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यूजीसी नेट/जेआरएफ परीक्षा‚ दिसम्बर-2013 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY) व्याख्या सहित तृतीय प्रश्न-पत्र का हल UGC NTA NET JRF Philosophy Previous Papers in Hindi 0012.

UGC NTA NET JRF Philosophy Previous Papers in Hindi यूजीसी नेट/जेआरएफ परीक्षा‚ दिसम्बर-2013 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY) व्याख्या सहित तृतीय प्रश्न-पत्र का हल

नोट : इस प्रश्नपत्र में पचहत्तर (75) बहु-विकल्पीय प्रश्न हैं। प्रत्येक प्रश्न के दो (2) अंक है। सभी प्रश्न अनिवार्य है।
1. निम्नलिखित में से किसमें वह साधन समाविष्ट है जो शक्तिग्रह का नही है?
(a) उपमान‚ कोश‚ आप्तवाक्य‚ व्याकरण
(b) आप्तवाक्य‚ उपाधिनिरास‚ व्याकरण‚ कोश
(c) उपमान‚ आप्तवाक्य‚ प्रसिद्धपद‚ सान्निध्य‚ वृद्ध-व्यवहार
(d) व्याकरण‚ वृद्ध-व्यवहार‚ उपमान‚ कोश
Ans. (b) : ‘उपाधिनिरास’ को छोड़कर उपमान‚ आप्तवाक्य‚ प्रसिद्धपद‚ सान्निध्य‚ वृद्ध-व्यवहार‚ कोश‚ व्याकरण आदि शक्तिग्रह का साधन है।
2. नीचे दिये गए सिद्धान्तों में से किसका मानना है कि ज्ञेय अपने अस्तित्व और अपने गुणधर्मों के लिए ज्ञाता मन् की सृजनात्मक क्रिया के प्रति ऋणी है?
(a) निरपेक्ष प्रत्ययवाद (b) संवृत्तिवाद
(c) तत्वमीमांसीय प्रत्ययवाद (d) ज्ञानमीमांसीय प्रत्ययवाद
Ans. (d) : ज्ञानमीमांसीय प्रत्ययवाद के अनुसार‚ ज्ञेय अपने अस्तित्व और अपने गुणधर्मों के लिए ज्ञाता मन् की सृजनात्मक क्रिया के प्रति ऋणी हैं। काण्ट एक प्रकार का ज्ञानमीमांसीय प्रत्ययवाद का प्रतिपादन करता है।
3. हुस्सर्लवादी अभिव्यक्ति ‘ईपॉक’ का अर्थ है
(a) वस्तुस्थिति का स्थगन (b) जगत का स्थगन
(c) निर्णय का स्थगन (d) अनुभव का स्थगन
Ans. (c) : हुस्सर्लवादी अभिव्यक्ति ‘ईपॉक’ का अर्थ ‘निर्णय का स्थगन’ (Suspension of Judgment) है। ‘इपोजे’ का अर्थ प्रकृति में या वस्तु में अविश्वास या निषेष नहीं‚ बल्कि कुछ काल के लिए उनके संबंध में निर्णय को स्थगित करना है।
4. अनाभिगम्य वास्तविकता के संवृत्तिक आभास (या प्रगटन) के बारे में हमारे ज्ञान को प्रतिबंधित करने वाला सिद्धान्त है
(a) संवृति/घटना-क्रिया विज्ञान
(b) आत्मनिष्ठ प्रत्ययवाद
(c) संवृत्तिवाद
(d) निरपेक्ष प्रत्ययवाद
Ans. (c) : अनाभिगम्य वास्तविकता के संवृत्तिक आभास (या प्रगटन) के बारे में हमारे ज्ञान को प्रतिबंधित करने वाला सिद्धान्त ‘संवृत्तिवाद’ है।
5. सूची – I को सूची- II के साथ सुमेलित करें और नीचे दिए कोडों से सही उत्तर का चयन करें:
सूची – I सूची – II
A. आत्मनिष्ठ प्रत्ययवाद i. कांट
B. सामान्य-बोध वस्तुवाद ii. थॉमस रीड
C. निरपेक्ष प्रत्ययवाद iii. हेगेल
D. आलोचनात्मक iv. बर्कले प्रत्ययवाद कोड:
A B C D
(a) iv iii ii i
(b) i ii iii iv
(c) iv ii iii i
(d) iii ii iv i
Ans. (c)
(A) आत्मनिष्ठ प्रत्ययवाद (iv) बर्कले
(B) सामान्य-बोध वस्तुवाद (ii) थॉमस रीड
(C) निरपेक्ष प्रत्ययवाद (ii) हेगेल
(D) आलोचनात्मक प्रत्ययवाद (ii) कांट
6. यदि ‘O’ असत्य है तो निम्नलिखित में से सत्य विकल्प ज्ञात करें:
(a) I और E सत्य है तथा A असत्य है।
(b) I और A सत्य है तथा E असत्य है।
(c) A और I असत्य है तथा E सत्य है।
(d) O सत्य है‚ परन्तु E और I असत्य है।
Ans. (b) : परम्परागत विरोध वर्ग में यदि ’O’ असत्य है तो ’I’ और ‘A’ सत्य होंगे तथा ‘E’ असत्य होगा।
7. नीचे दिए गए कथनों से असत्य कथन का चयन करें:
(a) ‘A’ का परिवर्तित रूप ‘I’ है।
(b) यदि ‘A’ असत्य है तो ‘O’ सत्य है।
(c) ‘O’ का प्रतिवर्तन ‘I’ है
(d) ‘E’ का प्रतिवर्तन ‘I’ है।
Ans. (d) : ‘E’ का प्रतिवर्तन ‘I’ में नहीं हो सकता है। ‘E’ का प्रतिवर्तन ‘A’ में होता है। प्रतिवर्तन में उद्देश्य पद अपरिवर्तित रहता है और प्रतिवर्तित होने वाला तर्कवाक्य का परिमाण भी अपरिवर्तित रहता है। किसी तर्कवाक्य के प्रतिवर्तन में हम तर्कवाक्य का गुण परिवर्तन करते हैं और विधेय के स्थान पर उसका पूरक पद रखते हैं। ‘A’ का ‘E’, ‘E’ का ‘A’, ‘I’ का ‘O’ में और ‘O’ का ‘I’ में प्रतिवर्तन होता है।
8. निम्नलिखित में से किस दार्शनिक का कहना है‚ ‘‘उपयोगिता का अर्थ किसी वस्तु के ऐसे गुणधर्म से है जिसके कारण लाभ‚ प्राप्ति‚ सुख‚ शुभ अथवा प्रसन्नता उत्पन्न किए जा सकते हैं अथवा उस व्यक्ति जिसके हित पर ध्यान दिया जा रहा है‚ के अनिष्ट‚ वेदना‚ बुराई‚ दु:ख को अवरुद्ध किया जा सकता है।’’
(a) जेम्स मिल (b) जे.एस. मिल
(c) ह्यूम (d) जैरेमी बेन्थम
Ans. (d) : जैरेमी बेन्थम जो सुखवादी उपयोगितावाद के समर्थक है के अनुसार‚ ‘‘उपयोगिता का अर्थ किसी वस्तु के ऐसे गुणधर्म से है जिसके कारण लाभ‚ प्राप्ति‚ सुख‚ शुभ अथवा प्रसन्नता उत्पन्न किये जा सकते हैं अथवा उस व्यक्ति जिसके हित पर ध्यान दिया जा रहा है के अनिष्ट‚ वेदना‚ दु:ख को अवरुद्ध किया जा सकता है।’’
9. निम्नलिखित में किस दार्शनिक ने कर्म के दोत के नैतिक श्रेणीकरण को प्रतिपादित किया है?
(a) कडवर्थ (b) सिजविक
(c) बटलर (d) मार्टिन्यू
Ans. (d) : मार्टिन्यू ने कर्म के दोत के नैतिक श्रेणीकरण के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। मार्टिन्यू एक अन्त:प्रज्ञावादी दार्शनिक है।
10. बेंथम से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर गौर करें तथा दिए गए कूट से सही का चयन करें:
कथन:
1. बेंथम ने सन्यासवादी नीतिशास्त्र को ‘प्रतिलोमित सुखवाद’ कर कर खारिज कर दिया।
2. सुख-सिद्धान्त को व्यवहार का मानदण्ड स्वीकार करने के कारण बेंथम नैतिक सुखवादी है।
3. अन्त:प्रज्ञावादी नीतिशास्त्र की आलोचना बेंथम द्वारा की गई क्योंकि यह व्यक्तिपरक‚ भावना के अतिरिक्त और कुछ नहीं।
कूट:
(a) केवल 1 और 3 सत्य है।
(b) केवल 1 और 2 सत्य है।
(c) 1‚2 और 3 सत्य है।
(d) केवल 2 सत्य है।
Ans. (c) : बेंथम के संबंध में तीनों कथन सत्य है। बेंथम को एक मनोवैज्ञानिक सुखवादी दार्शनिक माना जाता है। बेंथम के अनुसार ‘‘प्रत्येक केवल एक है और कोई भी एक से ज्यादा नहीं है।’’
11. प्राक्कल्पना
(a) एक स्वतंत्र मानसिक उड़ान है।
(b) एक अनुसंधान है।
(c) एक अटकल है।
(d) किसी समस्यामूलक घटना की व्याख्या के लिए प्रस्तुत एक सामयिके अटकल है।
Ans. (d) : ‘प्राक्कल्पना’ किसी समस्यामूल घटना की व्याख्या के लिए प्रस्तुत एक सामयिक अटकल (A provisional supposition) है। प्राक्कल्पनाओं के मूल्य या स्वीकार्यत्व के निर्धारण के लिए पांच मापदण्ड है। (तर्कशास्त्र का परिचय :
आई.एम. कोपी)
12. शंकर के अनुसार ब्रह्म निम्नलिखित में से किन तीन भेदों से परे हैं?
(a) सजातीय भेद‚ विजातीय भेद‚ स्वगत भेद
(b) जागृत अवस्था‚ स्वप्न अवस्था‚ सुषुप्ति अवस्था
(c) आनुभविक विरोध‚ तार्किक विरोध‚ अतार्किक विरोध
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं
Ans. (a) : शंकर अपने अद्वैतवादी दर्शन में ब्रह्म को सजातीय‚ विजातीय तथा स्वगत भेदों से परे मानते हैं। ब्रह्म सभी प्रकार के भेदों से रहित एक अभेद सत्ता है। ब्रह्म सभी भेदों से रहित निर्गुण निर्विशेष सत्ता है।
13. कालक्रमानुसार तीर्थंकरों के सही उत्तर-क्रम को चुने:
(a) ऋषभनाथ‚ अनंतनाथ‚ शांतिनाथ‚ नेमिनाथ‚ महावीर
(b) अनंतनाथ‚ शांतिनाथ‚ ऋषभनाथ‚ महावीर‚ नेमिनाथ
(c) पद्मप्रभ‚ अजितनाथ‚ मल्लिनाथ‚ ऋषभनाथ‚ शांतिनाथ
(d) ऋषभनाथ‚ अनंतनाथ‚ संभवनाथ‚ अजितनाथ‚ महावीर
Ans. (a) : जैन धर्म में 24 तीर्थंकर हुए ऋषभनाथ (आदिनाथ) प्रथम तथा महावीर अन्तिम 24वें तीर्थंकर हुए। क्रमश: ऋषभनाथ‚ अजितनाथ‚ संभवनाथ‚ अभिनन्दन‚ सुमितिनाथ‚ पद्मप्रभु‚ सुदर्श्वनाथ‚ चंदाप्रभु‚ सुविधिनाथ‚ शीतलनाथ‚ श्रेयांसनार्थ‚ वासुपूज्य‚ विमलनाथ‚ अनंतनाथ‚ धर्मनाथ‚ शांतिनाथ‚ कुंधुनाथ‚ अरनाथ‚ मल्लिनाथ‚ मुनिसुव्रत‚ नमिनाथ‚ नेमिनाथ‚ पार्श्वनाथ तथा महावीर।
14. ‘आभासों से परे सत् की कोई सम्पत्ति नहीं है और केवल आभास ही उसकी सम्पत्ति है तब वह दिवालिया हो जायेगा।’’ यह किसका वक्तव्य है?
(a) ग्रीन (b) हेगेल
(c) ब्रेडले (d) प्लेटो
Ans. (c) : ब्रैडले के अनुसार ‘आभासों से परे सत् की कोई सम्पत्ति नहीं है और आभास ही उसकी सम्पत्ति है तब वह दिवालिया हो जायेगा।’ ब्रैडले निरपेक्ष सत् को प्रत्येक आभास में अन्तर्व्याप्त मानता है। यद्यपि निरपेक्ष सत् प्रत्येक आभास में विद्यमान है‚ यह सर्वत्र उपस्थित है‚ तथापि प्रत्येक आभास में इसकी अभिव्यक्ति विभिन्न मात्राओं में है।
15. ‘आभास सत् के आभास है’ यह कथन है
(a) काण्ट का (b) ब्रैडले का
(c) हेगेल का (d) ग्रीन का
Ans. (b) : ‘आभास सत् के आभास है।’ अत: सत् आभासों को भी अपने में समेटे है। सत् इन सबों को समेटे रहता है। ब्रैडले का कहना है कि सभी आभास निरपेक्ष सत् में संगत रूप में रहते हैं‚ उनका आभास रूप सत् में अपनी विसंगति खो देता है।
16. ‘जीने के लिये मरो’ यह वक्तव्य है
(a) काण्ट का (b) हेगेल का
(c) बर्कले का (d) मिल का
Ans. (b) : ‘जीने के लिए मरो’ और ‘व्यक्ति बनो’ ये हीगेल के नैतिक दर्शन के मूल में है। हीगेल ने सम्पूर्ण विश्व को एक अध्यात्मिक तत्व का विकास माना है।
17. किसने कहा‚ है -‘मेरा स्थान और इसके कर्त्तव्य’?
(a) प्लेटो (b) बर्कले
(c) काण्ट (d) ब्रैडले
Ans. (d) : ब्रैडले अपने नीति-दर्शन में एक सिद्धान्त प्रतिपादित किया है जिसे ‘मेरा स्थान और इसके कर्तव्य’ कहा है। उनके अनुसार मनुष्य अपने जीवनकाल में सभी उत्कृष्टताओं को हासिल नहीं कर सकता। कर्मक्षेत्र बहुत व्यापक और बहुआयामी होता है। अत: मनुष्य से सभी आदर्शों की प्राप्ति की आशा नहीं करनी चाहिए।
18. शंकर के सत्कार्यवाद को क्या कहा जाता है?
(a) विज्ञान विवर्तवाद (b) ब्रह्म विवर्तवाद
(c) प्रकृति परिणामवाद (d) ब्रह्म परिणामवाद
Ans. (b) : शंकर के सत्कार्यवाद को ‘ब्रह्म विवर्तवाद’ कहा जाता है। सत्कार्यवादियों के अनुसार‚ कारण में कार्य उत्पत्ति पूर्व भी विद्यमान रहता है। शंकरवेदान्ती सत्कार्यवाद को तो मानते हैं‚ परन्तु कारण का कार्य के रूप में परिवर्तन को अतात्विक या प्रातीतिक मानते हैं। अत: यहाँ ‘विवर्तवाद’ का मतलब अतात्विक परिवर्तन है।
19. नीतिशास्त्र में ‘स्वतंत्र-संकल्प’ का अर्थ है
(a) व्यक्ति कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र है।
(b) व्यक्ति कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र नहीं है।
(c) व्यक्ति कुछ मानदण्डों को ध्यान में रखते हुए कर्म करने के लिए स्वतंत्र है।
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Ans. (c) : नीतिशास्त्र में ‘स्वतंत्र-संकल्प’ का अर्थ स्वेच्छाचारिता नहीं है। बल्कि कुछ नैतिक मानदण्डों को ध्यान में रखते हुए व्यक्ति कर्म करने के लिए स्वंत्र है। नीतिशास्त्र में ‘संकल्प-स्वातंत्र’ को एक नैतिक पूर्वमान्यता भी माना गया है।
20. आधुनिक पश्चिमी दर्शन में व्यक्तिगत पहचान की समस्या पर सर्वप्रथम किसने प्रकाश डाला है?
(a) स्ट्रासन (b) लॉक
(c) क्रिप्के (d) देकार्त
Ans. (b) : आधुनिक पश्चिमी दर्शन में व्यक्तिगत पहचान की समस्या पर सर्वप्रथम ‘लॉक’ ने प्रकाश डाला। जान लॉक स्मृति को वैयक्तिक अनन्यता का नियम मानता है। उसे इस सिद्धांत का जनक कहा जाता ह
21. भारतीय दर्शन के निम्नलिखित सम्प्रदायों में से किसने मोक्ष को निर्वाण के रूप में निर्दिष्ट किया है?
(a) जैन धर्म (b) बौद्ध
(c) योग (d) सांख्य
Ans. (b) : बौद्ध दर्शन में मोक्ष को ‘निर्वाण’ कहा गया है। इसे ‘निब्बान’ भी कहते हैं। ‘निर्वाण’ का अर्थ है ‘बुझना’। जैसे तेल के क्षय से दीपक बुझ जाता है‚ वैसे ही अविद्या और क्लेश के क्षय से धीर पुरुष निर्वाण प्राप्त करते हैं।
22. कौन कहता है कि दर्शन का कार्य पूर्णत:
आलोचनात्मक है?
(a) अरस्तू (b) एयर
(c) प्लेटो (d) हेगेल
Ans. (b) : ‘एयर’ के अनुसार दर्शन का कार्य पूर्णत:
आलोचनात्मक है। एयर के दर्शन परिकल्पनात्मक नहीं है। एयर के अनुसार दर्शन का कार्य विश्लेषण और स्पष्टीकरण है।
23. ‘सम्बन्ध’ के आधार पर तर्कवाक्यों को निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया जाता है:
(a) निरुपाधिक और सोपाधिक
(b) भावात्मक और निषेधात्मक
(c) सामान्य और विशेष
(d) अनिवार्य और समस्यामूलक
Ans. (a) : ‘संबंध’ के आधार पर तर्कवाक्यों को निरुपाधिक और सोपाधिक कथनों में विभाजित किया जाता है।
24. ‘सामान्य अस्तिवाचक’ और ‘विशेष नकारात्मक’ तर्कवाक्य इस रूप में प्रतीक द्वारा प्रस्तुत होते हैं
(a) A और E (b) A और I
(c) E और O (d) A और O
Ans. (d): ‘सामान्य अस्तिवाचक’ अर्थात् ‘सर्वव्यापक सकारात्मक’ का प्रतीक ‘A’ तथा ‘विशेष नकारात्मक का प्रतीक ‘O’ है। इसके अतिरिक्त ‘सामान्य नास्तिवाचक’ का प्रतीक ‘E’ है तथा ‘विशिष्ट सकारात्मक या अस्तित्ववाचक’ का प्रतीक ‘I’ है।
25. निम्नलिखित में से किस बौद्ध-मत में ‘त्रिशरण’ के नाम से जाना जाता है?
(a) श्रवण‚ मनन‚ निदिध्यासन (b) दर्शन‚ ज्ञान‚ चरित्र
(c) मैत्री‚ करुणा‚ मुदिता (d) बुद्ध‚ धम्म‚ संघ
Ans. (d) : बौद्ध मत में बुद्ध धम्म‚ संघ को ‘त्रिशरण’ नाम से जान जाता है। बौद्ध मत के दो सम्प्रदाय हीनयान और महायान है।
26. भगवद्गीता अति महत्त्वपूर्ण कृति मानी जाती है क्योंकि यह प्रस्तुत करती है
(a) जीवन का सामंजस्यपूर्ण दर्शन
(b) कर्म‚ भक्ति और ज्ञान का संश्लेषण
(c) नैतिक शिक्षा
(d) उपर्युक्त सभी
Ans. (d) : ‘भगवद्गीता’ एक अति महत्वपूर्ण कृति है क्योंकि यह जीवन का सामंजस्यपूर्ण दर्शन है। नैतिक शिक्षा तथा कर्म‚ भक्ति संज्ञान का संश्लेषण है।
27. बेन्थम द्वारा बताये गये नैतिकता के चार आदेश हैं:
(a) प्राकृतिक‚ सांस्कृतिक‚ राजनीतिक‚ सामाजिक
(b) प्राकृतिक‚ राजनीतिक‚ सामाजिक‚ धार्मिक
(c) प्राकृतिक‚ आर्थिक‚ राजनीतिक‚ धार्मिक
(d) प्राकृतिक‚ आर्थिक‚ सांस्कृतिक‚ धार्मिक
Ans. (c): बेन्थम ने नैतिकता के चार आदेश बताये हैं – प्राकृतिक‚ राजनीतिक‚ सामाजिक और धार्मिक। इन्हें वे नैतिकता के चार अनुशास्तियां कहते हैं। बेन्थम ने सुप्राप्ति के सार्वजनीन हो सकने के लिए दिया है जो बाध्य है। जो व्यक्ति इनको नहीं मानता‚ उसे दण्डित किया जा सकता है जो मानता है उसे पुरस्कृत किया जा सकता है।
28. पुरुषार्थ के समस्त निम्नलिखित क्रम गलत है सिवाय इसके :
(a) धर्म‚ अर्थ‚ काम‚ मोक्ष (b) अर्थ‚ काम‚ मोक्ष‚ धर्म
(c) धर्म‚ काम‚ अर्थ‚ मोक्ष (d) धर्म‚ मोक्ष अर्थ‚ काम
Ans. (a): भारतीय परम्परा में चार पुरुषार्थ माने गये हैं जो क्रमश:
धर्म‚ अर्थ‚ काम‚ मोक्ष है।
29. तीर्थंकर का तात्पर्य है
(a) एक धर्म (faith) का अनुयायी
(b) एक धर्म का प्रवर्तक
(c) एक तटस्थ व्यक्ति
(d) इनमें से कोई नहीं
Ans. (b) : ‘तीर्थंकर’ का तात्पर्य एक धर्म प्रवर्तक व्यक्ति है। जैन धर्म के संबंध में इस शब्द बहुधा प्रयोग हुआ है। ये उन 24 व्यक्तियों के लिए प्रयुक्त हुआ है जो स्वयं तप के माध्यम से आत्मज्ञान (केवल ज्ञान) प्राप्त करते हैं। जो संसार सागर से पार लगाने वाले ‘तीर्थ’ की रचना करते हैं।
30. निम्नलिखित में से कौन पैगम्बरीय धर्म है?
(a) हिन्दू धर्म (b) इस्लाम धर्म
(c) बौद्ध धर्म (d) इनमें से कोई नहीं
Ans. (b) : ‘पैगम्बर’ एक फारसी शब्द है जिसका अर्थ है- ‘पैगाम’ ेदेने वाला। ‘इस्लाम’ धर्म में पैगम्बर शब्द का इस्तेमाल मोहम्मद साहब के लिए हुआ है। जो इस्लाम धर्म के अन्तिम पैगम्बर कहे जाते हैं। ‘पैगम्बर’ वह व्यक्ति होता है जिसे ‘अल्लाह’ ने ‘इस्लाम धर्म’ के प्रचार-प्रसार के लिए चुना हो।
31. ‘दी इसेन्शल यूनिटी ऑफ आल रिलिजन्स’ का लेखक कौन है?
(a) राधाकृष्णन् (b) टैगोर
(c) भगवानदास (d) इनमें से कोई नहीं
Ans. (c) :
‘दी इसेन्शल यूनिटी ऑफ आल रिलिजन्स’ – भगवानदास। ‘दी रिलिजन ऑफ मैन – रवीन्द्र नाथ टैगोर। ‘रिलिजन एण्ड सोसाइटी’ – राधाकृष्णन।
32. अरस्तू ने शुभ की निम्नलिखित रूप में पहचान की है
(a) सुख (b) पूर्णता
(c) उपयोगिता (d) आत्म-सम्मान
Ans. (b) : अरस्तू के अनुसार परम शुभ यूडोमोनिया
(Eudaimonia) है। वह मध्यम मार्ग को ही सर्वश्रेष्ठ नैतिक मार्ग कहता है। वह केवल सुख को एकांगी मानता है। वह ‘शुभ’ को सुख आनन्द (Happiness) कहता है।
33. दंड के प्रतिकारी सिद्धान्त का विचार है कि
(a) अपराधियों को सुधारा जा सकता है
(b) अपराधियों को दण्डित किया जाना चाहिए।
(c) अपराधियों को बिना किसी दण्ड के छोड़ा जा सकता है।
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Ans. (b) : दण्ड के तीन सिद्धांत प्रचलित है- प्रतिफलनात्मक/ प्रतिकारी‚ निवर्तनकारी तथा सुधारात्मक सिद्धान्त। प्रतिफलनात्मक या प्रतिकारी दण्ड सिद्धान्त के अनुसार अपराधियों को दण्डित किया जाना चाहिए। इसमें दण्ड स्वत: साध्य है। ‘बुराई के लिए बुराई’ सिद्धान्त का समर्थक है।
34. प्लेटो के अनुसार‚ मूलभूत सद्गुण है
(a) सही वाक् सही क्रिया‚ सही मानसिकता
(b) प्रज्ञा‚ साहस‚ संयमिता और न्याय
(c) बौद्धिक गुण और नैतिक गुण
(d) सत्य‚ अहिंसा‚ ब्रह्मचर्य‚ चोरी न करना
Ans. (b) : यथार्थवादी प्लेटो ने न्याय का दार्शनिक और नैतिक अर्थ किया है। प्लेटो का नैतिक दर्शन भी उसकी तत्वमीमांसा से प्रभावित है। वह चार सद्गुणों क्रमश: प्रज्ञा (विवेक)‚ साहस‚ आत्म-संयम और इन तीनों से उत्पन्न न्याय को मानता है। यह सभी सद्गुण शुभ है।े ये प्रत्ययात्मक होने कारण बुद्धि ग्राह्य भी है।
35. आत्मपूर्णतावाद का अर्थ है
(a) योगक्षेम (b) सुखवाद
(c) उपयोगितावाद (d) पूर्णतावाद
Ans. (a): अरस्तू का आत्मपूर्णतावाद (Eudaimoniasm) परम कल्याण या योग क्षेम है। मानव श्रेय को ही अरस्तू परम कल्याण या योगक्षेम कहता है।
36. मे़ज का समवायीकरण क्या है?
(a) स्वयं मे़ज (b) मे़ज का रंग
(c) मे़ज के भाग (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Ans. (c): वह द्रव्य जिससे कार्य उत्पन्न होता है‚ समवायीकरण है। मेज का समवायीकरण ‘मेज के भाग’ है।
37. ‘‘धर्मसंकट-मीमांसा नैतिक अनुसंधान का लक्ष्य है’’ यह किसने माना है?
(a) जी.ई. मूर (b) ब्रैडले
(c) कांट (d) रैशडल
Ans. (a): ‘‘धर्मसंकट-मीमांसा (Casuistry) नैतिक अनुसंधान का लक्ष्य है’’- जी.ई. मूर। यह प्रयोगात्मक नीतिशास्त्र की एक विधि है।
38. अद्वैत वेदान्त के अनुसार निम्नलिखित कथनों में से कौन सा एक ब्रह्म के ज्ञान के संबंध में सत्य है?
(a) प्रत्यक्ष और अनुमान दोनों हमें ब्रह्म का ज्ञान प्रदान करते हैं।
(b) केवल अर्थापत्ति हमें ब्रह्म का ज्ञान प्रदान करती है।
(c) ब्रह्म के ज्ञान के लिये श्रुति एकमात्र दोत है।
(d) अर्थापति और अनुपलब्धि दोनों हमें ब्रह्म का ज्ञान प्रदान करती है।
Ans. (c): अद्वैत वेदान्त में ब्रह्म-साक्षात्कार के लिए ‘श्रुति’ को ही एकमात्र दोत माना गया है। ‘ब्रह्म’ का ज्ञान वेदान्तशास्त्र से ही होता है। श्रुति रत्न ऋषियों के बुद्धि-सागर के मन्थन से निकले हैं। श्रुतिवाक्य ऋषियों के ब्रह्मविषयक स्वानुभव की शाब्दिक अभिव्यक्ति है‚ अत: श्रुति को शब्द ब्रह्म भी कहते हैं।
39. निम्नलिखित में से कौन सा नित्यद्रव्य नहीं है?
(a) परमाणु (b) आकाश
(c) द्वयणुक (d) दिक्
Ans. (c): परमाणु‚ आकाश‚ दिक् नित्य द्रव्य माने गये हैं। परन्तु द्वयणुको का निर्माण परमाणु संघात से हुआ है। अत: यह नित्य द्रव्य नहीं है क्योंकि यह नष्ट होते हैं।
40. न्याय दर्शन के अनुसार ‘सीपी चाँदी है’ यह एक मिथ्या संज्ञान है‚ क्योंकि:
(a) चाँदी अन्यत्र विद्यमान है।
(b) चाँदी चमकती है।
(c) चाँदी का ग्रहण स्मृति से होता है।
(d) दृष्टा एक रजतकार है।
Ans. (c): न्याय दर्शन का भ्रम-विषयक सिद्धान्त अन्यथाख्यातिवाद कहलाता है। नैयायिक अपने वस्तुवाद की रक्षा के लिए भ्रम में चांदी के वास्तविक प्रत्यक्ष की कल्पना ज्ञान लक्षण नाम असाधारण प्रत्यक्ष की सहारा लेकर करते हैं। जिसमें स्मृति में विद्यमान रजत (चांदी) रूप का बाहर सीपी (शुक्त) के स्थान पर ज्ञानलक्षण प्रत्यासति द्वारा असाधारण प्रत्यक्ष होता है।
41. दिए गए अभिकथन के लिए दिए गए प्रतीकात्मक रूपो में से सही का चयन करें:
अभिकथन
मक्ख्यिाँ और ततैया तभी डंक चुभोती हैं जब वे या तो क्रुद्ध अथवा डरी हुई हों। (Bx, Wx, Sx, Ax, Fx) प्रतीकात्मक रूप
(a) (∃x) {Bx. Wx) ⊃ [Ax v Fx)= Sx]}
(b) (x) {Bx vWx)⊃[Ax v Fx)⊃ Sx]}
(c) (x) (Bx v Wx) ⊃ Ax v Fx ⊃ Sx
(d) (x) (Bx v Wx) ⊃ (Ax v Fx) ⊃ Sx
Ans. (b): मक्खियाँ और ततैया तभी डंक चुभोती हैं जब वे या तो क्रुद्ध अथवा डरी हुई हो। का प्रतीकात्मक रूप –
(x) {(BxsvWx) ⊃ {AxvFx) ⊃ Sx]}
42. न्याय दर्शन के अनुसार प्रमा है
(a) यथार्थ अनुभव
(b) विषय का प्रकटीकरण
(c) वह जो व्यवहार योग्य है
(d) अज्ञात विषय का ज्ञान
Ans. (a): न्याय दर्शन में प्रमा को यथार्थ अनुभव तथा अप्रमा के अयथार्थ अनुभव कहा गया है। प्रमा चार प्रकार की होती है- प्रत्यक्ष‚ अनुमिति‚ उपमिति और शब्द ज्ञान।
43. न्याय दर्शन के अनुसार ‘जल शीतल दिखता है’‚ उदाहरण है
(a) ज्ञान लक्षण प्रत्यक्ष का
(b) सामान्य लक्षण प्रत्यक्ष का
(c) योगज प्रत्यक्ष का
(d) लौकिक सन्निकर्ष का
Ans. (a): न्याय दर्शने में तीन प्रकार के अलौकिक प्रत्यक्ष माने गये हैं-सामान्य‚ लक्षण‚ ज्ञान लक्षण और योगज। ‘जल शीतल दिखता है’ ज्ञान लक्षण प्रत्यक्ष है। ज्ञान लक्षण प्रत्यक्ष तब होता है जब एक ज्ञानेन्द्रिय अपने गुण से विपरीत अन्य ज्ञानेन्द्रिय के गुण की भी कल्पना करती है तो वहां ज्ञान लक्षण प्रत्यक्ष होता है। प्रस्तुत वाक्य में ‘चक्षु’ के द्वारा जल और उसकी शीतलता दोनों का प्रत्यक्ष हो रहा है जबकि ‘शीतलता’ स्पर्श (त्वचा) का विषय है।
44. नैयायिकों के अनुसार शब्द-अर्थ -संबंध
(a) पाकृतिक है (b) परम्परा से प्राप्त है
(c) (A) और (B) दोनों (d) न तो (A) न ही (B)
Ans. (b): न्याय दर्शन के अनुसार‚ शब्द -अर्थ संबंध लंबी रूढ़ परम्परा के बाद आती है।
45. वाक्यार्थ-विषयक प्रभाकर-समर्थित मत का नाम है
(a) अभिहितान्वयवाद (b) अन्विताभिधानवाद
(c) तात्पर्यवाद (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Ans. (b): वाक्यार्थ-विषयक प्रभाकर समर्थित मत ‘अन्विताभिधानवाद’ कहलाता है। जिसके अनुसार‚ अर्थवाद भी कर्म का सहायक बनकर ही प्रामाणिक हो सकता है। कुमारिल को मत अभिहितान्वयवाद कहलाता है।
46. न्याय ज्ञानमीमांसा एक उदाहरण है
(a) निरपेक्ष प्रत्ययवाद का (b) यथार्थवाद का
(c) आत्मगत प्रत्ययवाद का (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Ans. (b): न्याय ज्ञानमीमांसा कट्टर वस्तुवादी/यथार्थवादी है। वह ज्ञान को ज्ञाता और ज्ञेय का संबंध मानता है। बिना ज्ञाता और ज्ञेय के ज्ञान उत्पन्न नहीं हो सकता।
47. निम्नलिखित अनुमान उदाहरण है:
‘कोई भी प्राणी जो आत्मरहित है प्राणयुक्त नहीं है। सभी जीवित प्राणी प्राणयुक्त है। अत: सभी जीवित प्राणी आत्मयुक्त है।’
(a) केवलान्वयी का (b) केवलव्यतिरेकी का
(c) अन्वय-व्यतिरेकी का (d) उपरोक्त में से कोई नहीं
Ans. (b) ‘कोई भी प्राणी जो आत्मरहित है प्राणयुक्त नहीं है। सभी जीवित प्राणी प्राणयुक्त है।’ में केवलव्यतिरेकी अनुमान का उदाहरण है। इसका आधार केवल व्यतिरेक-व्याप्ति है तथा इसमें अन्वय व्याप्ति की कोई उपयोगिता नहीं होती। इसमें अनुमान साध्य के अभाव के साथ हेतु के अभाव की व्याप्तिज्ञान से होता है।
48. ‘‘स्त्री पैदा नहीं होती‚ बनाई जाती है’’-यह कथन है
(a) मेरी वाल्स्टनक्राफ्ट (b) एम्मा गोल्डमैन
(c) सिमोन दि बुवा (d) लुस एरिगेरी
Ans. (c): ‘‘स्त्री पैदा नहीं होती‚ बनाई जाती है’’ यह कथन सिमोन दि बुवा का है। जो एक अस्तित्ववादी फ्रांसीसी लेखिका है। जो एक प्रतिक्रियावादी नारीवादी भी है।
49. निम्नलिखित दार्शनिकों में से किसने ‘संभूति’ की अवधारणा का प्रतिपादन किया है?
(a) पाईथागोरस (b) थेलेज
(c) हेराक्लीटस (d) डेमोक्रिटस
Ans. (c): हेराक्लाइट्स के अनुसार‚ प्रत्येक वस्तु क्षणिक है। कोई वस्तु उसी क्षण है भी और नहीं भी है। एक ही काल में वस्तुओं का होना और न होना उनका स्वभाव है। उसके इस मत को ‘संभूति का सिद्धान्त’ कहते हैं।
50. निम्नलिखित में से किस पक्ष का समर्थन बुद्ध ने किया?
(a) श्रेय (b) मध्यमप्रतिपदा
(c) केवल्य (d) प्रेय
Ans. (b): गौतमबुद्ध प्रतीत्यसमुत्पाद को ‘मध्यमा प्रतिपद (मध्यम मार्ग) कहते हैं। यह शाश्वतवाद (Eternalism) और उच्छेदवाद
(Nihidism) के बीच का मार्ग है।
51. किसने कहा है कि दिक् और केवल आनुभविक यथार्थ किंतु प्रागानुभविक आदर्श है?
(a) पाईथागोरस (b) स्पिनोजा
(c) काण्ट (d) हेगेल
Ans. (c): काण्ट दिक् और काल आनुभविक यथार्थ किंतु प्रागनुभविक आदर्श (Ideal) अथवा प्रत्ययात्मक मानता है। सभी अनुभवगम्य वस्तुएं देशकाल में स्थित है‚ इसलिए प्रत्येक विषय का ज्ञान देशकाल से परिच्छिन्न है। ज्ञान का कोई भी विषय देश-काल से परे नहीं हो सकता है। अत: आनुभविक दृष्टि से देश और काल वास्तविक (यथार्थ) है। इसके विपरीत देश और काल परमार्थिक दृष्टि से काल्पनिक या प्रत्ययात्मक या आदर्श है। यदि उनकी परमार्थिक दृष्टि से स्वीकार किया जाय तो वे काल्पनिक हो जायेंगे क्योंकि वे ेअसंवेद्य आकार हो जायेंगे।
52. निम्नलिखित में से कौन सा सिद्धान्त यह कहता है कि सामान्य का अर्थ ‘सामान्य अवधारणाएँ हैं; न कि कोई ऐसी वस्तु जो हमारे मन के बाहर है’?
(a) वास्तववाद (b) नामवाद
(c) प्रत्ययवाद (d) सादृश्यवाद
Ans. (c): ‘प्रत्ययवाद’ के अनुसार सामान्य का अर्थ ‘सामान्य अवधारणाएं हैं; न कि कोई ऐसी वस्तु जो हमारे मन के बाहर है। प्रत्ययवादी जो सामान्य की सत्ता को स्वीकार करते हैं यथार्थवादी या वस्तुवादी कहलाते हैं।
53. संवृत्तिशास्त्रीय पद्धति की अनिवार्य विशेषता है
(a) इंटेंशनीलिटी (b) जगत के प्रति संशय
(c) बे्रकेटिंग तकनीक (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Ans. (c): संवृत्तिशास्त्रीय पद्धति की अनिवार्य विशेषता ‘ब्रेकेटिंग’ तकनीक है। यह पद्धति हुर्सल के द्वारा दी गयी। इस पद्धति में हम विभिन्न प्रकार के विश्वासों को कुछ समय के लिए ब्रेकेटिंग करना होता है। यह एपोजे के माध्यम से संभव होता है।
54. निम्नलिखित दार्शनिकों में से किसने व्याकरणीय निर्वचन तथा मनोवैज्ञानिक निर्वचन के बीच अंतर किया है?
(a) डेल्थी (b) हाईडेगर
(c) स्क्लेरमैकर (d) गायडामर
Ans. (c) : स्क्लेरमैकर ने व्याकरणीय निर्वचन और मनोवैज्ञानिक निर्वचन के बीच अन्तर किया है। हाईडेगर अस्तित्ववादी निर्वचनशास्त्री है।
55. सूची – I को सूची- II के साथ सुमेलित करें और सही मेलित कोड का चयन करें:
सूची – I सूची – II
(प्रमाण)
A. न्याय i. दो
B. बौद्ध ii. चार
C. चार्वाक iii. तीन
D. सांख्य iv. एक कोड:
A B C D
(a) ii i iv iii
(b) iii ii iv i
(c) iv i iii ii
(d) i ii iii iv
Ans. (a): न्याय दर्शन चार प्रमाण (प्रत्यक्ष‚ अनुमान‚ शब्द‚ उपमान); बौद्ध दर्शन दो प्रमाण (प्रत्यक्ष‚ अनुमान); चार्वाक दर्शन एक (प्रत्यक्ष); सांख्य दर्शन तीन (प्रत्यक्ष‚ अनुमान‚ शब्द) प्रमाण को मानते हैं।
56. ब्रह्मचर्य निम्नलिखित में से किससे मुक्ति का साधन है?
(a) ऋषिऋण (b) पितृऋण
(c) देवऋण (d) मनुष्यऋण
Ans. (a): ब्रह्मचर्य ऋषिऋण से मुक्ति का साधन है; सन्तानोत्पत्ति पितृऋण से; यज्ञ देवऋण से और अतिथि सत्कार मनुष्य ऋण से मुक्ति का साधन है।
57. सूची – I को सूची- II के साथ सुमेलित करें और सही विकल्प का चयन करें:
सूची – I सूची – II
A. p= p v q i. मेटेरियल इंप्लीकेशन
B. (p⊃q) = (-q⊃ -p) ii. टॉटोलॉजी
C. (p⊃q) = (-p v q) iii. कम्यूटेशन
D. (p V q) = (q V -p) iv. ट्रांसपोर्टेशन विकल्प:
A B C D
(a) i ii iv iii
(b) ii iv i iii
(c) iii iv ii i
(d) iv ii iii i
Ans. (b):
(A) p α p vq ii. टॉटोलॉजी
(B) (p ⊃ q) α (-q⊃-p) iv. ट्रांसपोर्टेशन
(C) (p ⊃ q) α (-p v q) i. मेटेरियल इम्प्लीकेशन
(D) (p v q) α (q v p) iii. कम्यूटेशन
58. निम्नलिखित तर्क की जाँच करें और सही विकल्प बताइए:
तर्क:
p ⊃ (Q V R) S ⊃ (T. U) -T ∴ P ⊃ U विकल्प:
(a) वैध (b) अवैध
(c) उपर्युक्त दोनों (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Ans. (b): p ⊃ (Q v R) S ⊃ (T. U) – T यह एक अवैध तर्क है।
59. वैशेषिक मत के संदर्भ में समूह – I को समूह – II के साथ समुलित करें और नीचे दिए कोड से सही उत्तर का चयन करें:
समूह – I समूह – II
A. परमाणु i. विभु
B. आत्मा ii. निरावयव
C. मानस iii. महत्
D. घट iv. अणुपरिमाण कोड:
A B C D
(a) i ii iii iv
(b) ii i iv iii
(c) i iii ii iv
(d) ii iii i i
Ans. (b):
(A) परमाणु (ii) निरावयव
(B) आत्मा (i) विभु
(C) मानस (iv) अणुपरिमाण
(D) घट (iii) महत्
60. योग सूत्र का प्रथम भाग है
(a) केवल्यपाद (b) साधनापाद
(c) विभूतिपाद (d) समाधिपाद
Ans. (b): पातञ्जल योग-सूत्र के चार पाद है। प्रथम ‘समाधिपाद’ है जिसमें समाधि के रूप एवं भेदों का और चित्र तथा उसकी वृत्तियों का वर्णन है। द्वितीय साधनापाद‚ तृतीय विभूतिपाद तथा चतुर्थ कैवल्यपाद है।
61. गुणों में किस प्रकार का परिवर्तन सांख्य मतानुसार विकास क प्रारंभ का कारण होता है?
(a) सरूप परिणाम
(b) विरूप परिणाम
(c) दोनों सरूप तथा विरूप परिणाम
(d) न सरूप तथा न विरूप परिणाम
Ans. (c): गुणों की साम्यावस्था प्रलयकालीन अवस्था है। प्रकृति में जो व्यक्त है उसी का व्यक्त होना सृष्टि है। गुणों में विरूप परिवर्तन सांख्य मतानुसार विकास के प्रारंभ का कारण है। विरूप परिणाम गुणों की साम्यावस्था भंग होने के कारण होता है।
62. न्याय-वैशेषिक के अनुसार द्रव्य-गुण के संबंध का नाम है
(a) संयोग (b) समवाय
(c) तादात्म्य (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Ans. (b): न्याय-वैशेषिक के अनुसार द्रव्य गुण संबंध को समवाय संबंध कहते हैं। समवाय संबंध दो अयुतसिद्ध पदार्थों के बीच होता है। जिन्हें एक दूसरे से पृथक नहीं किया जा सकता है। यदि पृथक किया गया तो उनका स्वरूप नष्ट हो जाता है।
63. शंकर के अनुसार ‘तत्त्वमसि’ जीव तथा ब्रह्म में तादात्म्य स्थापित करता है
(a) अपने मुख्य अर्थ में
(b) अपने गौण अर्थ में
(c) अपने मुख्य तथा गौण अर्थ में
(d) न मुख्य तथा न ही गौण अर्थ में
Ans. (b): शंकर के अनुसार ‘तत्त्वमसि’ महावाक्य जीव तथा ब्रह्म में तादात्म्य अपने गौण अर्थ में स्थापित करता है। वह (ब्रह्म) ‘तत्’ ‘त्वम’ हो।
64. रामानुज के अनुसार जीवात्मा
(a) केवल ज्ञाता है।
(b) ज्ञाता तथा कर्त्ता है।
(c) कर्त्ता तथा भोक्ता है।
(d) ज्ञाता‚ कर्ता तथा भोक्ता है।
Ans. (d): रामानुज के अनुसार जीवात्मा ज्ञाता‚ कर्त्ता तथा तथा भोक्ता है। जीव अणु है किन्तु उसका ज्ञान विभु है। आत्मा स्वप्रकाशक है परन्तु वह पदार्थों को प्रकाशित नहीं कर सकता। जीव एक नहीं‚ अनेक है। तथापि वह सवयं द्रव्य है यद्यपि वह ईश्वर का विशेषण‚ प्रकार या गुण है।
65. नैयायिकों के अनुसार हेतु तथा साध्य में व्यतिरेक व्याप्ति होती है जब
(a) हेतु के सभी उदाहरण साध्याभाव के सभी उदाहरण होते हैं।
(b) हेतु के कुछ उदाहरण साध्य के उदाहरण होते हैं।
(c) साध्य के कुछ उदाहरण हेतु के उदाहरण होते हैं।
(d) साध्यभाव के सभी उदाहरण हेतु के अभाव के उदाहरण होते हैं।
Ans. (d): नैयायिकों के अनुसार हेतु तथा साध्य में व्यतिरेक व्याप्ति होती जब साध्यभाव के सभी उदाहरण हेतु के अभाव के उदाहरण होते हैं। जैसे वृद्धि (कारण) के अभाव में धूम (कार्य) का अभाव।
66. सूची – I को सूची- II के साथ सुमेलित करें और नीचे दिए कोडों से सही उत्तर का चयन करें:
सूची – I सूची – II
A
. तर्कमूलक उपयोगितावाद i. जी.ई. मूर
B. परिमाणात्मक उपयोगितावा ii. सिजविक
C. आदर्शमूलक उपयोगितवाद iii. बेन्थम
D. गुणात्मक उपयोगितवाद iv. जे.एस. मिल कोड:
A B C D
(a) i iv ii iii
(b) iii i iv ii
(c) ii iv i iii
(d) ii iii i iv
Ans. (d): जी.ई.मूर आदर्श उपयोगितावाद; सिजविक तर्कमूलक उपयोगितावाद; बेन्थम परिमाणात्मक उपयोगितावाद तथा जे.एस.मिल गुणात्मक उपयोगितावाद से संबंधित है।
67. जे.एस. मिल के निम्नलिखित कथनों पर विचार करें और सही कोर्ड का चयन करें:
1. जे.एस. मिल का सिद्धान्त परार्थोन्मुख परसुखवाद और गुणात्मक उपयोगितावाद का है।
2. मिल प्रसन्नता तथा सुख का समानार्थी रूप में उपयोग करता है।
3. प्रेम इत्यादि को आंतरिक मूल्य समझते हैं। कोड:
(a) 1, 2 और 3 सत्य हैं। (b) 1 और 2 सत्य हैं।
(c) 1 और 3 सत्य हैं। (d) केवल 2 सत्य हैं।
Ans. (b): जे.एस. मिल का सिद्धान्त परार्थोन्मुख परसुखवाद और गुणात्मक उपयोगितावाद का है। मिल प्रसन्नता तथा सुख का समानार्थी रूप में उपयोग करते हैं।
68. रसेल के दर्शन में‚ तर्कमूलक परमाणुवाद और सत्य का निम्नलिखित सिद्धान्त साथ-साथ चलते हैं
(a) संवाद सिद्धान्त (b) अर्थक्रियात्मक सिद्धान्त
(c) संसक्तता सिद्धान्त (d) शब्दार्थ विषयक सिद्धान्त
Ans. (a): रसेल के दर्शन में तर्कमूलक परमाणुवाद और सत्य का संवाद सिद्धान्त साथ-साथ चलते हैं। रसेल के तार्किक संवाद सिद्धान्त के अनुसार किसी प्रतिज्ञाप्ति की सत्यता का अर्थ तथ्यों से संवाद है‚ न कि अनुभव से संवाद।
69. यह किसने कहा है कि‚ ‘‘जहाँ बोलना संभव नहीं हो वहाँ मौन रहना चाहिए’’?
(a) हुस्सर्ल (b) हाइडेगर
(c) विट्टगेंस्टीन (d) एयर
Ans. (c): ‘ट्रैक्टटेस’ में ‘जो कहा जा सकता है’ तथा जिसे दिखाया जा सकता है यह विचार है। प्रतिज्ञाप्तियों के चित्रण सिद्धान्त में विचार ‘जो कहा जा सकता है’- तक ही सीमित है। विट्टगेंस्टीन का कहना है कि जिसके विषय में हम कुछ नहीं बोल सकते उसके विषय में मौन ही वांछनीय है। किन्तु उसे दिखाया जा सकता हैप्रदर्शि त किया जा सकता है।
70. न्याय के अनुसार चेतना है
(a) आत्म का आगन्तुक गुण (b) आत्म का शाश्वत गुण
(c) शाश्वत पदार्थ (d) अशाश्वत पदार्थ
Ans. (a): न्याय के अनुसार चेतना आत्मा का आगन्तुक गुण है। चैतन्य या ज्ञान आत्मा में तब उत्पन्न होता है जब इसका बाह्य विषयों के साथ सम्पर्क होता है। न्याय दर्शन आत्मा को द्रव्य तो मानता है किन्तु चेतना को उसका आकस्मिक धर्म मानता है। इसके अतिरिक्त न्याय दर्शन आत्मा को एक अभौतिक द्रव्य मानता है।
71. मानवाधिकार की चर्चा के संकल्प सिद्धान्त के संबंध में कौन सा कथन सत्य है?
(a) यह तर्क करता है कि मानवाधिकारों का मुख्य कार्य कुछ अनिवार्य मानव हितों को सुरक्षा करना और उन्हें प्रोन्नत करना है।
(b) यह स्वतंत्रता के लिए अद्वितीय मानव क्षमता पर आधारित मानवाधिकारों की वैधता स्थापित करने की चेष्टा करता है।
(c) उपरोक्त (B) सत्य है और (A) असत्य है।
(d) उपरोक्त (A) और (B) दोनों सत्य है।
Ans. (c): मानवाधिकारों की चर्चा के संकल्प सिद्धान्त में स्वतंत्रता के लिए अद्वितीय मानव क्षमता पर आधारित मानवाधिकारों की वैधता स्थापित करने की चेष्टा करता है। संयुक्त राष्ट्र संघ की मान्यता है कि मानव के कुछ ऐसे अधिकार है जो छीने नहीं जा सकते। इसलिए संयुक्त राष्ट्र ने 10 दिसम्बर 1948 को ‘मानव अधिकार की सार्वभौम घोषणा’ के अंगीकार किया।
72. नीचे दिए गये कथनों (A) और (R) पर ध्यान दें और नीचे दिये कूटों से सही उत्तर का चयन करें:
अभिकथन (A)
: मानव चेतना कृत्यों के औचित्य और अनौचित्य को किसी उद्देश्य या परिणामों से उसके संबंध पर ध्यान दिए बगैर तुरंत समझ लेती है। कारण (R) : औचित्य और अनौचित्य कर्मों के अंतर्जात गुण हैं।
कूट:
(a) (A) और (R) दोनों सत्य हैं और (R) (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सत्य हैं‚ परन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सत्य है‚ परन्तु (R) असत्य है।
(d) (A) असत्य है‚ परन्तु (R) सत्य है।
Ans. (a): अभिकथन (A) और कारण (R) दोनों सत्य है और
(R); (A) की सही व्याख्या है।
73. हाइडेगर के अनुसार‚ शास्त्रर्थमीमांसा चक्र निम्नलिखित से संबंधित है:
(a) मूल ग्रंथ और उसके भागों /अंशों के बीच परस्परता
(b) मूल गं्रथ और अर्थ के बीच परस्परता
(c) अर्थ और संदर्भ के बीच परस्परता
(d) स्व की समझ और जगत की समझ के बीच परस्परता
Ans. (d): हाइडेगर के अनुसार शास्त्रर्थमीमांसा चक्र स्व की समझ और जगत की समझ के बीच परस्परता से संबंधित है। मार्टिन हाइडेगर एक दार्शनिक शास्त्रमीमांसक है जो जर्मनी से संबंधित है।
74. सूची – I को सूची- II के साथ सुमेलित करें और नीचे दिए कोडों से सही उत्तर का चयन करें:
सूची-I (नाम) सूची-II (सम्प्रदाय)
A
. मोक्ष i. वेदान्त
B. निर्वाण ii. सांख्य
C. अपवर्ग iii. न्याय
D. कैवल्य v. बौद्धधर्म
v. जैन कोड:
A B C D
(a) i iv iii v
(b) ii v iv i
(c) iii ii i iv
(d) v ii iii iv
Ans. (a): वेदान्त में मोक्ष; न्याय में अपवर्ग; बौद्धधर्म में निर्वाण; जैन और सांख्य में कैवल्य कहा जाता है।
75. संशयवाद है
(a) ह्मूम के दर्शन का प्रारंभ बिंदु
(b) ह्मूम के दर्शन का निष्कर्ष
(c) उपर्युक्त दोनों
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Ans. (b): ह्यूम के दर्शन का अन्तिम निष्कर्ष ‘संशयवाद’ है। ह्यूम अनुभववाद से शुरू करता है और उसका अन्त संशयवाद पर होता है।

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