मानव आत्म रूप का पालना है।’ रवीन्द्र नाथ टैगोर अपनी कविताओं में‚ अपनी रचनाओं में प्रकृति की मानवीय दृष्टि से व्याख्या प्रस्तुत किया है।
15. कौन दार्शनिक प्रतिपादित करता है कि व्यक्तिगत विकास के लिए पुनर्जन्म अपरिहार्य है?
(a) राधाकृष्णन् (b) गाँधी
(c) श्री अरविन्द (d) टैगोर
Ans. (c) : श्री अरविन्द मानते हैं कि व्यक्तिगत विकास के लिए पुनर्जन्म आवश्यक है। श्री अरविन्द के अनुसार विकास प्रक्रिया मानस के स्तर तक पहुँच चुकी है तथा अतिमानस में प्रवेश को आतुर है। इस प्रक्रिया को सक्रिय रखने का एक उपकरण पुनर्जन्म है। ईशवरत्न की उपलब्धि का ढंग जन्म तथा पुनर्जन्मों के मार्गों से होता हुआ क्रमिक उपलब्धि है। सम्भवत: ईश्वरीय लीला का यह उपकरण है।
16. निम्नलिखित में से किसका मत है कि ‘निषेध का क्षेत्र अनिर्दिष्टता का क्षेत्र है’?
(a) के. सी. भट्टाचार्य (b) विवेकानन्द
(c) टैगोर (d) राधाकृष्णन्
Ans. (a) : के. सी. भट्टाचार्य के अनुसार‚ ‘निषेध का क्षेत्र अनिर्दिष्टता का क्षेत्र है।’ कोई भी ज्ञात भाव या कोई ज्ञात अन्तर्वस्तु निरपेक्ष सत् को निरूपित करने में असमर्थ है‚ क्योंकि हर भावात्मक सम्बन्ध उसे कुछ हद तक निश्चित कर देगा। निरपेक्ष सत् किसी भी रूप में इस प्रकार की निश्चित अवगति नहीं दे सकती उसमें अनिश्चितता है क्योंकि उसमें अनिर्दिष्टता है वह निर्धारित नहीं हो सकता है। यदि किसी प्रकार हम निषेध-प्रक्रिया को उसकी उच्चतम सीमा तक ले जा सकें तो उसी रूप में निरपेक्ष सत् की अवगति सम्भव है। यह निषेध प्रक्रिया का चरम महत्व है।
17. निम्नलिखित में से किसका कथन है कि ‘शिक्षा का अर्थ व्यक्ति के शरीर‚ मन‚ आत्म में जो शुभत्व है उसे प्रकट करने का प्रयत्न है’?
(a) टैगोर (b) विवेकानन्द
(c) श्री अरविन्द (d) गाँधी
Ans. (d) : गाँधी का समाज तथा राजनीति दर्शन भी इस विश्वास पर आधारित है कि हर व्यक्ति में एक अनिवार्य शुभत्त्व का वास है। शुभत्त्व को जाग्रत रखने के लिए उपयुक्त शिक्षा की आवशयकता है। गाँधी शिक्षा को एक सर्वांड्गी विकास मानते हैं। शरीर‚ मन तथा आत्म का सर्वांङ्गी विकास ही शिक्षा का लक्ष्य गाँधी जी के अनुसार ‘शिक्षा का अर्थ व्यक्ति के शरीर‚ मन‚ आत्म में जो शुभत्व है उसे प्रकट करने का प्रयत्न करना − उसे विकसित करने का प्रयत्न करना है।
18. निम्नलिखित में से कौन सही है?
(ग्रन्थ) (लेखक)
(a) फिलॉस़फी ऑफ हिन्दूइज्म‚ ऑन फीयर – अम्बेडकर
(b) यू. आर द वर्ल्ड‚ द लिमिट्स ऑफ थॉट – जे. कृष्णमूर्ति
(c) फ्रूट गैदरिंग‚ टोटल फ्रीडम – टैगोर
(d) ह्यूमन सायकिल‚ द रीकवरी ऑफ फेथ – श्री अरविन्द
Ans. (b) : यू. आर द वर्ल्ड‚ द लिमिट्स ऑफ थॉट − जे.
कृष्णमूर्ति।
जे. कृष्णमूर्ति का दर्शन ‘ध्यान’ के माध्यम से मानसिक क्रान्ति‚ मानवीय सम्बन्ध तथा सकारात्मक परिवर्तन कैसे लायें आदि का खोज है।
19. नीचे दिए गए अभिकथन (A) और कारण (R) पर विचार कीजिए और नीचे दिए गए कूटों में से सही उत्तर का चयन कीजिए :
अभिकथन (A) : केवल निषेध के अर्थ में शून्यता शुद्ध अभाव है। कारण (R) : ज्ञान के सभी वैध साधनों से शून्यता बाधित हो जाती है।
कूट :
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत नहीं करता है।
(b) (A) गलत है और (R) सही है और (R), (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत करता है।
(c) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत करता है।
(d) (A) सही है और (R) गलत है और (R), (A) की गलत व्याख्या प्रस्तुत करता है।
Ans. (c) : शून्यता को चतुष्कोटि विनिर्मुक्त माना गया है। यदि किसी भी कोटि से ‘शून्यता’ के बारे में कुछ कहेंगे तो यह विरोधाभासी होगा। माध्यमिकों के अनुसार यदि निषेध मुख से अथवा निषेध के माध्यम से शून्य के बारे में कुछ कहें तो वह ‘शुद्ध अभाव’ होगी।
20. रामानुज-वेदान्त में‚ अधोलिखित अभिकथनों में एक के सिवाय सभी सत्य हैं :
(a) जीव का ब्रह्म से अवयव-अवयवी सम्बन्ध है।
(b) जीव का ब्रह्म के साथ ऐक्य है।
(c) जीव ब्रह्म का विशेषण है।
(d) जीव ब्रह्म पर पूर्णत: आश्रित है।
Ans. (b) : रामानुज-वेदान्त‚ शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त के विपरीत ‘विशिष्टाद्वेत के नाम से जाना जाता है। रामानुज जीव और ब्रह्म में अवयव-अवयवी (सावयवी) सम्बन्ध मानते हैं। जीव ब्रह्म का विशेषण है तथा ब्रह्म पर आश्रित है। जीव ईश्वर का गुण-धर्म है। जीव का ब्रह्म के साथ एक न होकर अपृथक सिद्धि है जो आन्तरिक अपार्थक्य है।
21. ‘‘एक सीपी में दिखाई देने वाली चाँदी असत् नहीं हो सकती क्योंकि यह दिखती है; यह चाँदी सत् भी नहीं हो सकती क्योंकि जब हम सीपी को विधिवत् देखते हैं तो यह वहाँ उपस्थित नहीं होती।’’ यह अवधारणा है:
(a) विशिष्टाद्वैती (b) शून्यवादी
(c) सांख्यवादी (d) अद्वैती
Ans. (d) : जब कोई वस्तु एक दृष्टि से सत् भी न हो और असत् भी न हो तो वे अनिर्वचनीय ख्याति होती है जिसे अद्वैत वेदान्ती मानते हैं।
22. ‘‘ब्रह्म सभी वास्तविकताओं में स्वतंत्र है; कुछ भी उसके समान अथवा उससे श्रेष्ठ नहीं है’’−इस विचार का समर्थन किया है:
(a) शंकर (b) ईश्वरकृष्ण
(c) मध्वा (d) प्रभाकर
Ans. (c) : मध्वाचार्य अपने द्वैतवादी दर्शन में ब्रह्म को ही एकमात्र स्वतन्त्र तत्व मानते हैं। ब्रह्म ही एकमात्र निरपेक्ष सत् एवं परमतत्व है जो सवर्गगुण सम्पन्न है। मध्वाचार्य के अनुसार‚ ‘ब्रह्म सभी वास्तविकताओं में स्वतंत्र है; कुछ भी उसके समान अथवा उससे श्रेष्ठ नहीं है।
23. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर का चयन कीजिए:
सूची–I सूची–II
i. ब्रह्मसूत्र A. प्रस्थानत्रय
ii. मीमांसासूत्र B. स्वर्ग प्राप्ति
iii. वैशेषिक सूत्र C. असम्प्रजात समाधि
iv. योगसूत्र D. पुरुष-प्रकृति-विवेक ज्ञान
कूट :
A B C D
(a) ii i iv iii
(b) iv iii ii i
(c) iii iv i ii
(d) iii iv ii i
Ans. (b)
(i) सांख्य (d) पुरुष-प्रकृति विवेक
(ii) योग (c) असम्प्रज्ञात समाधि
(iii) पूर्व मीमांसा (b) स्वर्ग प्राप्ति
(iv) वेदान्त (a) प्रस्थानत्रय
24. सांख्य-योग के अनुसार पुरुष है:
(a) चेतन और सक्रिय (b) चेतन और जड़
(c) अचेतन और सक्रिय (d) अचेतन और जड़
Ans. (b) : सांख्य-योग में दो स्वतंत्र तत्व स्वीकार किये गये हैं। एक जड़ प्रकृति और दूसरा चेतन पुरुष। सांख्य दर्शन में पुरुष का स्वरूप चैतन्य है। वह साक्षी है‚ निष्क्रिय या उदासीन (Inactive) है‚ कुटस्थ-नित्य एवं अपरिवर्तनशील है। वह नित्यमुक्त (केपल्य)‚ उदासीन (माध्यस्थ); द्रष्टा एवं अकर्ता है। वह अज‚ नित्य‚ सर्वव्यापी‚ अनाश्रित‚ अलिङ्ग‚ निरवयव एवं स्वतंत्र है।
25. स्कंध को सही क्रम में प्रस्तुत करने वाले कूट का चयन करें :
(a) विज्ञान‚ रूप‚ वेतना‚ संज्ञा और संस्कार
(b) संज्ञा‚ विज्ञान‚ रूप‚ वेदना और संस्कार
(c) रूप‚ वेदना‚ संज्ञा‚ संस्कार और विज्ञान
(d) रूप‚ संज्ञा‚ वेदना‚ संस्कार और विज्ञान
Ans. (c) : गौतम बुद्ध आत्मा का विश्लेषण उसके घटकों में करते हैं। जैसाकि बागसेन−मिलिन्द संवाद से ज्ञात होता है कि आत्मा ‘पंचस्कन्धों का संघात’ है। ये पांच स्कन्ध क्रमश:−रूप‚ वेदना‚ संज्ञा‚ संस्कार और विज्ञान है। रूप स्कन्ध आत्मा का भौतिक घटक है और बाकी मानसिक घटक है।
26. ‘‘आकार वस्तुओं से पृथक नहीं हैं‚ बल्कि उनमें अन्तर्निष्ठ हैं; वे इन्द्रियातीत नहीं हैं बल्कि अनुस्यूत हैं।’’ यह दृष्टिकोण निमनलिखित में से किस ग्रीक दार्शनिक का है?
(a) सुकरात (b) प्लेटो
(c) अरस्तु (d) डेमोक्राइटस
Ans. (c) : अरस्तु अपने ‘आकार सिद्धान्त’ में कहते हैं कि ‘आकार वस्तुओं से पृथक् नहीं है‚ बल्कि उनमें अन्तर्निष्ठ है; वे इन्द्रयातीत नहीं है बल्कि अनुस्युत है।’ ध्यातव्य हो इससे पहले प्लेटो अपने आकारों को इन्द्रियातीत और वस्तुओं से पृथक् मानते हैं और उन्हें अलग लोक का निवासी कहते हैं।
27. नीचे दो कथन दिए गए हैं‚ इनमें से एक को अभिकथन
(A) और दूसरे को कारण (R) की संज्ञा दी गई है। प्लेटो की ज्ञानमीमांसा के परिप्रेक्ष्य में (A) और (R) पर विचार करते हुए सही कूट का चयन करें :
अभिकथन (A) : संकल्पनात्मक ज्ञान ही विशुद्ध ज्ञान है। कारण (R) : संकल्पनात्मक ज्ञान अनुकूल आदर्श अथवा अमूर्त वस्तुओं की यथार्थता के लिए आवश्यक नहीं होता।
कूट :
(a) दोनों (A) और (R) सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) दोनों (A) और (R) सही हैं लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही है‚ लेकिन (R) गलत है।
(d) (A) गलत है‚ लेकिन (R) सही है।
Ans. (c) : प्लेटो की ज्ञानमीमांसासा बुद्धिवादी ज्ञानमीमांसा है जो इन्द्रियानुभव को ज्ञान नहीं मानता है। वह संकल्पनात्मक ज्ञान या प्रत्ययात्मक ज्ञान को ही विशुद्ध ज्ञान मानता है। जिसका ज्ञान हमें बुद्धि या प्रतिभा (Rational Insight) के माध्यम से होता है। संकल्पनात्मक ज्ञान अनुकूल आदर्श अथवा अमूर्त वस्तुओं की यथार्थता के लिए आवश्यक होता है। प्लेटो सामान्यों के यथार्थवादी सिद्धान्त का प्रवर्तक है।
28. सेंट ऐन्सल्म के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए और सही कूट का चयन कीजिए :
(i) उसने आस्था की सत्यता के लिए आवश्यक कारणों को जानने का प्रयास किया।
(ii) ‘‘मैं समझने के लिये विश्वास करता हूँ।’’
(iii) ईश्वर से हमारा अभिप्राय है ‘कि इससे ज्यादा व्यापक नहीं सोचा जा सकता।’
कूट :
(a) मात्र (i) सही है।
(b) मात्र (i) और (ii) सही हैं।
(c) मात्र (iii) सही है।
(d) सभी (i), (ii) और (iii) सही हैं।
Ans. (d) : सेंट ऐन्सल्म मध्ययुगीन इसाई दार्शनिक है। उनके अनुसार‚ ‘मैं समझने’ के लिए विश्वास करता है। अन्सेलम ने आस्था की सन्यता के लिए आवश्यक कारणों को जानने का प्रयास किया। ऐन्सल्म के अनुसार‚ ईश्वर एक ऐसी सत्ता है जिससे अधिक महान (व्यापक) तत्व के बारे में नहीं सोचा जा सकता है। अन्सेलन के द्वारा ईश्वर के अस्तित्व के सम्बन्ध में दिया गया सत्तामूलक तर्क प्रसिद्ध है।
29. नीचे दो कथन दिए गए हैं‚ इनमें से एक को अभिकथन
(A) और दूसरे को कारण (R) की संज्ञा दी गई है। थेल्स के परिप्रेक्ष्य में (A) और (R) पर विचार करते हुए सही
कूट का चयन करें :
अभिकथन (A) : चुंबक में आत्मा है। कारण (R) : चुंबक अन्य वस्तुओं को हिलाने की क्षमता रखता है।
कूट :
(a) दोनों (A) और (R) सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) दोनों (A) और (R) सही हैं लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही है‚ लेकिन (R) गलत है।
(d) (A) गलत है‚ लेकिन (R) सही है।
Ans. (a) : थेल्स पाश्चात्य दर्शन के जनक थे। आयोनियन
(माइलेशियन स्कूल) सम्प्रदाय के संस्थापक हैं। जल को सृष्टि का मूल आधार मानते हैं। इनके अनुसार चुम्बक में प्राण (आत्मा) है क्योंकि यह लोहे को स्पन्दित (हिलाने की क्षमता) करने की क्षमता रखता है।
(पाश्चात्य दर्शन का इतिहास−1−प्रो. दयाकृष्ण)
30. हेराक्लाइटस के दृष्टिकोण से निमनलिखित कथनों पर विचार करें और सही कूट का चयन करें :
(i) हेराक्लाइटस ने माना कि संसार हमेशा से अस्तित्व में था और इसलिए विश्वोत्पत्ति को अस्वीकार किया।
(ii) संसार और इसके घटक निरन्तर प्रवाहमान हैं।
(iii) उन्होंने तर्क दिया कि ऊर्ध्वागामी मार्ग अधोगामी मार्ग के समान है।
कूट :
(a) मात्र (i) सही है।
(b) मात्र (i) और (ii) सही हैं।
(c) सभी (i), (ii) और (iii) सही हैं।
(d) मात्र (i) और (iii) सही हैं।
Ans. (c) : हेराक्लाइटस ‘परिवर्तन−सिद्धान्त’ ‘सम्भूति सिद्धान्त’ के प्रतिपादक हैं। जिसके अनुसार परिवर्तन ही सत् है। स्थिरता और अभेद मिथ्या है। जगत में कोई भी स्थिर नहीं है। हेराक्लाइट्स संसार उत्पत्ति और विनाश की प्रक्रिया को क्रमश: उर्ध्वगामी मार्ग तथा अधोगामी मार्ग कहा है। इन दोनों प्रक्रियाओं को एक और अभिन्न कहा है। हेराक्लाइट्स एक आरम्भ बिन्दु और प्रत्यावर्तन बिन्दु मानकर चलते हैं। वे संसार के अस्तित्व को हमेशा से मानते हैं। (पाश्चात्य दर्शन का इतिहास−1−प्रो. दयाकृष्ण)
31. सेंट अगस्टीन के परिप्रेक्ष्य में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए और सही कूट का चयन कीजिए :
(i) परिवर्तनशीलता प्रत्येक प्राणी की विशेषता है।
(ii) ईश्वर सुनिश्चित तौर पर अपरिवर्त्य है।
(iii) परिवर्तनशील वस्तुएँ पूर्णत: नहीं‚ लेकिन आंशिक रूप में सत् होती हैं।
(iv) सभी प्राणी पूर्णत: सत् होते हैं।
कूट :
(a) मात्र (i) और (ii) सही हैं।
(b) मात्र (ii) और (iv) सही हैं।
(c) मात्र (iii) और (iv) सही हैं।
(d) मात्र (i), (ii) और (iii) सही हैं।
Ans. (d) : सन्त ऑगस्टीन मध्यकालीन इसाई दार्शनिक हैं। उनके अनुसार‚ परिवर्तनशीलता प्रत्येक प्राणी की विशेषता है। लेकिन ईश्वर का स्वरूप और संकल्प अपरिवर्तनशील (Immutible) है। वह परिवर्तनशील वस्तुओं को आंशिक रूप में सत् मानता है। अत:
वह सभी प्राणियों को पूर्णत: सत् भी नहीं मानता है‚ आंशिक सत् ही मानता है। (A History of Philosophy : Frank Thilly)
32. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर का चयन कीजिए:
सूची–I सूची–II
i. लॉक a. ‘मैं चिंतन करता हूँ इसलिए मैं हूँ’।
ii. डेकार्ट b. ईश्वर सर्वव्यापी है।
iii. स्पिनो़जा c. पूर्व स्थापित सामंजस्य।
iv. लाइब्नी़ज d. द्वितीयक गुण आत्मनिष्ठ है।
कूट :
a b c d
(a) iii ii i iv
(b) ii iii iv i
(c) i iv ii iii
(d) iv i iii ii
Ans. (b)
(i) लॉक द्वितीयक गुण /उपगुण आत्मनिष्ठ है।
(ii) डेकार्ट ‘मैं चिंतन करता हूँ इसलिए मैं हूँ’।
(iii) स्पिनो़जा ईश्वर सर्वव्यापी है।
(iv) लाइब्नी़ज पूर्व स्थापित सामंजस्य।
33. नीचे दिए गए अभिकथन (A) और कारण (R) पर विचार करते हुए दिए गए कूटों में से सही विकल्प का चयन करें :
अभिकथन (A) : लाइबनी़ज के अनुसार द्रुतवेगी वायु और दरवा़जे के बंद होने में अनिवार्य सम्बन्ध है। कारण (R) : यह पूर्व-स्थापित सामंजस्य है।
कूट :
(a) (A) सही है और (R) गलत है और (R), (A) की गलत व्याख्या प्रस्तुत करता है।
(b) दोनों (A) और (R) सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत करता है।
(c) (A) गलत है और (R) सही है और (R), (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत करता है।
(d) दोनों (A) और (R) सही हैं और (R), (A) की गलत व्याख्या प्रस्तुत करता है।
Ans. (b) : लाइवनीत्ज पूर्व स्थापित सामंजस्य मानता है। उसके अनुसार ईश्वर ने सभी चिट्टणुओं को स्वतंत्र बनाया है। ईश्वर उन्हें ऐसा बनाया है कि वे परस्पर एकता अथवा सामंजस्य में पूर्व से बंधे हैं। इसी अर्थ में द्रुतवेगी वायु और दरवाजे के बन्द होने में अनिवार्य सम्बन्ध है।
34. सिवाय एक के निम्नलिखित सभी कथन स्पिनो़जा के अननुरूप हैं :
(a) मन और शरीर परस्पर दो भिन्न द्रव्य हैं।
(b) संदेह से संदेहकर्ता का अस्तित्व सिद्ध होता है।
(c) ईश्वर सत्तात्मक दृष्टि से संसार से भिन्न है।
(d) संसार और इसके परिवर्तन ईश्वर के प्रकार्य हैं।
Ans. (d) : स्पिनोजा के अनुसार ईश्वर निर्विकार और निराकार तत्व है। स्पिनोजा के अनुसार‚ संसार से ईश्वर सत्तात्मक दृष्टि से भिन्न है। संसार और इसके परिवर्तन ईश्वर के प्रकार्य न होकर‚ ईश्वर पर आश्रित जरूर हैं। प्रकार्य द्रव्य के आगंतुक लक्षण हैं जो गुणों के माध्यम से अभिव्यक्त होते हैं।
35. ‘‘सम्पूर्ण ब्रह्मांड पदार्थ के प्रत्येक घटक में प्रतिबिंबित होता है सिवाय इस अंतर के कि यह एक घटक में कुछ भिन्नता के साथ प्रतिबिंबित होता है।’’ यह स्थिति स्वीकार्य है :
(a) स्पिनो़जा (b) लाइबनी़ज
(c) डेकार्ट (d) सेंट थॉमस एक्विनॉस
Ans. (b) : लाइबनित्ज के अनुसार ‘प्रत्येक चिदणु विश्व का दर्पण है।’ उसके अनुसार‚ ‘सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड पदार्थ के प्रत्येक घटक में प्रतिबिंबित होता है सिवाय इस अन्तर कि यह एक घटक से दूसरे घटक में कुछ भिन्नता के साथ प्रतिबिन्बित होता है।
(A History of Philosophy : Frank Thilly)
36. जी. ई. मूर का प्रत्ययवाद का खण्डन निम्नलिखित में से किस एक पर आधारित है?
(a) बोध की क्रिया और बोध के विषय के बीच भिन्नता
(b) ज्ञाता और ज्ञान की क्रिया के बीच भिन्नता
(c) ज्ञाता और वस्तु के बीच भिन्नता
(d) भाव और संदर्भ के बीच भिन्नता
Ans. (a) : मूर के अनुसार प्रत्यय का तात्पर्य ‘बोध की क्रिया’ है। जानने (बोध) की क्रिया स्वयं ज्ञान का विषय नहीं हो सकती है। प्रत्ययवादियों की सही भूल है। कि वे ‘ज्ञात वस्तु’ और ‘यथार्थ वस्तु’ को एक मान लेते हैं। अर्थात् मूर के अनुसार‚ बोध की क्रिया और बोध के विषय के बीच भिन्नता है।
37. रसेल की पुस्तक ‘प्रोब्लेम्स ऑफ फिलोसॉफी’ के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य है?
(a) सामान्य की ही वास्तविक सत्ता होती है‚ जो न तो मानसिक और न ही भौतिक जगत में होती है फिर भी उनकी स्थानापन्न अथवा तार्किक स्थिति होती है।
(b) सामान्य की वास्तविक सत्ता नहीं होती है‚ वह सिर्फ कल्पना में होती है।
(c) सामान्य की ही वास्तविक सत्ता होती है‚ वह मानसिक और भौतिक दोनों जगत में होती है।
(d) सामान्य की ही वास्तविक सत्ता होती है‚ वह सिर्फ मानसिक जगत में होती है।
Ans. (a) : रसेल अपनी पुस्तक ‘प्रोब्लेम्स ऑफ फिलोसॉफी’ में दर्शन के विभिन्न समस्याओं पर विचार करते हैं। जिसमें सामान्य पर भी विचार करते हैं। उनके अनुसार‚ सामान्य की ही वास्तविक सत्ता होती है‚ जो न तो मानसिक और न ही भौतिक जगत में होती है फिर भी उनकी स्थानापन्न या तार्किक स्थिति होती है।
38. तार्किक प्रत्यक्षवाद के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए और सही कूट का चयन कीजिए :
(i) सबल अर्थ में सत्यापयनीयता का तात्पर्य है कि अर्थपूर्णता के लिए किसी कथन की सत्यता अथवा असत्यता को अनुभव सिद्ध होना चाहिए।
(ii) तार्किक अनुभववादी सत्यापयनीता को अर्थ के मानदण्ड के रूप में प्रयोग करते हैं।
(iii) सबल अर्थ में सत्यापयनीयता का तात्पर्य है सत्यापयनीयता की प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष विधि का होना।
कूट :
(a) मात्र (i) सही है।
(b) मात्र (i) और (ii) सही हैं।
(c) मात्र (iii) सही है।
(d) मात्र (i) और (iii) सही हैं।
Ans. (b) : ‘तार्किक प्रत्यक्षवाद’ अथवा तार्किक अनुभववाद अथवा तार्किक भाववाद अर्थ के सत्यापनीयता सिद्धान्त का समर्थन करता है। जिसके अनुसार सबल अर्थ में सत्यापनीयता का तात्पर्य है कि अर्थपूर्णता के लिए किसी कथन की सत्यता अथवा असत्यता को अनुभव सिद्ध होना चाहिए। तार्किक भाववादी/अनुभववादी सत्यापनीयता को अर्थ के मानदण्ड के रूप में प्रयोग करते हैं।
39. यह दृष्टिकोण कि ‘‘प्रसन्नता ऐसे सुखद क्षणों की प्रबलता नहीं है जो दुख से मुक्त है अपितु शक्ति के अभिधारण और उसके प्रयोग में है।’’ − निम्नलिखित में से किससे सम्बन्धित है?
(a) हेगल (b) मूर
(c) नीत्शे (d) हाइडेगर
Ans. (c) : नीत्शे का दर्शन ‘अतिमानववाद’ और ‘शक्तिवाद’ पर आधारित है। प्रसन्नता के बारे में वे विचार व्यक्त करते हुए कहते हैं कि ‘प्रसन्नता (Happiness) ऐसे सुखद क्षणों की प्रबलता नहीं है जो दुख से मुक्त है‚ अपितु शक्ति के अभिधारण और उसके प्रयोग में है।’ (नीतिशास्त्र का सर्वेक्षण : संगमलाल पाण्डेय)
40. सी. एस. पियर्स के उपयोगितावाद के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए और सही कूट का चयन कीजिए :
(i) उपयोगितावाद प्रतिबिंब की पद्धति नहीं है।
(ii) विचारों को स्पष्ट करने के अपने प्रयोजन हेतु उपयोगितावाद प्रतिबिंब की पद्धति है।
(iii) अवधारणों के अर्थ को स्पष्ट करने की एक मात्र पद्धति है।
कूट :
(a) मात्र (i) सही है।
(b) मात्र (i) और (ii) सही हैं।
(c) मात्र (ii) सही है।
(d) मात्र (ii) और (iii) सही हैं।
Ans. (d) : अमेरिकी दार्शनिक चार्ल्स सेण्डर्स पर्स (C.S. Peirce) को उपयोगितावाद ‘Pragmaticism’ शब्द का प्रथम प्रयोगकर्ता दर्शन में माना जाता है। (विलियम जेम्स के अनुसार) पर्स के अनुसार‚ अवधारणाओं के अर्थ को स्पष्ट करने की एकमात्र पद्धति उपयोगितावाद है तथा विचारों को स्पष्ट करने के अपने प्रयोजन हेतु यह प्रतिबिम्ब पद्धति है।
41. हेगल के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए और सही कूट का चयन कीजिए :
(i) विकास कालिक नहीं अपितु एक तार्किक प्रक्रिया है।
(ii) निरपेक्ष सत्ता में एकता एवं विरोध दोनों हैं।
(iii) सत एक बौद्धिक प्रक्रिया‚ एक क्रमिक विकास है।
कूट :
(a) मात्र (i) सही है।
(b) मात्र (i) और (ii) सही हैं।
(c) मात्र (i) और (iii) सही हैं।
(d) मात्र (i), (ii) और (iii) सही हैं।
Ans. (d) : हेगल निरपेक्ष प्रत्ययवाद के समर्थक हैं। उनके अनुसार‚ ‘सत् बोध है और बोध सत् है’ (Real is Rational and Rational is Real). यह विचारों के विकास की बात करते हैं। उनके अनुसार विकास कालिक नहीं अपितु एक तार्किक प्रक्रिया है। सत् एक बौद्धिक प्रक्रिया है। दर्शन का उद्देश्य सत के विकास का सम्यक् मूल्यांकन करना है क्योंकि हेगल के अनुसार सत् बोधगम्य‚ एक क्रमिक विकास है। इस निरपेक्ष सत्ता में एकता (Unity) और विरोध (opposition) दोनों है।
42. सूची-I के साथ सूची-II को सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूटों का उपयोग करते हुए सही उत्तर का चयन कीजिए:
सूची–I सूची–II
a. उच्चतम निश्चितता के लिए हमारी स्वीकृति ही आस्था है।
i. हेगल
b. यद्यपि हमारा समस्त ज्ञान अनुभव से प्रारम्भ होता है परन्तु इसका अर्थ ये नहीं है कि यह अनुभव से उत्पन्न होता है।
ii. ह्यूम
c. विचार अत्यधिक सरल‚ अमूर्त एवं रिक्त अवधारणाओं से अधिक जटिल मूर्त और बलवती धारणा की ओर बढ़ते हैं।
iii. कांट
d. मस्तिष्क विभिन्न अवबोधनों का समूह अथवा संग्रहण है।
iv. लॉक
कूट :
a b c d
(a) iv ii i iii
(b) ii iv iii i
(c) iv i ii iii
(d) iii ii i iv
Ans. (*) : यह प्रश्न गलत उत्तरों वाला है। फिर भी इसका सम्भावित उत्तर है−
(a) ‘उच्चतम निश्चितता के लिए हमारी स्वीकृति आस्था है’ − हेगल
(b) यद्यपि हमारा समस्त ज्ञान अनुभव से प्रारम्भ होता है परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि यह अनुभव से उत्पन्न होता है − कांट
(c) विचार अत्यधिक सरल‚ अमूर्त एवं रिक्त अवधारणाओं से अधिक जटिल‚ मूर्त और बलवती धारण की ओर बढ़ते हैं − लॉक
(d) मस्तिष्क विभिन्न अवबोधनों (sensations) का समूह अथवा संग्रहण है − ह्यूम
43. जब मस्तिष्क किसी अन्य विचार के हस्तक्षेप के बिना प्रत्यक्ष निरीक्षण के द्वारा दो विचारों की स्वीकृति अथवा अस्वीकृति का अनुभव करता है तो इसे जाना जाता है :
(a) अर्न्तदर्शी ज्ञान (b) निरूपणात्मक ज्ञान
(c) संवेदी ज्ञान (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Ans. (a) : जब मस्तिष्क किसी अन्य विचार के हस्तक्षेप के बिना प्रत्यक्ष निरीक्षण के द्वारा दो विचारों की स्वीकृति अथवा अस्वीकृति का अनुभव करता है तो इसे ‘अर्न्तदर्शीय ज्ञान’ (Intuitive knowledge) कहते हैं। इसमें इन्द्रिय सम्वेदनों के बिना ज्ञान प्राप्त होता है।
44. काण्ट के अनुसार निम्नलिखित में से निर्णय का सुनिश्चित स्वरूप कौन-सा है?
(a) प्रत्येक कार्य का एक कारण होता है।
(b) यह विष हो सकता है।
(c) द्रव्य या तो ठोस है अथवा तरल है।
(d) उपर्युक्त सभी
Ans. (a) : काण्ट बारह प्रकार के निर्णयों की व्याख्या ‘अतीन्द्रिय तर्कशास्त्र’ के अन्तर्गत करते हैं जिनसे 12 प्रकार के बुद्धि विकल्पों का निगमन होता है। इन निर्णयों को चार वर्गों में जिनमें तीन-तीन निर्णय प्रत्येक वर्ग में रखा गया है। अन्तिम वर्ग प्रकारतावाचक
(modal) का है। जिसमें अन्तिम बारहवां निर्णय आवश्यक
(Apodictic) है। यह अनिवार्यता एवं आपातिकता नामक बुद्धि विकल्प का निर्देश करता है जैसे−प्रत्येक कार्य का एक कारण होता है।
45. दिए गए अभिकथन (A) और कारण (R) पर विचार कीजिए और नीचे दिए कूटों में से सही विकल्प का चयन करें :
अभिकथन (A) : ह्यूम के लिए‚ हमें द्रव्य को कोई प्रत्यय नहीं होता। कारण (R) : हमें प्रत्यक्ष के अलावा वस्तुओं का कोई प्रत्यय नहीं प्राप्त होता जबकि द्रव्य प्रत्यक्ष से पूर्णतया भिन्न है।
कूट :
(a) दोनों (A) और (R) सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत करता है।
(b) दोनों (A) और (R) गलत हैं और (R), (A) की गलत व्याख्या प्रस्तुत करता है।
(c) (A) सही है और (R) गलत है और (R), (A) की गलत व्याख्या है।
(d) (A) गलत है लेकिन (R) सही है और (R), (A) की सही व्याख्या है।
Ans. (a) : ह्यूम किसी प्रकार के द्रव्य (वस्तु‚ आत्मा‚ ईश्वर) की सत्ता को नहीं मानता। उसके अनुसार‚ हमें द्रव्य का कोई प्रत्यय प्राप्त नहीं होता। क्योंकि हमें प्रत्यक्ष के अलावा वस्तुओं का कोई प्रत्यय नहीं प्राप्त होता। क्योंकि द्रव्य प्रत्यक्ष से पूर्णतया भिन्न है।
46. निम्नलिखित अभिकथनों पर विचार कीजिए और जॉन लॉक के दर्शन के परिप्रेक्ष्य में सही कूट का चयन कीजिए :
(i) विचारों की स्वीकृति अथवा अस्वीकृति ज्ञान है।
(ii) प्राथमिक और द्वितीयक गुणों के बीच भेद है।
(iii) वस्तुएँ अपने गुणों के माध्यम से निरूपित होती हैं।
(iv) वस्तु का ज्ञान मस्तिष्क में पूर्व स्थापित है।
कूट :
(a) (i) और (ii) सही हैं।
(b) (i), (ii) और (iii) सही हैं।
(c) (ii), (iii) और (iv) सही हैं।
(d) (i), (ii), (iii) और (iv) सही हैं।
Ans. (b) : ‘वस्तु का ज्ञान मस्तिष्क में पूर्व स्थापित है।’ यह बुद्धिवादियों के अनुसार है। लॉक एक अनुभववादी दार्शनिक हैं उसके अनुसार ‘जन्म के समय हमारा मस्तिष्क ‘कोरा कागज’ की तरह होती है जिसमें अनुभव के द्वारा ज्ञान बाद में प्राप्त होता है। अत: विकल्प (iv) को छोड़ बाकी (i), (ii), (iii) सही हैं।
47. निम्नलिखित अभिकथनों पर विचार कीजिए और कांट के दृष्टिकोण के परिप्रेक्ष्य में सही कूट का चयन कीजिए :
(i) संश्लेषणात्मक प्रागनुभविक निर्णय ज्ञान का मानदंड है।
(ii) संश्लेषणात्मक आनुभविक निर्णय ज्ञान का मानदंड है।
(iii) विश्लेषणात्मक प्रागनुभविक निर्णय ज्ञान का मानदंड है।
(iv) विश्लेषणात्मक आनुभविक निर्णय ज्ञान का मानदंड है।
कूट :
(a) मात्र (i) सही है। (b) मात्र (ii) सही है।
(c) मात्र (i) और (iv) सही हैं। (d) मात्र (iii) सही है।
Ans. (a) : काण्ट अपनी पुस्तक ‘शुद्ध बुद्धि की आलोचना’ में सार्वभौमिक नवीन और यथार्थ ज्ञान के मानदण्ड की खोज करता है जिसे वह ‘संश्लेषणात्मक प्रागनुभविक निर्णय’ कहता है। जिसे वह ज्ञान का मानदण्ड कहता है।
48. निम्नलिखित अभिकथनों पर विचार कीजिए और डेविड ह्यूम के परिप्रेक्ष्य में सही कूट का चयन कीजिए:
(i) शक्कर में मिठास अन्तर्निहित नहीं है।
(ii) शक्कर और मिठास के बीच सिर्फ पारिस्थितिक सम्बन्ध है।
(iii) शक्कर और मिठास के बीच कोई आवश्यक नैमित्तिक सम्बन्ध नहीं है।
(iv) शक्कर और मिठास के बीच सिर्फ सहयोजन है।
कूट :
(a) मात्र (i) सही है।
(b) मात्र (ii) सही है।
(c) मात्र (iii) और (iv) सही हैं।
(d) मात्र (ii) और (iv) सही हैं।
Ans. (c) : कारण−कार्य के साहचर्य और ‘प्राकृतिक एकरूपता’ पर आधारित आगमन पर डेविड ह्यूम के अनुसार संशय किया जा सकता है जिसे ‘आगमन की समस्या’ के नाम से जाना जाता है। उसके अनुसार कारण−कार्य सम्बन्ध कोई अनिवार्य सम्बन्ध नहीं है। अर्थात् यदि शक्कर में मिठास है तो इसका मतलब यह नहीं कि इनके बीच कोई आवश्यक नैमित्तिक सम्बन्ध ही हो। यह केवल साहचर्य (सहयोजन) पर आधारित है।
49. निम्नलिखित अभिकथन पर विचार कीजिए और सही
कूट का चयन कीजिए :
दृश्यता सत्ता है−यह विचार निम्नलिखित में से किसका है:
(i) लॉक
(ii) बर्कले
(iii) लॉक और बर्कले
(iv) लॉक‚ बर्कले और ह्यूम
कूट :
(a) मात्र (i) सही है।
(b) मात्र (ii) सही है।
(c) मात्र (i) और (ii) सही हैं।
(d) मात्र (iv) सही है।
Ans. (b) : बर्कले अपने प्रत्ययवादी विचारों के अन्तर्गत कहता है ‘सत्ता दृश्यता है।’ अर्थात् ‘सत्ता अनुभवमूल है।’ बर्कले के अनुसार किसी वस्तु के अस्तित्वयुक्त होने का अर्थ उसका अनुभव का विषय अर्थात् दृश्य होना है।
50. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूटों में से सही उत्तर चयन कीजिए :
सूची–I सूची–II
A. मैं स्वयं अपनी सत्ता का कारण नहीं हो सकता क्योंकि मुझमें पूर्णता का प्रत्यय है।
i. ह्यूम
B. यदि कोई सिद्धान्त बिना जाने हमारी आत्मा पर अंकित होता है तो उसके स्वरूप और उसमें भेद करना असंभव है।
ii. बर्कले
C. अमूर्त प्रत्ययों के निर्माण में मन असक्षम है।
iii. डेकार्ट
D. अनिवार्यत: वस्तु नहीं अपितु प्रत्यय ही हमारे मन के साथ संयुक्त होते हैं।
iv. लॉक
कूट :
A B C D
(a) ii i iii iv
(b) iv ii i iii
(c) i ii iv iii
(d) iii iv ii i
Ans. (d)
(a) डेकार्ट के अनुसार‚ मैं स्वयं अपनी सत्ता का कारण नहीं हो सकता‚ क्योंकि मुझमें पूर्णता का प्रत्यय है।
(b) लॉक के अनुसार‚ यदि कोई सिद्धान्त बिना जाने हमारी आत्मा पर अंकित होता है तो उसके स्वरूप और उसमें भेद करना असम्भव है।
(c) बर्कले‚ अमूर्त प्रत्ययों के निर्माण में मन असक्षम है।
(d) ह्यूम‚ अनिवार्यत: वस्तु नहीं अपितु प्रत्यय ही हमारे मन के साथ संयुक्त होते हैं। यू.जी.सी. नेट/जेआरएफ परीक्षा‚ जुलाई-2016 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY) व्याख्या सहित तृतीय प्रश्न-पत्र का हल
1. वैशेषिक के अनुसार आत्मा शरीर के साथ इन संबंधों से रहता है−
(a) स्वरूप (b) समवाय
(c) संयोग (d) विशेषणता
Ans : (c) वैशेषिक दर्शन में आत्मा और शरीर का सम्बन्ध ‘संयोग सम्बन्ध माना गया है। मन और आत्मा का सन्निकर्ष (सम्बन्ध) भी संयोग है। दो द्रव्यों के सन्निकर्ष (सम्बन्ध) को संयोग कहते हैं।
(भारतीय दर्शन की समीक्षात्मक रूपरेखा : राममूर्ति पाठक)
2. वैशेषिक के अनुसार‚ ज्ञान का अभाव मानवीय आत्मा में निम्न में से किस सम्बन्धों से रहता है−
(a) समवाय (b) स्वरूप
(c) संयोग (d) वैशिष्ट्य
Ans : (b) ज्ञान का आभाव मानवीय आत्मा में ‘स्वरूप’ सम्बन्ध से रहता है। वैशेषिक दर्शन में ‘ज्ञान’ को ‘आत्मा’ का आगन्तुक लक्षण माना गया। आत्मा अपने स्वरूपावस्था मूलत: जड़ तथा अभौतिक है। यहाँ ‘जड़’ का तात्पर्य है कि आत्मा चैतन्य रहित है। आत्मा ज्ञान-स्वरूप नहीं है। अपितु ज्ञान नामक गुण का आश्रयभूत द्रव्य है। अत: ज्ञान का अभाव आत्मा में उसके ‘स्वरूप’ के कारण है।
3. निम्न में से कौन वैशेषिक दर्शन में विश्व का समवायिकारण है?
(a) त्रसरेणु (b) द्वयणुक
(c) परमाणु (d) ईश्वर
Ans : (b) वैशेषिक दर्शन में विश्व का समवायिकारण ‘द्वयणुकों’ को माना गया है। सर्वप्रथम एक ही द्रव्य के दो परमाणु आपस में संयुक्त होकर द्वयुणु का निर्माण करते हैं। द्वयणु के उपरान्त त्र्यणुक का जिसे त्रसरेणु भी कहा जाता है। तीन द्वयणुकों से त्र्यणुक बनते हैं‚ चार त्र्यणुकों से चतुरणुक का निर्माण होता है। इसी प्रकार क्रमानुसार जगत की शृष्टि होती है। इसे ही परमाणुवाद कहते हैं।
(भारतीय दर्शन का सर्वेक्षण − संगम लाल पाण्डेय)
4. आकाश‚ काल और दिक् इन सभी तीन द्रव्यों की कुछ सामान्य विशेषताएँ होती हैं। निम्न में से उस एक का चयन कीजिए जो उन सभी विशेषताओं का सही-सही उल्लेख करता है−
(a) एक‚ भौतिक (भूत) और नित्य
(b) एक‚ नित्य और मिश्रित
(c) एक‚ सर्वव्यापी और नित्य
(d) अनेक‚ सर्वव्यापी और नित्य
Ans : (c) वैशेषिक दर्शन में स्वीकृत पाँच महाभूतों में पाँचवाँ आकाश है जो अपरमाणिविक और विभु (व्यापक) होने के कारण अन्य चार- पृथ्वी‚ जल‚ अग्नि और वायु से अलग हैं। यह भौतिक द्रव्य है और शब्द इसका गुण है। यह एक‚ नित्य‚ निरवयव‚ निष्क्रिय एवं अपरमाणविक है। दिक् और काल क्रमश: सह-अस्तित्व और अनुक्रम का प्रतिपादन करते हैं। दिक् एवं काल‚ अलग-अलग एक सर्वव्यापी‚ नित्य‚ अतीन्द्रिय‚ अभौतिक एवं गुणहीन है। इस प्रकार आकाश‚ काल और दिक्‚ एक‚ सर्वव्यापी नित्य है।
5. निम्न में से कौन नित्य द्रव्य नहीं है?
(a) आत्मा (b) आकाश
(c) विशेष (d) काल
Ans : (c) वैशेषिक दर्शन अपनी पदार्थ मीमांसा में ‘विशेष’ को एक अलग पदार्थ माना है। ध्यातव्य हो वैशेषिक सात पदार्थों-द्रव्य‚ गुण‚ कर्म‚ सामान्य‚ विशेष‚ समवाय और अभाव को मानता है। द्रव्य नौ हैं− पृथ्वी‚ जल‚ अग्नि‚ वायु और आकाश भौतिक (मूर्त्त) द्रव्य हैं तथा दिक्‚ काल‚ आत्मा और मनस् अभौतिक (अमूर्त्त) द्रव्य हैं। ये सब नित्य हैं। ‘विशेष’ एक अलग पदार्थ होने के कारण ‘द्रव्य’ नहीं हैं।
(भारतीय दर्शन− डॉ. नन्दकिशोर देवराज)
6. अभिकथन (A) और तर्क (R) पर विचार कीजिए तथा दिए गए कूटों से सही उत्तर का चयन कीजिए−
अभिकथन (A) : आकाशत्व को एक जाति होनी चाहिए।
तर्क (R) : यह आकाश की अनिवार्य विशेषता है।
कूट :
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) गलत है और (R) सही है।
(d) (A) और (R) दोनों गलत हैं।
Ans : (c) आकाशत्व कोई जाति (सामान्य) नहीं हो सकती। ‘व्यक्तेर भेद:’ अर्थात् एक व्यक्ति में रहने वाला धर्म जाति-रूप सामान्य न होकर उपाधि है। न्याय-वैशेषिक के अनुसार आकाश‚ काल‚ दिक् एक-एक है‚ अनेक नहीं। इसलिए आकाशत्व‚ कालत्व और दिक्त्व उपाधियाँ हैं‚ जातियाँ नहीं। अत: दोनों कथन (A) और (R) गलत हैं। (भारतीय दर्शन− डॉ. नन्दकिशोर देवराज)
7. ‘‘आत्म-पहचान विभिन्न अवधारणाओं को एक साथ मिलाने से संबंधित नहीं होती है बल्कि यह एकमात्र गुण है जिसे हम कल्पना में अपने एकत्रित विचारों के कारण इन अवधारणाओं में प्रकट करते हैं’’ निम्न में से किस दार्शनिक का यह विचार है?
(a) ह्यूम (b) स्पिनोजा
(c) कांट (d) किर्केगार्ड
Ans : (a) ‘Personal Identity’ (वैक्तिक अनन्यता) से सम्बन्धित यह कथन ह्यूम का है। जिसमें ‘आत्म-पहचान-’ को कल्पना में एकत्रित विचारों को अवधारणाओं में प्रकटीकरण की बात कर रहे हैं।
8. ‘‘शरीर का मस्तिष्क के बिना कोई अस्तित्व नहीं है; और इस संदर्भ में यह कहना विरोधाभासी है कि द्रव्य मस्तिष्क के बिना ग्रहण किये अस्तित्ववान है’’ यह विचार किनका है?
(a) बर्कले (b) लाइब्नित्ज
(c) स्पिनोजा (d) ह्यूम
Ans : (a) किसी भौतिक पिंड (Bodies) का अस्तित्व मस्तिष्क
(Mind) के बिना नहीं हो सकता है। बर्कले समस्त प्रत्ययों को या ‘Mind’ पर उपश्रित मान लेता है अथवा ईश्वर (God) पर। उसके अनुसार ‘सत्ता दृश्यता है’ अर्थात् कोई भी द्रव्य (Matter) जो अस्तित्व में हो और आत्मा/मन/मस्तिष्क (चाहे किसी का हो) के बिना के अस्तित्ववान हो ही नहीं सकता। अर्थात् बिना मस्तिष्क के दृश्य हुए किसी वस्तु की सत्ता हो ही नहीं सकती।
9. कांट के संदर्भ में निम्न कथनों पर विचार कीजिए और सही कूट का चयन कीजिए।
1. कांट उस धारणा को अस्वीकार करता है कि देश और काल वैसी अवधारणाएँ हैं जो वस्तुओं और हमारे सम्बन्धों के अनुभव से आती हैं।
2. कांट उस धारण को स्वीकार करता है कि देश और काल वैसी अवधारणाएँ हैं जो वस्तुओं और हमारे सम्बन्धों के अनुभव से आती है।
3. कांट उस धारण को अस्वीकार करता है कि देश और काल वैसी अवधारणाएँ हैं जो वस्तुओं और हमारे सम्बन्धों के अनुभव से नहीं आती हैं।
कूट :
(a) केवल 1 सही है।
(b) केवल 1 और 2 सही हैं।
(c) केवल 2 सही है।
(d) केवल 2 और 3 सही हैं।
Ans : (a) कांट अपने देश-काल सम्बन्धी विचार में‚ देश-काल को अनुभव-निरपेक्ष कहता है‚ जिसे वह सर्वव्यापक और विशुद्ध संवेदन कहता है। कांट के दर्शन में देश-काल को प्रागनुभविक और प्रत्यक्ष के आकार कहा गया है। देश और काल संवेद वस्तुओं और घटनाओं के अनुभव की तार्किक प्रागपेक्षा है।
(पाश्चात्य दर्शन का उद्भव और विकास− डॉ. हरिशंकर उपाध्याय)
10. नीचे दो कथन दिए गए हैं जिनमें एक अभिकथन (A) और दूसरा तर्क (R) है। देकार्त की द्रव्य की अवधारणा के संदर्भ में (A) और (R) पर विचार करते हुए सही उत्तर का चयन कीजिए−
अभिकथन (A) : मन और शरीर दो सापेक्षिक द्रव्य हैं।
तर्क (R) : मन और शरीर एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं।
कूट :
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) गलत है और (R) सही है।
(d) (A) और (R) दोनों गलत हैं।
Ans : (c) डेकार्ट के द्वैतवाद के अनुसार मन और शरीर दो सापेक्षिक द्रव्य हैं। मन और शरीर दोनों एक दूसरे के परस्पर विरुद्ध स्वभाव वाले द्रव्य हैं जो पूर्णत: परस्पर स्वतंत्र हैं। अर्थात् यह अपनी सत्ता के लिए एक दूसरे पर निर्भर नहीं हैं।
(A History of Philosophy– FRANK THILLY)
11. निम्न में से कौन-सा कथन लॉक के कारणता सिद्धांत के संदर्भ में सही है?
(a) कारणता का विचार ऐच्छिक कार्य से उत्पन्न नहीं होता है।
(b) कारणता का विचार अनविार्यत: एकरूपता से सम्बन्धित होता है।
(c) कारणता का विचार ऐच्छिक कार्य से उत्पन्न होता है और यह अनिवार्यत: एकरूपता से सम्बन्धित नहीं होता है।
(d) कारण और कार्य का एक-दूसरे से सम्बन्ध तथा उनकी एक-दूसरे पर निर्भरता हमारे विचारों में खोजी जा सकती है।
Ans : (c) लॉक के अनुसार‚ कारणता का विचार ऐच्छिक कार्य से उत्पन्न होता है और यह अनिवार्यत: एकरूपता से सम्बन्धित नहीं होता है। लॉक ने संवेदनों के कारण के रूप में जड़ तत्व की सत्ता को स्वीकार करता है। ‘दर्शन और विज्ञान’ के क्षेत्र में कारणता को वस्तु जगत् का एक सार्वभौम और अनिवार्य सम्बन्ध माना जाता है।
12. जागृत अनुभवों के प्रभाव द्वारा स्मृति में अविद्या के कारण जगत की रचना मन में होती है‚ इस मत का समर्थन किसके द्वारा किया गया?
(a) मीमांसा (b) वेदान्त
(c) न्याय (d) बौद्ध दर्शन
Ans : (b) वेदान्त दर्शन के अनुसार हम जो जाग्रत में देखते हैं वह हमारी स्मृति में होता है। उनके अनुसार स्मृति में अविद्या के कारण जगत की रचना मन में होती है। ध्यातव्य हो कि वेदान्त दर्शन विभिन्न स्तरों की सत्ताओं को तीन रूपों−प्रतिभ्यासिक‚ व्यावहारिक तथा पारमर्थिक में रखा गया है।
13. अप्रमा का कारण दोष है और प्रमा का कारण गुण है‚ यह किसके द्वारा समर्थित है?
(a) विश्वनाथ (b) गौतम
(c) कुमारिल (d) अभिनवगुप्त
Ans : (a) अप्रमा का कारण दोष तथा प्रमा का कारण गुण हैं। यह कथन विश्वनाथ का है। ‘न्याय सिद्धान्त मुक्तावली’ इनकी रचना है। ये साथ पदार्थों में आत्मा को बुद्धि का आश्रय मानते हैं। बद्धि− अनुभूति तथा स्मृति भेद से दो। अनुभूति के अन्तर्गत प्रमाणों का निरूपण।
14. ‘क्रियात्मक प्रत्यय वाक्य है’ यह मत किसके द्वारा समर्थित है?
(a) वेदान्त (b) बौद्ध दर्शन
(c) मीमांसा (d) न्याय
Ans : (c) क्रियात्मक प्रत्यय (Theveral suffix) वाक्य है। यह मीमांसा दर्शन को मानता है। मीमांसा दर्शन में वेद को क्रिया परक विधिवाक्य माना गया है। मीमांसा में शब्द या तो सिद्धार्थवाक्य या विद्यायक वाक्य हो सकते हैं।
15. निम्नांकित में किस मत के अनुसार शब्दों के अर्थ केवल वाक्यों में उनके प्रयोग से सीखा जा सकता है?
(a) नव्य-न्याय (b) न्याय
(c) मीमांसा (d) वेदान्त
Ans : (c) शब्दों के अर्थ को हम वाक्यों में उनके प्रयोग द्वारा ही सीख सकते हैं। मीमांसा दर्शन में शब्द और उसके अर्थ को लेकर कुमारिल और प्रभाकर क्रमश: अभिहितान्वयवाद और अन्विताभिधानवाद मत के समर्थक हैं।
16. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित करें और नीचे दिए गए कूटों से सही उत्तर का चयन करें− सूची-I सूची-II
A. ध्यान जो किसी वस्तु को i. निबन्ध मन में धारण करता है।
B. साहचर्य जो विभिन्न अनुभवों ii. परिग्रह को संयोजित करता है।
C. वह विशेषता जिससे पुन: iii. प्रणिधान स्मरण होता है कि विषय किससे सम्बन्धित है।
D. धारणा जो धारक को iv. लक्षण अभिव्यंजित करती है।
कूट :
A B C D
(a) ii i iii iv
(b) i iv iii ii
(c) iv i ii iii
(d) iii i iv ii
Ans : (d)
(a) प्रणिधान− वह ध्यान है जो किसी वस्तु को मन में धारण करता है।
(b) निबंध− साहचर्य जो विभिन्न अनुभवों को संयोजित करता है।
(c) लक्षण− वह विशेषता जिससे पुन:स्मरण होता है कि किससे सम्बन्धित है।
(d) परिग्रह− धारणा जो धारक को अभिव्यंजित करती है।
17. भ्रम के सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुए किस दार्शनिक ने यह तर्क दिया है कि ‘इन्द्रिय जगत एक भ्रम है’?
(a) फ्रांसिस बेकन (b) पार्मेनाइडीज
(c) प्रोटागोरस (d) विलियम जेम्स
Ans : (b) पार्मेनाइडीज अपने ‘सत्’ को कूटस्थ नित्य कहता है। उसके अनुसार इन्द्रियों से ज्ञात जगत परिवर्तनशील एवं उत्पत्तिमान है। जबकि ‘सत्’ कूटस्थ‚ नित्य और स्थिर है जिसका ज्ञान बुद्धि से होता है। और परिवर्तनयुक्त जगत इन्द्रियजन्य भ्रम है।
18. निम्न में से किस दार्शनिक ने यह तर्क दिया कि त्रुटि का दोत मानवीय बुद्धि की सीमितता और मानवीय इच्छा की असीमितता के बीच का अन्तर होता है?
(a) देकार्त (b) लॉक
(c) ब्रैडले (d) किर्केगार्ड
Ans : (a) डेकार्ट के अनुसार किसी भी ज्ञान पर विश्वास करने से पहले हमें उस पर संशय करना चाहिए और इसका कारण मानव बुद्धि की सीमितता है। उसके अनुसार हमारे त्रुटि का ध्Eोत मानवीय बुद्धि की सीमितता और मानवीय इच्छा की असीमितता के बीच का अन्तर होता है।
19. ‘तथ्य विषयक कथन’ और ‘विचार संबंधी कथन’ के बीच के अंतर को किसके द्वारा स्पष्ट किया गया?
(a) लॉक एवं बर्कले (b) केवल बर्कले
(c) ह्यूम और लॉक (d) केवल ह्यूम
Ans : (d) ह्यूम अपने दर्शन में मानव ज्ञान को दो वर्गों में बाँटता है− ‘तथ्य विषय कथन’ से हमें तथ्यात्मक ज्ञान’ तथा ‘विचार सम्बन्धी कथन’ से ‘आकारिक ज्ञान’ प्राप्त होता है। ‘तथ्य विषयक कथन’ का सम्बन्ध वस्तु जगत से है और ‘विचार सम्बन्धी कथन’ प्रत्ययों (विचारों) के पारस्परिक सम्बन्धों से है।
20. हेगल के अनुसार निम्नलिखित अवधारणाओं के सही क्रम को लिखें−
(a) पक्ष‚ सपक्ष और विपक्ष (b) पक्ष‚ विपक्ष और सपक्ष
(c) सपक्ष‚ पक्ष और विपक्ष (d) विपक्ष‚ पक्ष और सपक्ष
Ans : (b) हेगेल के अनुसार प्रत्येक अपूर्ण प्रत्यय में उसका विरोधी तत्व निहित होता है। किन्तु यह विरोधी तत्त्व ज्ञान अथवा प्रत्यय का यथार्थ स्वरूप नहीं है। ज्ञान और सत्ता स्वरूपत: सामञ्जस्यपूर्ण होते हैं। अत: विकास की अन्तिम अवस्था में विरोध का पूर्ण समन्वय हो जाता है। यह त्रयी क्रमश: पक्ष‚ विपक्ष है।
21. निम्नलिखित में से किस दार्शनिक द्वय का यह विचार है कि ‘मैं किसी वस्तु से अवगत हुए बिना स्वयं से अवगत हो सकता हूँ’?
(a) लॉक और ह्यूम (b) बर्कले और लॉक
(c) ह्यूम और स्पिनो़जा (d) ह्यूम और बर्कले
Ans : (d) बर्कले के अनुसार आत्म ज्ञान प्रत्ययात्मक नहीं है बल्कि ‘अंतर्बोध’ से होता है अर्थात् में किसी वस्तु से अवगत हुए बिना स्वयं से अवगत हो सकता हूँ। इसी तरह ह्यम आत्मा को विषय के स्तर पर लेआता है अत: वह मैं को प्रत्यक्षानुभव का विषय मानता है। ह्यूम आत्मा को प्रत्ययों और संस्कारों का अविच्छिन्न प्रवाह मानता है जो हमें ‘आत्मा’ की एकता का आभास कराता है।
22. मन अन्त:करण की संकल्पात्मिका वृत्ति है‚ यह निम्नलिखित में से किसकी दृष्टि है?
(a) न्याय (b) मीमांसा
(c) अद्वैत वेदान्त (d) बौद्ध
Ans : (c) अन्त:करण जब बाह्य विषयों के सम्पर्क में आता है तो तदाकार हो जाता है। जिसे ‘वृत्ति’ कहते हैं। अन्त: करण की चार आकृतियों अनिश्चय (संशय)‚ निश्चय (संकल्प)‚ आन्मचेतना और स्मरण। यहाँ प्रश्न में ‘मन’ की जगह अंग्रेजी का ‘मनस्’ होगा। ‘मनस्’ या ‘बुद्धि’ अंत:करण की संकल्पात्मिका वृत्ति है।
(भारतीय दर्शन का सर्वेक्षण: संगम लाल पाण्डेय)
23. सीपी में रजत् का ज्ञान भ्रमपूर्ण होता है क्योंकि यह गैर-अस्तित्व वाले रजत् को प्रक्षिप्त करता है और हम तब सचेत होते हैं। जब रजत् सम्बन्धी हमारा ज्ञान तत्पश्चात् सीपी के ज्ञान द्वारा खण्डित होता है। यह किसका उदाहरण है?
(a) अख्याति (b) अन्यथाख्याति
(c) असत्ख्याति (d) आत्मख्याति
Ans : (c) असत्ख्यातिवाद सीपी में रजत् का ज्ञान भ्रमपूर्ण मानता है। उसके अनुसार ‘रजत्’ जिसका अस्तित्व है ही नहीं अर्थात् वहाँ असत् है और असत् ‘रजत्’ का ज्ञान जब सीपी के ज्ञान से खण्डित हो जाता है। यह माध्यमिक बौद्धों से सम्बन्धित है।
24. न्याय के अनुसार‚ निम्न में किसमें भूतकाल का सचेतन संदर्भ और उसी वस्तु की वर्तमान दशा अपेक्षित होत है?
(a) स्मृति (b) अनध्यवसाय
(c) प्रत्यभिज्ञा (d) निर्विंकल्प प्रत्यक्ष
Ans : (c) न्याय दर्शन के अनुसार पहले जिस वस्तु का ज्ञान हो चुका है उसका पुन: प्रत्यक्षात्मक ज्ञान प्रत्यभिज्ञा है। अर्थात् प्रत्याभिज्ञा में भूतकाल का संचेतन संदर्भ और उसी वस्तु की वर्तमान दशा अपेक्षित होती है। यह स्मरण और प्रत्यक्ष का मिश्रण नहीं है।
(भारतीय दर्शन− डॉ. नन्दकिशोर देवराज)
25. न्याय के लिए कौन-सा कथन स्वीकार्य नहीं है?
(a) इन्द्रियार्थसन्निकर्ष जन्यम् ज्ञानम् प्रत्यक्षम्
(b) द्रव्याश्रिता ज्ञेया निर्गुण निष्क्रिया गुणा:
(c) संदिग्धसाध्यवान पक्ष:
(d) अर्थक्रियासामर्थ्य सत् का मानदण्ड है।
Ans : (d) न्याय दर्शन को ‘अर्थक्रियासामार्थ्य सत्’ का मानदण्ड नही मानता है। न्याय दर्शन में ‘अर्ध प्रकाशों बुद्धि: माना गया है।
26. सूची-I को सूची-II से मिलान कीजिए और दिए गए कूटों से सही उत्तर का चयन करें− सूची-I सूची-II
A. सभी सकारात्मक उदाहरणों i. विपक्षासत्व में मध्य पद की उपस्थिति
B. सभी नकारात्मक उदाहरणों ii. असत्प्रतिपक्ष में मध्य पद की अनुपस्थिति
C. मध्य पद में साध्य की iii. सपक्षसत्व विरोधी वस्तु नहीं होनी चाहिए।
D. विरोधी कारणों की iv.अबाधितविषयत्व अनुपस्थिति में विरोधी निष्कर्ष निकलते
कूट :
A B C D
(a) iii iv i ii
(b) ii iii iv i
(c) iii i iv ii
(d) i iii iv ii
Ans : (c)
A. सभी सकारात्मक उदाहरणों में मध्य पद की उपस्थिति−
iii. सपक्षसत्व
B. सभी नकारात्मक उदाहरणों में मध्य पद की अनुपस्थिति−
i. विपक्षासत्व
C. मध्य पद में साक्ष्य की विरोधी वस्तु नही होनी चाहिए−
iv. अबाधित विषयत्व
D. विरोधी कारणों की अनुपस्थिति में विरोधी निष्कर्ष निकलते हैं−
ii. असत प्रतिपक्ष
27. किस प्रकार का हेत्वाभास निम्नलिखित अनुमान द्वारा किया जाता है? सही कूट का चयन कीजिए− ‘मणिमय: पर्वत: वहिनमान धूमात् ।’
(a) अनुपसंहारी सव्यभिचार (b) आश्रयासिद्ध
(c) स्वरूपासिद्ध (d) बाधित
Ans : (b) जिसमें आश्रय या पक्ष काल्पनिक होता है‚ उस अनुमान को आश्रय सिद्ध या पक्षासिद्ध हेतु कहते हैं। ‘मृणमय पर्वत’ जो कि आश्रय/पक्ष है असत् होने के कारण हेतु भी असिद्ध है।
28. सही क्रम का चयन कीजिए−
(a) काम‚ अर्थ‚ धर्म‚ मोक्ष (b) मोक्ष‚ धर्म‚ अर्थ‚ काम
(c) धर्म‚ अर्थ‚ काम‚ मोक्ष (d) धर्म‚ काम‚ अर्थ‚ मोक्ष
Ans : (c) भारतीय दर्शन में चार प्रमुख पुरुषार्थ माने गये है जो क्रमश: धर्म‚ अर्थ‚ काम‚ मोक्ष है। इसका वर्णन भगवद्गीता में भी मिलता है।
29. श्रीकृष्ण के अनुसार वर्ण के विभाजन का आधार है−
(a) जाति और कर्म (b) गुण और कर्म
(c) जाति और गुण (d) स्वधर्म और जाति
Ans : (b) भगवद्गीता में श्रीकृष्ण वर्ण विभाजन का आधार गुण और कर्म को मानते हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन से स्पष्ट कहते हैं कि ‘चातुर्वर्ण्य मया सृष्ट गुण कर्मविभागश:। गीता चार वर्णों− ब्राह्मण‚ क्षत्रिय‚ वैश्य‚ शूद्र की सामाजिक व्यवस्था का समर्थक है।
30. सम्यक् चारित्र के प्रार्थी द्वारा किसकी आवश्यकता होती है?
(a) सिद्धशील (b) गुणस्थान
(c) सदसदविवेक (d) पंचव्रत
Ans : (a) जैन दर्शन में मोक्ष प्राप्ति के तीन सम्यक् दर्शन‚ सम्यक् ज्ञान और समाज चरित्र अपरिहार्य साधन माने गये हैं। सम्यक् चरित्र‚ सम्यक ज्ञान को कर्म में परिणत करना है। यह ‘पंचव्रतों’ द्वारा ही सम्भव है। ये पंचव्रत‚ अहिंसा‚ सत्य‚ अस्तेय‚ ब्रह्चर्य एवं अपरिग्रह हैं।
31. निम्न में से कौन-सा एक त्रिरत्न नहीं है?
(a) सम्यक् दर्शन (b) सम्यक् ज्ञान
(c) सम्यक् चरित्र (d) सम्यक् समाधि
Ans : (d) जैन दर्शन में सम्यक् दर्शन‚ सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र के साधन माने गये हैं। तीनों के सम्मिलित रूप से ही मोक्ष के साधन हैं। इसीलिए जैन दार्शनिक इन्हें ‘त्रिरत्न’ (Three Jewels) कहते हैं। ‘सम्यक् समाधि’ बौद्ध दर्शन के अष्टांग मार्ग का अंग है।
32. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित करें और नीचे दिए गए कूटों से सही उत्तर का चयन करें− सूची-I सूची-II
A. सुखानुशयी i. अभिनिवेष
B. दृग्दर्शनशक्तोरेकात्मेव ii. द्वेष
C. दु:खानुशयी iii. अस्मिता
D. स्वरसवाही विदृषोऽपि तथारुध: iv. राग
कूट :
A B C D
(a) iii ii i iv
(b) iv iii ii i
(c) ii iv i iii
(d) i iii ii iv
Ans : (c)
A. सुखानुशयी − द्वेष
B. दृग्दर्शनशक्तोरेकात्मेव − राग
C. दु:खानुशयी − अभिनिवेष
D. स्वरसवाही विदृषोऽपि तथारुध: − अस्मिता
33. निम्नलिखित में से किसने कहा है कि ‘संकल्प स्वातूल्य सत्य है या नैतिक निर्णय भ्रम’?
(a) मार्टिन्यू (b) बेंथम
(c) कान्ट (d) स्पेन्सर
Ans : (a) मार्टिन्यु ‘संकल्प स्वातुल्य तथा सत्य (fact) है या नैतिक निर्णय भ्रम’ है। अर्थात् मार्टिन्यु अनुसार या तो संकल्प की स्वतंत्रता एक तथ्य है या फिर नैतिकता एक भ्रम है।
(नीतिशास्त्र:सिद्धान्त और व्यवहार− प्रो. नित्यानंद मिश्र)
34. सूची-I को सूची-II से सुमेलित करें एवं सही कूट का चयन करें− सूची-I (लेखक) सूची-II (विषय)
A. अर्बन i. द लैंग्वेज ऑफ मॉरल्स
B. ब्रॉड ii. फाइव टाइप्स ऑफ इथिकल थियरीज
C. आर.एम.हेयर iii. द प्लेस ऑफ री़जन इन इथिक्स
D. टुल्मिन iv. फन्डामेन्टल्स ऑफ इथिक्स
कूट :
A B C D
(a) i iii iv ii
(b) iv ii i iii
(c) iii iv ii i
(d) i ii iii iv
Ans : (b)
A. अर्बन iv. फन्डामेन्टल्स ऑफ इथिक्स
B. ब्रॉड ii. फाइव टाइप्स ऑफ इथिकल थियरीज
C. आर.एम.हेयर i. द लैंग्वेज ऑफ मॉरल्स
D. टुल्मिन iii. द प्लेस ऑफ री़जन इन इथिक्स
35. निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म असंगत है?
(a) संवेगवाद − ए.जे. एयर
(b) अन्त:प्रज्ञावाद − मार्टिन्यू
(c) प्रकृतिवाद − एस.ई. टुल्मिन
(d) बुद्धिवाद − कांट
Ans : (c) ए.जे.एयर‚ संवेगवादी‚ मार्टिन्यू अंत:प्रज्ञवादी कांट बुद्धिवादी लेकिन एस.इ.टूल्मिन प्रकृतिवादी नहीं हैं।
36. अधोलिखित में से कौन प्रकृतिवादी नैतिक सिद्धान्त से सम्बन्धित कथन है?
(a) शुभ वह है जो एक बौद्धिक व्यक्ति चाहता है।
(b) शुभ वांछनीय है।
(c) ईश्वर द्वारा अनुमोदित कर्म ही सही कर्म है।
(d) स्वयं द्वारा अनुमोदित कर्म ही सही कर्म है।
Ans : (b) जब नैतिकता की कसौटी सुख का ज्ञान अर्थात् सुखानुभूति का ज्ञान हो तो वहाँ प्राकृतिक नैतिक सिद्धान्त होता है। जब वैसे ज्ञान का विषय प्राकृतिक होता है और वह साधारण इन्द्रियों के द्वारा प्राप्त होता है। जैसे− शुभ वांछनीय है। अर्थात् शुभ • इच्छा का विषय होना। उचित •सामंजस्यपूर्ण सुख का कारक होना।
37. अधोलिखित में से किसने कहा है ‘स्वतंत्रता ही मानव तथा समस्त बुद्धिजीवियों के गौरव का एकमात्र आधार है’?
(a) रॉस (b) हेगेल
(c) कान्ट (d) ग्रीन
Ans : (c) काण्ट अपने दर्शन में नैतिक की तीन पूर्णमान्यताओं को मानते हैं जो है− संकल्पस्वातन्त्रता‚ आत्मा की अमरता और ईश्वर का अस्तिव। उसके अनुसार‚ स्वतंत्रता‚ मानव तथा समस्त बुद्धिजीवियों गौरव का एकमात्र आधार है।
38. ‘जॉन को इसलिए दण्डित नहीं किया गया कि उसने भेड़ चुराई थी अपितु इसलिए कि दूसरे इसे न चुरायें’ यह कथन दण्ड के किस सिद्धान्त से सम्बन्धित है ?
(a) प्रतीकारवादी (b) निवर्तनवादी
(c) सुधारवादी (d) परपीड़ाजनित सुजवाद
Ans : (b) दण्ड के तीन सिद्धान्त प्रचलित हैं− प्रतीकारवादी‚ निवर्तनवादी तथा सुधारवादी। निवर्तनवादी दण्ड सिद्धान्त में किसी व्यक्ति के द्वारा किये गये अपराध की सजा इसलिए दी जाती है ताकि कोई अगला अपराध करने का साहस न करे। अत: यहाँ निवर्तनवादी दण्ड सिद्धान्त है।
39. बेन्थम एवं मिल के सन्दर्भ में‚ निम्नलिखत में कौन अभिकथन सही है/ हैं? सही कूट का चयन करें।
i. दोनों मानते हैं कि मनुष्य अनिवार्यत: सुख चाहता है।
ii. दोनों मानते हैं कि ‘चाहिए’ को ‘है’ से निगमित किया जा सकता है।
iii. दोनों स्वार्थ के आधार पर अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम सुख के आदर्श के औचित्य को सिद्ध करते हैं।
कूट :
(a) i और ii (b) i और ii
(c) ii और i (d) i, ii और iii
Ans : (b) बेथम और मिल दोनों सुखवादी हैं जो क्रमश: निकृष्ट और उत्कृष्ट सुखवाद की कोटि में रखे जाते हैं। दोनों का मानना है मनुष्य हमेशा सुख चाहता है। इनके अनुसार ‘चाहिए’ से ‘है’ से निगमित किया जा सकता है। मिल परार्थवादी सुखवाद को मानता है।
40. ‘चाहिए’ की भावना बाह्य आदेशों से आती है। निम्नलिखित में से किस एक की यह मान्यता है?
(a) वैधानिक मत (b) अन्त:प्रज्ञावाद
(c) सुखवाद (d) आदर्शवाद
Ans : (a) जब नैतिक निर्णय का स्वरूप आदेशात्मक हो अर्थात् चाहिए की भावना बाह्य आदेशों से आये तो वहां पर वैधानिक सिद्धान्त होता है। प्रत्येक विधान विधिमूलक और निषेधमूलक दोनों होता है। उसका रूप है ‘यह करो और उसे मत करो’।
41. सत्यता निम्न में से किसका गुण है?
(a) पद (b) तर्कवाक्य
(c) न्यायवाक्य (d) वाक्य और न्यायवाक्य दोनों का
Ans : (b) सत्यता तर्कवाक्यों का गुण है। तर्कवाक्य ही सत्य या असत्य होते हैं। न्यायवाक्य तो इन्हीं तर्कवाक्यों से बनता है। जो वैध या अवैध होते हैं।
42. यदि एकसमान उद्देश्य और विधेय वाले दो तर्क वाक्य सत्य नहीं हो सकते हैं किन्तु दोनों गलत हो सकते हैं‚ उनके संबंध को कहा जाता है।
(a) सब-अल्टरनेशन (b) कोंट्राडिक्ट्री
(c) कांट्रेरी (d) सबकंट्रेरी
Ans : (c) परम्परागत विरोध वर्ग के अनुसार यदि एकसममान उद्देश्य और विधेय वाले दोनों तर्कवाक्य सत्य नहीं हो सकते हैं किन्तु दोनों गलत हो सकते हैं तो उनके सम्बन्ध को ‘विपरीत’
(Contrary) कहते हैं। यह सम्बन्ध A और E में होता है।
(Datrodaction to Logic– Irving M. Copi)
43. यदि O तर्कवाक्य गलत है तो इससे संबंधित A, E और I होगा।
(a) A सही‚ E गलत है और I गलत है।
(b) A सही है‚ E गलत है और I सही है।
(c) E गलत है और A एवं I दोनों अनिश्चित हैं।
(d) A गलत है और E एवं I दोनों अनिश्चित हैं।
Ans : (b) परम्परागत विरोध वर्ग के अनुसार यदि ‘O’ तर्कवाक्य गलत है तो ‘A’ का व्याघाती सम्बन्ध होने के कारण ‘A’ सही‚ ‘E’ का उपाश्रयण सम्बन्ध हाने के कारण ‘E’ गलत तथा ‘I’ के विरुद्ध होने के कारण विकल्प (b) सही है।
44. निम्न में से कौन-सा एक विचार का नियम नहीं है?
(a) तादात्म्य का सिद्धांत
(b) पर्याप्त कारण का सिद्धांत
(c) मध्य बहिष्कार का सिद्धांत
(d) अविरोध का सिद्धांत
Ans : (*) विचार के तीन नियम− तादात्म्य का सिद्धान्त‚ व्याघात का नियम‚ मध्य−परिहार का नियम। संबंधित प्रश्न में एक से अधिक विकल्प सही है।
45. निम्न में से कौन-सा एक पुनर्कथन है?
(a) P ∨ P (b) P ⋅ P
(c) P ⋅ ∼ P (d) P ⊃ P
Ans : (d) जिस वाक्याभर के केवल सत्य प्रतिस्थापन− उदाहरण होते हैं‚ वह पुनर्कथन होता है। यहाँ P ⊃ P एक पुनर्कथन होगा।
46. निम्नलिखित युक्ति (a) और युक्ति आकार (b) पर विचार नहीं है?
i. (A
B) (C D) A B
ii. (p
q) (r s) p q
(a) i, ii का युक्ति आकार है।
(b) ii, i का युक्ति आकार है।
(c) i, ii का विशेष युक्ति आकार है।
(d) i, ii का विशेष युक्ति आकार है।
Ans : (a) दिये गये प्रश्न में एक से अधिक उत्तर सही है। इस प्रश्न में या तो कोई विकल्प नही सही है या पूरा प्रश्न ही गलत है।
47. सूची-I को सूची-II से सुमेलित करें एवं सही कूट का चयन करें− सूची-I सूची-II
A. FERIO i. चौथा आकार
B. CAMESTRES ii. तीसरा आकार
C. DATISI iii. दूसरा आकार
D. DIMARIS iv. पहला आकार
कूट :
A B C D
(a) i ii iii iv
(b) iv iii ii i
(c) ii i iii iv
(d) iv iii i ii
Ans : (b)
A. FERIO – iv. पहला आकार
B. CAMESTRES– iii. दूसरा आकार
C. DATISI – ii. तीसरा आकार
D. DIMARIS – i. चौथा आकार
48. ‘कोई भी मनुष्य पूर्ण नहीं हैं’ इस कथन का ऑबवर्जन है−
(a) सभी मनुष्य अपूर्ण हैं।
(b) सभी पूर्ण प्राणी मनुष्य हैं।
(c) कोई भी पूर्ण प्राणी मनुष्य नहीं है।
(d) कुछ पूर्ण प्राणी मनुष्य हैं।
Ans : (a) प्रतिवर्तन (Obversion) में उद्‌ेश्य पद अपरिवर्तित रहता है और प्रतिवर्तित होने वाले तर्कवाक्य का परिमाण भी अपरिवर्तित रहता है। किसी तर्कवाक्य के ‘प्रतिवर्तन’ (ऑबवर्जन) में हम तर्कवाक्य का गुण परिवर्तन करते हैं और विधेय के स्थान पर उसका पूरक रख देते हैं। जैसे− ‘कोई भी मनुष्य पूर्ण नहीं है’ ‘E’ तर्कवाक्य है जिसका प्रतिवर्तन ‘A’ तर्कवाक्य में ‘सभी मनुष्य अपूर्ण है।’ होगा।
49. निम्न में से कौन-सा एक p ⊃ ∼ ∼ q के समतुल्य है?
(a) q ⊃ ∼ p (b) p ∨ q
(c) p ⊃ q (d) ∼ p ⊃ ∼ q
Ans : (b) ∼ p ⊃ ∼ ∼ q ∼ p ⊃ q ∼ ∼p ∨ q p ∨ q ∴ ∼ p ⊃ ∼ ∼ q α p ∨ q
50. सूची-I को सूची-II से सुमेलित करें एवं सही कूट का चयन करें− सूची-I सूची-II
A. एक्सपोर्टेशन i. (p
q) α (q ⊃ ∼ p)
B. टॉटोलॉजी ii. (p
q) α (p q)
C. ट्रांसपोजिशन iii. p
α (p p)
D. मैटिरियल iv. [(p
p)r] α [ p (q r)] इम्प्लिकेशन
कूट :
A B C D
(a) i ii iii iv
(b) iv ii iii i
(c) iv iii i ii
(d) iii iv i ii
Ans : (c)
A. एक्सपोर्टेशन− iv. [(p ⋅ p) ⊃ r] α [ p ⊃ (q ⊃ r)]
B. टॉटोलॉजी− iii. p α (p ⋅ p)
C. ट्रांसपोजिशन− i. (p ⊃ q) α (∼ q ⊃ ∼ p)
D. मैटिरियल इम्प्लिकेशन− ii. (p ⊃ q) α (∼ p ∨ q)
51. सूची-I को सूची-II से सुमेलित करें एवं सही कूट का चयन करें− सूची-I सूची-II
A. हिन्दू i. पाँच मुख्य स्तम्भ
B. बौद्ध ii. सप्त भंगीनय
C. जैन iii. प्रतीत्यसमुत्पाद
D. इस्लाम iv. वर्णाश्रम
कूट :
A B C D
(a) iii iv i ii
(b) iv iii ii i
(c) ii i iv iii
(d) i ii iv iii
Ans : (b)
A. हिन्दू − iv. वर्णाश्रम
B. बौद्ध − iii. प्रतीत्यसमुत्पाद
C. जैन − ii. सप्त भंगीनय
D. इस्लाम − i. पाँच मुख्य स्तम्भ
52. सूची-I को सूची-II से सुमेलित करें एवं सही कूट का चयन करें− सूची-I सूची-II
A. पवित्र प्रेत i. जोरस्ट्रियन धर्म
B. अहरम़जदा ii. ईसाई धर्म
C. तालमड iii. सिक्ख धर्म
D. गुरुबानी iv. यहूदी धर्म
कूट :
A B C D
(a) i ii iii iv
(b) ii i iv iii
(c) iii iv i ii
(d) iv iii ii i
Ans : (b)
A. पवित्र प्रेत − ii. ईसाई धर्म
B. अहरम़जदा − i. जोरस्ट्रियन धर्म
C. तालमड − iv. यहूदी धर्म
D. गुरुबानी − iii. सिक्ख धर्म
53. हिन्दू धर्म में कर्म सिद्धांत से अभिप्राय है−
(a) भाग्यवाद
(b) नैतिक कारणता का सिद्धांत
(c) परिणाम की आशा करते हुए कर्म करना
(d) यज्ञ संपन्न करना
Ans : (b) हिन्दू धर्म में कर्म से अभिप्राय नैतिक कारणता का सिद्धान्त है। हिन्दु ‘धर्म’ में कर्म एवं पुनर्जन्म का सिद्धान्त एक प्रमुख नैतिक कारण है।
54. ‘‘किसी विषय के सभी पहलू यथार्थ हैं‚ जबकि विषय मात्र तार्किक संरचना है’’ यह किसका मत है?
(a) फ्रेगे (b) रसेल
(c) विट्गेन्स्टीन (d) आस्टिन
Ans : (b) रसेल अपने तार्किक परमाणुवाद में जगत् को वस्तुओं को एक तार्किक संरचना प्रस्तुत करते हैं। उनके अनुसार ‘किसी विषय के सभी पहलू यथार्थ हैं‚ जबकि विषय (Things) मात्र तार्किक संरचना है।
55. फ्रेगे द्वारा ‘‘होता है’’ और ‘‘है’’ के बीच विभेद के लिए सैद्धांतिक कारण को निम्नांकित में किसे स्पष्ट करने के लिए स्वीकार किया गया है?
(a) तादात्म्य (b) अभावात्मक सत्ता
(c) परोक्ष कथन (d) तर्कवाक्यीय अभिवृत्ति
Ans : (b) फ्रेगे द्वारा ‘होता है’ और ‘है’ के बीच विभेद के लिए सैद्धान्तिक कारण को स्पष्ट करने के लिए ‘अभावात्मक सत्ता’ को स्वीकार किया गया है।
56. अभिकथन (A) और तर्क (R) पर विचार कीजिए तथा दिए गए सही विकल्प का चयन करें−
अभिकथन (A) : सत्यता की परीक्षा उसके व्यावहारिक फल में है।
तर्क (R) : फलवाद किसी तर्कवाक्य की सत्यता अथवा असत्यता का निर्धारण उसके द्वारा हमारे प्रयोजनों को पूरा करने अथवा नहीं करने के आधार पर निर्धारित करता है।
कूट :
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) गलत है और (R) सही है।
(d) (A) और (R) दोनों गलत हैं।
Ans : (a) फलवाद (Pragmaticism) सत्यता की परीक्षा उसके व्यावहारिक फल के आधार पर करता है। पियर्स के अनुसार विश्वासों की सत्यता का मूल्यांकन उसके व्यावहारिक परिणामों के आधार पर करना चाहिए। अत: फलवाद (अथक्रियावाद) किसी तर्कवाक्य की सत्यता अथवा असत्यता का निर्धारण उसके द्वारा हमारे प्रयोजनों को पूरा करने अथवा नहीं करने के आधार पर करता है।
57. एक ही बाह्य वस्तु के बारे में दो लोगों की अवधारणाओं के सम्बन्ध में निम्नांकित में कौन शर्त डोनाल्ड डेविडसन को स्वीकार्य नहीं है?
(a) स्वयं के बारे में विश्वास
(b) अन्य लोगों के बारे में विश्वास
(c) भाषा नियमों के बारे में विश्वास
(d) विश्वास कि जगत का अस्तित्व संयुक्त रूप से होता है।
Ans : (c) डोनाल्ड डेविड्सन भाषा नियमों के बारे में विश्वास स्वीकार्य है‚ एक ही बाह्य वस्तु के बारे में दो लोगों की अवधारणाओं के सम्बन्ध में।
58. हर्म्युनिटिक के संदर्भ में निम्नांकित युग्मों पर विचार कर सही कूट का चयन करें−
i. फ्रेडरिक स्लायरमाखर −रोमांटिक हर्म्युनिटिक्स
ii. हाइडेगर −रेडिकल हर्म्युनिटिक्स
iii. डैरिडा −हर्म्युनिटिक फेनेमेनोलॉजी
कूट :
(a) केवल i सही सुमेलित है।
(b) केवल i और ii सही सुमेलित हैं।
(c) केवल iii सही सुमेलित है।
(d) केवल ii और iii सही सुमेलित हैं।
Ans : (*) सभी युग्म सुमेलित हैं।
i. फ्रेडरिक स्लायरमाखर − रोमांटिक हर्म्युनिटिक्स
ii. हाइडेगर − रेडिकल हर्म्युनिटिक्स
iii. डैरिडा − हर्म्युनिटिक फेनेमेनोलॉजी
59. हुसर्ल की फेनोमेनोलॉजी में ‘नोएसिस’ का अर्थ है−
(a) विषयापेक्षी क्रिया की वास्तविक अन्तर्वस्तु
(b) विषयापेक्षी क्रिया की आदर्श अन्तर्वस्तु
(c) अविषयापेक्षी क्रिया की वास्तविक अन्तर्वस्तु
(d) अविषयापेक्षी क्रिया की आदर्श अन्तर्वस्तु
Ans : (a) हुसर्ल की फेनोमेनोलॉजी में ‘नाएसिस’ विषयापेक्षी क्रिया की वास्तविक अन्तर्वस्तु है। हुसर्ल की फेनोमेनोलॉजी की दृष्टि की सार्थकता इस बात में है कि उस दृष्टि से जो आद्य रूप में ग्राह्य होता है‚ वह तास्त्विक सत् की झलक है। फेनोमेनोलॉजिकल अध्ययन के केन्द्र को चेतना से सत्ता में परिवर्तित कर देते हैं। उनके अनुसार तत्वदर्शन फेनोमेनोलाजी के रूप में ही संभव है।
60. निम्नांकित में से कौन दार्शनिक फेनोमेनोलॉजिकल अध्ययन के केंद को चेतना से सत्ता में परिवर्तित करने के लिए उत्तरदायी है?
(a) हुसर्ल (b) हाइडेगर
(c) हेगेल (d) किर्केगार्ड
Ans : (b) हाइडेगर के अनुसार दार्शनिक चिन्तन का मूल लक्ष्य तत्वमीमांसीय है‚ तथा उनकी फेनोमेनोलॉजी की दृष्टि की सार्थकता इस बात में है कि उस दृष्टि से जो आद्य रूप में ग्राह्य होता है‚ वह तात्विक सत् की झलक है। फेनोमेनोलॉकिल अध्ययन के केन्द्र को चेतना से सत्ता में परिवर्तित कर देते हैं। उनके अनुसार तत्वदर्शन फेनोमेनोलॉजी के रूप में ही संभव है।
61. सूची-I को सूची-II से सुमेलित करें एवं सही कूट का चयन करें− सूची-I सूची-II
A. शुद्धाद्वैत i. निम्बार्क
B. द्वैताद्वैत ii. वल्लभ
C. अद्वैत iii. मध्व
D. द्वैत iv. शंकर
कूट :
A B C D
(a) ii i iv iii
(b) i ii iii iv
(c) iii iv i ii
(d) iv iii ii i
Ans : (a)
A. शुद्धाद्वैत − ii. वल्लभ
B. द्वैताद्वैत − i. निम्बार्क
C. अद्वैत − iv. शंकर
D. द्वैत − iii. मध्व
62. अभिकथन (A) और तर्क (R) पर विचार कीजिए तथा दिए गए सही विकल्प का चयन करें−
अभिकथन (A) : ब्रह्म विश्व का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है।
तर्क (R) : ब्रह्म के अलावा कुछ भी नहीं है।
कूट :
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) गलत है और (R) सही है।
(d) (A) और (R) दोनों गलत हैं।
Ans : (b) शंकर वेदान्त में ब्रह्म को जगत का अभिन्ननिमित्तउपादान कारण माना गया है और ब्रह्म ही सबकुछ है अर्थात ब्रह्म के अलावा कुछ नही है। ब्रह्म ही एक मात्र सत् है अर्थात् ‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवेाब्रह्मैवनापर:।)
63. सूची-I को सूची-II से सुमेलित करें एवं सही कूट का चयन करें− सूची-I सूची-II
A. सत् i. माध्यमिक बौद्ध
B. असत् ii. मध्व
C. सदसत् iii. भर्तृप्रपंच
D. सदसदविलक्षण iv. शंकर
कूट :
A B C D
(a) i ii iv iii
(b) ii i iii iv
(c) iv iii i ii
(d) iii iv ii i
Ans : (b)
A. सत् − ii. मध्व
B. असत् − i. माध्यमिक बौद्ध
C. सदसत् − iii. भर्तृप्रपंच
D. सदसदविलक्षण − iv. शंकर
64. वेदांत में मोक्ष से अभिप्राय है−
(a) संपूर्ण शरीर से मुक्त होने की स्वतंत्रता (स्थूल शरीर)
(b) सभी आनुभाविक सीमाओं से स्वतंत्र
(c) स्वर्ग में स्थायी रूप से ठहरना
(d) यदा-कदा स्वर्ग की यात्रा
Ans : (b) सभी आनुभविक सीमाओं से स्वतंत्र होना वेदांत में मोक्ष है। अदैत वेदान्त में ‘ब्रह्मसाक्षात्कार’ को मोक्ष कहा गया है। जीवन्मुक्ति और विदेह मुक्ति मोक्ष का स्वरूप है।
65. अद्वैत के अनुसार मिथ्या शब्द का अर्थ है−
(a) जगत व्यावहारिक रूप से सत् नहीं है।
(b) जगत पूर्णत: असत् है।
(c) जगत पारमार्थिक रूप से सत् नहीं है।
(d) जगत को ब्रह्म समझ लेना।
Ans : (c) अद्वैत वेदान्त दर्शन में ‘मिथ्या’ शब्द का प्रयोग भ्रम‚ अविद्या‚ माया‚ अभ्यास आदि के पर्यायवाची रूप में। जगत पारमार्थिक रूप से सत् नहीं है; यह मिथ्या शब्द का अर्थ है।
66. निम्न में से एक छोड़कर शेष सभी वाक्य गलत हैं−
(a) शंकर द्वारा कर्मयोग को मुक्ति के प्राथमिक साधन के रूप में प्रतिपादित किया गया है।
(b) शंकर द्वारा कर्मयोग को विदेह मुक्ति के प्राथमिक साधन के रूप में प्रतिपादित किया गया है।
(c) शंकर द्वारा ज्ञानयोग को जीवन मुक्ति के प्राथमिक साधन के रूप में प्रतिपादित किया गया है।
(d) शंकर द्वारा ज्ञानयोग को विदेह मुक्ति के प्राथमिक साधन के रूप में प्रतिपादित किया गया है।
Ans : (c) शंकर अविद्या निवृत्ति को ही मोक्ष मानते हैं। अविद्या निवृत्ति‚ ब्रह्म के स्वरूप के साक्षात्कार से होगा। मोक्ष के साधन के रूप में शंकराचार्य ‘ज्ञानमार्ग’ को प्राथमिक महत्व देते हैं। उनके अनुसार ज्ञान से ही मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।
67. सूची-I को सूची-II से सुमेलित करें एवं सही कूट का चयन करें− सूची-I (लेखक) सूची-II (विषय)
A. जीव और ब्रह्म का तादात्म्य i. मध्व
B. जीव और ब्रह्म का सादृश्य ii. शंकर
C. ब्रह्म के विशेषण के रूप में जीव iii. निम्बार्क
D. ब्रह्म के साथ भेदाभेद सम्बन्ध iv. रामानुज के रूप में जीव
कूट :
A B C D
(a) iii iv ii i
(b) i i iv iii
(c) iv iii i ii
(d) iii ii i iv
Ans : (b)
A. शंकर जीव और ब्रह्म का तादात्म्य मानते हैं।
B. मध्व जीव और ब्रह्म का सादृश्य
C. रामानुज ब्रह्म के विशेषण के रूप में जीव
D. निम्बार्क ब्रह्म के साथ भेदाभेद सम्बन्ध के रूप में जीव को मानते
68. सूची-I को सूची-II से सुमेलित करें एवं सही कूट का चयन करें− सूची-I (लेखक) सूची-II (विषय)
A. महादेव देसाई i. गांधी की शव परीक्षा
B. गांधी ii. द अनिहिलेशन ऑफ कास्ट एण्ड अ रिप्लाई
C. यशपाल iii. वोमेन एण्ड सोशल जस्टिस
D. अम्बेडकर टू iv. द स्टोरी ऑफ बारदोली महात्मा गांधी
कूट :
A B C D
(a) iv iii i ii
(b) i ii iv iii
(c) ii iv i iii
(d) iv iii ii i
Ans : (a)
A. महादेव देसाई − iv. द स्टोरी ऑफ बारदोली
B. गांधी − iii. वोमेन एण्ड सोशल जस्टिस
C. यशपाल − i. गांधी की शव परीक्षा
D. अम्बेडकर − ii. द अनिहिलेशन ऑफ कास्ट एण्ड अ रिप्लाई टू महात्मा गांधी
69. सूची-I को सूची-II से सुमेलित करें एवं सही कूट का चयन करें− सूची-I (लेखक) सूची-II (विषय)
A. गांधी i. माया सामान्यत: तथ्यों का कथन है‚ जैसे कि वे हैं।
B. टैगोर ii. आरोहण अवरोहण की पूर्ववर्ती प्रक्रिया से प्रतिबद्ध है।
C. श्री अरविन्द iii. जैसे ही हम नैतिक आधार खो देते हैं हम धार्मिक नहीं होते हैं।
D. विवेकानन्द iv. वह (मनुष्य) पृथ्वीपुत्र तो है‚ किन्तु है स्वर्ग का उत्तराधिकारी
कूट :
A B C D
(a) i iv ii iii
(b) ii iv i iii
(c) iii iv ii i
(d) iv i iii ii
Ans : (c) गांधी‚ जैसे हम नैतिक आधार खो देते हैं हम धार्मिक नहीं होते हैं। टैगोर‚ वह पृथ्वीपुत्र तो है‚ किन्तु है स्वर्ग का उत्तराधिकारी। श्री अरविन्द‚ आरोहण अवरोहण की पूर्ववर्ती प्रक्रिया से प्रतिबद्ध है। विवेकानन्द‚ जैसे कि वे हैं− माया सामान्यत: तथ्यों का कथन है।
70. निम्नलिखित में से गांधी के संदर्भ में कौन-सा कथन सत्य नहीं है?
(a) अहिंसा‚ सत्य की व्यावहारिक अभिव्यक्ति है।
(b) मनुष्य सम्पर्ण सत्य को जान सकता है।
(c) साध्य एवं साधन मूल्यों की एक शृंखला है।
(d) सत्य एवं अहिंसा अविभाज्य हैं।
Ans : (b) गांधी के अनुसार मनुष्य सम्पूर्ण सत्य को नहीं जान सकता है। गांधी के अनुसार हम ‘सत्य’ का पूर्ण दर्शन तो करते नहीं कहीं-कहीं हमें ‘सत्य’ की क्षणिक झांकी मिलती रहती है। इसी कारण हम ‘सत्य’ की पूर्ण शक्ति से अपरिचित रह जाते हैं। किन्तु अपनी पूर्णता में ‘सत्य’ सत् को पूर्णतया प्रकाशित कर देता है।
71. अस्पृश्यता विरोधी उपवास गांधी ने इनके विरुद्ध किया था−
(a) ब्रिटिश सरकार (b) सवर्ण हिन्दू
(c) ईसाई (d) सनातनी हिन्दू
Ans : (b) गांधी जी ने अस्पृश्यता विरोधी उपवास सवर्ण हिन्दुओं के विरुद्ध किया था। यरवदा जेल में जब गांधी जी को पता चला कि ब्रिटिश सरकार द्वारा दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र बनाया जा रहा है‚ तो यह उपवास 20 सितम्बर 1932 को शुरू किया गया। यहीं से ‘हरिजन’ शब्द दलितों के लिए प्रयुक्त हुए।
72. सूची-I को सूची-II से सुमेलित करें एवं सही कूट का चयन करें− सूची-I (लेखक) सूची-II (ग्रन्थ)
A. गांधी i. गांधी जी इन इंडियन रिलेज्स
B. जे.बी.कृपलानी ii. इथिकल रिलिजन
C. महादेव देसाई iii. द फिलासफी ऑफ महात्मा गांधी
D. दत्ता डी.एम. iv. द गांधियन वे
कूट :
A B C D
(a) ii iv i iii
(b) i ii iv iii
(c) iii ii i iv
(d) iv i iii ii
Ans : (a)
A. गांधी − ii. इथिकल रिलिजन
B. जे.बी.कृपलानी − iv. द गांधियन वे
C. महादेव देसाई − i. गांधी जी इन इंडियन रिलेज्स
D. दत्ता डी.एम. − iii. द फिलासफी ऑफ महात्मा गांधी
73. निम्न में से किसके विचार में प्राकृतिक अधिकार एक प्रकार का आत्म संरक्षण है?
(a) हॉब्स (b) पेन
(c) कांट (d) एक्विन्स
Ans : (a) हॉब्स के विचार में प्राकृतिक अधिकार एक प्रकार क आत्म−संरक्षण है। हॉब्स ‘सामाजिक समझौते का सिद्धान्त का प्रतिपादन’ करता है।
74. गैडमर के अनुसार हर्म्युनिटिक समुदाय से तात्पर्य है−
(a) ग्रंथ और अध्येता का सहनिर्धारण
(b) ग्रंथ और लेखक का सहनिर्धारण
(c) ग्रंथ और संदर्भ का सहनिर्धारण
(d) लेखक और अध्येता का सहनिर्धारण
Ans : (a) गैडमर हर्म्युनिटिक के बहुत बड़े जानकार थे। उनके अनुसार हर्म्युनिटि समुदाय से तात्पर्य‚ ग्रन्थ और अश्र्येता का सहनिर्धारण है। यह 20वीं शताब्दी के महाद्वीपीय दार्शनिक के रूप में विख्यात है।
75. स्लायर माखैर के हर्म्युनिटिक्स के सिद्धांत के आलोक में निम्नांकित अभिकथनों पर विचार करें तथा सही
कूट का चयन करें−
i. व्याख्या की समस्या बोध की समस्या है।
ii. हर्म्युनिटिक्स त्रुटिपूर्ण बोध के निवारण की कला है।
iii. हर्म्युनिटिक्स का क्षेत्र केवल पवित्र ग्रंथों का ही नहीं अपितु सभी मानवीय ग्रंथों एवं उनके संप्रेक्षण की विधि है।
(a) केवल i सही है।
(b) केवल i और ii सही हैं।
(c) केवल i ओर iii सही हैं।
(d) सभी i, ii और iii सही हैं।
Ans : (d) हर्म्युनिटिक्स भास्य की प्रविधि और सिद्धान्त है। श्लायर माखैर व्याकरण भाष्य और मनोवैज्ञानिक भाष्य में अन्तर करते हैं। श्लायर के विचारों में−
i. व्याख्या की समस्या बोध की समस्या है।
ii. हर्म्युनिटिक्स त्रुटिपूर्ण बोध के निवारण की कला है।
iii. हर्म्युनिटिक्स का क्षेत्र केवल पवित्र ग्रंथों का ही नहीं अपितु सभी मानवीय ग्रंथों एवं उनके संप्रेक्षण की विधि है। यू.जी.सी. नेट/जेआरएफ परीक्षा‚ दिसम्बर-2015 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY) व्याख्या सहित द्वितीय प्रश्न-पत्र का हल
नोट : इस प्रश्न पत्र में पचास (50) बहु-विकल्पीय प्रश्न हैं। प्रत्येक प्रश्न के दो (2) अंक हैं। सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।
1. नैतिक संदर्भ में अधोलिखित में से किसके साथ ऋत की साम्यता संभव है?
(a) अर्थ (b) मोक्ष
(c) सत्य (d) निषेध
Ans. (c) : ऋक्संहिता में ‘ऋत्’ का विचार मिलता है। वैदिक ऋषि ‘ऋत्’ का रक्षक ‘वरुण’ का माना है। वेदों में ‘सत्’ को सत्ता दृष्टि से ‘सत्य’ और नैतिक नियमन की दृष्टि से ‘ऋत्’ तथा ‘आनंद’ की दृष्टि से ‘मधु’ या ‘मधुमान’ कहा है। इसके अतिरिक्त सदाचार के स्तर पर ‘ऋत्’ शब्द का प्रयोग सत्य व्यवस्था और औचित्य है। ‘ऋत्’ का विपरीत ‘अनृत’ है।
2. निम्नलिखित में कौन अर्थीभावना का संकेतक है?
(a) यज् धातु (b) लिंग
(c) निपात (d) अख्यात
Ans. (d) : ‘अख्यात’ को अर्थीभावना का संकेतक माना जाता है।
3. निम्नलिखित में से कौन सा सिद्धांत ख्याति को स्मृतिप्रमोष के रूप में स्वीकार करता है?
(a) असत् ख्याति (b) अख्याति
(c) अनिर्वचनीय ख्याति (d) सत् ख्याति
Ans. (b) : प्रभाकर के अनुसार‚ हमारा ‘भ्रम’ स्मृतिप्रमोष के कारण विवेकाग्रह (भेदभाव का आभाव) होने के कारण उत्पन्न है। ‘स्मृतिप्रमोष’ स्मरण शक्ति का दोष को कहते हैं। ‘स्मृतिप्रमोष’ के कारण उत्पन्न भ्रान्ति या भ्रम को प्रभाकर ‘अख्याति’ कहते हैं। उनके इस मत को ‘आख्यातिवाद’ कहते हैं।
4. दूसरों की मानसिक स्थिति को प्रकट करने के ज्ञान को जैन दर्शन में निम्नलिखित में से किस रूप में जान जाता है?
(a) अवधि (b) केवल
(c) मति (d) मन:पर्याय
Ans. (d) : जैन दर्शन में ज्ञान दो प्रकार साधारण अथवा असाधारण; अथवा अप्रत्यक्ष तथा लौकिक अथवा अलौकिक अथवा परोक्ष अथवा अपरोक्ष माने गये हैं। अपरोक्ष ज्ञान के तीन भेद-अवधि मन: पर्याय‚ केवल। मन: पर्याय वह ज्ञान है जो दूसरों के मानसिक स्थिति को प्रकट करता है। यह ज्ञान आत्मपूर्वक‚ मनुष्य क्षेत्र तक सीमित और गुण के कारण उत्पन्न है।
5. नैयायिकों के अनुसार‚ सभी प्रकार की धूम्र घटनाओं को हम जान सकते हैं‚ मात्र:
(a) योगज प्रत्यासत्ति से
(b) सामान्यलक्षण प्रत्यासत्ति से
(c) ज्ञानलक्षण प्रत्यासत्ति से
(d) समवाय सन्निकर्ष से
Ans. (b) न्याय-वैशेषिक दर्शन में तीन प्रकार के अलौकिक सन्निकर्ष को माना गया है। सामान्य लक्षण‚ ज्ञान लक्षण तथा योगज। विभिन्न तत्वों में समानता की प्रतीति के आधारभूत धर्म की सामान्य धर्म कहा जाता है। तत्वों या वस्तुओं के ‘सामान्य धर्मों’ का प्रत्यक्ष सामान्य लक्षण प्रत्यासत्ति है। उदाहरण स्वरूप ‘सभी प्रकार की धूम्र घटनाओं को हम सामान्य लक्षण प्रत्यासति के आधार पर ही जानते हैं।
6. न्याय की किस अवधारणा के अनुसार‚ एक व्यक्ति भूतकाल‚ वर्तमान और भविष्य की वस्तुओं का अनुभव कर सकता है?
(a) सामान्यलक्षण से (b) योगज से
(c) श्रावण से (d) ज्ञानलक्षण से
Ans. (b) : न्याय-वैशेषिक में ‘योगज प्रत्यक्ष’ समस्त भूत‚ वर्तमान और भविष्य स्थूल और सूक्ष्म‚ समीपस्थ और दूरस्थ परार्थों का योगी प्रत्यक्ष करता है। अष्टांक योग के अनुष्ठान से साधकों की आत्मा में एक तरह की विलक्षण शक्ति उत्पन्न हो जाती है। जिसे ‘योगज सन्निकर्ष’ कहते हैं।
7. ‘अग्नि शीतल है क्योंकि यह एक द्रव्य है।’ न्याय के अनुसार उपर्युक्त तर्क में किस प्रकार का दोष है?
(a) विरुद्ध (b) असिद्ध
(c) बाध (d) सत्प्रतिपक्ष
Ans. (c) : ‘बाधित’ हेत्वाभास वहां होता है जहां उसके साध्य के आभाव को अन्य प्रमाण द्वारा सिद्ध किया जा सके। ‘बाध’ या ‘बाधित’ हेतु में साध्यभाव अन्य प्रमाण द्वारा सिद्ध होता है। जैसे-
‘अग्नि शीतल है क्योंकि यह एक द्रव्य है। यहां शीतलता का आभाव अग्नि की उष्णता का प्रत्यक्ष प्रमाण द्वारा सिद्ध है।
(भारतीय दर्शन: आलोचन और अनुशीलन: चन्द्रधर शर्मा)
8. सूची – I को सूची- II के साथ सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूटों में से सही का चयन कीजिए:
सूची – I सूची – II
a. प्रागाभाव (i) न्याय
b. प्रमाणाभाव (ii) मीमांसा
c. प्राज्ञ iii. वैशेषिका
d. प्रमाणसम्प्लव iv.वेदांत
कूट :
(A) (B) (C) (D)
(a) (i) (ii) (iii) (iv)
(b) (ii) (i) (iv) (iii)
(c) (iii) (ii) (iv) (i)
(d) (iii) (i) (ii) (iv)
Ans. (c) : इस प्रश्न को गलत माना गया है।
9. अभाव के संदर्भ में‚ ‘जले गंधो नास्ति’ कथन में‚ ‘जल’ से क्या अभिप्राय है?
(a) प्रतियोगी (b) अनुयोगी
(c) अनुयोगिता (d) प्रतियोगितावच्छेदकधर्म
Ans. (b) : ‘जले गंधो नास्ति’ में ‘जल’ अनुपयोगी है और गंध’ प्रतियोगी है। किसी भी द्रव्य में जिस द्रव्य का आभाव सिद्ध किया जाता है। वह आभाव का प्रतियोगी तथा जिस द्रव्य में किया जाता है वह आभाव का ‘अनुपयोगी’ कहलाता है। जल (अनुपयोगी’ में गंध
(प्रतियोगी) का आभाव।
10. आकाश में ‘आकाशत्व’ निम्नलिखित में से किस भाव से निहित है?
(a) गुण-गुणी भाव (b) अवयव-अवयवी भाव
(c) जति-व्यक्ति भाव (d) विशेष-नित्यद्रव्य भाव
Ans. (d) : वैशेषिक दर्शन में ‘आकाश’ आदि नित्य पदार्थों परमाणु आदि को परस्पर भिन्न सिद्ध करने वाला ‘विशेष’ पदार्थ माना गया है। इसे स्वतोव्यावृत्त स्वीकार किया गया है। इन सबमे एक विशेषत्व नाम का साधारण धर्म है। पुन: न्याय-वैशेषिक दर्शन में एक व्यक्ति में रहने वाला धर्म जाति-रूप सामान्य न होकर मात्र ‘उपाधि’ है। न्याय-वैशेषिक के अनुसार आकाश‚ काल‚ दिक् एक-एक है अनेक नहीं। इसलिए आकाशत्व‚ कालत्व और दिक्त्व उपाधियां है। अत:
‘आकाशत्व’ कोई जाति न होकर मात्र ‘विशेष नित्य द्रव्य भाव है।
11. ‘‘संसार के निरंतर विकसित होने पर भी कुल ऊर्जा समान रहती है‚ एवं कारण-कार्य भी उसी शक्ति कमोवेश विकसित रूप है’’-यह विचारधारा निम्नलिखित में किसके द्वारा अनुमोदित की गई है?
(a) वेदांत (b) सांख्य
(c) न्याय (d) बौद्ध दर्शन
Ans. (b) : ‘संसार के निरन्तर विकसित होने पर कुल ऊर्जा समान रहती है‚ एवं कारण कार्य भी उसी शक्ति का कमोवेश विकसित रूप है। यह मत सांख्य दर्शन का है। वह कारण कार्य के संबंध में सत्कार्यवादी सिद्धांत को मानता है।
12. चार्वाक के अनुसार तथाकथित आत्मा कुछ भी नहीं है; अपितु:
(a) शरीर ही है (b) चेतना ही है
(c) चेतनायुक्त शरीर है (d) चेतनारहित शरीर है
Ans. (c) : चार्वाक दर्शन एक भौतिकवादी दर्शन है। चार्वाकों आत्मा‚ ईश्वर आदि की अवधारणा का खण्डन किया है। उनके अनुसार हम जिसे आत्मा कहते हैं वह देह विशिष्ट (शरीरयुक्त) चैतन्य है। जो शरीर के नष्ट होने के बाद नष्ट हो जाती है। इनका मत ‘देहआत्मवाद’ शरीरात्मवाद कहलाता है।
13. न्याय के अनुसार ज्ञान के किस प्रकार का कारण आत्मा है?
(a) समवायी (b) असमवायी
(c) निमित्त (d) उपादान
Ans. (b) : न्याय दर्शन में ‘ज्ञान’ को ‘आत्मा’ का ‘आगुन्तक धर्म’ माना गया है। न्याय दर्शन के अनुसार आत्मा में ज्ञान उत्पन्न होता है। ज्ञान आत्मा का एक विशेष गुण है। ‘आत्मा’ एक द्रव्य होने के कारण गुण ‘ज्ञान’ का समवायीकरण है।
14. ‘पर्वत में अग्नि है क्योंकि वहाँ नील धूम्र है’ न्याय के अनुसार इस अनुमान में दोष है:
(a) अनैकांतिक (b) आश्रयासिद्ध
(c) व्याप्तत्वासिद्ध (d) बाधित
Ans. (c) : ‘पर्वत में अग्नि है क्योंकि वहां नील धूम्र है’ में ‘नील धूम्र’ सोपाधिक है। अत: यहां व्याप्तत्वासिद्ध दोष है। इसमें हेतु सोपाधिक होता है।
15. शंकर के अनुसार जगत की स्थिति है:
(a) सत् (b) असत्
(c) सदासद्विलक्षण (d) सदासत्
Ans.(c) : आचार्य शंकर अपने अद्वैत वेदान्त में जगत् को सदसद्विलक्षण मानते हैं। उनके अनुसार सत् वह है जो त्रिकालबाधित है अर्थात् तीनों कालों में विद्यमान है और असत् वह है जिसका तीनों कालों में अभाव है। जगत् सत् नहीं है क्योंकि यह ज्ञान का विषय होने के कारण नष्टप्राय है। जगत् असत् भी नहीं है क्योंकि जगत का अनुभव होता है। इस प्रकार जगत् प्रपंच सदसदविलक्ष् ाण होने के कारण मिथ्या है।
16. रामानुज के अनुसार ईश्वर है:
(a) जगत का केवल निमित्तकारण
(b) जगत का केवल उपादानकारण
(c) जगत का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण
(d) अकारण
Ans. (c) : रामानुज ईश्वर को जगत् का निमित्त और उपादान दोनों कारण मानते हैं। ईश्वर की दो अवस्थाएँ-कारणावस्था तथा कार्यावस्था। प्रलयकाल में चित् और अचित् सूक्ष्मावस्था में रहते हैं यह ब्रह्म की कारणावस्था है और सृष्टि के समय चिद्चित् स्थूलरूप धारण कर लेते हैं यह ब्रह्म की कार्यावस्था है। सूक्ष्म चिदचिद्विशिष्ट ब्रह्म कारण और स्थूल चिद्चिद ब्रह्म कार्य है। ब्रह्म ही कारण और कार्य दोनों रूपों में उपादान है। सृष्टि ईश्वर की इच्छा से होती है। इसका प्रयोजन केवल लीला है। अत: जगत् का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण ‘ब्रह्म’ सिद्ध होता है। शंकर भी ब्रह्म को जगत् का अभिन्ननिमित्तोपादानकारण मानते हैं।
17. महावाक्य ‘अहंब्रह्मास्मि’ की मध्य की व्याख्या का अर्थ है:
(a) जीव और ब्रह्म का तादात्मय
(b) जीव और ब्रह्म का सादृश्य
(c) जीव ब्रह्म का विशेषण है
(d) जीव और ब्रह्म का प्रकार-प्रकारी स्वरूप
Ans. (b) : महावाक्य ‘अहंब्रह्मास्मि’ की मध्व व्याख्या उनके द्वैतवादी वेदान्त दर्शन पर आधारित है। मध्व मुक्तअवस्था में जीव और ब्रह्म का सादृश्य मानते हैं। अत: उनके अनुसार‚ ‘अहं’ ब्रह्मास्मि’ का तात्पर्य यह नहीं है कि मैं ही ब्रह्म हूं। अपितु मैं
(आत्मा) ब्रह्म के सादृश्य हूं। मध्व ब्रह्म और जीव में साम्यता दिखाने के लिए इस महावाक्य की भेदवादी व्याख्या प्रस्तुत करते हैं।
18. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित करें और नीचे दिये गये कूटों की सहायता से सही उत्तर चुने:
सूची-I सूची-II
(A) विद्यारण्य (i) तत्त्वप्रकाशिका
(B) श्रीनिवास (ii) वेदान्तपारिजात
(C) जयतीर्थ (iii) पञ्चदशी
(D) निम्बार्क iv.यतीन्द्रमतदीपिका
कूट :
(A) (B) (C) (D)
(a) (i) (iii) (iv) (ii)
(b) (iii) (iv) (i) (ii)
(c) (ii) (iii) (iv) (i)
(d) (i) (ii) (iii) (iv)
Ans. (b) :
(a) विद्यारण्य (iii) पञ्चदशी
(b) श्रीनिवास (iv) यतीन्द्रमतदीपिका
(c) जयतीर्थ (i) तत्वप्रकाशिका
(d) निम्बार्क (iii) वेदान्तपारिजत
19. निम्नलिखित में से कौन सा अम्बेडकर द्वारा स्वीकार नहीं किया गया है?
(a) स्वतन्त्रता‚ समानता‚ बन्धुत्व
(b) शिक्षा‚ संगठन‚ आन्दोलन
(c) जाति‚ वर्ण‚ कर्म
(d) बुद्ध‚ धम्म‚ संघ
Ans. (c) : अम्बेडकर जाति‚ वर्ण‚ कर्म व्यवस्था की स्वीकार नहीं करते हैं। उनके अनुसार जाति‚ वर्ण‚ कर्म के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए।
20. निम्नलिखित में से किसे टैगोर द्वारा मनुष्य के लिए अनिवार्य पक्ष माना गया है?
(a) शारीरिक एवं मानसिक
(b) प्राणिक एवं मानसिक
(c) भौतिक एवं आध्यात्मिक
(d) मानसिक एवं आध्यात्मिक
Ans. (c) : टैगोर के अनुसार‚ मानव स्वरूप के दो अनिवार्य पक्ष भौतिक एवं आध्यात्मिक पक्ष है। प्रथमत: मानव के स्वरूप का एक अंश उसका भौतिक एवं जैविक अंश है जो उसे विकास प्रक्रिया से प्राप्त होता है‚ इसको टैगोर ससीम पक्ष भी कहते हैं। इसके अतिरिक्त उसका दूसरा पक्ष उसका अभौतिक एवं आध्यात्मिक अंश है तथा जो उसे विशिष्टता प्रदान करता है और जिसके कारण उसमें स्वतंत्रता का ेभी अंश विद्यमान है। इसको असीमता का पक्ष कहा जा सकता है।
21. सूची-I को सूची-II से सुमेलित करें तथा नीचे दिये गये
कूट से सही उत्तर का चयन करें:
सूची-I सूची-II
(A) गाँधी i. लाइफ अहेड
(B) टैगोर ii. दी रिकवरी ऑफ फेथ
(C) राधाकृष्णन् iii. क्राइसिस इन सिविलाइजेशन
(D) जे. कृष्णमूर्ति iv. दी आर्ट ऑफ लीविंग
कूट :
(A) (B) (C) (D)
(a) (i) (iii) (ii) (iv)
(b) (iv) (iii) (ii) (i)
(c) (iii) (ii) (iv) (i)
(d) (ii) (i) (iii) (iv)
Ans. (b) :
(a) गाँधी (iv) दी आर्ट ऑफ लिविंग
(b) टैगोर (iii) क्राइसिस इन सिविलाइजेशन
(c) राधाकृष्णन (ii) दी रिकवरी आफ फेथ
(d) जे.कृष्णमूर्ति (iii) लाइफ अहेड
22. श्री अरविन्द के अनुसार विकास की प्रक्रिया में निम्नलिखित का सही क्रम क्या है?
(a) ऊर्ध्वमन‚ उच्चतर मन‚ प्रदीप्त मन‚ अन्तर्भासिक मन
(b) उच्तर मन‚ प्रदीप्त मन‚ अन्तर्भासिक मन‚ ऊर्ध्वमन
(c) प्रदीप्त मन‚ उच्चतन मन‚ अन्तर्भासिक मन‚ ऊर्ध्वमन
(d) महात्मा गांधी
Ans. (b) : श्री अरविन्द के अनुसार‚ मानस तथा अतिमानस के मध्य कुछ क्रमिक स्तर है जो क्रमानुसार -‘उच्चतर मानस’ (Higher mind), ‘प्रदीप्त मानस’ (Illumined mind), ‘अन्तर्दृष्टि या अन्तर्भासिक मानस (Intuitive mind), ‘व्यापक मानस’ (Over mind) यह निम्न गोलाई से उच्च गोलाई में पहुंचने की विकास प्रक्रिया है। अर्थात् मानस (mind) से अतिमान (overmind) तक की विकास प्रक्रिया है।
23. वैशेषिक के अनुसार सृष्टि परमाणुओं के संयो से प्रारंभ होती है:
(a) परमाणु के स्वभाव के द्वारा
(b) ईश्वरीय इच्छा के द्वारा
(c) उत्पादक व्यवस्था के द्वारा
(d) आकस्मिक
Ans. (c) : वैशेषिक के अनुसार परमाणुओं में संयोग सृष्टि का कारण है। परमाणु भौतिक तथा निष्क्रिय है इसमें सक्रियता और गति ईश्वरीय इच्छा के द्वारा आती है। ईश्वर ‘अदृष्ट’ से गति लेकर परमाणुओं में डाल देता है जिससे परमाणुओं गति उत्पन्न होती है और परमाणु एक दूसरे से जुड़ने लगते हैं जिससे शृष्टि का प्रारंभ होता है।
24. बौद्ध दर्शन में प्रतीत्यसमुत्पाद से अभिप्राय है:
(a) कारण में कार्य पूर्व -स्थित होता है
(b) प्रत्येक वस्तु का अस्तित्व क्षणिक है
(c) प्रत्येक वस्तु का अस्तित्व सशर्त होता है
(d) जो कुछ भी है‚ शाश्वत है
Ans. (c): बौद्ध दर्शन के अनुसार‚ प्रत्येक वस्तु का कोई न कारण अवश्य होता है। अर्थात् किसी भी वस्तु का अस्तित्व अपने पूर्ववर्ती अवस्था का परिणाम है। अर्थात् वस्तु का अस्तित्व सशर्त
(उपाधिस्वरूप) होता है‚ वह अनौपधिक नहीं होता है। ‘प्रतीत्य’ का अर्थ है-‘अपेक्षा रखकर’ या निर्भर अथवा आश्रित रहकर एवं समुत्पाद का अर्थ है ‘उत्पत्ति’। अत: प्रतीत्यसमुत्पाद का अर्थ है कारण की अपेक्षा रखकर या निर्भर रहकर कार्य की उत्पत्ति। प्रतीत्यसमुत्पाद में प्रत्येक वस्तु के अस्तित्व को सशर्त माना गया है।
25. निम्नलिखित में से कौन सा एक‚ सांख्य के अनुसार प्रकृति की सत्ता के लिए कारण नहीं हो सकता?
(a) भेदानाम् परिमाणात् (b) समन्वयात्
(c) भोक्तृभावात् (d) कारण-कार्य विभागात्
Ans. (c) : प्रकृति की सत्ता के लिए कारण सांख्य दर्शन में भोक्तृभावात् नहीं हो सकता है। यह पुरुष का गुण है। जिसका अर्थ है ‘भोक्ता पुरुष’ सांख्य दर्शन में प्रकृति की सत्ता को सिद्ध करने के लिए पांच युक्तियां दी गयी है- (1) भेदानाम् परिमाणात्
(2) समन्वयात् (3) शक्तित: प्रवृत्ते: (4) कारण-कार्य विभागात् (5) अग्निभागाद्वैश्यरूपस्य।
26. निम्नलिखित कथनों पर सेंट थॉमस एक्वीनस के दर्शन के परिपे्रक्ष्य में विचार कीजिए और सही कूट का चयन कीजिए:
(A) दर्शनशास्त्र तथ्यों से ईश्वर और धर्मशास्त्र ईश्वर से तथ्यों पर विचार करता है।
(B) उसने तर्क बुद्धि और विश्वास के बीच अंतर किया और यह तर्क दिया कि आस्था के विषय जैसे दैवी प्रकाशना आदि तर्क बुद्धि से परे हैं किन्तु उसके विरोधी नहीं है।
(C) आस्था इच्छा का विषय है और इच्छा उस स्वीकृति को निर्देशित करती है।
कूट:
(a) केवल (A) सही है
(b) केवल (B) सही है
(c) केवल (A) और (C) सही है
(d) (A), (B) और (C) सही है
Ans. (d) : सेन्ट थॉमस एक्वीनास का दर्शन ईसाई धर्म से प्रभावित था। उसके अनुसार दर्शन का क्षेत्र है तर्क तथा धर्म का क्षेत्र है श्रुति। एक्वीनस के अनुसार‚ दर्शनशास्त्र तथ्यों से ईश्वर और धर्मशास्त्र ईश्वर से तथ्यों पर विचार करता है।  उसने तर्कबुद्धि (Reason) और आस्था (faith) के बीच भी अन्तर किया और यह तर्क दिया कि आस्था के विषय जैसे-दैवी प्रकाशना आदि तर्कबुद्धि से परे हैं किन्तु उसके विरोध नहीं। अर्थात् दर्शन और धर्म के क्षेत्र भले ही अलग-अलग हो परन्तु उनमें कोई विरोध नहीं।  उसके अनुसार‚ आस्था इच्छा का विषय है और इच्छा उस स्वीकृति को निर्देशित करती है।
27. सूची – I के साथ सूची- II को सुमेलित कीजिउ और नीचे दिए गए कूटों में से सही उत्तर का चयन कीजिए:
सूची-I सूची-II
(a) प्रोटागोरस i. जो कुछ है ‘है’ ‘जो है’ नहीं उसे जान नहीं जा सकता
(b) जार्जियस ii. मनुष्य सभी वस्तुओं का मानदंड है
(c) थ्रेसीमेकस iii. किसी का अस्तित्व नहीं है‚ यदि है इसे नहीं जान जा सकता
(d) पार्मेनाइडीज iv. न्याय शक्तिशालियों का हित है
कूट :
(A) (B) (C) (D)
(a) (iv) (iii) (ii) (i)
(b) (ii) (iii) (iv) (i)
(c) (ii) (iv) (iii) (i)
(d) (iii) (i) (ii) (iv)
Ans. (b):
(a) प्रोटागोरस (ii) मनुष्य सभी वस्तुओं का मानदंड है।
(b) जार्जियस (iii) किसी का अस्तित्व नहीं है‚ यदि है तो इसे नहीं जाना जा सकता।
(c) थ्रेसीमेकस (iv) न्याय शक्तिशालियों का हित है।
(d) पार्मेनाइडीज (ii) जो कुछ है ‘है’ नहीं उसे जाना नहीं जा सकता।
28. निम्नलिखित में से किस मध्यकालीन दार्शनिक ने कहा था: ‘‘इस प्रकार से समझे कि आप विश्वास कर सकें‚ विश्वास इस प्रकार करें कि आप समझ सकें। कुछ बातों पर हम तब तक विश्वास नहीं करते जब तक उन्हें समझ नहीं लेते; या फिर हम तब तक नहीं समझते जब तक कि हम विश्वास नहीं करते।’’
(a) सेंट एन्सल्म (b) सेंट एक्वीनस
(c) सेंट ऑगस्टीन (d) विलियम ओकैम
Ans. (c): सेंट ऑगस्टीन के अनुसार‚ इस प्रकार से समझे कि आप विश्वास करें‚ विश्वास इस प्रकार करें कि आप समझ सकें। कुछ बातों पर हम तब तक विश्वास नहीं करते जब तक उन्हें समझ नहीं लेते या फिर हम तब तक नहीं समझते जब तक कि हम विश्वास नहीं करते।
29. निम्नलिखित कथनों पर पाइथागोरस के दृष्टिकोण से विचार करें और सही कूट का चयन करें:
(A) पाइथागोरस शाश्वत पुन: आवर्तन की अवधारणा में विश्वास रखता थ।
(B) पाइथागोरस का विचार था कि आत्मा अमर है और इसका पुनर्जन्म होता है।
(C) पाइथागोरस ने इस विचार को अस्वीकृत किया कि विश्व की प्रक्रिया अंतहीन और अपरिवर्तनीय है।
कूट:
(a) केवल (a) सही है
(b) केवल (b) सही है
(c) केवल (a) और (c) सही है
(d) केवल (a) और (b) सही है
Ans. (d) : पाइथागोरस शाश्वत पुन: आवर्तन (Eternal recurrence) में विश्वास करते थे। उनके अनुसार आत्मा अमर है और इसका पुनर्जन्म होता है। यह उस पर आर्फिक सम्प्रदाय की धार्मिक और नैतिक मान्यताओं का उस पर प्रभाव था। जिसे आवगमन सिद्धान्त कहते हैं। पाइथागोरस विश्व की प्रक्रिया अंतहीन और अपरिवर्तनीय मानता है।
30. प्लेटो के ज्ञान के सिद्धांत के संदर्भ में न्यूनतम से अधिकतम के सही क्रम का चयन करें।
(a) ज्ञानेन्द्रियों से उत्पन्न ज्ञान‚ काल्पनिक ज्ञान‚ विमर्शात्मक प्रज्ञा बुद्धी‚ तर्कबुद्धिपरक अंतर्दृष्टी
(b) काल्पनिक ज्ञान‚ ज्ञानेन्द्रियों से उत्पन्न ज्ञान‚ विमर्शात्मक प्रज्ञा बुद्धी‚ तर्कबुद्धिपरक अंतर्दृष्टी
(c) ज्ञानेन्द्रियों से उत्पन्न ज्ञान‚ काल्पनिक ज्ञान‚ तर्कबुद्धिपरक‚ अंतर्दृष्टी‚ विमर्शात्मक प्रज्ञा बुद्धी
(d) विमर्शात्मक प्रज्ञा बुद्धी‚ काल्पनिक ज्ञान‚ ज्ञानेन्द्रियों से उत्पन्न ज्ञान‚ तर्कबुद्धिपरक अंतर्दृष्टी
Ans. (b) :प्लेटो के ज्ञान सिद्धान्त में न्यूनतम से अधिकतम का सही क्रम-काल्पनिक ज्ञान‚ ज्ञानेन्द्रियां से उत्पन्न ज्ञान‚ विमर्शात्मक प्रज्ञा बुद्धि‚ तर्कबुद्धिपरक अंतदृष्टि। प्लेटो एक बुद्धिवादी दार्शनिक था जो ‘बौद्धिक अंतर्दृष्टि’ को सर्वोत्कृष्ट ज्ञान मानता था।
31. नीचे दिए गए कथनों में से एक को अभिकथन (A) और दूसरे को तर्क (R) की संज्ञा दी गई है। अरस्तू के कोटि-सिद्धांत के आलोक में (A) और (R) पर विचार करते हुए सही कूट का चयन करें।
अभिकथन (A)
पदार्थों में द्रव्य प्रमुख है।
तर्क (R) द्रव्य वह है जो उद्देश्य का विधेय हो सकता है और उद्देश्य में निहित है।
कूट:
(a) दोनों (A) और (R) सही है और (A) की सही व्याख्या
(R) है।
(b) दोनों (A) और (R) सही है लेकिन (A) की सही व्याख्या
(R) नहीं है।
(c) (A) सही है लेकिन (R) गलत है।
(d) (A) गलत है लेकिन (R) सही है।
Ans. (c) : अरस्तू के द्वारा मानी गयी कोटियों में द्रव्य
(Substance) का महत्वपूर्ण स्थान है। अरस्तू ने सत्ता (Reality) को द्रव्य (Substance) कहा। अरस्तू के कोटि सिद्धांत में द्रव्य सर्वाधिक प्रमुख पदार्थ है। कोटियों को अरस्तू तर्कशास्त्र के विधेय कहता है। अरस्तू का द्रव्य किसी वाक्य का विधेय अथवा किसी वस्तु का गुण नहीं हो सकता है। जगत की सभी वस्तुएँ उसके गुण और विधेय है। अत: यह कहना द्रव्य वह है जो उद्देश्य का विधेय हो सकता है और उद्देश्य में निहित है‚ गलत है। अत: अभिकथन
(A) सही तथा तर्क (R) गलत है।
32. ‘जन्म जात प्रत्यय’ सिद्धांत निम्नलिखित में से किसको स्वीकार्य है?
(a) डेकार्ट और स्पिनोजा (b) डेकार्ड और बर्कले
(c) डेकार्ड और ह्मूम (d) लॉक और फित्शे
Ans. (a): प्लेटो‚ डेकार्ट‚ स्पिनोजा तथा लाइबनित्ज जो कि बुद्धिवादी दार्शनिक है को जन्मजात प्रत्ययों का सिद्धान्त स्वीकार्य है। जबकि लॉक‚ बर्कले ह्यूम आदि अनुभववादी इसका खण्डन करते हैं।
33. ईश्वर के अस्तित्व के समर्थन में ‘सत्तामीमांसा युक्ति’ को निम्नलिखित में से किसने विख्यात किया?
(a) डेकार्ट (b) डेकार्ट और सेंट एन्सेल्स
(c) ह्मूम (d) बर्कले
Ans. (b): ‘सत्तामीमांसा युक्ति’ ईश्वर अस्तित्व की पूर्णता के प्रत्यय को सर्वाधिक महत्त्व देती है। यह युक्ति संतएन्सेलम और डेकार्ट द्वारा ईश्वर अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए दी गयी। यह युक्ति प्रत्यय सत्तामूलक युक्ति भी कहलाती है जो प्रागनुभविक अथवा अनुभव निरपेक्ष तर्क है।
34. लॉक्स के ‘प्रत्यय’ विचार को निम्नलिखित में सही रूप से कौन चित्रित करता है?
(a) जिसको मनस अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करता है‚ जो प्रत्यक्ष विचार अथवा बुद्धि की त्वरित वस्तु है।
(b) जिसको मनस प्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करता है‚ जो प्रत्यक्ष विचार अथवा बुद्धि की त्वरित वस्तु है।
(c) जिसको मनस अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करता है‚ जो प्रत्यक्ष विचार अथवा बुद्धि की परीक्षा वस्तु है।
(d) जिसको मनस प्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करता है‚ जो प्रत्यक्ष विचार अथवा बुद्धि की परोक्ष वस्तु है।
Ans. (b) : लॉक के ‘प्रत्यय’ विचार के अनुसार‚ जिसको मनस प्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करता है‚ जो प्रत्यक्ष‚ विचार अथवा बुद्धि की त्वरित वस्तु है।
35. निम्नलिखित में से किस आधुनिक दार्शनिक ने संकल्पना की है- ‘‘दर्शनशास्त्र संपूर्ण रूप में एक वृक्ष की भांति है जिसकी जड़ें तत्वमीमांसा‚ जिसका तना भौतिक विज्ञान और जिसकी शाखाएं‚ जो तने से उभरती हैं‚ सभी अन्य विज्ञान है।’’
(a) स्पिनो़जा (b) बर्कले
(c) डेकार्ड (d) लाइबनिट्ज
Ans. (c): डेकार्ट के अनुसार‚ ‘‘दर्शनशास्त्र संपूर्ण रूप में एक वृक्ष की भांति है जिसकी जड़े तत्वमीमांसा‚ जिसका तना भौतिक विज्ञान और जिसकी शाखाएँ जो तने से उभरती हैं‚ सभी अन्य विज्ञान है।’’
36. निम्नलिखित कथनों पर स्पिनोजा के ज्ञान के सिद्धांत के आलोक में विचार कीजिए और सही कूट का चयन कीजिए:
(A) अस्पष्ट और अपर्याप्त विचार संवेदन और कल्पना में अपना दोत रखते हैं।
(B) तर्क वस्तुओं के सार्वभौमिक तत्वों को ग्रहण करता है और इनको ईश्वर के संबंधे में समझता है।
(C) बाह्य संसार न करना
(D) प्रातिभ ज्ञान ईश्वर के कुछ गुण के वस्तुगत सार के पर्याप्त विचार के साथ वस्तुओं के पर्याप्त सेार की ओर बढ़ता है।
कूट:
(a) केवल (a) और (c) सही है
(b) केवल (b) और (c) सही है
(c) केवल (c) सही है
(d) केवल (a), (b) और (c) सही है
Ans. (d): स्पिनोजा अपने ‘एथिक्स’ में ज्ञान की तीन अवस्थाएं बतलाता है- (1) काल्पनिक ज्ञान- इन्द्रियजन्य एवं लोकपरम्पराओं पर आधारित ज्ञान। अस्पष्ट और अपर्याप्त विचार संवेदन और कल्पना में अपना दोत रखते हैं इस स्तर पर तत्व के विश्वरूप का ज्ञान।
(2) बौद्धिक ज्ञान- यह वैज्ञानिक ज्ञान है जो तर्कबुद्धि पर आधारित है। भेदों में अनुस्युत अभेद का ज्ञान प्राप्त करते हैं। तर्क वस्तुओं के सार्वभौमिक तत्वों को ग्रहण करता है और इनको ईश्वर के संबंध में समझता है। यह ईश्वर के विश्वात्म रूप का ज्ञान है।
(3) प्रातिभ ज्ञान -ईश्वर के कुछ गुण के वस्तुगत सार के पर्याप्त विचार के साथ वस्तुओं के पर्याप्त सार की ओर बढ़ता है। अत:
यहां (a) (b) (c) तीनों सत्य है।
37. लाइबनिट्जे के शक्ति सिद्धांत के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
(a) शक्ति तब भी रहती है जब गति रुक जाती है क्योंकि यह गति का आधार है।
(b) विस्तार शरीर का आवश्यक गुण है।
(c) कोई भी द्रव्य नहीं है जो शक्ति की अभिव्यक्ति है।
(d) जो सक्रिय है वह अवास्तविक है।
Ans. (a): लाइबनिट्जे ‘शक्ति के संरक्षण के नियम’ में विश्वास करता है। उसके अनुसार चिदणुओं की शक्ति का योग सदा एक बना रहता है। अर्थात् शक्ति तब भी रहती जब गति रुक जाती है। क्योंकि यह गति का आधार है।
38. निम्नलिखित में से कौन सा कथन बर्कले के संदर्भ में सही है?
(a) बर्कले‚ लॉक के मूल अनुभववाद का प्रयोग प्रत्ययवाद की स्थापना के लिए करता है और इसके परिणाम स्वरूप भौतिकवाद और नास्तिकवाद का समर्थन करता है।
(b) बर्कले‚ लॉक के मूल अनुभववाद का प्रयोग प्रत्ययवाद की स्थापना के लिए करता है और इसके पणिाम स्वरूप भौतिकवाद और नास्तिकवाद को अस्वीकार करता है।
(c) मन में अमूर्त प्रत्यय की रचना की क्षमता होती है।
(d) किसी वस्तु का अस्तित्व उस वस्तु के मन के द्वारा प्रत्यक्ष होने या ज्ञान होने पर निर्भर नहीं करता।
Ans. (b): बर्कले‚ लॉक के मूल अनुभववाद का प्रयोग प्रत्ययवाद की स्थापना के लिए करता है। इसके परिेणामस्वरूप जड़ वस्तु की सत्ता का निराकरण कर भौतिकवाद की जगह प्रत्ययवाद और प्रत्ययों का कारण ईश्वर को मानकर नास्तिकवाद को अस्वीकार देता है।
39. ह्मूम के अनुसार कारण और कार्य के बीच तथाकथित संबंध निम्नलिखित में से है:
(a) अनुभव से पूर्वानुमान।
(b) निरीक्षण और अनुभव पर आधारित।
(c) कार्य-कारण से निहित है।
(d) दोनों एक दूसरे से अनिवार्य रूप से संबद्ध है।
Ans. (b): ह्यूम अपने संशयवादी दर्शन के आलोक में कारण कार्य संबंधों पर भी प्रश्न चिन्ह उठाता है। उसके अनुसार‚ कारण और कार्य के बीच संबंध निरीक्षण और अनुभव पर आधारित है जो भूतकाल की घटनाओं के आधार पर वर्तमान और भविष्य की घटनाओं को निर्धारित करने के लिए नियत साहचर्य और प्रकृति की एकरूपता पर आधारित है।
40. कांट ने शुद्ध बुद्धि के विप्रतिषेध की व्याख्या अपने निम्नलिखित में से किस सिद्धांत में की है?
(a) अनुभवातीत ईश्वर विज्ञान
(b) अनुभवातीत सृष्टि विज्ञान
(c) अनुभवातीत आत्म विज्ञान
(d) उपर्युक्त सभी
Ans. (b): कांट के अनुसार प्रज्ञा के तीन संप्रत्यय जिन्हें आत्मा‚ सृष्टि और ईश्वर के नाम से जाना जाता है जिनको सिद्ध करने के लिए तीन शास्त्र क्रमश: बुद्धिपरक मनोविज्ञान‚ बुद्धिसृष्टि विज्ञान और बुद्धिपरक ईश्वरविज्ञान है। कांट के अनुसार ये तीनों शाध्Eों में जब बुद्धि विकल्पों का प्रयोग इनको (आत्मा‚ सृष्टि और ईश्वर) को सिद्ध करने के लिए होता है तो ये अंतर्विरोधों से ग्रस्त हो जाते हैं। जिन्हें क्रमश: बुद्धिपरक मनोविज्ञान में ‘तर्काभास’ (Paral Qgisms) सृष्टि विज्ञान में इन्हें विप्रतिषेध (Antinomies) और ईश्वरमीमांसा में इन्हें व्याघात (Contradictions) कहा जाता है।
41. ‘प्राथमिक वाक्य वस्तु का सही चित्र प्रदर्शित करते हैं’ निम्नलिखित में से किसके द्वारा प्रतिपादित किया गया?
(a) मूर (b) रसेल
(c) विट्गेन्स्टीन (d) हुसर्ल
Ans. (c): विट्गेंसटाइन के अनुसार‚ प्राथमिक प्रतिज्ञप्ति (वाक्य) वस्तु का सही चित्र प्रदर्शित करते हैं। विट्गेन्सटाइन प्राथमिक प्रतिज्ञप्ति को अणु प्रतिज्ञप्ति भी कहते हैं।
42. सूची – I को सूची- II के साथ सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूटों में से सही उत्तर का चयन कीजिए:
सूची-I सूची-II
(a) हुसर्ल i. सत्यापन सिद्धान्त
(b) ए.जे. एयर ii. कोटि दोष
(c) विलियम जेम्स iii. इपोके
(d) जी. राइल iv. उपयोगितावादी सिद्धांत
कूट :
(A) (B) (C) (D)
(a) (iii) (i) (iv) (ii)
(b) (iii) (iv) (i) (ii)
(c) (iii) (i) (ii) (iv)
(d) (i) (ii) (iii) (iv)
Ans. (a): हुसर्ल द्वारा इपोके‚ ए.जे.एयर द्वारा सत्यापन सिद्धान्त विलियम जेम्स द्वारा उपयोगितावादी सिद्धान्त और गिल्बर्ट द्वारा कोटि-दोष सिद्धांत प्रस्तुत किया गया।
43. निम्नलिखित में से कौन-सी पुस्तक हाइडेगर के द्वारा लिखी गयी है?
(a) लेबन्सवेल्ट (b) बीईंग एंड टाइम
(c) प्रैगमेटिज्म (d) फिनॉमिनोलॉजी
Ans. (b): मार्टिन हाइडेगर जो अस्तित्ववादी विचारक है। उसकी पुस्तक बीईंग एण्ड टाइम (Sein and Zeit) और What is Metaphysics है।
44. तार्किक भाववाद निम्नलिखित में से किस आधार पर तत्त्वमीमांसा को अस्वीकार करता है?
(a) तत्त्वमीमांसीय प्रश्न मानवीय बुद्धि विकल्पों की सीमा से परे हैं।
(b) तत्त्वमीमांसीय प्रश्न संदिग्ध है।
(c) तत्त्वमीमांसीय प्रश्न अर्थहीन है क्योंकिे वे असत्यापनीय है।
(d) तत्त्वमीमांसीय प्रश्न देश और काल से परे है।
Ans. (c): तार्किक भाववाद इन्द्रिय प्रत्यक्ष को सत्यापन का आधार मानता है। भाववादियों के सत्यापन सिद्धांत के अनुसार वही कथन सत्यापनीय है जिनका प्रत्यक्ष निरीक्षण किया जा सके। उनके अनुसार तत्वमीमांसा के कथनों का प्रत्यक्ष निरीक्षण नहीं किया जा सकता है। क्योंकि यह असत्यापनीय है। अत: तत्त्वमीमांसा के प्रश्न अर्थहीन
(non-sensical) है।
45. जी. राईल के अनुसार निम्नलिखित में कौन-सा एक सही है?
(a) सभी भौतिकवादी घटनाएं मानसिक घटनाओं से नि:सरित होने योग्य है।
(b) सभी मानसिक घटनाएं भौतिकवादी घटनाओं से नि:सरित होने योग्य है।
(c) दोनों प्रकार की घटनाएँ एक-दूसरे से नि:सरित होने योग्य है।
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Ans. (b): गिल्बर्ट राइल के अनुसार सभी मानसिक घटनाएँ‚ भौतिकवादी घटनाओं से नि:सरित होने योग्य है। वह अपनी पुस्तक ‘The concept of mind’ में साधारण भाषा-विश्लेषण के आधार यह सिद्ध करने का प्रयास करता है कि मन और शरीर का द्वैत ‘श्रेणीपरक भूल’ का परिणाम है। उसके अनुसार मानसिक तथ्यों से संबंधित कथनों की व्याख्या व्यवहार या व्यवहार की प्रवृत्ति में हो सकती है।
46. मूर का परमाणुवादी विश्लेषण‚ किसके विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में है?
(a) कांट की ज्ञानमीमांसा एवं सत्तामीमांसा के बीच द्वन्द्व
(b) हेगल का विचार और सत्ता के बीच तादात्मय
(c) बे्रडले का परम तत्त्ववाद
(d) उपर्युक्त सभी
Ans. (d): मूर अपने दर्शन को प्रत्ययवाद के खण्डन से प्रारंभ करता है। वह ब्रैडले के सत्ता दृश्यता है के विचार का अपने परमाणुवादी विश्लेषण में खण्डन करता है।
47. अभिकथन (A) और तर्क (R) पर विचार करते हुए कांट के ज्ञान के दृष्टिकोण के आलोक में सही विकल्प का चयन करें।
अभिकथन (A)
सार्वभौमिकता‚ अनिवार्यता और नवीनता ज्ञान की शर्तें हैं।
तर्क (R) संश्लेषणात्मक प्रागनुभविक निर्णय ज्ञान की सभी आवश्यक शर्तों को पूर्ण करता है।
कूट:
(a) (A) और (R) दोनों सही है और (R),(A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों गलत है और (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही है और (R) गलत है और (R), (A) की सही व्याख्या नहीें है।
(d) (A) गलत है और (R) सही है और (R), (A) की सही व्याख्या नहीं हैं
Ans. (a) कांट अपने आलोचनावादी दर्शने में ज्ञान की शर्तों के रूप में तीन मापदण्ड सार्वभौमिकता‚ अनिवार्यता और नवीनता को मानता है और इसी आधार पर कहता है कि संश्लेषणात्मक प्रागनुभविक निर्णय ज्ञान की सभी आवश्यक शर्तों को पूर्ण करता है। अत: (A) और (R) दोनों सही है और (R) (A) की सही व्याख्या है।
48. हेडेगर के अनुसार‚ अस्तित्व रचनाओं का सही क्रम निम्नलिखित में से क्या है?
(a) एग्जिसटेंज‚ फालेननैस‚ फैक्टिसिटी
(b) एग्जिसटेंज‚ फैक्टिसिटी‚ फालेननैस
(c) फैक्टिसिटी‚ फालेननैस‚ एग्जिसटेंज
(d) फालेननैस‚ फैक्टिसिटी‚ एग्जिसटेंज
Ans. (b): हाइडेगर के अनुसार अस्तित्व रचनाओं (Structric) का सही क्रम ‘एग्जिस्टेज फैक्टिसिटी फालननैस है। मानव अपने आपको एकायक फेंका हुआ पाता है। उसके अस्तित्व का आभास कि वह है एक ‘तथ्य हैं।
49. हुसर्ल ने विषयापेक्षी की अवधारणा को निम्नलिखित में से किस दार्शनिक से ग्रहण किया?
(a) कांट (b) हेगल
(c) ब्रेन्टानो (d) डेकार्ट
Ans. (c): हुसर्ल विषयापेक्षी की अवधारणा को बे्रन्टानो से ग्रहण किया है। ब्रेन्टानो का चेतना के विषयापेक्षी सिद्धांत के अनुसार‚ चेतना एक दिशा है‚ जो किसी ओर उन्मुख होती है। चेतना कभी भी रिक्त नहीं होती‚ वह अनिवार्यत: किसी की चेतना है।
50. अभिकथन (A) और तर्क (R) पर विचार करते हुए विटगेन्सटीन के विचार के आलोक में सही विकल्प का चयन कीजिए:
अभिकथन (A) प्रत्येक तर्क वाक्य एक स्पष्ट और निश्चित अर्थ रेखता है।
तर्क (R)
दैनिक जीवन के तर्क वाक्यों की मिश्रित अभिव्यक्तियां होती हैं‚ जो तार्किक रूप से व्यक्ति वाचक नाम है।
कूट:
(a) (A) और (R) दोनों सही है और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों गलत हैं लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही है और (R) गलत है और (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(d) (A) गलत है और (R) सही है और (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
Ans. (c) विटगेंस्टाइन के अनुसार‚ प्रत्येक तर्क वाक्य एक स्पष्ट और निश्चित अर्थ रखता है। यह अभिकथन (A) सत्य है जबकि
तर्क (R) दैनिक जीवन के तर्क वाक्यों की मिश्रित अभिव्यक्तियां होती है‚ जो तार्किक रूप से व्यक्तिवाचक नाम है। गलत है। और सही व्याख्या भी नहीं है। यू.जी.सी. नेट/जेआरएफ परीक्षा‚ दिसम्बर-2015 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY) व्याख्या सहित तृतीय प्रश्न-पत्र का हल
1. निम्नांकित में nslJeeYeeme की पहचान करें।
सभी धूम्रवान वस्तुएं वह्निवान हैं। पर्वत धूम्रवान है। इसलिए‚ पर्वत वह्निवान है।
कूट :
(a) विरुद्ध (b) प्रकरणसम
(c) असिद्ध (d) सव्यभिचार
Ans. (d) : सव्यभिचार को अनैकान्तिक भी कहते हैं। दिये गये अनुमान में व्याप्ति अपूर्ण या दोषपूर्ण है। अर्थात् यह दोष तब उत्पन्न होता है जब हेतु का सम्बन्ध कभी साध्य से और कभी साध्य से भिन्न किसी अन्य वस्तु से होता है।
2. निम्नांकित में से कौन यह अस्वीकार करता है कि प्रत्यक्षानुभवों को शब्दों में अभिव्यक्त किया जा सकता है।
(a) केवल जयराशि भट्ट (b) केवल धर्मकीर्ति
(c) केवल महावीर (d) धर्मकीर्ति और विश्वनाथ
Ans. (d) : धर्मकीर्ति और विश्वनाथ अपने दर्शन में ‘प्रत्यक्षानुभव’ के शब्दों में अभिव्यक्त किया जा सकता है‚ को अस्वीकार करते हैं। धर्मकीर्ति एक स्वतंत्रविज्ञानवादी के योगोचार सम्प्रदाय से हैं जो शब्द को अनुमान के अन्तर्गत रखते हैं।
3. निम्नांकित में किस दर्शन संप्रदाय के अनुसार अभाव का अनुभव विशेषणता सन्निकर्ष के द्वारा किया जाता है?
(a) सांख्य (b) बौद्ध
(c) न्याय (d) जैन
Ans. (c) : न्याय दर्शन में अभाव का ज्ञान विशेषण-विशेस्य-भाव
(विशेषणत) सन्निकर्ष से होता है। न्याय दर्शन में सन्निकर्ष के छ:
भेद माने गये हैं यथा-संयोग‚ संयुक्त-समवाय‚ संयुक्त समवेत समवाय‚ समवाय‚ समवेत समवाय‚ विशेषण-विशेस्य भाव।
(भारतीय दर्शन की समीक्षात्मक रूपरेखा-सममूर्ति पाठक)
4. समान उद्देश्य और विधेय वाले दो तर्कवाक्य सत्य हो सकते हैं‚ लेकिन दोनों असत्य नहीं हो सकते हैं‚ तो उनके बीच संबंध होता है :
(a) विरोध (b) विपरीत
(c) उप-विपरीत (d) उपाश्रित
Ans. (c) : परम्परागत विरोध वर्ग में जब समान उद्देश्य और विधेय वाले हो तर्कवाक्य सत्य हो सकते हैं‚ लेकिन दोनों असत्य नहीं हो सकते हैं तो उनमें उपविपरीत (Sub-contrary) सम्बन्ध होता है। अंशव्यापी सकारात्मक (II) तथा अंशव्यापी निषेधाघात्मक (O) तर्कवाक्यों के बीच यह सम्बन्ध होता है।
5. दूसरों का व्यवहार देखकर पद के अर्थ को जानना किसके रूप में जाना जाता है?
(a) आप्तवाक्य (b) प्रसिद्धपदसान्निध्य
(c) वृद्धव्यवहार (d) विवरण
Ans. (c) : दूसरों का व्यवहार देखकर पद के अर्थ को जानना ‘वृद्धव्यवहार’ है। न्याय दर्शन की शब्द मीमांसा के अनुसार‚ ‘वृद्धव्यवहार’ ‘लम्बी रूढ़ परम्परा’ से स्थापित एक तरह की शक्ति है।
6. सूची I को सूची II के साथ सुमेलित करें और सही
कूट का चयन करें :
सूची I सूची II
(A) असत्ख्यातिवाद (i) योगाचार बौद्ध
(B) आत्मख्यातिवाद (ii) प्रभाकर मीमांसा
(C) अन्यथाख्यातिवाद (iii) माध्यमिक बौद्ध
(D) अख्यातिवाद (iv) न्याय दर्शन कोड :
(A) (B) (C) (D)
(a) (i) (ii) (iii) (iv)
(b) (i) (ii) (iv) (iii)
(c) (iii) (i) (iv) (ii)
(d) (iii) (ii) (i) (iv)
Ans. () : (a) असत्ख्यातिवाद (iii) माध्यमिक बौद्ध
(b) आत्मख्यातिवाद (i) योगाचार बौद्ध
(c) अन्यथाख्यातिवाद (iv) न्याय दर्शन
(d) अख्यातिवाद (ii) प्रभाकर मीमांसा
7. बरतन के मामले में कुम्भकार का जनक माना जाता है:
(a) समवायीकारण (b) असमवायीकारण
(c) अन्यथासिद्ध (d) निमित्तकारण
Ans. (c) : ‘अन्यथासिद्ध’ कारण वह है जिसके बिना कार्य की उत्पत्ति हो जाती है। बरतन बनाने के मामले में कुम्भकार का पिता
(जनक) भले ही कुम्भकार का कारण हों‚ परन्तु उसकी अनुपस्थिति में भी बर्तन का निर्माण निर्विघन चलता रहता है अत: ‘कुम्भकार का जनक’ अन्यथा सिद्ध है।
8. द्वयणुक के उत्पादन में परमाणु संयोग की कारणता है:
(a) समवायीकारणता (b) असमवायीकारणता
(c) निमित्तकारणता (d) सामग्रीकारणता
Ans. (a) : शंकराचार्य जगत् की व्यावहारिक सत्ता मानते है। जिसे वह सद्सदनिर्वचनीय कहते हैं। वह जगत के इसी अर्थ में मिथ्या भी कहते हैं। उनके अनुसार तीन तरह की सत्ताएं प्रतिभासिक सत्ता‚ व्यावहारिक सत्ता और पारमार्थिक सत्ता प्रतिभासिक सत्ता का बाध व्यावहारिक सत्ता में स्तर पर‚ और पारमार्थिक सत्ता के स्तर पर व्यावहारिक सत्ता का बाध हो जाता है। ध्यातव्य हो कि पारमार्थिक सत्ता अद्वितीय ब्रहम की सत्ता है। जो मोक्ष की अवस्था है।
9. शंकर के अनुसार निम्नांकित में किसकी प्राप्ति होने पर जगत की ‘व्यावहारिकसत्ता’ समाप्त हो जाती है?
(a) केवल ब्रह्मा की hejceeefLe&keâmeòee
(b) स्वप्न वस्तुओं की ØeefleYeeefmekeâmeòee
(c) ब्रह्म की hejceeefLe&keâmeòee तथा स्वप्न-वस्तुओं की ØeefleYeeefmekeâmeòee दोनों
(d) सांसारिक वस्तुओं की ueewefkeâkeâ DeJemLee
Ans. () :
10. कौन-से भूतद्रव्य नित्य हैं?
(a) केवल आकाश
(b) केवल मारूत
(c) केवल क्षिति‚ अप‚ तेज‚ मारुत के परमाणु
(d) आकाश और क्षिति‚ अप‚ तेज और मारुत के परमाणु
Ans. (d) : क्षिति‚ अप‚ तेज और मारूत को परमाणु रूप में नित्य माना गया है। आकाश को परमाणु रूप नहीं माना गया है। फिर भी नित्य‚ एक और विभु माना गया है।
11. निम्नांकित में किसके अनुसार मुक्त आत्मा भक्त है?
(a) शंकर (b) रामानुज
(c) मध्व (d) निम्बार्क
Ans. (c) : शंकर ने मुक्त आत्मा को ‘ज्ञानस्वरूप ब्रहम’ माना है। रामानुज मुक्त जीव को ‘बह्म-प्रकार’ मानते हैं। मध्व के अनुसार मुक्त जीव (आत्मा) ‘भक्त’ हैं।
12. मध्व के अनुसार निम्नांकित में से कौनसा सही नहीं है?
(a) जगत वास्तविक है।
(b) ब्रह्म सर्वोच्च है।
(c) मोक्ष जीव द्वारा अन्तर्निहित आनन्द की प्राप्ति है।
(d) ब्रह्म निर्गुण है।
Ans. (d) : माध्वाचार्य द्वैतवादी परम्परा के विचारक है। यह ब्रह्म को ‘निर्गुण’ न मानकर सगुण मानते है। उनके अनुसार जगत वास्तविक है‚ ब्रह्म सर्वोच्च शक्ति है। मोक्ष जीव द्वारा अन्तर्निहित आनन्द है।
13. रामानुज के अनुसार निम्नांकित में से कौन सही है?
(a) सारत: peerJe और yeÇÿe समान हैं।
(b) ØelÙe#e सदैव efveefJe&keâuhe होता है।
(c) Øeheefòe cees#e का राजमार्ग है।
(d) yeÇÿe DeJeefÅee का आश्रय है।
Ans. (c) : रामानुज के अनुसार‚ प्रपत्ति मोक्ष का राजमार्ग है। प्रपत्ति मार्ग को मोक्ष प्राप्ति का साधन मानते हैं। प्रपत्ति ईश्वर के प्रति अपने को पूर्णतया समर्पण कर देना है। यह सर्वसुलभ मार्ग है। प्राप्ति का अर्थ है ‘शरणगति’। प्रपत्तिमार्ग में छ: अंग हैं-आनुकूल्यसंकल्प प्रातिकूल्यवर्जन‚ महावश्विास‚ कार्यव्य‚ गोतृत्व वरण और आत्मनिरपेक्ष।
14. ‘cees#e के चार क्रम’ के मत का प्रतिपादन किसने किया?
(a) शंकर (b) रामानुज
(c) निम्बार्क (d) मध्व
Ans. (d) : माध्वाचार्य अपने दर्शन में ‘मोक्ष के चार क्रम’ या चार अवस्थाएं बताते हैं। कर्मक्षय‚ उत्क्रान्तिलय‚ अर्चिरादिगमन‚ और भाग ये चार अवस्थाएं हैं।
15. peerJevecegefòeâ यद्यपि वांछनीय है‚ लेकिन तार्किक रूप से युक्तिसंगत नहीं हैं − यह मत किनका था?
(a) शंकर और मध्व (b) रामानुज और शंकर
(c) रामानुज और मध्व (d) वल्लभ और वाचस्पति
Ans. (c) : वेदान्तियों में शंकर‚ जीवन्मुक्ति की अवधारणा को मानते हैं। परन्तु रामानुज और मध्व इस अवधारणा की तार्किकता को नहीं मानते हैं। रामानुज के अनुसार जब तक शरीर है तब तक मोक्ष नहीं मिल सकता क्योंकि जीवात्मा का शरीर धारण कर्म के ही कारण है। मुक्ति कर्मों के क्षीण हो जाने पर तथा भौतिक शरीर के पात के अनन्तर ही सम्भव है। यह विदेह मुक्ति है।
16. शंकर के अनुसार cees#e का अंतिम साधन है :
(a) keâce& (b) %eeve keâce& mecegÛJeÙe
(c) %eeve और केवल %eeve (d) उपर्युक्त सभी
Ans. (c) : शंकर मोक्ष का अंतिम साधन ‘ज्ञान’ को ही मानते है। उनके अनुसार कर्म से मुक्ति सम्भव नहीं हैं। वह भक्तिमार्ग को भी मोक्ष प्राप्ति का साधन मानते है। लेकिन कर्म को वे चित्त शुद्धि के लिए और भक्ति को एकाग्रता में सहायक मानते हैं। परन्तु यह अपर्याप्त है।
17. साधक में कर्माचरण‚ मोक्ष प्राप्ति की इच्छा जागृत करता है − यह विचार किसके द्वारा प्रतिपादित है :
(a) प्रकाशात्मन् (b) वाचस्पति मिश्रा
(c) पद्मपाद (d) आनन्दगिरि
Ans. (b) : ‘साधक में कर्माचरण‚ मोक्ष प्राप्ति की इच्छा जागृत करता है। वाचस्पति मिश्र का यह विचार अद्धैत वेदान्त से सम्बन्धित है। जिनकी कृति ‘भामती’ से ‘भामती-प्रस्थान’ नामक अद्धैत वेदान्त का एक सम्प्रदाय ही विकसित हो गया।
18. निम्नलिखित को सुमेलित कीजिए और कूटों का प्रयोग करते हुए सही उत्तर चुनिए :
सूची I सूची II
(a) रामानुज (i) सांख्य कारिका
(b) मध्व (ii) तत्व वैशार्दी
(c) वाचस्पति मिश्र (iii) श्रीभाष्य
(d) ईश्वर कृष्ण (iv) महाभारत तात्पर्य निर्णय
कूट :
(a) (b) (c) (d)
(a) (iii) (iv) (ii) (i)
(b) (ii) (i) (iv) (iii)
(c) (iv) (iii) (i) (ii)
(d) (ii) (iii) (i) (iv)
Ans. (a) : रामानुज का ‘श्रीभाष्य’‚ मध्व का ‘महाभारत तात्पर्य निर्वाय’‚ वाचस्पति मिश्र का ‘तत्व वैशार्दी’‚ और ईश्वर कृष्ण की ‘सांख्य कारिका’ नामक ग्रन्थ है।
19. किसी शब्द का अर्थ ‘जातिविशिष्ट व्यक्ति’ है‚ यह विचार किसके द्वारा दिया गया है?
(a) विश्वनाथ (b) जगदीश
(c) उदयनाचार्य (d) रामाकृष्ण
Ans. (a) : इस प्रश्न को संदिग्ध माना गया है।
20. ‘mebmkeâejpevÙe %eevece’ का अभिप्राय है :
(a) प्रत्यक्ष (b) अनुमान
(c) विपर्याय (d) स्मृति
Ans. (d) : संस्कारजन्य ज्ञान को ‘स्मृति’ कहते हैं। किसी वस्तु का अनुभव होने पर उसके संस्कार आत्मा में रह जाते हैं। कालान्तर में ये सूत्र संस्कार प्रबुद्ध होकर दृष्टा के मन में पूर्वानुभूत वस्तु को उपस्थित कर देते हैं। इसे स्मृति कहते हैं। न्याय दर्शन में स्मृति को भी यथार्थ और अययार्थ माना गया है। लेकिन यह अनुभव नहीं है।
21. नीचे दो कथन दिए गए हैं‚ जिनमें एक अभिकथन (A) और दूसरा तर्क (R) के रूप में हैं। वेदांत के संदर्भ में
(A) और (R) पर विचार करते हुए‚ सही कूट का चयन कीजिए।
अभिकथन (A) :
‘‘व्यापारवद् असाधारणम कारणम कर्णम’’
तर्क (R) : सभी प्रकार के ज्ञान के लिए मन के एक सामान्य कारक होने के कारण इसे एक असाधारण कारण माना जाता है।
कूट :
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही है लेकिन (R) गलत है।
(d) (A) सही है लेकिन (R) सही है।
Ans. (c) : वेदान्त दर्शन के अनुसार ‘व्यापारवद् असाधारणम कारणम कर्णम’ सत्य है परन्तु ‘सभी प्रकार के ज्ञान के लिए मन के एक सामान्य कारक होने के कारण इसे एक असाधारण कारण माना जाता है’ गलत है।
22. क्रियात्व और कारकत्व के बीच के संबंध को किस रूप में जाना जाता है?
(a) आकांक्षा (b) योग्यता
(c) सन्निधि (d) तात्पर्य
Ans. (a) : यदि बिना क्रिया पद का उच्चारण किये बिना कारक पद का अर्थ समक्ष न आये तो इन दोनों पदों के परस्पर संबंध को ‘आकांक्षा’ कहते हैं। यह संबंध क्रियात्व और कारकत्व के बीच होता है। ध्यातव्य हो कि प्रत्येक वाक्य का ज्ञान प्राप्त करने के लिए आकांक्षा‚ योग्यता‚ सन्निधि तथा तात्पर्य ज्ञान नामक हेतुओं की आवश्यकता होती है।
23. भारतीय दर्शन की किस प्रणाली का विचार है कि संज्ञान का प्रामाण्य और अप्रामाण्य परत: है?
(a) बौद्ध (b) पूर्व-मीमांसा
(c) वेदांत (d) न्याय
Ans. (d) : न्याय दर्शन प्रामाण्य और अप्रामाण्य के संबंध में परत:
प्रामाण्यवादी है। न्याय के अनुसार किसी भी ज्ञान की प्रामाणितता का परीक्षण उसके ‘सफलप्रवृत्तिसामर्थ्य’ के आधार पर किया जाता है। ‘सफलप्रवृत्तिसामर्थ्य’ से ज्ञान में प्रामाण्य या अप्रामाण्य का अनुमान किया जाता है। यदि सफल प्रवृति सामर्थ्य है तो प्रामाण्य और नहीं है तो अप्रामाण्य।
24. भारतीय दर्शन की किस प्रणाली के अनुसार संज्ञान का प्रामाण्य‚ स्वत: है और अप्रामाण्य‚ परत: है?
(a) न्याय (b) बौद्ध
(c) वेदांत (d) पूर्व-सीमांसा
Ans. (a)
25. नीचे दो कथन दिए गए हैं जिनमें एक अभिकथन (A) और दूसरा तर्क (R) के रूप में हैं। अद्वैतियों के संदर्भ में
(A) और (R) पर विचार करते हुए सही कूट का चयन कीजिए :
अभिकथन (A) :
धुएं के सभी मामले आग के मामले हैं।
तर्क (R) : धुएं और अग्नि के बीच सर्वव्यापी सहवर्तिता से वास्तव में सर्वव्यापी तर्क-
वाक्य निकाले जाते हैं।
कूट :
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही है लेकिन (R) गलत है।
(d) (A) सही है लेकिन (R) सही है।
Ans. (a) : अद्धैत वेदान्त भी अनुमान को परोक्ष प्रमाण स्वीकार करता है। जिसमें व्याप्ति ज्ञान के आधार पर पक्ष में हेतु को देखकर साध्य का ज्ञान प्राप्त किया जाता है। अभिकथन (A) धुएं के सभी मामले आग के मामले है। सही है और तर्क (R) ‘धुएं-धुएं और अग्नि के बीच सर्वव्यापी सहवर्तिता से वास्तव में सर्वव्यापी तर्क-
वाक्य निकाले जाते हैं‚ भी सही हैं। जो अनुमान और व्याप्ति में सम्बन्ध को बताते हैं।
26. नीचे दो कथन दिए गए हैं जिनमें एक अभिकथन (A) और दूसरा तर्क (R) के रूप में हैं। (A) और (R) पर विचार करते हुए सही कूट का चयन कीजिए :
अभिकथन (A) :
कांट का तर्क है कि सभी मानव के लिए स्थान और समय किसी वस्तु को समझने के व्यक्तिनिष्ठ रूप हैं।
तर्क (R) : कांट का मानना है कि चूँकि सभी मानव के लिए स्थान और समय एक ही प्रकार से व्यक्तिनिष्ठ हैं‚ वे वास्तव में वस्तुनिष्ठ हैं।
कूट :
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही है लेकिन (R) गलत है।
(d) (A) सही है लेकिन (R) सही है।
Ans. (b) : कांट के अनुसार स्थान (देश) और समाज (काल) हमारे संवेदन के मुख्य द्वार है जो किसी वस्तु को समझने के व्यक्तिनिष्ठ रूप है। इसके अतिरिक्त वह मानता है कि चूँकि सभी मानव के लिए स्थान और समय एक ही प्रकार से व्यक्तिनिष्ठ हैं‚ वे वास्तव में वस्तुनिष्ठ हैं। परन्तु यह अभिकथन (A) के लिए पर्याप्त व्याख्या नहीं है।
27. निम्नलिखित में से कौन-सा समूह ह्यूम के‚ केवल विचारों पर निर्भर संबंधों की अवधारणा को सही रूप में चित्रित करता है?
(a) सादृश्यता‚ विपरीतता‚ तादात्म्य‚ समय और स्थान।
(b) सादृश्यता‚ विपरीतता‚ गुण में मात्रा और परिमाण में मात्रा।
(c) सादृश्यता‚ विपरीतता‚ समय और स्थान‚ कारण और कार्य।
(d) सादृश्यता‚ तादात्म्य‚ गुण में मात्रा औरपरिमाण में मात्रा।
Ans. (b) : डेविड ह्यूम विभिन्न प्रकार के संबंधों को मानता है यथासादृश्य संबंध‚ अभेद संबंध‚ देश-काल पर आश्रित संबंध‚ परिमाणात्मक संबंध‚ गुण की मात्रा का संबंध‚ विपरीत संबंध और कारण-कार्य संबंध। परन्तु केवल विचारों (Ideas) पर निर्भर संबंध सादृश्यता‚ विपरीतता‚ गुण में भिन्नता‚ परिमाण में मात्रा हैं।
(History of Western Philosophy : Frank Thilly)
28. ब्रैडले के आभास और वास्तविकता के सिद्धांत के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार करते हुए सही
कूट चिह्नित करें।
(a) हम वास्तविकता की प्रकृति को आभास के माध्यम से समझते हैं जो दैनिक जीवन की चीजें हैं।
(b) वास्तविकता आभास से संबंधित है और आभास वास्तविकता का आभास है।
(c) वास्तविकता सभी आभासों में पाई जाती है लेकिन एक समान मात्रा में नहीं।
कूट :
(a) केवल (b) गलत है।
(b) केवल (b) और (c) गलत हैं।
(c) केवल (a) और (b) गलत हैं।
(d) (a), (b) और (c) सही हैं।
Ans. (d) : ब्रैडले एक प्रत्ययवादी विचारक है। उसकी रचना ‘आभास और सत्’ (Appearance and Reality) है। आभास और सत् (वास्तविकता) के संदर्भ में-हम वास्तविकता को प्रकृति के आभास के माध्यम से समझते है जो दैनिक जीवन की चीजें हैं। वास्तविकता (Reality) आभास से संबंधित है और आभास वास्तविकता का आभास है। वास्तविकता सभी आभासों मे पाई जाती है परन्तु एक समान मात्र में नहीं। इसके अतिरिक्त ब्रैडले निरपेक्षसत् को प्रत्येक आभास में अन्तर्व्याप्त मानता है। सत् (वास्तविकता) और आभास परस्पर आश्रित है।
29. हेडेगर की दुश्चिंता की अवधारणा वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति आ जाता है :
(a) जब उसे लगता है कि सिर्फ वही अस्तित्व का प्रश्न है और उत्तर देने की जवाबदेही भी उसी की है।
(b) जब उसे लगता है कि सभी प्रश्नों के उत्तर उसी के पास हैं।
(c) जब उसे लगता है कि सभी के पास अस्तित्व का प्रश्न है।
(d) जब वह अस्तित्व के प्रश्न और उसके उत्तर देने की जवाबदेही को अस्वीकार कर देता है।
Ans. (a) : हाइडेगर (Heidegger) एक आस्तित्ववादी विचारक माने जाते हैं। हाइडेगर का कहना है कि मानव-अस्तित्व की एक अनुभूति फेंके हुए होने तथा ‘तव्यता की अनुभूति है। दूसरी ओर उसकी तात्विकता उसे ‘सत्’ की ओर उन्मुख करती है।‚ वह सत् को भी पाना चाहता है-इस तनाव मे जो अभिवृति जागती है। उसे हाइडेगर चिन्ता (दुश्चिंता) (Anxiety) कहते हैं। ऐसा तब होता है जब उसे लगता है वही अस्तित्व का प्रश्न है और उत्तर देने की जवाबदेही भी उसी की है।
(समकालीन भारतीय दर्शन-बसन्त कुमार लाल)
30. लाईबनित्ज के अनुसार वास्तविकता है :
(a) यह एक नहीं हो सकती है बल्कि अनेक होती है और प्रत्येक शाश्वत एवं वास्तविक होती है।
(b) यह एक नहीं हो सकती है बल्कि अनेक होती है और प्रत्येक अस्थायी एवं अवास्तविक होती है।
(c) यह अनेक नहीं हो सकती बल्कि एक होती है और वह शाश्वत एवं वास्तविक होती है।
(d) यह अनेक नहीं हो सकती है बल्कि एक होती है और वह अस्थायी एवं अवास्तविक होती है।
Ans. (a) : लाईबनित्ज (1696-1716 ई0) एक बुद्धिवादी दार्शनिक था। उसके अनुसार ‘वास्तविकता’ (सत्) एक नहीं हो सकती है बल्कि अनेक होती है और शाश्वत एवं वास्तविक होती है। लाइबनित्ज का मत ‘चिदणुवाद’‚ बुद्धिवाद‚ बहुलवाद है।
31. निम्नलिखित में से ‘‘जेंडर ट्रबल’’ के लेखक कौन हैं?
(a) सिमोन द बोआ (b) ल्यूस इरिगैरी
(c) जूडिथ बटलर (d) एलन शोवाल्टर
Ans. (c) : ‘जेंडर ट्रबल’ − जुडिथ बटलर सिमोन द बोआ − द सेकण्ड सेम्स
32. निम्नलिखित में से किस दार्शनिक ने ‘‘समूहगत विभेदक अधिकारों’’ की अवधारणा प्रतिपादित की?
(a) थॉमस हूब्स (b) अमर्त्य सेन
(c) विल किमलिका (d) मैकेनटायर
Ans. (c) : ‘‘समूहगत विभेदक अधिकारों’’ की अवधारणा विल किमलिका ने प्रतिपादित किया। उसके अनुसार‚ लैंगिक पृथक्करण के आधार जेंग्र निस्पक्षता पर आधारित हैं। सार्वजनिक निजी भेद पर आधारित है और न्याय की अवधारणा स्वयं पुरूषों के व्यवहार एवं हितों के ध्यान में रखकर बनाई गयी हैं।
33. निम्नलिखित में से किसने ‘अन्नदायी श्रम सिद्धान्त’ की अवधारणा की शुरुवात किया?
(a) गाँधी (b) विनोबाभावे
(c) तिलक (d) जे.बी. कृपलानी
Ans. (a) : गाँधी जी ने ‘अन्नदायी श्रम’ (Bread Labour) सिद्धान्त’ की अवधारणा को शुरू किया। जिसका तात्पर्य है कि जीवित रहने के लिए हर व्यक्ति को श्रम करना आवश्यक है। हर व्यक्ति स्वेच्छा से प्रत्येक दिन जाने से पहले कुछ न कुछ शारीरिक श्रम करें। गाँधी जी का यह सिद्धान्त अनुशंसा करता है कि हर व्यक्ति को पूर्णतया समान समझा जाय। ‘टालस्टाय’ तथा रस्किन के लेखों एवं बाइबिल के कुछ सन्दर्भों से प्रभावित।
34. सूची I को सूची II से सुमेलित करें और निम्नलिखित कूटों में से सही उत्तर का चयन करें :
सूची I सूची II
(लेखक) (रचना)
(a) गाँधी (i) राष्ट्रीयता और समाजवाद
(b) जे.बी. कृपलानी (ii) गाँधीजी इन इण्डियन विलेजेज
(c) महादेव देसाई (iii) पॉलिटिक्स ऑफ चरखा
(d) नरेन्द्र देव (iv) इथिकल रीलीजन
(नीति-धर्म)
कूट :
(a) (b) (c) (d)
(a) (i) (ii) (iii) (iv)
(b) (iv) (iii) (ii) (i)
(c) (ii) (iii) (iv) (i)
(d) (ii) (ii) (i) (iv)
Ans. (b) : गाँधी जी-इथिकल रीलीजन (नीति धर्म)‚ जे.बी.
कृपलानी‚ पॉलिटिक्स ऑफ चरखा‚ महादेव देसाई- गाँधीजी इन इण्डियन विलेजेस तथा नरेन्द्र देव-राष्ट्रीयता और समाजवाद।
35. निम्नलिखित कथनों में से गाँधी के सन्दर्भ में कौन सही नहीं है?
(a) अहिंसा मानव जाति का नियम है।
(b) साधन‚ साध्य के औचित्य को सिद्ध करना है।
(c) साध्य‚ साधन के औचित्य को सिद्ध कारता है।
(d) समस्त भूमि गोपाल की है।
Ans. (c) : गाँधी जी अपने कर्म और चिंतन दोनों में ही साध्य को महत्वपूर्ण तो मानते थे‚ परन्तु वह साधन की पवित्रता पर भी जोर देते थें। उनके अनुसार साधन के औचित्य का प्रमाण या आधार नहीं बन सकता। इसके अतिरिक्त ‘अहिंसा’ मानव जाति का नियम है‚ तथा ‘समस्त भूमि गोपाल की है’ मानते थे।
36. निम्नलिखित में से किसने ‘ग्रामीण गणतन्त्र’ का समर्थन किया है?
(a) टैगोर (b) गाँधी
(c) विवेकानन्द (d) राधाकृष्णन्
Ans. (b) : गाँधी जी ने ‘ग्रामीण गणतन्त्र’ की बात कही है। गाँधी जी के अनुसार शक्ति एक स्थान पर केन्द्रित नहीं रहनी चाहिए। यह शोषण का आधार बन जाता है। विकेन्द्रीकरण की नीति को राज्य में अपनाना चाहिए।
37. गाँधी के ‘रचनात्मक कार्यक्रम’ के उद्देश्य के सन्दर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन सही है?
(a) केवल बेरोजगारों को आर्थिक राहत पहुँचाना
(b) केवल कटाई-बुनाई करने वालों को कुछ मजदूरी दे पाना
(c) केवल समाज में अहिंसात्मक व्यवस्था को निर्मित करना
(d) उपरोक्त सभी
Ans. (d) : गाँधी जी के ‘रचनात्मक कार्यक्रम’ उनके सिद्धान्तों के आधार पर ही है। उनके अनुसार केवल बेरोजगारों को आर्थिक राहत पहुँचना‚ केवल कटाई-बुनाई करने वालो को कुछ मजदूरी दे पाना तथा केवल समान में अहिंसात्मक व्यवस्था को निर्मित करना।
38. निम्नलिखित में से कौन-सा ईशदूतीय धर्म का सही युग्म है?
(a) जैन धर्म और बौद्ध धर्म
(b) ईसाई धर्म और इस्लाम धर्म
(c) सिक्ख धर्म और इस्लाम धर्म
(d) हिन्दू धर्म और जोरोष्ट्रियन धर्म
Ans. (b) : ‘ईशदूतीय’ (Prophetic) ‘या पैगम्बर’ के माध्यम से स्थापित धर्म ‘ईसाई धर्म’ और ‘इस्लाम धर्म’ हैं। ऐसे धर्मों में दावा किया जाता है कि ईश्वर ने उनके पैगम्बरों को आकर कुछ ‘इल्हाम’ कराया और उन्हें समाज सम्बन्धित ‘धर्म’ का प्रचार-प्रसार करने का ‘आदेश’ दिया।
39. सूची I को सूची II के साथ सुमेलित करें और नीचे दिये गये कूटों से सही उत्तर का चयन करें :
सूची I सूची II
(धर्म) (अभीष्ट प्रक्रिया)
(a) बौद्ध धर्म (i) गुणस्थानक
(b) इस्लाम (ii) नामस्मरण
(c) सिक्ख धर्म (iii) अष्टाङ्गिक मार्ग
(d) जैनधर्म (iv) दिन में पाँच बार प्रार्थना करना
कूट :
(a) (b) (c) (d)
(a) (iii) (iv) (ii) (i)
(b) (iii) (i) (ii) (iv)
(c) (i) (iii) (iv) (ii)
(d) (iv) (ii) (i) (iii)
Ans. (a) : बौद्ध धर्म-अष्टाङ्गिक मार्ग‚ इस्लाम-दिन में पाँच बार प्रार्थना करना‚ सिक्ख धर्म-नामस्मरण तथा जैनधर्म-गुणस्थानक।
40. निम्नलिखित में से किस दार्शनिक का मानना था कि ‘‘आगमन में अत:प्रज्ञा एक आवश्यक तत्व है‚ ऐसी प्रक्रिया जिसमें इन्द्रिय प्रत्यक्ष से सार्वभौमिक ज्ञान प्राप्त होता है।’’
(a) अरस्तु (b) पाइथागोरस
(c) डेमोक्रेटस (d) प्रोटोगोरस
Ans. (a) : अरस्तु (389-322 ई0पू0) को तर्कशास्त्र का जनक कहा जाता है। उसके द्वारा स्थापित तर्कशास्त्र एक बौद्धिक अनुशासन का विज्ञान है। उसके अनुसार‚ ‘आगमन में अत: प्रज्ञा एक आवश्यक तत्व है‚ ऐसी प्रक्रिया जिसमें इन्द्रिय प्रत्यक्ष से सार्वभौंमिक ज्ञान प्राप्त होता है।’
41. नीचे दिए गए दो कथनों में से एक को अभिकथन (A) और दूसरे को तर्क (R) की संज्ञा दी गई है। (A) और
(R) पर विचार करते हुए सही कूट का चयन कीजिए :
अभिकथन (A) :
स्पिनो़जा त्रुटि को ज्ञान के विकार के रूप में नहीं देखते।
तर्क (R) : कोई भी विचार अपने आप में सही या गलत नहीं हैं‚ एक उपर्युक्त वस्तु की उपस्थिति एक विचार को सही बनाती है।
कूट :
(a) दोनों (A) और (R) सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) दोनों (A) और (R) सही हैं लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही है लेकिन (R) गलत है।
(d) (A) गलत है लेकिन (R) सही है।
Ans. () : स्पिनोजा त्रुटि (भ्रम) को ज्ञान के विकार के रूप में देखते हैं। अत: कथन (A) गलत है। तर्क (R) ‘कोई भी विचार अपने आप में सही या गलत नहीं है‚ एक उपर्युक्त वस्तु की उपस्थिति एक विचार को सही बनाती है।’ यह विचार स्पिनोजा के दर्शन के लिए सही है।
42. निम्न में से किस दार्शनिक ने यह तर्क दिया कि दो पारस्परिक विरोधाभासी कथन समान रूप से सत्य हो सकते हैं‚ लेकिन एक‚ दूसरे को तुलना में ‘‘बेहतर’’ हो सकता है?
(a) अरस्तु (b) प्रोटोगोरस
(c) परमेनाइडीज (d) डेमोक्रेट्स
Ans. (b) : प्रोटोगोरस का मानना था कि ‘मनुष्य प्रत्येक वस्तु का मापदण्ड है’। तथा प्रत्येक व्यक्ति के लिए वही सत्य है‚ जो उसे सत्य प्रतीत होता है सत्य व्यक्ति की संवदेना और अनुभूति तक ही सीमित है। ये सत्य को आत्मनिष्ठ बना देते हैं। उसके अनुसार‚ दो पारस्परिक विरेधाभासी कथन समान रूप से सत्य हो सकते है‚ लेकिन एक‚ दूसरे की तुलना में ‘बेहतर’ हो सकता हैं प्रोटोगोरस
(481-411 ई0पू0) सोफिस्ट सम्प्रदाय के प्रवर्तक माने जाते हैं।
43. लाइवनी़ज की ज्ञान मीमांस के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन गलत है?
(a) संपूर्ण ज्ञान मस्तिष्क में पहले से निहित है।
(b) अनुभव ज्ञान उत्पन्न नहीं करता।
(c) सार्वभौमिक और अनिवार्य तर्क वाक्यों को केवल संवेदन द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।
(d) लाइवनी़ज सूक्ष्म प्रत्यक्ष को स्वीकार करता है ऐसा प्रत्यक्ष जिसका प्रति मनस अचेतन है।
Ans. (c) : लाइबनित्ज की ज्ञानमीमांसा बुद्धिवाद पर आधारित है। उसके अनुसार सम्पूर्ण ज्ञान मस्तिष्क में पहले से निहित है। अनुभव द्वारा ज्ञान उत्पन्न नहीं होता बल्कि वह हमारे पूर्व ज्ञान को और अभिव्यक्त कर देता है। लाइबनित्ज जन्मजात प्रत्ययों के ज्ञान को मानता है। सार्वभौमिक और अनिवार्य नियम केवल बुद्धि के माध्यम से निगमित किये जा सकते हैं। लाइबनित्ज सूक्षम प्रत्यक्ष को स्वीकार करता है‚ यह‚ ऐसा प्रत्यक्ष जिसके प्रति मनस अवचेतन है।
44. ‘‘सभी वस्तुओं के प्रति विश्वास अत्यंत नैसर्गिक एवं अत्यंत पराभौतिक हैं; विश्वास‚ ज्ञान का प्रायोगिक विकास है और विश्वासें‚ यथार्थ को बदलते और आकार प्रदान करते हैं’’-यह धारणा निम्नलिखित में से कौन-से दार्शनिक की है?
(a) जॉन डिवी (b) कांट
(c) डेकार्ट (d) अरस्तु
Ans. (a) : ‘जॉन डिवी’ (1859-1952) एक उपकरणवादी दार्शनिक है। जिन्होंने अर्थक्रियावाद के उपकरणवाद मे परिणत कर दिया। इनका योगदान शिक्षाशास्त्र एवं मूल्यशास्त्र में अनुकरणीय हैं उनके अनुसार सभी वस्तुओं के प्रति विश्वास अत्यंत नैसर्गिक एवं अत्यंत पराभौतिक है; विश्वास‚ ज्ञान का प्रयोगिक विकास है और विश्वासें‚ यथार्थ को बदलते और आकार प्रदान करते हैं’’।
45. सूची I के साथ सूची II को सुमेलित करें एवं नीचे दिये गये कूटों से सही उत्तर का चुनाव करें :
सूची I सूची II
(A) बुद्धिवाद (i) एअर
(B) संवेगवाद (ii) हेयर
(C) उपयोगितावाद (iii) कांट
(D) परामर्शवाद (iv) मिल
कूट :
(A) (B) (C) (D)
(a) (i) (ii) (iii) (iv)
(b) (iii) (i) (iv) (ii)
(c) (iv) (ii) (iii) (i)
(d) (iv) (iii) (ii) (i)
Ans. (b) : सम्बन्धित प्रश्न को संदिग्ध माना गया है। परन्तु फिर भी एअर संवेगवाद‚ मिल उपयोगितावाद‚ एअर परामर्शवाद तथा कांट- समन्वयवाद।
46. ‘नीति सम्बन्धी प्रकरणों में राजकीय नियम ही सर्वोच्व न्यायालय हैं‚’ यह विचार निम्नलिखित में से किसका है?
(a) स्पेन्सर (b) मिल
(c) कान्ट (d) हॉब्स
Ans. (d) : हॉब्स के अनुसार‚ ‘नीति सम्बन्धी प्रकरणों में राजकीय नियम ही सर्वोच्य न्यायालय हैं। हॉब्स अपने राज्य सम्बन्धी विचार अपनी पुस्तक ‘लेवियाथन’ में देता हैं हॉब्स सामान्यों के नामवादी सिद्धान्त का समर्थक है तथा ‘सामाजिक समझौते का सिद्धान्त’ को प्रतिपादित किया।
47. सूची I को सूची II के साथ सुमेलित कीजिये तथा नीचे दिये गये कूटों से सही उत्तर का चयन करें :
सूची I सूची II
(लेखक) (रचना)
(A) हेयर (i) मेटॉफिजिक्स ऑफ मॉरल्स
(B) स्टीफेन (ii) दी राइट एण्ड दी गुड
(C) रॉस (iii) साइन्स ऑफ इथिक्स
(D) कान्ट (iv) फ्रीडम एण्ड री़जन
कूट :
(A) (B) (C) (D)
(a) (i) (ii) (iii) (iv)
(b) (ii) (iii) (i) (iv)
(c) (iii) (ii) (iv) (i)
(d) (iv) (iii) (ii) (i)
Ans. (d) : हेयर-फ्रीडम एण्ड रीजन‚ स्टीफेन-साइन्स इथिक्स‚ काण्ट मेटाफिजिक्स ऑफ मारल्स तथा रॉस-दी राइट एण्ड दी गुड
48. निम्नलिखित में से किस एक सिद्धान्त का विचार ‘आँख के लिए आँख’ है?
(a) निवर्तनवाद (b) सुधारवाद
(c) प्रतीकारवाद (d) उपरोक्त सभी
Ans. (c) : दण्ड सिद्धान्त के तीन प्रकार- प्रतीकारवाद‚ निर्वसनवाद‚ सुधारवाद। जब दण्ड का स्वरूप ‘आंख के बदले आंख’ का हो तो वहां प्रतिक्रिया स्वरूप दण्ड दिया जाता है अर्थात् जैसों का तैसा’। ऐसे दण्ड सिद्धान्त को प्रतिकारवाद (Retributive) दण्ड सिद्धान्त कहते हैं इसमें दण्ड की मात्रा के अनुसार दण्ड दिया जाता हैं।
49. निम्नलिखित में से किसने कहा है कि ‘यदि सुख शुभ है‚ तो जिस अर्थ में अन्य क्रियायें शुभ हैं‚ उससे भिन्न अर्थ में ही वह शुभ हो सकता हैं’?
(a) मूर (b) रॉस
(c) एयर (d) हेयर
Ans. (b) : रॉस के अनुसार ‘यदि सुख शुभ है‚ तो जिस अर्थ में अन्य क्रियाएं शुभ है‚ उससे भिन्न अर्थ में ही वह शुभ हो सकता है।’
50. निम्नलिखित में से किसने हा है कि ‘स्वतन्त्रता ही मानव तथा समस्त बुद्धिजीवियों के गौरव का एक मात्र आधार है’?
(a) हॉब्स (b) कान्ट
(c) स्टीवेन्शन (d) बेन्थम
Ans. (b) : काण्ट अपने नीतिशास्त्र विवेचन में ‘संकल्प की स्वतंत्रता’ को महत्व देते है और इसे पूर्वस्थापित मान्यता मानते है। उनके अनुसार ‘स्वतंत्रता ही मानव तथा समस्त बुद्धिजीवियों के गौरव का एक मात्र आधार है।’
51. निम्नलिखित में से यह किसका कथन है?
‘उसी सूत्र के अनुसार कार्य कीजिये जिसे आप तत्क्षण संकल्प द्वारा सामान्य नियम के रूप में प्रस्तुत कर सकें’।
(a) कान्ट (b) हेगेल
(c) हॉब्स (d) मिल
Ans. (a) : काण्ट के शब्दों में कर्त्तव्य का रूप अहैतुक आदेश हैं। अहैतुक आदेश के पांच सूत्र काण्ट अपने दर्शन में बताता है-
1. सार्वभौम विधान का सूत्र 2. प्रकृति-विधान का सूत्र 3. स्वयं साध्य का सूत्र 4. स्वतंत्रता का सूत्र 5. साध्यों के राज्य का सूत्र। उनके सार्वभौम विधान के सूत्र के अनुसार ‘उसी सूत्र के अनुसार कार्य कीजिए जिसे आपे तत्क्षण संकल्प द्वारा सामान्य नियम के रूप में प्रस्तुत कर सकें।
52. नीचे दिये गये तर्क और तर्क आकार का अध्ययन कर नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर का चयन कीजिए।
(A.B) ⊃ C p ⊃ q
(1) (A.B) (2) p  ∴ C ∴ q  (a) (a), (b) का तर्काकार है।
(b) (b), (a) का विशिष्ट तर्काकार है।
(c) (b), (a) का तर्काकार है।
(d) (a), (b) का विशिष्ट तर्काकार है।
Ans. (c) : युक्ति आकार या तर्काकार प्रतीकों का वह विन्यास‚ जिसमें वाक्यचर होते है किन्तु कोई वाक्य नहीं होता। जब वाक्यचरों के स्थान पर वाक्य रख दिये जाते है तब युक्ति आकार युक्ति बन जाती है जैसे –
(A.B) ⊃ C का युक्ति आकार या तर्काकार p ⊃ q
(A.B) P ∴ C ∴ q
53. विकल्पीय वाक्यों के सबल एवं निर्बल के निर्धारण में निम्नलिखित में से कौन-सा विकल्प सही है?
(a) विकल्पावय के निर्बल अर्थ में केवल एक विकल्प सत्य होता है जबकि सबल अर्थ में दोनों विकल्प सत्य होते हैं।
(b) विकल्पावय के निर्बल एवं सबल दोनों अर्थों में दोनों विकल्प सत्य होते हैं।
(c) विकल्पावय के निर्बल और सबल अर्थ में केवल एक विकल्प सत्य होता है।
(d) विकल्पावय के निर्बल अर्थ में दोनों विकल्प सत्य होते हैं जबकि सबल अर्थ में केवल एक विकल्प सत्य होता है।
Ans. (d) : दो कथनों का विकल्प उनके बीच या (or) रखकर किया जाता है। इस संगठित होने वाले दोनों कथन विकल्पावयव कहलाते हैं। विकल्पावय के निर्बल अर्थ में दोनों विकल्प सत्य होते है जबकि सबल अर्थ में केवल एक विकल्प सत्य होता है।
(दर्शन पुज एक गहन दृष्टि – विनोद तिवारी)
54. सूची I को सूची II से सुमेलित कीजिये और नीचे दिये गये कूट से सही उत्तर का चयन कीजिये :
सूची I सूची II
(A) डी.आई.एम.ए.आर.आई. (i) पहली आकृति एस.
(B) एफ.ई.एल.ए.पी.टी.ओ. (ii) दूसरी आकृति एन.
(C) बी.ए.आर.ओ.सी.ओ. (iii) तीसरी आकृति
(D) डी.ए.आर.आई.आई. (iv) चौथी आकृति
कूट :
(A) (B) (C) (D)
(a) (i) (ii) (iii) (iv)
(b) (ii) (iii) (i) (iv)
(c) (iii) (iv) (ii) (i)
(d) (iv) (iii) (ii) (i)
Ans. (d) :
DIMARIS चौथी आकृति FELAPTON तीसरी आकृति BAROCO दूसरी आकृति DARII पहली आकृति
55. नीचे दिये कथनों से सही उत्तर को चीन्हित कीजिए।
(1) व्याघात तर्कवाक्यों के बीच एक संबंध है जिसमें तर्कवाक्य गुण और परिमाण दोनों में भिन्न होते हैं।
(2) विपरीत संबंध सर्वव्यापी तर्कवाक्यों के बीच होता है।
(3) विरुद्ध संबंध अंशव्यापी तर्कवाक्यों के बीच होता है।
(4) सर्वव्यापी तर्कवाक्य अंशव्यापी तर्कवाक्यो के उपाश्रय हैं।
कूट :
(a) (a) और (b) सही है।
(b) (b) और (c) गलत हैं।
(c) (c) और (d) गलत हैं।
(d) उपर्युक्त सभी कथन सही हैं।
Ans. (d) : परम्परागत विरोध वर्ग गुण और परिमाण में अलग-
अलग तर्कवाक्यों में सम्बन्ध की व्याख्या करता हैं चार प्रकार के तर्कवाक्य सर्वव्यापी स्वीकारात्म (A), सर्वव्यापी निषेधात्मक (E), अंशव्यापी स्वीकारात्मक (I) अंशव्यापी निषेधात्मक (O) इस वर्ग के अनुसार संबंध-
56. निम्नलिखित में से किस स्थिति में दो कथन तार्किक रूप से समतुल्य होंगे?
(a) जिनके द्विउपाधिक पुनर्कथन हैं।
(b) जिनके द्विउपाधिक व्याघात हैं।
(c) जिनके द्विउपाधिक संभाव्य हैं।
(d) दोनों समान सत्यता मूल्य रखते हैं।
Ans. (a) : दो कथन तार्किक रूप से समतुल्य तब होते है जब उनके द्विउपाधिक (Bicnditional) पुनर्कथन हो। जैसे- द्विधानिष् ोध- ‘P α ~ ~ P’ इसके लिए प्रतीक ‘ α ‘ प्रतीक का प्रयोग होता है।
57. निम्नलिखित में से कौन सा व्यंजक डेमार्गन सिद्धान्त का सही आकार है?
(a) [(pαq)]α[(p>q).(q>p)] और [(pαq)]α[(p.q)∨(~p.~q)]
(b) [~(p.q)]α[(~p∨~q)] और [~(p∨q)]α[(~p.~q)]
(c) [(pα(p.p)] और [(pα(p∨p)]
(d) [(p.p)]α (q.p)] और [(p∨q)α(q∨p)]
Ans. (b) : डेमार्गन सिद्धान्त – [~(p.q)] α [(~p∨~q)] और [~(p∨q)]α[(~p.~q)]
58. निम्नलिखित में से किस प्रकार लघु सत्यतासारणी विधि द्वारा किसी युक्ति की अवैधता सिद्ध की जा सकती है?
(a) दोनों आधार वाक्यों एवं निष्कर्षों को ‘सत्य’ सत्यता मूल्य निर्धारित कर
(b) दोनों आधार वाक्यों एवं निष्कर्षों को ‘असत्य’ सत्यता मूल्य निर्धारित कर
(c) आधार वाक्यों को ‘असत्य’ सत्यता मूल्य एवं निष्कर्ष को ‘सत्य’ सत्यता मूल्य निर्धारित कर
(d) आधार वाक्यों को ‘सत्य’ सत्यता मूल्य तथा निष्कर्ष को ‘असत्य’ सत्यता मूल्य निर्धारित कर
Ans. (d) : लघु सत्यतासारणी विधि द्वारा किसी युक्ति की अवैधता‚ आधार वाक्यों को ‘सत्य’ सत्यता मूल्य तथा निष्कर्ष को ‘असत्य’ सत्यता मूल्य निर्धारित कर सिद्ध की जाती है।
59. तर्क वाक्य ‘‘सभी पत्तियाँ हरित हैं’’ का प्रतिवर्तन है।
(a) कोई अ-पत्तियाँ अहरित नहीं हैं।
(b) सभी पत्तियाँ अहरित हैं।
(c) कछ पत्तियाँ अहरित हैं।
(d) कोई पत्तियां अहरित नहीं हैं।
Ans. (d) : प्रतिवर्तन में उद्देश्य और परिमाण तर्कवाक्य के अपरिवर्तित रहते है लेकिन विधेय के स्थान पर उसके पूरक से तथा गुण बदल दिया जाता है जैसे- ‘‘सभी पत्तियां हरित है’’ का प्रतिवर्तन है ‘‘कोई पत्तियां अहरित नहीं है।’’
60. सभी धर्मों की सामान्य और आवश्यक शिक्षा है :
(a) नैतिकता जीवन का सार है।
(b) सामाजिक मूल्यों का उन्नयन
(c) आपसी प्रेम और सम्मान के मानव धर्म की स्थापना
(d) उपर्युक्त सभी
Ans. (d) : सभी ‘धर्मो’ की कुछ शिक्षाएं होती है। जो लगभग सभी में समान होती है‚ वो है- 1. नैतिकता जीवन का सार है। 2.
सामाजिक मूल्यों का उन्नयन 3. आपसी प्रेम और सम्मान के मानव धर्म की स्थापना।
61. स्ट्रासन ने अपनी पुस्तक ‘लॉजिकल थियरी’ में ‘औपचारिक प्रणालियों’ के निम्नलिखित में से किसका मूल्यांकन करने में लाभदायक होने की व्याख्या की है?
(a) ‘संदर्भ मुक्त’ परिचर्चा (b) ‘संदर्भ सापेक्ष’ परिचर्चा
(c) ‘संदर्भ निरपेक्ष’ परिचर्चा (d) उपर्युक्त सभी
Ans. (a) : स्ट्रॉसन अपनी पुस्तक लॉजिकल थियरी में औपचारिक प्रणालियों’ के मूल्यांकन में ‘सन्दर्भ मुक्त’ परिचर्चा के उपयोगी होने की बात करता है।
62. मूल तर्क वाक्य‚ सत्यापन और तत्व‚ मीमांसीय कथनों के संदर्भ में दिए गए अभिकथन (A) और तर्क (R) पर विचार करते हुए नीचे दिए गए कूटों में से सही कूट को चिह्नित कीजिए।
अभिकथन (A) :
यदि सभी कथन मूल तर्क-वाक्यों के सत्यता-फलन हैं जो कि प्रेक्षण की सूचना देते हैं तो वे सभी या तो अपने आप में आनुभविक होंगे अन्यथा पुनर्कथन या व्याघात होंगे।
तर्क (R) : तत्व मीमांसीय कथनों का उपर्युक्त घटकों के अंतर्गत वर्गीकरण नहीं किया जा सकता है।
कूट :
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही है और (R) गलत है।
(d) (A) गलत है लेकिन (R) सही है।
Ans. (b) : मूल तर्कवाक्य (प्राथमिक प्रतिज्ञप्ति)‚ सत्यापन के सन्दर्भ में यदि सभी कथन प्राथमिक प्रतिज्ञप्ति मूल तर्कवाक्य के सत्यता-
फलन है जो कि प्रेक्षण की सूचना देते है तो वे सभी तर्कवाक्य या तो अपने आप में आनुभविक होंगे अन्यथा पुनर्कथन या व्याघात होंगे। लेकिन इन वाक्यों का सत्यता फलन सूचनाओं का तत्वमीमांसीय कथनों से कोई सम्बन्ध नहीं है। अत: अभिकथन (A) सही हैं तथा (R) भी सही है। परन्तु (R) व्याख्या नहीं हैं।
63. विटगेंसटाइन ने ‘इनवेस्टिगेशन्स’ में अर्थ का सिद्धान्त प्रतिपादित किया है‚ इसे किस नाम से जाना जाता है?
(a) अर्थ का चित्र सिद्धान्त
(b) अर्थ का प्रयोग सिद्धान्त
(c) अर्थ का भाषायी-खेल सिद्धान्त
(d) अर्थ का वाक् कृत्य सिद्धान्त
Ans. (b) : विटगेन्सटाइन अपनी पुस्तक ‘इन्वेस्टिगेशन्स’ में अर्थ का सिद्धान्त का प्रतिपादन करता है। जिसे ‘अर्थ का प्रयोग सिद्धान्त’ कहते है। चुंकि यह सिद्धान्त फुटबॉल मैच के खेल को देखने के बाद विटगेन्सटाइन के मन में आया था अत: इसे ‘भाषा- खेल सिद्धान्त’ भी कहते है।
64. रसेल के डिफिनिट डिस्क्रिप्शन के सिद्धान्त के अनुसार तर्क वाक्य ‘वेवरली का लेखक स्काट है’ निम्न प्रकार विश्लेषित किया जा सकता है :
(1) कम से कम एक व्यक्ति ने वेवरली को लिखा है।
(2) अधिक से अधिक एक व्यक्ति ने वेवरली को लिखा है।
(3) जिस किसी भी वेवरली को लिखा है स्काट है। रसेल के अनुसार नीचे दिए गए कूटों में से कौन में से कौन-सा सही हैं?
(a) (a) और (b) का समन्वय
(b) (b) और (c) का समन्वय
(c) (a) और (c) का समन्वय
(d) (a), (b) और (c) का समन्वय
Ans. (d) : रसेल डिफिनिट डिस्टिक्रप्शन (निश्चित वर्णन) के सिद्धान्त के अनुसार ‘‘वेवरली का लेखक स्काट है’’ का विश्लेषण निम्न प्रकार करता है-
1. कम से कम एक व्यक्ति ने वेवरली को लिखा है।
2. अधिक से अधिक एक व्यक्ति ने वेवरली को लिखा है।
3. जिसने भी वेवरली लिखा वह स्काट है। रसेल के अनुसार‚ ‘वेवरली का लेखक’ एक अपूर्ण प्रतीक है। जो एक वर्णनात्मक पदावली और जटिल प्रतीक है। जबकि ‘एकार’ एक व्यक्तिवाचक नाम और एक सरल प्रतीक है।
65. सूची I को सूची II के साथ सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूटों में से सही उत्तर का चयन पियर्स के अपनी पुस्तक ‘फाउंडेशन्स ऑफ दी थ्योरी ऑफ साइन्स’ में किए गए संकेत परक वृत्ति के वर्गीकरण के आलोक में करें :
सूची I सूची II
(A) वाक्य विन्यास विज्ञान (i) यह चिह्नों एवं उनके भाष्यों के बीच संबंध का वर्णन करता है।
(B) संकेत विज्ञान (ii) यह एक चिह्न से दूसरे चिह्नों के संबंधों का वर्णन करता है।
(C) व्यवहार विज्ञान (iii) यह उस तरीके का वर्णन करता है जिनमें वे निर्धारित होते हैं।
कूट :
(A) (B) (C)
(a) (ii) (iii) (i)
(b) (iii) (ii) (i)
(c) (i) (ii) (i)
(d) (i) (iii) (ii)
Ans. (a) : ‘वाक्य विन्यास विज्ञान’ में एक चिन्ह से दूसरे चिन्हों के संबंधों का वर्णन किया जाता है। ‘संकेत विज्ञान’ (Semontic) में उस तरीके का वर्णन किया जाता है जिनमें वे निर्धारित होते है। तथा व्यवहार विज्ञान में चिन्हों एवं उनके भाष्यों के बीच संबंध का वर्णन किया जाता हैं।
66. अभिकथन (A) और तर्क (R) पर विचार करते हुए विटगेन्सटाइन के तर्कवाक्य के विचार के आलोक में नीचे दिए गए कूटों में से सही उत्तर का चयन कीजिए।
अभिकथन (A) :
किसी तर्क वाक्य की परिसीमा का उसके सत्यता आधार से तादात्म्य होता है।
तर्क (R) : किसी तर्क वाक्य की परिसीमा परमाण्विक तर्कवाक्यों का संयोजन होता है।
कूट :
(a) दोनों (A) और (R) सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) दोनों (A) और (R) सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही है और (R) गलत है।
(d) (A) गलत है और (R) सही है।
Ans. (b) : विट्गेन्सटाईन (1889-1959) अपने तर्कवाक्य के विचार के अनुसार किसी तर्कवाक्य की परिसीमा का उसके सत्यता आधार से तादात्म्य होता है। और तर्कवाक्यों की परिसीमा परमाण्विक तर्कवाक्यों का संयोजन होता है। परन्तु (R), (A) की व्याख्या नहीं है।
67. ‘‘भाषा हमारी द्वितीय प्रकृति है। यह भाषा के कारण ही संभव है कि जगत हमारे लिये खुला हुआ है। यह निम्नलिखित में से किस शास्त्र मीमांसीय चिंतक का विचार है?
(a) श्लाइरमेकर (b) डिल्थे
(c) गडैमर (d) हाइडेगर
Ans. (c) : ‘हैंस जार्ज गैडामर’ (1900-2002) एक जर्मन शादामीमांसक है। उनके अनुसार ‘भाषा हमारी द्वितीय प्रकृति है। यह भाषा के कारण ही संभव है कि जगत हमारे लिए खुला हुआ है।
68. शास्त्रमीमांसा को ‘सत्तामीमांसीय मोड़’ देने में निम्नलिखित में से किस दार्शनिक का योगदान है?
(a) मार्टिन हाइडेगर (b) रिकोवर
(c) डेरिडा (d) हाबरमास
Ans. (c) : मार्टिन हाइडेगर जो कि एक अस्तित्ववादी विचारक थे‚ ने शास्त्रमीमांसा को ‘सत्तामीमांसीय मोड़’ देने में योगदान दिया। उन्होंने शास्त्रमीमांसा को अपने ढंग से व्याख्यापित करते है।
69. निम्नलिखित में से किस शास्त्रमीमांसीय चिंतक ने सत्तामीमांसीय शास्त्र एवं समीक्षात्मक शास्त्रमीमांसा में समन्वय स्थापित किया?
(a) गडैमर (b) डेरिडा
(c) रिकोवर (d) हाबरमास
Ans. (a) : पॉल रिकोवर (1913 – 2015) फ्रांस के एक शास्त्रमीमांसीय चिंतक हैं। जिन्होंने शास्त्रमीमांस्य (hermeneutics) को फेनोमेनोलॉजिकल वर्णन के साथ जोड़ा। इन्होने सत्तामीमांसीय शास्त्र एवं समीक्षात्मक शास्त्रमीमांस में समन्वय स्थापित किया।
70. ‘चेतनता का’ संवृत्तशास्त्रीय विश्लेषण के दो पक्ष हैं (i) नोएमैटिक और (ii) नोएटिक। उनके संबंध के बारे में नीचे दिए गए विकल्पों से सही विकल्प का चयन करें :
(a) विभाज्य (b) विभाजन से परे
(c) अविभाज्य (d) संयुक्त
Ans. (c) : चेतना का संवृत्तिशास्त्रीय विश्लेषण हुसर्ल अपने फेनोमेनोलॉजी में प्रस्तुत करता है। उसके अनुसार इसके दो अविभाज्य पक्ष है- 1. नोएमैटिक तथा 2. नोएटिक।
71. धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन के लक्ष्य की आवश्कता है :
(a) अन्तरधर्म संवादों को समझने के लिए
(b) धर्मों के बीच समानता तथा अंतर को समझने के लिए
(c) धर्मों की विविधता के मूल तथा समन्वय को प्राप्त करने के लिए
(d) उपर्युक्त सभी
Ans. (d) : धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन करने के लिए हमें कुछ मूलभूत लक्ष्यों की आवश्यकता है-
1. अन्तधर्म संवादों को समझने के लिए
2. धर्मों के बीच समानता तथा अंतर को समझने के लिए
3. धर्मों की विविधता के मूल तथा समन्वय को प्राप्त करने के लिए।
72. ‘प्रत्यक्षम कल्पनापोढम नामजात्याद्य-संयुक्तम’ प्रत्यक्ष की इस परिभाषा को किसने सही बताया?
(a) धर्मकीर्ति (b) धर्मोत्तर
(c) वात्स्यायन (d) दिङ्गनाग
Ans. (d) : प्रत्यक्षम कल्पनापोढ़म नामजात्याद्य-संयुक्तम प्रत्यक्ष की इस परिभाषा को दिये गये विकल्पों के सन्दर्भ में सन्दिग्ध माना गया है। यह प्रश्न UGC ने।
73. ‘ज्ञानकरणकं ज्ञानं प्रत्यक्षम्’‚ प्रत्यक्ष की यह परिभाषा सर्वप्रथम किसके द्वारा प्रतिपादित की गई थी?
(a) दिङ्गनाग (b) गौतम
(c) गंगेश (d) वाचस्पति मिश्र
Ans. (c) : ‘ज्ञानकरणकं ज्ञानं प्रत्यक्षम्’ – गंगेश। गंगेश को नव्यन्याय के प्रवर्तक माने जाते है। गंगेश की पुस्तक का नाम ‘तत्वचिंतामणि’ है।
74. निम्नलिखित में से किस एक दार्शनिक का कथन है कि ‘प्रत्येक अपने लिए से प्रत्येक अन्य के लिए कोई मार्ग नहीं हैं’?
(a) मिल (b) बेन्थम
(c) कान्ट (d) मार्टिन्यू
Ans. (d) : मर्टिन्यू ‘प्रत्येक अपने लिए से प्रत्येक अन्य के लिए कोई मार्ग नहीं है।’ इसके अतिरिक्त उनके अनुसार‚ या तो संकल्प की स्वतंत्रता एक कथन है या फिर नैतिकता एक भ्रम है।
75. निम्नलिखित में से कौन नैतिकता का तत्व सीमांसीय आधार प्रदान करता है?
(a) आधारभूत गुण (b) स्वतन्त्रता तथा उत्तरदायित्व
(c) आत्मा की अमरता (d) चरित्र का विकास
Ans. (c) : नैतिककता का तत्व मीमांसीय आधार ‘आत्मा की अमरता’ पर जोर देता है। नैतिकता की तीन पूर्वमान्यताएं – ईश्वर की अवधारणा‚ आत्मा की अमरता‚ स्वतंत्रता की अवधारणा। यू.जी.सी. नेट/जेआरएफ परीक्षा‚ जून-2015 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY) व्याख्या सहित द्वितीय प्रश्न-पत्र का हल निर्देश: इस प्रश्नपत्र में पचास (50) बहु-विकल्पीय प्रश्न हैं। प्रत्येक प्रश्न के दो (2) अंक हैं। सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।
1. नीचे दो कथन दिए गए है एक अभिकथन (A) और दूसरा तर्क (R) के रूप में हैं। (A) और (R) पर विचार करते हुए सही कूट चुने:
अभिकथन (A) :
तैजस् में आत्मा सूक्ष्म वस्तुओं को ग्रहण करता है।
तर्क (R) : स्वप्नावस्था में आत्मा स्वयं काल्पनिक वस्तुओं का निर्माण करता है।
कूट:
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R),(A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही है लेकिन (R) गलत है।
(d) (A) गलत है लेकिन (R) सही है।
Ans. (a) : माण्डूक्योपनिषद में आत्मा के पारमार्थिक स्वरूप को जाग्रत‚ स्वप्न‚ एवं सुषुप्ति से भी परे तुरीय नामक एक चतुर्थ अवस्था बताया गया है। आत्मा की चार अवस्थाये मानी गयी है। स्वप्नावस्था में आत्मा जाग्रतावस्था की स्मृति से स्वयं काल्पनिक वस्तुओं का निर्माण करती हैं यह अवस्था ‘तैजस्’ कहलाती है। तैजस में आत्मा सूक्ष्म वस्तुओं का आनन्द (engoy) लेती है। (A) और (R) दोनों सही है। और (R), (A) की व्याख्या करता है।
2. उपनिषद् में हिरण्यगर्भ’ को ………. के रूप में भी जाना गया है।
(a) विश्वकर्मा (b) प्रजापति
(c) सहदााक्ष (d) सहदाशीर्ष
Ans. (b) : उपनिषद् में ‘हिरण्यगर्भ’ को ‘प्रजापति के रूप में भी जाना जाता है। ‘प्रजापति’ का अर्थ है− ‘अपन्यों का स्वामी’। परवर्ती संहिताओं और ब्राह्मण में प्रजापति को तत्वत: देवताओं का मूर्धन्य‚ सबका जनक‚ देवताओं और असुरों का पिता तथा प्रथम यजमान माना गया है। उन्हें विशेष रूप से ब्रह्मन् (ब्रह्मा) का तादात्म बताया गया है। ‘हिरण्यगर्भ-सूक्त’ (ऋग्वेद 10,121) में उन्हें हिरण्यगर्भ कहा गया हैं जिसका अर्थ है। ‘स्वर्णिम बीज’।
(भारतीय दर्शन- डॉ. नन्दकिशोर देवराज)
3. सही क्रम का चयन करें:
(a) अर्थ‚ काम‚ धर्म‚ मोक्ष
(b) अर्थ‚ धर्म‚ काम‚ मोक्ष
(c) मोक्ष‚ धर्म‚ अर्थ‚ काम
(d) धर्म‚ अर्थ‚ काम‚ मोक्ष
Ans. (c) : भारतीय दर्शन में चार पुरुषार्थ माने गये हें जो क्रमश:
धर्म‚ अर्थ‚ काम‚ मोक्ष है। मानव जीवन के चार परम लक्ष्यों में ‘मोक्ष’ पुरुषार्थ को सबसे अन्त में रखा गया है। ‘मोक्ष’ को ‘परम पुरुषार्थ’ कहा गया है। जो मानव जीवन का ‘चरम आदर्श’ है।
4. सूची-I को सूची- II से सुमेलित करें तथा नीचे दिये
कूट से सही उत्तर का चयन करें। सूची-I सूची-II
(A) नैगम नय (i) जहाँ सामानय गुण पूर्णत:
वास्तविक समझे जाते हैं एवं विशेष का अवास्तविक के रूप में निषेध हो जाता हैं।
(B) संग्रह नय (ii) जहाँ वस्तुएँ सामान्य और विशेष गुणोंवाली समझी जाती हैं और हम उनमें भेद नहीं कर पाते।
(C) व्यवहार नय (iii) जहाँ यथार्थ का क्षण के साथ अभिज्ञान किया जाता है।
(D) ऋजुसूत्र नय (iv) जहाँ वस्तुओं को केवल मूर्त विशेष समझा जाता है।
कूट:
(A) (B) (C) (D)
(a) (i) (ii) (iii) (iv)
(b) (iv) (iii) (ii) (i)
(c) (ii) (i) (iv) (iii)
(d) (iii) (ii) (iv) (i)
Ans. (c) :
(A) नैगम नय – जहाँ वस्तुएँ सामान्य और विशेष गुणोंवाली समझी जाती हैं और हम उनमें भेद नहीं कर पाते।
(B) संग्रह नय – जहाँ सामानय गुण पूर्णत: वास्तविक समझे जाते हैं एवं विशेष का अवास्तविक के रूप में निषेध हो जाता हैं।
(C) व्यवहार नय – जहाँ वस्तुओं को केवल मूर्त विशेष समझा जाता है।
(D) ऋजुसूत्र नय – जहाँ यथार्थ का क्षण के साथ अभिज्ञान किया जाता है।
5. सूची- I को सूची- II से सुमेलित करें तथा नीचे दिये
कूट से सही उत्तर का चयन करें। सूची-I सूची-II
(a) वसुबन्धु (i) महायान सूत्रालंकार
(b) असंग (ii) विग्रह व्यावर्तिनी
(c) नागार्जुन (iii) महायान श्रद्धोत्पाद शास्त्र
(d) अश्वघोष (iv) विज्ञप्तिमात्रता सिद्धि
कूट:
(a) (b) (c) (d)
(a) (iv) (i) (ii) (iii)
(b) (ii) (iii) (i) (iv)
(c) (iii) (iv) (ii) (i)
(d) (i) (ii) (iii) (iv)
Ans. (a) :
वसुबन्ध – विज्ञप्तिमात्रता सिद्धि असंग – महायान सूत्रालंकार नागार्जुन – विग्रह व्यावर्तिनी अश्वघोष – महायान श्रद्धोत्पाद शास्त्र
6. अन्योन्य अभाव की अवधारणा का प्रतिपादन किया गया है:
(a) सांख्या द्वारा (b) न्याय द्वारा
(c) विशिष्टाद्वैत द्वारा (d) अद्वैत द्वारा
Ans. (b) : न्याय दर्शन में अनोन्य अभाव की अवधारणा का प्रतिपादन मिलता है। आभाव का ही एक रूप है। दो वस्तुओं का परस्पर अर्थात दो वस्तुओं के तादात्म्य का आभाव अन्योन्यभाव है जैसे घट पट नहीं है। यदि अन्योन्याभाव न हो तो सारी वस्तुएं अभिन्न हो जायेगी।
7. दिये गये अभिकथन (A) तथा तर्क (R) पर विचार कीजिए तथा नीचे दिये गये विकल्पों से सही उत्तर का चयन कीजिए:
अभिकथन (A) :
आत्मा की न उत्पत्ति होती है न ही विनाश।
तर्क (R) : यह उत्पत्ति विनाश से परे है।
कूट:
(a) (A) तथा (R) दोनों सत्य हैं और (R),(A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) तथा (R) दोनों असत्य हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(c) (A) तथा (R) दोनों सत्य हैं लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(d) (A) असत्य है और (R) सत्य है‚ लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या है।
Ans. (a) : यहां यह स्पष्ट नहीं कि यह किस दर्श्न के आलोक में पूछा जा रहा है परन्तु यदि नास्तिक दर्शनों की आत्मा की व्याख्या को छोड़कर‚ आस्तिक सम्प्रदाय की आत्मा की अवधारणा को ग्रहण किया जाये तो यह कथन (A) और तर्क (R) दोनों सही हैं और
(R), (A) की व्याख्या है।
8. सूची- I को सूची- II से सुमेलित करें तथा नीचे दिये
कूट से सही उत्तर का चयन करें। सूची-I सूची-II
(a) विनाशपूर्व घट का अभाव (i) अन्योन्या भाव
(b) विनाश के पश्चात् (ii) अत्यंता भाव
(c) पट की भांति नहीं (iii) प्रागभाव
(d) तरल-घट की भांति नहीं (iv) प्रध्वंसा भाव
कूट:
(a) (b) (c) (d)
(a) (i) (ii) (iii) (iv)
(b) (ii) (iii) (iv) (i)
(c) (iv) (iii) (ii) (i)
(d) (iii) (iv) (i) (ii)
Ans. (d) :
विनाशपूर्व घट का अभाव – प्रागभाव विनाश के पश्चात् – प्रध्वंसा भाव पट की भांति नहीं – अन्योन्या भाव तरल-घट की भांति नहीं – अत्यंता भाव
9. पूर्व-मीमांसा के अनुसार आकृति का तात्पर्य है:
(a) विशेष (b) संस्थान
(c) समवाय (d) गुण
Ans. (b) : पूर्व-मीमांसा में ‘आकृति’ का तात्पर्य संस्थान से है। इसको भ्रमवश ‘जाति’ भी कह दिया जाता है। लेकिन मीमांसक शब्द को जाति कहते है‚ उनके अनुसार शब्द का अर्थ न तो व्यक्ति है और न आकार (आकृति)।
10. रामानुज के अनुसार निर्गुण का अर्थ है:
(a) कल्याण गुण रहित
(b) अकल्याण गुण रहित
(c) लक्षण रहित
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Ans. (b) : रामानुज के अनुसर ब्रह्म सगुण है। परमतत्व को निर्गुण कहने का कोई प्रमाणिक ज्ञान नहीं है। निर्गुण ब्रह्म की कल्पना श्रुतिसम्मत नहीं श्रुति में वर्णित निर्गुण शब्द प्रकृति के गुणों से रहित सत्ता के अर्थ में है। रामानुज के अनुसार ‘निर्गुण’ का अर्थ अकल्याण गुण रहित है। रामानुज अपने दर्शन में ‘निर्गुण ब्रह्म’ की शंकर की अवधारणा का खण्डन करते हैं।
11. मायावाद के विरुद्ध सप्तानुपपत्ति (सात शास्त्रीय आपत्ति) को किसने प्रख्यापित किया?
(a) वल्लभ (b) मध्व
(c) रामानुज (d) निम्बार्क
Ans. (c) : शंकर का ‘माया-सिद्धान्त’ का रामानुज द्वारा खण्डन किया गया है। जिसे ‘सप्तानुपत्ति (सात शास्त्रीय आपत्ति) कहा जाता है। रामानुज माया’ को ब्रह्म की वास्तविक शक्ति मानते हैं जिसके द्वारा ब्रह्म सृष्टि की रचना करता है। यह शंकर के मत के विपरीत है। ‘माया’ को रामानुज ब्रह्म की प्रकृति कहते है।
12. शंकर के दर्शन को कहा जाता है:
(a) एकतत्ववाद (b) समग्र अद्वैतवाद
(c) अद्वैतवाद (d) उपर्युक्त सभी
Ans. (c) : शंकर के वेदान्त दर्शन को ‘अद्वैतवाद’ के नाम से जाना जाता हैं शंकर के अद्वैतवाद के अनुसार पारमार्थिक दृष्टि से ब्रह्म ही एकमात्र सत् है‚ जगत् मिथ्या है और जीव ब्रह्म से अभिन्न है।
13. विशिष्टाद्वैत दर्शन केवल अनुमोदन करता है…….।
(a) जीवनमुक्ति का (b) विदेहमुक्ति का
(c) दोनों का (d) उपर्युक्त में से किसी का नहीं
Ans. (b) : विशिष्टाद्वैत दर्शन‚ रामानुजाचार्य के नाम के साथ ज्यादा जाना जाता है। यह मोक्ष की अवस्था को अशरीरी अर्थात् विदेहमुक्ति को ही मानते है। रामानुज के अनुसार ‘मोक्ष अप्राप्त की प्राप्ति’ हैं विशिष्टाद्वैत दर्शन में जीवन्मुक्ति को अस्वीकार किया गया है। रामानुज की धारणा है कि क्योंकि जीवात्मा का शरीर-धारण कर्म के ही कारण है। अत: जब तक शरीर रहेगा तब मोक्ष नहीं मिल सकता है।
14. कौन-सा कथन सत्य नहीं है?
(a) मध्व उत्कट बहुतत्त्ववाद के समर्थन हैं।
(b) मध्व प्रबल वस्तुवादी हैं।
(c) मध्व एक महान ईश्वरवादी हैं।
(d) मध्व ब्रह्म-जीव अभेदवाद के समर्थन हैं।
Ans. (d) : मध्वाचार्य का दर्शन द्वैतवाद का समर्थक हैं ये भी वेदान्ती है। महत्व उत्कट बहुतत्ववादी और प्रबल वस्तुवादी है। वह महान ईश्वरवादी भी है। वह जगत् सत्य है। मध्वाचार्य ने अपने दर्शन में पुंचविध नित्य भेद को स्वीकार किये हैं वह ब्रह्म जीव के अभेदवाद के प्रबल विरोधी हैं और शंकर के अद्वैतवाद के विरोधी।
15. न्याय के अनुसार कार्य जाना जाता है:
(a) कारण (b) प्रगभाव प्रतियोगी
(c) असमवायी कारण (d) कारण
Ans. (b) : न्याय असत्कार्यवाद है। इसके अनुसार कार्य नई सृष्टि हैं। कार्य उत्पत्ति से पूर्व कारण में विद्यमान नहीं रहता। कार्य अपने प्रागभाव को प्रतियोगी होता है। कार्य अपने प्रागभाव का आभाव है। कार्य की सत्ता का आरम्भ उसकी उत्पत्ति के साथ ही होता हैं भारतीय दर्शन : आलोचन और अनुशीलन चन्द्रधर शर्मा
16. ज्ञान स्वयं में सत्य होना चाहिए‚ यह विचार प्रतिपादित है:
(a) न्याय द्वारा (b) वेदान्त द्वारा
(c) मीमांसा द्वारा (d) जैन द्वारा
Ans. (c) : मीमांसा दर्शन ज्ञान के प्रमाण्य के सम्बन्ध में स्वत:
प्रमाण्यवादी हैं। उसके ज्ञान स्वयं में सत्य होता है उसके लिए किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं हैं। अज्ञान के सम्बन्ध में मीमांसक परत: उपप्रामाण्य को मानते है।
17. चेतना आत्मा का एक आगंतुक गुण है‚ स्वीकार किया गया है:
(a) वेदान्त द्वारा (b) पूर्व मीमांसा द्वारा
(c) न्याय द्वारा (d) सांख्य द्वारा
Ans. (c) : न्याय दर्शन में चेतना को ‘आत्मा’ का आगन्तुक गुण स्वीकार किया गया है। न्याय दर्शन मुक्तावस्था में आत्मा को ज्ञान और चैतन्य रहित जड़ और अभौतिक द्रव्य मानता है। यह अन्यान्य भारतीय दर्शनों से एकदम अलग मान्यता हैं।
18. निम्नलिखित में कौन-सा कथन सही है?
(a) अपृथक्सिद्धि है‚ ब्रह्म का जीव के साथ सम्बन्ध।
(b) अपृथक्सिद्धि है‚ ब्रह्म का जीव और जगत के साथ सम्बन्ध।
(c) अपृथक्सिद्धि है‚ ब्रह्म का केवल जगत के साथ सम्बन्ध।
(d) अपृथक्सिद्धि कोई सम्बंध है ही नहीं।
Ans. (b) : अपृथक सिद्धि रामानुजाचार्य के विशिष्टाद्वैत दर्शन में ब्रह्म का जीव और जगत से सम्बन्ध बतलाने के लिए प्रयुक्त एक प्रकार का सम्बन्ध हैं। रामानुज के अद्वैत अर्थात् ब्रह्म तथा द्वैत अर्थात जीव एवं जगत‚ में अपृथकसिद्धि सम्बन्ध हैं। क्योंकि इन्हें एक-दूसरे से पृथक नहीं किया जा सकता है। इसीलिए रामानुजाचार्य का वेदान्त हैतुविशिष्ट-अहैतु कहलाता है।
19. न्याय का कारणता सिद्धान्त कहा जाता है:
(a) विवर्तवाद (b) असत्कार्यवाद
(c) सत्कार्यवाद (d) यदृच्छावाद
Ans. (b) : न्याय का कारण-सिद्धान्त असत्कार्यवाद कहलाता है। न्याय-वैशेषिक दर्शन के अनुसार कार्य उत्पत्ति से पूर्व अपने कारण में विद्यमान नहीं रहता है। अर्थात् कारण में कार्य उत्पत्ति से पूर्व असत् होता है। अर्थात् कार्य की सत्ता का प्रारम्भ उसकी उत्पत्ति से ही प्रारम्भ होती है। यही असत्कार्यवाद है।
20. नीचे दो कथन दिये गये हैं जिनमें एक को अभिकथन
(A) कहा गया है तथा दूसरे को तर्क (R)। नीचे दिये गये कूटों से सही उत्तर का चयन करें।
अभिकथन (A) :
‘‘अभ्यास वैराग्यभ्याम् तन्निरोध:’’।
तर्क (R) : सतत् अभ्यास और अनासक्ति के द्वारा चित्त वृत्ति का निरोध।
कूट:
(a) (A)‚(R) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों गलत हैं।
(c) (A) और (R) परस्पर व्याघातक हैं।
(d) (A) सही हैं‚परंतु (R) गलत है।
Ans. (a) : अभ्यास और वैराग्य दोनों की आवश्यकता पर योग दर्शन में बताया गया है। महर्षि पतन्जलि ने उत्तम साधकों की चिन्तवृत्ति-निरोध के लिए ‘अभ्यास-वैराग्य’ को उपय के रूप में बतलाया है। सतत् अभ्यास और अनासक्ति के द्वारा चित्त वृत्ति का निरोध किया जा सकता है।
21. ईश्वर को परम अंह के रूप में कल्पित करने से इकबाल का तात्पर्य है:
(a) प्रकाश के रूप में ईश्वर
(b) एक गत्यात्मक और सर्जनात्मक जीवन
(c) अनन्त सर्जनात्मक सम्भावनाएँ
(d) जगत की एक सर्जनात्मक प्रगति
Ans. (a) : इकबाल के अनुसार ईश्वर एक परम अहं (supreme ego) है‚ जो अपनी सर्जनात्मकता में सृष्टि का दिशा-निर्देश करता हैं। इकबाल कुरान के ईश्वर को प्रकाश-रूप कहे जाने की व्याख्या अपने दर्शन में करते हैं। प्रकाश की उपमा से सतत गतिशीलता पूर्ण गत्यात्मकता का बोध होता है। इकबाल का कहना है कि ‘प्रकाश’ की उपमा उस ‘परम अहं’ के स्वरूप को समझने के लिए निकटतम उपमा है।
22. निम्नलिखित में से कौन सा युग्म सही है?
(a) पर्सनाल्टी‚ हिन्द स्वराज-गाँधी
(b) द लाइफ डिवाइन‚ इस्ट एण्ड वेस्ट-श्री अरविन्द
(c) साधना‚ पर्सनाल्टी – टैगोर
(d) इस्ट एण्ड वेस्ट इन रिलिजन‚ दी ह्यूमन सायकिल –
राधाकृष्णन्
Ans. (c) : ‘साधना’‚ ‘पर्सनाल्टी’ टैगोर की रचनाएं हैं। ‘दी ह्यूमन सायकिल’‚ ‘द लाइफ डिवाइन’- श्री अरविन्द; ‘इस्ट एण्ड वेस्ट’‚ ‘इस्ट एण्ड वेस्ट इन रिलिजन’- राधाकृष्णन; ‘हिन्द स्वराज’-गांधी
23. सूची- I को सूची- II से सुमेलित करें तथा प्रदत्त कूट के आधार पर सही उत्तर चुनें:
सूची-I सूची-II
(लेखक) (ग्रन्थ)
(a) के. सी. भट्टाचार्य (i) दी आइडियल ऑफ ह्यूमन यूनिटी
(b) राधाकृष्णन् (ii) दी सीक्रेट्स ऑफ सेल्फ
(c) इकबाल (iii) स्टडीज इन वेदान्तिज्म
(d) श्री अरविन्द (iv) दी रीकवरी ऑफ फेथ
कूट:
(a) (b) (c) (d)
(a) (iii) (iv) (ii) (i)
(b) (i) (ii) (iii) (iv)
(c) (ii) (iv) (i) (iii)
(d) (iv) (i) (ii) (iii)
Ans. () :
के. सी. भट्टाचार्य – स्टडीज इन वेदान्तिज्म राधाकृष्णन् – दी रीकवरी ऑफ फेथ इकबाल – दी सीक्रेट्स ऑफ सेल्फ श्री अरविन्द – दी आइडियल ऑफ ह्यूमन यूनिटी
24. अन्त: अनुभूति एवं प्रज्ञा एक दूसरे के पूरक हैं निम्न में से किसके अनुसार?
(a) बर्गसॉ (b) कान्ट
(c) राधाकृष्णन् (d) अम्बेडकर
Ans. (c) : राधाकृष्णन के अनुसार‚ अन्त:अनुभूति एवं प्रज्ञा एक दूसरे के पूरक हैं राधाकृष्णन के अनुसार अन्त: अनुभूति से प्राप्त ज्ञान प्रामाणिक ज्ञान है। बौद्धिक ज्ञान (Intellect, प्रज्ञा) कभी भी पूर्ण नहीं होता जबकि प्रतिभ ज्ञान (Intnition) एक पूर्ण ज्ञान हैं प्रज्ञा (बौद्धिक ज्ञान) के ज्ञान की सत्यता की परीक्षा की जाती है परन्तु अन्त: अनुभूति (प्रज्ञा) से प्राप्त ज्ञान की नहीं। दर्शन पुज:एक महन दृष्टि – विनोद तिवारी
25. किसके अनुसार ‘मुमुक्षुत्व’ अमरता के पक्ष में एक साक्ष्य है?
(a) शंकर (b) रामानुज
(c) राधाकृष्णन् (d) विवेकानन्द
Ans. (d) : स्वामी विवेकानंद के अनुसार ‘मुमुक्षत्व’ मृत्यु की इच्छा नहीं हैं ‘मुमुक्षत्व’ – मुक्त होने की हमारी प्रबल उत्कठा हैं‚ जो अमरता के पक्ष में एक साक्ष्य हैं। यह दुखरहित जीवन की इच्छा है। इस इच्छा की विषयवस्तु के रूप मे मृत्यु से परे की किसी स्थिति को स्वीकारना पड़ता है। मुमुक्षत्व अमरता की इच्छा हैं‚ अत: इस इच्छा के अनुरूप इसके इच्छित वस्तु- अमरता को स्वीकारना पड़ता है।
26. सूची-I को सूची-II से सुमेलित करें तथा नीचे दिये हुए कूट से सही विकल्प का चयन करें:
सूची-I सूची-II
(A) लाइब्नित्ज (i) जगत चिदणुओं का समूह है।
(B) विट्गेंसटाइन (ii) जगत अणुओं का समूह है।
(C) ह्यूम (iii) जगत संस्कारों का समूह है।
(D) बर्कले (iv) जगत प्रत्यक्षों का समूह है।
कूट:
(a) (A) और (iv) (b) (B) और (i)
(c) (C) और (iii) (d) (D) और (ii)
Ans. (b) :
लाइब्नित्ज – जगत् चिदणुओं का समूह है। विट्गेंसटाइन – जगत् तथ्यों की समग्रता है वस्तुओं की नहीं। ह्यूम – जगत् संस्कारों का समूह है। बर्कले – जगत् प्रत्ययों का प्रत्यक्ष्य हैं।
27. सूची- I को सूची- II से सुमेलित करें तथा नीचे दिये गये कूटों से गलत विकल्प का चयन करें:
सूची-I सूची-II
(A) लॉक (i) अन्तरक्रियावाद
(B) लाइबनित्ज (ii) सर्वेश्वरवाद
(C) स्पिनो़जा (iii) बहुलवाद
(D) देकार्त (iv) विज्ञानवाद
कूट:
(a) (C) और (ii) (b) (D) और (i)
(c) (A) और (iv) (d) (B) और (iii)
Ans. (c) : देकार्त अन्तर क्रियावाद‚ स्पिनोजा सर्वेश्वरवाद‚ तथा लाइबनित्ज बहुलवाद को मानते है लेकिन विज्ञानवादी बर्कले को कहा जाता है और लाॉक प्रत्यय प्रतिनिधित्ववादी कहा जाता हैं। लॉक विज्ञानवाद (Idealism) को नहीं मानते हैं।
28. सही विकल्प का चयन करें:
बुद्धिवादियों के लिए जन्मजात प्रत्यय हैं-
(a) नित्य
(b) आकस्मिक
(c) दोनों नित्य और आकस्मिक
(d) न तो नित्य न आकस्मिक
Ans. (a) : बुद्धिवादी आत्मा (मन) में ज्ञान को जन्म से निगूढ़ मानते है। इसे ही जन्म जात प्रत्यय कहते हैं उनके अनुसार जन्मजात प्रत्यय शाश्वत (Eternal‚ नित्य) होते है। यह प्रागनुभविक भी होते है।
29. सही विकल्प का चयन करें:
अन्तरक्रियावाद के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया था:
(a) लाइब्नित़्ज द्वारा (b) देकार्त द्वारा
(c) बर्कले द्वारा (d) स्पिनो़जा द्वारा
Ans. (b) : मन और शरीर सम्बन्ध की समस्या को हल करने के लिए बुद्धिवादियों ने कई सिद्धान्त दिया। डेकार्ट ने अंतक्रियावाद‚ स्पिनाजो ने समानान्तरवाद तथा लाइबनित्ज ने पूर्व स्थापित सामंजस्य का सिद्धान्त प्रतिपादित किया हैं।
30. कौन यह स्वीकार करता है कि किसी वस्तु की सत्ता उसके अनुभव पर निर्भर करती है?
(a) प्लेटो (b) ह्यूम
(c) बर्कले (d) लॉक
Ans. (c) : बर्कले के अनुसार‚ ‘सत्ता दृश्यता है’ अर्थात् वस्तु की सत्ता उसके अनुभव पर निर्भर करती है। अर्थात जो कुछ भी दृश्य है वह अनुभव के अन्तर्गत है । और जो अनुभव के अन्तर्गत है उसकी सत्ता है।
31. सूची-I को सूची-II के साथ्ज्ञ सुमेलित करें और नीचे दिए गए कूटों में से सही उत्तर चुनें:
सूची-I सूची-II
(A) लॉक (i) प्रागनुभविक संश्लेषी निर्णय
(B) बर्कले (ii) आनुभविक संश्लेषी निर्णय
(C) ह्यूम (iii) प्रत्ययों का ज्ञान
(D) कांट (iv) संवेदनाओं का ज्ञान
कूट:
(a) (A) और (iii) (b) (D) और (i)
(c) (C) और (ii) (d) (B) और (iv)
Ans. (b) : लॉक‚ संवेदनाओं के ज्ञान को‚ बर्कले प्रत्ययों के ज्ञान को और कांण्ट प्रागनुभविक संश्लेषी निर्णय को मानते है।
32. सही विकल्प का चयन करें:
पूर्व स्थापित सामंजस्य संबंध है-
(a) मन और शरीर के मध्य
(b) ईश्वर और प्रकृति के मध्य
(c) गुण और पर्याय के मध्य
(d) चिदणुओं के मध्य
Ans. (d) : लाइबनित्ज के अनुसार चिदणुओं के स्वभाव में ही यह पूर्व-स्थापित सामंजस्य निहित हैं कि प्रत्येक चिदणु पूर्व-स्थापित सामंजस्य के नियम से संचालित होता है। इसके अतिरिक्त लाइबनित्ज ने आत्मा और शरीर के संबंध की समस्या को अपने प्रसिद्ध ‘पूर्व-स्थापित’ सामंजस्य के नियम के द्वारा हल करने का प्रयास किया।
33. सूची-I को सूची-II से सुमेलित करें तथा नीचे दिये गये कूट से सही विकल्प का चयन करें:
सूची-I सूची-II
(A) वाक् क्रिया (i) विट्गेन्स्टाइन
(B) भाषा खेल (ii) एयर
(C) अर्थ का सत्यापन सिद्धांत (iii) पीयर्स
(D) अर्थ का उपचारात्मक सिद्धांत (iv) राइल
कूट:
(A) (B) (C) (D)
(a) (i) (ii) (iii) (iv)
(b) (iv) (iii) (ii) (i)
(c) (iii) (ii) (iv) (i)
(d) (ii) (iii) (iv) (i)
Ans. (d) : वाक् क्रिया सिद्धान्त जे.एल. ऑस्टिन ने दिया है। भाषा खेल सिद्धान्त विट्गेन्सटाइन का है। अर्थ का सत्यापन सिद्धान्त एयर का है। अर्थ का उपचारात्मक सिद्धान्त।
34. सही विकल्प का चयन करें:
(a) हीगेल एक निरपेक्ष विज्ञानवादी है तथा हुसर्ल अतीन्द्रिय विज्ञानवाद का समर्थन करता है।
(b) हीगेल एक बुद्धिवादी है तथा स्पीनोजा एक वस्तुवादी है।
(c) हुसर्ल अतीन्द्रिय विज्ञानवाद का समर्थन करता है तथा कांट एक अनुभववादी है।
(d) हीगेल एक निरपेक्ष विज्ञानवादी है किंतु हुसर्ल विज्ञानवाद का खण्डन करते हैं।
Ans. (a) : हीगेल द्वारा प्रस्तुत विज्ञानवाद निरपेक्ष सत् का वर्णन करने के कारण निरपेक्ष विज्ञानवाद हैं हुसर्ल अपने फेनोमेनोलॉजी एक तरह से अतीन्द्रिय विज्ञानवाद के तत्व उभरकर आते है।
35. जी. ई. मूर के अनुसार जब भी दार्शनिक सिद्धान्त और सामान्य बुद्धि के बीच टकराव होता है तो इस बात की संभावना अधिक होती है कि:
(a) दार्शनिक सिद्धान्त की तुलना में सामान्य बुद्धि भटक जाती है।
(b) सामान्य बुद्धि को तुलना में तर्क भटक जाता है।
(c) तर्क और सामान्य बुद्धि दोनों भटक जाते हैं।
(d) तर्क और सामान्य बुद्धि में से कोई नहीं भटकता।
Ans. (c) : मूर सामान्य बुद्धि के आधार पर दार्शनिक प्रत्ययों की व्याख्या का समर्थक हैं। उसके अनुसार जब भी दार्शनिक सिद्धान्त और सामान्य बुद्धि के बीच टकराव होता है तो इस बात की संभावना अधिक होती है कि तर्क और समान्य बुद्धि दोनों भटक जाये।
36. रसेल के दर्शन के संदर्भ में दिए गये अभिकथन (A) और तर्क (R) पर विचार करें और नीचे दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प चुनें:
अभिकथन (A) :
सामान्य कथन अस्तित्वपरक नहीं हैं।
तर्क (R) : अणु न तो मानसिक हैं न ही भौतिक। विकल्प:
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं लेकिन (R),(A) की सीधी व्याख्या नहीं प्रदान करता है।
(b) (A) और (R) दोनों गलत हैं लेकिन (R), (A) की सीधी व्याख्या प्रदान करता है।
(c) (A) सही है‚ (R) गलत है और (R), (A) की सीधी व्याख्या प्रदान करता है।
(d) (A) गलत है‚ (R) सही है लेकिन (R), (A) की सीधी व्याख्या नहीं प्रदान करता है।
Ans. (a) : रसेल के दर्शन में यह दोनों कथन कि ‘सामान्य कथन अस्तित्वपरक नहीं है तथा ‘अणु न तो मानसिक है न ही भौतिक’ सत्य हैं। परन्तु एक दूसरे की व्याख्या नहीं करते है। रसेल के अनुसार जो कई विशेषों में समान हो वह सामान्य हैं।
37. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन अस्तित्ववाद और गीता के अनुसार सत्य है?
(a) हम कर्त्ता और भोक्ता हैं‚ साक्षी-मात्र नहीं।
(b) हम साक्षी-मात्र हैं‚ कर्त्ता अथवा भोक्ता नहीं।
(c) हम कर्त्ता‚ भोक्ता और साक्षी है।
(d) ऊपर दीये गए विकल्पों में से कोई भी स्वीकार्य नहीं है।
Ans. (d) : गीता और अस्तित्ववाद दोनों को साथ-साथ यह मान्य नहीं है कि−
1. हम कर्त्ता और भोक्ता हैं‚ साक्षी मात्र नहीं।
2. हम साक्षी-मात्र है‚ कर्ता अथवा भोक्ता नहीं।
3. हम कर्त्ता‚ भोक्ता और साक्षी सभी है। गीता मैं आत्मा का कर्त्ता‚ भोक्ता‚ ज्ञाता‚ माना गया है। यह अपने पारमार्थिक स्वरूप में शुद्ध साक्षिचैतन्य है।
38. इनमें से कौन ‘उत्कट अनुभववादी’ कहा जाता है?
(a) एयर (b) लॉक
(c) जेम्स (d) मूर
Ans. (c) : एयर को तार्किक प्रत्यक्षवादी या तार्किक अनुभववादी‚ लॉक का अनुभववाद संवेदनवाद‚ प्रत्यय प्रतिनिधित्ववाद‚ मूर भाषाविश्लेष् ाणवादी तथा विलियम जेम्स का अनुभववाद उत्कट अनुभववाद कहलाता है।
39. सीमित अर्थ में ‘इपोखे’ का अर्थ है:
(a) वस्तुओं के अस्तित्व में विश्वास
(b) वस्तुओं के अस्तित्व में अविश्वास
(c) बाह्य विश्व के अस्तित्व से संबंधित निरपेक्ष निर्णय प्राप्त करना।
(d) वस्तुओं के अस्तित्व विषयक निर्णयों का स्थगन।
Ans. (d) : हुसर्ल अपने फेनोमेनोलॉजी में ‘शुद्ध सार भाव’ तक पहुँचने के लिए विभिन्न प्रकार के विश्वासों से मुक्त होने के लिए कुछ विधियां बताते है‚ जिसे फेनोमेनालाजी की विधि कहते हैं। फेनोमेनालॉजी की विधि को असंबंधन (Epoche) तथा विभिन्न स्तरों के उपचयन (Reduction) की विधि कही जाती हैं‚ उसी सीमित अर्थ में इपोखे (असंबंधन) का अर्थ है−वस्तुओं के अस्तित्व विषयक निर्णयों का स्थगन करना। ‘असंषधन’ अलग रखने का प्रयत्न करना है। कोष्टीकरण (Bracketing) विमुख होना (Detachment), असम्बोधन (Disconnection) इसी विधि में प्रयुक्त है।
40. हाइडेगर के अनुसार ‘केयर’ के तीन पक्ष क्या है?
(a) तथ्यता‚ संभाव्यता‚ गिरावट
(b) तथ्यता‚ सावधानी‚ अनुशासन
(c) सावधानी‚ अनुशासन‚ सेवा
(d) सेवा‚ सावधानी‚ तथ्यता
Ans. (c) : हाइडेगर के अनुसार मानव के जगत के साथ संबंधित होने का तार्किक स्वरूप यह ‘उद्वेगपूर्ण लगाव’ (Care an concern) है। यदि यह ‘केयर’ (लगाव) न हो तो अस्तित्व की अनुभूति ही न रहे। हाइडेगर ने ‘लगाव’ (केयर) के तीन लक्षणों का उल्लेख किया हैं तीनों को क्रमश: तथ्यता (Facticity)‚ संभावना
(Possibility)‚ तथा ‘गिरावट’ (Fallen ness) कहा जाता है।
41. मूर विश्लेषण करता है:
(a) भाषा (b) भाषायी तथ्य
(c) भाषेतर तत्व (d) इनमें सभी
Ans. (c) : मूर के अनुसार‚ जिसका विश्लेषण हो रहा है वह भाषीय तत्व नहीं बल्कि भाषा के इतर कोई तत्व (extra linguistic entity) हैं। इस भाषेतर तत्व को वह संप्रत्यय (Concept) प्रस्थापना (proposition) भाव (idea) आदि कहते हैं। परन्तु ये भाषीय अथवा शाब्दिक उक्तियां नहीं हैं
42. निम्नलिखित में से कौन सा युग्म सही सुमेलित नहीं है?
(a) साइकोलॉजिज्म – हुस्सर्ल
(c) मशीन में प्रेत – डेकार्ट
(a) डेसिन – हाइडेगर
(c) बुद्धिवाद – हेगल
Ans. (b) : ‘मशीन में प्रेत’ सिद्धान्त गिल्बर्ट राइल’ के दर्शन से सम्बन्धित है‚ जो डेकार्ट के मन-शरीर’ सम्बन्ध सिद्धान्त की आलोचना है। गिल्बर्ट राइल के अनुसार यह कहना कि मन और शरीर दो विरूद्ध कोटियां हैं‚ और फिर दोनों के परस्पर अन्तक्रिया की बात करना और शरीर को मन में स्थापित कर देना यह ‘मशीन में प्रेत’ की तरह हैं।
43. सूची-I को प्लेटों के कार्यों के सन्दर्भ से सूची-II से सुमेलित करें और सही कूट का चयन करे:
सूची-I सूची-II
(a) मेनो (i) सुकरात के जीवन और मृत्यु
(b) गारजियस (ii) ज्ञान की प्रकृति और निर्देश
(c) एपोलॉजी एण्ड क्रेटो (iii) सद्गुण और आत्म नियंत्रण
(d) करमाइड्स (iv) वक्रपटुता के अध्ययन से जुड़ा
कूट:
(a) (b) (c) (d)
(a) (ii) (iv) (iii) (i)
(b) (iv) (ii) (i) (iii)
(c) (ii) (iv) (i) (iii)
(d) (iii) (i) (iv) (ii)
Ans. (c) : प्लेटों के ‘मेनो’ डॉयलॉग में ज्ञान और उसकी प्रकृति एवं निर्देश के बारे में बताता है‚ ‘गारजियस’ में वाक्पटुता (rhetic) का अध्ययन‚ एपोलॉजी एण्ड क्रेटो में सुकरात के जीवन और मृत्य से सम्बन्धित है तथा करमाइड्स में सद्गुण तथा आत्मनियन्त्रण की बात करता हैं।
44. थॉमस एक्वीनॉस के संदर्भ में नीचे दिये गये कथनों पर विचार कीजिए और सही कूट का चयन कीजिए:
(i) एक्वीनॉस सार्वभौमिक पुद्गलाकारवाद एवं आकारों की अनेकता के सिद्धान्त का निषेध करते हैं।
(ii) मनुष्य के पास एक बौद्धिक आत्मा है जो एक सारभूत आकार के रूप में कार्य करती हैं।
(iii) केवल ईश्वर ही ऐसा है जो सर्वथा संघटकविहीन है। उसका सार उसके होने में है।
कूट:
(a) केवल (ii) और (iii) सही है।
(b) केवल (i) और (ii) सही हैं।
(c) केवल (i) और (iii) सही है।
(d) सभी (i), (ii) और (iii) सही है।
Ans. (d) : एक्वीनॉस अपने दर्शन में सार्वभौमिक पुद्गलाकारवाद एवं आकारों की अनेकता के सिद्धान्त का निषेध करते हैं उनके अनुसार‚ मनुष्य के पास बौद्धिक आत्मा है जो एक सारभूत आकार के रूप में कार्य करती है तथा ईश्वर का सार उसके होने में है यह संघटक विहीन नित्य (शाश्वत) है।
45. संत आगस्टाइन के दर्शन के आलोक में निम्नलिखित
अभिकथन (A) और तर्क (R) पर विचार करें और सही
कूट चुनें:
अभिकथन (A) :
शुभत्व के सोपानों का सत् के सोपानों से तादात्म्य है।
तर्क (R) : यदि किसी विशेष वस्तु में शुभत्व नहीं हैं तो इसमें किसी भी रूप में सत् नहीं है। विकल्प:
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं लेकिन (R), (A) की सही व्याख नहीं है।
(c) (A) सही है‚ और (R) गलत है।
(d) (A) और (R) दोनों गलत हैं।
Ans. (b) : आगस्टाइन के अनुसार प्रत्येक सत् वस्तु शुभ है या शुभत्व की अभिव्यक्ति हैं। शुभ के न होने पर अशुभ होता है क्योंकि शुभ के न होने पर वह नहीं हो सकता है जो होना चाहिए था। आगस्टाइन के दर्शन के सन्दर्भ में यह कथन कि शुभत्व के सोपानों का सत् के सोपानों से तादात्म्य है सत्य है‚ और यह भी किसी विशेष वस्तु में यदि शुभत्व नहीं होती इसमें किसी भी रूप में सत् नहीं है‚ सत्य हैं‚ परन्तु यह पहले कथन की सही व्याख्या नहीं है।
46. ‘तीन श्रेणी के मनुष्य’ – बुद्धि के प्रेमी‚ सम्मान के प्रेम और अर्जन के प्रेमी- सिद्धांत प्रतिपादित किया गया:
(a) पाइथागोरस (b) हेराक्लाइटस
(c) अरस्तू (d) ल्यूसिपस्
Ans. (a) : साधना और ज्ञान की दृष्टि से पाइथागोरस ने व्यक्तियों को तीन श्रेणियों में विभक्त किया। उनकी तुलना ओलम्पिक में भाग लेने वाले खिलाड़ियों से की हैं। ओलम्पिक खेलों में तीन प्रकार के व्यक्ति यथा-ग्राहक (क्रेता-विक्रता)‚ खिलाड़ी‚ दर्शक भाग लेते थे जिन्हे क्रमश; निम्नतम‚ मध्यम‚ उत्तरी श्रेणी का कहा गया। उसके अनुसार संसार में भी तीन प्रकार के व्यक्ति यथा- अर्जन के प्रेमी
(लवर्स ऑवगेन)‚ सम्मान के प्रेमी (लवर्स आव ऑनर) तथा बुद्धिया ज्ञान के प्रेमी (लवर्स आव विजडम) पाये जाते हैं।
47. निम्नलिखित में से कौन सी पुस्तकें प्लेटों द्वारा लिखी गई हैं?
(i) रिपब्लिक
(ii) लॉ़ज
(iii) पॉलिटिक्स
(iv) क्रीटो
कूट:
(a) केवल (i) और (iv)
(b) केवल (ii), (iii) और (iv)
(c) केवल (ii) और (iv)
(d) केवल (i), (ii) और (iv)
Ans. (d) : ररिपब्लिक‚ लॉज‚ क्रीटो प्लेटो के द्वारा लिखित पुस्तके है। ‘पॉलिटिक्स’ अरस्तु द्वारा लिखित पुस्तक है।
48. निम्नलिखित कथनों को सावधानीपूर्वक पढ़े और फलवाद के संदर्भ में सही विकल्प का चयन करें :
अभिकथन:
(a) ‘अर्थ’ शब्द का अर्थ है बोध की प्रांजलता।
(b) अर्थ की उत्पत्ति प्रायोगिक प्रक्रिया में होती है।
(c) मन तात्त्विक वस्तु है।
(d) ज्ञान एक क्रिया है। विकल्प:
(a) ऊपर लिखे सभी कथन सही हैं।
(b) केवल (i), (ii) और (iii) सही है। लेकिन (iv) गलत है।
(c) केलव (i), (ii) और (iv) सही है लेकिन (iii) गलत है।
(d) केलव (ii), (iii) और (iv) सही है लेकिन (i) गलत है।
Ans. (c) : फलवाद (Pragmatism) का दर्शन पर्स और जेम्स की अनुभवादी मान्यताओं पर आधारित हैं जिसमें मन को तात्विक वस्तु नहीं माना जाता हैं। ‘अर्थ’ शब्द का अर्थ है बोध की प्रांजलता और इसकी उत्पत्ति प्रायोगिक प्रक्रिया में होती हैं। फलवाद में ज्ञान को एक क्रिया (activity) माना गया है।
49. सूची- I को सूची- II के साथ सुमेलित करें और नीचे दिए गए कूटों में से सही विकल्प चुनें:
सूची-I सूची-II
(A) स्पिनो़जा (i) प्रतिनिधित्ववाद
(B) देकार्त (ii) समानान्तरवाद
(C) लॉक (iii) संशयवाद
(D) ह्यूम (iv) सर्वेश्वरवाद
कूट:
(a) (C) और (i) (b) (B) और (iv)
(c) (A) और (iii) (d) (D) और (ii)
Ans. (a) : स्पिनोजा का दर्शन सर्वेश्वरवादी और समानान्तरवादी लॉक का प्रत्यय प्रतिनिधित्ववाद तथा ह्यूम का संशयवाद हैं डेकार्ट बुद्धिवाद अंतक्रियावाद और निमित्तश्वरवाद के समर्थन है।
50. सूची- I को सूची- II के साथ सुमेलित करें और नीचे दिए गए कूटों में से सही विकल्प चुनें:
सूची-I सूची-II
(A) देकार्त (i) द्वैतवाद
(B) स्पिनो़जा (ii) बहुतत्त्ववादी
(C) लाइबऩिज (iii) सर्वेश्वरवादी
(D) लॉक (iv) प्रत्ययवादी
कूट:
(a) (D) और (iv) (b) (B) और (iii)
(c) (A) और (ii) (d) (C) और (i)
Ans. (b) : देकार्त का दर्शन द्वैतवाद‚ स्पिनोजा का सर्वेश्ववारद‚ लाइबनित्ज का बहुलवाद तथा लॉक का दर्शन प्रत्यय प्रतिनिधित्ववाद है। ‘प्रत्ययवाद’ बर्कले‚ हीगेल आदि का दर्शन है। यू.जी.सी. नेट/जेआरएफ परीक्षा‚ जून-2015 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY) व्याख्या सहित तृतीय प्रश्न-पत्र का हल
1. ‘‘नाम सामान्य का अवबोध कराते हैं जो शुद्ध रूप से कल्पना प्रसूत‚ भ्रमात्मक और निषेधात्मक हैं।’’ यह मत प्रतिपादित किया गया है:
(a) धर्मकीर्ति द्वारा (b) दिङ्नाग द्वारा
(c) प्रभाकर द्वारा (d) कमलशील द्वारा
Ans : (b) बौद्ध दर्शन का ‘जाति’ अथवा ‘सामान्य’ सम्बन्धी मत अपोहवाद कहलाता है। अपोहवाद के अनुसार ‘नाम सामान्य का अवबोध करात्+ो है जो शुद्ध रूप से कल्पना प्रसूत‚ भ्रमात्मक और निषेधात्मक है।’ यह कथन आचार्य दिङनाग अपने दर्शन में प्रतिपादित करते हैं। इन्हीं को अपोहवाद का प्रतिपादक माना जाता है। ‘अपोह’ शब्द का प्रयोग दिङनाग ने अपने ग्रन्थ प्रमाण समुच्चय में एक सिद्धांत के रूप में किया है।
2. ‘जब द्रव्य अस्तित्ववान नहीं है तो गुण‚ जो इन पर आश्रित हैं‚ भी अस्तित्ववान नहीं हैं।’ यह मत है:
(a) जैनों का (b) नैयायिकों का
(c) मीमांसकों का (d) बौद्ध का
Ans : (d) बौद्ध दर्शन अनित्यवादी विचार को मानता है। उसके अनुसार प्रत्येक वस्तु प्रतिक्षण परिवर्तनशील है। संसार की जितनी वस्तुएं प्रतीत समुत्पन्न हैं। उनकी एक क्षण के लिए भी सत्ता नहीं है। कोई नित्य या कूटस्थ द्रव्य नहीं है जिसकी सत्ता हो। गुण द्रव्यों पर आश्रित माने जाते है। अत: जब द्रव्य द्रविअनित्य‚ परिवर्तनशील है तो गुण जो इन पर आश्रित हैं के अस्तित्वा में होने का प्रश्न ही नहीं उठता। ये सब कल्पना जन्य प्रत्यय है।
3. जैन विचार संप्रदाय द्वारा स्वीकार्य और समर्थित‚ निम्नलिखित में से त्रिरत्न की कौन सी श्रेणी नहीं है?
(a) सम्यक् ज्ञान (b) सम्यक् चारित्र्य
(c) सम्यक् प्रयास (d) सम्यक् दर्शन
Ans : (c) जैन-दर्शन में साधना मागे की तीन महत्वपूर्ण सधनों को तिरत्न कहा जाता है। जिनके बिना मोक्ष प्राप्ति सम्भव नहीं है। जो क्रमश: है – सम्यक दर्शन‚ सम्यक चरित्र और सम्यक ज्ञान।
4. ख्याति कोई एक ज्ञान नहीं है अपितु दो असंबद्ध अवबोधों का समुच्चय है। यह मत प्रतिपादित किया गया है:
(a) प्रभाकर द्वारा (b) कुमारिल द्वारा
(c) रामानुज द्वारा (d) उद्योतकर द्वारा
Ans : (a) प्रभाकर का भ्रम सिद्धांत अख्यातिवाद है। उनके अनुसार ख्याति कोई एक ज्ञान नहीं है‚ आपेतु दो असंबद्ध अवबोधों का समुच्चय है। भ्रम दो आंशिक ज्ञानों और उनके शिष्यों के भेद का अग्रहण या अज्ञान है। अर्थात भेदाग्रह है।
5. पूर्वमीमांसा के अनुसार निम्नलिखित में से कौन ज्ञान की नवीनता को सूचित करता है?
(a) यथार्थ (b) बाधक ज्ञानरहित
(c) अग्रहिताग्राहि (d) कारणदोषरहित
Ans : (c) पार्थसारधि मिश्र के अनुसार प्रभा को ‘प्रभा के कारण दोष रहित बाधकज्ञानरहित‚ अग्रहतग्राहि और यथार्थ होना चाहिए
(कारणदोषबाधकज्ञान-रहितमग्रहीतग्राहि ज्ञान प्रमाणमशास्त्रदीपिका)। पूर्व-मीमांशा के अनुसार‚ अग्रहिताग्राहि से तात्पर्य वह ज्ञान है जो पूर्व में अज्ञात हो अर्थात‚ नवीन हो। यह शब्द ज्ञान की नवीनता का सूचक है।
6. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित करें और नीचे दिए गए कूटों की सहायता से सही उत्तर चुने:
सूची-I सूची-II
(A) पक्षधर्मता (i) अग्नि शीतल है
(B) विपक्षसत्त्व (ii) शब्द शाश्वत है क्योंकि यह उत्पन्न होता है
(C) बाधित (iii) पर्वत पर धूम्र है
(D) विरूद्ध (iv) जलाशय में अग्नि है
कूट:
A B C D
(a) iv i iii ii
(b) i ii iii iv
(c) ii iii i iv
(d) iii iv i ii
Ans : (d) पश्रधर्मता – पक्ष में सत्ता है यथा – पर्वत पर धूम्र है। विपक्षसत्व – विपक्ष में सत्ता है यथा – जलाशय में अग्नि है। बाधित – हेतु का प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से बाधित होना यथा – अग्नि शीतल है। विरूद्ध – साध्य की सत्ता की जगह साध्य के आभाव को सिद्ध करना यथा शब्द शाश्वत है क्योंकि यह उत्पन्न होता है।
7. निम्नलिखित में से कौन-सा ऋत् के समान है?
(a) अदिति (b) इन्द्र
(c) सोम (d) उषस्
Ans : (a) ऋत् की अवधारणा के समान ही देवी आदिति की अवधारणा में भी नैतिक व्यवस्था का आधार प्राप्त होता है। आदिति संज्ञा शब्द है और इसका अर्थ बन्धन शहित्य है। इस शब्द का स्वतंत्रता मुक्ति और निसीमता के अर्थ में प्रयोग हुआ है। आदिति को आदित्यों की माता कहा गया है। इसी तरह देवताओं के लिए ऋत् जात शब्द का प्रयोग किया गया है।
8. भगवद्गीता में योग शब्द का प्रयोग इस आशय से नहीं किया गया है:
(a) समत्व (b) कौशल
(c) कर्म (d) क्रिया
Ans : (d) भगवद्गीता में योग की परिभाषा कई प्रकार से की गयी है। समत्व का ही नाम योग है। कर्मों में कुशलता को ही योग कहते हैं। क्रिया का प्रयोग योग के लिए नहीं किया गया है।
9. जैन मत में आत्मोत्थान के क्रमिक चरण जाने जाते हैं:
(a) अप्रमत्तसंयत (b) अविरत
(c) उपशान्तकषाय (d) गुणस्थान
Ans : (d) जैन दर्शन में अन्मिक गुणों के विकास की आत्मोत्थान के क्रमिक अवस्थाओं को गुणस्थान कहते हैं। गुण स्थान चौदह है। अप्रभतसेयत‚ अविरत‚ उपशान्तकषाय आदि गुणस्थान ही है। अत:
विकल्प d सही है।
10. निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म ‘भूत’ को ‘क्षर’ की तरह और ‘कूटस्थ’ को ‘अक्षर’ की तरह उद् घाटित करता है?
(a) प्रकृति-पुरुष (b) जीव-माया
(c) ब्रह्म-जीव (d) माया-जीव
Ans : (a) भगवद्गीता में सब भूतों को क्षर तथा कूटस्थ का अक्षर कहा गया है। ये तत्व सांख्य की पुरुष तथा प्रकृति के समान है। उत्तम पुरुष को इन दोनों से भिन्न परमात्मा कहा गया है। रामानुज क्षर और अक्षर का अर्थ बद्ध एवं मुक्त जीव करते है तथा शंकर क्षर का अर्थ मायाशक्ति बतलाते है। विकल्प a यहां सही है।
11. निम्नलिखित में से कौन-सा सृष्टि की प्रक्रिया को ‘यज्ञ’ के रूप में स्वीकार करता है?
(a) पुरुष सूक्त (b) नासदीय सूक्त
(c) हिरण्यगर्भ सूक्त (d) तैत्तिरीय ब्राह्मण
Ans : (a) यज्ञ की अवधारणा के विकास के साथ यज्ञ के रूप में सृष्टि प्रक्रिया का कल्पित किया गया है। पुरुष सूक्त के अनुसार‚ पुरुष की छवि बनाकर किय गये यज्ञ से ब्रह्माण्ड की समस्त वस्तु की रचने (सृष्टि) की सामग्री प्राप्त हुई। हिरण्यगर्भ में हिरण्यगर्भ प्रकृतिरूपी उपादान से सृष्टि का निर्माण करने वाला वर्णित है। नासदीयसूक्त द्वैतपरक आध्यात्मिक ज्ञान का अतिक्रमण कर उच्चतर अद्वैतवाद को स्वीकार करता है। तैत्तिरीय ब्राह्मण‚ ब्रहमन को शृष्टि का निर्माण कर्त्ता माना गया है।
12. भगवद्गीता के अनुसार निम्नलिखित में से कौन-सा ‘कर्तव्य’ और ‘अकर्तव्य’ के बीच निर्णय का प्राधिकारी है?
(a) आप्तवाक्य (b) परम्परा
(c) शास्त्र (d) स्वात्म
Ans : (c) गीमा में कहा गया है कि निष्काम भाव से‚ कलाशक्ति किो त्यागकर कर्म करने की यह शिक्षा ही गीता का मौलिक उपदेश है। ज्ञानमार्ग की तरह गीता ने इस उपदेश को भक्तिमार्ग से भी जोड़ दिया है। कर्त्ताव्याकर्त्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही तेरे प्रमाण है। यह कहकर गीता ने शाध्Eों का सम्मान भी कर लिया है।
13. भगवद्गीता के अनुसार निम्नलिखित में से कौन प्रकृति से संबंधित नहीं है?
(a) महत् (b) चैतन्य
(c) कार्त्री (d) बुद्धि
Ans : (b) गीता में प्रकृति को महद्ब्रह्म भी कहा गया है। प्रकृति‚ असृधा है – भूमि‚ जल‚ अनल‚ वायु‚ आकाश‚ मन‚ बुद्धि और अहंकार। प्रकृति के गुण ही हमारे कर्मों के लिए उत्तर दायी है। प्रकृति ही वास्तविक कार्ती है। अहंकार के वश होकर हम अपने को कर्त्ता मानते है।
14. वैशेषिक के अनुसार नित्य द्रव्य है:
(a) प्रयणुक (b) आत्मा
(c) द्वयणुक (d) कर्म
Ans : (b) वैशेषिक दर्शन में आत्मा को नित्य द्रव्य माना गया है। परमाणु के संयोग से उत्पन्न द्रयणुक‚ त्रयणुक आदि को तथा कर्म को अनित्य कहा गया है।
15. निम्नलिखित में से कौन-सा संबंध नहीं है?
(a) स्वरूप (b) अपृथक्सिद्धि
(c) गुण (d) समवाय
Ans : (a) स्वरूप कोई सम्बन्ध न होकर यह तो सम्बन्धित द्रव्य का अपना स्वभाव है। अर्थात यह सम्बन्धों का आभाव है। अपृथकसिद्धि‚ गुण‚ समवाय आदि सम्बन्ध है।
16. ‘धर्म घर के लिए आतुरता है’ के द्वारा कहा गया है:
(a) राधाकृष्णन् (b) विवेकानन्द
(c) टैगोर (d) गाँधी
Ans : (c) टैगोर के अनुसार धर्म एक प्रकार से घर से अलग हुए व्यक्ति की घर के लिए आतुरता () है। जिस प्रकार गृहातुर पहाड़ी पक्षी समय आने पर रात दिन उड़ता हुआ पहाड़ पर अपने घोसले तक पहुँचना चाहता है वैसे ही मनुष्य आत्म अपने घर वापस जाना चाहती है जहां मृत्यु नहीं है। यही घर पहुँचने की आकांक्षा धर्म है।
17. नैयायिकों के अनुसार दिक्‚ आत्मा और मनस् हैं:
(a) भौतिक (b) मूर्त
(c) भौतिक और मूर्त दोनों (d) न तो भौतिक न मूर्त
Ans : (d) नैयायिकों के अनुसार दिक्काल आत्मा‚ और मनस न तो भौतिक न मूर्त तत्व है। जबकि पृथ्वी‚ अग्नि‚ जल‚ वायु और आकाश भौतिक द्रव्य है।
18. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिए। नीचे दिए गए कूटों की सहायता से सही उत्तर का चयन कीजिए:
सूची-I सूची-II (ा)
(A) ब्रह्म (i) व्यावहारिक सत्ता
(B) स्वप्न (ii) पारमार्थिक सत्ता
(C) जगत् (iii) प्रातिभासिक सत्ता
(D) तुरीय (iv) तादात्म्य
कूट:
A B C D
(a) iii ii iv i
(b) i iv ii iii
(c) ii iii i iv
(d) i ii iv iii
Ans : (c) ब्रह्म‚ पारमार्थिक सत्ता‚ स्वप्न‚ प्रातिभासिक सत्ता‚ तुरीय तादाम्य अवस्था और जगत व्यावहारिक सत्ता है।
19. कान्तवादी नैतिक‚ दर्शन में ‘क्रिया का वस्तुपरक सिद्धांत’ कहलाता है:
(a) सूत्र (b) नियम
(c) व्यावहारिक नियम (d) आदेश
Ans : (d) काण्ट के नैतिक दर्शन में प्रक्रिया का वस्तुपरक सिद्धांत आदेश कहलाता है। जिसका वर्णन वह अपनी पुस्तक क्रिटिक ऑफ प्रेक्टिकल रीजन में करता है।
20. निम्नलिखित में से किसने आन्तरिक अनुशास्तिओं की अनुशंसा की है:
(a) बेन्थम (b) स्पेन्सर
(c) मिल (d) एपीक्यूरस
Ans : (c) मिल का नीतिदर्शन सुखवादी उपयोगितावाद है। जिसमें मिल ने बेन्थम द्वारा स्वीकृति नैतिक अंकुशों के अतिरिक्त एक अन्य अंकुश को भी स्वीकार किय है। वह है मनुष्य की परोपकार सम्बन्धी स्वाभाविक भावना। इसे मिल ने आन्तरिक अनुशक्ति की संज्ञा दिया है।
21. ‘संकल्प स्वातंत्र्य सत्य है या नैतिक निर्णय एक भ्रम’ यह कथन है:
(a) मार्टिन्यू का (b) हॉब्स का
(c) काण्ट का (d) मिल का
Ans : (a) मार्टिन्यू अंत:प्रज्ञावाद के समर्थक है। उनके अनुसार संकल्प स्वातंत्र्य सत्य है या नैतिक निर्णय एक भ्रम है।
22. ‘ईश्वरीय नियम ही चरम नैतिक नियम है’ निम्नलिखित में से किस एक का यह मत है:
(a) हॉब्स (b) देकार्त
(c) बेन (d) स्पेन्सर
Ans : (b) डेकार्ट ईश्वरीय नियमों को ही चरम नैतिक नियम कहते है। डेकार्क एक ईश्वरवादी दार्शनिक थे। वह ईश्वर में अस्तित्व को परम शुभ और सर्वशक्तिमान सत्ता मानते थे।
23. निम्नलिखित में से सही विकल्प को चिह्नित करें। पूर्णतावाद के अनुसार:
(a) मात्र सुख नैतिकता का मापदण्ड है।
(b) मात्र विवेक नैतिकता का मापदण्ड है।
(c) अन्त: अनुभूति नैतिकता का मापदण्ड है।
(d) उपयोगिता नैतिकता का सूचकांक है।
Ans : (b) पूर्णतावाद अन्त: अनुभूति को नैतिकता का मापदण्ड मानता है। यह नैतिकता को आध्यात्मिक रूप प्रदान करती है। आत्मपूर्णत‚ आत्मसाक्षात्कार‚ आत्मज्ञान को नैतिक आदर्श स्वीकार किया गया है। पूर्णतावाद में आत्मनिर्माण पर‚ स्वार्थवाद एवं परार्थवाद का समन्वय सम्भव‚ सुखवाद और कर्त्तव्यवाद में भी समन्वय पर बल दिया गया है।
24. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूटों से सही उत्तर का चयन करें:
सूची-I (लेखक) सूची-II (रचना)
(A) रॉस (i) प्रोलेगोमेना टू इथिक्स
(B) मूर (ii) फांउन्डेशन्स ऑफ इथिक्स
(C) कान्ट (iii) इथिक्स
(D) ग्रीन (iv) मेटाफिजिक्स ऑफ मॉरल्स
कूट:
A B C D
(a) ii iii iv i
(b) i iv ii iii
(c) ii iii i iv
(d) iv ii i iii
Ans : (a) रॉस‚ फाउन्डेशन्स ऑफ इथिक्स‚ मूर‚ इथिक्स‚ काण्ट‚ मेटाफिजिक्स ऑफ मारल्ज तथा ग्रीन‚ प्रोलेगोमेना टू इथिक्स।
25. अधोलिखित में से किसने कहा है ‘शुभ संकल्प के अतिरिक्त अन्य कुछ भी निरपेक्ष रूप से शुभ नहीं है’?
(a) क्लार्क (b) मार्टिन्यू
(c) सिजविक (d) कान्ट
Ans : (d) काण्ट अपने ‘शुभ-संकल्प’ सम्बन्धी सिद्धांत में‚ शुभसंकल्प को निरपेक्ष रूप से शुभ बताया है। काण्ट का नैतिकता संबंधी मत कर्त्तव्य के लिए कर्त्तव्य काण्ट के अनुसार शुभ-संकल्प से युक्त कर्म हमेशा ही शुभ होता है। यह किसी वस्तु की प्राप्ति का साधन नहीं है।
26. ‘‘मात्र कार्य का प्रयोजन ही उसके नैतिक निर्णय का आधार है’’‚ निम्नलिखित में से किस एक का यह मत है?
(a) सुखवादी (b) बुद्धिवादी
(c) अंतर्ज्ञानवादी (d) कठोरतावादी
Ans : (c) अंतर्ज्ञानवादी मत में कार्य मात का प्रयोजन ही उसके नैतिक निर्णय का आधार है। इसमें कार्य के साध्य को महत्व् नहीं दिया जाता है। इसमें कार्य के हेतु पर ध्यान दिया जाता हे। अंतर्तानवाद एक तरह का हेतुवाद है। जो कार्य के साध्य को जाने भी अंतर्ज्ञानवादी कार्य को अच्छा या बुरा कह देता है। अर्थात‚ चोरी का साध्य जाने बिना ही इसको अच्छा कह देते है।
(नीतिशास्त्र का सर्वेक्षण: संगमलाल पाण्डेय)
27. निम्नलिखित विचारकों में से किस एक ने ए-वर्ड‚ डी-
वर्ड तथा जी-वर्ड को एक परिवार माना है?
(a) मूर (b) रॉस
(c) स्पेन्सर (d) नॉवेल स्मिथ
Ans : (d) अधिनीतिशास्त्री नॉवेल स्मिथ को परामर्शवादी माना जाता है। नावेल स्मिथ का विचार है नैतिक निर्णययों का प्रयोग परामर्श देने के अतिरिक्त अन्य बहुत से कार्यों के लिए किया जा सकता है। नैतिक भाषा सम्बन्धित अपने मत में उन्होंने ए-वर्ड‚ डी-वर्ड तथा जी-वर्ड को एक परिवार माना है
28. निम्नलिखित में से किसने कहा है कि नैतिक निर्णयों में संवेगात्मक तत्व होते हैं?
(a) मूर (b) रॉस
(c) एयर (d) स्टीवेन्शन
Ans : (c) नैतिक निर्णयों में संवेगात्मक तत्व होते है यह कथन ए.जे. एयर का है। एयर नैतिक निर्णयों से सम्बन्धित मत संवेगाभिव्यक्तिवाद है। मूर गैरप्रकृतिवाद या अप्रकृतिवादी है। स्टीवेन्शन ने नैतिक अभिव्यक्ति के बजाय उत्प्रेरणा पर अधिक बल दिया है। इन्होंने भी संवेगवाद का समर्थन किया है। गैर प्रकृतिवादी या अप्रकृतिवादी अन्त:प्रज्ञावादी मूर‚ रॉस दोनों है। नीतिशास्त्र के मूल सिद्धांत : वेद प्रकाश वर्मा
29. गैलवे धर्म के प्रकार के रूप में निम्नलिखित को स्वीकार नहीं करता है?
(a) जन जातीय धर्म (b) राष्ट्रीय धर्म
(c) पूर्णव्यापी धर्म (d) आरम्भिक धर्म
Ans : (d) गैलवे धर्म के प्रकार के रूप में आरम्भिक धर्म को स्वीकार नहीं करता जबकि जनजातीय धर्म‚ राष्ट्रीय धर्म और सार्वभौमिक धर्म को स्वीकार करते है।
30. निम्नलिखित में से कौन-सा ‘ताओ’ का दोत है?
(a) आरम्भिक धर्म (b) प्रकृतिवादी धर्म
(c) मानववादी धर्म (d) उपरोक्त में से कोई नहीं
Ans : (b) ताओ क दोत प्राकृतिवादी धर्म है। ताओ धर्म चीन में उत्पन्न धर्म है। इस धर्म में प्राकृतिक अराधना होती है। ताओ के दो सम्प्रदाय ‘छवुआनचनताओ पंथ’ और ‘चड़यीताओ पंथ’। ताओ धर्म चीन का मूल धर्म और दर्शन है। इसमें सर्वोच्च देवी और देवता क्रमश: यिन और यान है। ताओ-त्सी द्वारा रचित ग्रन्थ दाओ-दे-चिंग और जुआंग-जी इस धर्म और दर्शन प्रमुख ग्रन्थ।
31. निम्नलिखित में से कौन-सी बात गाँधी के विषय में सत्य है?
(a) ईश्वर और सत्य सार्वभौमिक अवधारणाएं हैं।
(b) ईश्वर निरपेक्ष है और सत्य सापेक्ष हैं।
(c) ईश्वर और सत्य परस्पर परिवर्तनीय है।
(d) ईश्वर सत्य है और सत्य ईश्वर है।ृ
Ans : (d) गांधी जी के दर्शन में सत्य को बड़ा महत्व दिया गया है। उन्होंने सत्य को सर्वोच्च साध्य माना है। और अहिंसा को उसका साधन। उनके अनुसार‚ सत्य ईश्वर है और ईश्वर सत्य है। गांधी जी के अनुसार सत्य के अतिरिक्त ईश्वर कुछ और है तो वैसे ईश्वर की उन्हें आवश्यकता नहीं है।
32. गाँधी ‘रोटी के लिए श्रम’ के सिद्धांत में अनिवार्यत:
सम्मिलित है:
(a) मानसिक कार्य (b) शारीरिक कार्य
(c) सामाजिक कार्य (d) राजनैतिक कार्य
Ans : (b) गांधी जी के रोटी के लिए श्रम के सिद्धांत में शारीरिक श्रम अनिवार्यत: सम्मिलित है। उनका यह सिद्धांत सामाजिक असमानता को कम करने में उपयोगी होगा। जीवित रहने के लिए हर व्यक्ति को श्रम करना आवश्यक है। हर व्यक्ति को शारीरिक श्रम की गरिमा को समझना चाहिए। यह श्रम स्वेच्छापूर्ण सहयोग है।
33. गाँधी के अनुसार अहिंसा नहीं है:
(a) मानव प्रजाति का नियम
(b) मानव क्रिया की गाथा
(c) समस्त जीवन के प्रति शुभेच्छा
(d) निष्क्रिय प्रतिरोध
Ans : (d) गाँधी जी के अनुसार‚ अहिंसा निष्क्रिय प्रतिरोध नहीं है। अहिंसा सर्वप्रमुख सद्गुण है। अहिंसा सक्रिय प्रतिरोध है। यह बिना किसी को क्षति पहुँचाये हिंसक शक्ति को नियंत्रित रखने की संकल्प शक्ति है। अहिंसता निर्भयता और प्रेम है। अहिंसा समस्तकर्मों को प्रेरणा है। यह उघसीनता या निस्क्रियता की मनोवृत्ति नहीं है।
34. गाँधी विचारधारा के आर्थिक कार्यक्रम आधारित थे:
(a) आर्थिक समझ के आदर्शात्मक सिद्धांत
(b) लोगों की आवश्यकताओं के लिए उत्पादन करना
(c) आत्मनिर्भरता का आदर्श
(d) समस्त आर्थिक उत्पादन में हिस्सेदारी
Ans : (b) गांधी यह समझते हैं कि पूर्ण आर्थिक समानता का आदर्श प्राय: अप्रात्य आदर्श है। उनके अनुसार समाज की आर्थिक संरचना का आधार भी नैतिक ही होना अनिवार्य है। महात्मा गांधी के अनुसार अगर मनुष्य अपनी आवश्यकता के अनुसार उत्पादन करे तो दुनिया में कोई भूखा नहीं मरेगा।
35. वल्लभ के अनुसार ब्रह्म है:
(a) निर्गुण-मात्र (b) सगुण-मात्र
(c) निर्गुण और सगुण दोनों (d) इनमें से कोई नहीं
Ans : (b) वल्लभ सगुण ब्रह्म के उपासक है। उनके दर्शन को शुद्धाद्वैत वेदान्त कहा जाता है। शुद्धाद्वैत अर्थात माया के सम्बन्ध से रहित शुद्ध ब्रह्म का अद्वैत। वल्लभ वेदान्त में प्रमेयतत्व एकमात्र ब्रह्म है जो सर्वधर्मविशिष्ट‚ सविशेष‚ सगुण‚ शुद्ध धर्म के समान हेयगुणरहित है।
36. मध्व के अनुसार ब्रह्म और जीव का संबंध है:
(a) अभेद (b) भेद
(c) भेदाभेद (d) उपरोक्त सभी
Ans : (b) मध्व ब्रह्म और जीव में भेद सम्बन्ध को मानते है। मध्व का दार्शनिक मत द्वैतवादी वेदान्त है। वह पंचविद्य भेद को मानते है। (1) ब्रह्म का जीव से (2) ब्रह्म का जड़ से (3) जीव का जड़ से (4) जीव का जीव से तथा (5) जड़ का जड़ से भेद मानते है।
37. किस के द्वारा ‘संवृत्ति’ का ‘तथ्यसंवृत्ति’ एवं ‘मिथ्यासंवृत्ति’ में भेद किया गया है:
(a) आर्यदेव (b) दिङनाग
(c) नागार्जुन (d) चंद्रकीर्ति
Ans : (d) चन्द्रकीर्ति ने संवृत्ति को लोकसंवृत्ति (तथ्यसंवृत्ति) तथा मिथ्यसंवृत्ति में विभक्त किया है। संवृत्ति मूलाविद्या है‚ व्यक्तिगत अविद्या नही। अत: इसका निरोध निर्विकल्प प्रज्ञा द्वारा सम्भव है बौद्धिक ज्ञान द्वारा नहीं क्योंकि यह स्वयं बुद्धि-विकल्प है।
38. कूटों का प्रयोग करते हुए निम्नलिखित को सुमेलित करें:
सूची-I सूची-II
(A) शंकर (i) विष्णुतत्वविनिर्णय
(B) वल्लभ (ii) दृगदृश्य विवेक
(C) मध्व (iii) प्रस्थानरत्नाकर
(D) निम्बार्क (iv) वेदांत पारिजात कुसुम
कूट:
A B C D
(a) iii i iv ii
(b) iii iv ii i
(c) ii iii i iv
(d) iv i iii ii
Ans : (c) शंकर – दृगदृश्य विवेक वल्लभ – प्रस्थानरत्नाकर मध्व – विष्णुतत्वविनिर्णय निम्बार्क – वेदांत पारिजात कुसुम
39. शब्द संबंध मूलक हैं अत: ये मात्र सामान्य (जाति) का बोध करते हैं न कि वास्तविक (स्वलक्षण) का:
(a) आर्यदेव (b) चंद्रकीर्ति
(c) नागार्जुन (d) दिङनाग
Ans : (d) शब्द संबंधमूलक है अत: ये मात्र सामान्य (जाति) का बोध करते है न कि वास्तविक (स्वलक्षण) का यह कथन दिङनाग का है। दिङनाग का सामान्य सम्बन्धी मत अपोहवाद है।
(भारतीय दर्शन: डॉ. नन्द किशोर देवराज)
40. हरमन्यूटिक्स को अपने आप को ज्ञानमीमांसीय समस्याओं की व्याख्या तक सीमित कर लेना चाहिए तथा मानव अस्तित्व की गहन अवस्थाओं में संलिप्त होने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए। यह मत है:
(a) पॉल रिकर (b) एमीलिओ बेट्टी
(c) हैबरमास (d) देरीदा
Ans : (b) हरमन्यूटिक्स को अपने आप को ज्ञानमीमांसीय समस्याओं की व्याख्या तक सीमित कर लेना चाहिए तथा मानव अस्तित्व की गहन अवस्थाओं में संलिप्त होने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए। यह कथन एमीलिओ बेट्टी का है।
41. निम्नलिखित में से किसने व्याकरणिक व्याख्या और मनोवैज्ञानिक व्याख्या के बीच भेद किया है?
(a) विल्हेल्म डिल्थे (b) फ्रेडरिक श्लेयमाकर
(c) गैडेमर (d) हैडेगर
Ans : (b) फ्रेडरिक श्लेयमाकर अपने हर्म्युनिटिक्स में व्याकरणिक व्याख्या और मनोवैज्ञानिक व्याख्या के बीच अन्तर क्रिया है। उन्हें रोमांटिक हर्म्युनिटिक्स का समर्थक कहा जाता है।
42. सत्य प्रणालीबद्ध संसक्त समग्रता का एक अनिवार्य संघटक है- यह मत हो सकता है:
(a) सत्य के व्यावहारवादी सिद्धांत का
(b) सत्य के संवाद सिद्धांत का
(c) सत्य के संसक्तता सिद्धांत का
(d) सत्य के संबंधमूलक सिद्धांत का
Ans : (c) सत्य का संसक्तता सिद्धांत के अनुसार सत्य प्रणालीबद्ध संसक्त समग्रता का एक अनिवार्य संघटक है। संसक्तता या सुसंगति सिद्धांत के अनुसार‚ कोई संप्रत्यय अथवा विश्वास तभी सत्य हो सकता है। जब वह पूर्वमान्य एवं पहले से स्थापित विश्वासों के साथ सामंजस्य रखता हो अर्थात उनके विरूद्ध न हो।
43. निम्नलिखित दार्शनिकों में किस का मत है कि सत्यता का संवाद सिद्धांत तथ्य के संघटक तथा प्रतिज्ञपित के संघटक के बीच का तादात्म्य है?
(a) फ्रेगे (b) रसेल
(c) कार्नेप (d) क्वाइन
Ans : (b) रसेल सत्य के संवादिता के तार्किक सिद्धांत का समर्थक हैं। उनके अनुसार किसी प्रतिज्ञप्ति की सत्यता का अर्थ तथ्यों से संवाद है‚ न कि अनुभव से संवाद। यदि प्रतिज्ञप्ति के संघटक तथा तथ्य के संघटक के बीच तादाम्य है तो वह संवादिता सिद्धांत
44. निम्नलिखित में से कौन-सा ‘अत्यन्ताभाव’ की संकल्पना की सही तरह से उद्घाटित करता है?
(i) वायु में रंग का पूर्ण अभाव।
(ii) दो वस्तुओं के बीच भूत‚ वर्तमान और भविष्य में संबंध का अभाव।
(iii) इस अभाव का एक आरंभ होता है किन्तु अंत नहीं होता।
कूट:
(a) केवल (i) और (iii) सही है।
(b) केवल (i) और (ii) सही है।
(c) केवल (i) सही है।
(d) केवल (ii) सही है।
Ans : (b) अत्यन्ताभाव संसर्ग का नित्य आभाव है। अर्थात किसी भी प्रकार के संसर्ग (संबंध) के त्रकालिक आभाव को अत्यन्ताभाव कहां है। जैसे- वायु में रंग का पूर्ण आभाव। वायु में रंग – रूप आदि का वैकालिक आभाव होता है। अत: यहां अत्यन्तभाव है। अत्यन्ताभाव दो वस्तुओं के बीच भूत‚ वर्तमान और भविष्य में संबंध का अभाव है। इस आभाव का न आरम्भ होता है और न ही अंत होता है।
45. निम्नलिखित में से कौन-सा मत अवस्तुवादियों का है?
(a) इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि प्रत्येक घोषणा वाक्य निश्चित रूप से सत्य या असत्य होता है।
(b) प्रत्येक घोषणा वाक्य निश्चित रूप से सत्य या असत्य होता है।
(c) प्रत्येक घोषणा वाक्य सदैव सत्य होता है।
(d) प्रत्येक घोषणा वाक्य सदैव असत्य होता है।
Ans : (a) अ-वस्तुवादी (Anti-realism)‚ इस बात की कोई गारण्टी नही कि प्रत्येक घोषणा वाक्य निश्चित रूप से सत्य या असत्य हो।
46. फ्रेगे के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें और सही कूट चिह्नित करें।
(i) फ्रेगे संदर्भ और अभिव्यक्ति की समझ के बीच भेद प्रस्तुत करता है।
(ii) वस्तुएँ वह हैं जिनके लिए नाम विशेष प्रयुक्त हैं।
(iii) उसने परिमाणीकरण के सिद्धांत की खोज की।
कूट:
(a) केवल (i) और (ii) सही है।
(b) केवल (i) और (iii) सही है।
(c) केवल (iii) सही है।
(d) सभी (i)‚ (ii) और (iii) सही है।
Ans : (d) फ्रेगे के अनुसार नाम एवं वर्क वाक्य दोनों में अर्थ एवं निर्देश होता है। तादात्म्य कथनों को सार्थक कथन बतलाने के लिए फ्रेगे ने यह विभेद किया है। वस्तुएं वह है जिनके लिए नाम विशेष प्रयुक्त है। उसने परिमाणीकरण के सिद्धांत की खोज की।
47. निम्नलिखित में किस दार्शनिक द्वारा मानव अधिकारों की अवधारणा की आलोचना यह कह कर की जाती है कि ‘‘ऐसा कोई भी अधिकार तथा विश्वास नहीं है तथा इसमें विश्वास करना वैसा ही है जैसे चुडैलों और एकशृंग में विश्वास करना।’’
(a) जेरेमी बेन्थम (b) एल्सडेयर मैकेन्टेयर
(c) एडमण्ड बर्क (d) जॉन लॉक
Ans : (b) जान लॉक मानव अधिकारों का प्राकृतिक अधिकार कहता है। लेकिन एल्सडेयर मैकेनृेयर ने इसको आलोचना करते हुए कहता है कि ऐसा कोई भी अधिकार तथा विश्वास नहीं है इसमें विश्वास करना वैसा ही है जैसे चुड़ैलों और एक शृंग में विश्वास करना।
48. न्यायमत के अनुसार अणु निष्क्रिय और गतिहीन हैं यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है:
(i) आत्मा में रहने वाले धर्म एवं अधर्म के अनुरूप अदृष्ट द्वारा अणुओं में गति प्रदान की जाती है।
(ii) अणुओं का संयोग ज्यामितीय प्रगति में होता है न कि अंक अणितीय तरीके में।
(iii) भौतिक व्यवस्था के पीछे एक नैतिक व्यवस्था होती है।
कूट:
(a) (i) एक वैध अनुमान है।
(b) (ii) एक अवैध अनुमान है।
(c) (i), (iii) एक वैध अनुमान है।
(d) (i), (ii), (iii) वैध अनुमान है।
Ans : (d) (i), (ii), (iii) वैध अनुमान है। न्यायमत में अणुओें का निस्क्रिय और गतिहीन माना जाता है। जिसके परमात्मा‚ अदृष्ट से गति लेकर संचालित करता है। अदृष्ट नैतिक व्यवस्था है।
49. उस कूट को चिन्हित करें जिसमें सही अभिकथन न हो:
(a) एक संयोजक सत्य है यदि इसके सभी संघटक सत्य हैं अन्यथा यह असत्य है।
(b) प्रत्येक यौगिक अभिकथन एक सत्यता-फलन अभिकथन होता है।
(c) द्विमूल्याश्रित तर्कशास्त्र में प्रत्येक अभिकथन या तो सत्य होता हैं या असत्य।
(d) एक सरल अभिकथन वह अभिकथन है जिसका संघटक इसके भाग के रूप में अन्य कोई अभिकथन नहीं होता।
Ans : (-) सत्य कथन (a)‚ (c)‚ (d) असत्य कथन (b) प्रत्येक यौगिक अभिकथन एक सत्यता-फलन अभिकथन है।
50. निम्नलिखित में से किसके अनुसार देश और काल प्रागनुभविक प्रत्यक्ष हैं?
(a) ह्यूम (b) काण्ट
(c) लाइब्नित्स (d) आईस्टीन
Ans : (b) काण्ट अपने दर्शन में देश-काल को प्रागनुभाविक प्रत्यक्ष मानता है। वह इन्हें संवेदना शक्ति तथा संवेदन द्वार कहता है। काण्ट देश-काल को प्रत्यक्ष के आकार मानता है। उसके अनुसार देश काल स्वरूपता अनुभव न होकर प्रागनुभविक है। किन्तु वे संप्रत्यय न होकर शुद्ध संवेदनाएं है।
51. उपमान के संदर्भ में सही अभिकथन का परीक्षण करें तथा सही कूट का चयन करें।
(i) वेदान्ती तर्क देते हैं कि उपमान आधार वाक्यों से निगमित किया जा सकता है।
(ii) सांख्या संप्रदाय के चितंकों के अनुसार उपमान का आविर्भाव प्रत्यक्ष में संभव है।
(iii) न्याय मतानुसार उपमान एक शब्द और उसके द्वारा इंगित वस्तु के बीच के संबंध का ज्ञान है।
कूट:
(a) केवल (i) और (ii) सही है।
(b) केवल (ii) और (iii) सही है।
(c) केवल (iii) सही है।
(d) सभी (i)‚ (ii) और (iii) सही है।
Ans : (d) भारतीय दर्शनों में उपमान को प्रमाण माना गया है। न्यय दर्शन में उपमान को स्वतंत्र प्रमाण के रूप में माना गया है। वैदान्त दर्शन में उपमान को स्वतंत्र प्रमाण माना गया है। वेदान्तियों के अनुसार उपमान का निगमन आधार वाक्यों से किया जा सकता है। सांख्य दर्शन में उपमान को स्वतंत्र प्रमाण न मानकर उसका अविर्भाव प्रत्यक्ष प्रमाण में कर लिया गया है। जबकि न्याय मतानुसार उपमान एक शब्द और उसके द्वारा इंगित वस्तु के बीच तुलनात्मक संबंध का ज्ञान है।
52. दिये गये अभिकथन (A) और तर्क (R) की परीक्षा आगमनात्मक अनुमान के आलोक में करें और नीचे दिये गये कूट में से सही का चयन करें।
अभिकथन (A) :
आगमनात्मक अनुमान में ज्ञात से अज्ञात की ओर जाते हैं।
तर्क (R) : आगमनात्मक अनुमान में किसी जाति विशेष के सभी सदस्यों के निर्णय के द्वारा उस जाति विशेष के सभी सदस्यों के बारे में निर्णय तक पहुँचते है।
कूट:
(a) दोनों (A) तथा (R) सही हैं और (R)‚ (A) की सही व्याख्या है।
(b) दोनों (A) तथा (R) सही हैं‚ और (R)‚ (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही है‚ और (R) गलत है।
(d) (R) सही है‚ और (A) गलत है।
Ans : (c) आगमनात्मक अनुमान में हम ज्ञात विशिष्ट तर्कवाक्यों से सामान्य/व्यापक अज्ञात की ओर अग्रसर होते है। कथन (A) सही है लेकिन कथन (R) गलत है।
53. किसका मत है कि द्रव्य‚ गति‚ देश और काल सापेक्षताएँ हैं?
(a) न्यूटन (b) आइन्स्टीन
(c) ह्यूम (d) लाइबनिज
Ans : (b) आइन्सटीन द्रव्य‚ गति‚ देश और काल को सापेक्षताएं कहते है। उनका सिद्धांत सापेक्षतावादी है। न्यूटन के अनुसार देश और काल पारमार्थिक दृष्टिवास्तविक और स्वतंत्रता सत्ता है। लाइवनित्ज देश-काल में वस्तुओं का संबंध मानते है और उन्हें व्यावहारिक दृष्टि से अयथार्थ मानते है।
54. मिल के अनुसार निम्नलिखित में कौन-सा ‘एकरूपता’ का प्रकार नहीं है। सही विकल्प को चिह्नित करें।
(a) अनुक्रम की एकरूपता
(b) विज्ञान की एकरूपता
(c) सह-अस्तित्व की एकरूपता
(d) समानता की एकरूपता
Ans : (b) मिल के अनुसार एकरूपता का प्रकार हे-
(1) अनुक्रम‚ (2) सह अस्तित्व‚ (3) समानता की एकरूपता।
55. नैतिक निर्णय का आधार कर्म फल है। निम्नलिखित में से किस एक का यह मत है?
(a) सुखवादी (b) अंतर्ज्ञानवादी
(c) कठोरतावादी (d) आदर्शवादी
Ans : (a) नैतिक निर्णय का आधार कर्म फल को मानने वाला नैतिक संप्रदाय सुखवादी है। यदि कोई कर्म कर्त्ता के लिए सुखनुभूति को सम्भव बनाता है तो वह कर्म नैतिक दृष्टि से अच्छा कर्म है। और यदि कोई कर्म वैसा नही है तो वह बुरा होगा।
56. ऑस्टिन जब संवाद का विवरण प्रस्तुत कर रहे होते हैं तब निम्नलिखित में से किसके बीच भेद करते हैं?
(a) डिस्क्रिप्टिव एण्ड डेमाँनस्ट्रेटिव कन्वेंशन्स
(b) डिस्क्रिप्टिव एण्ड कोरिलेटिव कन्वेंशन्स
(c) डेमाँस्ट्रेटिव एण्ड लोक्युशनरी कन्वेंशन्स
(d) लोक्युशनरी एण्ड परलोक्युशनरी कन्वेंशन्स
Ans : (a) ऑस्टिन जब संवाद का विवरण प्रस्तुत कर रहे होते हैं तो डिस्क्रिप्टिव एण्ड डेमॉन्स्ट्रेटिव कन्वेंशन्स के बीच अन्तर करते हैं। ऑस्टिन भी विट्गेसटाइन और राइल की भाँति भाषा विश्लेषण प्रस्तुत करता है। सर्वप्रथम उसने भाषा के दो गुप्त प्रयोगों में अन्तर्गत करता है- शाश्वत (Constrative) तथा सम्पादनात्मक
(Performance) अभिव्यक्तियां।
57. निम्नलिखित में से कौन दार्शनिक फ्रेगे के स्वाभाविक अंकों के श्रेणी निर्माण की विधि की मात्र तार्किक धारणाओं के कारण आलोचना करता है?
(a) विट्गेन्स्टाइन (b) ऑस्टिन
(c) बट्रेंण्ड रसेल (d) स्ट्रॉसन
Ans : (c) बर्ट्रेण्ड रसल दार्शनिक फ्रेगे के स्वाभाविक अंको की श्रेणी निर्माण की विधि की मात्र तार्किक घटनाओं की आलोचना करता है। रसेल का मत तार्किक अनुवाद और फ्रेगे का मात्र तर्कान्तर्भूटगाण्डिहवाद (Logi) है।
58. रसेल के अनुसार ‘डिनोटिंग फ्रेजेज’ वे मुहावरे हैं:
(a) जो पूर्णार्थक है।
(b) जिनका स्वयं में कोई अर्थ नहीं होता है।
(c) तर्कवाक्य से स्वतंत्र अर्थ वाले है।
(d) स्वयं में अर्थ रखते हैं।
Ans : (c) रसेल के अनुसार ‘डिनोटिंग फ्रेजेज’ के मुहावरे है जिनका स्वयं में कोई अर्थ नहीं है। लेकिन यह हो सकता है जिन वाक्यों में उनका प्रयोग हो वह वाक्य अर्थपूर्ण हो। रसेल के अनुसार ऐसे वाक्यांश केवल अपने भारतीय आकार से कुछ कहते है‚ वस्तुत: अपने में कोई वस्तु सूचित नहीं करते। समकालीन पाश्चात्य दर्शन – बसन्त कुमार लाल
59. तर्क निष्ठ भाववाद के अनुसार ‘प्रोटोकाल स्टेटमेंट’ सन्दर्भित करते हैं:
(a) पूर्णत: आनुभाविक अभिकथन को
(b) साधारण सम्बन्धात्मक को
(c) प्राथमिक अभिकथन को
(d) लाक्षणिक अभिकथन को
Ans : (c) कारनैप के अनुसार अर्थपूर्ण भाषा अर्थपूर्ण इसी कारण है कि उसके आधार कुछ ऐसे निरीक्षण वाक्य या स्वानुभवमूल वाक्य
() या प्रोटोकॉल स्टेटमेंट है जो उसके सत्यापन के आधार है। तार्किक भाववाद में प्रोटोकॉल स्टेटमेंट प्राथमिक अभिकथन के सन्दर्भ में प्रयुक्त हुआ है।
60. आगमन के सन्दर्भ में सही कथनों पर विचार करें और सही कूट का चयन करें।
(i) जे. एस. मिल आगमन को अनिवार्यत: एक प्रमाणदायी प्रक्रिया मानते हैं।
(ii) ह्वेवेल इसे अनिवार्यत: अन्वेषण मानते है।
(iii) चार्ल्स पीयर्स इसे सामान्यीकरण के रूप में देखते हैं तथा इसे अनुमान के विरूद्ध कहते हैं।
कूट:
(a) केवल (i) और (ii) सही हैं।
(b) केवल (i) और (iii) सही है।
(c) सभी (i)‚ (ii) और (iii) सही है।
(d) केवल (iii) सही है।
Ans : (c) जे.एस. मिल आगमन को अनिवार्यत: प्रमाणदायी प्रक्रिया मानते है। ह्वेल इसे अनिवार्यत: अन्वेषण मानते है। चार्ल्स पियर्स इसे सामान्यीकरण के रूप में देखते है तथा इसे अनुमान के विरूद्ध कहते है। जबकि ह्यूम आदि दार्शनिक आगमन की प्रक्रिया पर ही सन्देह करते है।
61. निम्नलिखित में से कौन सा अभिकथन संशयवादी को स्वीकार नहीं है?
(a) कोई भी निरपेक्ष‚ प्रश्नातीत‚ पूर्ण ज्ञान संभव नहीं है।
(b) जब प्रमाण अनिश्चित हो‚ निर्णय को स्थगित रखा जाना चाहिए।
(c) ऐसे निश्चित और शाश्वत मूलय हैं जो समय और स्थान से निरपेक्ष रहते हैं।
(d) प्रश्नात्मकता और संशयात्मकता ज्ञान प्राप्ति के साधन के रूप में है।
Ans : (c) संशयवादी किसी भी वस्तु की निश्चयता और शश्वता पर संशय करता है। संशयवाद किसी भी वस्तु के अस्तित्व में पूर्ण विश्वास नहीं करता है। उसके अनुसार कोई भी निरपेक्ष‚ प्रश्नतीत‚ पूर्ण ज्ञान संभव नहीं है। प्रश्नात्मकता और संशयात्मकता ज्ञान प्राप्ति के साधन के रूप में है।
62. प्लेटो के संदर्भ में निम्नलिखित में कौन-सा अभिकथन सही है/हैं? सही कूट का चयन करें।
(i) न्याय आत्मा का गुण हे।
(ii) सामुहिकता की आत्मा को व्यक्ति को व्याप्त करना चाहिए।
(iii) नैतिकता शाश्वत परंपरामात्र नहीं है।
कूट:
(a) केवल (i) सही हैं।
(b) केवल (ii) सही है।
(c) केवल (i) और (iii) सही है।
(d) (i), (ii) और (iii) सही है।
Ans : (d) प्लेटो न्याय को आत्मा का गुण मानता है। उसके अनुसार सामुहिकता की आत्मा को व्यक्ति का व्याप्त करना चाहिए। नैतिकता को प्लेटो शाश्वत परम्परागत नहीं मानता।
63. सूची-I के संदर्भ में सूची-II से सुमेलित कीजिए और सही कूट का चयन करें। सूची- I सूची- II
(A) वैयक्तिक प्रत्ययवाद (i) सीमीत आत्मा एक का अंश‚ प्रकार अथवा अभास है।
(B) एकतत्व प्रत्ययवाद (ii) मूर्तसत्ता वैयक्तिक आत्मत्व है।
(C) आत्मनिष्ठ प्रत्ययवाद (iii) वस्तुओं के आदर्श रहित रूपों की यथार्थता को स्थापित करते है।
(D) यथार्थवादी प्रत्ययवाद (iv) प्रकृति सीमित मन का प्रक्षेपण मात्र है।
कूट:
(A) (B) (C) (D)
(a) iv iii ii i
(b) ii iv i iii
(c) ii i iv iii
(d) i ii iii iv
Ans : (c)
(A) वैयक्तिक प्रत्ययवाद (ii) मूर्तसत्ता वैयक्तिक आत्मत्व है।
(B) एकतत्व प्रत्ययवाद (i) सीमीत आत्मा एक का अंश‚ प्रकार अथवा अभास है।
(C) आत्मनिष्ठ प्रत्ययवाद (iv) प्रकृति सीमित मन का प्रक्षेपण मात्र है।
(D) यथार्थवादी प्रत्ययवाद (iii) वस्तुओं के आदर्श रहित रूपों की यथार्थता को स्थापित करते है।
64. प्रत्यक्ष स्वलक्षण का भ्रमरहित ज्ञान है‚ यह मत है:
(a) बौद्धों का (b) प्रभाकर का
(c) नैयायिकों का (d) वेदांतियों का
Ans : (a) बौद्ध दर्शन में दो प्रमाण माने गये है – प्रत्यक्ष‚ अनुमान। प्रतिक्षण परिवर्तित पदार्थों को बुद्धि रचित मानने वाले आचार्यदिङनाग ने प्रत्यक्ष का विषय केवल स्वलक्षणों को माना है। स्वलक्षण को वो समस्त कल्पनाओं से रहित मानते है।
65. ‘पर्याप्त हेतु का नियम’ का प्रतिपादक कौन है?
(a) अरस्तु (b) प्लेटो
(c) लाईब्नित्स (d) काण्ट
Ans : (c) पर्याप्त हेतु (कारणता) का नियम लाईब्नित्स ईश्वर अस्तित्व के प्रमाण के लिए प्रतिपादित करता है। लाईब्नित्स के अनुसार केवल वही वस्तु सत्य है जिसका पर्याप्त कारण हो। इसी प्रकार इस शृष्टि का भी कोई पर्याप्त कारण होना चाहिए। शृष्टि का यह पर्याप्त कारण ईश्वर ही हो सकता है। लाईब्नित्स का दिया गया यह तर्क प्रथम कारण के स्थान पर पर्याप्त कारण की मान्यता पर आधारित है।
66. दी गई युक्ति की परीक्षा करें और नीचे दिए गए कूटों में से तर्कदोष के सही नाम का चयन करें। यूक्ति:
सभी घोड़े चौपाया हैं। कोई भी बैल घोड़ा नहीं है। कोई भी बैल चौपाया नहीं है।
कूट:
(a) अनुचित बृहत-पद-दोष
(b) अनुचित मध्य-पद-दोष
(c) अनुचित लघु-पद-दोष
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Ans : (a) दी गई उपरोक्त युक्ति में अनुचित वृहत-पद () दोष है। क्योंकि वृहत पद आधार वाक्यों में व्याप्त नहीं है। जो नियम-3 वैध निरपेक्ष न्यायवाक्य में कोई भी ऐसा पद निष्कर्ष में व्याप्त नहीं हो सकता जो आधारवाक्यों में न व्याप्त हो/का उलंघन है।
67. ‘तर्क वाक्यों के विरोध’ के अनुसार यदि तर्क वाक्य‚ ‘गर्मी के दिन सामान्यत: गर्म होते हैं’ सत्य है तो तर्क वाक्य ‘गर्मी के सीभी दिन गर्म है’ होगा:
(a) सत्य (b) असत्य
(c) संदिग्ध (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Ans : (c) परम्परागत विरोध वर्ग के अनुसार‚ ‘गर्मी के दिन सामान्यत: गर्म होते है।’ को अंशव्यापी स्वीकारात्मक ‘’तर्कवाक्य माना जा सकता है। वहीं गर्मी के सभी दिन गर्म है को सर्वव्यापी स्वीकारत्मक तर्कवाक्य माना जा सकता है। ‘’ और ‘’ में उपाश्रयण उपाश्रित सम्बन्ध है। लेकिन इस विरोध वर्ग के अनुसार यदि सत्य होगा तो संदिग्ध हो जायेगा।
68. एक युक्ति में अनिवार्यत: होते हैं:
(a) आकार और प्रतिज्ञप्ति
(b) सत्यता और आकार
(c) सत्यता और असत्यता
(d) आकार‚ प्रतिज्ञप्ति और सत्यता
Ans : (a) प्रत्येक युक्ति में एक आकार और कुछ प्रतिज्ञप्तियां होती है। जिनके आधार पर निष्कर्ष निगर्मित किया जाते है। यह अनिवार्य है।
69. तर्कवाक्य ‘‘मक्खियाँ और ततैया डंक तभी चुभोती हैं जब वे या तो क्रुद्ध अथवा डरी हुई हों’’ का सही प्रतीकात्मक रूप निम्नलिखित में से कौन है? (Ax, Wx, Sx, Ax, Fx)
(a) (∃x){(Bx,Wx) ⊃ [(Ax ∨ Fx) ⊃ Sx]}
(b) (x) (Bx ∨Wx) ⊃ [(Ax ∨ Fx) ⊃ Sx]}
(c) (x) (Bx ∨Wx) ⊃ Ax ∨ Fx ⊃ Sx
(d) (x) (Bx ∨Wx) ⊃ (Ax ∨ Fx) ⊃ Sx
Ans : (b) Bx = ‘Bees’, Wx = Waps, Sx = Sting, Ax = Angry, Fx = Frightined मक्खियां (Bees) और ततैया (Waps) डंक तभी चुभोती (Sting) है जब या तो क्रुद्ध (Angry) अथवा डरी (Frightened) हुई हो। का प्रतीकात्मक रूप है-
(x) (Bx ∨Wx) ⊃ [(Ax ∨ Fx) ⊃ Sx]}
70. नीचे दी गई युक्ति की परीक्षा करें और सही कूट को चिह्नित करें। P U T S T U P Q R ∴ ⊃−⊃⊃ ∨( . )
( )
कूट:
(a) मान्य (b) अमान्य
(c) सत्य (d) असत्य
Ans : (b) अमान्य है। यह युक्ति आकार ही अवैध है।
71. युक्ति I और युक्ति II को सावधानी पूर्वक पढ़ें और सही कूट को चिह्नित करें। युक्ति I : यदि वहाँ धूम्र है तो अग्नि है। वहाँ धूम्र नहीं है। इसलिए वहाँ अग्नि नहीं है। युक्ति II: मृत्यु जीवन का अंत है। जीवन का अंत पूर्णता है। इसलिए मृत्यु पूर्णता है।
(a) युक्ति I पूर्ववर्ती निषेध दोष है तथा II एक वैध युक्ति है।
(b) I वैध है तथा II में मध्य पद निषेध दोष है।
(c) I और II दोनों वैध युक्तियाँ हैं।
(d) युक्ति I में पूर्ववर्ती निषेध दोष है तथा युक्ति II में चतुष्पादी दोष है।
Ans : (d) युक्ति I का युक्त आकार P ⊃ Q ~ P ~Q यह युक्ति आकार पूर्ववर्ती निषेध दोष से ग्रस्त है। युक्ति (II) में मृत्यु‚ जीवन का अंत‚ पूर्णता‚पक्ष का प्रयोग हुआ है। परन्तु मृत्यु के सन्दर्भ में जीवन का अंत का एक अर्थ और पूर्णत:
के सन्दर्भ में दूसरा अर्थ है। अत: यहां चतुष्पदो दोष है।
72. निम्नलिखित में से कौन प्रथम आकार का वैध योग्य नहीं है?
(a) बारबरा (b) दरिआई
(c) क्लारेंट (d) बारोको
Ans : (d) बारोको प्रथम आकार का वैध योग्य नहीं है।
73. सूची को सूची से सुमेलित करें तथा दिए गए कूट में से सही का चयन करें। सूची- I सूची- II
(A) p.q (i) मोडस पोनेंस ∴ p
(B) p>q (ii) कंस्ट्रक्टीव डाइलेमा p ∴ q
(C) p (iii) सिम्प्लीफिकेशन ∴ p∨q
(D) (p>q).(r>s) (iv) ऐडीशन p∨r ∴ q∨s
कूट:
(A) (B) (C) (D)
(a) iii ii iv i
(b) iii i iv ii
(c) iv ii iii i
(d) iii ii i iv
Ans : (b)
(A) p.q (iii) सिम्प्लीफिकेशन ∴ p
(B) p>q (i) मोडस पोनेंस p ∴ q
(C) p (iv) ऐडीशन ∴ p∨q
(D) (p>q).(r>s) (ii) कंस्ट्रक्टीव डाइलेमा p∨r ∴ q∨s
74. उस कूट को चिह्नित करें जो रूल ऑफ इन्फरेंस को नहीं बतला रहा है:
(a) हाईेपोथेटिकल सिलोजज्म
(b) डिस्जंक्टिव सिलोजज्म
(c) केटागोरिकल सिलोजज्म
(d) सिम्प्लाअेफिकेशन
Ans : (*)
75. इकोफेमेनिज्म का समर्थन निम्नलिखित में से कौन करता है?
(a) वंदना शिवा और मारिया माइस
(b) वंदना शिवा और सिमोन दि बुवा
(c) मारिया माइस और सिमोन दि बुवा
(d) सिमोन दि बुवा और महाश्वेता देवी
Ans : (*)

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