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UGC NTA NET JRF Subject Philosophy Solved Previous Papers (In Hindi) Book

UGC NTA NET JRF Subject Philosophy Solved Previous Papers (In Hindi) 2016

1. वैशेषिक के अनुसार एक घट का असमवायीकारण है :
(a) पृथ्वी स्वयं (b) घट स्वयं
(c) घट के अंश (d) घट के अंशों का संयोजन
Ans. (d) : वैशेषिक दर्शन के अनुसार असमवायीकारण वह गुण या कर्म है जो समवायीकारण में समवाय सम्बन्ध से रहते हैं और कार्योत्पत्ति में सहायक होते हैं। कार्य और उसका असमवायीकारण दोनों ही समवायीकारण में समवाय सम्बन्ध में रहते हैं। ‘घट के अंशों का संयोजन’ घट का असमवायीकारण है‚ क्योंकि वह घट के अंशों में समवाय सम्बन्ध से रहता है।
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2. पर्वत: वह्निमान धूमात्‌ उपर्युक्त अनुमान में किस प्रकार का हेत्वाभास है?
(a) असाधारण सव्यभिचार (b) अनुपसंहारी
(c) बाधित (d) व्याप्यत्वासिद्ध
Ans. (d) : पर्वत: वह्निमान धूमात्‌ अर्थात्‌ पर्वत वन्ह्निमान
(अग्निमय) होने के कारण धूमवान है; यहाँ वह्नि और धूम की व्याप्ति नियत नहीं है क्योंकि लोहे के जलते गोले में वह्नि है किन्तु धूम नहीं है; वह्नि और धूम की व्याप्ति आर्द्रन्धनसंयोग रूपी उपाधि के कारण सोयाशिक है‚ क्योंकि गीली लकड़ी के जलने पर ही अग्नि से धूम उत्पन्न होता है। जहाँ ‘हेतु’ सोपाधिक होता है वहाँ ‘व्याप्यत्वसिद्धि’ हेत्वाभास होता है।
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3. निम्नलिखित में से किस दर्शन के अनुसार एक वस्तु एक ही समय में ‘हो’ भी सकती है और ‘नहीं भी’?
(a) चार्वाक (b) वेदांत
(c) जैन (d) बौद्ध
Ans. (c) : जैन धर्म के सप्तभंङ्गी नय के तीसरे नय के अनुसार‚ ‘स्यात्‌ अस्ति च नास्ति च’ अर्थात्‌ एक वस्तु है भी और नहीं भी। अर्थात्‌ एक विशेष अर्थ में वह वस्तु है और अन्य अर्थ में नहीं भी है।
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4. चार्वाक के अनुसार अनुमान एक प्रमाण नहीं हो सकता क्योंकि :
(a) यह ईश्वर को सिद्ध नहीं कर सकता है।
(b) यह भ्रमातीत नहीं है।
(c) इसकी व्याप्ति को स्थापित नहीं किया जा सकता है।
(d) यह स्व व्याघाती है।
Ans. (c) : चार्वाकों के अनुसार‚ अनुमान का प्रमुख साधन व्याप्ति ज्ञान है‚ जिसे स्वयं अनुमान पर आधारित माना जा सकता है। चार्वाकों के अनुसार व्याप्ति की स्थापना सम्भव नहीं हो सकती है। अत: वह केवल प्रत्यक्ष प्रमाण को ही मानते हैं। चार्वाकों के अनुसार व्याप्ति की स्थापना प्रत्यक्ष के आधार पर सम्भव नहीं है‚ क्योंकि एक साथ सारी घटनाओं का निरीक्षण नहीं किया जा सकता है।
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5. वैदिक परम्परा में यज्ञ को निम्नलिखित में से किसके निर्देशन में सम्पन्न किया जाता है?
(a) यजमान (b) ऋत्‌विक
(c) गृहकर्ता (d) ईश्वर
Ans. (b) : वैदिक परम्परा में यज्ञ को ‘ऋत्विक’ (पुरोहित) के निर्देशन में सम्पन्न किया जाता था। चारों संहिताओं के लिए अलग-अलग ऋत्विक (पुरोहित) है। ऋग्वेद के ऋत्विक को ‘होता’; यजुर्वेद के ऋत्विक ‘अध्वर्यु’‚ सामवेद के ऋत्विक को ‘उद्‌गाता’ तथा अथर्ववेद के ऋत्विक को ‘ब्रह्मन्‌’ कहा जाता है।
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6. निम्नलिखित में से सही क्रम को बताने वाले कूट का चयन करें :
(a) ब्राह्मण‚ संहिता‚ आरण्यक‚ उपनिषद्‌
(b) उपनिषद्‌‚ संहिता‚ आरण्यक‚ ब्राह्मण
(c) संहिता‚ ब्राह्मण‚ आरण्यक‚ उपनिषद्‌
(d) संहिता‚ उपनिषद्‌‚ ब्राह्मण‚ आरण्यक
Ans. (c) : ‘संहिता’‚ ब्राह्मण‚ आरण्यक तथा उपनिषद्‌’ यह सही क्रम है। ‘संहिता’ में मंत्रों के संकलन प्राप्त होते हैं। ‘ब्राह्मण’ में यज्ञ यागादि के विविध अंगों का सर्वांगपूर्ण विवेचन है। ‘आरण्यक’ वनों में (अरण्य में) रहकर किये गये ऋषियों के चिन्तन है और वैदिक साहित्य के अन्तिम भाग के रूप में उपनिषद आते हैं जिनमें वैदिक दार्शनिक चिन्तन पराकाष्ठा को प्राप्त कर लेता है।
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7. निम्नलिखित में से किस दार्शनिक सम्प्रदाय की यह धारणा है कि देहपरिमाण ही आत्मा का भी परिमाण है?
(a) चार्वाक (b) वैशेषिक
(c) योग (d) जैन
Ans. (a) : चार्वाको के अनुसार‚ देह और आत्मा कोई पृथक्‌ तत्व नहीं हैं। बल्कि चार भूतों का मिश्रण ही है। अत: जीवित शरीर (देह) से भिन्न कोई आत्मा नहीं है। देह के नष्ट होने पर चैतन्य भी नष्ट हो जाता है। इसे ही देहपरिमाणवाद या देहात्मवाद कहते हैं।
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8. नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिया गया है। उन पर न्याय दर्शन के परिप्रेक्ष्य में विचार करें और नीचे दिए गए कूट में से सही का चयन करें :
अभिकथन (A) : लक्षणा एक वृत्ति नहीं हो सकती है। कारण (R) : शक्ति एक वृत्ति है और शक्ति लक्षणा नहीं है।
कूट :
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत करता है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत नहीं करता है।
(c) (A) सही है और (R) गलत है।
(d) (A) गलत है और (R) सही है।
Ans. (d) : प्राचीन नैयायिकों ने वृत्ति के तीन भेद किये हैं−संकेत‚ परिभाषा और लक्षणा। संकेत को शक्ति‚ अभिद्या‚ वाचकता‚ मुख्य वृत्ति भी कहते हैं। लेकिन शक्ति‚ लक्षणा नहीं है। ‘शक्ति’ मुख्य वृत्ति तथा ‘लक्षणा’ गौड़ वृत्ति है। अत: (A) गलत है तथा (R) सही है। (भारतीय दर्शन: डॉ. नन्द किशोर देवराज)
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9. निम्नलिखित में से किसके द्वारा ऋषिऋण से उऋण हुआ जा सकता है?
(a) ब्रह्मचर्य का पालन करके
(b) यज्ञ करके
(c) पुत्र उत्पन्न करके
(d) निर्धन की सहायता करके
Ans. (a) : ऋषिऋण से उऋण होने के लिए हमें स्वाध्याय और ‘ब्रह्मचर्य’ का पालन करना चाहिए। ‘यज्ञ करके’ देव ऋण से और पुत्र उत्पन्न करके पूर्वजों के ऋण (पितृ-ऋण) से मुक्ति मिलती है।
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10. नीचे एक अभिकथन (A) और एक कारण (R) दिया गया है। इन्हें न्याय वैशेषिक दर्शन के परिप्रेक्ष्य में विचार कीजिए और नीचे दिए गए कूटों में से सही का चयन कीजिए :
अभिकथन (A) : मुक्त आत्मा जड़ ही है। कारण (R) : मुक्त आत्मा अपनी चेतना को भी खो देती है।
कूट :
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत करता है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत नहीं करता है।
(c) (A) सही है और (R) गलत है।
(d) (A) गलत है और (R) सही है।
Ans. (d) : मुक्तावस्था में आत्मा में विभिन्न गुणों का अभाव हो जाता है। वह अपनी पूर्वावस्था में लौट जाती है। आत्मा जड़ ही नहीं है। आत्मा वास्तविक स्वरूप में आध्यात्मिक और अभौतिक द्रव्य है। वास्तव में आत्मा की जड़ता की जो बात कही गयी है वह भौतिक जड़ता नहीं। आत्मा विशुद्ध रूप से चैतन्य नहीं है। चेतना उसका आगन्तुक गुण है। मुक्तावस्था में वह जड़‚ अभौतिक‚ आध्यात्मिक है।
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11. वैशेषिक के अनुसार निम्नलिखित में से कौन-सा एक त्र्‌सरेणु के परिमाण का कारण है?
(a) परमाणुओं की संख्या (b) द्वयणुको की संख्या
(c) त्र्‌सरेणुओं की संख्या (d) त्र्‌सरेणु स्वयं
Ans. (c) : एक त्र्‌सरेणु के परिमाण का कारण वैशेयिक दर्शन में त्र्‌सरेणुओं की संख्या है। न्याय−वैशेषिक दर्शन परमाणुओं के द्वारा शृष्टि की उत्पत्ति का सिद्धान्त देता है। उसके अनुसार सर्वप्रथम दो परमाणुओं से द्वयणुक का निर्माण होता है फिर तीन द्वयणुकों से त्र्‌सरेणु का और चार त्र्‌सरेणु मिलक चतुर्णुक और इसी प्रकार शृष्टि होती है।
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12. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूट में से सही कूट का चयन कीजिए:
सूची–I सूची–II
a. ब्रह्मसूत्र i. कणाद
b. मीमांसासूत्र ii. जैमिनी
c. वैशेषिक सूत्र iii. पतंजलि
d. योगसूत्र iv. बादरायण
कूट :
(a) i ii iii iv
(b) i iii ii iv
(c) iv ii i iii
(d) iv i ii iii
Ans. (c)
(a) ब्रह्मसूत्र (iv) बादरायण
(b) मीमांसासूत्र (ii) जैमिनि
(c) वैशेषिक सूत्र (i) कणाद
(d) योगसूत्र (iii) पतंजलि
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13. किसका मत है कि ‘धर्म स्वीकार्यता’ है‚ सहिष्णुता नहीं?
(a) श्री अरविन्द (b) विवेकानन्द
(c) जे. कृष्णमूर्ति (d) राधाकृष्णन्‌
Ans. (b) : स्वामी विवेकानन्द के अनुसार ‘धर्म स्वीकार्यता’ है‚ सहिष्णुता नहीं। विवेकानन्द कहते हैं कि यदि एक धर्म दूसरे को केवल ‘सहन’ करता रहे तो उसमें ‘सार्वभौमिकता’ की दृष्टि नहीं जाग सकती। उसके लिए अन्य धर्मों के लिए भावात्मक दृष्टि अनिवार्य है। इसे तो विवेकानन्द ‘स्वीकृति’ (Acceptance) कहते हैं।
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14. किसका मत है कि जगत ‘मानव आत्म रूप का पालना’ है?
(a) जे. कृष्णमूर्ति (b) के. सी. भट्टाचार्य
(c) विवेकानन्द (d) टैगोर
Ans. (d) : रवीन्द्र नाथ टैगोर‚ जगत की वास्तविकता पर विश्वास करते हैं। अत: उन्होंने जगत का विशद विवरण दिया है‚ जिसमें मानववादी अंश विद्यमान हैं। उनके अनुसार‚ जगत‚ ‘मानव आत्म रूप का पालना है।’ रवीन्द्र नाथ टैगोर अपनी कविताओं में‚ अपनी रचनाओं में प्रकृति की मानवीय दृष्टि से व्याख्या प्रस्तुत किया है।
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15. कौन दार्शनिक प्रतिपादित करता है कि व्यक्तिगत विकास के लिए पुनर्जन्म अपरिहार्य है?
(a) राधाकृष्णन्‌ (b) गाँधी
(c) श्री अरविन्द (d) टैगोर
Ans. (c) : श्री अरविन्द मानते हैं कि व्यक्तिगत विकास के लिए पुनर्जन्म आवश्यक है। श्री अरविन्द के अनुसार विकास प्रक्रिया मानस के स्तर तक पहुँच चुकी है तथा अतिमानस में प्रवेश को आतुर है। इस प्रक्रिया को सक्रिय रखने का एक उपकरण पुनर्जन्म है। ईशवरत्न की उपलब्धि का ढंग जन्म तथा पुनर्जन्मों के मार्गों से होता हुआ क्रमिक उपलब्धि है। सम्भवत: ईश्वरीय लीला का यह उपकरण है।
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16. निम्नलिखित में से किसका मत है कि ‘निषेध का क्षेत्र अनिर्दिष्टता का क्षेत्र है’?
(a) के. सी. भट्टाचार्य (b) विवेकानन्द
(c) टैगोर (d) राधाकृष्णन्‌
Ans. (a) : के. सी. भट्टाचार्य के अनुसार‚ ‘निषेध का क्षेत्र अनिर्दिष्टता का क्षेत्र है।’ कोई भी ज्ञात भाव या कोई ज्ञात अन्तर्वस्तु निरपेक्ष सत्‌ को निरूपित करने में असमर्थ है‚ क्योंकि हर भावात्मक सम्बन्ध उसे कुछ हद तक निश्चित कर देगा। निरपेक्ष सत्‌ किसी भी रूप में इस प्रकार की निश्चित अवगति नहीं दे सकती उसमें अनिश्चितता है क्योंकि उसमें अनिर्दिष्टता है वह निर्धारित नहीं हो सकता है। यदि किसी प्रकार हम निषेध-प्रक्रिया को उसकी उच्चतम सीमा तक ले जा सकें तो उसी रूप में निरपेक्ष सत्‌ की अवगति सम्भव है। यह निषेध प्रक्रिया का चरम महत्व है।
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17. निम्नलिखित में से किसका कथन है कि ‘शिक्षा का अर्थ व्यक्ति के शरीर‚ मन‚ आत्म में जो शुभत्व है उसे प्रकट करने का प्रयत्न है’?
(a) टैगोर (b) विवेकानन्द
(c) श्री अरविन्द (d) गाँधी
Ans. (d) : गाँधी का समाज तथा राजनीति दर्शन भी इस विश्वास पर आधारित है कि हर व्यक्ति में एक अनिवार्य शुभत्त्व का वास है। शुभत्त्व को जाग्रत रखने के लिए उपयुक्त शिक्षा की आवशयकता है। गाँधी शिक्षा को एक सर्वांड्‌गी विकास मानते हैं। शरीर‚ मन तथा आत्म का सर्वांङ्‌गी विकास ही शिक्षा का लक्ष्य गाँधी जी के अनुसार ‘शिक्षा का अर्थ व्यक्ति के शरीर‚ मन‚ आत्म में जो शुभत्व है उसे प्रकट करने का प्रयत्न करना − उसे विकसित करने का प्रयत्न करना है।
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18. निम्नलिखित में से कौन सही है?
(ग्रन्थ) (लेखक)
(a) फिलॉस़फी ऑफ हिन्दूइज्म‚ ऑन फीयर – अम्बेडकर
(b) यू. आर द वर्ल्ड‚ द लिमिट्‌स ऑफ थॉट – जे. कृष्णमूर्ति
(c) फ्रूट गैदरिंग‚ टोटल फ्रीडम – टैगोर
(d) ह्यूमन सायकिल‚ द रीकवरी ऑफ फेथ – श्री अरविन्द
Ans. (b) : यू. आर द वर्ल्ड‚ द लिमिट्‌स ऑफ थॉट − जे.
कृष्णमूर्ति।
जे. कृष्णमूर्ति का दर्शन ‘ध्यान’ के माध्यम से मानसिक क्रान्ति‚ मानवीय सम्बन्ध तथा सकारात्मक परिवर्तन कैसे लायें आदि का खोज है।
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19. नीचे दिए गए अभिकथन (A) और कारण (R) पर विचार कीजिए और नीचे दिए गए कूटों में से सही उत्तर का चयन कीजिए :
अभिकथन (A) : केवल निषेध के अर्थ में शून्यता शुद्ध अभाव है। कारण (R) : ज्ञान के सभी वैध साधनों से शून्यता बाधित हो जाती है।
कूट :
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत नहीं करता है।
(b) (A) गलत है और (R) सही है और (R), (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत करता है।
(c) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत करता है।
(d) (A) सही है और (R) गलत है और (R), (A) की गलत व्याख्या प्रस्तुत करता है।
Ans. (c) : शून्यता को चतुष्कोटि विनिर्मुक्त माना गया है। यदि किसी भी कोटि से ‘शून्यता’ के बारे में कुछ कहेंगे तो यह विरोधाभासी होगा। माध्यमिकों के अनुसार यदि निषेध मुख से अथवा निषेध के माध्यम से शून्य के बारे में कुछ कहें तो वह ‘शुद्ध अभाव’ होगी।
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20. रामानुज-वेदान्त में‚ अधोलिखित अभिकथनों में एक के सिवाय सभी सत्य हैं :
(a) जीव का ब्रह्म से अवयव-अवयवी सम्बन्ध है।
(b) जीव का ब्रह्म के साथ ऐक्य है।
(c) जीव ब्रह्म का विशेषण है।
(d) जीव ब्रह्म पर पूर्णत: आश्रित है।
Ans. (b) : रामानुज-वेदान्त‚ शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त के विपरीत ‘विशिष्टाद्वेत के नाम से जाना जाता है। रामानुज जीव और ब्रह्म में अवयव-अवयवी (सावयवी) सम्बन्ध मानते हैं। जीव ब्रह्म का विशेषण है तथा ब्रह्म पर आश्रित है। जीव ईश्वर का गुण-धर्म है। जीव का ब्रह्म के साथ एक न होकर अपृथक सिद्धि है जो आन्तरिक अपार्थक्य है।
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21. ‘‘एक सीपी में दिखाई देने वाली चाँदी असत्‌ नहीं हो सकती क्योंकि यह दिखती है; यह चाँदी सत्‌ भी नहीं हो सकती क्योंकि जब हम सीपी को विधिवत्‌ देखते हैं तो यह वहाँ उपस्थित नहीं होती।’’ यह अवधारणा है:
(a) विशिष्टाद्वैती (b) शून्यवादी
(c) सांख्यवादी (d) अद्वैती
Ans. (d) : जब कोई वस्तु एक दृष्टि से सत्‌ भी न हो और असत्‌ भी न हो तो वे अनिर्वचनीय ख्याति होती है जिसे अद्वैत वेदान्ती मानते हैं।
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22. ‘‘ब्रह्म सभी वास्तविकताओं में स्वतंत्र है; कुछ भी उसके समान अथवा उससे श्रेष्ठ नहीं है’’−इस विचार का समर्थन किया है:
(a) शंकर (b) ईश्वरकृष्ण
(c) मध्वा (d) प्रभाकर
Ans. (c) : मध्वाचार्य अपने द्वैतवादी दर्शन में ब्रह्म को ही एकमात्र स्वतन्त्र तत्व मानते हैं। ब्रह्म ही एकमात्र निरपेक्ष सत्‌ एवं परमतत्व है जो सवर्गगुण सम्पन्न है। मध्वाचार्य के अनुसार‚ ‘ब्रह्म सभी वास्तविकताओं में स्वतंत्र है; कुछ भी उसके समान अथवा उससे श्रेष्ठ नहीं है।
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23. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर का चयन कीजिए:
सूची–I सूची–II
i. ब्रह्मसूत्र A. प्रस्थानत्रय
ii. मीमांसासूत्र B. स्वर्ग प्राप्ति
iii. वैशेषिक सूत्र C. असम्प्रजात समाधि
iv. योगसूत्र D. पुरुष-प्रकृति-विवेक ज्ञान
कूट :
A B C D
(a) ii i iv iii
(b) iv iii ii i
(c) iii iv i ii
(d) iii iv ii i
Ans. (b)
(i) सांख्य (d) पुरुष-प्रकृति विवेक
(ii) योग (c) असम्प्रज्ञात समाधि
(iii) पूर्व मीमांसा (b) स्वर्ग प्राप्ति
(iv) वेदान्त (a) प्रस्थानत्रय
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24. सांख्य-योग के अनुसार पुरुष है:
(a) चेतन और सक्रिय (b) चेतन और जड़
(c) अचेतन और सक्रिय (d) अचेतन और जड़
Ans. (b) : सांख्य-योग में दो स्वतंत्र तत्व स्वीकार किये गये हैं। एक जड़ प्रकृति और दूसरा चेतन पुरुष। सांख्य दर्शन में पुरुष का स्वरूप चैतन्य है। वह साक्षी है‚ निष्क्रिय या उदासीन (Inactive) है‚ कुटस्थ-नित्य एवं अपरिवर्तनशील है। वह नित्यमुक्त (केपल्य)‚ उदासीन (माध्यस्थ); द्रष्टा एवं अकर्ता है। वह अज‚ नित्य‚ सर्वव्यापी‚ अनाश्रित‚ अलिङ्ग‚ निरवयव एवं स्वतंत्र है।
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25. स्कंध को सही क्रम में प्रस्तुत करने वाले कूट का चयन करें :
(a) विज्ञान‚ रूप‚ वेतना‚ संज्ञा और संस्कार
(b) संज्ञा‚ विज्ञान‚ रूप‚ वेदना और संस्कार
(c) रूप‚ वेदना‚ संज्ञा‚ संस्कार और विज्ञान
(d) रूप‚ संज्ञा‚ वेदना‚ संस्कार और विज्ञान
Ans. (c) : गौतम बुद्ध आत्मा का विश्लेषण उसके घटकों में करते हैं। जैसाकि बागसेन−मिलिन्द संवाद से ज्ञात होता है कि आत्मा ‘पंचस्कन्धों का संघात’ है। ये पांच स्कन्ध क्रमश:−रूप‚ वेदना‚ संज्ञा‚ संस्कार और विज्ञान है। रूप स्कन्ध आत्मा का भौतिक घटक है और बाकी मानसिक घटक है।
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26. ‘‘आकार वस्तुओं से पृथक नहीं हैं‚ बल्कि उनमें अन्तर्निष्ठ हैं; वे इन्द्रियातीत नहीं हैं बल्कि अनुस्यूत हैं।’’ यह दृष्टिकोण निमनलिखित में से किस ग्रीक दार्शनिक का है?
(a) सुकरात (b) प्लेटो
(c) अरस्तु (d) डेमोक्राइटस
Ans. (c) : अरस्तु अपने ‘आकार सिद्धान्त’ में कहते हैं कि ‘आकार वस्तुओं से पृथक्‌ नहीं है‚ बल्कि उनमें अन्तर्निष्ठ है; वे इन्द्रयातीत नहीं है बल्कि अनुस्युत है।’ ध्यातव्य हो इससे पहले प्लेटो अपने आकारों को इन्द्रियातीत और वस्तुओं से पृथक्‌ मानते हैं और उन्हें अलग लोक का निवासी कहते हैं।
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27. नीचे दो कथन दिए गए हैं‚ इनमें से एक को अभिकथन
(A) और दूसरे को कारण (R) की संज्ञा दी गई है। प्लेटो की ज्ञानमीमांसा के परिप्रेक्ष्य में (A) और (R) पर विचार करते हुए सही कूट का चयन करें :
अभिकथन (A) : संकल्पनात्मक ज्ञान ही विशुद्ध ज्ञान है। कारण (R) : संकल्पनात्मक ज्ञान अनुकूल आदर्श अथवा अमूर्त वस्तुओं की यथार्थता के लिए आवश्यक नहीं होता।
कूट :
(a) दोनों (A) और (R) सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) दोनों (A) और (R) सही हैं लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही है‚ लेकिन (R) गलत है।
(d) (A) गलत है‚ लेकिन (R) सही है।
Ans. (c) : प्लेटो की ज्ञानमीमांसासा बुद्धिवादी ज्ञानमीमांसा है जो इन्द्रियानुभव को ज्ञान नहीं मानता है। वह संकल्पनात्मक ज्ञान या प्रत्ययात्मक ज्ञान को ही विशुद्ध ज्ञान मानता है। जिसका ज्ञान हमें बुद्धि या प्रतिभा (Rational Insight) के माध्यम से होता है। संकल्पनात्मक ज्ञान अनुकूल आदर्श अथवा अमूर्त वस्तुओं की यथार्थता के लिए आवश्यक होता है। प्लेटो सामान्यों के यथार्थवादी सिद्धान्त का प्रवर्तक है।
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28. सेंट ऐन्सल्म के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए और सही कूट का चयन कीजिए :
(i) उसने आस्था की सत्यता के लिए आवश्यक कारणों को जानने का प्रयास किया।
(ii) ‘‘मैं समझने के लिये विश्वास करता हूँ।’’
(iii) ईश्वर से हमारा अभिप्राय है ‘कि इससे ज्यादा व्यापक नहीं सोचा जा सकता।’
कूट :
(a) मात्र (i) सही है।
(b) मात्र (i) और (ii) सही हैं।
(c) मात्र (iii) सही है।
(d) सभी (i), (ii) और (iii) सही हैं।
Ans. (d) : सेंट ऐन्सल्म मध्ययुगीन इसाई दार्शनिक है। उनके अनुसार‚ ‘मैं समझने’ के लिए विश्वास करता है। अन्सेलम ने आस्था की सन्यता के लिए आवश्यक कारणों को जानने का प्रयास किया। ऐन्सल्म के अनुसार‚ ईश्वर एक ऐसी सत्ता है जिससे अधिक महान (व्यापक) तत्व के बारे में नहीं सोचा जा सकता है। अन्सेलन के द्वारा ईश्वर के अस्तित्व के सम्बन्ध में दिया गया सत्तामूलक तर्क प्रसिद्ध है।
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29. नीचे दो कथन दिए गए हैं‚ इनमें से एक को अभिकथन
(A) और दूसरे को कारण (R) की संज्ञा दी गई है। थेल्स के परिप्रेक्ष्य में (A) और (R) पर विचार करते हुए सही
कूट का चयन करें :
अभिकथन (A) : चुंबक में आत्मा है। कारण (R) : चुंबक अन्य वस्तुओं को हिलाने की क्षमता रखता है।
कूट :
(a) दोनों (A) और (R) सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) दोनों (A) और (R) सही हैं लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही है‚ लेकिन (R) गलत है।
(d) (A) गलत है‚ लेकिन (R) सही है।
Ans. (a) : थेल्स पाश्चात्य दर्शन के जनक थे। आयोनियन
(माइलेशियन स्कूल) सम्प्रदाय के संस्थापक हैं। जल को सृष्टि का मूल आधार मानते हैं। इनके अनुसार चुम्बक में प्राण (आत्मा) है क्योंकि यह लोहे को स्पन्दित (हिलाने की क्षमता) करने की क्षमता रखता है।
(पाश्चात्य दर्शन का इतिहास−1−प्रो. दयाकृष्ण)
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30. हेराक्लाइटस के दृष्टिकोण से निमनलिखित कथनों पर विचार करें और सही कूट का चयन करें :
(i) हेराक्लाइटस ने माना कि संसार हमेशा से अस्तित्व में था और इसलिए विश्वोत्पत्ति को अस्वीकार किया।
(ii) संसार और इसके घटक निरन्तर प्रवाहमान हैं।
(iii) उन्होंने तर्क दिया कि ऊर्ध्वागामी मार्ग अधोगामी मार्ग के समान है।
कूट :
(a) मात्र (i) सही है।
(b) मात्र (i) और (ii) सही हैं।
(c) सभी (i), (ii) और (iii) सही हैं।
(d) मात्र (i) और (iii) सही हैं।
Ans. (c) : हेराक्लाइटस ‘परिवर्तन−सिद्धान्त’ ‘सम्भूति सिद्धान्त’ के प्रतिपादक हैं। जिसके अनुसार परिवर्तन ही सत्‌ है। स्थिरता और अभेद मिथ्या है। जगत में कोई भी स्थिर नहीं है। हेराक्लाइट्‌स संसार उत्पत्ति और विनाश की प्रक्रिया को क्रमश: उर्ध्वगामी मार्ग तथा अधोगामी मार्ग कहा है। इन दोनों प्रक्रियाओं को एक और अभिन्न कहा है। हेराक्लाइट्‌स एक आरम्भ बिन्दु और प्रत्यावर्तन बिन्दु मानकर चलते हैं। वे संसार के अस्तित्व को हमेशा से मानते हैं। (पाश्चात्य दर्शन का इतिहास−1−प्रो. दयाकृष्ण)
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31. सेंट अगस्टीन के परिप्रेक्ष्य में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए और सही कूट का चयन कीजिए :
(i) परिवर्तनशीलता प्रत्येक प्राणी की विशेषता है।
(ii) ईश्वर सुनिश्चित तौर पर अपरिवर्त्य है।
(iii) परिवर्तनशील वस्तुएँ पूर्णत: नहीं‚ लेकिन आंशिक रूप में सत्‌ होती हैं।
(iv) सभी प्राणी पूर्णत: सत्‌ होते हैं।
कूट :
(a) मात्र (i) और (ii) सही हैं।
(b) मात्र (ii) और (iv) सही हैं।
(c) मात्र (iii) और (iv) सही हैं।
(d) मात्र (i), (ii) और (iii) सही हैं।
Ans. (d) : सन्त ऑगस्टीन मध्यकालीन इसाई दार्शनिक हैं। उनके अनुसार‚ परिवर्तनशीलता प्रत्येक प्राणी की विशेषता है। लेकिन ईश्वर का स्वरूप और संकल्प अपरिवर्तनशील (Immutible) है। वह परिवर्तनशील वस्तुओं को आंशिक रूप में सत्‌ मानता है। अत:
वह सभी प्राणियों को पूर्णत: सत्‌ भी नहीं मानता है‚ आंशिक सत्‌ ही मानता है। (A History of Philosophy: Frank Thilly)
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32. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर का चयन कीजिए:
सूची–I सूची–II
i. लॉक a. ‘मैं चिंतन करता हूँ इसलिए मैं हूँ’।
ii. डेकार्ट b. ईश्वर सर्वव्यापी है।
iii. स्पिनो़जा c. पूर्व स्थापित सामंजस्य।
iv. लाइब्नी़ज d. द्वितीयक गुण आत्मनिष्ठ है।
कूट :
a b c d
(a) iii ii i iv
(b) ii iii iv i
(c) i iv ii iii
(d) iv i iii ii
Ans. (b)
(i) लॉक द्वितीयक गुण /उपगुण आत्मनिष्ठ है।
(ii) डेकार्ट ‘मैं चिंतन करता हूँ इसलिए मैं हूँ’।
(iii) स्पिनो़जा ईश्वर सर्वव्यापी है।
(iv) लाइब्नी़ज पूर्व स्थापित सामंजस्य।
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33. नीचे दिए गए अभिकथन (A) और कारण (R) पर विचार करते हुए दिए गए कूटों में से सही विकल्प का चयन करें :
अभिकथन (A) : लाइबनी़ज के अनुसार द्रुतवेगी वायु और दरवा़जे के बंद होने में अनिवार्य सम्बन्ध है। कारण (R) : यह पूर्व-स्थापित सामंजस्य है।
कूट :
(a) (A) सही है और (R) गलत है और (R), (A) की गलत व्याख्या प्रस्तुत करता है।
(b) दोनों (A) और (R) सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत करता है।
(c) (A) गलत है और (R) सही है और (R), (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत करता है।
(d) दोनों (A) और (R) सही हैं और (R), (A) की गलत व्याख्या प्रस्तुत करता है।
Ans. (b) : लाइवनीत्ज पूर्व स्थापित सामंजस्य मानता है। उसके अनुसार ईश्वर ने सभी चिट्टणुओं को स्वतंत्र बनाया है। ईश्वर उन्हें ऐसा बनाया है कि वे परस्पर एकता अथवा सामंजस्य में पूर्व से बंधे हैं। इसी अर्थ में द्रुतवेगी वायु और दरवाजे के बन्द होने में अनिवार्य सम्बन्ध है।
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34. सिवाय एक के निम्नलिखित सभी कथन स्पिनो़जा के अननुरूप हैं :
(a) मन और शरीर परस्पर दो भिन्न द्रव्य हैं।
(b) संदेह से संदेहकर्ता का अस्तित्व सिद्ध होता है।
(c) ईश्वर सत्तात्मक दृष्टि से संसार से भिन्न है।
(d) संसार और इसके परिवर्तन ईश्वर के प्रकार्य हैं।
Ans. (d) : स्पिनोजा के अनुसार ईश्वर निर्विकार और निराकार तत्व है। स्पिनोजा के अनुसार‚ संसार से ईश्वर सत्तात्मक दृष्टि से भिन्न है। संसार और इसके परिवर्तन ईश्वर के प्रकार्य न होकर‚ ईश्वर पर आश्रित जरूर हैं। प्रकार्य द्रव्य के आगंतुक लक्षण हैं जो गुणों के माध्यम से अभिव्यक्त होते हैं।
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35. ‘‘सम्पूर्ण ब्रह्मांड पदार्थ के प्रत्येक घटक में प्रतिबिंबित होता है सिवाय इस अंतर के कि यह एक घटक में कुछ भिन्नता के साथ प्रतिबिंबित होता है।’’ यह स्थिति स्वीकार्य है :
(a) स्पिनो़जा (b) लाइबनी़ज
(c) डेकार्ट (d) सेंट थॉमस एक्विनॉस
Ans. (b) : लाइबनित्ज के अनुसार ‘प्रत्येक चिदणु विश्व का दर्पण है।’ उसके अनुसार‚ ‘सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड पदार्थ के प्रत्येक घटक में प्रतिबिंबित होता है सिवाय इस अन्तर कि यह एक घटक से दूसरे घटक में कुछ भिन्नता के साथ प्रतिबिन्बित होता है।
(A History of Philosophy: Frank Thilly)
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36. जी. ई. मूर का प्रत्ययवाद का खण्डन निम्नलिखित में से किस एक पर आधारित है?
(a) बोध की क्रिया और बोध के विषय के बीच भिन्नता
(b) ज्ञाता और ज्ञान की क्रिया के बीच भिन्नता
(c) ज्ञाता और वस्तु के बीच भिन्नता
(d) भाव और संदर्भ के बीच भिन्नता
Ans. (a) : मूर के अनुसार प्रत्यय का तात्पर्य ‘बोध की क्रिया’ है। जानने (बोध) की क्रिया स्वयं ज्ञान का विषय नहीं हो सकती है। प्रत्ययवादियों की सही भूल है। कि वे ‘ज्ञात वस्तु’ और ‘यथार्थ वस्तु’ को एक मान लेते हैं। अर्थात्‌ मूर के अनुसार‚ बोध की क्रिया और बोध के विषय के बीच भिन्नता है।
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37. रसेल की पुस्तक ‘प्रोब्लेम्स ऑफ फिलोसॉफी’ के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य है?
(a) सामान्य की ही वास्तविक सत्ता होती है‚ जो न तो मानसिक और न ही भौतिक जगत में होती है फिर भी उनकी स्थानापन्न अथवा तार्किक स्थिति होती है।
(b) सामान्य की वास्तविक सत्ता नहीं होती है‚ वह सिर्फ कल्पना में होती है।
(c) सामान्य की ही वास्तविक सत्ता होती है‚ वह मानसिक और भौतिक दोनों जगत में होती है।
(d) सामान्य की ही वास्तविक सत्ता होती है‚ वह सिर्फ मानसिक जगत में होती है।
Ans. (a) : रसेल अपनी पुस्तक ‘प्रोब्लेम्स ऑफ फिलोसॉफी’ में दर्शन के विभिन्न समस्याओं पर विचार करते हैं। जिसमें सामान्य पर भी विचार करते हैं। उनके अनुसार‚ सामान्य की ही वास्तविक सत्ता होती है‚ जो न तो मानसिक और न ही भौतिक जगत में होती है फिर भी उनकी स्थानापन्न या तार्किक स्थिति होती है।
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38. तार्किक प्रत्यक्षवाद के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए और सही कूट का चयन कीजिए :
(i) सबल अर्थ में सत्यापयनीयता का तात्पर्य है कि अर्थपूर्णता के लिए किसी कथन की सत्यता अथवा असत्यता को अनुभव सिद्ध होना चाहिए।
(ii) तार्किक अनुभववादी सत्यापयनीता को अर्थ के मानदण्ड के रूप में प्रयोग करते हैं।
(iii) सबल अर्थ में सत्यापयनीयता का तात्पर्य है सत्यापयनीयता की प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष विधि का होना।
कूट :
(a) मात्र (i) सही है।
(b) मात्र (i) और (ii) सही हैं।
(c) मात्र (iii) सही है।
(d) मात्र (i) और (iii) सही हैं।
Ans. (b) : ‘तार्किक प्रत्यक्षवाद’ अथवा तार्किक अनुभववाद अथवा तार्किक भाववाद अर्थ के सत्यापनीयता सिद्धान्त का समर्थन करता है। जिसके अनुसार सबल अर्थ में सत्यापनीयता का तात्पर्य है कि अर्थपूर्णता के लिए किसी कथन की सत्यता अथवा असत्यता को अनुभव सिद्ध होना चाहिए। तार्किक भाववादी/अनुभववादी सत्यापनीयता को अर्थ के मानदण्ड के रूप में प्रयोग करते हैं।
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39. यह दृष्टिकोण कि ‘‘प्रसन्नता ऐसे सुखद क्षणों की प्रबलता नहीं है जो दुख से मुक्त है अपितु शक्ति के अभिधारण और उसके प्रयोग में है।’’ − निम्नलिखित में से किससे सम्बन्धित है?
(a) हेगल (b) मूर
(c) नीत्शे (d) हाइडेगर
Ans. (c) : नीत्शे का दर्शन ‘अतिमानववाद’ और ‘शक्तिवाद’ पर आधारित है। प्रसन्नता के बारे में वे विचार व्यक्त करते हुए कहते हैं कि ‘प्रसन्नता (Happiness) ऐसे सुखद क्षणों की प्रबलता नहीं है जो दुख से मुक्त है‚ अपितु शक्ति के अभिधारण और उसके प्रयोग में है।’ (नीतिशास्त्र का सर्वेक्षण: संगमलाल पाण्डेय)
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40. सी. एस. पियर्स के उपयोगितावाद के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए और सही कूट का चयन कीजिए :
(i) उपयोगितावाद प्रतिबिंब की पद्धति नहीं है।
(ii) विचारों को स्पष्ट करने के अपने प्रयोजन हेतु उपयोगितावाद प्रतिबिंब की पद्धति है।
(iii) अवधारणों के अर्थ को स्पष्ट करने की एक मात्र पद्धति है।
कूट :
(a) मात्र (i) सही है।
(b) मात्र (i) और (ii) सही हैं।
(c) मात्र (ii) सही है।
(d) मात्र (ii) और (iii) सही हैं।
Ans. (d) : अमेरिकी दार्शनिक चार्ल्स सेण्डर्स पर्स (C.S. Peirce) को उपयोगितावाद ‘Pragmaticism’ शब्द का प्रथम प्रयोगकर्ता दर्शन में माना जाता है। (विलियम जेम्स के अनुसार) पर्स के अनुसार‚ अवधारणाओं के अर्थ को स्पष्ट करने की एकमात्र पद्धति उपयोगितावाद है तथा विचारों को स्पष्ट करने के अपने प्रयोजन हेतु यह प्रतिबिम्ब पद्धति है।
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41. हेगल के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए और सही कूट का चयन कीजिए :
(i) विकास कालिक नहीं अपितु एक तार्किक प्रक्रिया है।
(ii) निरपेक्ष सत्ता में एकता एवं विरोध दोनों हैं।
(iii) सत एक बौद्धिक प्रक्रिया‚ एक क्रमिक विकास है।
कूट :
(a) मात्र (i) सही है।
(b) मात्र (i) और (ii) सही हैं।
(c) मात्र (i) और (iii) सही हैं।
(d) मात्र (i), (ii) और (iii) सही हैं।
Ans. (d) : हेगल निरपेक्ष प्रत्ययवाद के समर्थक हैं। उनके अनुसार‚ ‘सत्‌ बोध है और बोध सत्‌ है’ (Real is Rational and Rational is Real). यह विचारों के विकास की बात करते हैं। उनके अनुसार विकास कालिक नहीं अपितु एक तार्किक प्रक्रिया है। सत्‌ एक बौद्धिक प्रक्रिया है। दर्शन का उद्‌देश्य सत के विकास का सम्यक्‌ मूल्यांकन करना है क्योंकि हेगल के अनुसार सत्‌ बोधगम्य‚ एक क्रमिक विकास है। इस निरपेक्ष सत्ता में एकता (Unity) और विरोध (opposition) दोनों है।
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42. सूची-I के साथ सूची-II को सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूटों का उपयोग करते हुए सही उत्तर का चयन कीजिए:
सूची–I सूची–II
a. उच्चतम निश्चितता के लिए हमारी स्वीकृति ही आस्था है।
i. हेगल
b. यद्यपि हमारा समस्त ज्ञान अनुभव से प्रारम्भ होता है परन्तु इसका अर्थ ये नहीं है कि यह अनुभव से उत्पन्न होता है।
ii. ह्यूम
c. विचार अत्यधिक सरल‚ अमूर्त एवं रिक्त अवधारणाओं से अधिक जटिल मूर्त और बलवती धारणा की ओर बढ़ते हैं।
iii. कांट
d. मस्तिष्क विभिन्न अवबोधनों का समूह अथवा संग्रहण है।
iv. लॉक
कूट :
a b c d
(a) iv ii i iii
(b) ii iv iii i
(c) iv i ii iii
(d) iii ii i iv
Ans. (*) : यह प्रश्न गलत उत्तरों वाला है। फिर भी इसका सम्भावित उत्तर है−
(a) ‘उच्चतम निश्चितता के लिए हमारी स्वीकृति आस्था है’ − हेगल
(b) यद्यपि हमारा समस्त ज्ञान अनुभव से प्रारम्भ होता है परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि यह अनुभव से उत्पन्न होता है − कांट
(c) विचार अत्यधिक सरल‚ अमूर्त एवं रिक्त अवधारणाओं से अधिक जटिल‚ मूर्त और बलवती धारण की ओर बढ़ते हैं − लॉक
(d) मस्तिष्क विभिन्न अवबोधनों (sensations) का समूह अथवा संग्रहण है − ह्यूम
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43. जब मस्तिष्क किसी अन्य विचार के हस्तक्षेप के बिना प्रत्यक्ष निरीक्षण के द्वारा दो विचारों की स्वीकृति अथवा अस्वीकृति का अनुभव करता है तो इसे जाना जाता है :
(a) अर्न्तदर्शी ज्ञान (b) निरूपणात्मक ज्ञान
(c) संवेदी ज्ञान (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Ans. (a) : जब मस्तिष्क किसी अन्य विचार के हस्तक्षेप के बिना प्रत्यक्ष निरीक्षण के द्वारा दो विचारों की स्वीकृति अथवा अस्वीकृति का अनुभव करता है तो इसे ‘अर्न्तदर्शीय ज्ञान’ (Intuitive knowledge) कहते हैं। इसमें इन्द्रिय सम्वेदनों के बिना ज्ञान प्राप्त होता है।
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44. काण्ट के अनुसार निम्नलिखित में से निर्णय का सुनिश्चित स्वरूप कौन-सा है?
(a) प्रत्येक कार्य का एक कारण होता है।
(b) यह विष हो सकता है।
(c) द्रव्य या तो ठोस है अथवा तरल है।
(d) उपर्युक्त सभी
Ans. (a) : काण्ट बारह प्रकार के निर्णयों की व्याख्या ‘अतीन्द्रिय तर्कशास्त्र’ के अन्तर्गत करते हैं जिनसे 12 प्रकार के बुद्धि विकल्पों का निगमन होता है। इन निर्णयों को चार वर्गों में जिनमें तीन-तीन निर्णय प्रत्येक वर्ग में रखा गया है। अन्तिम वर्ग प्रकारतावाचक
(modal) का है। जिसमें अन्तिम बारहवां निर्णय आवश्यक
(Apodictic) है। यह अनिवार्यता एवं आपातिकता नामक बुद्धि विकल्प का निर्देश करता है जैसे−प्रत्येक कार्य का एक कारण होता है।
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45. दिए गए अभिकथन (A) और कारण (R) पर विचार कीजिए और नीचे दिए कूटों में से सही विकल्प का चयन करें :
अभिकथन (A) : ह्यूम के लिए‚ हमें द्रव्य को कोई प्रत्यय नहीं होता। कारण (R) : हमें प्रत्यक्ष के अलावा वस्तुओं का कोई प्रत्यय नहीं प्राप्त होता जबकि द्रव्य प्रत्यक्ष से पूर्णतया भिन्न है।
कूट :
(a) दोनों (A) और (R) सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत करता है।
(b) दोनों (A) और (R) गलत हैं और (R), (A) की गलत व्याख्या प्रस्तुत करता है।
(c) (A) सही है और (R) गलत है और (R), (A) की गलत व्याख्या है।
(d) (A) गलत है लेकिन (R) सही है और (R), (A) की सही व्याख्या है।
Ans. (a) : ह्यूम किसी प्रकार के द्रव्य (वस्तु‚ आत्मा‚ ईश्वर) की सत्ता को नहीं मानता। उसके अनुसार‚ हमें द्रव्य का कोई प्रत्यय प्राप्त नहीं होता। क्योंकि हमें प्रत्यक्ष के अलावा वस्तुओं का कोई प्रत्यय नहीं प्राप्त होता। क्योंकि द्रव्य प्रत्यक्ष से पूर्णतया भिन्न है।
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46. निम्नलिखित अभिकथनों पर विचार कीजिए और जॉन लॉक के दर्शन के परिप्रेक्ष्य में सही कूट का चयन कीजिए :
(i) विचारों की स्वीकृति अथवा अस्वीकृति ज्ञान है।
(ii) प्राथमिक और द्वितीयक गुणों के बीच भेद है।
(iii) वस्तुएँ अपने गुणों के माध्यम से निरूपित होती हैं।
(iv) वस्तु का ज्ञान मस्तिष्क में पूर्व स्थापित है।
कूट :
(a) (i) और (ii) सही हैं।
(b) (i), (ii) और (iii) सही हैं।
(c) (ii), (iii) और (iv) सही हैं।
(d) (i), (ii), (iii) और (iv) सही हैं।
Ans. (b) : ‘वस्तु का ज्ञान मस्तिष्क में पूर्व स्थापित है।’ यह बुद्धिवादियों के अनुसार है। लॉक एक अनुभववादी दार्शनिक हैं उसके अनुसार ‘जन्म के समय हमारा मस्तिष्क ‘कोरा कागज’ की तरह होती है जिसमें अनुभव के द्वारा ज्ञान बाद में प्राप्त होता है। अत: विकल्प (iv) को छोड़ बाकी (i), (ii), (iii) सही हैं।
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47. निम्नलिखित अभिकथनों पर विचार कीजिए और कांट के दृष्टिकोण के परिप्रेक्ष्य में सही कूट का चयन कीजिए :
(i) संश्लेषणात्मक प्रागनुभविक निर्णय ज्ञान का मानदंड है।
(ii) संश्लेषणात्मक आनुभविक निर्णय ज्ञान का मानदंड है।
(iii) विश्लेषणात्मक प्रागनुभविक निर्णय ज्ञान का मानदंड है।
(iv) विश्लेषणात्मक आनुभविक निर्णय ज्ञान का मानदंड है।
कूट :
(a) मात्र (i) सही है। (b) मात्र (ii) सही है।
(c) मात्र (i) और (iv) सही हैं। (d) मात्र (iii) सही है।
Ans. (a) : काण्ट अपनी पुस्तक ‘शुद्ध बुद्धि की आलोचना’ में सार्वभौमिक नवीन और यथार्थ ज्ञान के मानदण्ड की खोज करता है जिसे वह ‘संश्लेषणात्मक प्रागनुभविक निर्णय’ कहता है। जिसे वह ज्ञान का मानदण्ड कहता है।
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48. निम्नलिखित अभिकथनों पर विचार कीजिए और डेविड ह्यूम के परिप्रेक्ष्य में सही कूट का चयन कीजिए:
(i) शक्कर में मिठास अन्तर्निहित नहीं है।
(ii) शक्कर और मिठास के बीच सिर्फ पारिस्थितिक सम्बन्ध है।
(iii) शक्कर और मिठास के बीच कोई आवश्यक नैमित्तिक सम्बन्ध नहीं है।
(iv) शक्कर और मिठास के बीच सिर्फ सहयोजन है।
कूट :
(a) मात्र (i) सही है।
(b) मात्र (ii) सही है।
(c) मात्र (iii) और (iv) सही हैं।
(d) मात्र (ii) और (iv) सही हैं।
Ans. (c) : कारण−कार्य के साहचर्य और ‘प्राकृतिक एकरूपता’ पर आधारित आगमन पर डेविड ह्यूम के अनुसार संशय किया जा सकता है जिसे ‘आगमन की समस्या’ के नाम से जाना जाता है। उसके अनुसार कारण−कार्य सम्बन्ध कोई अनिवार्य सम्बन्ध नहीं है। अर्थात्‌ यदि शक्कर में मिठास है तो इसका मतलब यह नहीं कि इनके बीच कोई आवश्यक नैमित्तिक सम्बन्ध ही हो। यह केवल साहचर्य (सहयोजन) पर आधारित है।
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49. निम्नलिखित अभिकथन पर विचार कीजिए और सही
कूट का चयन कीजिए :
दृश्यता सत्ता है−यह विचार निम्नलिखित में से किसका है:
(i) लॉक
(ii) बर्कले
(iii) लॉक और बर्कले
(iv) लॉक‚ बर्कले और ह्यूम
कूट :
(a) मात्र (i) सही है।
(b) मात्र (ii) सही है।
(c) मात्र (i) और (ii) सही हैं।
(d) मात्र (iv) सही है।
Ans. (b) : बर्कले अपने प्रत्ययवादी विचारों के अन्तर्गत कहता है ‘सत्ता दृश्यता है।’ अर्थात्‌ ‘सत्ता अनुभवमूल है।’ बर्कले के अनुसार किसी वस्तु के अस्तित्वयुक्त होने का अर्थ उसका अनुभव का विषय अर्थात्‌ दृश्य होना है।
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50. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूटों में से सही उत्तर चयन कीजिए :
सूची–I सूची–II
A. मैं स्वयं अपनी सत्ता का कारण नहीं हो सकता क्योंकि मुझमें पूर्णता का प्रत्यय है।
i. ह्यूम
B. यदि कोई सिद्धान्त बिना जाने हमारी आत्मा पर अंकित होता है तो उसके स्वरूप और उसमें भेद करना असंभव है।
ii. बर्कले
C. अमूर्त प्रत्ययों के निर्माण में मन असक्षम है।
iii. डेकार्ट
D. अनिवार्यत: वस्तु नहीं अपितु प्रत्यय ही हमारे मन के साथ संयुक्त होते हैं।
iv. लॉक
कूट :
A B C D
(a) ii i iii iv
(b) iv ii i iii
(c) i ii iv iii
(d) iii iv ii i
Ans. (d)
(a) डेकार्ट के अनुसार‚ मैं स्वयं अपनी सत्ता का कारण नहीं हो सकता‚ क्योंकि मुझमें पूर्णता का प्रत्यय है।
(b) लॉक के अनुसार‚ यदि कोई सिद्धान्त बिना जाने हमारी आत्मा पर अंकित होता है तो उसके स्वरूप और उसमें भेद करना असम्भव है।
(c) बर्कले‚ अमूर्त प्रत्ययों के निर्माण में मन असक्षम है।
(d) ह्यूम‚ अनिवार्यत: वस्तु नहीं अपितु प्रत्यय ही हमारे मन के साथ संयुक्त होते हैं।
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