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UGC NTA NET JRF Subject Philosophy Solved Previous Papers (In Hindi) Book

UGC NTA NET JRF Subject Philosophy Solved Previous Papers (In Hindi) 2017

1. अद्वैत के अनुसार जिस कलम से मैं लिख रहा हूँ‚ वह है :
(a) सत्‌ (b) असत्‌
(c) सत्‌ और असत्‌ दोनों (d) न ही सत्‌ न असत्‌
Ans. (d) : अद्वैत वेदान्त में व्यावहारिक जगत की वस्तुओं की सदसत-विलक्षण माना गया है। अर्थात्‌ ‘न ही सत्‌ है और न असत्‌। ‘कलम जिससे मै लिख रहा हूँ’ भी व्यावहारिक जगत की एक वस्तु है अत: वह भी ‘न सत्‌ है और न असत्‌ है’‚ अर्थात्‌ सदसत्‌ विलक्षण है।
(भारतीय दर्शन: आलोचन और अनुशीलन: चन्द्रधर शर्मा)
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2. वैशेषिकों के अनुसार घट का असमवायी कारण निम्नलिखित में से कौन है?
(a) कपाल (b) कपाल संयोग
(c) उपादान (d) दण्ड-संयोग
Ans. (b) : वैशेषिक दर्शन के अनुसार गुण कभी किसी कार्य का समवायिया उपादान कारण नहीं हो सकता क्योंकि समवायि कारण केवल द्रव्य में होता है। गुण किसी कार्य का केवल असमवायि कारण ही होता है। ‘संयोग’ वैशेषिक दर्शन में एक गुण है। इसके अतिरिक्त किसी कार्य में असमवायि कारण वह गुण या कर्म है जो समवायि कारण में समवाय सम्बन्ध से रहते हुए कार्योत्पत्ति में सहायक होने से कारण हो जाता है। यहां ‘कपाल-संयोग’ घट का असमवायि कारण है‚ क्योंकि वह ‘कपाल’ में समवाय सम्बन्ध से रहता है। यहां घट ‘कार्य’ और ‘कपाल’ समवायि कारण है।
(भारतीय दर्शन की समीक्षात्मक रूपरेखा: राममूर्ति पाठक)
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3. केवल नित्य मूर्तदृव्य को वर्णित करने वाले कूट का चयन कीजिए:
(a) क्षिति‚ मनस्‌‚ आकाश
(b) दिक्‌‚ काल‚ आत्मा
(c) क्षिति के परमाणु‚ तेज्‌ और मरूत्‌
(d) काल‚ आत्मा और मनस्‌
Ans. (c) : क्षिति‚ जल‚ पावक (तेज) और मरुत (वायु) को नित्य‚ एवं मूर्त्तरूप इनके परमाणु रूप में कहा गया है।
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4. मीठे में कड़वेपन का अभाव किस संबंध से रहता है?
(a) समवाय (b) संयोग
(c) विशेषणता (d) स्वरूप
Ans. (d) : मीठे में कड़वेपन का अभाव इसके स्वरूप के कारण होता है। मीठापन और कड़वापन एक तरह के गुण है। और गुण में अपने स्वभावानुसार कोई अन्य गुण नहीं हो सकता है। अत:
‘मीठेपन’ में कड़वेपन का अभाव उसके स्वरूप सम्बन्ध से जाना जा सकता है।
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5. वैशेषिक मतानुसार‚ घट के संबंध में कुम्हार का दंड क्या है?
(a) समवायी कारण (b) असमवायी कारण
(c) निमित्त कारण (d) अन्यथा सिद्ध
Ans. (c) : न्याय- वैशेषिक दर्शन में समवाय पदार्थ के स्वीकरण के आधार पर कारण के तीन भेद माने गये है- समवायि कारण
(Inherent Cause)‚ असमवायि कारण (Nan-Inherent Cause) तथा निमित्त कारण (Efficient Cause)‚ समवायि कारण और असमवायि कारण तो कार्य से अभिन्न रहते है। परन्तु वह कारण जो अपनी शक्ति से उपादान कारण से कार्य उत्पन्न करता है वह निमित्त कारण है। जैसे कुम्भकार घट का निमित्त कारण है। उसका दण्ड और चाक‚ आदि भी सहकारी कारण होने के कारण निमित्त कारण हैं।
(भारतीय दर्शन: डॉ. नन्द किशोर देवराज)
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6. कुमारिल के अनुसार जाति और व्यक्ति के बीच किस प्रकार का संबंध होता है?
(a) समवाय (b) तादात्म्य
(c) स्वरूप (d) संयोग
Ans. (b) : कुमारिल के दर्शन में संयोग एवं संयुक्त तादात्म्य में दो ही सम्बन्ध माने गये हैं। कुमारिल भाव और आभाव दोनों को पदार्थ मानते है। भाव का ज्ञान प्रत्यक्ष आदि से होता है आभावक ज्ञान अनुपलब्धि से होता है। भाव के दो अनिवार्य पक्ष सामान्य और विशेष जाति और व्यक्ति जिसमें परस्पर तादात्म्य अथवा भेदाभेद संबंध है। जाति और व्यक्ति दोनों में अभेद रहने पर उनमें भेद विद्यमान रहता है।
(भारतीय दर्शन का सर्वेक्षण: संगम लाल पाण्डेय)
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7. लाइब्नित़्ज के पूर्व-स्थापित सामंजस्य सिद्धान्त के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सत्य है?
(a) शरीर और आत्मा एक-दूसरे के सामंजस्य से क्रियाशील रहते हैं और एक हो जाते हैं।
(b) शरीर आत्मा के बिना और आत्मा शरीर के बिना क्रिया करते हैं किन्तु दोनों ऐसे क्रिया करते हैं जैसे एक दूसरे को प्रभावित करते हैं।
(c) शरीर आत्मा पर और आत्मा शरीर पर क्रिया करते हैं।
(d) शरीर और आत्मा दोनों एक और समरूप हैं।
Ans. (b) : लाइबनित्ज के अनुसार‚ आत्मा और शरीर न तो अंतर्क्रिया का संबंध है और न ही संयोगवाद है। आत्मा और शरीर से सम्बन्धित उसका सिद्धान्त पूर्वस्थापित सामं जस्य-नियम है। आत्मा और शरीर क्रमश: चिदणुओं की क्रियाशील और अल्पव्र् िाâयाशील दो अवस्थायें है। ईश्वर ने इन दोनों में इस प्रकार सामंजस्य स्थापित कर दिया है कि एक-दूसरे से स्वतंत्र होते हुए भी चिदणुओं में संबंध बना रहता है।
(पाश्चात्य दर्शन का इतिहास-भाग-2- प्रो. दयाकृष्ण)
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8. कांट के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए और सही कूट का चयन कीजिए:
(i) देश और काल वस्तुगत हैं और अपने ढंग से रहते हैं।
(ii) देश और काल वस्तुगत नहीं है‚ बल्कि वे केवल आभास और सापेक्षिक है।
(iii) देश और काल प्रागनुभविक हैं
कूट:
(a) केवल (ii) सत्य है।
(b) केवल (i) और (ii) सत्य हैं।
(c) केवल (iii) सत्य है।
(d) केवल (i) और (iii) सत्य हैं।
Ans. (c) : कांट के अनुसार‚ देश-काल प्रागनुभविक है और प्रत्यक्ष के आकार है। हम देश-काल से वस्तुओं के स्वरूप को निर्धारित नहीं कर सकते है। वस्तुत: देश एवं काल की आत्मनिष्ठ शर्तो से स्वतंत्र रूप में किसी भी वस्तु के स्वरूप का निर्धारण नहीं किया जा सकता है। इसीलिए काण्ट देश−काल को आनुभविक दृष्टि से यथार्थ और अनुभव-निरपेक्ष (अतीन्द्रिय) दृष्टि से अयथार्थ (प्रत्ययात्मक) मानता है।
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9. देकार्त के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए और सही कूट का चयन कीजिए:
(i) सभी मानसिक अवस्थाओं को भौतिक अवस्थाओं में घटाया जा सकता है।
(ii) सभी भौतिक अवस्थाओं को मानसिक अवस्थाओं में घटाया जा सकता है।
(iii) मन और शरीर का संबंध तार्किक रूप से वैसा नहीं है जैसा कार और चालक का।
(iv) मनुष्य के संदर्भ में दैहिक और अदैहिक का भेद नहीं है।
कूट:
(a) केवल (iii) सत्य है।
(b) केवल (i) और (iv) सत्य हैं।
(c) केवल (ii) और (iii) सत्य हैं।
(d) केवल (ii), (iii) और (iv) सत्य हैं।
Ans. (a) : मन और शरीर का संबंध वैसा नहीं है जैसा कार और चालक का। देकार्त के मन-शरीर संबंध को ‘अंतर्क्रियावाद’ के नाम से जाना जाता है।
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10. ‘जब तक हम भौतिक शरीर में आबद्ध हैं‚ सम्पूर्ण सत्य का अनुभव असंभव हैं‚’ यह विचार है
(a) के.सी. भट्टाचार्य का (b) राधाकृष्णन का
(c) जे. कृष्णमूर्ति का (d) गांधी का
Ans. (d) : गांधी जी के अनुसार ‘जब तक हम भौतिक शरीर में आबद्ध है‚ सम्पूर्ण सत्य का अनुभव असंभव है।’ गांधी जी भैतिकता से ऊपर आध्यात्मिकता को रखते है। और हम जैसे भौतिकता से आध्यात्मिकता की तरह अग्रसर होते हैं सत्य के और निकट होते हैं।
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11. ह्यूम के परिप्रेक्ष्य में अभिकथन (A) और तर्क (R) पर विचार करते हुए सही कूट का चयन कीजिए:
अभिकथन (A): वैयक्तिक अनन्यता कल्पना का कार्य है।
तर्क (R): सुख-दु:ख‚ संवेदन और कल्पना ये सादृश्य‚ सामीप्य और कारणता के द्वारा एक साथ संबंधित होते हैं।
कूट:
(a) दोनों (A) और (R) सत्य है और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) दोनों (A) और (R) सत्य हैं‚ लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सत्य है और (R) असत्य है।
(d) (A) असत्य है और (R) सत्य है।
Ans. (a) : ह्यूम के ‘अ-स्वामित्व सिद्धान्त’ के अनुसार‚ वैयक्तिक अनन्यता केवल एक काल्पनिक विचार है। यह हमारे संस्कारों और प्रत्ययों के साहचर्य से उत्पन्न होता है। अर्थात्‌ सुख-दु:ख‚ संवेदन और कल्पना ये सादृश्य‚ सामीप्य और कारणता के द्वारा एक साथ संबंधित होते है। जो एकता को उत्पन्न करते हैं।
(AHISTOR OF PHILOSOPHY- FRANK THILLY)
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12. शब्द और इसके अर्थ के बीच का संबंध स्वाभाविक नहीं है‚ यह मत है:
(a) बौद्धों का (b) वेदांतियों का
(c) मीमांसकों का (d) नैयायिकों का
Ans. (d) : नैयायिकों ने शब्द और इसके अर्थ के बीच का संबंध स्वाभाविक न मानकर कृत्रिम माना है। उल्लेखनीय है कि मीमांसा दर्शन भी शब्द और अर्थ में संबंध स्वीकारता है परन्तु न्याय दर्शन के विपरीत वह नैसर्गिक (स्वाभाविक) एवं नित्य सम्बन्ध को मानता है।
(भारतीय दर्शन की समीक्षात्मक रूपरेखा: राममूर्ति पाठक)
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13. निम्नलिखित में से कौन सा युग्म इस विचार का समर्थन करता है कि ‘ज्ञान की सत्यता का सत्यापन किसी दूसरे ज्ञान से नहीं होता’?
(a) वेदांत और मीमांसा (b) मीमांसा और सांख्य
(c) मीमांसा और न्याय (d) वेदांत और न्याय
Ans. (a) : ‘ज्ञान की सत्यता का सत्यापन किसी दूसरे ज्ञान से नहीं होता’ यह ज्ञान के प्रामाण्य से सम्बन्धित स्वत: प्रामाण्यवादी मत है‚ जिसका समर्थन युग्म रूप में सम्बन्धित प्रश्न की विकल्प (i) वेदान्त और मीमांसा के दर्शनों में किया गया है।
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14. जब किसी शब्द के तात्पर्य‚ अर्थ अथवा उसकी अभिव्यक्ति अपने मूल अर्थ के आंशिक रूप से भिन्न होती है‚ तो यह स्थिति है:
(a) अभिधा (b) अजहत्‌ लक्षणा
(c) जहत्‌-अजहत्‌ लक्षणा (d) व्यंजना
Ans. (c) : जब किसी शब्द के तात्पर्य‚ अर्थ अथवा उसकी अभिव्यक्ति अपने मूल अर्थ के आंशिक रूप से भिन्न होती है‚ तो यह स्थिति ‘जहत्‌- अजहत्‌- लक्षणा’ की होती है। ध्यातव्य हो लक्षणा तीन प्रकार से क्रमश: जहत्‌ लक्षणा‚ अजहत्‌-लक्षणा‚ जहत्‌-
अजहत्‌- लक्षणा या भाग्य लक्षणा या भाग्य त्याग लक्षणा भी कहते हैं।
(भारतीय दर्शन: डॉ नन्द किशोर देवराज)
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15. सूची-I का सूची-II सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूटों का उपयोग करते हुए सही उत्तर का चयन कीजिए:
सूची-I सूची-II
A. शब्दार्थ शक्ति जिसमें पदों i. तात्पर्य के पारस्परिक अर्थ की अपेक्षा हो।
B. शब्दों के अर्थों के बीच ii. आसत्ति संबंधों का अविरोध
C. उच्चरित शब्दों के अर्थ iii. आकांक्षा का अविलम्ब ग्रहण
D. विशेष अर्थ के सम्प्रेषण iv. योग्यता में शब्द की क्षमता
कूट:
A B C D
(a) ii i iii iv
(b) i iii iv ii
(c) iv iii ii i
(d) iii iv ii i
Ans. (d) : (a) शब्दार्थ शक्ति जिसमें पदों के पारस्परिक अर्थ को आकांक्षा अपेक्षा हो
(b) शब्दों के अर्थों के बीच संबंधो का अविरोध योग्यता
(c) उच्चरित शब्दों के अर्थ का अविलम्ब ग्रहण आसत्ति
(d) विशेष अर्थ के सम्प्रेषण में शब्द की क्षमता तात्पर्य आकांक्षा‚ योग्यता‚ आसत्ति और तात्पर्य से सम्पन्न पदों का समूह वाक्य है।
(भारतीय दर्शन: डॉ नन्द किशोर देवराज)
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16. अ-गवय का निषेध एक भावात्मक सत्ता है और यह अ-गवय से भिन्न है‚ यह विचार है:
(a) नैगम नय (b) अपोहवाद
(c) प्रतिबिंबवाद (d) सप्तभंगीनय
Ans. (b) : बौद्ध दर्शन में ‘अपोहवाद’ सामान्य या जाति को ‘अपोह’ कहा गया है। ‘अपोह’ का अर्थ है सदृश्य वस्तुओ के समूह से निसदृश वस्तुओं को अलग करना। उदाहरण के लिए गवय का अर्थ है न अजौ अर्थात जो अ-गवय नहीं है। अर्थात अ-गवय का निषेध एक भावात्मक सत्ता है और यह अ-गवय नहीं है।
(भारतीय दर्शन का सर्वेक्षण- संगम लाल पाण्डेय)
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17. ‘प्रत्यक्ष कल्पनापोढ़म’- प्रत्यक्ष का यह लक्षण निम्नलिखित में से किसके द्वारा प्रतिपादित है?
(a) दिङ्‌नाग (b) धर्म कीर्ति
(c) गंगेश (d) ईश्वर कृष्ण
Ans. (a) : ‘प्रत्यक्षं कल्पनापाठेम नामजात्यादयसंयुक्तम्‌’ -दिङनाग। ‘प्रत्यक्षम्‌ कल्पनापोठम्‌ अभ्रान्रम’-धर्मकीर्ति ‘ज्ञानाकरण कम्‌ ज्ञानम्‌ प्रत्यक्षम्‌’- गंगेश ‘इन्द्रियार्धसन्निकषौत्पन्नम्‌ ज्ञानम्‌ अव्यपदेशम्‌ अन्यभिचारी व्यावसायत्मिकां प्रत्यक्षण’- गौतम ‘साक्षात प्रतीति: प्रत्यक्षम’- प्रभाकर। विशेषावधारण- प्रधान- प्रत्यक्षम्‌’- योग यह विभिन्न भारतीय दर्शनों में प्रत्यक्ष से सम्बन्धित दार्शनिकों की परिभाषा हैं।
(भारतीय दर्शन: डॉ. नन्द किशोर देवराज)
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18. नैयायिकों के द्वारा प्रत्यक्ष की निर्विकल्पक स्थिति की सिद्धि होती है:
(a) प्रत्यक्ष के द्वारा (b) अनुमान के द्वारा
(c) उपमान के द्वारा (d) शब्द के द्वारा
Ans. (b) : नैयायिक प्रत्यक्ष की दो अवस्थाओं को मानते हैनिर्वि कल्पक और सविकल्पक। अत: प्रत्यक्ष ज्ञान भी सविकल्पक होता है। परन्तु इससे पूर्व वह निर्विकल्पक अवस्था में होता है। यह ज्ञान की पूर्व अवस्था है। प्रत्यक्ष की निर्विकल्पक स्थिति का हम अनुमान करते है।
(भारतीय दर्शन: आलोचन और अनुशीलन- चन्द्रधर शर्मा)
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19. ‘याग न स्वर्गहेतु: क्रियत्वात’ उक्त अनुमान में किस प्रकार का हेत्वाभास है?
(a) बाधित (b) सत्‌प्रतिपक्ष
(c) विरुद्ध (d) सव्यभिचारी
Ans. (a) : बांधित हेत्वाभास में ‘हेतु’ अबाधित विषय नहीं होता। अर्थात्‌ इसमे हेतु द्वारा प्रतिपादित साध्य प्रत्यक्ष आदि प्रबलतर अनुमानेत्तर प्रमाणों द्वारा बाधित होता है। जैसे- ‘त्याग न स्वर्गहेतु:
क्रियात्वात्‌’।
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20. वैशेषिकों के अनुसार आत्मा तब ज्ञान का आधार नहीं हो सकती है‚ जब यह हो जाती है:
(a) ज्ञाता (b) ज्ञात
(c) बंधन में (d) मुक्त
Ans. (d) : न्याय- वैशेषिक में ज्ञान केा आत्मा का स्वरूप नहीं माना गया है‚ अत: मुक्तावस्था में ‘आत्मा’ ज्ञान रहित होती है।
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21. यह मन है जिसके द्वारा देखा और सुना जाता है निश्चय ही प्रत्येक वस्तु प्राप्त की जाती है या बुद्धि के प्रकाश से उसकी खोज होती है जैसे अंधकार में एक वस्तु दीप के प्रकाश में प्रकाशित होती है‚ यह विचार निम्नलिखित में से किसका है?
(a) गंगेश (b) शंकर
(c) वल्लभ (d) कपिल
Ans. (b) : शंकर के अनुसार यह ‘मन है जिसके द्वारा देखा और सुना जाता है- निश्चय ही प्रत्येक वस्तु प्राप्त की जाती है……….। यह कथन शंकर का मत है।
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22. निम्नलिखित में से कौन से पुरुषार्थ चार्वाक को स्वीकार्य है? नीचे दिए गए कूट का चयन कीजिए:
(a) अर्थ और काम (b) अर्थ‚ काम और धर्म
(c) मोक्ष और काम (d) काम और धर्म
Ans. (a) : चार्वाक दर्शन में ‘अर्थ और काम’ को ही पुरुषार्थ स्वीकार किया गया है। ‘धर्म और मोक्ष’ को यह अस्वीकार करता है। चार्वाक दर्शन ‘यावज्जीवेत सुख’ जीवते और ‘मृत्यु एवं अपवर्ग’ के दर्शन पर चलता है।
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23. निम्नलिखित में से क्या भगवद्‌गीता का उपदेश नहीं है?
(a) कर्मो के फल का त्याग
(b) प्राकृतिक और निर्धारित कर्त्तव्यों का पालन
(c) सुख में सुखी और दु:ख में दु:खी होने के भाव से ऊपर उठना
(d) सभी अहं प्रधान इच्छाओं का ईश्वर के प्रति समर्पण नहीं होना चाहिए।
Ans. (d) : भगवद्‌गीता में निष्काम कर्म और ईश्वर-भक्ति में समर्पण के सिद्धान्त का प्रतिपादन करता है। जिसके अनुसार-
(1) फलासक्ति रहित होकर प्राकृतिक और निर्धारित कर्त्तव्यों का पालन करना- निष्काम कर्म।
(2) सुख में सुखी और दु:ख में दु:खी होने के भाव से ऊपर उठनास्थितिप्रज्ञ् ा पुरुष
(3) सभी अहं प्रधान इच्छाओं का ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण। स्वयं श्रीकृष्ण अर्जुन को भगवद्‌गीता में उपदेश देते हैं।
(भारतीय दर्शन: चटर्जी एवं दत्त)
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24. निम्नलिखित में से कौन ‘ब्रह्मविहार’ के समूह से संबंधित नहीं है?
(a) मुदिता (b) करुणा
(c) एकाग्रता (d) मैत्री
Ans. (c) : ब्रहम विहार का समूह क्रमश: मैत्री‚ करुणा‚ मुदिता तथा उपेक्षा हैं। महायान सूत्रों में साधनामार्ग ध्यान चतुष्टय‚ समाधित्रय‚ पारमिताषट्टक‚ चार ब्रहम विहार और भूमिदशक के रूप में वर्णित है।
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25. जैन दर्शन के अनुसार निम्नलिखित में से कौन एक त्रि-रत्न नहीं है?
(a) सम्यक्‌ भावना (b) सम्यक्‌ चरित्र
(c) सम्यक्‌ दर्शन (d) सम्यक्‌ ज्ञान
Ans. (a) : जैन दर्शन में त्रिरत्नं सम्यक‚ चरित्र‚ सम्यक्‌ दर्शन‚ और सम्यक ज्ञान हैं।
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26. ‘शब्द नित्य शब्दत्वात्‌’ उक्त अनुमान में किस प्रकार का हेत्वाभास है?
(a) साधारण सव्यभिचार (b) अनूप संहारी
(c) सत्‌प्रतिपक्ष (d) असाधारण सव्यभिचार
Ans. (d) : ‘शब्द नित्य शब्दत्वात्‌’ अर्थात्‌ शब्द नित्य है‚ क्योंकि उसमें शब्दत्व है।’ में हेतु (शब्दत्व) का निजी गुण होने के कारण सजातीय दृष्टान्तों में अनुपस्थित है। अत: यहां असाधारण सत्यभिचार हेतु है। असाधारण सत्यभिचार हेत्वाभास में हेतु अत्यन्त संकीर्ण होता है। वह केवल पक्ष में होता है क्योंकि उसका निजी गुण है। वह विपक्ष एवं सपक्ष में नहीं रहता। वह सपक्षवृत्ति अर्थात्‌ हेतु को पक्ष के साथ सपक्ष में भी रहना चाहिए का उल्लंघन करता है।
(भारतीय दर्शन की समीक्षात्मक रूपरेखा: राममूर्ति पाठक)
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27. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित करते हुए समतुल्यता की खोज कीजिये और नीचे दिए गए कूटों का उपयोग करते हुए सही उत्तर का चयन कीजिए:
सूची-I सूची-II
A. [(p.q) ⊃ r] α i. [(p⊃q). (q⊃p)]
B. [p∨ (q.r)] α ii. ∼ p∨q
C. [p α q] α iii. [p⊃(q⊃r)]
D. [p ⊃ q] α iv. [(p∨q). (p∨r)]
कूट:
A B C D
(a) i iii iv ii
(b) ii iv iii i
(c) iv ii i ii
(d) iii iv i ii
Ans. (d) : A. [(p.q) ⊃ r] α iii. [p⊃(q⊃r)]
B. [p∨ (q.r)] α iv. [(p∨q). (p∨r)]
C. [p α q] α i. [(p⊃q). (q⊃p)]
D. [p ⊃ q] α ii. ∼ p∨q
(तर्कशास्त्र का परिचय: इरविंग एम. कोपी)
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28. तर्क वाक्यों के परंपरागत विरोध वर्ग के संबंध में सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूटों में से सही उत्तर का चयन कीजिए:
सूची-I सूची-II
A. यदि ‘I’ असत्य है i. E अनिश्चित है
B. यदि ‘O’ सत्य है ii. ‘I’ अनिश्चित है
C. यदि ‘I’ सत्य है iii. ‘O’ अनिश्चित है
D. यदि ‘A’ असत्य है iv. ‘A’ असत्य है
कूट:
A B C D
(a) iv i iii ii
(b) iii ii iv i
(c) ii iii i iv
(d) i iv ii iii
Ans. (a) : A. यदि ‘I’ असत्य है iv. ‘A’ असत्य है
B. यदि ‘O’ सत्य है i. ‘E’ अनिश्चित है
C. यदि ‘I’ सत्य है iii. ‘O’ अनिश्चित है
D. यदि ‘A’ असत्य है ii. ‘I’ अनिश्चित ह
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29. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूटों का उपयोग करते हुए सही उत्तर का चयन कीजिए:
सूची-I सूची-II
A. अच्छे प्रमाण के प्रभाव में i. पटिश्यो प्रिंसिपाई ऐसे निर्णय के लिए जन मानस को भावनात्मक अनुरोध करने से होने वाला दोष
B. यह तरीका हमेशा ही दोष- ii. इग्नोराटियो इलेन्ची पूर्ण नहीं होता क्योंकि इसमें अधिकारी की अपनी क्षेत्र क्षमता का महात्म्य होता है
C. तर्क वाक्य का सत्य iii. ऑर्म्यूमेंटम एंड पोपुलम स्थापित करने में ऐसे मान्य आधार वाक्य को प्रसारित करना जिसमें जो प्रश्न रूप तर्क वाक्य हो वहीं निगमनात्मक निर्णय के रूप में सामने आता है।
D. ऐसे विशेष निर्णय जिससे iv. ऑगर्यूमेंट्‌म एंड अन्य निर्णय को अभिप्रेत वेरेक्युन्डियम रूप से स्थापित किया जाए।
कूट:
A B C D
(a) i iii ii iv
(b) ii i iv iii
(c) iii iv i ii
(d) iv iii ii i
Ans. (c) : (a) अच्छो प्रमाण के अभाव में ऐसे निर्णय के लिए जनमानस को भावनात्मक अनुरोध करने से होने वाला दोष (iii) ‘लोकोत्तेजक युक्ति’ (Argumentum ad Populum) कहते है।
(b) यह तरीका हमेशा दोषपूर्ण नहीं होता क्योंकि इसमें अधिकारी की अपनी क्षेत्र क्षमता का महात्म्य होता है‚ यहाँ (iv) श्रद्धामूलक युक्ति
(Argumentum and Verecuncliam) है।
(c) तर्कवाक्य का सत्य स्थापित करने में ऐसे मान्य आधार वाक्य को प्रसारित करना जिसमें जो प्रश्न रूप तर्क वाक्य वही निगमनात्मक निर्णय के रूप में सामने आता है‚ ‘चक्रक दोष’ (Petitio Principil) कहलाता है।
(d) ऐसे विशेष निर्णय जिससे अन्य निर्णय को अभिप्रेत रुप से स्थापित किया जाए- ‘अर्थान्तर सिद्धि’ (Ignaratio Elenchi or Irrelevant Conelusion) कहते हैं।
(तर्कशास्त्र का परिचय इरविंग एम. कोपी)
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30. यूनिवर्सल और एग़्जिस्टेंशल क्वांटिफिकेशन को सूची-
I एवं सूची-II के माध्यम से सुमेलित करते हुए नीचे दिए गए कूटों का प्रयोग करते हुए सही उत्तर का चयन कीजिए:
सूची-I सूची-II
A. [(x)  x] i. α [∼ (x)  x]
B. [(∃x)  x] ii. α [∼ (∃x)  x]
C. [(x) ∼  x] iii. α [∼ (x) ∼  x]
D. [(∃x) ∼  x] iv. α [∼ (∃x) ∼  x]
कूट:
A B C D
(a) i ii iii iv
(b) iv iii ii i
(c) ii iv i iii
(d) iii i iv ii
Ans. (b)
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31. निम्नलिखित में से‚ ‘न ही फिलमोर ना ही हार्डिंग महान प्रेसिटेंड हुए’‚ की कौन सी सही प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है?
(a) (∼F). (∼ H) (b) (∼ F ∨ ∼ H)
(c) F ∨ H (d) ∼ (F.H)
Ans. (a) : ‘न ही फिलमोर ना ही हार्डिंग महान प्रेसिडेंट हुए’ वाक्य एक संयुक्त तर्कवाक्य है‚ जो ‘संयोजन’ के माध्यम से इस प्रकार जुड़ा है ‘वह ही फिलमोर महान प्रेसिडेंट थे और नही हार्डिंग महान प्रेसिडनृ थे यथा‚ (∼F). (∼ H) इसका प्रतीकात्मक रूप है।
(तर्कशास्त्र का परिचय: इरविंग एम. कोपी)
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32. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूटों का उपयोग करते हुए सही उत्तर का चयन कीजिए:
सूची-I सूची-II
(आबवटेंन्ड) (आबवर्स)
A. कुछ ‘एस’‚ ‘पी’ नहीं है। i. कुछ ‘एस’ ‘नॉन-पी’ नहीं है।
B. कोई ‘एस’‚ ‘पी’ नहीं है। ii. कोई भी ‘एस’ ‘नॉन-पी’ है।
C. कुछ ‘एस’‚‘पी’ हैं। iii. कुछ ‘एस’‚ ‘नॉन-पी’ हैं।
D. सभी ‘एस’‚ ‘पी’ हैं। iv. सभी ‘एस’ ‘नॉन-पी’ हैं।
कूट:
A B C D
(a) i iv ii iii
(b) ii iii iv i
(c) iv i ii iii
(d) iii iv i ii
Ans. (d) : A. कुछ ‘एस’‚ ‘पी’ नहीं है। iii. कुछ ‘एस’‚ ‘नॉन-पी’ हैं।
B. कोई ‘एस’‚ ‘पी’ नहीं है। iv. सभी ‘एस’ ‘नॉन-पी’ हैं।
C. कुछ ‘एस’‚‘पी’ हैं। i. कुछ ‘एस’ ‘नॉन-पी’ नहीं है।
D. सभी ‘एस’‚ ‘पी’ हैं। ii. कोई भी ‘एस’ ‘नॉनपी’ है।
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33. अभिकथन (A) और तर्क (R) पर विचार करते हुए सही
कूट का चयन कीजिए:
अभिकथन (A): ‘निष्कर्ष में व्याप्त पदों की संख्या का अंक आधार-वाक्यों में उपलब्ध व्याप्त पदों से एक कम होना चाहिए।’
तर्क (R): हेतु-पद निष्कर्ष में लुप्त रहता है।
कूट:
(a) (A) और (R) दोनों सत्य है और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सत्य है‚ लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) असत्य है और (R) सत्य है।
(d) (A) और (R) दोनों असत्य हैं।
Ans. (a) : मानक निरपेक्ष न्याय वाक्य के छह: नियमों में एक यह भी है। जिसके अनुसार प्रत्येक आधार-वाक्यों में उपलब्ध व्याप्त पदों की संख्या से निष्कर्ष में व्याप्त पदों की संख्या एक कम होती है अर्थात्‌ ‘हेतु पद’ (Middle Term) जो कि किसी एक आधारवाक्य में व्याप्त होना ही चाहिए‚ निष्कर्ष में लुप्त होता है। अत: (A) और
(R) सत्य है और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(Introduction to lagic- I. M- Copi)
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34. अभिकथन (A) और तर्क (R) पर विचार करते हुए सही
कूट का चयन कीजिए:
अभिकथन (A): यदि आधार वाक्य विशेष है‚ तो निष्कर्ष भी विशेष होगा।
तर्क (R): (i) साकारात्मक विशेष तर्कवाक्य में कोई पद व्याप्त नहीं होता है।
(ii) दोनों आधार-वाक्य विशेष नहीं हो सकते‚ इसलिए दोनों आधार वाक्यों में मात्र भेद होना चाहिए।
कूट:
(a) (A) और (R) दोनों सत्य हैं और (R) (i), (ii), (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सत्य हैं‚ पर (R) (i), (A) की सही व्याख्या है।
(c) (A) और (R) दोनों सत्य हैं‚ पर (R) (ii), (A) की सही व्याख्या है।
(d) (A) सत्य है‚ पर (R) (i), (ii) दोनों ही (A) की सही व्याख्या नहीं है।
Ans. (c) : मानक निरपेक्ष न्याय वाक्य के नियम-6 के अनुसार यदि निरूपाधिक न्यायवाक्य जो कि वैध हो निष्कर्ष विशिष्ट हो तो उसके दोनों आधार वाक्य सामान्य नहीं हो सकते है। अर्थात्‌ यदि एक आधारवाक्य विशेष है तो निष्कर्ष भी विशिष्ट होगा। हालांकि दोनों आधारवाक्य विशेष नहीं हो सकते हैं‚ इसलिए दोनों आधारवाक्य में ‘मात्रा’ में भी अन्तर होना चाहिए। ऐसा नहीं होने पर ‘सत्तात्मक दोष’ होता है। यद्यपि यह सत्य है कि सकारात्मक विशेष तर्कवाक्य में कोई पद व्याप्त नहीं होता और निषेधात्मक विशेष तर्कवाक्य में केवल एक पद व्याप्त होता है। परन्तु यह अभिकथन (A) की व्याख्या नहीं है। अत: केवल अभिकथन (A) की सही व्याख्या R
(ii) ही है।
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35. यदि भाषा की सत्य-परिभाषा उपलब्ध हो‚ तो वह सत्य के सिद्धान्त की पर्याप्त स्थिति हो जाती है; यह विचार निम्नलिखित में से किस सिद्धान्त द्वारा सम्प्रेषित होता है?
(a) सत्य का सहभागिता का सिद्धान्त
(b) सत्य का रिडन्डेन्स का सिद्धान्त
(c) सत्य का सिमेन्टिक सिद्धान्त
(d) सत्य का व्यवहारवादी सिद्धान्त
Ans. (c) : ‘सत्य का सिमेन्टिक सिद्धान्त’ भाषा की सत्ता-परिभाषा पर अधिक जोर देता है। यदि भाषा की सत्य- परिभाषा उपलब्ध हो तो वह सत्ता के सिद्धान्त की पर्याप्त स्थिति हो जाती है।
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36. निम्नलिखित में से कौन संशयवादी नहीं है?
(a) ह्यूम (b) पाईरो
(c) बेयल (d) देकार्त
Ans. (d) : पाईरो‚ ह्यूम और बेयल आदि संशयवादी दार्शनिक है। संशयवाद वह विचारधारा है जो कि किसी भी चीज को निश्चिततापूर्वक जानने से इन्कार करती है। वह सभी प्रकार के ‘ज्ञान’ के बारे में संशय करके उससे इन्कार करते हैं। संशय करना अलग बात है‚ क्योंकि देकार्त ने भी अपने बुद्धिवादी दर्शन की प्रतिष्ठा के लिए संशय किया किन्तु यहां ‘संशय’ साधन रूप था। परन्तु संशयवाद में ‘संशय’ साध्य की तरह इस्तेमाल होने लगता है। इसी अर्थ में पाइरो‚ ह्यूम और बेयल की केवल संशयवादी हैं।
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37. देकार्त के अनुसार निम्नलिखित में से सत्य का कौन सा मानदण्ड हैं?
(a) स्पष्टता एवं एकरूपता (b) स्पष्टता एवं सुभिन्नता
(c) स्पष्टता एवं सम्पूर्णता (d) स्पष्टता एवं अपरोक्षता
Ans. (b) : देकार्त अपने बुद्धिवादी दर्शन के आलोक में सत्यता के मानदण्ड के रूप में स्पष्टता एवं सुभिन्नता को मानता है। यह प्रामाणिक ज्ञान की कसौटी है। देकार्त ने ‘स्पष्टता’ पद का प्रयोग ‘साक्षात्‌ रूप में अनुभव किये जाने के अर्थ में’ और विवेकपूर्ण या सुभिन्नता (Distinct) शब्द का प्रयोग जो स्वत: जाना जा सके के अर्थ में किया है।
(पाश्चात्य दर्शन का उदभव और विकास: हरिशंकर उपाध्याय)
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38. लाइब्नित्ज के संदर्भ में‚ निम्नलिखित युग्मों में से कौन सा सही है?
(a) बुद्धि के सत्य- अनिवार्यत: सत्य
(b) तथ्य के सत्य- पर्याप्त कारणता के नियम पर आधारित
(c) बुद्धि के सत्य- विरोध के नियम का आधारित
(d) तथ्य के सत्य- विरोधता के बिना जिसका निषेध न हो सके
Ans. (d) : लाइबनित्ज के अनुसार ‘तथ्य के सत्य’ विरोधता के बिना निषेध नहीं हो सकता है। लाइबनित्ज के अनुसार सभी अस्तित्ववादी वाक्य (सत्तामूलक कथन) ‘तथ्य के सत्य’ है न की बुद्धि के सत्य। इस सरल सिद्धान्त कई महत्वपूर्ण परिणाम हुए।
(पाश्चात्य दर्शन का उद्‌भव और विकास: हरिशंकर उपाध्याय)
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39. प्रत्यय दो प्रकार के हैं‚ ’इन्द्रियों पर अंकित और कल्पना एवं स्मृतिजन्य;’ यह विचार निम्नलिखित में से किसका है?
(a) लॉक (b) बर्कले
(c) ह्यूम (d) लाइब्नित़्ज
Ans. (b) : वर्कले के अनुसार प्रत्यय दो प्रकार के होते है ‘इन्द्रियों पर अंकित और कल्पना एवं स्मृति के द्वारा निर्मित। बर्कले अपने दर्शन में प्रत्ययों को ही ज्ञान का विषय मानता है। जो या तो हमारी आत्मा द्वारा उत्पन्न किये गये है या ईश्वर द्वारा सृजित किये गये है।
(History of Philosophy- Frank Thilly)
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40. लॉक के ज्ञान के सिद्धान्त के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार करते हुए सही कूट का चयन करें:
(i) प्रत्ययों को समझने की शक्ति पर ज्ञान आश्रित है।
(ii) ज्ञान तार्किक नहीं होता।
(iii) ज्ञान का अर्थ प्रत्ययों में सहमति एवं असहमति को देखना है।
कूट:
(a) केवल (i) कथन सत्य है।
(b) केवल (ii) कथन सत्य है।
(c) केवल (i) और (iii) कथन सत्य हैं।
(d) केवल (i) और (ii) कथन सत्य हैं।
Ans. (c) : प्रत्ययों की समझने के मानसिक शक्ति पर ज्ञान आश्रित है और (iii) ज्ञान का अर्थ प्रत्ययों में सहमति एवं असहमति है को देखना है लॉक के ज्ञान सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक प्रत्यय की अनुरूप बाह्य जगत में कोई न कोई वस्तु अवश्य होनी चाहिए अन्यथा वह ‘ज्ञान’ नहीं हो सकता है। इसे प्रत्यय प्रतिनिधित्ववाद कहते है।
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41. भगवद्‌गीता के ‘स्थितप्रज्ञ’ के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन एक सही नहीं है?
(a) स्थितप्रज्ञ अपनी समस्त मनोकांक्षाओं का त्याग कर देता है।
(b) स्थितप्रज्ञ के मन में उद्‌वेग नहीं होता है।
(c) स्थितप्रज्ञ सुखों की प्राप्ति से सर्वथा नि:स्पृह है।
(d) स्थितप्रज्ञ हमेशा दूसरों का अच्छा करने के लिए सोचता है।
Ans. (d) : ‘स्थित प्रज्ञ’ ‘सुखे-दु:खे समेकृत्वा‚ लाभालाभौ जयाजयों तथा वह कभी यह सोचकर कर्म नहीं करता कि अच्छा करना है ‘स्थितप्रज्ञ’ तो स्वत: स्फूर्त रूप से जो भी कर्म करता है वह शुभ ही होता है। वह संसार के ‘लोक संग्रहार्थ’ कार्य करता रहता है‚ निष्काम भाव से। (भगवद्‌गीता- गीता प्रेस)
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42. नीचे दो कथन दिये गये हैं जिसमें से एक को
अभिकथन (A) और दूसरे को तर्क (R) की संज्ञा दी गई है। (A) और (R) पर विचार करते हुए सही कूट का चयन कीजिये:
अभिकथन (A): कांट का निरपेक्ष आदेश का नैतिक सिद्धान्त आकारित और कठोरतावदी है।
तर्क (R): यह भावनाओं की उपेक्षा करता है।
कूट:
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही है‚ परन्तु (R) गलत है।
(d) (A) गलत है‚ परन्तु (R) सही है।
Ans. (a) : काण्ट के नैतिकता के क्षेत्र में दिये गये ‘निरपेक्ष आदेश’ के सन्दर्भ में यह कहा जाता है कि यह मानवीय भावनाओ की उपेक्षा करते हुए केवल कर्त्तव्य को महत्व देता है। इसी अर्थ में इसे कठोरतावादी (Fegasistic) और आकारिक (Formal) कहा जाता है।
(नीतिशास्त्र का सर्वेक्षण: संगम लाल पाण्डेय)
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43. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिये और निम्नलिखित में से सही कूट का चयन कीजिये:
सूची-I सूची-II
(लेखक) (रचनाएँ)
A. जी.ई.मूर i. फ्रीडम एण्ड री़जन
B. आर.एम. हेयर ii. इथिक्स
C. टी.एच.ग्रीन iii. द लॉजिक ऑफ मोरल डिस्कोर्स
D. पॉल एडवर्ड iv. प्रोलिगोमिन टू इथिक्स
कूट:
A B C D
(a) iv i ii iii
(b) i iii iv ii
(c) ii i iv iii
(d) i ii iii iv
Ans. (c) : A. जी.ई.मूर ii. इथिक्स
B. आर.एम. हेयर i. फ्रीडम एण्ड री़जन
C. टी.एच.ग्रीन iv. प्रोलिगोमिन टू इथिक्स
D. पॉल एडवर्ड iii. द लॉजिक ऑफ मोरल डिस्कोर्स
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44. मिल के उत्कृष्ट परार्थवादी सुखवाद में निम्नलिखित में से कौन सा दोष है?
(a) अनियमित मुख्य पद दोष
(b) अनियमित अमुख्य पद दोष
(c) अव्याप्त मध्यम पद
(d) आलंकारिक भाषा दोष
Ans. (d) : मिल के उत्कृष्ट परार्थवादी सुखवाद में‚ उपयोगितावाद में अथवा सुखवाद में ‘अलंकारिक भाषा दोष’ है। मिल अपने उपयोगितावाद में अलंकारिक वाक्यों का प्रयोग करते हैं।
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45. दंड के निरोधात्मक सिद्धान्त का उद्देश्य है
(a) किये गये अपराध के प्रति बदला लेना
(b) भविष्य में अपराध को रोकना
(c) अपराधी का सुधार
(d) वैयक्तिक स्वतंत्रता को पुष्ट करना
Ans. (d) : दण्ड के निरोधात्मक सिद्धान्त का उद्देश्य भविष्य में अपराध को रोकना है। ध्यातव्य हो कि दण्ड के तीन सिद्धान्त (1) प्रतिरोधात्मक या निरोधात्मक (2) प्रतिकारात्मक तथा (30) सुधारात्मक सिद्धान्त हैं।
(नीतिशास्त्र: सिद्धान्त और व्यवहार- प्रो. नित्यानन्द मिश्र)
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46. ‘यह अच्छा है’ इस कथन की व्याख्या नियामक नीतिशास्त्री किस प्रकार करेगा?
(a) ‘यह’ जीवन का लक्ष्य है।
(b) ‘यह’ सामान्यतया लोगों द्वारा अनुमोदित है।
(c) मैं ‘यह’ का अनुमोदन करता हूँ।
(d) ‘यह’ करो।
Ans. (d) : नियामक नीतिशास्त्री ‘यह अच्छा है’ को ‘यह करो’ के अर्थ में व्याख्यायित करे। नियामक नीतिशास्त्री प्राय: ‘यह करो’ या ‘उसे न करो’ का विधान करता है।
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47. अधोलिखित में से कौन सुखवाद की मूलभूत विशेषता को स्पष्ट करता है?
(a) ईमानदारी स्वयं में अच्छी है।
(b) ईमानदारी अच्छी है क्योंकि यह सुख में वृद्धि करती है।
(c) ईमानदारी अच्छी है क्योंकि यह मनुष्य की प्राकृतिक क्षमता है।
(d) ईमानदारी अच्छी है क्योंकि यह मनुष्य और पशु में भेद करती है।
Ans. (b) : सुखवाद की मूलभूत विशेषता है कि वह कार्य जो हमारे ‘सुख’ में वृद्धि करता हो वह शुभ या अच्छा होता है। इसी प्रकार ईमारदारी अच्छी है क्योंकि यह सुख में वृद्धि दार्शनिकों के मत अलग-अलग है परन्तु सभी ने ‘सुख’ को मापदण्ड माना है।
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48. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिये और नीचे दिये गये कूट से सही उत्तर चुनिये:
सूची-I सूची-II
(चिंतक) (चिंतन)
A. कांट i. मूलभूत कर्त्तव्य
B. हीगेल ii. मेरा स्थान एवं तदनु सार कर्त्तव्य
C. ब्रेडले iii. मनुष्य बनो
D. रॉस iv. साध्यों के लिए राज्य के सदस्य की तरह कार्य करो
कूट:
A B C D
(a) i ii iii iv
(b) iv iii ii i
(c) ii iii i iv
(d) iii i iv ii
Ans. (b) : (a) ‘काण्ट (iv) साध्यों के लिए राज्य के सदस्य की तरह कार्य करो।’
(b) हीगेल (iii) ‘मनुष्य बनो’
(c) ब्रेडले ‘ (ii) मेरा स्थान एवं तदनुसार कर्त्तव्य’
(d) रॉस (i) मूलभूत कर्त्तव्य
(नीतिशास्त्र: सिद्धान्त और व्यवहार- प्रो.नित्यानन्द मिश्र)
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49. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिये और नीचे दिये गये कूट से सही उत्तर चुनिये:
सूची-I सूची-II
(सिद्धान्त) (चिंतक)
A. परामर्शवाद i. रुडोल्फ कार्नेप
B. वर्णनसिद्धान्त ii. बटलर
C. निप्रकृतिवाद iii. आर.एम. हेअर
D. संवेगवाद iv. पी.टी. गीच
कूट:
A B C D
(a) iii iv ii i
(b) i ii iv iii
(c) ii i iii iv
(d) iv ii i iii
Ans. (a) : (a) परामर्शवाद (iii) आर.एम. हेअर
(b) वर्णन सिद्धान्त (iv) पी.टी. गीच
(c) निप्रकृतिवाद (ii) बटलर
(d) संवेगवाद (i) रुडोल्ड कार्नेप
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50. मूर के अनुसार ‘शुभ’ अपरिभाष्य है क्योंकि
(a) इसमें अगणित गुण हैं।
(b) यह एक सरल पद है।
(c) यह एक अतीन्द्रिय वस्तु है।
(d) यह एक निरर्थक पद है।
Ans. (b) : मूर ‘शुभ’ को ‘अपरिभाष्य’ कहते है। उनके अनुसार इससे ‘सरल’ कुछ हो ही नहीं सकता। वह ‘शुभ’ को एक ‘सरल पद’ कहते है। और ‘सरल पद’ वह होते है जिसका और अधिक विश्लेषण न किया जा सके। जिनकी परिभाषा नहीं दी जा सकती है।
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51. निम्नलिखित वेदान्तियों में से कौन सा युग्म जीवनमुक्ति के सिद्धान्त को न्यायोचित नहीं मानता?
(a) शंकर और रामानुज (b) रामानुज और मध्व
(c) शंकर और मध्व (d) वाचस्पति और प्रकाशात्मन
Ans. (b) : रामानुज जीवन मुक्ति नहीं मानते क्योंकि जब तक शरीर है तब तक कर्मो का आत्यन्तिक क्षय नहीं हो सकता और मध्व विदेहमुक्ति को मानते है जो देह पात्र के अनन्तर सम्भव है‚ वह जीवन्मुक्ति का निषेध करते हैं।
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52. निम्नलिखित में से किस पूर्वमीमांसक का यह विचार है कि धर्म केवल साध्य मूल्य है साधन मूल्य नहीं?
(a) कुमारिल (b) प्रभाकर
(c) शबर (d) मुरारि मिश्र
Ans. (b) : प्रभाकर ‘धर्म’ को साध्य मूल्य मानते हैं‚ साधन को मूल्य नहीं। पूर्वमीमांसा का मुख्य प्रतिपाद्य विषय धर्म के स्वरूप की व्याख्या एवं परीक्षा करना है। वेद नित्य ज्ञान के भण्डार है‚ साथ ही साथ वे शाश्वत विधिवाक्यों और नियमों के आगार भी है‚ जिसके अनुसार आचरण करना धर्म है।
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53. पतञ्जलि के ‘योगदर्शन’ के संदर्भ में सही अनुक्रम का चयन कीजिए:
(a) नियम‚ यम‚ प्राणायाम‚ आसन‚ प्रत्याहार
(b) यम‚ नियम‚ प्राणायाम‚ आसन‚ प्रत्याहार
(c) यम‚ नियम‚ आसन‚ प्राणायाम‚ प्रत्याहार
(d) आसन‚ प्राणायाम‚ प्रत्याहार‚ यम‚ नियम
Ans. (c) : योगदर्शन भी बन्धन का मूल कारण अविवेक को मानता है। चित्तवृत्तियों के विरोध से ही मोक्ष प्राप्त हो सकता है। उसके लिए साधना-पाद में अष्टांग मार्ग बतलाये गये है जो क्रमानुसारयम‚ नियम‚ आसन‚ प्राणायाम‚ प्रत्याहार‚ धारणा‚ ध्यान‚ समाधि है। प्रथम पांच को बहिरंग तथा शेष तीन को अन्तरंग साधन कहा गया है।
(दर्शन पुंज: विनोद तिवारी)
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54. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिये और नीचे दिये गये कूट से सही उत्तर का चयन कीजिये:
सूची-I सूची-II
A. यदृच्छावाद i. वेदान्ती
B. प्रतीत्य सममुत्पाद ii. चार्वाक
C. ईश्वरवाद iii. बौद्ध
D. परमाणुवाद iv. जैन
कूट:
A B C D
(a) iii iv ii i
(b) ii iii i iv
(c) iii ii iv i
(d) iv ii iii i
Ans. (b) : (a) यदृच्छावाद (ii) चार्वाक
(b) प्रतीत्य सममुत्पाद (iii) बौद्ध
(c) ईश्वरवाद (i) वेदान्ती
(d) परमाणुवाद (iv) जैन
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55. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिये और नीचे दिये गये कूट से सही उत्तर चुनिये:
सूची-I सूची-II
A. चार्वाक i. केवल प्रत्यक्ष‚ अनुमान‚ उपमान शब्द
B. बौद्ध ii. केवल प्रत्यक्ष
C. सांख्य iii. केवल प्रत्यक्ष और अनुमान
D. न्याय iv. केवल प्रत्यक्ष‚ अनुमान‚ शब्द
कूट:
A B C D
(a) ii iii iv i
(b) iii ii i iv
(c) i iii ii iv
(d) iv ii iii i
Ans. (a) : चार्वाक दर्शन में केवल प्रत्यक्ष‚ बौद्ध दर्शन में प्रत्यक्ष‚ अनुमान‚ सांख्य दर्शन में प्रत्यक्ष‚ अनुमान शब्द तथा न्याय दर्शन में प्रत्यक्ष‚ अनुमान‚ उपमान‚ शब्द प्रमाण को माना जाता है।
(भारतीय दर्शन- डॉ नन्द किशोर देवराज)
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56. निम्नलिखित में से कौन भारतीय दार्शनिक ‘धर्मभूत’ ज्ञान और ‘धर्मीभूतज्ञान’ में अन्तर बताता है?
(a) वसुबन्धु (b) मध्व
(c) रामानुज (d) वल्लभ
Ans. (c) : रामानुज के दर्शन में ‘धर्मभूत’ और ‘धर्मीभूत ज्ञान’ का अन्तर किया गया है। ‘धर्मभूत ज्ञान’ विशेषणात्मक ज्ञान है। यह ज्ञाता का विशेषण है। यह जीव या ईश्वर को प्राप्त होता है। यह धर्म के रूप में आत्मा पर आश्रित है इसीलिए यह धर्मभूत ज्ञान है। ज्ञान द्रव्य एवं धर्म दोनों है। जीव और ईश्वर धर्मिभूत ज्ञान है। धर्मिभूत ज्ञान से धर्मभूत ज्ञान निकलता है।
(भारतीय दर्शन की समीक्षात्मक रूपरेखा: राममूर्ति पाठक)
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57. निम्नलिखित में से भेदाभेद का सिद्धान्त किसका है?
(a) चित्‌सुख (b) कुन्दकुन्द
(c) जैमिनी (d) निम्बार्क
Ans. (d) : निम्बार्क भेदाभेदवादी या द्वैतवादी थे। इसके अतिरिक्त औडुलोमि‚ आश्मरथा‚ यादवप्रकाश‚ भर्तप्रपंच‚ भास्कराचार्य आदि अन्य भेदा भेदवादी परम्परा के दार्शनिक माने जाते हैं।
(भारतीय दर्शन का सर्वेक्षण: संगम लाल पाण्डेय)
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58. निम्नलिखित में से कौन दार्शनिक अविकृत परिणामवाद का समर्थन करता है?
(a) निम्बार्क (b) शंकर
(c) वल्लभ (d) मध्व
Ans. (c) : शुद्धाद्वैतवाद के प्रतिपादक बल्लभाचार्य कारण और कार्य में शुद्ध अद्वैत या अभेद मानते हैं। ब्रह्मम जगत में परिणत होने पर भी आवेकृत रहता है। यह ब्रह्म का अविकृत परिणामवाद है।
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59. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिये और नीचे दिये गये कूट से सही उत्तर का चयन कीजिये:
सूची-I सूची-II
A. तालमुड i. जोरोस्ट्रियनिज्म
B. त्रिपिटक ii. सिक्ख
C. ग्रंथ साहेब iii. जुड़ाइज़्म
D. जेन्दा अवस्था iv. बौद्ध
कूट:
A B C D
(a) iii iv ii i
(b) iv iii i ii
(c) ii i iv iii
(d) i ii iii iv
Ans. (a) : (a) तालगुड (iii) जुडाइज्म
(b) त्रिपिटक (iv) बौद्ध
(c) ग्रंथ साहेब (ii) सिक्ख
(d) जेन्दा अवेस्ता (i) जोरोस्ट्रियनिज़्म
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60. निम्नलिखित में से किस धर्म में अग्निपूजा की जाती है?
(a) जुडेइज़्म (b) इसाई
(c) इस्लाम (d) जोरस्ट्रियनिज्म
Ans. (d) : जोरस्ट्रियनिज्म ‘धर्म’ में अग्नि की पूजा की जाती है। इसमें ‘अहरमज्दा’ को कल्याण का देवता माना जाता है तथा ‘अहिरमन’ को बुराई का देवता।
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61. अभिकथन (A) और तर्क (R) पर विचार कीजिए और निम्नलिखित में से सही कूट का चयन कीजिये:
अभिकथन (A) : गांधी सत्याग्रह को ब्रिटिश साम्राज्य से युद्ध का हथियार मानते हैं।
तर्क (R): वह अंग्रेजी शासकों से भयभीत थे।
कूट:
(a) (A) और (R) दोनों सही है और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सही है‚ परन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही है‚ परन्तु (R) गलत है।
(d) (A) गलत है‚ परंतु (R) सही है।
Ans. (c) : गांधी जी ‘संत्याग्रह’ को एक हथियार के रूप में प्रयुक्त करते हैं। उन्होंने इसका प्रयोग ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ आजादी की लड़ाई में किया। इसका मतलब ये नहीं वह अंग्रेजी शासकों से भयभीत थे। गांधी के द्वारा प्रतिपादित सत्याग्रह के सिद्धान्त में सत्याग्रही होने का अर्थ है पूर्णतया निर्भय होना‚ ईमानदार एवं निष्ठावान होना है।
(समकालीन भारतीय दर्शन- बसन्त कुमार लाल)
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62. पर्यावरण नारीवाद के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
(a) यह संस्कृति को नारी कि रूप में और प्रकृति को पुरुष के रूप में पहचान देते हुए ध्Eिायों के वर्चस्व को प्रश्न करता है।
(b) यह संस्कृति को पुरुष के रूप में और प्रकृति को नारी के रूप में पहचान देते हुए पुरुष के वर्चस्व को प्रश्न करता है।
(c) यह संस्कृति को पुरुष के रूप में और प्रकृति को नारी के रूप में पहचान देते हुए नारी के वर्चस्व को प्रश्न करता है।
(d) यह संस्कृति को नारी के रूप में और प्रकृति को पुरुष के रूप में पहचान देते हुए पुरुष के वर्चस्व को प्रश्न करता है।
Ans. (b) : पर्यावरण नारीवाद में संस्कृति को पुरुष के रूप में और प्रकृति को नारी के रूप में पहचान देते हुए पुरुष के वर्चस्व को प्रश्न करता है।
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63. निम्नलिखित में से किस दार्शनिक का यह विचार है कि ‘‘प्राकृतिक अधिकार’’ ऐसा पुत्र है जिसका कोई पिता नहीं है?
(a) एडमर्ड बर्क (b) बेंथम
(c) नीत्शे (d) मैक इनटायर
Ans. (b) : बेंथम के अनुसार‚ प्राकृतिक अधिकार ऐसा पुत्र है जिसका कोई पिता नहीं है। लॉक ने भी अपने दर्शन में प्राकृतिक अधिकारों की बात कही है।
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64. गांधीवादी नीतिशास्त्र के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सही नहीं है?
(a) सत्य साध्य के रूप में
(b) अहिंसा साधन के रूप में
(c) साध्य और साधन दोनों का उचित होना चाहिये।
(d) एक उचित साध्य अनुचित साधन केा औचित्य प्रदान करता है।
Ans. (d) : गांधी जी के दर्शन में साध्य-साधन की स्वरूप पर भी विचार किया गया। गांधी जी के अनुसार ‘साध्य’ की पवित्रता जितनी जरूरी है उतनी ही साधन की पवित्रता है। गांधीवादी नीतिशास्त्र में सत्य को सवोच्च साध्य माना गया है। अहिंसा को साधन रूप में माना गया है। गांधी जी के अनुसार एक उचित साध्य साधन के औचित्य का निर्धारण नहीं कर सकता है बशर्ते एक उचित साधन यह सुनिश्चित करता है कि साध्य उचित होगा।
(समकालीन भारतीय दर्शन: बसन्त कुमार लाल)
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65. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिये और और नीचे दिये गये कूट से सही का उत्तर का चयन कीजिये:
सूची-I सूची-II
(लेखक) (गं्रथ)
A. देसाई महादेव i. रिलिजन एंड सोसाइटी
B. गांधी ii. द स्टोरी ऑफ बारदोली
C. राधाकृष्णन iii. ह्वाई सोशलिज़्म
D. नारायण जय प्रकाश iv. द ह्वील ऑफ फॉर्च्यून
कूट:
A B C D
(a) i ii iii iv
(b) ii iv iii i
(c) ii iv i iii
(d) iii ii iv i
Ans. (c) : (a) देसाई महादेव (ii) द स्टोरी ऑफ बारदोली
(b) गांधी (iv) द ह्वील ऑफ फॉर्च्यून
(c) राधाकृष्णन (i) रिलिजन एण्ड सोसाइटी
(d) नारायण जय प्रकाश (iii) ह्वाई सोसलिज्म
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66. ऑस्टिन के अनुसार यह किस वाक्‌ क्रिया का उदाहरण है? ‘मैं तुम्हें मार दूँगा’?
(a) वचन-कर्म (b) वचनेत्तर कर्म
(c) प्रभावी वचन कर्म (d) अवचन कर्म
Ans. (b) : ‘‘मै तुम्हे मार दूँगा’’ में वचनेन्तर कर्म
(ILLOCUTIONARY) का उदाहरण है। जे. एल. ऑस्टिन वाक्‌ क्रिया का विभाजन तीन रूपों में किया है। (1) वचन कर्म
(Locutionary) (2) वचनेत्तर कर्म (Illocutionary) और (3) प्रभावी वचन कर्म (Perlocutioary) जिन वाक्यों का प्रयोग एक निश्चित उद्देश्य के लिए किया जाता है उन्हे वचनेत्तर कर्म कहते है। वादा करना‚ प्रश्न पूछाना‚ चेतावनी देना‚ उत्तर देना आदि वचनेत्तर कर्म है।
(दर्शन पुंज: एक गहन दृष्टि-विनोद तिवारी)
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67. निम्नलिखित में से कौन एक सूची ऑस्टिन के क्रिया और उसके वचनेतर शक्ति में भेद को स्पष्ट करती है?
(a) वर्डिक्टिव्स‚ एक्सरसिटिव्स‚ कामिसिव्स‚ बिहैविटिव्स और एक्सपोजेटिव्स
(b) वर्डिक्टिव्स‚ एक्सरसिटिव्स‚ कमिसिव्स‚ सिन्टैक्टिकल और एक्सपोजेटिव्स
(c) वर्डिक्टिव्स‚ एक्सरसिटिव्स‚ कमिसिव्स‚ सिमैन्टिकल और बिहैविटिव्स
(d) वर्डिक्टिव्स‚ एक्सरसिटिव्स‚ सिमैन्टिकल‚ सिन्टैक्टिकल और कमीशिव्स
Ans. (a) : ऑस्टिन के क्रिया और वचनेत्तर शक्ति में भेद को स्पष्ट करती है- क्रमश: वर्डिक्टिव्स‚ एक्सरसिटिव्य‚ कमिसिव्स‚ बिहैविटिव्स और एक्सपोजेटिव्स। यह वचन कर्म शक्ति
(Illocutionary Force) की पहचान पांच क्रिया रूपों के द्वारा है।
(समकालीन पाश्चात्य दर्शन: बसन्त कुमार लाल)
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68. ‘‘होने का तात्पर्य एक चर का मूल्य होना है‚’’ यह विचार है
(a) क्वाइन का (b) फ्रेगे का
(c) रसल का (d) स्ट्रॉसन का
Ans. (a) : ‘होने का तात्पर्य एक चर के मूल्य का होना है’-
क्वाइन। क्वाइन के अनुसार किसी गुण या विधेय के होने से हम उसके निर्देश या सामान्य तक नहीं पहुँच सकते। किसी पदार्थ के प्रति सत्तात्मक प्रतिबद्धता के लिए प्रतिबद्ध चरों का प्रयोग होना नितान्त आवश्यक है। अर्थात्‌ किसी वस्तु या इकाई के अस्तित्व के लिए यह आवश्यक है कि वह किसी प्रतिबद्ध चर का मूल्य हो।
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69. रसल के अनुसार निम्नलिखित में से कौन अनिश्चित विवरण के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता?
(a) अयोध्या का वर्तमान राजा
(b) भारत का वर्तमान राष्ट्रपति
(c) भारतीय रिजर्व बैंक का वर्तमान गवर्नर
(d) भारत का वर्तमान प्रधानमंत्री
Ans. (a) : महावाक्य ‘तत्वमसि’ छांदोग्य उपनिषद से उद्‌धृत है। ‘सत्यं ज्ञानमनन्तरम्‌ ब्रह्म’ महावाक्य तैतिरीय उपनिषद में‚ वृहदारण्यक उपनिषद में ‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’ उद्‌धृत है।
(भारतीय दर्शन आलोचन और अनुशीलन: चन्द्रधर शर्मा)
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70. किसी शब्द का कोई मानक अर्थ नहीं है‚ इसके जितने प्रयोग हैं‚ उतने अर्थ हैं और ये अनगिनत हैं यह विचार है
(a) रसल का (b) फ्रेगे का
(c) विट्‌गेन्स्टाइन का (d) डमेट का
Ans. (c) : विट्‌गेन्सटाईन के अनुसार अर्थ को नहीं प्रयोग को देखो अर्थात्‌ किसी शब्द का कोई मानक अर्थ नहीं है‚ इसके जितने प्रयोग है‚ उतने अर्थ है और अनगिनत है। इसी अर्थ में विट्‌गेन्सटाईन भाग का उपयोग सिद्धान्त देता है।
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71. ‘मृत्यु हमारी सारी संभावनाओं का अंत है।’ यह कथन है
(a) हाइडेगर का (b) हुसर्ल का
(c) सार्त्र का (d) जॉस्पर्स का
Ans. (c) : सार्त्र के अनुसार ‘मृत्यु हमारी सारी संभावनाओ का अन्त है’। मनुष्य जब तक जीता है संभावनाओं के साथ-साथ। यह संसार चेतन आत्मा के लिए संभावनाओं का जगत है। वह यहां विभिन्न प्रकार से अपनी प्रतिभा को निखारता है।
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72. अधोलिखित में से किसके अनुसार ‘सार को वैसा ही देखा जा सकता है जैसा ध्वनि को सुना जा सकता है’?
(a) हाइडेगर (b) मॉर्सेल
(c) हुसर्ल (d) सार्त्र
Ans. (c) : हुसर्ल के अनुसार ‘सार को वैसा ही देखा जा सकता है जैसा ध्वनि को सुना जा सकता है।’ हुसर्ल चेतना के दार्शनिक विश्लेषण के आधार पर ऐसे स्वत: सिद्ध वस्तुनिष्ठ सारभाव को ढूढ़ लेना चाहते है जो ज्ञान-विज्ञान का आधार हो।
(समकालीन पाश्चात्य दर्शन: बसन्त कुमार लाल)
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73. निम्नलिखित में से कौन हुसर्ल के फेनोमेनॉलाजी का उद्देश्य नहीं है?
(a) ज्ञान और अनुभव के आधार की खोज
(b) उस संरचना का निरूपण करना जो तार्किक विचारों के सार की संरचना करते हैं।
(c) चेतन की अवस्था के संदर्भ में तटस्थता।
(d) प्रदत्त स्वीकृति पूर्वमान्यताओं की
Ans. (d) : हुसर्ल की फेनोमेनॉलॉजी का उद्देश्य- ज्ञान और अनुभव के आधार की खोज करना‚ उस संरचना का निरूपण करना जिसे तार्किक विचारों के सार की संरचना कहते हैं‚ चेतना की अवस्था के संदर्भ में तटस्थता तथा प्रदत्तता को उसकी पूर्वमान्यताओं से स्वतंत्र होकर उसके आद्य अर्थ में पकड़ना।
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74. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिये और नीचे दिये गये कूट से सही उत्तर का चयन कीजिये:
सूची-I सूची-II
A. स्लिअरमारकर i. फेनोमेलॉजिकल हमर्यूनीटिक्स
B. हाइडेगर ii. रेडिकल हर्म्यूनीटिक्स
C. डेरिडा iii. माक्रिसस्ट हर्म्यूनीटिक्स
D. फ्रेड्रिक जेम्सन iv. रोमॉन्टिक हर्म्यूनीटिक्स
कूट:
A B C D
(a) i ii iii iv
(b) iv i iii ii
(c) iv ii i iii
(d) iv i ii iii
Ans. (d) :
(a) स्लिअरमारकर (स्लायरमाखर) (iv) रोमॉन्टिक हर्म्यूनीटिक्स
(b) हाइडेगर (i) फेनोमेनालॉजिकल हर्म्यूनिटिक्स
(c) डेरिडा (ii) रेडिकल हर्म्यूनिटिक्स
(d) फ्रेड्रिक जेम्सन (iii) मार्क्िसस्‌ हर्म्यूनीटिक्स
(समसामायिक राजनीतिक सिद्धान्त: नरेश दधीचि)
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75. निम्नलिखित में से कौन दार्शनिक हर्म्यूनीटिक्स को ‘सत्तामूलक मोड़’ देता है?
(a) पॉल रिकर (b) डेरिडा
(c) हेबरमास (d) हाइडेगर
Ans. (d) : हाइडेगर के फेनोमेनोलाजी का प्रभाव दर्शन क्षेत्र में इतना हुआ कि भाषा-दर्शन एवं समाज दर्शन दोनों में फेनोमेनोलाजिकल दृष्टि की एक विधा खुल गयी। भाषा दर्शन में ही अर्थ निरूपणता का एक नया आधार उपलब्ध हो गया और फेनोमेनोलाजी के प्रभाव में (Hermeneuties) शास्त्रर्थमीमांसा की एक शाखा विकसित हो गयी जिसे ‘सत्तामूलक मोड़’ कहते है।
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