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यूजीसी नेट/जेआरएफ परीक्षा‚ जून-2013 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY) व्याख्या सहित द्वितीय प्रश्न-पत्र का हल UGC NTA NET JRF Philosophy Previous Papers in Hindi 0013.

UGC NTA NET JRF Philosophy Previous Papers in Hindi यूजीसी नेट/जेआरएफ परीक्षा‚ जून-2013 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY) व्याख्या सहित द्वितीय प्रश्न-पत्र का हल

1. कर्म के वे फल जो अभी फलित होने शुरू नहीं हुए हैं‚ वे कहलाते हैं
(a) संचित कर्म (b) संचीयमान कर्म
(c) प्रारब्ध कर्म (d) अनारब्ध कर्म
Ans : (a) ऐसी मान्यता है कि कर्म के अनुरूप ही उसका फल मिलता है। भारतीय कर्मफल नियम के अनुसार अच्छे कर्म का अच्छा और बुरे कर्म का बुरा फल मिलता है। को तीन प्रकार का माना गया है- क्रियामाण कर्म‚ प्रारब्ध कर्म‚ तथा संचित कर्म। क्रियामाण कर्म या संचीयमान कर्म वो कर्म है जिन्हे व्यक्ति वर्तमान में करता है और भविष्य में प्रारब्ध एवं संचित कर्म बनते है। प्रारब्ध कर्म वह कर्मशक्ति है जो अतीत में सम्पादित कर्मों से उत्पन्न होती है और जिसका फल मिलना शुरू हो जाता है। संचित कर्म वह कर्मशक्ति या कर्म के फल जो अभी फलित होने शुरू नहीं हुए है। हालांकि आयोग ने विकल्प (d) माना है जो कि गलत है।
2. देवऋण से उऋण हो सकते हैं
(a) यज्ञ करने से
(b) पुत्र को जन्म देने से
(c) (a) और (b) दोनों से
(d) (a) और (b) किसी से भी नहीं
Ans : (a) भारतीय नीतिशास्त्र में विभिन्न प्रकार के ऋण जो मानव पर जन्म के समय से रहते है बताएं गये है जिनमें – पितृऋण‚ ऋषि ऋण‚ और देव ऋण प्रमुख है। पुत्र को जन्म देकर वंशवृद्धि करने से पितृऋण‚ ब्रह्मचर्य पालन और अध्यापन कर ऋषि ऋण तथा यज्ञ करने से देव-ऋण से मुक्ति मिलती है।
3. निम्नलिखित में से सही क्रम का चयन कीजिए:
(a) जागृत‚ सुसुप्ति‚ स्वप्न
(b) जागृत‚ स्वप्न‚ सुसुप्ति
(c) स्वप्न‚ सुसुप्ति‚ जागृत
(d) सुसुप्ति‚ जागृत‚ स्वप्न
Ans : (b) माण्डूक्योपनिषद में जीव (आत्मा) की चार अवस्था का विशद् वर्णन मिलता है जो क्रमश: जाग्रत‚ स्वप्न‚ सुषुप्त तथा तुरीय अवस्था का वर्णन मिलता है जो क्रमश: वैश्वानर‚ तेजस‚ प्राज्ञ तथा ब्रह्म स्वरूप में होती है तुरीय को लेकर आत्मा को चतुष्पात कहा गया है।
(भारतीय दर्शन का सर्वेक्षण – संगम लाला पण्डेय)
4. प्रभाकर और भट्ट का निम्नलिखित में से किस पर मतभेद है?
(a) प्रमाण‚ प्रमेय‚ धर्म
(b) प्रमाण‚ प्रमेय‚ ख्याति
(c) प्रमेय‚ ख्याति‚ धर्म
(d) प्रमाण‚ धर्म‚ ख्याति
Ans : (b) प्रभाकर और भाट्ट मीमांसकों में प्रमाण‚ प्रमेय और ख्याति पर मतभेद है। प्रभाकर जहां प्रत्यक्ष‚ अनुमान‚ शब्द‚ उपमान और अर्थापति को मिलाकर पांच प्रमाण मानते हैं वहीं कुमारिल भट्ट अनुपलब्धि को उपर्युक्त प्रमाणों में जोड़कर छ: प्रमाण मानते है। प्रमेय के विषय में प्रभाकर आठ पदार्थों को मानते है- गुण‚ कर्म‚ सामान्य‚ समवाय‚ शक्ति‚ सादृश्य‚ संख्या वहीं कुमारिल पांच पदार्थों को द्रव्य‚ गुण‚ कर्म‚ सामान्य और आभाव को मानते है। ‘ख्याति’ के सम्बन्ध में प्रभाकर का मत ‘अख्यातिवाद’ तथा कुमारिल का मत ‘विपरीत ख्यातिवाद’ कहलाता है।
5. सूची – I के साथ सूची – II को सुमेलित कीजिए और सही कूट का चयन कीजिए:
सूची I सूची II
(A) अपोहवाद (i) बौद्ध
(B) अंविताविधानवाद (ii) न्याय
(C) अभिहितान्वयवाद (iii) प्रभाकर
(D) अन्यथा ख्यातिवाद (iv) भट्ट
कूट:
(A) (B) (C) (D)
(a) (i) (iii) (iv) (ii)
(b) (iii) (iv) (i) (ii)
(c) (iv) (ii) (iii) (i)
(d) (ii) (iv) (iii) (ii)
Ans : (a) अपोहवाद – बौद्ध अंविताविधानवाद – प्रभाकर अभिहितान्वयवाद – भट्ट अन्यथा ख्यातिवाद – न्याय
6. आत्मा के अमरत्व के निषेध का सिद्धांत किसका है?
(a) पायथागोरस
(b) डेमोक्रीटस
(c) संत ऑगस्टाइन
(d) संत एन्सेल्म
Ans : ( ) यह प्रश्न संदिग्ध माना गया हैं। पायथागोरस‚ संत ऑगस्टाइन और संत अन्सेल्म स्पष्ट रूप से आत्मा के अमरत्व की बात करते है। हालांकि परमाणुवादी आत्मा के पुनर्जन्म या आवागमन सिद्धान्त को असंभव मानते है। डेमॉकिटस भी ग्रीक परमाणुवादी है जो मानता है कि मृत्यु के बाद आत्मा के परमाणु बिखर जाते है।
(पाश्चात्य दर्शन का द्भव और विकास : डॉ हरिशंकर उपाध्याय)
7. प्लेटो के अनुसार दर्शनशास्त्र है
(a) जीवन के लिए तैयारी
(b) अच्छे जीवन के लिए तैयारी
(c) मृत्यु के लिए तैयारी
(d) शांतिपूर्ण मृत्यु के लिए तैयारी
Ans : (c) प्लेटो के अनुसार ‘दर्शनशास्त्र मृत्यु के लिए तैयारी है।
8. निम्नलिखित में से कौन सा सत्कार्यवाद का रूप है?
(a) पारिणामवाद
(b) स्याद्वाद
(c) अनेकान्तवाद
(d) इनमें से कोई नहीं
Ans : (a) सत्कार्यवाद वह सिद्धान्त है जिसमें ‘कार्य’ को उत्पत्तिपूर्व कारण में पहले से विद्यमान माना जाता है। भारतीय दर्शन में सत्कार्यवाद के दो रूप प्राप्त होते है – परिणामवाद और विवर्तवाद। सांख्य-योग और रामानुज का विशिष्ट द्वैत दर्शन परिणामवाद को और अद्वैत वेदान्त‚ महायान बौद्ध विवर्तवाद को मानते है।
9. सूची – I को सूची – II से सुमेलित कीजिए और सही
कूट का चयन कीजिए:
सूची I सूची II
(A) अन्याय (i) सोलह पदार्थ
(B) वैशेषिक (ii) सात पदार्थ
(C) प्रभाकर (iii) आठ पदार्थ
(D) भट्ट (iv) छ: पदार्थ
कूट:
(A) (B) (C) (D)
(a) (i) (ii) (iii) (iv)
(b) (i) (iii) (iv) (ii)
(c) (iii) (iv) (ii) (i)
(d) (iv) (iii) (ii) (i)
Ans : (a) न्याय सोलह पदार्थों को‚ वैशेषिक स्यत पदार्थो को‚ प्रभाकर आठ पदार्थों को‚ तथा भट्ट छ: पदार्थो को मानते है।
10. निम्नलिखित में से कौन सा समूह निरीश्वरवादी दार्शनिकों का है?
(a) बौद्ध‚ जैन‚ न्याय
(b) बौद्ध‚ महायान‚ न्याय
(c) पूर्व-मीमांसा‚ जैन-सर्वास्तिवाद
(d) सर्वास्तिवाद‚ महायान‚ अद्वैत वेदांत
Ans : (c) निरीश्वरवादी दार्शनिकों का समूह-पूर्व-मीमांसा‚ जैन‚ सर्वास्तिवाद। भारतीय दर्शन में निरीश्वरवादी दर्शन में चार्वाक‚ बौद्ध तथा जैन के साथ-साथ सांख्य एवं मीमांसा को रखा जाता है। वहीं ईश्वरवादी दर्शन में न्याय‚ वैशेषिक‚ योग‚ वेदान्त दर्शन को रखा जाता है।
11. निम्नलिखित सिद्धांतों का सही क्रम है:
(a) शून्यवाद‚ अजातिवाद‚ अद्वैतवाद‚ द्वैतवाद
(b) अजातिवाद‚ शून्यवाद‚ द्वैतवाद‚ अद्वैतवाद
(c) शून्यवाद‚ अद्वैतवाद‚ द्वैतवाद‚ अजातिवाद
(d) अद्वैतवाद‚ अजातिवाद‚ द्वैतवाद‚ शून्यवाद
Ans : ( ) यह प्रश्न संदिग्ध माना गया है।
12. चर्वाक द्वारा निम्नलिखित में से कौन सा विकल्प अपनाया गया है?
(a) क्षिति‚ अप‚ तेज‚ आकाश
(b) सुखवाद‚ प्रत्यक्षप्रमाणवाद‚ तेज‚ आत्मा
(c) सुखवाद‚ देहात्मवाद‚ अप‚ तेज
(d) अप‚ तेज‚ मरुत‚ व्योम
Ans : (c) चार्वाक दर्शन एक भौतिकवादी दर्शन है जिसमें चार भूतों क्षिति (पृथ्वी)‚ अप (जल)‚ तेज और समीर (वायु) को माना गया है। शरीर के बिना आत्मा का अस्तितत्व नहीं माना गया है अर्थात् देहात्मवाद को माना गया है तथा ‘सुख’ को चरम लक्ष्य माना गया है। अत: सुखवाद‚ देहात्मवाद‚ अप‚ तजे को माना गया है।
13. जैन मत के अनुसार निम्नलिखित में से कौन सा अस्तिकाय द्रव्य नहीं है?
(a) जीव
(b) आकाश
(c) काल
(d) धर्म
Ans : (c) जैन दर्शन में द्रव्य के दो भेद माने गये है- अस्तिकाय और अनस्तिकाय। अस्तिकाय द्रव्य पांच हैं- जीव‚ पुद्गल‚ आकाश‚ धर्म और अधर्म। जबकि काल को एकमात्रा अनास्तिकाय तथा एक प्रदेशव्यायी द्रव्य माना गया है।
(भारतीय दर्शन: आलोचन और अनुशीलन – चन्द्रधर शर्मा)
14. द्वयगुक का असमवायिकारण क्या है?
(a) परमाणु
(b) परमाणुसंयोग
(c) द्वयणुक
(d) द्वयणुक-संयोग
Ans : (b) असमवायिकारण समवायिकारण (उपादानकारण) में समवाय सम्बन्ध से रहते हुए कार्योत्पत्ति में सहायक होने से कारण कहा जाता हैं यह सदा गुण या कर्म होता हैं परमाणु संयोग जो परमाणुओं में (समवायिकारण में) समवाय सम्बन्ध में रहता है द्वयगुक का असमवयिकारण हैं।
15. ‘अभिकथन’ और ‘तर्क’ पर विचार कीजिए और मध्व दर्शन के संदर्भ में निम्नलिखित विकल्पों का मूल्यांकन कीजिए:
अभिकथन (A) :
प्रकृति‚ जीव और ईश्वर एक दूसरे से स्वतंत्र हैं।
तर्क (R) : ये लौकिक हैं।
कूट:
(a) (A) और (R) दोनों सत्य हैं और (R)‚ (A) की सही सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों असत्य हैं‚ और (R)‚ (A) की सही व्याख्या है।
(c) (A) सत्य हैं‚ और (R) असत्य है और (R)‚ (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(d) (A) असत्य है और (R) सत्य हैं। और (R)‚ (A) की सही व्याख्या है।
Ans : (c) मध्व दर्शन में प्रकृति‚ जीव और ईश्वर को एक दूसरे से स्वतंत्र माना गया है। मध्वाचार्य के अनुसार ईश्वर‚ जीव एवं प्रकृति ये परस्पर भिन्न तत्व हैं और अपनी – अपनी स्वतंत्रत सत्ता रखते हैं। उनके अनुसार ईश्वर‚ जीव‚ एवं प्रकृति की अन्तिम एवं पारमर्थिक सत्ता है। अत: अभिकथन (A) सत्य है परन्तु तर्क (R) गलत है और सही व्याख्या नहीं है।
16. प्रत्येक प्रतिज्ञप्ति पर शंका करने के लिए देकार्त द्वारा प्रयुक्त ऊहा (अटकलों) के संभावित प्रकार हो सकते हैं:
(a) स्वप्न संबंधी अटकलें और ईश्वर
(b) दु:ख स्वप्न अटकलें और पावन भूत (आत्मा)
(c) स्वप्न अटकलें और अशुभ शैतान संबंधी अटकल
(d) ईश्वर और पावन भूत अटकल
Ans : (c) डेकार्ट अपने ‘संशयवादी पद्धति’ के अन्तर्गत सभी प्रकार के प्रतिज्ञपितयों पर संशय करता है। वह स्वप्न और ईश्वर तक पर संशय करता है उसके द्वारा प्रयुक्त ऊहा (अटकलों) के संभावित प्रकार स्वप्न अटकलें और अशुभ शैतान संबंधी अटकलें है।
17. निम्नलिखित में से अष्टांगिक-योग का सही क्रम कौन सा है?
(a) यम‚ नियम‚ आसन‚ प्राणायाम‚ प्रत्याहार‚ ध्यान‚ धारणा‚ समाधि
(b) यम‚ नियम‚ आसन‚ प्राणायाम‚ प्रत्याहार‚ धारणा‚ ध्यान‚ समाधि
(c) यम‚ नियम आसन‚ प्रत्याहार‚ प्रणायाम‚ ध्यान‚ धारणा‚ समाधि
(d) नियम‚ यम‚ आसन‚ प्रत्याहार‚ प्राणायाम‚ धारणा‚ ध्यान‚ समाधि
Ans : (b) योग दर्शन मोक्ष-मांग के रूप में अष्टंगिक योग का मार्ग बताया गया है जिसका सही क्रम – यम‚ नियम‚ आसन‚ प्राणायाम‚ प्रत्याहार‚ धारणा‚ ध्यान समाधि है।
18. निम्नलिखित में से किस धर्म-ग्रंथ में कर्म‚ अकर्म‚ और विकर्म पर विचार किया गया है?
(a) मनुस्मृति
(b) श्रीमद् विष्णुपुराण
(c) भगवद्गीता
(d) श्री नारदपुराण
Ans : (c) भगवद्गीता में कर्म‚ अकर्म‚ विकर्म‚ पर विचार किया गया है। जहां तक विकर्म का प्रश्न है वह तो निषिद्ध कर्म है‚ झूठ बोलना‚ चोरी करना‚ आदि। कर्म और अकर्म के सम्बन्ध में गीता
(4/18) में कहा गया है जो व्यक्ति कर्म में अकर्म तथा अकर्म में कर्म देखता है वह मनुष्यों में बुद्धिमान है और वह योगी अपने सभी करने योग्य कर्मों की कर लेने वाला होता है।
19. स्पिनो़जा के अनुसार ईश्वर है:
(a) मात्र विश्वातीत
(b) मात्र अनुस्यूत
(c) अनुस्यूत तथा विश्वातीत दोनों
(d) अनस्तित्ववान
Ans : (c) स्पिनोजा का प्रसिद्ध कथन है ‘सब ईश्वर है’ और ‘ईश्वर सब है’। उसके अनुसार ईश्वर अनुस्युत तथा विश्वातीत दोनों हैं उनका ईश्वर में विश्वास सर्वेश्वरवाद’ कहलाता हैं वह एक सर्वेश्वरवादी दार्शनिक हैं।
20. सही युग्म का चयन कीजिए:
(a) अध्यास और अध्यवसाय
(b) अविद्या और पराविद्या
(c) मूलाविद्या और तूलाविद्या
(d) माया और संस्कार
Ans : (c) सही युग्म- मूलाविद्या और तूलाविद्या है शंकराचार्य के अनुसार मूलाविद्या व्यक्तिगत भ्रम की अवस्था है जबकि तुलाविद्या सामुहिक भ्रम की अवस्था है इसे स्पिनोजा नेचुरल्स एवं नेचुराल्स कहता है।
21. सी.एस. पर्स‚ विलियम जेम्स और जॉन ड्यूई जैसे व्यावहारिकतावादियों के अनुसार सत्य है
(a) सदैव परिवर्तनशील‚ यह समय और स्थान तथा प्रयोजन के सापेक्ष।
(b) स्थिर और समय और स्थान तथा प्रयोजन के सापेक्ष।
(c) सदैव परिवर्तनशील‚ लकिन समय और स्थान तथा प्रयोजन के सापेक्ष नहीं
(d) कभी परिवर्तनशील और कभी स्थिर
Ans : (a) सी. ए. पर्स.‚ विलियम जेम्स तथा जॉन ड्यूई अर्थक्रियात्वादी (व्यावहारिकतावादी) दार्शनिक हैं। जिनके अनुसार सत्य सदैव परिवर्तनशील‚ यह समय और स्थान तथा प्रयोजन के सापेक्षा है इनका सिद्धान्त सत्य का आर्थक्रियावादी सिद्धन्त है।
22. निम्नलिखित में से कौन सा गुणाष्टक का भाग नहीं है ?
(a) ऐश्वर्य
(b) तेज
(c) अभिहित संकल्पत्व
(d) तीर्य
Ans : (c) अभिहित संकल्पत्व गुणाष्टक का भाग नहीं हैं।
23. निम्नलिखित में से किसने आत्मा स्वतन्त्र्य की संकल्पना का पतिपादन किया है?
(a) के. सी. भट्टाचार्य
(b) एम.एन. रॉय
(c) ए. के. कुमारस्वामी
(d) एस. राधाकृष्णन्
Ans : (a) के.सी. भट्टाचार्य आत्म स्वातन्त्र्य की संकल्पना’ का प्रतिपादन करते है। कोट के नैतिकता एवं स्वतंत्रता विचार की विवेचना करते हुए के. सी. भट्टाचार्य ने दो प्रकार की ‘स्वतंत्रता का उल्लेख किया है- संकल्पनात्मक स्वतंत्रता तथा तात्विक स्वतंत्रता और यह अभी कहा कि अनुभूति की प्रक्रिया पहले प्रकार्य की स्वतंत्रता से होकर दूसरे प्रकार की स्वतंत्रता तक के विकास की क्रमिक प्रक्रिया है।
(समकालीन भारतीय दर्शन- बसन्त कुमार लाल)
24. डॉ. एस. राधाकृष्णन् के अनुसार बौद्धिक ज्ञान निम्नलिखित में से किससे प्राप्त किया जा सकता है?
(a) कल्पना और संवेदना
(b) विश्लेषण और संश्लेषण
(c) संश्लेषण और अपाकर्षण
(d) कल्पना और अपाकर्षण
Ans : (b) डॉ. एस. राधाकृष्णन के अनुसार बौद्धिक ज्ञान विश्लेषण और संश्लेषण से प्राप्त किया जा सकता है। उनके अनुसार बौद्धिक विचार मन का व्यापार है। उनके अनुसार ज्ञानोपार्जन के तीन ढंग सम्भव है – इन्द्रिय- अनुभव‚ बौद्विक अवगति तथा अनृर्दृष्टि। सत् के ज्ञान के लिए ‘अन्तदृष्टि’ ही उपर्युक्त है।
25. ‘अतिमन’ की संकल्पना निम्नलिखित में से किस दार्शनिक से संबद्ध है?
(a) डॉ. एस. राधाकृष्णन्
(b) डॉ. टी. एम. पी. महादेवन्
(c) श्री अरबिन्द
(d) डॉ. के. सी. भट्टाचार्य
Ans : (c) ‘अतिमन’ की संकल्पना श्री अरविन्द के दर्शन में मिलता है। श्री अरविन्द अपने विकासवादी दर्शन के अनुसार सत् के आठ स्तर है प्रथम चार स्तर – शुद्ध अत्‚ चित्त-शक्ति आनन्द एवं आतिमानस उच्चतर गोलार्द्ध में तथा अन्तिम चार-मानव‚ मन‚ प्राण‚ जड़तत्व निम्नतर गोलार्द्ध में है। विकास प्रक्रिया सत्ता निम्नतर गोलार्द्ध में व्यक्त हो चुकी हैं अब यह उच्चतर गोलार्द्ध अतिमानस के रूप में विकसित होगी।
26. ‘कॉमेंटरीज ऑन लिविंग’ नामक पुस्तक के लेखक कौन हैं?
(a) डॉ. बी. आर. अम्बेडकर
(b) श्री जे. कृष्णमूर्ति
(c) एम. एन. रॉय
(d) श्री के. सी. भट्टाचार्य
Ans : (b) ‘कॉमेंटरीज ऑन लिंविगं’ फ्रीडम फ्रॉम द नोन‚ द बुक ऑफ लाइफ द फर्स्ट एण्ड लास्ट फ्रीडम आदि पुस्तके श्री जे.
कृष्णमूर्ति की है।
27. निम्नलिखित में से किसने रामकृष्ण मठ और मिशन का अग्रणी संस्थापक माना जाता है?
(a) श्री रामकृष्ण परमहंस
(b) श्री रमण महर्षि
(c) स्वामी विवेकानंद
(d) श्री रंगनाथानंद महाराज
Ans : (c) रामकृष्ण परमहंस के प्रमुख शिष्यों में से एक स्वामी विवेकानन्द को रामकृष्ण मठ और मिशन के अग्रणी संस्थापक माना जाता हैं उन्होंने कलकत्ता के निकट बेलमेर में स्वामी रामकृष्ण आश्रम की स्थापना की।
28. ‘दर्श्न’ शब्द से तात्पर्य है
(a) ईश्वर के लिए प्रेम
(b) मानव मात्र के लिए प्रेम
(c) जीवन का प्रेम
(d) ज्ञान के लिए प्रेम
Ans : (d) ‘अंग्रेजी में ‘दर्शन’ शब्द ‘फिलॉसॉफी’ से बना है।’ ‘फिल’ तथा ‘सोफिया’ से बना है शब्द का अर्थ ‘ज्ञान के लिए प्रेम’ है।
29. प्लेटों और अरस्तू दोनों के अनुसार ज्ञान का संबंध होना चािहए
(a) आकार से नहीं भौतिक द्रव्य से
(b) भौतिक द्रव्य और आकार दोनों से
(c) न तो भौतिक द्रव्य से ही आकार से
(d) भौतिक द्रव्य से नहीं आकार से।
Ans : (d) प्लेटो और अरस्तू दोनों के अनुसार ज्ञान का संबंध भौतिक द्रव्य से नहीं आकार से है। प्लेटो अपने आकार को प्रत्यय कहते हैं जिनका ज्ञान बुद्धि के द्वारा होता है ज्ञान का विषय शाश्वत और अनिवार्य सत्ता है।
30. क्या यह संभव है कि दो चिदगुओं में सभी गुण एक समान हों?
(a) हाँ
(b) संभवत:
(c) कुछ अपवादपूर्ण मामलों में
(d) नहीं
Ans : (d) लाइबनित्ज का दर्शन ‘चिदगुवाद’ कहलाता है। लाइबनित्ज के ‘चिदगु’ सजातीय है परन्तु उनकी अपनी विशिष्टता हैं प्रत्येक चिदगु की अलग पहचान हैं कोई भी दो चिदणु एक नहीं हैं। ‘अदृश्यों के अभेद’ नियम को स्वीकार करता है। अत: लाइबनित्ज के चिदगुणुओं में सभी गुण एक समान नहीं है।
31. निम्नलिखित में से कौन सी प्लेटोवाद अैर अरस्तूवाद की स्थायी विरासत है?
(a) वैश्विक दृष्टिकोण
(b) सप्रयोजन दृष्टिकोण
(c) अन्वेषणपूर्ण दृष्टिकोण
(d) अनौपचारिक दृष्टिकोण
Ans : (b) प्लेटोवाद और अरस्तूवाद विचारधारा सप्रयोजन दृष्टिकोण की मानते है। जहां प्लेटो अपने प्रत्ययों के अस्तित्व सिद्धि के लिए सप्रयोजनवादी दृष्टि अपनाता है वहीं अरस्तु विकास की प्रयोजन मानते है। इनके अनुयायियों ने भी श्रृष्टि की प्रयोजनमूलक मानकर ईश्वर की सत्ता की सिद्ध करने का प्रयास किया है।
32. अरस्तू के अनुसार ईश्वर है
(a) स्थिर‚ शाश्वत‚ परिपूर्ण‚ अमूर्त और विशुद्ध वास्तविकता
(b) स्थिर‚ शाश्वत‚ परिपूर्ण‚ अमूर्त और विशुद्ध क्षमता
(c) स्थिर‚ शाश्वत‚ परिपूर्ण‚ मूर्त और विशुद्ध क्षमता
(d) स्थिर‚ शाश्वत‚ परिपूर्ण‚ मूर्त और विशुद्ध वास्तविकता
Ans : (a) अरस्तू का ईश्वर एक निरपेक्ष (पूर्ण) आकार है। अरस्तू के अनुसार ईश्वर स्थिर (अचल)‚ शाश्वत‚ परिपूर्ण‚ अमूर्त‚ विशुद्ध वास्तविकता हैं अरस्तु के अनुसार ईश्वर ‘अचालित चालक’ है। अरस्तु का ईश्वर शुद्ध विचार या विचार ही विचार है।
33. ईश्वर के अस्तित्व के संबंध में सत्तामूलक प्रमाण का प्रतिपदन निम्नलिखित में से किसने किया है?
(a) संत एनसेल्म और रामानुज
(b) संत थॉमस एक्विनस और मध्व
(c) संत थॉमस एक्विनस और पतंजलि
(d) संत एनसेलम् और पतंजलि
Ans : (d) ईश्वर के अस्तित्व के सम्बन्ध में सत्तामूलक प्रमाण का प्रतिपादन संत अन्सेलम ने और पतंजलि ने दिया हैं संत अन्सेलन को प्रत्यय सत्तामूलक पुस्तिका प्रवर्तक माना जाता हैं। संत अन्सेलम की युक्ति ईश्वर के जन्मजात प्रत्यय पर आधारित है। जबकि
34. बर्कले के अनुसार
(a) प्रत्ययों का अस्तित्व है‚ लेकिन मन का नहीं।
(b) मन का अस्तित्व है‚ लेकिन प्रत्ययों का नहीं।
(c) प्रत्ययों और मन दोनों का अस्तित्व है।
(d) प्रत्यय या मन किसी का भी अस्तित्व नहीं है।
Ans : (c) बर्कले के अनुसार प्रत्यय और मन दोनों का अस्तित्व हैं बर्कले प्रत्ययों के सम्बन्ध में लॉक द्वारा मान्य बाह्य जगत की सत्ता का खण्डन करते है। बर्कले के अनुसार आत्मा (मन) और प्रत्यय
(ज्ञेय) के अतिरिक्त कोई जड़वस्तु सत् नहीं है। उनके अनुसार जो अनुभव का विषय है वही सत् है और अनुभव का विषय प्रत्यय है। इन प्रत्ययों को अनुभावकर्त्ता मन (आत्मा) है।
35. आगमन के युक्तियुक्त आधार को किसने चुनौति दी थी?
(a) देकार्त
(b) प्लेटो
(c) कांट
(d) ह्यूम
Ans : (d) ह्यूम ने अपने अनुभववादी दर्शन में सभी प्रकार के ज्ञानों पर संशय किया। वह कारण-कर्म संबंध पर भी संशय करते हैं इसी कड़ी में वह आगमन से प्राप्त निष्कर्षों पर भी संशय करते है। उनके अनुसार‚ आगमन से प्राप्त निष्कर्षों पर मनोवैज्ञानिक रूप से विश्वास तो किया जा सकता है परन्तु तार्किक रूप से नहीं। इसे दर्शन जगत में आगमन की समस्या के नाम से जानते है।
36. लाइब्नित्ज के अनुसुार
(a) पर्याय के चार प्रकार है।
(b) पर्याय के तीन प्रकार हैं।
(c) पर्याय के दो प्रकार हैं।
(d) पर्याय के पाँच प्रकार हैं।
Ans : ( ) लाइबनित्ज‚ चिदगुवाद के प्रणेता है जबकि स्पिनोजा पर्यायों का सिद्धान्त देते हैं स्पिनोजा के अनुसार‚ विकार द्रव्य की परिवर्तित आकृतियां है। विकार वह हैं जो दूसरों पर आश्रित होता है और उसके द्वारा समझा भी जाता है।
37. हेगल के अनुसार बुद्धि है
(a) ब्रह्माण्ड का द्रव्य‚ लेकिन इसकी अनंत ऊर्जा नहीं।
(b) ब्रह्माण्ड की अनंत ऊर्जा‚ लेकिन इसका द्रव्य नहीं।
(c) ब्रह्माण्ड की एकमात्र अनंत ऊर्जा।
(d) ब्रह्माण्ड का द्रव्य और अनंत ऊर्जा।
Ans : (d) हेगल के अनुसार ‘बुद्धि’ ब्रह्माण्ड का द्रव्य और अनन्त ऊर्जा हैं हेगल के दर्शन में ‘बुद्धि’ के नियामक होने के साथ-साथ उपादानात्मक भी है।
38. लॉक की मान्यता है कि द्रव्य की अवधारणा है
(a) सरल प्रत्यय
(b) जटिल प्रत्यय
(c) विशिष्टि प्रत्यय
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Ans : (b) लॉक की मान्तयता है कि द्रव्य की अवधारणा जटिल प्रत्ययों से बनती हैं द्रव्य कि जटिल प्रत्यय स्वतंत्र वस्तुओं का प्रतिनिधित्व करने वाले सरल प्रत्ययों के सम्मिश्रण से बनते है। द्रव्य गुणों के जटिल प्रत्यया से बनता है जो विशेष वस्तुओं का प्रतिनिधित्व करता है।
39. कांट के अनुसार नैतिक कर्तव्य है
(a) ईश्वरीय आदेश
(b) विशुद्ध तर्क का आदेश
(c) बहुमत से निधारित
(d) किसी के अंत:ज्ञान द्वारा निर्दिष्ट
Ans : (b) काण्ट के अनुसार नैतिक कर्त्तव्य विशुद्ध तर्क (शुद्ध बुद्धि) का आदेश हैं काण्ट के दर्शन में ‘आदेश’ (Imperative) की परिभाषा यह है ‘‘जो विषयगत सिद्धान्त किसी इच्छा के लिए आवश्यक कर्त्तव्य हो उसका प्रत्यय बुद्धि की आज्ञा है और इस आज्ञा का सूत्र आदेश हैं।’’
(नीतिशब्द का सर्वेक्षण- संगमलाल पाण्डेय)
40. ‘‘समाज का अस्तित्व समाज के लिए नहीं’’। लेकिन ‘‘उस व्यक्ति के लिए हैं‚ जो अपने उच्च कार्य में बढ़ना चाहता है और सत्ता के उच्च स्तर को प्राप्त करना चाहता है।’’‚ यह कथन निम्नलिखित में से किसका है?
(a) हेगल
(b) नीत्शे
(c) श्री अरबिन्द
(d) मार्क्स
Ans : (b) नीत्शे के अनुसार ‘समाज का अस्तित्व समाज के लिए नहीं लेकिन ‘‘उस व्यक्ति के लिए है‚ जो अपने उच्च कार्य को बढ़ाना चाहता है और सत्ता के उच्च स्तर को प्राप्त करना चाहता है नीत्शे का दर्शन व्यक्तिकेन्दिर मूल्यवाद है जो एक तरह का अतिमानववाद है।
41. रसेल के आणविक तथ्य हैं
(a) आणिविक भौतिक के तथ्य
(b) इंद्रिय प्रदत्त
(c) तार्किक स्थान के तथ्य
(d) आणविक संवाक्य के तत्व
Ans : (b) रसेल के आणविक तथ्य’ इन्द्रिय प्रदत्त (Sense Data) है सबसे सरल – अविभाज्य‚ तथा‚ जिसे और छोटा नहीं किया जा सके जिसके अंगों के विषय में सोचा न जा सके‚ उनके लिए ‘आण्विक तथ्य’ का व्यवहार रसेल के दर्श्न में मिलता है इन्हे सरल तथ्य’ भी कहा है।
42. हुसर्ल निम्नलिखित में से किसका समर्थक है?
(a) निरपेक्ष प्रत्ययवाद
(b) निरपेक्ष व्यवहारवाद
(c) अतीन्द्रिय प्रत्ययवाद
(d) अतीन्द्रिय बुद्धिवाद
Ans : (c) हुसर्ल अतीन्द्रिय प्रत्ययवाद का समर्थन करता है। हुसर्ल को यह स्वीकार्य है कि उनकी फेनोमेनोलॉजी की विधि अन्तत: एक अतीन्द्रिय (अनुभवातीत) आत्मनिष्ठता तक की जाती है। जिसका एक विवरण ‘प्रत्यावाद’ के रूप में करते है।
43. निम्नलिखित में से हाइडेगर ने डा़जाइन के गुणों को किस में प्रकट किया है?
(a) सत्ता की प्रभावी एकान्तता
(b) स्वयं – सत्
(c) आस – पास के लोगों और वस्तुओं से प्रभावी संबंध
(d) स्वयं के लिए सत्
Ans : ( ) हाइडेगर मानव अस्तित्व (Dasein) के गुणों को आसपास लोगों और वस्तुओं से प्रभवी संबंध के रूप में प्रकट किया है। हाइडेगर के अस्तित्व विश्लेषण के दो ढंगों की बात से ontical और दूसरा ontological
44. सूची – I को सूची – II से सुमेलित कीजिए और प्रदत्त
कूट से उत्तर का चयन कीजिए:
सूची I सूची II
(A) मशीन में भूत (i) जी.ई. मूर
(B) तत्वशास्त्र का निरसन (ii) ऑस्टिन
(C) समान्य बुद्धि की रक्षा (iii) ए.जे. एअर
(D) वाक् क्रिया (iv) गिल्बर्ट राइल
कूट:
(A) (B) (C) (D)
(a) (iv) (iii) (ii) (i)
(b) (iii) (iv) (i) (ii)
(c) (ii) (iii) (i) (iv)
(d) (iv) (iii) (i) (ii)
Ans : (d) गिल्बर्ट राइल का मशीन में भूत‚ ए.जे. एयर का तत्त्वमीमांसा का मिरसन‚ जी.ई. मूर का सामान्य बुद्धि की रक्षा‚ तथा ऑस्टिन का वाक्क्रिया।
45. सूची – I को सूची – II से सुमेलित कीजिए और प्रदत्त
कूट से उत्तर का चयन कीजिए:
सूची I सूची II
(A) प्लेटो (i) क्रिटिक ऑफ प्योर रीजन
(B) कांट (ii) फाउंडेशन ऑफ इम्पीरियल नॉलेज
(C) विट्गेन्सटाइन (iii) रिपब्लिक
(D) एअर (iv) फिलोसोफिकल इन्वेस्टिगेशन
कूट:
(A) (B) (C) (D)
(a) (iii) (ii) (i) (iv)
(b) (iii) (i) (iv) (ii)
(c) (iv) (ii) (i) (iii)
(d) (iv) (iii) (ii) (i)
Ans : (b) प्लेटो द्वारा ‘रिपब्लिक’; काण्ट द्वारा क्रिटिक ऑफ प्योर रीजन’ विट्गेन्सटाइन द्वारा ‘फिलोसोफिकल इन्वेस्टिगेशन’; एअर के द्वारा फाउंडेशन ऑफ इम्पीरियल नॉलेज का लेखन किया गया है।
46. सूची – I को सूची – II से सुमेलित कीजिए और प्रदत्त
कूट से सही उत्तर का चयन कीजिए:
सूची I सूची II
(A) रिलीजन ऑफ मैन (i) श्री अरबिन्दो
(B) फ्रीडम फ्रॉम द नोन (ii) श्री आर. टैगोर
(C) ईस्टर्न रिलीजन (iii) श्री. जे. कृष्णमूर्ति एण्ड वेस्टर्न थॉट
(D) द लाइफ डिवाइन (iv) एस. राधाकृष्णन्
कूट:
(A) (B) (C) (D)
(a) (i) (iii) (ii) (iv)
(b) (ii) (i) (iv) (iii)
(c) (iii) (iv) (i) (ii)
(d) (ii) (iii) (iv) (i)
Ans : (d) श्री आर. टैगोर द्वारा ‘रिलीजन ऑफ मैन’; श्री. जे.
कृष्णमूर्ति द्वारा ‘फ्रीडम फ्रॉम द नोन’; एस. राधाकृष्णन् द्वारा ‘ईस्टर्न रिलीजन एण्ड वेस्टर्न थॉट’ तथा श्री अरबिन्दो द्वार ‘द लाइफ डिवाइन’ नामक लिखी गई है।
47. लाइब्नित़्ज चिदणु को परिभाषित करते हैं
(a) भौतिक द्रव्य जैसा
(b) मानसिक द्रव्य जैसा
(c) ऊर्जा के केन्द्र जैसा
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं
Ans : (c) लाइबनित्ज चिदणुओं को सम्बन्ध ‘ऊर्जा (शक्ति) संरक्षण के नियम’ में विश्वास करता है। लाइबनित्ज चिद्णुओं को ऊर्जा के केन्द्र जैसा परिभाषिद करता है। उसके अनुसार चिद्णुओं की ऊर्जा का योग सदैव एक बना रहता है।
48. समसामायिक समय में भारत में नव-बुद्धिष्ट विचारों की दृष्टि से निम्नलिखित में से कौन सा युग्म सही सुमेलित है?
(a) डॉ. बी. आर. अम्बेडकर‚ महात्मा गांधी‚ डॉ. एस.
राधाकृष्णन्
(b) डॉ. बी. आर. अम्बेडकर‚ लोकमान्य तिलक‚ श्री एम.
जी. रानाडे
(c) डॉ. बी.आर. अम्बेडकर‚ श्री डी.डी‚ कोसाम्बी‚ डॉ‚ राहुल सांकृत्यायन
(d) डॉ. बी. आर. अम्बेडकर‚ श्री जे. कृष्णमूर्ति श्री दलाई लामा
Ans : (c) समसामयिक समय में भारत में नवबुद्विष्ट विचारको का युग्म- डॉ. बी. आर. अम्बेडकर‚ श्री डी. डी. कोसाम्बी‚ डॉ राहुल सांकृत्यायन आदि है।
49. जी. ई. मूर के अनुसार जब कभी दार्शनिक सिद्धांत और सामान्य बुद्धि के बीच टकराव होता है तो इस बात की अधिक संभावना होती है कि
(a) दार्शनिक सिद्धांतों की तुलना में सामान्य बुद्धि भटक जाती है।
(b) सामान्य बुद्धि की तुलना में तर्क भटक जाता है।
(c) तर्क और सामान्य बुद्धि दोनों भटक जाते है।
(d) तर्क और सामान्य बुद्धि में से कोई नहीं भटकता है।
Ans : (b) जी. ई. मूर के अनुसार जब कभी दार्शनिक सिद्धान्त और सामान्य बुद्धि का टकराव होता है तो इस बात की सम्भावना होती है कि सामान्य बुद्धि की तुलना में तर्क भटक जाता हैं मूर ने ‘सामान्य-’ज्ञान’ का समर्थन किया है।
50. सूची – I और सूची – II से सुमेलित कीजिए और दिए गए कूट से सही उत्तर का चयन कीजिए:
सूची I सूची II
(चिन्तक) (सिद्धांत/कथन)
(A) श्री अरबिन्द (i) मानव का जैविक और आध्यात्मिक पहलू
(B) आर. एन. टैगोर (ii) स्वत: सिद्ध का स्वत:
सिद्ध विस्तार
(C) के. सी. भट्टाचार्य (iii) सार्वभौम धर्म
(D) विवेकानंद (iv) चैतसिक रूपान्तरण
कूट:
(A) (B) (C) (D)
(a) (i) (ii) (iii) (iv)
(b) (iv) (i) (ii) (iii)
(c) (iv) (ii) (i) (iii)
(d) (ii) (i) (iii) (iv)
Ans : (b) श्री अरबिन्द – चैतसिक रूपान्तरण आर. एन. टैगोर – मानव का जैविक और आध्यात्मिक पहलू के. सी. भट्टाचाय – स्वत: सिद्ध का स्वत: सिद्ध विस्तार विवेकानंद – सार्वभौम धर्म

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