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यूजीसी नेट/जेआरएफ परीक्षा‚ नवम्बर-2017 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY) व्याख्या सहित तृतीय प्रश्न-पत्र का हल UGC NTA NET JRF Philosophy Previous Papers in Hindi 004.

UGC NTA NET JRF Philosophy Previous Papers in Hindi यूजीसी नेट/जेआरएफ परीक्षा‚ नवम्बर-2017 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY) व्याख्या सहित तृतीय प्रश्न-पत्र का हल

1. वैशेषिक के अनुसार अतीत और वर्तमान के अवबोध का कारण है:
(a) आकाश (b) दिक्
(c) काल (d) मनस्
Ans : (c) वैशेषिक दर्शन में ‘काल’ को नौ द्रव्यों में से एक द्रव्य माना गया है। काल एक‚ नित्य और विभु है। वस्तुत: यह अखण्ड है परन्तु व्यवहार में इनके खण्डों की कल्पना कर ली जाती है। काल के कारण अतीत (भूत)‚ वर्तमान‚ भविष्य का ज्ञान होता है‚ ज्येष्ठ और कनिष्ठ का व्यवहार होता है एवं वस्तुओं की एककालता‚ भिन्नकालता‚ दीर्घकालता‚ तथा अल्पकालता सिद्ध होती है।
(भारतीय दर्शन: आलोचन और अनुशीलन- चन्द्रधर शर्मा)
2. रामानुज के अनुसार अपृथक-सिद्धि निम्नलिखित में से किस के बीच का सम्बंध हैं :
(a) केवल जीव और जगत के
(b) केलव जीव और ब्रह्म के
(c) केवल जगत और ब्रह्म के
(d) एक ओर ब्रह्म और जीव के बीच और दूसरी ओर ब्रह्म और जगत के बीच
Ans : (d) रामानुज‚ आचार्य शंकर के अभेदसूचक दृष्टि का खण्डन करते हैं और विशिष्ट अभेद पर बल देते है। उनके अनुसार जीव स्वरूपत: ब्रह्म से भिन्न है‚ किन्तु ब्रह्म एवं जीव में अपृथकसिद्ध सम्बन्ध है। इसके अतिरिक्त ईश्वर का जगत के साथ भी अपृथकसिद्ध सम्बन्ध है। वस्तुत: ईश्वर‚ चित् और अचित् की अपृथकसिद्ध एकता ही रामानुज का ब्रह्म है।
(भारतीय दर्शन की समीक्षात्मक रूपरेखा: राममूर्ति पाठक)
3. वैशेषिकों के अनुसार द्वयअणुक का असमवायीकारण क्या है?
(a) परमाणु (b) परमाणु का परिमाण
(c) परमाणु संयोग (d) ईश्वर
Ans : (c) जो समवायि कारण से निकट सम्बन्ध रखता है तथा जिसमें कारण का सामान्य लक्षण घटित होता‚ वह असमवायि कारण है। यह वह गुण या कर्म है जो समवायि कारण में समवाय सम्बन्ध से रहते हुए कार्योत्पत्ति में सहायक होने से कारण कहा जाता है। जैसे ‘परमाणु संयोग’ द्वयअणुक का असमवायि कारण है क्योंकि वह परमाणुओं में समवाय सम्बन्ध से रहता है।
(भारतीय दर्शन की समीक्षात्मक रूपरेखा: राममूर्ति पाठक)
4. वैशेषिकों के अनुसार सत्ता सामान्य निम्नलिखित में से किसमें है?
(a) केवल द्रव्य‚ और गुण कर्म में
(b) केवल द्रव्य‚ गुण‚ कर्म और सामान्य में
(c) केवल गुण और कर्म में
(d) केवल द्रव्य और गुण में
Ans : (a) वैशेषिक के अनुसार‚ ‘सामान्य एक नित्य पदार्थ है जो एक होते हुए भी अनेक विशिष्ट वस्तुओं में विद्यमान रहता है।’ वैशेषिक दर्शन सामान्य की स्थिति द्रव्य‚ गुण अैर कर्म पदाथों में मानता है। वह अन्य चारों पदार्थों सामान्य‚ विशेष समवाय और अभाव में सामान्य की उपस्थिति को अस्वीकार करता है।
(भारतीय दर्शन की समीक्षात्मक रूपरेखा: राममूर्ति पाठक)
5. निम्नलिखित में से कौन सा मूर्तद्रव्य नहीं है?
(a) मरूत् (b) मनस्
(c) आत्मन् (d) क्षिति
Ans : (c) क्षिति‚ जल‚ पावक‚ और मरूत् ये मूर्त तत्व है अत: यह मूर्तद्रव्य है। मनस् एक आन्तरिक इन्द्रिय है। जो अणुरूप है। आत्मा नित्य एवं विभु है तथा अमूर्त द्रव्य है।
6. निम्नलिखित में से किस प्रारंभिक यूनानी दार्शनिक ने आभास और सत् को सतत परिवर्तन के आभासित स्थायित्व और निरन्तर परिवर्तन की प्रच्छन्न वास्तविकता में अंतर के रूप को निरूपित किया है।
(a) हेरेक्लाइटस (b) एनेक्जेगोरस
(c) एम्पेडोक्लीज (d) डेमोक्रीट्स
Ans : (a) हेराक्लाइट्स ने संभूति के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। उनके अनुसार‚ परिवर्तन ही सत् है। स्थिरता और अभेद मिथ्या हैं‚ भ्रामक है। उसके परिवर्तन सिद्धान्त के अनुसार ‘‘एक ही नदी में हम गोता लगाते भी है और नहीं भी लगाते हैं क्योंकि वह निरन्तर प्रवाहित हो रही है। उसका आभास और सत् सम्बन्धित परिवर्तन सिद्धान्त सापेक्षता का द्योतक है। स्थायित्व आभास है और परिवर्तन सत् है।
(पाश्चात्य दर्शन का इतिहास -1 प्रा. दयाकृष्ण)
7. लॉक के दर्शन के आलोक में निम्नलिखित अभिकथनों पर विचार कीजिए और सही कूट का चयन कीजिए:
(a) प्राथमिक गुण वे संवेदी गुण हैं जो प्रत्यक्षकर्त्ता पर निर्भर होते हैं।
(b) प्राथमिक गुण रंग‚ ध्वनि‚ स्वाद और स्पर्श का विषय होते हैं।
(c) गौण-गुण वे गुण होते हैं जिनका अस्तित्व प्रत्यक्षकर्त्ता से स्वतंत्र होता है।
(d) प्राथमिक गुण वस्तुओं के वस्तुनिष्ठ गुणधर्म होते हैं जबकि द्वितीयक गुण व्यक्तिनिष्ठ गुणधर्म होते हैं।
कूट:
(a) केवल (a) और (b) सत्य हैं।
(b) केवल (b) और (c) सत्य है।
(c) केवल (c) और (d) सत्य है।
(d) केवल (d) सत्य है।
Ans : (d) प्राथमिक गुण अथवा मूल गुण बाह्य वस्तुओं में पाये जाते हैं तथा वस्तुनिष्ठ और अनिवार्य होते हैं। प्रागमिक गुण घनत्व‚ विस्तार‚ आकार‚ आकृति‚ गति‚ विराम‚ संख्या आदि हैं। द्वितीयक गुण अथवा उपगुण‚ मूलगुणों से उत्पन्न व्यक्तिनिष्ठ गुणधर्म होते है। उदाहरण- रंग‚ स्वाद‚ गन्ध‚ शीतलता उष्णता इत्यादि।
(पाश्चात्य दर्शन का इतिहास-2 प्रो. दयाकृष्ण)
8. देकार्तीय-द्वैत के अनुसार मानव निम्नलिखित का मिश्रितरूप है:
(a) मूर्त और अमूर्त द्रव्य जो अलग-अलग नियमों से संचालित होते हैं।
(b) मूर्त द्रव्य जो समान प्रकार के नियमों से संचालित होते हैं।
(c) अमूर्ति द्रव्य जो अलग-अलग नियमों से संचालित होते हैं।
(d) अमूर्त और मूर्त दोनों द्रव्य जो समान प्रकार के नियमों से संचालित होते हैं।
Ans : (a) डेकार्ट के अनुसार‚ आत्मा‚ विचारशील अमूर्त है और अनात्मा‚ विस्तारयुक्त मूर्त द्रव्य है। चेतन आत्मा और अचेतन जड़ तत्व अपनी सत्ता के लिए एक दूसरे पर निर्भर नहीं है। अर्थात् डेकार्ट द्वैतवाद‚ मानव को दो अलग-अलग मूर्त और अमूर्त द्रव्यों का मिश्रण है जिनका गुण क्रमश: विस्तार और चिंतन करना है‚ एक दूसरे से पूर्णतया स्वतन्त्र‚ अलग-अलग नियमों से संचालित‚ ईश्वर नामक द्रव्य पर निर्भर है।
(पाश्चात्य दर्शन का उद्भव एंव विकास- प्रो. हरिशंकर उपध्याय)
9. प्लेटो के लिए कोई व्यक्ति हो सकता है:
(a) इन्द्रियगोचर वस्तु जिसके संबंध में प्रत्यक्ष द्वारा ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
(b) बिम्ब जिसके बारे में प्रत्यक्ष द्वारा ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
(c) इन्द्रियगोचर वस्तु जिसके बारे में तर्क द्वारा ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
(d) इन्द्रिगोचर वस्तु जिसके बारे में कल्पना द्वारा ज्ञान प्राप्त किया जा सकता हैं।
Ans : (a) ‘An Individual’ (कोई व्यक्ति) अर्थात् एक विशेष इन्द्रियगोचर वस्तु है जिसका ज्ञान प्रत्यक्ष द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। सभी विशेष मनुष्य एक पूर्ण एवं सामान्य मनुष्य की अपेक्षा अपूर्ण हैं। पूर्ण एवं सामान्य मनुष्य का प्रत्यय अतीन्द्रिय है। जिसका ज्ञान बुद्धि द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। अर्थात् एक व्यक्ति सामान्य सत्ता न होकर‚ एक विशेष है और प्लेटों के दर्शन में विशेषों का ज्ञान इन्द्रियानुभव के द्वारा होता है।
10. प्लेटो के अनुसार निम्नलिखित में से किसे ‘सम्मति’ के अंतर्गत रखा जा सकता है?
(a) कुर्सी का विश्वास (b) कुर्सीपन
(c) कुर्सी का कालापन (d) कुर्सी का सफेदीपन
Ans : (a) प्लेटो के अनुसार सम्मति (opinion)‚ विश्वास का ही एक रूप है। कुर्सी का विश्वास ‘सम्मति’ के अंतर्गत ही रखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त ज्ञान बौद्धिक विश्वास और सत्य मत से भिन्न होता है।
(पाश्चात्य दर्शन का इतिहास-1‚ प्रो. दयाकृष्ण)
11. निकोमेकियन नीतिशास्त्र के अनुसार व्यावहारिक प्रज्ञा से तात्पर्य है:
(a) व्यावहारिक ज्ञान (b) मुख्य सद्गुण
(c) स्वाभाविक उत्कृष्टता (d) प्रसन्नता
Ans : (b) ‘Phronesis’ (व्यावहारिक प्रज्ञा) एक प्राचीन ग्रीन शब्द है जो एक Wisdome अथवा Intelligence (ज्ञान) का प्रकार है। यह एक ‘व्यावहारिक ज्ञान से सम्बन्धित है।
12. ‘‘मन‚ कारणता और अनिवार्यता के भावों का सृजन करता हैं; हम उसे देख नहीं पाते है’’ यह कथन निम्नलिखित में से किस आधुनिक पाश्चात्य दार्शनिक का हैं।
(a) मिल (b) ह्यूम
(c) डेकार्ट (d) लॉक
Ans : (b) ह्यूम अपने संशयवाद में कारण – कार्य संबंन्धों की अनिवार्यता का खण्डन करते है। ह्यूम के अनुसार कारण-कार्य संबंधों पर आरोपित अनिवार्यता वास्तविक नहीं है‚ यह मनोवैज्ञानिक भावना है। ह्यूम के अनुसार‚ ‘‘मन‚ कारणता और अनिवार्यता के भावों का सृजन करता है; और हम उसे देख नहीं पाते।’’
(पाश्चात्य दर्शन का इतिहास-II प्रो. दयाकृष्ण)
13. विलियम जेम्स के व्यवहारवाद के संदर्भ में निम्नलिखित अभिकथनों पर विचार कीजिए और सही उत्तर का चयन कीजिए:
(a) सत्य की सार्वभौमिक धारणा अस्वीकार की जाती है।
(b) ज्ञान संदर्भ रहित है।
(c) सत्य एक विचार है।
कूट:
(a) केवल (a) सत्य है
(b) केवल (a) और (c) सत्य है
(c) केवल (b) सत्य है
(d) केवल (b) और (c) सत्य है
Ans : (b) विलियम जेम्स के व्यवहारवाद के संदर्भ में-
1. ‘सत्य’ विचार तथा विश्वास का लक्षण है।
2. ‘सत्यता’ किसी ज्ञान या तत्व का कोई निश्चित – वस्तुनिष्ठ रूप नहीं है।
3. यदि सत्य का मापदण्ड सुकार्यता है तो यह हवा में निर्धारित नहीं होती- किसी परिस्थिति में‚ किसी विशेष सन्दर्भ में निर्धारित होती है।
(समकालीन पाश्चात्य दर्शन- बसन्त कुमार लाल)
14. निम्नलिखित में से किस पाश्चात्य दार्शनिक के अनुसार ‘सत्य व्यक्तिनिष्ठ स्थिति है न कि वस्तुनिष्ठ’।
(a) किर्केगार्ड (b) ह्यूम
(c) कांट (d) विलियम जेम्स
Ans : (a) सोरेन किर्केगार्ड जो कि ईश्वरवादी अस्तित्ववाद के पोषक हैं। उनके अनुसार ‘सत्य व्यक्तिनिष्ठ स्थिति है न कि वस्तुनिष्ठ’। उनके अनुसार सत्य आत्मीयता है (Truth is subjectivity) कर्कगार्ड के अनुसार‚ ‘‘सत्य प्रबलरूप में भावनात्मक आन्तरिकता के आत्मीकरण-प्रक्रिया के दृढ़ावलम्बन में जकड़ी हुई वस्तुनिष्ठ अनिवश्चयता है।’’
(स. पाश्चात्य दर्शन : बसन्त कुमार लाल)
15. ह्यूम के अनुसार ‘आत्मा’ है:
(a) स्थिर विषय (b) स्थिर भौतिक सत्ता
(c) अटल तादात्म्य रहित (d) अटल तादात्म्य सहित
Ans : (c) ह्यूम आत्मा को संस्कारों एवं प्रत्ययों अथवा परिवर्तनशील चित्तवृत्तियों के अतिरिक्त और कुछ नहीं मानते है। परिवर्तनशील संस्कारों एवं प्रत्ययों के तीव्र और अविच्छिन्न प्रवाह के कारण आत्मा की एकता का भ्रम पैदा हो जाता है। ह्यूम ने आत्मा को अटल प्रादात्म्य रहित माना है।
16. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य नहीं है?
(a) सांख्य के अनुसार शब्द‚ विशेष को अभिव्यंजित करता है।
(b) कुमारिल के अनुसार शब्द‚ विशेष का अभिव्यंजित नहीं करता है।
(c) प्रारंभिक-मीमांसकों के अनुसार शब्द का अर्थ आकृति है।
(d) नैयायिकों के अनुसार शब्द का अर्थ जाति नहीं है।
Ans : (d) नैयायिको के शब्द से हमें व्यक्ति‚ उसकी आकृति तथा उसकी जाति तीनों की अलग-अलग मात्रा में जानकारी मिलती है।
17. भारतीय तर्क शास्त्र में वाच्यार्थ का निम्नलिखित में से क्या तात्पर्य नहीं है :
(a) अभिधेयार्थ (b) मुख्यार्थ
(c) व्यंगार्थ (d) शक्यार्थ
Ans : (c) वाच्यार्थ का तात्पर्य अभिधेयार्थ‚ मुख्यार्थ और शक्यार्थ है।
18. निम्नलिखित में से किस दर्शन के अनुसार प्रमा की सत्यता को ‘‘अबाधितार्थ विषयकत्व’’ माना जाता है?
(a) चार्वाक (b) जैन
(c) अद्वैत (d) सांख्य
Ans : (c) प्रमा की परिभाषा अद्वैत वेदान्त दर्शन में यह है:
अनधिगत (अज्ञात)‚ अबाधित अर्थ-विषयक ज्ञान (अबाधितार्थ विषयकत्व) प्रमा है। जिस ज्ञान का विषय दूसरे ज्ञान से बाधित हो जाये वह ज्ञान प्रमा नहीं‚ अप्रमा है। स्मृति ज्ञान से भिन्न प्रमा को रखा गया है।
(भा. दर्शन- डॉ. नन्द किशोर देवराज)
19. ‘नाम और सामान्य-अवधारणा‚ हमारी कल्पना द्वारा प्रदान किए जाते है‚ इस मत का प्रतिपादन निम्नलिखित में से किस दर्शन द्वारा किया गया है?
(a) अद्वैत (b) बौद्ध
(c) नैयायिक (d) वैशेषिक
Ans : (b) बौद्धों का सामान्य सम्बन्धित सिद्धान्त ‘अपोहवाद’ कहलाता है। जिसके अनुसार‚ नाम और जाति (सामान्य) अवधारणा‚ हमारी कल्पना द्वारा प्रदान किये जाते हैं। अर्थात् सामान्य की सत्ता वास्तविक न होकर काल्पनिक हैं।
20. निम्नलिखित में से कौन-सा ख्याति का सिद्धान्त यह स्पष्ट करता है कि ‘‘ख्याति आंशिक और अपूर्ण दो प्रकार के ज्ञान के बीच अंतर का बोध न हो पाना है’’।
(a) विपरीत ख्याति (b) अख्याति
(c) यथार्थ ख्याति (d) अन्यथा ख्याति
Ans : (b) प्रभाकर के अनुसार‚ अयथार्थ या मिथ्याज्ञान के रूप में भ्रम सम्भव नहीं है। जिसे हम भ्रम कहते है वह आंशिक और अपूर्ण ज्ञान के दो प्रकारों में अन्तर का बोध न हो पाना है। सारा ज्ञान यथार्थ होता है परन्तु अपूर्ण होता है। प्रभाकर के इस मत को अख्यातिवाद कहते है।
(भा. दर्शन : आलोचन एवं अनुशीलन: चन्द्रधर शर्मा)
21. उपमान को प्रत्यभिज्ञा के स्वरूप में निम्नलिखित में से किस के द्वारा माना जाता है?
(a) जैन (b) सांख्य
(c) वैशेषिक (d) नैयायिक
Ans : (a) जैन दर्शन में तीन प्रकार के प्रमाणों को माना गया हैप्रत्यक्ष् ा‚ अनुमान और शब्द। उपमान को प्रत्यभिज्ञा नामक परोक्ष ज्ञान के रूप में माना जाता है। प्रत्यभिज्ञा का सम्बन्ध प्राय: पहचान से है। यह ज्ञान वस्तुओं के परस्पर सादृश्य से उत्पन्न होता है।
22. अभिकथन (A) और तर्क (R) पर विचार कीजिए और नीचे दिए गए सही कूट का चयन कीजिए:
अभिकथन (A) :
अद्वैतवादी केवल ‘अन्वयी’ अनुमान को स्वीकार करते हैं परंतु ‘केवलान्वयी’ अनुमान को स्वीकार नहीं करते हैं।
तर्क (R) : इससे निकाला जाने वाला निष्कर्ष गैर-
अस्तित्व के विपरीत नहीं होना चाहिए।
कूट:
(a) (A) तथा (R) दोनों सही हैं और (R)‚ (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं‚ परंतु (R)‚ (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) गलत हैं‚ और (R) सही है।
(d) (A) और (R) दोनों गलत हैं।
Ans : (a) अद्वैत वेदान्त दर्शन में छ: प्रमाण- प्रत्यक्ष‚ अनुमान‚ शब्द‚ उपमान‚ अर्थापत्ति‚ और अनुपलब्धि को मानता है। अनुमान परोक्ष प्रमाण है। अद्वैत वेदान्त केवल एक ही अनुमान स्वीकार करता है वह है- अन्वयिरूप। अद्वैत वेदान्त न्याय दर्शन के केवलान्वयि‚ केवल व्यतिरेकी और अन्वय-व्यतिरेकी अनुमानों को अस्वीकार करता है।
(भा. दर्शन की समीक्षात्मक रूपरेखा- राममूर्ति पाठक)
23. अद्वैत वेदान्त के अनुसार अंत:करणवृत्ति का अर्थ है:
(a) मन की ज्ञानात्मकम विधि
(b) मन की भावात्मक विधि
(c) मन की क्रियात्मक विधि
(d) उपरोक्त सभी
Ans : (a) विषय के आकार के रूप में परिणत होना अन्त:करण वृत्ति कहलाता है। यह वृत्ति इन्द्रिय और विषय से सन्निकर्ष की अपेक्षा करती है; इस अन्त:करण की वृत्ति को उपचारवश ज्ञान कहते है। (वृत्तौज्ञानत्वोपचारात् – विवरणे)। यह मन की ज्ञानात्मक विधि है। अद्वैत मत में मन‚ बुद्धि आदि को अन्त:करण ही माना गया है।
24. अभिकथन (A) और तर्क (R) पर विचार कीजिए और नीचे दिए गए सही कूट का चयन कीजिए:
अभिकथन (A) :
अद्वैत के अनुसार वस्तु का प्रत्यक्ष प्रमातृ-चैतन्य को अनुभूत नहीं होता।
तर्क (R) : जो प्रत्यक्ष-गत नहीं हुआ वह अज्ञान से आच्छादित होता है।
कूट:
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R)‚ (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) सही है परंतु (R) गलत है और (R)‚ (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) गलत हैं‚ और (R) सही है।
(d) (A) और (R) दोनों गलत हैं।
Ans : (c) वृत्ति की मध्यस्थता से विषयावच्छिन्न चैतन्य या विषय चैतन्य और प्रभात-चैतन्य में तादात्म्य स्थापित हो जाता है। अर्थात् विषय या वस्तु की प्रत्यक्षता का अर्थ है उस विषय का (घट का) अपने आकारवाली वृत्ति की उपाधि वाले प्रमात् – चैतन्य की सत्ता से पृथक सत्ता- पाला न रह जाना। प्रत्यक्ष में एक तरह की योग्यता अपेक्षित है। अर्थात जो प्रत्यक्षगत नहीं हुआ वह अज्ञान से आच्छादित है।
(भारतीय दर्शन – डॉ. नन्द किशोर देवराज)
25. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूट का प्रयोग सही उत्तर का चयन कीजिए। सूची I सूची II
(a) साक्षातप्रतीति:प्रत्यक्षम् i. दिङ्गनाग
(b) विशेषावधारण-प्रधान-प्रत्यक्षम् ii. गंगेश
(c) प्रत्यक्ष-कल्पनापोढ़म ज्ञानम् iii. प्रभाकर
(d) ज्ञानाकरणकम् ज्ञानं प्रत्यक्षम् iv. योग
कूट:
(a) (b) (c) (d)
(a) i ii iii iv
(b) ii i iv iii
(c) iii iv i ii
(d) iv iii ii i
Ans : (c) साक्षातप्रतीति:प्रत्यक्षम् – प्रभाकर विशेषावधारण-प्रधान-प्रत्यक्षम् – योग प्रत्यक्ष-कल्पनापोढ़म ज्ञानम् – दिङ्गनाग ज्ञानाकरणकम् ज्ञानं प्रत्यक्षम् – गंगेश
26. लोकसंग्रह निम्नलिखित में से किस के लिए है?
(a) पीड़ितों के लाभ के लिए
(b) पूर्वजों के लाभ के लिए
(c) जनसमूह के लाभ के लिए
(d) कुछ लोगों के लाभ के लिए
Ans : (c) गीता का लोकसंग्रह का आदर्श प्रागैतिहासिक काल से ही राज्य के लोककल्याणकारी स्वरूप की याद दिलाता है। गीता पुरुषोत्तम एवं मुक्तात्माओं को लोककल्याण हेतु प्रयासरत दिखाकर मानवमात्र को लोककल्याण हेतु प्रेरित करती है। लोकसंग्रह के लिए स्थितप्रज्ञ एक‚ आदर्श पुरुष है‚ जो जनसाधारण के कल्याण के लिए कार्य करता है परन्तु बन्धनों में नहीं पड़ता है।
(भारतीय दर्शन समीक्षात्मक रूपरेखा : राममूर्ति पाठक)
27. निम्नलिखित में से कौन-सा त्रिरत्न नहीं है?
(a) सम्यक् ज्ञान (b) सम्यक् कर्मांत
(c) सम्यक् दर्शन (d) सम्यक् चरित्र
Ans : (b) जैन दर्शन में सम्यक् दर्शन‚ सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित‚ मोक्ष के मार्ग माने जाते हैं। तीनों सम्मिलित रूप से मोक्ष के स्पधन है। इसलिए जैन दार्शनिक इन्हे ‘त्रिरत्न’ कहते हैं।
28. सही क्रम का चयन कीजिए
(a) अर्थ‚ काम‚ धर्म‚ मोक्ष (b) मोक्ष‚ काम‚ धर्म‚ अर्थ
(c) धर्म‚ काम‚ अर्थ‚ मोक्ष (d) धर्म‚ अर्थ‚ काम‚ मोक्ष
Ans : (d) भारतीय मूल्यमीमांसा में जिन चार प्रमुख मूल्यों को माना गया है वो क्रमानुसार‚ धर्म‚ अर्थ‚ काम‚ मोक्ष है।
29. ब्रह्मचर्य के पालन से निम्नलिखित ऋण चुकाए जाते है :
(a) केवल पितृ ऋण
(b) केवल ऋषि ऋण
(c) केवल देव ऋण
(d) केवल पितृ ऋण और देव ऋण
Ans : (b) ब्रह्मचर्य के पालन से केवल ऋषि-ऋण चुकाए जाते है। इसके अतिरिक्त ऋषि-ऋण का एक और तात्पर्य है कि प्राचीन पुरुषों के प्रति सांस्कृतिक दाय के लिए ऋण है‚ जिसे हम स्वाध्याय के द्वारा उस परम्परा को ग्रहण कर‚ उसे आगे की पीढ़ी तक पहुँचाकर उऋृण हो सकते हैं।
(भा. दर्शन- नन्दकिशोर देवराज)
30. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूट का प्रयोग सही उत्तर का चयन कीजिए। सूची I सूची II
(लेखक) (कृति)
(a) ब्रॉड i. लैंग्ग्वेज ऑफ मॉरल्स
(b) अर्बन ii. फाइव टाइप्स ऑफ एथिकल थ्योरी
(c) हेयर iii. मेटाफिजिक्स ऑफ मॉरल्स
(d) कांट iv. फंडामेंटल्स ऑफ इथिक्स
कूट:
(a) (b) (c) (d)
(a) i iii ii iv
(b) iv ii i iii
(c) ii iv iii i
(d) ii iv i iii
Ans : (d) ब्रॉड फाइव टाइप्स ऑफ एथिकल थ्योरी अर्बन फंडामेंटल्स ऑफ इथिक्स हेयर लैंग्ग्वेज ऑफ मॉरल्स कांट मेटाफिजिक्स ऑफ मॉरल्स
31. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए दिए गए कूट की सहायता से सही उत्तर का चयन कीजिए। सूची I सूची II
(चिंतक) (मत)
(a) ़जेनो i. गरिमा की भावना
(b) हीगेल ii. सामाजिक संतुलन
(c) जे.एस.मिल iii. मनुष्य बनो
(d) सैमुअल एलेक्जेंडर iv. प्रकृति के अनुसार जीवन
कूट:
(a) (b) (c) (d)
(a) iv iii i ii
(b) iv ii i iii
(c) iii ii i iv
(d) ii i iii iv
Ans : (a) प्रकृति के अनुसार जीवन .जेनो मनुष्य बनो हीगेल गरिमा की भावना जे.एस.मिल सामाजिक संतुलन सैमुअल एलेक्जेंडर
32. एयर के अनुसार जब आप कहते हैं ‘‘यह अच्छा है’’ तब आप:
(a) अपनी भावनाओं को संप्रेषित कर रहे होते हैं।
(b) अपनी भावनाओं को व्यक्त कर रहे होते हैं।
(c) किसी विशेष बात का विवरण देते हैं।
(d) दूसरों की भावनाओं को प्रभावित करते हैं।
Ans : (b) एयर‚ जो तार्किक प्रत्यक्षवादी दार्शनिक है‚ कहते है कि नैतिक वाक्य वर्णन नहीं‚ वरन् भावनाओं या संवेगों की अभिव्यक्ति
(Express) करता है। यदि कोई कहता है कि ‘‘यह अच्छा है।’’ तो इसका मतलब वह अपनी भावनाओं को ही व्यक्त कर रहा है। अर्थात नैतिक वाक्यों का संवेगात्मक अर्थ ही हो सकता है। एयर का यह मत नैतिक संवेगभिव्यक्तिवाद कहलाता है।
(नीतिशास्त्र‚ सिद्धान्त और व्यवहार – प्रो. नित्यनन्द मिश्र)
33. सूची – I को सूची – II के साथ सुमेलित कीजिए और नीचे दिय गए कूट की सहायता से सही उत्तर का चयन कीजिए। सूची I सूची II
(a) कानूनी सिद्धांन्त i. नैतिक दायित्व का वास्तविक ध्Eोत व्यावहारिक बुद्धि है।
(b) कांट का मत ii. नैतिक दायित्व का दोत राज्य है।
(c) अंत: प्रज्ञावाद मत iii. नैतिक दायित्व का दोत आत्मा है।
(d) आनन्दवाद मत iv. नैतिक दायित्व का अधिरोपण अंतरात्मा द्वारा किया जाता है जो सर्वोच्च सत्ता है।
कूट:
(a) (b) (c) (d)
(a) ii i iv iii
(b) i iii ii iv
(c) iii iv ii i
(d) iv iii ii i
Ans : (a) नैतिक दायित्व का दोत राज्य है। कानूनी सिद्धांन्त नैतिक दायित्व का वास्तविक ध्Eोत कांट का मत व्यावहारिक बुद्धि है। नैतिक दायित्व का अधिरोपण अंत: प्रज्ञावाद मत अंतरात्मा द्वारा किया जाता है जो सर्वोच्च सत्ता है। नैतिक दायित्व का दोत आत्मा है। आनन्दवाद मत
34. निम्नलिखित में से यह किसका कथन है कि ‘‘दंड से विवेक प्राप्त होता है’’। यह दुष्टता के निवारण की कला है :
(a) सुकरात (साक्रीटी़ज) (b) प्लेटो
(c) अरस्तू (अरस्टॉटिल) (d) नीत्से
Ans : (b) प्लेटो ‘दण्ड’ की उपयोगिता उन दुष्ट लोगों के लिए आवश्यक मानते है जो राज्य के कार्यों में बाधा उत्पन्न करते हैं। उनके अनुसार ‘‘दण्ड से विवेक प्राप्त होता है’’। यह दुष्टता के निवारण की कला है।
35. निम्नलिखित में से किसने कहा कि ‘‘सही नियम इस उचित विचार में है कि प्रकृति के अनुसार आचरण किया जाय और यह सार्वभौमिक प्रयोगवाला अपरिवर्तनीय और अनन्तयुगीत होता है।’’?
(a) कांट (b) सिसरो
(c) हीगेल (d) डार्विन
Ans : (b) सिसरो के अनुसार‚ ‘‘सही नियम इस उचित विचार में है कि प्रकृति के अनुसार आचरण किया जाय और यह सार्वभौमिक प्रयोगवाला अपरिवर्तनीय और अनन्तयुगीत होता है।’’
36. मूर के अनुसार आत्मज्ञान की दृष्टि से ‘शुभ’ की परिभाषा होगी :
(a) प्रकृतिवादी दोष
(b) तत्वमीमांसीय दोष
(c) प्रकृतिवादी और तत्वमीमांसीय दोष
(d) प्रकृतिवादी और तत्वमीमांसीय दोष में कोई नहीं
Ans : (a) मूर ने नैतिकता के वर्णनात्मक एवं ज्ञानप्रदानात्मक मत की तीव्र आलोचना की है। मूर के अनुसार‚ आत्मज्ञान की दृष्टि से ‘शुभ’ की परिभाषा देना एक तरह का दोष करना है। जिसे वे ‘प्रकृतिवादी दोष’ कहते है।
(अधिनीतिशास्त्र – V.P.Verma)
37. निम्नलिखित चिन्तकों में से किसने ‘विशेषणों’ को उनके क्रियाओं के अनुसार तीन श्रेणियों (ए-वर्ड्स‚ डी-वर्ड्स‚ जी-वर्ड्स) में वर्गीकृत किया हैं?
(a) एयर (b) हेयर
(c) नॉवेल स्मिथ (d) स्टीवेन्सन
Ans : (c) नॉवेल स्मिथ के अनुसार एक ही शब्द का प्रयोग अनेक प्रकार के द्देश्यों के लिए किया जा सकता है। इसीलिए उन्होने विशेषणों को उनके क्रियाओं के अनुसार तीन श्रेणियों (ए-वर्ड्स‚ डी-वर्ड्स‚ जी-वर्ड्स़ में वर्गीकृत किया है।
(नीतिशास्त्र: सिद्धान्त और व्यवहार: प्रो. नित्यानन्द मिश्र)
38. निम्नलिखित में से कौन नैतिक निर्णय के संबंध में सुसंगत है?
(a) यह एक ‘है’ निर्णय है
(b) यह एक तर्कसंगत निर्णय है
(c) यह एक प्राकृतिक निर्णय है
(d) यह एक निर्देशात्मक निर्णय है
Ans : (d) नैतिक निर्णय तार्किक निर्णय‚ सौन्दर्यशास्त्रीय निर्णय‚ प्रकृतिवादी या वर्णनात्मक निर्णयों से भिन्न है। नैतिक निर्णयों को देखने से पता चलता है कि वे आलोचनात्मक है। वे किसी गुण या दोष को व्यक्त करते है। नैतिक निर्णय नियामक या निर्देशात्मक निर्णय (Normative) है। क्योंकि वे किसी नियम (Norm) या निष्कर्ष के आधार पर दिये जाते है।
(नीतिशास्त्र का सर्वेक्षण: संगमलाल पाण्डेय)
39. निम्नलिखित विचारों में से किसके अनुसार मूल्यनिर्ण य अनिवार्यत: आदेशात्मक हैं?
(a) विवरणवाद (b) संवेगवाद
(c) निर्देशवाद (d) अंत:अनुभूतिवाद
Ans : (c) मूल्य-निर्णय अनिवार्यत: आदेशात्मक हैं। यह मानने वाला विचार निर्देशवाद (Prescriptivism) है।
40. न्यायवाक्यीय आकार में किए गए दोष का पता लगाइये : ए ए आई- 1
(a) अव्याप्त मध्यम पद (b) मुख्य पद अव्याप्त
(c) अमुख्य पद अव्याप्त (d) सत्तात्मक दोष
Ans : (d) मानक निरपेक्ष न्याय वाक्य ए ए आई-1 (A A I-1) में निष्कर्ष ‘I’ विशिष्ट तर्कवाक्य है और आधार वाक्य ‘A A’ सामान्य तर्कवाक्य है। यहां वैध निरूपाधिक न्याय के नियम – 6 का उल्लंघन है जिसके अनुसार जिस वैध निरूपाधिक न्यायवाक्य में निष्कर्ष विशिष्ट होगा उसके दोनों आधार वाक्य सामान्य नहीं हो सकते हैं। ऐसा उल्लंघन करने पर हम बिना सत्तात्मक तात्पर्य वाले दो आधारवाक्यों से एक ऐसा निष्कर्ष निकालते हैं जिसमें सत्तात्मक तात्पर्य होता है। विशिष्ट तर्कवाक्यों में एक विशेष प्रकार के सत्ता का कथन होता है। अत: दिये गये मानक निरपेक्ष न्यायवाक्य AAI-1 में एक तरह का सत्तात्मक दोष है।
41. नीचे अभिकथन (A) और तर्क (R) दिए गए हैं। उन पर विचार कीजिए और नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर दीजिए:
अभिकथन (A) :
किसी सोपाधिक न्याय वाक्य में चतुष्पद दोष घटित होता है यदि उसमें तीन से अधिक पदों का प्रयोग होता है।
तर्क (R) : किसी मानक आकार के सोपाधिक न्याय वाक्य में तीन और केवल तीन पद होते हैं‚ जो पूरे न्याय वाक्य में प्रत्येक‚ समान अर्थ में दो बार घटित होते हैं।
कूट:
(a) (A) और (R) दोनों सत्य हैं और (R)‚ (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(b) (A) और (R) दोनों सत्य है और (R)‚ (A) की सही व्याख्या है।
(c) (A) सत्य है और (R) असत्य है।
(d) (A) और (R) दोनों असत्य हैं।
Ans : (b) न्यायवाक्य वह युक्ति है‚ जिसमें दो आधारवाक्यों से एक निष्कर्ष का निगमन किया जाता है। निरपेक्ष न्यायवाक्य
(Categorical syllogism) वह युक्ति है जिसमें तीन निरपेक्ष तर्कवाक्य होते है। इन तीनों तर्कवाक्यों में कुल मिलाकर तीन पद होते हैं‚ जिनमें प्रत्येक पद दो तर्कवाक्यों में आता है। यदि तीन से अधिक पर्दों का प्रयोग होता है तो वहां चतुष्पद दोष होता है।
(तर्कशास्त्र का परिचय: Irving M. copi (Pandey & Mishra)
42. अरस्तवी एवम् बूलीय की सोपाधिक तर्क वाक्यों की व्याख्या में निम्नलिखित अंतर है:
(a) अरस्तवी व्याख्या विपरीत‚ विरूद्ध‚ उपाश्रयण एवं व्याघात संबंध को स्वीकार करती है जबकि बूलीय व्याख्या केवल व्याघात संबंध को स्वीकार करती है।
(b) अरस्तवी व्याख्या‚ विपरीत‚ विरुद्ध संबंध को स्वीकार करती है और बूलीय व्याख्या केवल व्याघात संबंध को स्वीकार करती है।
(c) अरस्तवी एवं बूलीय दोनों व्याया उपरोक्त सभी संबंधों को स्वीकार करती है।
(d) अरस्तवी एवं बूलीय दोनों उपर्युक्त किसी संबंध को स्वीकार नहीं करती है।
Ans : (b) निरूपाधिक तर्कवाक्यों (Categorical Propositions) से सम्बन्धित अरस्तू की व्याख्या परम्परागत विरोध वर्ग को मान्यता देती हैं जिसमें विपरीत‚ विरूद्ध‚ उपाश्रयण एवं व्याघात संबंध को स्वीकार किया गया है। परन्तु जॉर्ज बूल जो कि आधुनिक प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र के एक प्रवर्तक हैं के अनुसार‚ परम्परागत विरोध-वर्ग में सिर्फ व्याघाती सम्बन्ध को स्वीकार करते हैं।
(तर्कशास्त्र का परिचय : इरूविंग एम. कोपी (पाण्डेय और मिश्र)
43. यदि ‘A’ तर्कवाक्य का परिवर्तन ‘A’ में होता है तथा ‘E’ तर्कवाक्य का प्रतिपरिवर्तन ‘E’ में होता है तो बूल के अनुसार निम्नलिखित तर्क दोष घटित होता है:
(a) मध्यम पद अव्याप्त (b) सत्तात्मक दोष
(c) मुख्य पद अव्याप्त (d) अमुख्य पद अव्याप्त
Ans : (b) बूलीय व्याख्या के अनुसार प्रतिवर्तन किसी भी तर्कवाक्य के साथ वैध है‚ किन्तु परिमित परिवर्तन और प्रतिपरिवर्तन वैध के रूप में अस्वीकृत हैं परिवर्तन ‘E’ और ‘I’ के लिए वैध हैं और प्रतिपरिवर्तन ‘A’ और ‘O’ के लिए वैध है। अत: यदि ऐसा जिस तर्कवाक्य में नहीं है वहां सत्तात्मक दोष होता है।
44. सत्यता एवं वैधता के आलोक में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
(a) किसी युक्ति के निष्कर्ष की सत्यता या असत्यता उसकी वैधता या अवैधता का निर्धारण करती हैं।
(b) किसी युक्ति की वैधता उसके निष्कर्ष की सत्यता की शर्त है।
(c) सत्यता एवं असत्यता का प्रयोग युक्तियों के लिए होता है जबकि वैधता एवं अवैधता का प्रयोग तर्क वाक्यों के लिए होता है।
(d) किसी युक्ति के निष्कर्ष की सत्यता या असत्यता उस युक्ति की वैधता या अवैधता का निर्धारण नहीं करती और यदि कोई युक्ति वैध है तो वह उस युक्ति के निष्कर्ष की सत्यता की शर्त प्रदान नहीं करती।
Ans : (d) किसी युक्ति की वैधता उसके निष्कर्ष की सत्यता या असत्यता पर निर्भर नहीं होता है। युक्ति की वैधता भी निष्कर्ष की सत्यता का दावा नहीं करती है। यदि किसी पूर्वारूपेण वैध युक्ति का निष्कर्ष असत्य है तो उसका एक आधारवाक्य अवश्य असत्य होगा।
45. डी मार्गन सिद्धान्त के संदर्भ में निम्नलिखित में से क्या सही नहीं है?
(a) ~ (pvq) α (~ p . ~ q)
(b) ~ (p . q) α (~ pv ~ q)
(c) ~ (p . q) α ~ ( pvq)
(d) (~ pv ~ q) α ~ (p . q)
Ans : (c) डेमार्गन नियम‚ पुनर्स्थापित का नियम है। ~ (p . q) α (~ pv ~ q) ~ (pvq) α (~ p . ~ q) α ~ (p . q) यहां (~ p . ~ q) α ~ (p . q) α परन्तु (~ pv ~ q) ~ (p v q) अत: तीसरा (c) विकल्प डेमार्गन नियम नहीं है।
47. शाब्दिक प्रतिपत्ति के विरोधाभास के सही प्रतीक क्या हैं?
(a) ~ p ⊃ (q ⊃ p) और p ⊃ (q ⊃ p)
(b) p ⊃ (q ⊃ p) और ~ p ⊃ (p ⊃ q)
(c) ~ p ⊃ (q ⊃ p ) और ~ p ⊃ (p ⊃ q)
(d) p ⊃ (q ⊃ p ) और p ⊃ (p ⊃ q)
Ans : (b) शाब्दिक प्रतिपत्ति
(p ⊃ q) α (~ pvq) का विरोधाभास p ⊃ (q ⊃ p ) और ~ p ⊃ (p ⊃ q) है।
48. कथन आकार को पुनर्कथन कहा जाता है:
(a) यदि इसके सभी प्रतिस्थापन उदाहरण असत्य हैं।
(b) यदि इसके प्रतिस्थापन उदाहरण सत्य एवं असत्य दोनों का मिश्रण हो।
(c) यदि इसके सभी प्रतिस्थापन उदाहरण सत्य हों।
(d) यदि इसके प्रतिस्थापन उदाहरण न तो सत्य हों न असत्य हों।
Ans : (c) जिसके केवल सत्य प्रतिस्थापन- उदाहरण होते हैं‚ वह पुनर्कथन वाक्याकार है। pv~p एक पुनर्कथन है।
49. दो कथनों को शाब्दिक समतुल्य कहा जाता है यदि :
(a) दोनों सत्य हैं और दोनों असत्य हैं।
(b) एक सत्य है और दूसरा असत्य है।
(c) एक असत्य है और दूसरा सत्य है।
(d) इसमें सत्य और असत्य का कोई प्रश्न नहीं होता।
Ans : (a) जब दो वाक्य सत्यता-मूल्य में सम हो अर्थात जब वे दोनों एक साथ सत्य या असत्य हों‚ तब ऐसे वाक्यों को ‘शाब्दिक समतुल्य’ (Materially Equivalent) कहा जाता है। इसका चिन्ह ‘α’ है।
50. निम्नलिखित में से किसने मानव अधिकारों की आलोचना नहीं की है?
(a) बेंथम (b) एलियन पेलेट
(c) लॉक (d) नीत्शे
Ans : (c) लॉक ने राजा के दैवीय अधिकारों के विचार का विरोध किया और तर्क दिया कि मानव के प्राकृतिक अधिकार है‚ सरकार जिनका हनन नहीं कर सकती है। सरकार को इनकी सुरक्षा करनी होती है। अब प्रश्न के अनुसार बेंथम‚ एलियन पेलेट और नीत्शे या तो मानवाधिकार की बात नहीं करते है। या आलोचना करते हैं। अत: विकलप (c) सही है।
51. किस नारीवादी कार्यकर्ता ने ‘द पर्सनल इज पॉलिटिकल’ नारा दिया?
(a) कैरॉल हैरीश (b) साइमन डे बूवो
(c) मैरी आर. बर्ड (d) केट मिलेट
Ans : (a) ‘द पर्सलन इज पॉलिटिकल’ यह एक निबन्ध संग्रह था जो 1969 ई. में कैरॉल हरीश के द्वारा इसी टाइटल से लिखा गया था। यह नारा 60 के दशक में प्रसिद्ध हुआ था। यह द्वितीय नारीवादी लहर में खूब इस्तेमाल हुआ।
52. निम्नलिखित दार्शनिकों में से कौन अर्थ के अनन्त भिन्नता के रूप में खेल मुक्त भाषा को मानता है?
(a) डेरिडा (b) रसेल
(c) विटगन्सटीन (d) हुसर्ल
Ans : (b) डेरिडा अपनी पुस्तक ‘ऑफ ग्रामेटोलॉजी’ में भिन्नता
(Difference) शब्द का प्रयोग करता है। अर्थ के अनन्त भिन्नता के लिए वह खेलमुक्त भाषा को मानता है। उसका दर्शन एक तरह का विखण्डनवाद है। वह अपरिचित शब्दावलियों का प्रयोग करता है और अपने विवेचन को स्वयं कई जगह खण्डित कर भाषा को परम्परागत सीमाओं से परे ले जाना चाहता है।
(समसामयिक राजनीतिक सिद्धान्त: नरेश दधीचि)
53. निम्नलिखित में से कौन सी सूची हाइडेगर के भाषा के चार अवस्थाओं को निरूपित करता है?
(a) अभिकथन‚ प्रवचन‚ व्यर्थ वार्ता और कथन
(b) अभिकथन‚ तर्क‚ मनोभाव और व्यर्थ वार्ता
(c) अभिकथन‚ समझ‚ प्रवचन और वार्ता
(d) अभिकथन‚ तर्क‚ समझ और व्यर्थ वार्ता
Ans : (a) हाइडेगर का भाषा – दर्शन शुरू से ही एक सत्ताविषयक
(ontological) भाव से प्रेरित हैं। वह जगत में मानव-अस्तित्व के अभिव्यक्ति के द्वारा तात्विक सत् जैसी भाषा प्रदर्शित करने की इच्छा रखते है। इसके लिए हाइडेगर भाषा की चार अवस्थाओं को बताते है – (i) अभिकथन (assuage) (ii) Discourse (iii) Idle Talk
(Gerede) (iv) saying (sagen)
54. निम्नलिखित में से किसने अस्तित्व परक प्रवचन के प्रामाणिक तथा अप्रामाणिक आकारों के बीच विभेद किया है?
(a) हाइडेगर (b) हुसर्ल
(c) सार्त्र (d) डेरडा
Ans : (a) अस्तित्व परक प्रवचन के प्रामाणिक और अप्रामाणिक आकारों के बीच भेद मार्टिन हाइडेगर ने किया है। जो एक अस्तित्ववादी विचारक है।
55. हुसर्ल के अनुसार विषयिपेक्षा के तीन प्रमुख प्रकार है:
(a) प्रत्यक्ष‚ अनुमान और मत।
(b) प्रत्यक्ष‚ कल्पना और बुद्धि।
(c) प्रत्यक्ष‚ कल्पना और महत्वीकरण।
(d) प्रत्यक्ष‚ अनुमान और महत्वीकरण।
Ans : (c) हुसर्ल के अनुसार विषयिपेक्षा के तीन प्रमुख प्रकार हैप्रत्यक्ष् ा‚ कल्पना और महत्वीकरण।
56. सत्ता के सत्तामूलक वर्गणा के अंतर्गत सार्त्र द्वारा स्वलक्षण चेतना के दृश्य घटना संबन्धी सूची निम्नलिखित में से कौन सही हैं?
(a) अनिवार्यता‚ सारतत्वता‚ वस्तुपरकता और ख्याति
(b) अनिवार्यता‚ तथ्यपरकता‚ वस्तुपरकता और कलंक
(c) अनिवार्यता‚ सारतत्वता‚ तथ्यपरकता और कलंक
(d) सारतत्वता‚ तथ्यपरकता‚ वस्तुपरकता और ख्याति
Ans : (b) सत्ता के सत्तामूलक वर्गणां के अन्तर्गत सार्त्र द्वारा स्वलक्षण चेतना के दृश्य घटना संबंधी सूची क्रमश: अनिवार्यता‚ तथ्यपरकता‚ वस्तुपरकता तथा कलंक है।
57. गांधीवादी विचार के आलोक में अभिकथन (A) और
तर्क (R) पर विचार कीजिए और सही कूट चुनिए:
अभिकथन (A) :
हड़ताल की क्षमता अहिंसा की पूर्वमान्यता है।
तर्क (R) : हड़ताल निष्क्रिय प्रतिरोध है।
कूट:
(a) (A) और (R) दोनों सत्य हैं और (R)‚ (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सही है किन्तु (R)‚ (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही है किन्तु (R) गलत है।
(d) (A) गलत है किन्तु (R) सही हैं।
Ans : (c) गांधी जी के अनुसार हड़ताल की क्षमता अहिंसा की पूर्वमान्यता तो है परन्तु हड़ताल निष्क्रिय प्रतिरोध न होकर सक्रिय प्रतिरोध है। अत: अभिकथन (A) सही है तथा तर्क (R) गलत है।
58. सूची – I को सूची – II से मिलान कीजिए और नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
सूची I सूची II
(लेखक) (लेखन)
(a) टैगोर i. फाउन्डेशन्स ऑफ इंडियन कल्चर
(b) गांधी ii. सर्च फोर द ऐब्सॅल्यूट इन निओ-वेदान्ता
(c) के. सी. भट्टाचार्य iii. माई रिलीजन
(d) श्री अरविंद iv. थॉट रेलिक्स
कूट:
(a) (b) (c) (d)
(a) i ii iv iii
(b) iv iii ii i
(c) ii iv i iii
(d) iii i ii iv
Ans : (b) टैगोर थॉट रेलिक्स गांधी माई रिलीजन के. सी. भट्टाचार्य सर्च फोर द ऐब्सॅल्यूट इन निओ-वेदान्ता श्री अरविंद फाउन्डेशन्स ऑफ इंडियन कल्चर
59. निम्नलिखित में से किसका यह विचार है कि ‘मांग और आपूर्ति का सिद्धान्त किसी विज्ञान का आधार नहीं हो सकता’।
(a) अम्बेडकर (b) गांधी
(c) विवेकानन्द (d) मार्क्स
Ans : (b) गांधी जी अपने आर्थिक विचार में यह स्पष्ट करते है कि ‘मांग और आपूर्ति का सिद्धान्त किसी विज्ञान का आधार नहीं हो सकता।’
60. ‘रोटी श्रम’ के गांधीवादी सिद्धान्त के बारे में निम्नलिखित में से कौन सही नहीं है?
(a) यह सभी नागरिकों में सादा जीवन को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया था।
(b) यह श्रमिकों की प्रतिष्ठा को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया था।
(c) यह पूंजीवादियों के विरुद्ध प्रतिक्रिया को बढ़ावा देने के लिए किया गया था।
(d) यह प्रचलित श्रम-विभाजन से परे समानता के भाव को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया था।
Ans : (c) ‘रोटी श्रम’ या अन्नदायी श्रम से गांधी जी का तात्पर्य है कि जीवित रहने के लिए हर व्यक्ति को श्रम करना आवश्यक है। हर व्यक्ति स्वेच्छा से ऐसा श्रम करना चाहिए। यह पूंजीपतियों के विरुद्ध प्रतिक्रिया को बढ़ावा नहीं देता है। समाज के सभी वर्ग को कुछ न कुछ शारीरिक श्रम करना चाहिए। बस इसका इतना लक्ष्य है।
(समकालीन भारतीय दर्शन: बसन्त कुमार लाल)
61. निम्नलिखित में से किसने यह कहा है कि ‘यदि हम लोकतंत्र की सच्ची भावना का पोषण करना चाहते हैं तो हम असहिष्णु नहीं हो सकते। असहिष्णुता लक्ष्य के प्रति विश्वासघात है’।
(a) विवेकानन्द (b) अम्बेडकर
(c) तिलक (d) गांधी
Ans : (d) गांधी के अनुसार‚ यदि व्यक्ति को अपने जीने के ढंग को चुनने की सवतत्रता है‚ तो उसके लिए यह भी अनिवार्य होता जाता है कि अन्य व्यक्तियों के ढंगों के प्रति उसके मन में सहिष्णुता हो‚ तथा उनके प्रति भी वह आदर की भावना रखे। यही लोकतंत्र की सच्ची भावना का पोषण करना हुआ।
62. सूची – I को सूची – II से मिलान कीजिए और नीचे दिए गए कूट में से एक चुनकर सही उत्तर दीजिए:
सूची I सूची II
(a) ‘‘ऑन रेफरिंग’’ i. डोनाल्ड डेविडसन
(b) थ्योरी ऑफ डिस्क्रिप्शन ii. जे. एल. ऑस्टिन
(c) टी-सेन्टेसेज iii. पी. एफ. स्ट्रॉसन
(d) स्पीच-ऐक्ट iv. बट्रेन्ड रसेल
कूट:
(a) (b) (c) (d)
(a) iv ii i iii
(b) iii ii iv i
(c) iv iii ii i
(d) iii iv i ii
Ans : (d) पी. एफ. स्ट्रॉसन ‘‘ऑन रेफरिंग’’ बट्रेन्ड रसेल थ्योरी ऑफ डिस्क्रिप्शन डोनाल्ड डेविडसन टी-सेन्टेसेज
जे. एल. ऑस्टिन स्पीच-ऐक्ट
63. फ्रेगे के विचार के आलोक में निम्नलिखित में से कौन सही नहीं है?
(a) व्यक्तिवाचक नाम के साथ निश्चित विवरण में भाव और संदर्भ दोनों होता हैं और उनका संदर्भ उनके भाव द्वारा निर्धारित होता है।
(b) भाव‚ उस वस्तु के प्रस्तुतीकरण की अवस्था है जो अपने अर्थ की अभिव्यक्ति के संदर्भ में ली जाती हैं।
(c) विधेय का संदर्भ अवधारणा है।
(d) संदर्भ प्रस्तुतीकरण का प्रकार हैं
Ans : (d) फ्रेगे के अनुसार‚ सन्दर्भ प्रस्तुतीकरण का प्रकार है। फ्रेगे के अनुसार नाम एवं तर्क वाक्य दोनों में अर्थ एवं सन्दर्भ (Sense and Reference) दोनों होता है। नाम में केवल शब्द निर्देश
(सन्दर्भ) होता है शब्दार्थ नहीं और तर्कवाक्य केवल शब्दार्थ
(sense) होता है‚ सन्दर्भ नहीं।
(दर्शन- पुज-एक गहन दृष्टि- विनोद तिवारी)
64. ‘‘अर्थ का अभिप्राय‚ प्रयोग है’’ इसका तात्पर्य नहीं है कि :
(a) निरर्थक व्याख्यान अर्थहीन है।
(b) भाषीय-खेल जीवन के अलग-अलग रूपों में भिन्न-भिन्न होता है।
(c) यदि भाषा विषयक अभिव्यक्ति इसके भाषीय खेल के संदर्भ में एक उपयुक्त साधन बन जाता है तो यह अर्थपूर्ण है।
(d) भाषा का विश्लेषण उलझन को नहीं समाप्त कर सकता।
Ans : (d) ‘‘अर्थ का अभिप्राय‚ प्रयोग है’’ यह कथन विट्गेन्सटाइन का है जो उपयोग-सिद्धान्त से सम्बन्धित है। यदि भाषा से सम्बन्धित समस्याओं का निराकरण करना है तो भाषीय कथनों के उपयोग या प्रयोग को देखें।
65. जब किसी चीज को अच्छा ‘कहना’ विशेष रूप से प्रशंसा या सराहना या संस्तुति है; इसका अर्थ है:
(a) विवरणात्मक दोष (b) अभिकथन दोष
(c) वाक् क्रिया दोष (d) प्रकृतिवादी दोष
Ans : (c) जब हम किसी चीज को अच्छा ‘कहना’ विशेष रूप से प्रशंसा या सराहना या संस्तुति के अर्थ में करते है तो वहां वाक् क्रिया दोष करते है।
66. नीचे दिए गए अभिकथन (A) और तर्क (R) पर विचार कीजिए और अपने उत्तर के रूप में सही कूट चुनिए:
अभिकथन (A) :
हम यह कल्पना कर सकते हैं कि नीले का अस्तित्व तो है फिर भी नीले का संवेदन नहीं हैं।
तर्क (R) : मूर के अनुसार संवेदन में दो तत्व हैं‚ एक तो चेतना और दूसरा चेतना का विषय।
कूट:
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R)‚ (A) की सही व्याख्या करता है।
(b) (A) और (R) दोनों सही है किन्तु (R)‚ (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही है (R) गलत है।
(d) (A) और (R) दोनों गलत हैं।
Ans : (a) अभिकथन (A) और (R) दोनों सही हैं और (R)‚ (A) की सही व्याख्या है। हम कल्पना कर सकते हैं कि नीले का अस्तित्व तो है फिर भी नीले का संवेदन नहीं है क्योंकि संवेदन में दो तत्व है‚ एक तो चेतना और दूसरा चेतना का विषय।
67. मध्व के दर्शन में निम्नलिखित तर्क वाक्यों में से किसे छोड़ कर शेष सही है:
(a) ब्रह्म प्रत्येक जीव को अंदर से शासित करता है।
(b) प्रत्येक जीव ब्रह्म पर निर्भर है।
(c) जीव मुक्त नहीं है।
(d) प्रत्येक जीव सावयवी रूप से ब्रह्म से संबंधित है।
Ans : (d) रामानुज की तरह मध्व भी अपने दर्शन में ‘जीव’ को ईश्वर अंश माना है। जीव को ईश्वर का अंश मानने के बावजूद मध्वाचार्य रामानुज के अंश-अंशी (सावयवी रूप) को अस्वीकार करते है। मध्व के अनुसार जीव को ईश्वर का अंश कहने का अर्थ है कि जीव ईश्वर का प्रतिबिम्ब है।
(भारतीय दर्शन की समीक्षात्मक रूपरेखा- डॉ राममूर्ति पाठक)
68. बौद्धमत निम्नलिखित में से किसका समर्थन नहीं करता है:
(a) नैरात्म्यवाद (b) स्यादवाद
(c) प्रतीत्यसमुत्पाद (d) क्षणभंगुरवाद
Ans : (b) नैरात्म्यवाद‚ प्रतीत्यसमुत्पाद‚ क्षणभंगुरवाद आदि बौद्धमत हैं वहीं स्यादवाद‚ नयवाद आदि जैनमत हैं।
69. महावाक्य तत्त्वमसि उद्धृत है:
(a) बृह्दारण्यक उपनिषद् में (b) मांडूक्य उपनिषद् में
(c) छांदोग्य उपनिषद् में (d) तैत्तिरीय उपनिषद् में
Ans : (c) ‘तत्वमसि’ महावाक्य का उल्लेख छान्दोग्य उपनिषद
(6/8/7) में प्राप्त होता है। जिसमें त्वम् (जीव) का तत् (ब्रह्म) के साथ ऐक्य या अभेद का ज्ञान कराया गया है। तत्वमसि महावाक्य की विस्तृत व्याख्या नैष्कर्म्यसिद्धि‚ वेदान्तसार‚ और वेदान्तपरिभाषा में मिलती है।
70. सूची – I और सूची – II को सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूट की सहायता से सही उत्तर चुनिए:
सूची I सूची II
(a) सत्ख्याति i. योगाचार बौद्ध
(b) अभिनवअन्यथाख्याति ii. माध्यमिक बौद्ध
(c) आत्मख्याति iii. सांख्य
(d) असत्ख्याति iv. मध्व
कूट:
(a) (b) (c) (d)
(a) iv iii ii i
(b) iii iv i ii
(c) i ii iii iv
(d) ii i iv iii
Ans : (b) सांख्य सत्ख्याति मध्व अभिनवअन्यथाख्याति योगाचार बौद्ध आत्मख्याति माध्यमिक बौद्ध असत्ख्याति
71. ‘अद्वैतियों’ के ‘प्रधान मल्ल’ हैं:
(a) नैयायिक (b) बौद्ध
(c) सांख्य (d) वैशेषिक
Ans : (c) शारीरिक भाष्य में शंकराचार्य ने सांख्य को वेदान्त का प्रधानमल्ल बताया है। उनके अनुसार द्वैतवादी होने के कारण सांख्य को श्रुतिमूलक नहीं माना जा सकता है। अद्वैत वेदान्त ने सांख्य के प्रकृतिपरिणामवाद का खण्डन किया गया है।
(भा. दर्शन : आलोचन और अनुशील- चन्द्रधर शर्मा)
72. निम्नलिखित वाक्यों में से कौन एक रामानुज को स्वीकार्य है?
(a) रामानुज जीवनमुक्ति के प्रमुख साधन के रूप कर्म-योग का समर्थन करते हैं।
(b) रामानुज विदेहमुक्ति के प्रमुख साधन के रूप में ज्ञानयोग का समर्थन करते हैं।
(c) रामानुज विदेहमुक्ति के प्रमुख साधन के रूप में कर्म-
योग का समर्थन करते हैं।
(d) रामानुज विदेहमुक्ति के प्रमुख साधन के रूप में भक्तियोग का समर्थन करते है।
Ans : (d) विशिष्ट द्वैत दर्शन में भक्तिमार्ग को मोक्ष का साधन माना गया है। कर्मयोग एवं ज्ञानयोग भक्ति के अंग है। कर्मयोग से सत्वशुद्धि होती है और सत्वशुद्धि से ज्ञान उत्पन्न होता है। इसके बाद ईश्वर भक्ति उत्पन्न होती है। रामानुज मुक्ति का एक ही रूप मानते है वह है विदेह मुक्ति। यह विदेह मुक्ति अन्यान्य भारतीय दर्शनों में वर्णित विदेह मुक्ति से भिन्न है। रामानुज के अनुसार व्यक्ति इस अवस्था में दोषयुक्त प्राकृतिक शरीर से मुक्त हो जाता है‚ किन्तु वह एक निर्दोष शरीर धारण करता है जो शुद्ध सत्व से निर्मित है। इस तरह रामानुज का मोक्ष सिद्धान्त विदेहमुक्ति के साधन रूप में भक्तियोग की सस्तुति करता हैं।
73. इस्लाम के अनुसार किस एक को छोड़कर सभी निम्नलिखित वाक्य सहीं हैं:
(a) प्रार्थना और उपवास को प्रमुख स्थान दिया जाता है।
(b) दान सर्वोत्तम सद्गुण है।
(c) तीर्थयात्रा ईश्वर की कृप पाने के लिए पवित्र प्रतिज्ञा हैं।
(d) ईश्वर संकल्प के प्रति समर्पण में विफलता।
Ans : (d) इस्लाम धर्म में‚ प्रार्थना और उपवास (रो़जा) को प्रमुख स्थान‚ दिया जाता है‚ दान को सर्वोत्तम गुण माना गया है तथा तीर्थयात्रा ईश्वर की कृपा पाने के लिए पवित्र प्रतिज्ञा माना गया है। इसके अतिरिक्त चोरी न करना‚ मद्य-निषेध की बात भी की गई है। ईश्वर-संकल्प के प्रति समर्पण को माना गया है। कथन (d) इस्लाम धर्म के विपरीत है।
74. जैन मत के अनुसार जीव के बंधन और मुक्ति की प्रक्रिया का सही क्रम है:
(a) बंध‚ सम्वर‚ निर्जरा‚ मोक्ष‚ आदाव
(b) आदाव‚ बंध‚ सम्वर‚ निर्जरा‚ मोक्ष
(c) सम्वर‚ निर्जरा‚ मोक्ष‚ आदाव‚ बंध
(d) निर्जरा‚ मोक्ष‚ आदाव‚ बंध‚ सम्वर
Ans : (b) जैन मत में ‘बंधन और मुक्ति’ की प्रक्रिया क्रमश:
आध्Eाव‚ बंध‚ सम्वर‚ निर्जरा मोक्ष है।
75. जरथुष्ट्रवाद के अनुसार किस एक को छोड़कर निम्नलिखित तर्कवाक्य सही हैं:
(a) जरथुष्ट्रवाद अग्नि-पूजा का समर्थन करता है।
(b) जरथुष्ट्रवाद में ‘अहरमज्दा’ को कल्याण का ईश्वर माना जाता है।
(c) जरथुष्ट्रवाद में ‘अहरिमन’ को बुराई का ईश्वर माना जाता है।
(d) जरथुष्ट्रवाद वर्णाश्रम व्यवस्था का समर्थन करता है।
Ans : (d) वर्णाश्रम व्यवस्था हिन्दु सभ्यता एवं संस्कृति की विशेषता है। जबकि जरथु्रस्टवाद का वर्णाश्रम व्यवस्था पर किसी भी प्रकार का कोई चिंतन नहीं है।

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