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यूजीसी नेट/जेआरएफ परीक्षा‚ जून-2013 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY) व्याख्या सहित तृतीय प्रश्न-पत्र का हल UGC NTA NET JRF Philosophy Previous Papers in Hindi 0014.

UGC NTA NET JRF Philosophy Previous Papers in Hindi यूजीसी नेट/जेआरएफ परीक्षा‚ जून-2013 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY) व्याख्या सहित तृतीय प्रश्न-पत्र का हल

नोट : इस प्रश्नपत्र में पचहत्तर (75) बहु-विकल्पीय प्रश्न हैं। प्रत्येक प्रश्न के दो (2) अंक हैं। सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।
1. न्याय के अनुसार प्रमा निम्नलिखित में से क्या है?
(a) पहले से अज्ञात वस्तु का सही संज्ञान
(b) सही स्मृति
(c) वस्तु जो वास्तव में वहाँ है के गुण का सही अनुबोधक संज्ञान
(d) सम्यक् ज्ञान
Ans. (c) : न्याय दर्शन के अनुसार‚ प्रमा या सम्यक् ज्ञान सदा ‘यथा अर्थ’ पदार्थ के अनुरूप-यथार्थ होता है। अर्थात् वस्तु जो वास्तव में वहाँ है के गुण का सही अनुबोधक संज्ञान। अविरुद्ध या सम्वादि तथा सफल प्रवृत्ति सामर्थ्य भी होना चाहिए।
2. न्याय-वैशेषिक के अनुसार‚ मुक्त आत्मा और सुखाभाव के बीच संबंध निम्नलिखित है:
(a) संयोग (b) स्वरूप
(c) समवाय (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Ans. (b) : न्याय-वैशेषिक दर्शन में आत्मा एक अभौतिक द्रव्य है‚ जिसमें छह गुण है- इच्छा‚ द्वेष‚ प्रयत्न‚ सुख‚ दु:ख और ज्ञान। आत्मा में यह गुण शरीर से संबंधित होने पर आते हैं। आत्मा अपनी मुक्तावस्था में निर्गुण है। उसमें गिनाये गये ये छह गुण अनित्य है। न्याय में मोक्ष एक आभावात्मक अवस्था माना गया है। इसका अर्थ है – दु:खनिवृत्तिमात्र‚ सुख-प्राप्त नहीं। मुक्त आत्मा में स्वरूपत:
बुद्धि‚ इच्छा‚ प्रयत्न‚ धर्म‚ अधर्म‚ द्वेष‚ संस्कार‚ सुख‚ दु:ख आदि का आभाव होता है।
3. सूची – I को सूची- II के साथ सुमेलित करें और नीचे दिये कूटों से सही उत्तर का चयन करें:
सूची – I सूची- II
(बौद्ध सम्प्रदाय) (मत)
A. वैभाषिक i. बाह्य वस्तुओं को अनुमान से जाना जाता है
B. माध्यमिक ii. बाह्य वस्तुओं को सीधे अनुभव किया जाता है।
C. योगाचार iii. ज्ञाता‚ ज्ञेय एवं ज्ञान परस्पर निर्भर होते हैं।
D. सौंत्रान्तिक iv. बाह्य जगत में वस्तुएँ संज्ञान की वास्तविक स्थितियाँ हैं।
कूट :
A B C D
(a) iii ii iv i
(b) iii ii i iv
(c) ii iii iv i
(d) ii iii i iv
Ans. (c) :
a. वैभाषिक − बाह्य वस्तुओं को सीधे अनुभव किया जाता है।
b. माध्यमिक − ज्ञाता‚ ज्ञेय एवं ज्ञान परस्पर निर्भर होते हैं।
c. सौंत्रान्त्रिक − बाह्य वस्तुओं को अनुमान से जाना जाता है।
4. अनुभव के विशिष्ट तथ्यों से सार्वभौम तर्कवाक्यों तक आने की प्रक्रिया कहलाती है
(a) मानसिक संरचना
(b) सरल कारणता
(c) आगमनात्मक सामान्यीकरण
(d) वैध्ेाता का आकारिक प्रमाण
Ans. (c) : अनुभव के विशिष्ट तथ्यों से सार्वभौम तर्कवाक्यों तक आने की प्रक्रिया आगमनात्मक सामान्यीकरण कहलाता है। इसमें विशेष-विशेष तर्क वाक्यों के आधार पर उससे व्यापक सामान्य निष्कर्ष निगमित करते हैं।
5. निम्नलिखित में से कौन सा कथन विचारधारा का शुद्ध गांधीवादी परिपे्रक्ष्य प्रकट नहीं करता है?
(a) अहिंसा बुराई के विरुद्ध सक्रिय नैतिक संघर्ष है।
(b) पाप से घृणा करो और पापी से नहीं।
(c) दण्ड का स्वरूप प्रतिशोधात्मक होना चाहिए।
(d) हिंसा सदैव गलत नहीं होती है।
Ans. (c) गाँधीवादी विचारधारा में अहिंसा और सत्याग्रह पर विशेष बल दिया गया है। दण्ड का प्रतिशोधात्मक स्वरूप अतिशय हिंसा को बढ़ावा देता है। अत: यह गांधीवादियों को मंजूर नहीं होगा।
6. सूची – I को सूची- II के साथ सुमेलित करें और नीचे दिये कूटों से सही उत्तर का चयन करें:
सूची – I सूची – II धर्म प्रार्थना प्रक्रिया
A. बौद्ध धर्म i. गुणस्थानक
B. इस्लाम ii. नाम स्मरण
C. सिक्ख धर्म iii. अष्टांग मार्ग
D. जैन धर्म iv. दिन में पाँच बार प्रार्थना करना
कूट :
A B C D
(a) ii i iv iii
(b) i iii ii iv
(c) iii iv ii i
(d) iv ii i iii
Ans. (c) : बौद्ध धर्म में अष्टांग मार्ग‚ इस्लाम धर्म में‚ दिन में पाँच बार प्रार्थना करना‚ सिक्ख धर्म में नाम स्मरण तथा जैन-धर्म में गुणस्थानक की मान्यता है।
7. गांधी के अनुसार‚ ‘सर्वधर्म समभाव’ का अर्थ है
(a) समस्त धर्मों का संश्लेषण किया जाना चाहिये।
(b) समस्त धर्म नैतिक मूल्य सिखाते हैं।
(c) सभी धर्मों को एक समान समझना चाहिये।
(d) सभी धर्मों में एकत्व है।
Ans. (c) : गाँधी जी ‘सर्वधर्म समभाव’ का अर्थ सभी धर्मों को एक समान समझना चाहिए। उनके अनुसार‚ धर्म एक दृष्टि से जीने का ढंग होता है। अत: व्यक्ति को अपने जीने के ढंग के चयन की स्वतंत्रता होनी चाहिए। यदि ऐसा है तो व्यक्ति के लिए यह भी अनिवार्य होता जाता है कि अन्य व्यक्तियों ने जो अपने-अपने ढंग चुने हैं‚ उन विभिन्न ढंगों के प्रति भी उसके मन में समान भाव हो‚ आदर भाव हो।
8. सूची – I को सूची- II के साथ सुमेलित करें और नीचे दिये कूटों से सही उत्तर का चयन करें:
सूची – I सूची- II धर्म ग्रन्थ
A. पारसी धर्म i. ग्रंथ साहिब
B. यहूदी धर्म ii. अवेस्ता
C. सिक्ख धर्म iii. त्रिपिटक
D. बौद्ध धर्म iv. तालमड
कूट :
A B C D
(a) i iv iii ii
(b) ii i iv iii
(c) iii ii iv i
(d) ii iv i iii
Ans. (d) : पारसी धर्म का अवेस्ता‚ यहूदी धर्म का तालमड‚ सिक्ख धर्म का ग्रन्थ साहिब तथा बौद्ध धर्म का त्रिपिटक प्रमुख पवित्र ग्रन्थ है।
9. निम्नलिखित में से किस सिद्धान्त का मानना है कि एक सत्य प्रतिज्ञप्ति वास्तविक वस्तु-स्थिति का वर्णन करती है?
(a) संसक्तता सिद्धान्त (b) उपयोगितावादी सिद्धान्त
(c) संवृत्तिवादी सिद्धान्त (d) संवाद सिद्धान्त
Ans. (d) : ‘संवाद सिद्धान्त’ के अनुसार एक सत्य प्रतिज्ञप्ति वास्तविक वस्तु स्थिति का वर्णन करती है। सेल के अनुसार किसी प्रतिज्ञप्ति की सत्यता का अर्थ तथ्यों से संवाद है‚ न कि अनुभव से संवाद।
10. सूची – I को सूची- II के साथ सुमेलित करें और नीचे दिये गये कूटों से सही उत्तर का चयन करें:
सूची – I सूची- II
A. रामानुज i. अनिर्वचनीय ख्यातिवाद
B. बौद्ध विज्ञानवाद ii. अन्यथा ख्यातिवाद
C. न्याय iii. आत्म-ख्यातिवाद
D. अद्वैत वेदान्त iv. सत् ख्यातिवाद
कूट :
A B C D
(a) i ii iii iv
(b) iv iii ii i
(c) ii iii i iv
(d) iii ii iv i
Ans. (b) : ‘ख्याति’ (भ्रम) के सम्बन्ध में रामानुज का मत सत्ख्यातिवाद; बौद्ध विज्ञानवाद का मत आत्म-ख्यातिवाद‚ न्याय का मत अन्यथा ख्यातिवाद‚ अद्वैत वेदान्त का मत अनिवर्चनीय ख्यातिवाद‚ प्रभाकर का मत आख्यातिवाद तथा कुमारिल का मत विपरीत ख्यातिवाद कहलाता है।
11. किसका मानना है कि संज्ञान की शर्ते वैधता की निर्धारक नहीं होती?
(a) स्वत: प्रामाण्यवादी (b) परत: प्रामाण्यवादी
(c) (A) और (B) दोनों (d) न (A) और न ही (B)
Ans. (b) : परत: प्रामाण्यवादी मानते हैं कि संज्ञान की शर्ते वैधता की निर्धारक नहीं होती है। उन्हें बाह्य सम्वादि होना पड़ता है। इनके अनुसार प्रामाण्य ज्ञान का स्वभाव या अन्तरङ्ग आवश्यक गुण नहीं है‚ अपितु बाहर से आता है। इसके लिए न्याय दर्शन में परत:
प्रामाण्य सकलप्रवृत्ति सामर्थ्य में बताया गया है।
12. निम्नलिखित में से कौन अभिहितान्वयवादी नहीं है?
(a) गौतम (b) प्रभाकर
(c) मुरारी मिश्र (d) कुमारिल
Ans. (b) : प्रभाकर अन्विताभिधानवाद को मानते हैं जबकि कुमारिल अभिहितान्वयवादी है।
13. न्याय के अनुसार‚ निर्विकल्प ज्ञान निम्नलिखित में से क्या है?
(a) अभिव्यक्ति के अयोग्य तथा अतीन्द्रीय
(b) प्रत्यक्षीकरण की प्रथम अवस्था तथा अभिव्यक्ति के योग्य
(c) अभिव्यक्ति तथा अनुमान के योग्य
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Ans. (a) : न्याय के अनुसार निर्विकल्प ज्ञान आलोचना मात्र है जो नाम‚ जाति आदि कल्पना से रहित होता है। न्याय दर्शन में प्रत्यक्ष ज्ञान के दो भेद निर्विकल्पक तथा सविकल्पक प्राप्त होते हैं। निर्विकल्पक प्रत्यक्ष ज्ञान की पूर्व संख्या है। निर्विकल्पक ज्ञान अभिव्यक्ति के अयोग्य और इन्द्रिय सम्वेदन मात्र (अतीन्द्रिय) हैं।
14. नैयायिकों द्वारा स्वीकार्य ‘लौकिक सन्निकर्ष’ है
(a) संयोग‚ समवाय‚संयुक्त-समवाय
(b) समवाय‚ संयुक्त-समवेत-समवाय
(c) समवेत-समवाय‚ विशेषण-विशेष्य-भाव
(d) उपर्युक्त सभी
Ans. (d) : नैयायिकों में लौकिक प्रत्यक्ष इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष के आभाव में सम्भव नहीं है। लौकिक सन्निकर्ष के पांच भेद है –
संयोग‚ संयुक्त-समवाय‚ संयुक्त-समावेत‚ समवाय‚ समवेत‚ समवाय तथा विशेषण-विशेष्य भाव।
15. निम्नलिखित में से कौन सा एक न्याय के अनुसार व्याप्ति को प्रदूषित करने की शर्त है?
(a) उपाधि (b) असत् प्रतिपक्ष
(c) विरुद्ध (d) बाधित
Ans.(a) : व्याप्ति हेतु और साध्य का अनौपाधिक नियत साहचर्य सम्बन्ध है। न्याय दार्शनिक व्याप्ति की याथर्थता हेतु उपाधि-निरास पर बल देते हैं। व्याप्ति के सम्बन्ध में यह निश्चय कर लेना आवश्यक है कि कहीं स्थापित व्याप्ति में उपाधि तो नहीं है। अन्यथा व्याप्ति को उपाधि‚ प्रदूषित करता है।
16. प्रातिभासिक सत‚ व्यावहारिक सत् और पारमार्थिक सत् सभी निम्नलिखित से संबंधित है:
(a) एक सत (या वास्तविकता)
(b) दो सत (या वास्तविकताएँ)
(c) तीन सत् (या वास्तविकताएँ)
(d) कोई भी सत् नहीं
Ans. (a) : प्रतिभासिक सत्‚ व्यावहारिक सत् तथा पारमार्थिक सत् एक ही सत्ता से संबंधित है। प्रतिभासिक सत् का बाध व्यावहारिक सत् से और व्यावहारिक सत् का बाध पारमार्थिक सत् से हो जाता है। जो वास्तव में एक ही सत् स्वरूपत: ब्रह्म है।
17. वैशेषिकों के अनुसार‚ परमेश्वर विश्व के लिये किस प्रकार का कारण है?
(a) समवायि कारण (b) सहकारी कारण
(c) असमवायि कारण (d) निमित्त कारण
Ans. (d) : वैशेषिक में ईश्वर की कल्पना परमात्मा के रूप में मिलती है जो विश्व के निमित्त कारण और परमाणु उपादान कारण है। ईश्वर का कार्य‚ सर्ग के समय अदृष्ट से गति लेकर परमाणुओं में आद्यस्पन्दन के रूप में सञ्चरित कर देना‚ और प्रलय के समय‚ इस गति का अवरोध करके वापस अदृष्ट में संक्रमित कर देना है।
18. निम्नलिखित में से कौन सा एक प्रकार के नित्यद्रव्यों का समूह हैं?
(a) मनस‚ आत्मा‚ आकाश (b) परमाणु‚ आकाश‚ काल
(c) आकाश‚ काल‚ आत्मा (d) मनस‚ काल‚ आत्मा
Ans. (c) : आकाश‚ काल‚ आत्मा‚ नित्य द्रव्यों का समूह है।
19. नैयायिकों के अनुसार‚ किस प्रकार के कारण का विनाश परिणाम या प्रभाव के विनाश का कारण है?
(a) समवायि कारण (b) असमवायि कारण
(c) निमित्त कारण (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Ans. (b) : असमवायि कारण का विनाश परिणाम या प्रभाव के विनाश का कारण है ऐसा नैयायिकों का मानना है। असमवायि कारण केवल गुण एवं क्रिया होती और उसके विनाश से कार्य का भी विनाश हो जाता है।
20. गुणत्व कौन से प्रकार का सामान्य है?
(a) पर-सामान्य (b) अपर-सामान्य
(c) परापर-सामान्य (d) अखण्डोपाधि
Ans. (c) : ‘गुणत्व’ परापर -सामान्य है। वैशेषिक दर्शन में सामान्य के तीन भेद किये गये हैं – पर‚ अपर और परापर। जिस सामान्य की व्यापकता मध्यवर्ती होती है उसे परापर सामान्य कहते हैं। द्रव्यत्व‚ गुणत्व आदि परापर सामान्य है।
21. सूची – I को सूची- II से सुमेलित कीजिए और निम्नलिखित कूट से सही उत्तर चुनिए:
सूची – I सूची- II
A. रामानुजाचार्य i. चित्‚ अचित‚ ईश्वर
B. माध्वाचार्य ii. शंकर पूर्व वेदान्त
C. योग-वशिष्ठ iii. सविशेष ब्रह्मवाद
D. विवर्तवाद iv. अद्वैत वेदान्त
कूट :
A B C D
(a) i ii iii iv
(b) i iii iv ii
(c) i iii ii iv
(d) i iv iii ii
Ans. (c) :
a. रामानुजाचार्य – चित्‚ अचित‚ ईश्वर
b. माध्वाचार्य – सविशेष ब्रह्मवाद
c. योग-वशिष्ठ – शंकर पूर्व वेदान्त
d. विवर्तवाद – अद्वैत वेदान्त
22. सूची – I को सूची- II के साथ सुमेलित करें औरे नीचे दिये कूटों से सही उत्तर का चयन करें:
सूची – I सूची- II
A. शंकर i. द्वैतवाद
B. रामानुज ii. अद्वैतवाद
C. निम्बार्क iii. विशिष्टाद्वैतवाद
D. माध्व iv. द्वैताद्वैतवाद
कूट :
A B C D
(a) i ii iii iv
(b) i iii iv ii
(c) ii iii iv i
(d) ii iii i iv
Ans. (c) : शंकर का दर्शन अद्वैतवाद‚ रामानुज का विशिष्टाद्वैतवाद‚ निम्बार्क का द्वैताद्वैतवाद तथा माध्व का द्वैतवाद कहलाता है। ये सब मूलत: वेदान्त की परम्परा के दार्शनिक है।
23. जिस अचर से संख्यात्मक फलन प्रणाली के सभी अचरों की परिभाषा दी जा सकती है‚ कहलाता है
(a) स्ट्रासन का आघात/स्ट्रॉक फलन
(b) रसेल का स्ट्रॉक फलन
(c) शेफर का स्ट्रॉक फलन
(d) व्हाइटहेड का स्ट्रॉक फलन
Ans. (c) : जिस अचर से संख्यात्मक फलन प्रणाली के सभी अचरों की परिभाषा दी जा सकती है‚ वह शेफर का स्ट्रॉक फलन कहलाता है।
24. निम्नलिखित में से कौन सा मूलभूत विचार का नियम है?
(a) तर्क का नियम (b) मध्याभाव नियम
(c) योग्यता का नियम (d) द्वि-निषेध का नियम
Ans. (b): तर्कशास्त्र मूलभूत विचार के तीन नियम माने जाते हैं। परम्परा इनको तादात्म्य का नियम‚ व्याघात का नियम और मध्यम परिहार (मध्याभाव) का नियम कहा जाता है।
25. सूची – I को सूची- II के साथ सुमेलित करें और नीचे दिये कूट से सही उत्तर का चयन करें:
सूची – I को सूची- II के साथ सुमेलित करें और नीचे दिये गये कूट से सही उत्तर का चयन करें:
सूची – I सूची- II
A. (p ⊃) . (r ⊃ s)/ i. डी मार्गन ∴ -pv-r-qv-s
B. -(p.q)/∴-pv-q ii. वियोजक न्याय
C. pvq/∴q-p iii. विनिमय
D. (p ⊃ q)/ ∴ (- q ⊃ -p) iv. विनाशक उभयतोपाश
कूट :
A B C D
(a) iv ii i iii
(b) i iii iv ii
(c) iv ii iii i
(d) iv i ii iii
Ans. (*) : इसमें प्रश्न गलत दिया गया है।
(i) डी मार्गन – ∼ (p.q) α (∼ pv∼q) ∼ (pvq) α (∼ p∼q)
(ii) वियोजक न्याय – pvq ∴ q
(iii) विनिमय (pvq) α (qvp)
(p.q) α (q.p)
(iv) विनाशक उभयतोपाश
26. दिए गए विकल्पों में सही उत्तर चुने:
(∃x) [Kx. (y) (Ly ⊃ My)]
(x) Kx ⊃ [(∃y) (Ny. My) ⊃ Ox] ∴ (∃y) (Ny.Ly) ⊃ (∃x)
(a) वैध (b) अवैध
(c) सत्य (d) असत्य
Ans. (*) : उत्तर – संदिग्ध यू0जी0सी0 ने इस प्रश्न को संदिग्ध माना है।
27. ‘बहुत कम मनुष्य ईमानदार है’ – इस कथन में
(a) केवल उद्देश्य पद व्याप्त है।
(b) केवल विधेय पद व्याप्त है।
(c) उद्देश्य पद और विधेय पद दोनों व्याप्त है।
(d) कोई भी पद व्याप्त नहीं है।
Ans. (d): ‘बहुत कम मनुष्य ईमानदार हैं’ जो अंशव्यापी स्वीकारात्मक कथन (I) है। जिसमें उद्देश्य और विधेय दोनों ही अव्याप्त होते हैं अर्थात् व्याप्त नहीं होते हैं।
28. पारम्परिक विरोध-वर्ग में यदि ‘आई’ तर्कवाक्य असत्य है‚ तो निम्नलिखित में से कौन सा निर्धारित हो सकता है?
(a) A, E और O अनिर्धारित है।
(b) A, E और O असत्य है।
(c) A सत्य है‚ E सत्य है और O असत्य है।
(d) A असत्य है‚ E सत्य है और O सत्य है।
Ans. (d): यदि परम्परागत विरोध वर्ग में ‘I’ तर्कवाक्य असत्य है तो ‘A’ असत्य‚ ‘E’ सत्य तथा ‘O’ सत्य होगा। यदि ‘I’ तर्कवाक्य ‘सत्य’ हो तो ‘E’ असत्य‚ ‘A’ और ‘O’ अनिश्चित हो जायेंगे।
29. ~ p q का समतुल्य निम्नलिखित में से कौन सा है?
(a) p ⊃ ~ q (b) q v p
(c) q ⊃ ~ p (d) ~ q ⊃ ~ p
Ans. (b) :
p ⊃ ~ q ∼ ∼ pvq (शाब्दिक प्रतिपति) pvq (द्वि या निषेध) ∴qvp (विनिमय)
30. ’p.q’ ‘p v q’ और ‘p = q’ सभी केवल तभी सत्य है जब
(a) p सत्य है और q असत्य है।
(b) p असत्य है और q सत्य है।
(c) p और q दोनों असत्य है।
(d) p और q दोनों सत्य है।
Ans. (d) : ‘p.q’, ‘pvq’, ‘p ⊃ q’ और p α q सभी केवल तभी सत्य हैं जब p और q दोनों सत्य है। सत्यता सारणी विधि का प्रयोग करने पर ज्ञात होगा।
31. जब एक ही विषय समग्री के बारे में दो तर्कवाक्य इकट्ठे सत्य नहीं हो सकते हैं‚ तो वो
(a) परस्पर व्याघाती हैं।
(b) विपरीत हैं।
(c) या तो परस्पर व्याघाती है या विपरीत हैं।
(d) परस्पर व्याघाती और विपरीत दोनों हैं।
Ans. (c) :यदि एक ही विषय सामग्री के बारे में दो तर्कवाक्य एक साथ सत्य नहीं हो सकते हैं तो वो या तो परस्पर व्याघाती है या विपरीत है।
32. निम्नलिखित में से कौन सा एक तर्कवाक्य सम्बन्धी फलन है?
(a) सभ गायें सफेद अथवा काली होती है।
(b) यदि सुकरात मानव है‚ तो वह नश्वर है।
(c) x मनोहर है।
(d) किसी भी x के लिये‚ यदि x मानव है‚ तो x बौद्धिक है।
Ans. (c): तर्कवाक्य संबंधी फलन है x मनोहर है। तर्कवाक्यीय फलन वह व्यंजक है- प्रथम‚ जिसमें एक वैयक्तिक चर होता है‚ दूसरा‚ जो वैयक्तिक चर के स्थान पर वैयक्तिक अचर रखने पर एक तर्कवाक्य बन जाता है। वैयक्तिक अचर किसी व्यक्ति के नाम होते हैं। (तर्कशास्त्र का परिचय : इरविंग एम. कोपी) (पाण्डेय और मिश्र)
33. जब कोई व्यक्ति एक प्रकार के तथ्यों के साथ किसी अन्य प्रकार के तथ्य समझने की गलती करता है‚ तो वो कौन सी प्रकार की गलती करता है?
(a) काल्पनिक गलती (b) विधि विषयक गलती
(c) नैतिक गलती (d) सुस्पष्ट गलती
Ans. (*): संदिग्ध जब कोई व्यक्ति एक प्रकार के तथ्यों के साथ किसी अन्य प्रकार के तथ्य समझने की गलती करता है तो यह एक प्रकार की गलती है। यह प्रश्न संदिग्ध/गलत माना गया है।
34. प्रतिनिधानवाद के अनुसार विश्वास ज्ञान का स्पष्टीकरण सिर्फ तभी करता है
(a) जब यह असत्य धारणा है।
(b) जब यह सत्य धारणा है।
(c) जब यह सत्य और असत्यता के प्रति उदासीन है।
(d) जब यह सत को चित्रित नहीं करती है।
Ans. (b) : ‘प्रतिनिधानवाद’ के अनुसार विश्वास‚ ज्ञान का स्पष्टीकरण तभी करता है जब वह सत्य विश्वास हो।
35. जी.इ.मूर नैतिक
(a) संज्ञानवादी है। (b) अ-संज्ञानवादी है।
(c) वर्णनात्मकवादी हैं। (d) गैर-वर्णनात्मकवादी है।
Ans. (c): जी. ई. मूर नैतिक वर्णनात्मकवादी है। इन्हें नैतिक अप्रकृतिवादी भी कहा जा सकता है। इनके अनुसार जो भी लोग नैतिकता को प्राकृतिक या अतिप्राकृतिक रूप देना चाहते हैं वे सभी महान नीतिशास्त्री जी.इ.मूर के अनुसार भयंकर भूल करते हैं।
36. सूची – I को सूची- II के साथ सुमेलित करें और नीचे दिये कूटों से सही उत्तर का चयन करें:
सूची – I सूची- II
A. गुणवत्ता का विप्रतिषेध i. विश्व या तो सीमित या असीमित हैं
B. मात्रा का विप्रतिषेध ii. पदार्थ या तो अविभाज्य या अनन्त रूप से विभाज्य है।
C. रूप का विप्रतिषेध iii. विश्व का कारण होना चाहिए या कोई कारण नहीं है।
D. संबंध का विप्रतिषेध iv. तमाम परिवर्तन तथा स्थितियाँ किसी बात की पूर्वकल्पना कर लेते हैं जो बदलता नहीं है और अनानुकूलित है।
कूट :
A B C D
(A) iii iv i ii
(B) iv iii ii i
(C) i ii iii iv
(D) ii i iv iii
Ans. (d):
A. गुणवत्ता का विप्रतिषेध − पदार्थ या तो अविभाज्य या अनंत रूप से विभाज्य है।
B. मात्रा का विप्रतिषेध – विश्व या तो सीमित या असीमित है।
C. रूप का विप्रतिषेध – तमाम परिवर्तन तथा स्थितियां किसी बात की पूर्व कल्पना कर लेते हैं जो बदलता नहीं है और अनुकूलित है।
D. रूप का विप्रतिषेध – विश्व का कारण होना चाहिए या नहीं कोई कारण नहीं है।
37. कांट के लिये निम्नलिखित में से कौन सा सत्य है?
(a) केवल प्रपंचदृश्य का ज्ञान ही संभव है।
(b) परमार्थ अज्ञात तथा अज्ञेय बना रहता है।
(c) दृश्यप्रपंच अज्ञात तथा अज्ञेय बना रहता है।
(d) परमार्थ का ज्ञान ही सम्भव है।
Ans. (c): संदिग्ध प्रश्न माना गया है। कांट ने ज्ञानमीमांसीय दृष्टि से दृश्य प्रपंच (व्यवहार) और परमार्थ का भेद किया है। उसके अनुसार‚ दृश्य प्रपंच एक संबंध विषय और परमार्थ बौद्धिक चिंतन का विषय अर्थात् परमार्थ संबंध अनुभव का विषय नहीं।
38. कांट की ‘लक्ष्यों के साम्राज्य’ की अवधारणा गीता की निम्नलिखित में से कौन सी अवधारणा के लगभग समान हैं?
(a) तपस्या (b) मानवता की एकता
(c) मानववाद (d) अनीश्वरवाद
Ans. (b): कांट के अहैतुक आदेश के पांच सूत्रों में ‘लक्ष्यों के साम्राज्य’ (Kingdom of ends) सूत्र को अभिव्यक्त करता है। जहां सभी मनुष्य अपने लिए स्वयं विधायक है। वह सभी मनुष्यों को स्वयं विधायक मानता है और उनको एक नैतिक शासन व्यवस्था का नागरिक कहता है। यह अवधारणा गीता की ‘मानवता की एकता’ की अवधारणा से मिलता है।
39. सत्तामूलक द्वैतवाद एक सिद्धान्त है जो मानता है कि
(a) मन तथा शरीर एक साथ कार्य करने वाली भिन्न सत्ताएँ हैं।
(b) मन तथा पदार्थ एक दूसरे से स्वतंत्र हैं।
(c) दो परम सत्ताएँ हैं जो संसक्त रूप से इकट्ठे कार्य करती है।
(d) एक दूसरे से स्वतंत्र दो परम सत्ताएँ हैं।
Ans. (d): सत्तामूलक द्वैतवाद वह सिद्धान्त है जो एक दूसरे से परस्पर स्वतंत्र दो परम सत्ताओं को मानता है।
40. न्याय सम्प्रदाय के अनुसार हेतु और साध्य के बीच व्यतिरेक-व्याप्ति तब प्राप्त होती है जब
(a) हेतु की सब स्थितियाँ साध्य की अनुपस्थिति की स्थितियाँ हैं।
(b) हेतु की कुद स्थितियाँ साध्य की स्थितियाँ हैं।
(c) साध्य की कुछ स्थितियाँ हेतु की स्थितियाँ हैं।
(d) साध्य की अनुपस्थिति की सभी स्थितियाँ हेतु की अनुपस्थिति की स्थितियाँ हैं।
Ans. (d): न्याय सम्प्रदाय में व्याप्ति के तीन प्रकार केवल अन्वय‚ केवल व्यतिरेक तथा अन्वय-व्यतिरेक व्याप्ति है। व्यतिरेक व्याप्ति वहां होती है जब साध्य की अनुपस्थिति की सभी स्थितियाँ हेतु की अनुपस्थिति की स्थितियाँ है। जैसे -यह दिखलाना जहाँ-जहाँ अग्नि नहीं है वहाँ-वहाँ धूम्र भी नहीं है।
41. डब्ल्यू.वी.ओ. क्वाइन सत्तामूलक वास्तववादी है क्योंकि वे निम्नलिखित को मानते है:
(a) संदर्भ की अबोधगम्यता (b) अर्थ का चित्र सिद्धान्त
(c) जीवन के रूप (d) पारिवारिक अनुरूपता
Ans. (a): डब्ल्यू. वी. ओ. क्वाइन सत्तामूलक वास्तववादी है क्योंकि वह सन्दर्भ की अबोधगम्यता के सिद्धान्त को मानते हैं।
42. जे. कृष्णामूर्ति के अनुसार‚ सत्य ज्ञान निम्नलिखित में से क्या है?
(a) रहस्यवादियों द्वारा प्रकट (b) अनुभव द्वारा अनुकूलित
(c) धार्मिक चिंतन द्वारा प्राप्त (d) अप्रतिबन्ध जागरूकता
Ans. (d): जे. कृष्णमूर्ति के अनुसार‚ सत्य ज्ञान अप्रतिबन्ध जागरूकता है।
43. अभिप्रेतता की समस्या निम्नलिखित के बीच सम्बन्ध को समझने की है:
(a) मानसिक अवस्था तथा समवर्ती शारीरिक अवस्था।
(b) भिन्न मानसिक अवस्थाएँ
(c) मानसिक अवस्था और वह वस्तु जिससे वह संबंधित है।
(d) भिन्न शारीरिक अवस्थाएँ
Ans. (c): अभिपे्रतता की समस्या मानसिक अवस्था और वह वस्तु जिससे वह संबंधित है के बीच संबंध को समझने की है। हुर्सल चेतना को अभिप्राय विषयक मानते हैं।
44. हाइडेगर ने डाइसीन का चरित्र चित्रण निम्नलिखित के रूप में किया है:
(a) सत्ता का प्रभावी पार्थक्य
(b) अपने आप में सत्ता
(c) अपने लिये सत्ता
(d) आसपास के लोगों और वस्तुओं के साथ प्रभावी संबंध
Ans. (d): हाइडेगर ने ’Da-Sein’ शब्द का अर्थ ‘मानव-अस्तित्व’ है। यह मानव-अस्तित्व‚ अस्तित्व की चेतना के साथ जीवन व्यतीत करने की एक विधा है। इस मानव अस्तित्व का विश्लेषण करने से उसकी विधाएं स्वत: प्रकट हो जाती है। ’Da-Sein’ से तात्पर्य आस-पास के लोगों और वस्तुओं के साथ प्रभावी संबंध।
45. ‘‘हम किस प्रकार के जगत का प्रत्यक्ष बोध एवं अनुभव करते हैं वह इस पर निर्भर करता है कि हम
(सत्ता) किस प्रकार के हैं।’’ यह किसका निष्कर्ष है?
(a) कांट (b) देकार्त
(c) अरस्तू (d) स्पिनो़जा
Ans. (a): कांट के अनुसार‚ ‘‘हम किस प्रकार के जगत का प्रत्यक्ष बोध एवं अनुभव करते हैं वह इस पर निर्भर करता है कि हम
(सत्ता) किस प्रकार से हैं।’’ कांट की प्रसिद्ध पुस्तक “The Perpetual Place” है।
46. तर्क की सत्यता निम्नलिखित के द्वारा सिद्ध होती है:
(a) विरोध का नियम तथा पर्याप्त कारण के सिद्धान्त
(b) केवल पर्याप्त कारण के सिद्धान्त
(c) केवल विरोध के नियम
(d) अंत: प्रज्ञात्मक कल्पना के नियम
Ans. (c): तर्क की सत्यता केवल विरोध (व्याघात) के नियम से सिद्ध होती है। व्याघात नियम के अनुसार‚ कोई वाक्य सत्य और असत्य दोनों नहीं हो सकता है।
47. तर्कवाक्यों के किसी वैज्ञानिक समुच्चय में
(a) सभी तर्कवाक्यों को प्रमाणित किया जा सकता है और सभी पदों की व्याख्या की जा सकती है।
(b) सभी तर्कवाक्यों को प्रमाणित नहीं किया जा सकता‚ परन्तु सभी पदों की व्याख्या की जा सकती है।
(c) सभी तर्कवाक्यों को प्रमाणित किया जा सकता है‚ परन्तु सभी पदों की व्याख्या नहीं की जा सकती है।
(d) सभी तर्कवाक्यों को प्रमाणित नहीं किया जा सकता है और सभी पदों की व्याख्या नहीं की जा सकती है।
Ans. (d) तर्कवाक्यों के किसी वैज्ञानिक समुच्चय में सभी तर्क वाक्यों को प्रमाणित नहीं किया जा सकता है‚ और सभी पदों की व्याख्या नहीं की जा सकती है।
48. मानवाधिकार निम्नलिखित में से किसे मान कर चलते हैं?
(a) मानव की गरिमा
(b) मानव की एक विशेष परिस्थिति में रहन-सहन की उचित स्थिति
(c) एक विशेष समाज में मानव के अधिकार
(d) एक विशेष समाज में मानव के सार्वभौम अधिकार
Ans. (a): ‘मानवाधिकार’ सभी मानकों के मूलभूत अधिकारों की बात करता है जिसमें मानव की गरिमा को विशेष आधार मानकर चला जाता है।
49. नैतिक दायित्व के साथ निम्नलिखित में से कौन सा विकल्प सुमेलित होता है?
(a) शारीरिक अनिवार्यता (b) स्व-आरोपण
(c) बाह्य प्राधिकारी (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Ans. (b): नैतिक दायित्व में आन्तरिक अभिप्रेरण होता है जिसे ‘स्व-आरोपण’ कहा जाता है।
50. कांट के अनुसार नैतिक कर्तव्य का स्वरूप निम्नलिखित है:
(a) परमेश्वर का आदेश
(b) अपनी अंत:प्रज्ञा द्वारा प्रदत्त
(c) शुद्ध तर्क का आदेशसूचक
(d) नैतिकता द्वारा निर्धारित
Ans. (c): कांट के अनुसार नैतिक कर्तव्य का स्वरूप शुद्ध तर्क का आदेश सूचक है। काण्ट कर्तव्य के लिए कर्तव्य सिद्धान्त का समर्थक है। वह नैतिकता के क्षेत्र में अहैतुक आदेश और साहैतुक आदेश की बात करते हैं।
51. ‘‘हमें आत्म-हत्या करने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि हमारा जीवन हमारी अपनी और दूसरों की संयुक्त सम्पत्ति है।’’ – यह वाक्य निम्नलिखित में से किसके क्षेत्र में पड़ता है?
(a) हमारे समाज के प्रति हमारा कर्तव्य
(b) हमारे परिवार के प्रति हमारा कर्तव्य
(c) हमारे अपने प्रति हमारा कर्तव्य
(d) इन सबके प्रति हमारा कर्तव्य
Ans. (d): ’’हमें आत्म-हत्या करने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि हमारा जीवन हमारी अपनी और दूसरों की संयुक्त सम्पत्ति है।’’ यह वाक्य इन सबके प्रति हमारा कर्त्तव्य के क्षेत्र में पड़ता है।
52. निम्नलिखित में से कौन सा कथन गलत है?
(a) जे.एस. मिल नैतिक दायित्व का विवेकपूर्णे स्पष्टीकरण नहीं प्रस्तुत करते हैं।
(b) सिजविक उच्चत्तम शुभ के बारे में अपने विचार में सुखवादी है।
(c) नैतिक निर्णय नैतिक भावनाओं पर निर्भर है।
(d) सौन्दर्यात्मक- बोध सिद्धान्त के अनुसार‚ सुन्दरता नैतिकता का चरम स्तर है।
Ans. (c): ‘नैतिक निर्णय नैतिक भावनाओं पर निर्भर है।’ यह वाक्य गलत है।
53. नैतिकता को तत्त्वमीमांसीय आधार निम्नलिखित में से कौन प्रदान करता है?
(a) आधारभूत गुण (b) स्वतन्त्रता तथा उत्तरदायित्व
(c) आत्मा की अमरता (d) चरित्र का विकास
Ans. (c): नैतिकता को तत्त्वमीमांसीय आधार ‘आत्मा की अमरता’ की अवधारणा प्रदान करती है। हम तत्वमीमांसीय ढंग से आत्मा और उसके स्वरूप पर विचार करते हैं। कर्मवाद और पुनर्जन्म के परिप्रेक्ष्य में आत्मा की अमरता का विचार किया गया है।
54. सूची – I को सूची- II के साथ सुमेलित करें और नीचे दिये कूटों से सही उत्तर का चयन करें:
सूची – I सूची- II
A. कठोरतावाद i. मूर
B. संवेगवाद ii. कांट
C. अंत:प्रज्ञावाद iii. बटलर
D. उपयोगितावाद iv. एयर
कूट :
A B C D
(a) i ii iii iv
(b) ii iv i iii
(c) ii iv iii i
(d) i iv iii ii
Ans. (c): कांट का कठोरतावाद‚ एयर का संवेगवाद‚ बटलर का अंत:प्रज्ञावाद तथा मूर का उपयोगितावाद नीतिशास्त्र के विभिन्न सिद्धान्त है।
55. सूची – I को सूची- II से के साथ सुमेलित करें और दिये गये कूटों से सही उत्तर का चयन करें:
सूची – I सूची- II
A. आत्मा की वास्तविक सत्ता है i. न्याय
B. वैश्विक समरसता के लिये सम्मान ii. नैतिकता की अभिधारणा
C. आधारभूत गुण iii. कर्तव्य
D. प्रतिकारी सिद्धान्त iv. दण्ड
कूट :
A B C D
(A) ii iv i iii
(B) iii ii iv i
(C) i iii ii iv
(D) ii iii i iv
Ans. (d):
(A) आत्मा की वास्तविक सत्ता है ii. नैतिकता की अभिधारणा
(B) वैश्विक समरसता के लिए सम्मान i. कर्तव्य
(C) आधारभूत गुण i. न्याय
(D) प्रतिकारी सिद्धान्त iv. दण्ड
56. संवेदनावाद मानता है कि नैतिक कथन निम्नलिखित स्थिति को व्यक्त नहीं करते हैं:
(a) सत्य या असत्य (b) सत्तामूलक
(c) बौद्धिक/विवेकपूर्ण (d) प्रभावी
Ans. (a): संवेदनावाद (Emotivism) के अनुसार कोई भी नैतिक कथन सत्य या असत्य नहीं हो सकता है। यह नैतिक कथनों के संबंध में अवर्णनात्मक तथा ज्ञाननिरपेक्ष मत है। इस मत के अनुसार‚ नैतिक भाषा ज्ञान देने वाली या किसी प्रकार की वस्तुस्थिति का वर्णन करने वाली भाषा नहीं होती‚ वह तो संवेग या भावना को अभिव्यक्ति करने वाली भाषा होती है।
57. ‘प्रकृतिवादी भ्रान्ति’ है
(a) प्रकृतिवाद का परिणाम
(b) स्वाभाविक सिद्ध ज्ञानमीमांसा का परिणाम
(c) प्राकृति धर्ममीमांसा का परिणाम
(d) प्राकृतिक अवधारणा के साथ नैतिक अवधारणा की पहचान करने का परिणाम
Ans. (d): ‘प्रकृतिवादी भ्रान्ति’ प्राकृतिक अवधारणा के साथ नैतिक अवधारणा की पहचान करने का परिणाम है। जी.ई.मूर के अनुसार नैतिकता को प्राकृतिक या अतिप्राकृतिक रूप देना एक तरह की ‘प्रकृतिवादी भूल’ है।
58. नामवाद एक सिद्धान्त है जो कहता है
(a) ‘सामान्य’ वास्तविक नहीं है अपितु केवल नाम या शब्द है।
(b) ‘सामान्य’ नाम नहीं है।
(c) ‘सामान्य’ तर्क द्वारा स्थापित है।
(d) ‘सामान्य अवधारणाएँ हैं।
Ans. (a): ‘नामवाद’ सामान्य की वास्तविक सत्ता को नहीं मानता है। इसके अनुसार ‘सामान्य’ केवल नाम या शब्द है। ओकम‚ हाब्स‚ बर्कले‚ ह्यूम आदि इसके समर्थक है।
59. निम्नलिखित में कौन-सा कथन मूल्यपरक कथन नहीं है?
(a) ईमानदारी सर्वश्रेष्ठ नीति है।
(b) हम ईमानदारी को श्रेष्ठ नीति मानते हैं।
(c) कभी बेईमानी न करें।
(d) आओ हम सभी ईमानदार बनें।
Ans. (b): ‘हम ईमानदारी को श्रेष्ठ नीति मानते हैं’ यह मूल्यपरक कथन नहीं है।
60. कांट के अनुसार‚ निम्नलिखित में से कौन सा प्रागानुभविक संश्लेषणात्मक निर्णय नहीं है?
(a) सभी वस्तुओं का वजन होता है।
(b) सभी वस्तुओं का निश्चित गुरुत्व होता है।
(c) 9 + 7 • 16
(d) प्रत्येक परिवर्तन का कारण होता है।
Ans. (*): उत्तर- कोई नहीं दिया गया प्रश्न का उत्तर संदिग्ध है। प्रागनुभाविक संश्लेषणात्मक निर्णय कांट के दर्शन की खोज है। ज्ञान के आदर्श प्रतिमान के रूप में प्रागनुभाविक संश्लेषणात्मक निर्णयों की बात करता है।
61. देकार्त के लिये‚ ‘मैं सोचता हूँ’ स्वयं प्रमाणित है क्योंकि
(a) यह एक अनिवार्य सत्य है।
(b) यह एक तार्किक सत्य हैं।
(c) उस पर संदेह करना उसकी पुष्टि है।
(d) सोचना मेरा सार है।
Ans. (c): देकार्त जब अपनी संदेह पद्धति के अन्तर्गत सभी प्रकार के ज्ञानों पर संशय कर लेता है तो वह स्वयं पर संशय करता है। लेकिन देकार्त के अनुसार‚ जब मैं स्वयं पर संशय करता हूं तो संदेहकर्ता की आत्मा का अस्तित्व स्वत: प्रमाणित हो जाता है। इसलिए वह कहता है ‘मैं संशय करता हूँ इसलिए मैं हूं।’
62. स्वधर्म का समर्थन कौन करता है?
(a) कृष्णा (b) रावण
(c) सीता (d) उपर्युक्त सभी
Ans. (a): भगवद्गीता में श्री कृष्णा ने स्वधर्म का उपदेश दिया है। लोकसंग्रह और स्वधर्म को भगवद्गीता का प्रमुख सिद्धान्त माना जाता है।
63. निम्नलिखित में से किसे त्रिरत्न कहा जाता है?
(a) श्रवण‚ मनन‚ निदिध्यासन (b) दर्शन‚ ज्ञान‚ चरित्र
(c) मैत्री‚ कामना‚ मुदिता (d) संघ‚ धम्म‚ बुद्ध
Ans. (b): ‘त्रिरत्न’ की संज्ञा जैन दर्शन में सम्यक् दर्शन‚ सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र को दी गयी है। जो मोक्ष के मार्ग माने जाते हैं। तीनों सम्मिलित रूप से जैन दर्शन भी मोक्ष के साधन है।
64. वैदिक जगत का ऋत किसके समीप है?
(a) विधिक आदेश (b) सत्य
(c) कर्म (d) सामाजिक आदेश
Ans. (b): वैदिक जगत का ऋत सत्य के ज्यादा निकट है। ‘ऋत’ को वेदों के आचार संबंधी सिद्धान्त के रूप में विवेचित किया गया है। वैदिक क्षेत्रों में यह विश्व व्यवस्था का अर्थ देता है।
65. महाभारत में कर्म‚ निम्नलिखित में से किसके साथ ज्यादा सरोकार रखता है?
(a) देव-ऋण (b) पितृ-ऋण
(c) मित्र-ऋण (d) भूत-ऋण
Ans. (*): उत्तर- कोई नहीं यह प्रश्न गलत है। महाभारत में निष्काम कर्म की भावना का उपदेश दिया गया है।
66. आश्रम धर्म के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन सा समूह सुमेलित नहीं है?
(a) गांधी-ब्रह्मचार्य और गृहस्थ
(b) शंकर-ब्रह्मचार्य और संन्यास
(c) याज्ञवल्कय-गृहस्थ और संन्यास
(d) विवेकानंद-ब्रह्मचार्य और गृहस्थ
Ans. (d): गाँधी ब्रह्मचर्य और गृहस्थ‚ शंकर-ब्रह्मचर्य और संन्यास याज्ञवल्कय-गृहस्थ और संन्यास सन्य है‚ परन्तु विवेकानंद ब्रह्मचर्य और गृहस्थ गलत है।
67. ब्रह्मविहार निम्नलिखित को सम्मिलित करता है
(a) मैत्री‚ करुणा‚ विनय‚ उपेक्षा
(b) मैत्री‚ करुणा‚ मुदिता‚ उपेक्षा
(c) विनय‚ करुणा‚ मुदिता‚ उपेक्षा
(d) मैत्री‚ मुदिता‚ उपेक्षा‚ विनय
Ans. (b): ब्रह्मविहार-मैत्री‚ करुणा‚ मुदिता‚ उपेक्षा है।
68. कौन सा सम्प्रदाय धर्मग्रन्थ को प्रत्यक्षबोध से ज्यादा शक्तिशाली मानता है?
(a) जैन (b) बौद्ध
(c) अद्वैत वेदान्त (d) न्याय
Ans. (c): अद्वैत वेदान्त में धर्मग्रन्थ (शाध्Eों) को प्रत्यक्षबोध से ज्यादा शक्तिशाली मानता है। ब्रह्म के विषय में श्रुति के ही प्रबल प्रमाण मानता है। ब्रह्म का ज्ञान वेदान्तशास्त्र से ही होता है।
69. न्याय के अनुसार‚ हम समवाय को इन्द्रिय-वस्तु सन्निकर्ष मानते हैं‚ जिसे —–कहते हैं।
(a) समवाय (b) समवेत समवाय
(c) विशेषणता (d) संयोग
Ans. (b): न्याय के अनुसार‚ हम समवाय को इन्द्रिय-वस्तु सन्निकर्ष मानते हैं‚ जिसे विशेषता कहते हैं।
70. प्रत्यक्ष की परिभाषा ‘प्रत्यक्षम् कल्पनापोढ़म् अभ्रान्तम्’ के रूप में किसने दी है?
(a) वसुबंधु (b) कमलशील
(c) दिग्नाग (d) धर्मकीर्ति
Ans. (d): ‘प्रत्यक्ष कल्पनापोढ़म अभ्रान्तम्’ यह प्रत्यक्ष की परिभाषा आचार्य धर्मनीति की है।
71. पक्षधर्मता निम्नलिखित में से किसके मध्य संबंध है?
(a) हेतु और साध्य (b) पक्ष और साध्य
(c) पक्ष और हेतु (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Ans. (c): न्याय दर्शन में हेतु के सम्बन्ध में पांच गुण बताये गये हैं- पक्षधर्मता‚ सपक्षसत्व‚ विपक्षसत्व‚ असन्प्रतिपक्षत्व या अबाधित्व। पक्षधर्मता पक्ष और हेतु के मध्य सम्बन्ध है।
72. न्याय दर्शन के अनुसार‚ रूपत्त्व के अवबोध के दौरान किस प्रकार का सन्निकर्ष होता है?
(a) समवाय (b) संयुक्त-समवेत-समवाय
(c) समवेत समवाय (d) विशेषणता
Ans. (b): रूपत्व के अवबोध के दौरान संयुक्त-समवेत-समवाय सन्निकर्ष होता है। न्यायदर्शन के अनुसार‚ इस तरह का सन्निकर्ष में संयोग + समवाय + समवाय की अपेक्षा होती है।
73. कांटवादी नैतिक दर्शन में ‘क्रिया का वस्तुपरक सिद्धान्त’ कहलाता है:
(a) सूक्ति (b) नियम
(c) व्यावहारिक नियम (d) आदेश
Ans. (d): कांटवादी नैतिक दर्शन में ‘क्रिया का वस्तुपरक सिद्धान्त’ ‘आदेश’ कहलाता है।
74. केवल प्रयोजन बतला कर आगे बढ़ने वाली परिभाषा क्या कहलाती है?
(a) मानक परिभाषा (b) व्यापक परिभाषा
(c) विस्तृत परिभाषा (d) प्रत्यक्षबोधक परिभाषा
Ans. (d): केवल प्रयोजन बतला कर आगे बढ़ने वाली परिभाषा प्रत्यक्षबोध परिभाषा कहलाती है। परिभाषा के पांच प्रकार तर्कशास्त्र में बतलाये गये हैं- ऐच्छिक‚ कोशीय‚ निश्चायक‚ सैद्धान्तिक‚ पे्ररक परिभाषा है।
75. स्पिनोजा के अनुसार‚ गुण वह होता है जिसे
(a) बुद्धि पदार्थ के सार की रचना करते देखती है।
(b) बुद्धि पदार्थ के आकस्मिक गुणधर्म की रचना करते देखती है।
(c) बुद्धि पदार्थ के भौतिक गुणधर्म की रचना करते देखती है।
(d) बुद्धि पदार्थ के आध्यात्मिक गुणधर्म के रूप में देखती है।
Ans. (a) : स्पिनोजा के अनुसार‚ गुण वह होता है जिसे बुद्धि पदार्थ के सार की रचना करते देखती है। उसके अनुसार‚ ‘‘गुणों से मेरा अभिप्राय वह है जिसे बुद्धि द्रव्य का सारतत्व समझती है।’’

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