You are here
Home > Previous Papers > यूजीसी नेट/जेआरएफ परीक्षा‚ जनवरी-2017 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY) व्याख्या सहित द्वितीय प्रश्न-पत्र का हल UGC NTA NET JRF Philosophy Previous Papers in Hindi 005.

यूजीसी नेट/जेआरएफ परीक्षा‚ जनवरी-2017 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY) व्याख्या सहित द्वितीय प्रश्न-पत्र का हल UGC NTA NET JRF Philosophy Previous Papers in Hindi 005.

UGC NTA NET JRF Philosophy Previous Papers in Hindi यूजीसी नेट/जेआरएफ परीक्षा‚ जनवरी-2017 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY) व्याख्या सहित द्वितीय प्रश्न-पत्र का हल

1. वैदिक परंपरा में पृथ्वी का संचरण निम्नलिखित में से किसके द्वारा नियंत्रित था?
(a) ब्रह्म (b) ईश्वर
(c) ऋत (d) सूर्य
Ans. (c) : वैदिक परम्परा में सभी तरह के ब्रह्माण्डीय पिण्डों का संचरण ‘ऋत’ द्वारा नियंत्रित था। ‘ऋत’ को एक शाश्वत और नैतिक व्यवस्था के रूप में भी जाना जाता था। वरुण को ‘ऋतस्य गोप्ता’ अर्थात प्राकृतिक एवं नैतिक नियमों के संरक्षक रूप में देखा गया है। ऋत के कारण ही सूर्य‚ चन्द्र‚ ग्रह (पृथ्वी आदि)‚ नक्षत्र आदि की गतिविधि संचालित है।
(भारतीय दर्शन का सर्वेक्षण-संगम लाल पाण्डेय)
2. वैदिक परंपरा में निम्नलिखित में से किस प्रकार के ऋण से यज्ञ के अनुष्ठान के द्वारा उऋण हुआ जा सकता है?
(a) ऋषिऋण (b) देवऋण
(c) पितृऋण (d) पृथ्वीऋण
Ans. (b) : देव-ऋण‚ ऋषि-ऋण और पितृ-ऋण को वैदिक परम्परा में माना गया था। देवों के प्रति कर्त्तव्य की पूर्ति यज्ञ के सम्पादन से होती है। ऋषि-ऋण का तात्पर्य है कि प्राचीन पुरुषों के प्रति सांस्कृतिक दाय के लिए ऋण है‚ जिसे हम स्वाध्याय के द्वारा उस परम्परा को ग्रहण कर‚ उसे आगे की पीढ़ी तक पहुँचाकर अनृण हो सकते हैं। अर्थात् ब्रह्मचर्य पालन से इससे उऋण हुआ जा सकता है। ‘पितृ-ऋण’ से अनृण्य सनृति के सूत्र को आगे बढ़ाकर प्राप्त किया जा सकता है।
(भारतीय दर्शन- डॉ. नन्द किशोर देवराज)
3. जैन विचारधारा में ‘पर्याय’ शब्द निम्नलिखित में से किसका उल्लेख करता है?
(a) आगन्तुक धर्म (b) नित्य धर्म
(c) मन: पर्याय (d) नय
Ans. (a) : जैन दर्शन में प्रत्येक द्रव्य के दो प्रकार के धर्म होते हैं-
(1) स्वरूप अथवा नित्यधर्म (2) आगन्तुक अथवा परिवर्तनशील धर्म। नित्य धर्म में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं होता‚ परन्तु आगन्तुक धर्मो का उस वस्तु से सदैव ही संबंध एवं विच्छेद होता रहता है। जैन-दार्शनिक स्वरूप धर्मो को गुण और आगन्तुक धर्मो को पर्याय कहते हैं।
(भारतीय दर्शन का सर्वेक्षण- संगम लाल पाण्डेय)
4. नीचे दिए गए दो कथनों में एक को अभिकथन (A) और दूसरे को तर्क (R) की संज्ञा दी गई है।
चार्वाक दर्शन के संदर्भ में इन पर विचार करते हुए नीचे दिए गए कूटों में से सही का चयन कीजिए:
अभिकथन (A): मृत शरीर को चेतन होना चाहिए
तर्क (R): चेतना शरीर का एक गुण है।
कूट:
(a) (A) और (R) दोनों सत्य हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सत्य है और (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सत्य है और (R) असत्य है।
(d) (A) असत्य है और (R) सत्य है।
Ans. (d) : चार्वाक दर्शन में ‘मृत्युरेव अपवर्ग’ अर्थात् मृत्यु को ही अपवर्ग माना गया है। मृत्यु के बाद चेतना विलुप्त हो जाती है और शरीर का नाश हो जाता है। चार्वाक दर्शन में ‘चेतना’ को शरीर का एक गुण माना गया है। अत: मृत शरीर से चेतना का लोप हो जाता है। अभिकथन (A) असत्य है और तर्क (R) सत्य है।
(भारतीय दर्शन का सर्वेक्षण- संगम लाल पाण्डेय)
5. निम्नलिखित में से किसका मानना है कि नीला रंग और नीले रंग का ज्ञान एक है और समान है?
(a) बृहस्पति (b) वसुबंधु
(c) भासर्वज्ञ (d) प्रभाकर
Ans. (b) : विज्ञानवाद पहले तो ‘सहोपलम्भनियम’ के आधार पर अर्थाभाव सिद्ध करता है; उसका कथन है कि ‘नीला रंग’ और ‘नीले रंग का विज्ञान’ दोनों अभिन्न हैं क्योंकि दोनों की उपलब्धि एक साथ होती है। वसुबन्धु यह बातें अपनी प्रसिद्ध कृति ‘विज्ञप्ति-मात्रतासिद्धि’ में करते हैं।
(भारतीय दर्शन: आलोचन और अनुशीलन- चन्द्रधर शर्मा)
6. सूची-I और सूची-II पर विचार कीजिए और नीचे दिए गए कूटों में से सही का चयन कीजिए :
सूची-I सूची-II
A. पंचशील i. न्याय
B. पंचावयव ii. बौद्ध
C. पंच परमेष्टि iii. जैन
D. पंचक्लेश iv. योग A B C D
(a) i ii iii iv
(b) ii iii iv i
(c) ii i iii iv
(d) iii i ii iv
Ans. (c) : (a) पंचशील (ii) बौद्ध
(b) पंचावयव (i) न्याय
(c) पंच परमोष्टि (iii) जैन
(d) पंचक्लेश (iv) योग
7. नैयायिकों द्वारा समवाय संबंध जिस सन्निकर्ष से प्राप्त होता है‚ उसे जाना जाता है
(a) समवाय (b) समवेत समवाय
(c) संयुक्त समवाय (d) विशेषणता
Ans. (d) : विशेषणता और विशेष्यता संबंधों के प्रत्यक्ष होने पर उनके बीच वर्तमान समवाय‚ जिसे वैशेषिक कदापि इन्द्रियवेद्य नहीं मानते‚ को भी न्यायदर्शन प्रत्यक्षज्ञान का विषय मानता है। इसलिए आधारभूत पदार्थ के साथ विशेषण अथवा विशेष्य के रूप में प्रसूत समवाय का भी विशेषणता या विशेष्यता सम्बन्ध से ही प्रत्यक्ष होता है।
(भारतीय दर्शन- डॉ नन्द किशोर देवराज)
8. न्याय भाषा-दर्शन में ईश्वरेच्छा है
(a) शक्ति का कारण (b) लक्षणा का कारण
(c) स्वयं शक्ति (d) शब्दबोध का कारण
Ans. (c) : न्याय भाषा-दर्शन में ईश्वरेच्छा को स्वयं शक्ति माना गया है। प्राचीन न्याय दर्शन में शब्दों में अर्थबोध कराने की शक्ति ईश्वरेच्छा पर निर्भर है। अमुक शब्द का अमुक अर्थ है यह रुढ़ि ‘ईश्वर संस्थापित’ है (ईश्वर संकेत) है।
(भारतीय दर्शन की समीक्षात्मक रूपरेखा: राममूर्ति पाठक)
9. ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए निम्नलिखित में से कौन दर्शन अदृष्ट की सहायता लेता है?
(a) केवल न्याय (b) न्याय और वैशेषिक
(c) न्याय‚ वैशेषिक और योग (d) योग और वैशेषिक
Ans. (b) : ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए न्याय-
वैशेषिक दर्शन अदृष्ट की सहायता लेता है। अदृष्ट धर्म एवं अधर्म अथवा पाप एवं पुण्य के संग्रह को अदृष्ट कहते हैं‚ जिससे कर्मफल उत्पन्न होता है। सभी जीवों को अदृष्ट का फल मिलता है। किन्तु अदृष्ट जड़ है। इसी जड़ अदृष्ट के संचालन के लिए चेतन द्रव्य ईश्वर है।
10. सही क्रम की सुनिश्चित करने के लिए सही कूट का चयन कीजिए:
(a) क्षिप्त‚ मूढ़‚ विक्षिप्त‚ एकाग्र‚ निरुद्ध
(b) मूढ़‚ क्षिप्त‚ विक्षिप्त‚ एकाग्र‚ निरुद्ध
(c) क्षिप्त‚ विक्षिप्त‚ मूढ़‚ एकाग्र‚ निरुद्ध
(d) निरुद्ध‚ एकाग्र‚ मूढ़‚ क्षिप्त‚ विक्षिप्त
Ans. (a) : सही क्रम क्षिप्त‚ मूढ़ विक्षिप्त‚ एकाग्र‚ निरुद्ध है। योग दर्शन में इन्हें चित्त की पांच भूमियां कहा गया है। अर्थात् इन्हें चित्तभूमि कहा जाता है।
11. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूटों की सहायता से सही उत्तर का चयन कीजिए:
सूची-I सूची-II
A. अभिहितान्वयवाद i. मंडन
B. अन्विताभिधानवाद ii. कुमारिल
C. स्फोटवाद iii. प्रभाकर
D. अपोहवाद iv. दिङ्नाग A B C D
(a) iii ii iv i
(b) ii iii i iv
(c) i ii iii iv
(d) iii i iv ii
Ans. (b) : (a) अभिहितान्वयवाद (ii) कुमारिल
(b) अन्विताभिधानवाद (iii) प्रभाकर
(c) स्फोटवाद (i) मण्डन
(d) अपोहवाद (iv) दिङ्नाग
12. सूची-I के साथ सूची-II को सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूटों में से सही उत्तर का चयन कीजिए:
सूची-I सूची-II
A. सांख्य दर्शन i. असत्कार्यवाद
B. द्वैत वेदांत ii. विवर्तवाद
C. अद्वैत वेदांत iii. सदसत्कार्यवाद
D. न्याय दर्शन iv. सतकार्यवाद A B C D
(a) iii iv i ii
(b) iv iii ii i
(c) i ii iii iv
(d) ii i iv iii
Ans. (b) : (a) सांख्य दर्शन (iv) सतकार्यवाद
(b) द्वैत वेदान्त (iii) सदसत्कार्यवाद
(c) अद्वैत वेदान्त (ii) विपर्टवाद
(d) न्याय दर्शन (i) असत्कार्यवाद
13. नीचे दिए गए कथनों में एक को अभिकथन (A) और दूसरे को तर्क (R) की संज्ञा दी गई है। शंकर दर्शन के संदर्भ में नीचे दिए गए कूटों में से सही उत्तर का चयन कीजिए:
अभिकथन (A): ब्रह्म जगत का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है।
तर्क (R): ब्रह्म से भिन्न कुछ भी नहीं है।
कूट:
(a) दोनों (A) और (R) सही है और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) दोनों (A) और (R) सही है और (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) असत्य है और (R) सही है।
(d) दोनों (A) और (R) असत्य हैं।
Ans. (a) : शंकराचार्य ने ईश्वर परिणामवाद का खण्डन किया तथा ब्रह्म को जगत् का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण स्वीकार किया तथा जगत को ब्रहम का विवर्त्त माना। वे जगत को मिथ्या‚ ब्रह्म का आभासमान कहते है और जीवों को परमार्थता ब्रह्म से अभिन्न मानते हैं।
(भारतीय दर्शन: डॉ नन्द किशोर देवराज)
14. मध्य वेदांत में मोक्ष के सही क्रम का चयन कीजिए:
(a) सायुज्य‚ सारूप्य‚ सामीप्य‚ सालोक्य
(b) सालोक्य‚ सामीष्य‚ सारूप्य‚ सायुज्य
(c) सारूप्य‚ सामीप्य‚ सालोक्य‚ सायुज्य
(d) सालोक्य‚ सायुज्य‚ सारूप्य‚ सामीप्य
Ans. (b) : मध्य वेदान्त में मोक्ष एक भावात्मक अवस्था है। मध्व दर्शन में मुक्तात्मा की साधना के अनुरूप आनन्दभोग में तारतम्य की बात की जाती है। तारतम्य के आधार पर क्रमश: सालोक्य‚ सामीप्य‚ प्रारूप्य एवं सायुज्य- भेद से चार प्रकार की मुक्ति मानी गयी है। यह चार अवस्थाएं हैं।
(भारतीय दर्शन की समीक्षात्मक रूपरेखा: राममूर्ति पाठक)
15. शंकर की दृष्टि में‚ ब्रह्म-ज्ञान में एकमात्र प्रमाण है
(a) अर्थापत्ति (b) प्रत्यक्ष
(c) अनुमान (d) शब्द
Ans. (d) : शंकराचार्य के अनुसार सर्वज्ञ‚ सर्वशक्तिमान‚ सर्वव्यापक‚ जागत्कारण एवं जगन्नियन्ता ईश्वर की सिद्धि श्रुतिवाक्यों के आधार पर होती है‚ अनुमान या तर्क द्वारा नहीं। अर्थात् ब्रहम-
ज्ञान में एक मात्र प्रमाण शब्द है।
(भारतीय दर्शन: आलोचन और अनुशीलन- चन्द्रधर शर्मा)
16. अनुप्रमाण और केवल प्रमाण के बीच भेद करने वाला भारतीय दार्शनिक‚ निम्नलिखित में से कौन है?
(a) पतंजलि (b) शंकर
(c) मध्व (d) ईश्वरकृष्ण
Ans. (c) : माध्वाचार्य के अनुसार‚ ‘यथार्थ प्रमाणम्’। वे प्रमाण का प्रयोग दो अर्थो में − केवल प्रमाण तथा अनुप्रमाण के रूप में करते हैं। केवल प्रमाण के चार भेद- ईश्वरज्ञान‚ लक्ष्मीज्ञान‚ योगिज्ञान‚ अयोगिज्ञान तथा अनुप्रमाण के तीन भेद- प्रत्यक्ष‚ अनुमान और शब्द।
17. शंकर के अनुसार साधन चटुष्टय के स्तरों में से एक है
(a) प्रकृति-पुरुष ज्ञान (b) मुमुक्षुत्व
(c) नित्यविभूति ज्ञान (d) अनुमान ज्ञान
Ans. (b) : अद्वैत वेदान्ती शंकर के अनुसार ज्ञानमार्ग का अधिकारी वही है जो ‘साधन चतुष्टय’ युक्त है। यह व्यक्ति के चित्त को शुद्ध करके उसे ज्ञानमार्ग के योग्य बनाता है। जो क्रमश: है- नित्यानित्यव स्तुविवेक‚ रहामुद्रार्थ भोगविराग‚ शमदमादिसाधनसम्पत् तथा मुमुक्षुत्व/मोक्षार्थी का मोक्ष प्राप्त करने के लिए दृढ़ संकल्प से युक्त होना ही मुमुक्षुत्व है।
18. सभी वेदान्तियों के लिए सामान्य यह शिक्षा है कि ब्रह्म
(a) निर्गुण है। (b) सगुण है।
(c) सगुण-निर्गुण है। (d) अनंत है।
Ans. (d) : सभी वेदान्ती को सामान्य रूप से यह शिक्षा है कि ब्रह्म ‘सत्यं‚ ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ अर्थात् सत्य‚ ज्ञान अनन्त है। यह तैत्तरीय उपनिषद का महावाक्य सभी वेदान्त परम्परा के अनुयायियों को माना है। जिसमें ब्रह्म को अनन्त कहा गया है।
19. नीचे आत्मपरकता के कुछ स्तर दिए गए हैं :
(A) शारीरिक आत्मपरकता (B) मानसिक आत्मपरकता
(C) आध्यात्मिक आत्मपरकता (D) धार्मिक आत्मपरकता के.सी. भट्टाचार्य द्वारा आत्मपरकता के कौन से तीन स्तर स्वीकार्य हैं?
नीचे दिए गए कूटों में से सही उत्तर का चयन कीजिए :
कूट:
(a) i iii iv (b) ii iii iv
(c) i ii iii (d) i ii iv
Ans. (c) : के.सी. भट्टाचार्य को आत्म परकता के तीन स्तर जो स्वीकार्य हैं निम्न हैं-
(i) शारीरिक आत्मपरकता
(ii) मानसिक आत्मपरकता
(iii) आध्यात्मिक आत्मपरकता
(समकालीन भारतीय दर्शन: बसन्त कुमार लाल)
20. निम्नलिखित में से यह किसका विचार है कि ‘जब आप सत्य को उसके आभास से वंचित कर देते हैं‚ तो सत्य के सुन्दरतम् भाग को खो देते हैं।’?
(a) श्री अरबिन्दों (b) टैगोर
(c) जे. कृष्णमूर्ति (d) विवेकानंद
Ans. (b) : टैगोर अपनी पुस्तक पर्सनाल्टी में कहते है कि एक दृष्टि से जगत ‘प्रतीति’ है‚ परन्तु इसका प्रतीति होना इसे मिथ्या या भ्रामक नहीं बना देता है। उनके अनुसार‚ यदि सत् की उसकी प्रतीति से सर्वथा पृथक कर दिया जाय तो सत् के सुन्दरतम् भाग को खो देते हैं। यद्यं प्रतीति या आभास मिथ्या या भ्रामक नहीं है।
21. निम्नलिखित में से यह किसका विचार है कि ‘देश‚ काल और कारणता तत्वमीमांसीय तत्व नहीं है‚ वे आकार मात्र है?
(a) टैगोर (b) विवेकानंद
(c) राधाकृष्णन् (d) जे. कृष्णमूर्ति
Ans. (b) : विवेकानन्द देश‚ काल और कारणता को तत्त्वमीमांसीय तत्व नहीं मानते हैं। उन्हें आकार कहते हैं। क्योंकि वे स्वतंत्र रूप में आस्तित्ववान नहीं है‚ वे अपने में ‘होने’ या ‘निर्देश’ के लिए दूसरे तत्वों पर निर्भर हैं। स्थान‚ काल और कारणता की सार्थकता निरपेक्ष सत् के लिए नहीं‚ बल्कि सृष्टि प्रक्रिया के लिए है।
22. निम्नलिखित में से यह किसका विचार है कि ‘सृष्टि अज्ञान में आत्मा का निमज्जन है’ है?
(a) टैगोर (b) गांधी
(c) विवेकानंद (d) श्री अरबिन्दों
Ans. (d) : श्री अरविन्द के अनुसार‚ ‘सृष्टि अज्ञान में आत्मा का निमज्जन है। अर्थात् ‘आत्म का अज्ञान में प्रविष्ट हो जाना है।’ श्री अरविन्द के अनुसार‚ अज्ञान ईश्वरीय चेतना की अपने को आंशिक रूप में रोक रखने की शक्ति है। यह ईश्वरीय चेतना का ही अंश है।
(समकाली भारतीय दर्शन: बसन्त कुमार लाल)
23. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूटों में से सही उत्तर का चयन कीजिए:
सूची-I सूची-II
(विचारक) (विचारधारा)
A. राधाकृष्णन् i. ईश्वर परम आत्मरूप है।
B. टैगोर ii. ग्रामीण लोकतंत्र
C. गांधी iii. सैद्धांतिक अवगति‚ भावनात्मक भक्ति‚ पूजाप्रार्थ ना
D. इकबाल iv. धर्म घर के लिए आतुरता है।
कूट:
A B C D
(a) i ii iii iv
(b) iv ii i iii
(c) iii iv ii i
(d) iii iv i ii
Ans. (c) : (a) राधाकृष्णन (iii) सैद्धांतिक अवगति‚ भावनात्मक भक्ति‚ पूजा-प्रार्थना
(b) टैगोर (iv) धर्म-घर के लिए आतुरता।
(c) गांधी (ii) ग्रामीण लोकतंत्र
(d) इकबाल (i) ईश्वर परमआत्मरूप है।
24. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूटों की सहायता से सही उत्तर का चयन कीजिए :
सूची-I सूची-II
A. प्राज्ञ i. जाग्रत
B. तैजस् ii. सुषुप्ति
C. वैश्वानर iii. स्वप्न
D. अद्वय iv. तुरीय
कूट:
A B C D
(a) iii ii i iv
(b) ii iii i iv
(c) ii i iii iv
(d) iv iii ii i
Ans. (b) : (a) प्राज्ञ (ii) सुषुप्ति
(b) तैजस् (iii) स्वप्न
(c) वैश्वानर (i) जाग्रत
(d) अद्वय (iv) तुरीय
25. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूटों में से सही उत्तर का चयन कीजिए:
सूची-I सूची-II
A. प्रकृति i. निष्क्रय
B. पुरुष ii. सक्रिय
C. महत् iii. द्वितीय व्यक्त रूप
D. अहंकार iv. प्रथम व्यक्त रूप
कूट:
A B C D
(a) i ii iii iv
(b) ii i iv iii
(c) iii iv ii i
(d) iv iii i ii
Ans. (b) : (a) प्रकृति (ii) सक्रिय
(b) पुरुष (i) निष्क्रिय
(c) महत् (iv) प्रथम व्यक्त रूप
(d) अहंकार (iii) द्वितीय व्यक्त रूप
26. लॉक के दर्शन के संदर्भ में दिये गये अभिकथन (A) और तर्क (R) पर विचार कीजिये तथा नीचे दिये गये विकल्पों में से सी विकल्प का चयन कीजिये:
अभिकथन (A):
हमारे सभी ज्ञान अनुभवसापेक्ष होते हैं।
तर्क (R): ज्ञान संवेदन और स्वसंवेदन से प्राप्त होता है। विकल्प :
(a) (A) और (R) दोनों सही है‚ परन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(b) (A) सही है और (R) गलत है‚ परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही है और (R) गलत है‚ परंतु (R), (A) की सही व्याख्या है।
(d) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
Ans. (d) : लॉक के अनुसार हमारे सभी ज्ञान अनुभव सापेक्ष है तथा ज्ञान संवेदन और स्वसंवेदन से प्राप्त होता है। दोनों सत्य है और सही व्याख्या हैं।
27. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिये तथा नीचे दिये गये कूटों से सही उत्तर का चयन कीजिए:
सूची-I सूची-II
A. ह्यूम i. समानान्तरवाद
B. लॉक ii. संशयवाद
C. बर्कले iii. अनुभववाद
D. स्पिनोजा iv. प्रत्ययवाद
कूट:
A B C D
(a) i ii iii iv
(b) ii i iv iii
(c) ii iii iv i
(d) iv iii i ii
Ans. (c) : (a) ह्यूम (ii) संशयवाद
(b) लॉक (iii) अनुभववाद
(c) बर्कले (iv) प्रत्ययवाद
(d) स्पिनोजा (i) समानान्तरवाद
(ज्ञानमीमांसा की समस्याएं: डॉ. हृदयनारायण मिश्र)
28. संवेदनवाद‚ अनुभववाद तथा प्रतिनिधित्ववाद सम्मिलित रूप से किससे संबंधित है?
(a) ह्यूम (b) लॉक
(c) कांट (d) बर्कले
Ans. (b) : संवेदनवाद‚ अनुभववाद तथा प्रतिनिधित्ववाद का प्रतिपादन लॉक के दर्शन में किया गया है। वस्तुओं से प्राप्त संवेदन जो कि हमारे अनुभव के विषय हैं‚ से हमारे मस्तिष्क में प्रत्ययो का निर्माण होता है। इन्हीं प्रत्ययों के अनुरूप जब बाह्य जगत में कोई वस्तु होती है तो हमें उसका अनुभव होता है और हमें ज्ञान प्राप्त होता है। वास्तव में हमारे ज्ञान के विषय प्रत्यय है जो कि बाह्य वस्तुओं के प्रतिनिधि हैं। यही प्रत्यय प्रतिनिधित्ववाद है।
29. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिये और नीचे दिये गये कूटों से सही उत्तर चुनिये:
सूची-I सूची-II
(चिंतक) (गं्रथ)
A. लॉक i. प्रिंसिपल्स ऑफ ह्यूमेन नॉलेज
B. ह्यूम ii. पिं्रसिपिया फिलॉसॉफिया
C. देकार्त iii. एस्से कन्सर्निंग ह्यूमन अन्डरस्टैंडिंग
D. बर्कले iv. इन्क्वाइरी कन्सर्निंग ह्यूमेन अन्डरस्टैंडिंग
कूट:
A B C D
(a) i ii iii iv
(b) ii iv iii i
(c) iii i ii iv
(d) iii iv ii i
Ans. (d) : (a) लॉक (iii) एस्से कन्सर्निंग ह्यूमन अन्डरस्टैंडिग
(b) ह्यूम (iv) इन्क्वाइरी कन्सर्निग ह्यूमन अन्डरस्टैंडिंग
(c) देकार्त (ii) प्रिंसिपिया फिलॉसॉफिया
(d) बर्कले (i) प्रिंसिपल्स ऑफ ह्यूमन नॉलेज
30. ‘संस्कार’ एवं विज्ञान के मध्य अन्तर……………के द्वारा किया गया था।
(a) कांट (b) लॉक
(c) ह्यूम (d) बर्कले
Ans. (c) : ह्यूम अनुभव को ही एक मात्र ज्ञान का साधन मानते हैं। उनके अनुसार संस्कार और प्रत्यय विज्ञान अनुभव के दो अंग हैं। बाहरी जगत से (संवेदन) या हमारे भीतर से (स्वसंवेदन) जो अनुभव प्राप्त होते हैं। उन्हें ‘संस्कार’ कहते हैं और संस्कारों के धुँधले और निर्बल और कम स्पष्ट रूप जो हमारे मन में रहता है‚ उन्हें प्रत्यय कहते हैं।
(ज्ञानमीमांसा की समस्थाएं: डॉ. हृदयनारायण मिश्र)
31. नीचे दिये गये दो कथनों में से एक को अभिकथन (A) और दूसरे को तर्क (R) की संज्ञा दी गई है। तर्कीय प्रत्यक्षवाद के संदर्भ में (A) और (R) पर विचार करते हुए नीचे दिये गये कूटों से सही कूट चिह्नित कीजिए :
अभिकथन (A) :
सत्यापन सिद्धान्त के अनुसार ‘किसी तर्कवाक्य का अर्थ सत्यापन का प्रकार है।’
तर्क (R): वे सभी कथन जिनका अनुभव द्वारा न तो सत्यापन किया जा सकता है और न ही उन्हें मिथ्या साबित किया जा सकता है‚ सार्थक हैं।
कूट:
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही है‚ परन्तु (R) गलत है।
(d) (A) गलत है‚ परंतु (R) सही है।
Ans. (c) : सत्यापन सिद्धान्त तर्कीय प्रत्यक्षवाद से सम्बन्धित हैं। जो विज्ञान से प्रभावित हैं। इसके अनुसार‚ विज्ञान की नींव निरीक्षण प्रयोग पर आधारित है‚ अत: वही वाक्य ज्ञानात्मक कहा जा सकता है‚ जिसका आधार निरीक्षण या अनुभव हो। इस दृष्टि से उन्होंने अर्थ का एक सिद्धान्त प्रतिपादित किया जिसे अर्थ का सत्यापन सिद्धान्त कहते हैं। स्लिक के अनुसार‚ ‘किसी वाक्य या तर्कवाक्य
(Proposition) का अर्थ उसके सत्यापन की विधि है।’ स्लिक एक तर्कीय प्रत्यक्षवादी दार्शनिक हैं। कोई कथन सार्थक तब होता है‚ जब उसका अनुभव के द्वारा सत्यापन किया जा सकता है। अत:
अभिकथन (A) तो सही है परन्तु तर्क (R) गलत है।
(समकालीन पाश्चात्य दर्शन: बसन्त कुमार लाल)
32. निम्नलिखित में से कौन सा कथन सेंट थॉमस एक्विनास के संदर्भ में सही हैं?
(a) ईश्वर के सार की पहचान बुद्धि द्वारा की जाती है।
(b) ईश्वर के सार की पहचान शुद्ध यथार्थता के रूप में उसके सार के साथ की जाती है।
(c) ईश्वर के सार की पहचान उसकी शक्ति से की जाती है।
(d) ईश्वर की सत्ता है‚ परंतु उसमें सार नहीं है।
Ans. (b) : सेंट थॉमस एक्वीनास के अनुसार ईश्वर के सार
(essence) और ईश्वर के सारतत्व में कोई भेद नहीं है। ईश्वर शुद्ध आकार शुद्ध यथार्थता है। ईश्वर आस्था का विषय है परन्तु उसे तर्कबुद्धि के द्वारा जाना जा सकता है। ईश्वर के सारतत्व (Oral’ sessence) को उसके अस्तित्व (Existence) के माध्यम से शुद्ध यथार्थता (Pure Autuality) के रूप में पहचाना जा सकता है।
(A HISTORY of Philosophy: Frank Thily)
33. विभिन्न विज्ञानों के बीच अरस्तू के भेद के अनुसार‚ ‘‘शुद्ध और अमूर्त ज्ञान’’ का वर्णन……….द्वारा होता है।
(a) सैद्धान्तिक विज्ञान यथा राजनीति शास्त्र और नीति शास्त्र
(b) व्यावहारिक विज्ञान यथा ईश्वर मीमांसा तथा तत्त्वमीमांसा
(c) सैद्धान्तिक विज्ञान यथा गणित और भौतिक विज्ञान
(d) व्यावहारिक विज्ञान यथा राजनीति शास्त्र और नीति शास्त्र
Ans. (c) : अरस्तू ने विज्ञानों को चार वर्गों में विभक्त किया था। पहला‚ तर्कशास्त्र यह बौद्धिक अनुशासन का विज्ञान हैं। दूसरा‚ सैद्धान्तिक विज्ञान ‘शुद्ध और अमूर्त ज्ञान’ के वर्णन का विज्ञान जिसमें गणित‚ भौतिक‚ मनोविज्ञान‚ तत्त्वमीमांसा आदि आते हैं। तीसरा‚ व्यावहारिक विज्ञान‚ नीतिशास्त्र एवं राजनीतिशास्त्र आते हैं। चौथा‚ उत्पादक विज्ञान‚ अरस्तू की पाइटिक्स जिसे आज सौन्द्रर्यशास्त्र कहते है‚ आती है।
(पाश्चात्य दर्शन का उद्भव एवं विकास: डॉ. हरिशंकर उपाध्याय)
34. नीचे दिये गये दो कथनों में से एक को अभिकथन (A) और दूसरे को तर्क (R) की संज्ञा दी गई है। (A) और
(R) पर विचार करते हुए सही कूट का चयन कीजिए:
अभिकथन (A):
प्लेटो ने अपनी पुस्तक थीटिटस में इस विचार को अस्वीकार किया कि ज्ञान विचार है।
तर्क (R): ज्ञान आस्था पर आधारित होना चाहिये न कि बुद्धि पर।
कूट:
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सही है‚ लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही है‚ लेकिन (R) गलत है।
(d) (A) गलत है‚ लेकिन (R) सही है।
Ans. (c) : प्लेटो अपनी पुस्तक ‘थीटिटस’ में ज्ञान पर विरोधात्मक दृष्टि से विचार करते हैं। वह यह स्पस्ट करते है कि ज्ञान क्या नहीं है। प्लेटो के अनुसार यदि इन्द्रिय प्रत्यक्ष और मत को ज्ञान माना जाये तो प्रामाणिक और दार्शनिक ज्ञान प्राप्त करना असंभव हो जायेगा। उसके अनुसार प्रत्यक्ष और मत पर आधारित विश्वास सत्य एवं असत्य दोनों हो सकते हैं। उसके अनुसार ज्ञान का विषय अनिवार्य एवं सार्वभौमिक होता है। यह सार्वजनिक प्रतीति और वस्तुनिष्ठ मापदण्ड पर आधारित होता है। ज्ञान आस्था पर न आधारित होकर प्रत्ययों अथवा विशुद्ध आकारों का अन्तर्बोध है जो बौद्धिक अन्तर्दृष्टि (प्रतिभा) से ही प्राप्त हो सकता है। अत:
अभिकथन (A) सही है और तर्क (R) गलत है।
35. ‘‘परमाणु की सत्ता है-क्योंकि वे सत् हैं। रिक्त देश की सत्ता है जबकि इसे विरोधाभासी रूप से असत् कहा जाता है। और किसी चीज की सत्ता नहीं है।’’ यह दार्शनिक उक्ति है-
(a) हेराक्लीट्स की (b) डेमोक्रीट्स की
(c) अनेक्जागोरस की (d) पारमेनिडिज की
Ans. (b) : डेमोक्रीटस् जो कि ग्रीक परमाणुवादी दार्शनिक हैं के अनुसार‚ ‘‘परमाणु की सता है-क्योंकि वे सत् है। रिक्त देश की सत्ता है जबकि इसे विरोधाभासी रूप से असत् कहा जाता है और किसी चीज की सत्ता नहीं है।’’ (A HISATORY OF PHILOSOPHY: FRANK THILLI)
36. निम्नलिखित में से यह किसका विश्वास था कि ‘‘सभी वस्तुएँ आत्मा और चित्ति से भरपूर है’’?
(a) डेमोक्रीट्स (b) हेराक्लीट्स
(c) पारमेनिडिज (d) पाइथागोरस
Ans. (b) : हेराक्लीट्स आत्मा की अमरता के सिद्धान्त में विश्वास करते थे। उनके अनुसार आत्मा का स्वतंत्र अस्तित्व है और अमर है। वह मानते थे कि ‘सभी वस्तुएं आत्मा और चित्ति। से भरपूर हैं’ हेराक्लाइटस परिवर्तन को शाश्वत् और ‘अग्नि’ को मूल तत्त्व मानते है।
37. प्रोटागोरस के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन से कथन सही हैं? सही कूट का चयन कीजिये :
(i) मनुष्य सभी वस्तुओं का मापदंड है।
(ii) सत्य वस्तुनिष्ठ है।
(iii) एक व्यक्ति के लिये जो सत्य है‚ यह आवश्यक नहीं कि वह दूसरे के लिये भी सत्य हो।
कूट:
(a) केवल (i) सही है।
(b) केवल (i) और (ii) सही हैं।
(c) केवल (i) और (iii) सही हैं।
(d) केवल (ii) और (iii) सही हैं।
Ans. (c) : सोफिस् सम्प्रदाय के प्रवर्तकों में अबडेरा के निवासी प्रोटागोरस का नाम अग्रगण्य है। उनका एक सुप्रसिद्ध सिद्धान्त ‘मनुष्य प्रत्येक वस्तु का मापदण्ड है’ प्रोटोगोरस के अनुसार सत्य व्यक्ति की संवेदना और अनुभूति तक सीमित है। इससे स्पष्ट है कि सोफिष्ट सत्य को वस्तुनिष्ठ नहीं मानते बल्कि आत्मनिष्ठ बना देते हैं। जो व्यक्ति विशेष को सत्य प्रतीत होता है वह उसके लिए सत्य है अर्थात जो एक व्यक्ति को सत्य प्रतीत होता है वह दूसरे के लिए असत्य भी हो सकता है। सोफिस्टों का यह सिद्धान्त व्यक्तिगत या आत्मनिष्ठ सत्य और वस्तुनिष्ठ सत्य के भेद को समाप्त कर देता है।
(पाश्चात्य दर्शन का उद्भव और विकास: डॉ. हरिशंकर उपाध्याय)
38. गिलबर्ट राइल का सिद्धान्त ‘‘मशीन में प्रेत’’ अस्वीकार करता है
(a) देकार्त के देह-मन के द्वैतवाद
(b) बर्कले का प्रत्ययवाद
(c) स्पिनोजा का सर्वेश्वरवाद
(d) मन की बौद्धिक क्षमता
Ans. (a) : गिल्बर्ट राइल ने अपने भाषा-दर्शन में डेकार्ट द्वारा प्रतिपादित मन-शरीर (देह-मन) की आलोचना करते हुए कहता है कि मन-शरीर का भेद करना एक तरह कोटिदोष की श्रेणी में आता है। वह इसे मशीन में प्रेत (Host in the Machine) का पूर्वाग्रह कहता है।
39. निम्नलिखित सूची-I की मदों को सूची-II से सुमेलित कीजिये और कूटों का प्रयोग करते हुए सही उत्तर चुनिये:
सूची-I सूची-II
A. निरपेक्ष में एकता और i. लॉक प्रतिकूलता दोनों ही होनी चाहिए
B. इन्द्रिय संवेदन के आकार ii. ह्यूम अन्त:प्रज्ञानात्मक होते है‚ बुद्धि के वैचारिक
C. द्रव्यों के प्रत्यय अनुपयुक्त iii. कांट है।
D. प्रत्यय पूर्णत: असम्बद्ध iv. हीगेल या अकस्मात संयुक्त नहीं होते‚ वे एक निश्चित सीमा तक सिद्धांत और सातत्य में एक दूसरे से संबंधन कराते हैं।
कूट:
A B C D
(a) i iv ii iii
(b) iii ii iv i
(c) iv iii i ii
(d) ii i iii iv
Ans. (c) : (a) निरपेक्ष में एकता और प्रतिकूलता दोनों ही होनी चाहिए। (iv) हीगेल
(b) इन्द्रिय संवेदन के आकार अंत:प्रज्ञात्मक होते है बुद्धि के वैचारिक (iii) कांट
(c) द्रव्यों के प्रत्यय अनुपयुक्त है। (i) लॉक
(d) प्रत्यय पूर्णत: असम्बद्ध या अकस्मात संयुक्त नहीं होते वे एक निश्चित सीमा तक सिद्धान्त और सातत्य में एक दूसरे से संवर्धन कराते हैं। (ii) ह्यूम
40. हीगेल के अनुसार‚ निरपेक्ष मन अपने सत्य के सार को………….में अन्त: अनुभूति में अभिव्यक्त करता है।
(a) नैतिकता (b) कला
(c) धर्म (d) दर्शन
Ans. (d) : हीगेल के दर्शन में निरपेक्ष मन आत्मा विकास की सर्वोच्च अवस्था है। जिसके अन्तर्गत आत्मा की दोनों पूर्ववर्ती अवस्थाओं‚ आत्मनिष्ठ मन (आत्मा) और वस्तुनिष्ठ मन (आत्मा) का समन्वय हो जाता है। इस अवस्था में भी मन की अभिव्यक्ति तीन रूपों में होती है- क्रमश: कला (सौन्दर्यशास्त्र)‚ धर्म (धर्म-दर्शन)‚ तथा दर्शन शास्त्र (दर्शन)। प्लेटो के समान हीगेल भी मानता है कि ज्ञान और विज्ञान की विभिन्न विधाओ और शाखाओं में दर्शनशास्त्र ही सर्वोच्च है। वस्तुत: निरपेक्ष मन अपने सत्य के सार के दर्शन मे अन्त:अनुभूति अवस्था में अभिव्यक्त करता है।
(पाश्चात्य दर्शन का उद्भव एवं विकास: डॉ हरिशंकर उपाध्याय)
41. ‘मृत्यु के प्रति अभिमुखता उससे पलायन हैं।’ यह किसके दर्शन को अभिव्यक्त करता है?
(a) रसेल (b) हुसर्ल
(c) हाइडेगर (d) मूर
Ans. (c) : हाइडेगर के अस्तित्ववादी दर्शन में ‘मृत्यु के प्रति अभिमुखता’ का विशिष्ट महत्व है। उनके अनेक अनुसार‚ ‘मृत्य निश्चित भविष्य है। ‘मृत्यु की अनिवार्यता’ भविष्य के लिए पूर्ण निश्चयता है और यह अनुभूति हर क्षण जीवित है- वर्तमान है। हम अपने साधारण अप्रामणिक जीवन में इस अनुभूति से पलायन कर जाते है। हम मृत्यु की अनिवार्यता को जानबूझकर भुलाये बैठे रहते है। हम ऐसे जीते है जैसे हमें वर्षों जीना है और कई मिथ्या धारणाएं कल्पित कर लेते है। इसी अर्थ में हाइडेगर कहता है कि‚ ‘मृत्यु के प्रति अभिमुखता (Being towards death) उससे पलायन है‚ भाग जाना है। (Philosophy of Man: Manuel Dy Junior)
42. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिये और नीचे दिये गये कूटों से सही उत्तर चुनिये:
सूची-I सूची-II
A. उन सभी प्रदत्तों का i. केअर समुच्चय जिनका हम अपनी सत्ता में विरोध करते हैं।
B. वह अनुभव जो हमारे ii. दासमैन लिये सम्पूर्ण सत् को अनावृत करता है।
C. प्रत्येक दूसरा है और कोई iii. तथ्यात्मकता भी स्व नहीं है।
D. सत्ता‚ तथ्यात्मकता और iv. मूड पतनशीलता में ऐक्य
कूट:
A B C D
(a) iv i iii ii
(b) i iv ii iii
(c) ii iii i iv
(d) iii iv ii i
Ans. (d) : (a) तथ्यात्मकता से तात्पर्य‚ उन सभी प्रदत्तों का समुच्चय जिनका हम अपनी सत्ता में विरोध करते हैं।
(b) मूड से तात्पर्य वह अनुभव जो हमारे लिए सम्पूर्ण सत् की अनावृत करता है।
(c) दासमैन का तात्पर्य प्रत्येक दूसरा है और कोई भी स्व नहीं है।
(d) केअर‚ सता‚ तथ्यात्मकता‚ पतनशीलता में ऐक्य से सम्बन्धित है।
(समकालीन पाश्चात्य दर्शन: बसन्त कुमार लाल)
43. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए और नीचे दिये गये कूट से सही उत्तर का चयन कीजिये। देकार्त के लिये‚ मानव देह मशीन की तरह है। सूची-I सूची-II
A. देह का गतिमान सिद्धान्त है i. हृदय की ऊष्मा
B. गति के अंग ii. तंत्रिकाएँ
C. संवेदन के अंग iii. पेशियाँ
कूट:
A B C
(a) i iii ii
(b) iii i ii
(c) ii i iii
(d) ii iii i
Ans. (a) : देकार्त (डेकार्ट) के अनुसार मानव मन‚ मानव देह में ‘पीनियल ग्लैण्ड’ के माध्यम से ‘अन्तर्क्रिया’ करता है। यदि देकार्त के लिए मानव देह मशीन की तरह हो तो (a) देह के गतिमान सिद्धान्त के रूप में हृदय की ऊष्मा को‚ (b) गति के अंग के रूप में पेशियों को तथा (c) संवेदन के अंग के रूप में तंत्रिकाओं को रखा जा सकता है।
44. ‘उद्देश्य में विधेय सिद्धान्त’ का प्रतिपादन किया गया है
(a) देकार्त द्वारा (b) लाइब्नित़्ज द्वारा
(c) स्पिनो़जा द्वारा (d) लॉक द्वारा
Ans. (b) : लाइबनित्ज अपने सत्तामूलक तर्क में ‘ईश्वर को सबसे अधिक पूर्ण सत्ता कहता है‚ क्योंकि सर्वाधिक पूर्ण तत्व का संप्रत्यय संभव है। लाइबनित्ज के अनुसार‚ सत्तामूलक युक्ति में‚ केवल ईश्वर के सन्दर्भ में ही विधेय पद उद्देश्य पद के अंतर्गत निहित हो सकता है। किन्तु अन्य सन्दर्भो में नहीं। इस तरह लाइबनित्ज ईश्वर के संबंध में ‘उद्देश्य में विधेय’ सिद्धान्त का प्रतिपादन करता है।
(पाश्चात्य दर्शन केा उद्भव और विकास: डॉ. हरिशंकर उपाध्याय)
45. निम्नलिखित में से किसके अनुसार ‘नव मानव’ का सार आनन्दपूर्ण प्रज्ञा है?
(a) हुसर्ल (b) मूर
(c) नीत्शे (d) फ्रेगे
Ans. (c) : नीत्शे ‘नव मानव’ का सार आनन्दपूर्ण प्रज्ञा है मानते हैं। इसके अतिरिक्त वे ‘विल टू पॉवर’ और ‘सुपरमैन’ सिद्धान्त भी देते हैं। नीत्शे का नीतिशास्त्र व्यक्ति केन्द्रित मूल्यवाद है।
(नीतिशास्त्र का सर्वेक्षण- संगम लाल पाण्डेय)
46. अभिकथन (A) और तर्क (R) पर विचार करते हुए नीचे दिए गए कूटों में से सही उत्तर का चयन कीजिए:
अभिकथन (A): रसेल के अनुसार‚ द्योतक मुहावरों केा अपने आपमें कोई अर्थ नहीं होता’।
तर्क (R):
I ‘‘चार्ल्स द्वितीय के भाई को पदच्युत किया गया’ में ‘‘चार्ल्स द्वितीय को पदच्युत किया गया’ का कोई अर्थ नहीं है। II ‘चार्ल्स द्वितीय के भाई को पदच्युत किया गया’‚ चार्ल्स का भाई एक द्योतक मुहावरा है और इसलिये इसका कोई अर्थ नहीं है।
कूट :
(a) (A) सही है और (R) I, II, (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) सही है और (R) I, (A) की सही व्याख्या है एवं
(R) II गलत है।
(c) (A) सही है (R) II, (A) और की सही व्याख्या है एवं
(R) I गलत है।
(d) (A) सही है‚ लेकिन न ही (R) I और न (R) II, (A) की सही व्याख्या है।
Ans. (c) : रसेल के अनुसार द्योतक मुहावरों (Denoting Phrases) वर्णनात्मक वाक्याशों (Descriptive Phroses) का अपने आप में कोई अर्थ नहीं होता है। ‘‘चार्ल्स द्वितीय के भाई का पदच्युत किया गया में ‘‘चार्ल्स द्वितीय को पदच्युत किया गया’’ अपने आप में एक स्वतंत्र वाक्य है। अत: रसेल के सन्दर्भ में तर्क R (I) गलत है। परन्तु तर्क R (II) में ‘‘चार्ल्स द्वितीय का भाई’’
(The broher of charles II) एक द्योतक मुहावरा है‚ अत: जैसा कि अभिकथन (A) में कहा गया है वैसे ही ‘‘चार्ल्स द्वितीय का भाई’’ का कोई अर्थ नहीं है। अत: अभिकथन (A) सही है‚ R (II) A की व्याख्या है परन्तु (R) I गलत है।
(समकालीन पाश्चात्य दर्शन: बसन्त कुमार लाल)
47. अभिकथन (A) और तर्क (R) पर विचार करते हुए नीचे दिये कूटों से सही उत्तर का चयन कीजिये:
अभिकथन (A):
चिदणु गवाक्षहीन हैं
तर्क (R): I बाहर से उनमें कुछ भी प्रवेश नहीं होता। II उनकी प्रत्येक अवस्था अपने स्वभाव से संचालित होती हैं। III चिदणुओं में अन्त:क्रिया नहीं होती।
कूट:
(a) (A) सही है और (R) I, II, III, (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) सही है और केवल (R) I, (A) की सही व्याख्या है।
(c) (A) सही है और (R) I, II, (A) की सही व्याख्या है।
(d) (A) सही है और (R) II, III, (A) की सही व्याख्या है।
Ans. (c) : लाइबनित्ज अपने चिदणुवाद में चिद्णुओं को गवाक्षहीन कहता है। जिसका तात्पर्य है चिदणु किन्हीं बाह्य वस्तुओं से प्रभावित नहीं होते अर्थात बाहर से उनमें कुछ प्रवेश नहीं होता। चूंकि प्रत्येक चिदणु अपने आप में पूर्ण है अत: वह आत्मनिर्भर है। अत: स्वतंत्र चिदगुओं में कोई पारस्परिक संबंध नहीं होता। उनकी प्रत्येक अवस्था अपने स्वभाव से संचालित होती है। अत: कथन (A) की व्याख्या
तर्क (R) I, II (A) है।
(A HISTORY OF PHILOSOPHY: FRANK THILLY)
48. रसेल के तार्किक अणुवाद के आलोक में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये और नीचे दिये गये कूट से सही उत्तर का चयन कीजिये :
(i) तर्क के वैयक्तिक चरों तथा तर्कवाक्यीय प्रकार्यों के अनुरूप विश्व में अंशव्यापी तथा विश्वव्यापी शामिल है।
(ii) तर्क के अंशव्यापी और विश्वव्यापी के अनुरूप विश्व में अंशव्यापी और विश्वव्यापी प्रकार्य शामिल हैं।
(iii) विश्व में सामान्य तर्कवाक्यों के अनुरूप परमाण्विक तथ्य हैं।
कूट:
(a) केवल (i) सत्य है।
(b) केवल (i) और (ii) सत्य है।
(c) केवल (i) और (iii) सत्य है।
(d) केवल (ii) और (iii) सत्य है।
Ans. (c) : रसेल के तार्किक अणुवाद के आलोक में-
(i) तर्क के वैयक्ति चरों तथा तर्क वाक्यीय प्रकार्यो के अनुरूप विश्व में अंशव्यापी तथा विश्वव्यापी शामिल हैं। और
(iii) विश्व में सामान्य तर्कवाक्यों के अनुरूप स्वतंत्र परमाण्विक तथ्य हैं।
(ii) गलत है।
(समकालीन पाश्चात्य दर्शन: बसन्त कुमार लाल)
49. व्यवहारवाद के आलोक में निम्नलिखित कथनों पर विचार करते हुए सही कूट का चयन कीजिए:
(i) विलियम जेम्स और सी.एस. पीयर्स दोनों व्यवहारवाद के सिद्धान्त से पूर्णत: सहमत हैं।
(ii) व्यावहारिक आधार पर नैतिक सिद्धान्त को प्रस्तुत करने में विलियम जेम्स पीयर्स से भी आगे रहे।
(iii) सी.एस. पीयर्स ने अपने सिद्धान्त को व्यवहारवाद बताया।
कूट:
(a) केवल (i) सत्य है
(b) केवल (i) और (ii) सत्य हैं।
(c) केवल (ii) और (iii) सत्य हैं।
(d) केवल (i) और (iii) सत्य हैं।
Ans. (c) : व्यवहारवाद वह सिद्धान्त है जो ‘व्यवहार’ को केन्द्रीय स्थान देता है। विचारो की अर्धमूलकता भी व्यवहार पर आधारित है। सी.एस. पीयर्स ने अपने सिद्धान्त का व्यवहारवादी सिद्धान्त कहा। पीयर्स ने ही ‘प्रैग्मेटोज्म’ शब्द का उपयोग सर्वप्रथम किया। व्यावहारिक आधार पर नैतिक सिद्धान्त को प्रस्तुत करने में विलियम जेम्स पीयर्स से भी आगे रहे। विलियम जेम्स अपने अनुभववाद को परम्परागत अनुभववाद से अधिक मौलिक कहते हैं।
(समकालीन पाश्चात्य दर्शन: बसन्त कुमार लाल)
50. निम्नलिखित में से किस दार्शनिक ने प्रैगमेटिसिज्म का समर्थन किया?
(a) विलियम जेम्स (b) सी.एस. पीयर्स
(c) जी.राइल (d) ए.जे. एयर
Ans. (b) : ‘‘प्राग्मेटिसिज्म’’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम सी.एस.
पीयर्स के दर्शन में हुआ माना जाता है।
(समकालीन पाश्चात्य दर्शन: बसन्त कुमार लाल)

Top
error: Content is protected !!