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UGC NTA NET JRF Subject Philosophy Solved Previous Papers (In Hindi) Book

UGC NTA NET JRF Subject Philosophy Solved Previous Papers (In Hindi) 2017

1. व्यक्ति देवऋण से मुक्त हो सकता है:
(a) ब्रह्मचर्य का पालन करके (b) यज्ञ करके
(c) मंत्रोच्चारण करके (d) संतान को जन्म देकर
Ans: (b) सन्ततिसूत्र जिस प्रकार मनुष्य पर पितृ-ऋण के रूप में है‚ सवाध्याय और ब्रह्मचर्य चालन के लिए ऋषि-ऋण तथा अतिथ्य सत्कार के लिए मनुष्य-ऋण है‚ उसी प्रकार देवों के प्रति ऋण का शोधन यज्ञों से होता है। अर्थात व्यक्ति देवऋण से मुक्त‚ यज्ञ करके हो सकता है।
(भा. दर्शन- डॉ नन्द किशोर देवराज)
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2. वैदिक परम्परा के अनुसार खगोलीय पिंडों की गति निर्देशित होती है:
(a) ईश्वर की इच्छा से
(b) ऋत‚ ब्रह्माण्डीय नियम से
(c) लोगों के नैतिक सद्‌गुणों से
(d) प्रजापति से
Ans: (b) ‘ऋत’ का अर्थ ‘विश्व व्यवस्था’ है। ‘ऋत्‌’ से विश्वव्यस्था के नैतिक पक्ष के साथ-साथ भौतिक पक्ष अर्थात्‌ ब्रहमाण्डीय नियम भी निर्देशित होते है। ब्रह्माण्डीय नियम‚ खगोलीय पिण्डों यथा सूर्य‚ चन्द्र‚ नक्षत्र‚ तारे आदि की नियमित गति एवं क्रम से ‘ऋत’ धारणा का उदय हुआ।
(भा. दर्शन- डॉ नन्द किशोर देवराज)
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3. सूची – I के साथ सूची – II को सुमेलित कीजिए और सही कूट चुनिए:
सूची I सूची II
(a) ऋक्‌ (i) उद्‌गाता
(b) साम (ii) होता
(c) यजु: (iii) अध्वर्यु
(d) अथर्व (iv) ब्रह्मा
कूट:
(a) (b) (c) (d)
(a) (i) (ii) (iii) (iv)
(b) (ii) (i) (iii) (iv)
(c) (i) (iii) (ii) (iv)
(d) (iv) (iii) (ii) (i)
Ans: (b) यज्ञयाज्ञादि के विधिपूर्वक अनुष्ठान के लिए चार ऋत्विजों की आवश्यकता होती है- होता; जो स्तुति -मन्त्रों के उच्चारण से देवताओं का आह्वान करता है; उद्‌गाता‚ जो मधुर स्वर में मंत्र गान करता है; अध्वर्यु‚ जो यज्ञ के विविध अंगों को सविधि सम्पादन करता है; तथा ब्रह्मा‚ जो सम्पूर्ण यज्ञ अनुष्ठान का विधिवत निरीक्षण करता है। होता के लिए ऋक-संहिता का‚ उद्‌गाता के लिए साम-संहिता का‚ अध्वर्यु के लिए यजु-संहिता और ब्रह्मा के लिए अथर्व संहिता का संकलन हुआ है।
(भा. द.: आलोचन और अनुशीलन – चन्दधर शर्मा)
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4. वैशेषिक के अनुसार गाय में अश्वत्व के अभाव को जाना जाता है:
(a) अन्योन्याभाव (b) प्रागभाव
(c) ध्वंसाभाव (d) अत्यन्ताभाव
Ans: (a) वैशेषिक दर्शन में आभाव चार प्रकार का माना गया हैप्रागभाव‚ प्रध्वंसाभाव‚ अत्यन्ताभाव और अन्योन्याभाव। अन्योन्याभाव का अर्थ है दो वस्तुओं का परस्पर भेद‚ जैसे घट पट नहीं है; घट में पटाभाव और पट में घटाभाव है। यह दो वस्तुओं के तादात्म्य का अभाव है। जो अनादि और अनन्त हैं यदि यह न हो तो सब वस्तुएं अभिन्न हो जायेंगी। ‘गाय’‚ अश्वत्व का अभाव होता है। तो वहां अन्योन्याभाव होगा।
(भारतीय दर्शन- आलोचना एवं अनुशीलन- चन्दधर शर्मा)
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5. आत्मा के बंधन दो प्रकार के होते हैं : भावबन्धन और द्रव्यबन्धन – यह विचार है:
(a) चार्वाक का (b) जैन का
(c) सांख्य का (d) मीमांसा का
Ans: (b) जैन दर्शन में आत्मा के बन्धन का दो प्रकार माना गया है- भावबन्धन और द्रव्यबन्धन। काषाय और कर्म का उदय भावबन्धन है तथा कर्म-पुदगलों द्वारा जीव/आत्मा को आबद्ध कर लेना द्रव्यबन्धन है।
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6. निम्नलिखित में से कौन वैशेशिकों को स्वीकार्य नहीं है?
(a) वेद की रचना किसी के द्वारा नहीं की गई है।
(b) तत्वज्ञान नि:श्रेयस्‌ के लिए पर्याप्त शर्त नहीं है।
(c) अभाव का प्रत्यक्ष हो सकता है।
(d) ईश्वर एक प्रकार की आत्मा है।
Ans: (a) वैशेषिक में ईश्वर की अवधारणा का स्पष्ट उल्लेख है। यहां ईश्वर को परम आत्मा कहा गया है। वैशेषिक के अनुसार वेद ईश्वर-वाक्य है। ईश्वर नित्य‚ सर्वज्ञ‚ और पूर्व है। अत: यह कथन ‘वेद की रचना किसी के द्वारा नहीं की गई है। वैशेषिकों को स्वीकार्य नहीं है।
(भा.द.: आ. एवं अनु. – चन्द्रधर शर्मा)
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7. निम्नलिखित कूट में से कौन सा एक चार्वाकों को स्वीकार्य है? (a), (b), (c), (d) पर विचार करते हुए उत्तर दीजिए।
(a) क्षिति और काम (b) अर्थ और पुण्य
(c) सुख और अर्थ (d) मरुत और व्योम
कूट:
(a) (a) और (b) (b) (a) और (c)
(c) (a) और (d) (d) (b) और (c)
Ans: (b) चार्वाक दर्शन में क्षिति‚ जल‚ पावक‚ समीर‚ चार महाभूत और अर्थ एवं काम को परम पुरुषार्थ मानते हुए ‘सुख’ को चरम लक्ष्य स्वीकार किया है। (यावज्जीवेत सुखं जीवेत।)
(लोकायतमत)
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8. न्याय में अपवर्ग के संदर्भ में सही क्रम का चयन कीजिए:
(a) दु:ख प्रवृत्ति‚दोष‚ जन्म‚ मिथ्याज्ञान
(b) मिथ्याज्ञान‚ दोष‚ प्रवृत्ति‚ जन्म‚ दु:ख
(c) जन्म‚ दु:ख‚ प्रवृत्ति‚ दोष‚ मिथ्याज्ञान
(d) जनम‚ दु:ख‚ मिथ्याज्ञान‚ प्रवृत्ति‚ दोष
Ans: (b) न्याय दर्शन भी अपवर्ग को मानव जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य मानता है। दु:ख का नित्य और निश्चित उच्छेद (विनाश) इसके कारण-मूल कारण-के उच्छेद के बिना असम्भव है। उच्छेद का प्रारम्भ क्रमश: मिथ्या-ज्ञान‚ दोष‚ प्रवृत्ति‚ जन्म और अन्त में दु:ख का उच्छेद कर अपवर्ग की प्राप्ति होती है।
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9. नैयायिकों के अनुसार निम्नलिखित में से कौन पंचावयवीन्याय का अवयव नहीं है?
(a) उदाहरण (b) उपनय
(c) उपमान (d) निगमन
Ans: (c) न्याय दर्शन में पंचावयवीन्याय के अवयव हैं क्रमश:
प्रतिज्ञा‚ हेतु‚ उदाहरण‚ उपनय‚ निगमन।
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10. नैयायिकों के अनुसार निम्नलिखित में से कौन वाक्यार्थ ज्ञान की शर्त नहीं है?
(a) व्याकरण (b) तात्पर्य
(c) आकांक्षा (d) आसत्ति
Ans: (a) न्याय दर्शन में वाक्यार्थ ज्ञान की शर्त के रूप में क्रमश:
आकांक्षा‚ योग्यता‚ सन्निधि या आसत्ति तथा तात्पर्य आदि चार शर्तों का होना आवश्यक है।
(भारतीय दर्श्न को समीक्षात्मक रूपरेखा -राममूर्ति पाठक)
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11. निम्नलिखित अनुमान में किस प्रकार का हेत्वाभास है सही कूट चुनिए। ‘पर्वत: वह्निमान नीलधूमात्‌’
(a) साधारण सव्यभिचार (b) स्वरुपासिद्ध
(c) व्याप्यत्वासिद्ध (d) बाधित
Ans: (c) जिस अनुमान में हेतु का साध्य के साथ व्याप्ति- सम्बन्ध अप्रामाणिक हो‚ उसे व्याप्यत्वासिद्ध हेतु कहते हैं। जैसे- ‘पर्वत बह्निमान नीलधूमात।’ अर्थात पर्वत अग्निमय है क्योंकि वहाँ नीला धुंआ है। ‘नीले धुँएं’ का साध्य ‘अग्नि’ के साथ सम्बन्ध अप्रामाणिक है।
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12. नैयायिकों के अनुसार ‘पदशक्ति’ है:
(a) एक अतिरिक्त पदार्थ है।
(b) एक शाश्वत पदार्थ है।
(c) दो पदों के बीच संबंध हैं
(d) पद और प्रयुज्य पदार्थ के बीच का संबंध है।
Ans: (d) ‘पदशक्ति’ पद और प्रयुज्य पदार्थ के बीच का संबंध हैं।
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13. निम्नलिखित कथनों में से कौन पातंजल योग के संबंध में सही नहीं है?
(a) ईश्वर पुरुषों में एक है।
(b) पातंजल योग तीन प्रमाणों को स्वीकार करता है।
(c) पातंजल योग एकतत्त्ववाद का समर्थन करता है।
(d) पातंजल योग पूर्व नैतिक प्रशिक्षण स्वीकार करता है।
Ans: (c) पातंजल योग को सांख्य की तत्वमीमांसा मान्य है। सांख्य के पच्चीस तत्वों को योग दर्शन में माना गया है। अत: पातंजलि योग एकतत्ववाद का समर्थन नहीं करता है।
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14. ‘‘चाँदी जो सीपी में दिखाई पड़ती है अवास्तविक नहीं हो सकती क्योंकि यह दिखाई पड़ती है; चाँदी वास्तविक भी नहीं हो सकती है क्योंकि जब हम सीपी को ठीक से देखते हैं तो यह वहाँ नहीं मिलती है’’। यह विचार है:
(a) रामानुज का (b) ईश्वरकृष्ण का
(c) शंकर का (d) नागार्जुन का
Ans: (c) शंकराचार्य के अनिर्वचनीयख्याति वाद के अनुसार चांदी
(रजत) जो सीपी में दिखाई पड़ती है‚ अवास्तविक नहीं हो सकती क्योंकि यह दिखायी पड़ती है; चांदी वास्तविक नहीं हो सकती है‚ क्योंकि जब हम सीपी को ठीक से देखते हैं तो यह वाहं नहीं मिलती है। इस तरह जो न वास्तविक हो और न ही अवास्तविक हो अथवा न वास्तविक-अवास्तविक दोनों हो और दिखाई पड़ने के कारण स्मृति का विषय भी नहीं हो तो वह सदसद्विलक्षण या अनिवर्चनीय है।
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15. सूची – I और सूची – II को सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूट की सहायता से सही उत्तर दीजिए। सूची I सूची II
(a) जीवन्मुक्ति (i) न्याय-वैशेषिक
(b) विदेहमुक्ति (ii) पूर्व मीमांसक
(c) नि:श्रेयस: (iii) शंकर
(d) स्वर्ग (iv) मध्व
कूट:
(a) (b) (c) (d)
(a) (iv) (iii) (ii) (i)
(b) (iii) (iv) (i) (ii)
(c) (ii) (i) (iii) (iv)
(d) (i) (ii) (iv) (iii)
Ans: (b) जीवन्मुक्ति – शंकर विदेहमुक्ति – मध्व नि:श्रेयस: – न्याय-वैशेषिक स्वर्ग – पूर्व मीमांसक

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16. नीचे अभिकथन (A) और तर्क (R) दिए गए हैं। उन पर विचार कीजिए और शंकर के दर्शन के संदर्भ में नीचे दिए गए सही कूट का चयन कीजिए।
अभिकथन (A) : शंकर का दर्शन जगत को पूर्ण्तया अस्वीकार करता है।
तर्क (R) : तथ्य यह है कि एक वास्तविक बाह्य जगत है।
कूट:
(a) (A) तथा (R) दोनों सही हैं और (R)‚ (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं‚ और (R)‚ (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) गलत हैं‚ और (R) सही है।
(d) (A) सही है और (R) गलत हैं।
Ans: (c) शंकराचार्य अपने दर्शन में जगत की व्यावहारिक सत्ता को स्वीकार करते है। ये अलग बात है कि तथ्यात्मक रूप से यह वास्तविक बाह्य जगत है। अत: अभिकथन (A) पूरी तरह गलत है परन्तु तर्क (R) सही हैं।
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17. सांख्य के अनुसार विकास का सही क्रम है:
(a) अहंकार‚ मनस्‌‚ कर्मेन्द्रियाँ‚ ज्ञानेन्द्रियाँ‚ महत्‌
(b) ज्ञानेन्द्रियाँ‚ मनस्‌‚ कर्मेन्द्रियाँ‚ अहंकार‚ महत्‌
(c) कर्मेन्द्रियाँ‚ ज्ञानेन्द्रियाँ‚ मनस्‌‚ महत्‌‚ अहंकार‚
(d) महत्‌‚ अहंकार‚ मनस्‌‚ ज्ञानेन्द्रियाँ‚ कर्मेन्द्रियाँ‚
Ans: (d) सांख्य दर्शन के अनुसार प्रकृति से सृष्टि में विकास क्रमश: महत्‌ (बुद्धि) प्रथम तत्व है‚ उसके बाद क्रम से – अहंकार‚ मनस्‌ ‚ ज्ञानेन्द्रियां‚ कर्मेन्द्रियां विकसित हुईं।
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18. सांख्य दर्शन में प्रकृति:
(a) अचेतन और आश्रित है (b) चेतन और निष्क्रिय है
(c) अचेतन और सक्रिय है (d) चेतन और स्वतंत्र है
Ans: (c) सांख्य दर्शन में द्वितीय तत्व अव्यक्त या प्रकृति है। जो जगत का मूल कारण है। यह प्रकृति पुरुष की विरुद्धधर्मी है। यह चेतनस्वरूप‚ त्रिगुणातीत एवं उदासीन पुरुष के विपरीत‚ अचेतन‚ त्रिगुणात्मिका और सक्रिय है।
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19. मीमांसा-दर्शन में निम्नलिखित तर्क वाक्यों में कौन सही नहीं है?
(a) मीमांसा‚ स्वत: प्रामाण्यवाद का समर्थन करता है।
(b) आत्मा सक्रिय है।
(c) वेद अपौरुषेय है।
(d) सीप-चांदी भ्रम में प्रत्यक्षपरक त्रुटि अध्यास के कारण है।
Ans: (d) ‘मीमांसा – दर्शन में अध्यास’ को प्रत्यक्षपरक त्रुटि का कारण नहीं माना गया है।
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20. नीचे अभिकथन (A) और तर्क (R) दिए गए हैं। उन पर विचार कीजिए और बौद्धमत के संदर्भ में सही कूट चुनिए।
अभिकथन (A) : निर्वाण क्षणिक है।
तर्क (R) : सर्वं क्षणिकं क्षणिकम्‌
कूट:
(a) (A) तथा (R) दोनों सही हैं और (R)‚ (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं‚ और (R)‚ (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही हैं‚ और (R) गलत है।
(d) (A) गलत है और (R) सही हैं।
Ans: (d) सर्व क्षणिकम्‌ क्षणिकम्‌‚ यह बौद्धों का क्षणिकवाद सिद्धान्त है। परन्तु निर्वाण तो समस्त दु:ख का निरोध है। निर्वाण प्राप्त होने पर मनुष्य भव-चक्र से मुक्त हो जाता है। निर्वाण नित्य‚ है अत: क्षणिक धर्म नहीं।
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21. सूची – I और सूची – II को सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूट की सहायता से सही उत्तर दीजिए। सूची I सूची II
(लेखक) (लेखन)
(a) श्री अरबिन्द (i) फ्रीडम फ्रॉम द नोन
(b) जे. कृष्णमूर्ति (ii) द रिकवरी ऑफ फेथ
(c) के. सी. भट्टाचार्य (iii) स्टडीज इन वेदान्तिज्म
(d) एस. राधाकृष्णन्‌ (iv) सावित्री‚ ए लीजेन्ड एंड ए सिम्बल
कूट:
(a) (b) (c) (d)
(a) (i) (ii) (iv) (iii)
(b) (iv) (i) (iii) (ii)
(c) (ii) (iv) (i) (iii)
(d) (iii) (i) (ii) (iv)
Ans: (b) श्री अरबिन्द – सावित्री‚ ए लीजेन्ड एंड ए सिम्बल
जे. कृष्णमूति – फ्रीडम फ्रॉम द नोन के. सी. भट्टाचाय – स्टडीज इन वेदान्तिज्म
एस. राधाकृष्णन्‌ – द रिकवरी ऑफ फेथ
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22. अधोलिखित में से कौन श्री अरविन्द की अतिमानसिक चेतना की तीन अवस्थाओं की अवधारणा के साथ सुमेलित नहीं है?
(a) अन्तर्दृष्टी चेतना
(b) अभिमुखदृष्टी चेतना
(c) विश्लेषणात्मक चेतना
(d) प्रक्षेपणात्मक चेतना
Ans: (c) श्री अरविन्द के दर्शन में अतिमानसिक चेतना की तीन अवस्थाएं अन्तर्दृष्टी चेतना‚ अभिमुखदृष्टी चेतना तथा प्रक्षेपणात्मक चेतना।
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23. निम्नलिखित में से किसने परमसत्‌ को ‘जीवन देवता’ के रूप में सम्बोधित किया है?
(a) श्री अरविन्द (b) एस. राधाकृष्णन्‌
(c) बी. आर. अम्बेडकर (d) आर. एन. टैगोर
Ans: (d) रवीन्द्र नाथ टैगोर के दर्शन में ‘परम्‌ सत्‌ ’ के लिए जिन शब्दों को प्रयोग में लाया जाता है वह है- ‘The Universal Man ‘The Supreme Person’, ‘The Supreme Spirit, The Infinite Personality’ – ‘जीवनदेवता’ ‘असीम आत्म-पुरुष’‚ परम-पुरुष आदि।
(समकालीन भारतीय दर्शन-बी. के. लाल)
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24. निम्नलिखित में से किसने कहा है कि ‘मानव के लिए दो मिलियन ईश्वरों में अंधविश्वास करने की अपेक्षा तर्क का अनुसरण करके नास्तिक बनाना श्रयेस्कर है’?
(a) गांधी (b) टैगोर
(c) विवेकानंद (d) अम्बेडकर
Ans: (c) ‘मानव के लिए मिलियन ईश्वरों में अंधविश्वास की अपेक्षा तर्क का अनुसरण करके नास्तिक बनाना श्रेयस्कर है’ यह कथन स्वामी विवेकानन्द का है।
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25. नीचे अभिकथन (A) और तर्क (R) दिए गए हैं। उन पर विचार कीजिए और के. सी. भट्टाचार्य के संदर्भ में नीचे दिए गए सही कूट को चुनिए।
अभिकथन (A) : दर्शन के निर्णय छद्‌म निर्णय हैं।
तर्क (R) : सभी दार्शनिक निर्णयों में विधेय उद्देश्य में अंतर्निहित होता है।
कूट:
(a) (A) तथा (R) दोनों सही हैं और (R)‚ (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं‚ किन्तु (R)‚ (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही हैं‚ किन्तु (R) गलत है।
(d) (A) गलत है किन्तु (R) सही हैं।
Ans: (c) के. सी. भट्टाचार्य के अनुसार दर्शन के निर्णय छद्‌म निर्णय है। यह उस अर्थ में निर्णय नहीं है जिस अर्थ में विज्ञान के निर्णय है। विज्ञान के निर्णयों में उद्देश्य-विधेय के सम्बन्ध कुछ सूचना देते है। लेकिन दर्शन के निर्णय सम्बन्ध-सूचक न होकर किसी का प्रतीक है। अत: अभिकथन (A) तो सही है परन्तु तर्क
(R) असत्य (गलत) है।
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26. निम्नलिखित में से किसका यह विचार है कि : दैवी ज्ञान सृजनात्मक है‚ क्योंकि कुछ भी ईश्वर – बाह्य नहीं है। वह स्वयं अपने ज्ञान का विषय है। वह जैसा जानता है‚ सृजन करता है‚ और जैसा सृजन करता है‚ जानता है।
(a) टैगोर (b) विवेकानंद
(c) के. सी. भट्टाचार्य (d) इ़कबाल
Ans: (d) यह इकबाल का विचार है। उनका दर्शन इस्लामिक दर्शन पर आधारित है।
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27. सूची – I और सूची – II को सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूट की सहायता से सही उत्तर दीजिए। सूची I सूची II
(चिन्तक) (चिन्तन)
(a) एस. राधाकृष्णन्‌ (i) जो कहा जाए उसे प्रथमत:
विश्वास योग्य होना चाहिए।
(b) विवेकानंद (ii) मानव आत्मा की नियति सर्वशक्तिमान के साथ एकात्मता की अनुभूति होनी चाहिए।
(c) के. सी. भट्टाचार्य (iii) असीम और ससीम उसी प्रकार एक हैं जिस प्रकार गायक और उसका गायन
(d) टैगोर (iv) अमरत्व प्रत्येक वस्तु के साथ एकात्मता की अनुभूति में हैं।
कूट:
(a) (b) (c) (d)
(a) (i) (ii) (iv) (iii)
(b) (ii) (iv) (iii) (i)
(c) (iv) (ii) (i) (iii)
(d) (ii) (iv) (i) (iii)
Ans: (d)
एस. राधाकृष्णन्‌ – मानव आत्मा की नियति सर्वशक्तिमान के साथ एकात्मता की अनुभूति होना चाहिए। विवेकानंद – अमरत्व प्रत्येक वस्तु के साथ एकात्मता की अनुभूति में हैं। के. सी. भट्टाचार्य – जो कहा जाए उसे प्रथमत: विश्वास योग्य होना चाहिए। टैगोर – असीम और ससीम उसी प्रकार एक हैं जिस प्रकार गायक और उसका गायन
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28. संत ऑगस्टीन के अभाव के सिद्धान्त के अनुसार:
(a) ईश्वर ने सत्‌ में से जगत की रचना की
(b) ईश्वर ने अभाव में से जगत की रचना की
(c) ईश्वर ने भाव में अशुभ की रचना की
(d) ईश्वर ने अभाव से स्वयं की रचना की
Ans: (b) संत ऑगस्टीन के ‘आभाव सिद्धान्त के अनुसार ईश्वर ने अभाव से सृष्टि या जगत की रचना किया हैं ऑगस्टीन का यह मत चमत्कारवाद के नजदीक है।
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29. ‘‘यदि कोई वैयक्तिक चक्रक पदार्थ नहीं है; तो ऐसा कोई भी पदार्थ नहीं होगा जिसके स्वरूप को चक्रीय कहा जाए‚’’ किसे मान्य है:
(a) सुकरात
(b) प्लेटो
(c) अरस्तू
(d) संत ऑगस्टीन
Ans: (c) ‘अरस्तू के अनुसार निरपेक्ष आकार और निरपेक्ष जड़ द्रव्य का इस दृश्य जगत में स्पष्ट अभाव है। यह एक सापेक्षिक अवधारणा है। यहां कोई वस्तु एक दृष्टि से द्रव्य है तो दूसरी दृष्टि से आकार है। अत: कोई वैयक्तिक चक्रक पदार्थ न हो‚ तो ऐसा कोई भी पदार्थ नहीं होगा जिसका स्वरूप (आकार) चक्रीय कहा जाये।
(पाश्चात्य दर्शन का इतिहास – प्रो. दयाकृष्ण)
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30. प्लेटो की तत्त्वमीमांसा के आलोक में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए और सही कूट को चिन्हित कीजिये:
(a) जिन वस्तुओं का हम संवेदी अनुभव में सामना करते हैं वे सत्यात्मक तथ्य नहीं है।
(b) आकार को केवल बौद्धिक रूप से समझा जा सकता है।
(c) आकार किसी के मन के प्रत्यय या सम्प्रत्यय हैं।
कूट:
(a) केवल (a) सही है।
(b) केवल (a) और (b) सही हैं।
(c) केवल (a) और (c) सही हैं।
(d) (a), (b), (c) और सभी सही हैं।
Ans: (b) प्लेटो के अनुसार‚
1. जिन वस्तुओं का हम संवेदी अनुभव में सामना करते हैं वे सत्यात्मक तथ्य नहीं है।
2. आकार को केवल बौद्धिक रूप से समझा जा सकता है।
3. आकार किसी के मन के प्रत्यय या सम्प्रत्यय न होकर यह वस्तुनिष्ठ रूप से सत्‌ हैं।
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31. निम्नलिखित में से किसका यह विचार है कि ‘‘पदार्थ‚ पदार्थ हैं क्योंकि उनकी गणना की जा सकती है’’?
(a) पाइथागोरस (b) एनेक्जिमेन्डर
(c) हेरेक्लाइट्‌स (d) पार्मेनाइडी़ज
Ans: (a) पाइथागोरस के अनुसार जिनकी गणना की जा सकती है वह पदार्थ है। पाइथागोरस ने परम तत्व को ‘संख्या’ ही कह दिया। इनके द्वारा संख्या- सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया।
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32. नीचे अभिकथन (A) और तर्क (R) दिए गए हैं। उन पर थॉमस एक्विनॉस के आलोक में उन पर विचार कीजिए और सही कूट पर चिन्ह लगाइये।
अभिकथन (A) : ईश्वर जगत का कारण-रहित कारण है।
तर्क (R) : कोई वस्तु जिसका अस्तित्व है‚ उसके अस्तित्व के कारण का अस्तित्व पहले विद्यमान होगा।
कूट:
(a) (A) तथा (R) दोनों सही हैं और (R)‚ (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं‚ और (R)‚ (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही हैं‚ और (R) गलत है।
(d) (A) गलत है और (R) सही हैं।
Ans: (a) थॉमस एक्विनॉस के अनुसार‚ ईश्वर इस जगत्‌ का कारण-रहित कारण है अर्थात्‌ स्वयंभू कारण है। यह एक कारणकार्य सम्बन्ध पर आधारित कथन है जिसके अनुसार प्रत्येक अस्तित्व का जो विद्यमान हो एक कारण अवश्य होता है।
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33. निम्नलिखित प्रारम्भिक ग्रीक दार्शनिकों में से किसका विचार है कि:
‘‘जो नहीं है उसे आप जान नहीं सकते और न ही अभिव्यक्त किया जा सकता है‚ जिसका विचार किया जा सकता है और जो हो सकता है- वे समान है।’’
(a) पामेनाइडी़ज (b) हेरेक्लाइटस
(c) एम्पेडोक्ली़ज (d) डेमोक्रीटस
Ans: (a) पार्मेनाइडीज के अनुसार सत्‌ और विचार दोनों एक हैं। वह जो हमारे विचार का विषय है और वह जिसके लिए हमारे विचार का अस्तित्व है- दोनों एकरूप (समान) है। जो नहीं है उसे आप जान नहीं सकते। अर्थात्‌ जो हमारे विचार का विषय नहीं है उसकी सत्ता भी नहीं हो सकती और जिसकी सत्ता नहीं है अर्थात्‌ जो पूर्ण रूप से असत्‌ है वह हमारे विचार का विषय भी नहीं हो सकता।
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34. सूची – I और सूची – II को सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूट की सहायता से सही उत्तर दीजिए। सूची I सूची II
(a) एनेक्जिमेनी़ज (i) नाउस
(b) एनेक्जिमेन्डर (ii) वायु
(c) थेली़ज (iii) एपीरॉन
(d) एनेक्जेगोरस (iv) जल
कूट:
(a) (b) (c) (d)
(a) (iii) (ii) (i) (iv)
(b) (ii) (iii) (iv) (i)
(c) (i) (iv) (iii) (ii)
(d) (iv) (i) (ii) (iii)
Ans: (b) एनेक्जिमेनी़ज – वायु एनेक्जिमेन्डर – एपीरॉन थेली़ज – जल एनेक्जेगोरस – नाउस
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35. निम्नलिखित कौन सा क्रम हीगेल के अनुसार ‘निरपेक्ष मनस्‌’ के अनुक्रमिक चरणों का सही प्रतिनिधित्व करता है?
(a) कल्पना‚ अंतर्बोध‚ अवधारणा
(b) धर्म‚ मनोविज्ञान‚ दर्शन
(c) कला‚ धर्म‚ दर्शन
(d) धर्म‚ कला‚ दर्शन
Ans: (c) हेगेल के अनुसार ‘निरपेक्ष मनस’ के अनुक्रमिक चरणों का सही क्रम- कला‚ धर्म‚ दर्शन है।
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36. कान्ट के दर्शन के आलोक में सूची – I से सूची – II को सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूट की सहायता से सही उत्तर दीजिए। सूची I सूची II
(a) समस्यापरक निर्णय (i) ताप गति का रूप है।
(b) अनन्त निर्णय (ii) यह विष हो सकता है।
(c) अकाट्‌य निर्णय (iii) मनस अविस्तारित है।
(d) स्वीकारात्मक निर्णय (iv) प्रत्येक कार्य का कारण है।
कूट:
(a) (b) (c) (d)
(a) (i) (ii) (iii) (iv)
(b) (ii) (iii) (iv) (i)
(c) (iii) (iv) (i) (ii)
(d) (iv) (iii) (ii) (i)
Ans: (b) समस्यापरक निर्णय – यह विष हो सकता है। अनन्त निर्णय – मनस अविस्तारित है। अकाट्‌य निर्णय – प्रत्येक कार्य का कारण है। स्वीकारात्मक निर्णय – ताप गति का रूप है।
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37. हाइडेगर के दर्शन के आलोक में निम्नलिखित सूची-I और सूची-II को सुमेलित कीजिए तथा नीचे दिए गए
कूट की सहायता से सही उत्तर चुनिए :
सूची I सूची II
(a) फेनॉमेनॉ (i) संभाव्यता
(b) भय (ii) जो स्वयं का प्रकट करता है
(c) रेडी-टू-हैंड (iii) मानवीय अस्तित्व का प्रकार
(d) एग्जिस्टेऩ्ज (iv) सावधानी
कूट:
(a) (b) (c) (d)
(a) (iv) (iii) (ii) (i)
(b) (iii) (ii) (i) (iv)
(c) (ii) (iii) (iv) (i)
(d) (i) (iv) (iii) (ii)
Ans: (c)
(i) जो स्वयं को प्रकट करता है वह फेनॉमेनॉ है।
(ii) भय मानवीय अस्तित्व का प्रकार है।
(iii) सावधानी को रेडी-टू-हैंड कहा गया है।
(iv) अस्तित्व एक तरह की संभाव्यता है।
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38. नीचे अभिकथन (A) और तर्क (R) दिए गए हैं। उन पर विचार कीजिए और सही कूट चुनिए।
अभिकथन (A) : गिल्बर्ट राइल के अनुसार किसी के बारे में कहना कि ‘x’ बुद्धिमान है‚ से अभिप्राय है कि
तर्क (R) : (i) यह ‘x’ के मनस्‌ के बारे में एक अभिकथन है।
(ii) यह ‘x’ के सार्वजनिक कार्य-
निष्पादन के बारे में हमारा ज्ञान है।
कूट:
(a) (A) और (R) (i)‚ (ii) सही हैं और (R) (i)‚ (ii) दोनों (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) सही हैं‚ किन्तु केवल (R) (i)‚ (A) की सही व्याख्या है।
(c) (A) और (R) सही हैं‚ किन्तु केवल (R) (ii)‚ (A) की सही व्याख्या है।
(d) (A) और (R) गलत हैं और (R) (i)‚ (ii) (A) की सही व्याख्या नहीं है।
Ans: (a) गिल्बर्ट राइल के अनुसार किसी के बारे में कहना कि ‘x’ बुद्धिमान है‚ से अभिप्राय है कि
(i) यह ‘x’ के मनस्‌ के बारे में एक अभिकथन है।
(ii) यह ‘x’ के सार्वजनिक कार्य- निष्पादन के बारे में हमारा ज्ञान है। दोनों सही वाक्य है। ऐसी बाते वह अपने ‘Knowing How’ और ‘Knowing That’ सम्बन्धी विचार में कहती है।
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39. नीत्शे के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?
(a) जीवनोपरान्त काल्पनिक प्रतिशोध में दास नैतिकता व्यवस्थत हो जाती है।
(b) दास नैतिकता प्रामाणिक नहीं है क्योंकि यह हमेशा एक व्यवस्थित है‚ मूल आवेग नहीं।
(c) दास नैतिकता जो बाहर से आये हुए को या जो भिन्न है या जो स्वयं का नहीं है‚ को तात्कालिक रूप से स्वीकार कर लेती हैं
(d) दास नैतिकता त्याग‚ विलम्बन एवं निषेध की नैतिकता है।
Ans: (c) नीत्शे अपने नीति-दर्शन में समाज के दो पहलूओं की चर्चा करता है। उसके अनुसार समाज में दो तरह की नैतिकता कार्य करती है। एक दास नैतिकता और दूसरी स्वामी नैतिकता। इसी सन्दर्भ से दास नैतिकता को दुर्बल वर्ग की नैतिकता कहता है और इसे त्याग‚ विलम्बन और निषेध की नैतिकता कहता है। वह दास नैतिकता को प्रामाणिक भी नहीं मानता क्योंकि यह एक प्रतिशोध है‚ मूल आवेग नहीं। यह प्रतिशोध एक काल्पनिक प्रतिशोध है जो जीवनोपरान्त तक उसी में व्यवस्थित हो जाती हैं यह बाहर से आये हुए को या जो भिन्न है‚ या जो स्वयं का नहीं है तात्कालिक रूप से स्वीकार नहीं करती हैं अर्थात्‌ तुरन्त स्वीकार करने में कठिनाई महसूस करती है।
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40. विलियम जेम्स के आलोक में‚ निम्नलिखित में से कौन सही कथन नहीं है?
(a) जीवन उत्तरापेक्षी है- ‘‘अनिवार्य विकल्प’’
(b) मिथ्या प्रत्यय वे हैं जिनका सत्यापन हम नहीं कर सकते।
(c) सिद्धान्त केवल मानव-निर्मित भाषा हैं जिसमें हम प्रकृति की आख्या लिखते हैं।
(d) सत्य प्रत्ययों की वैधता स्थापित नहीं की जा सकती है।
Ans: (d) विलियम जेम्स के अनुसार‚ किसी विश्वास अथवा विचार की सत्यता की परीक्षा करने के लिए यह देखना चाहिए कि उसके सत्य होने से हमारे व्यवहारिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है। सत्यता का अर्थक्रियावादी सिद्धान्त सत्य प्रत्ययों की वैधता स्थापित करने से सम्बन्धित है वह प्रत्यय शुभ एवं सत्य है जो फलोत्पादक हैं।
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41. हुसर्ल के अनुसार फेनॉमिनॉलॉजी निम्नलिखित में से किस दृढ़ विश्वास पर निर्भर है?
(a) अर्थ केवल मनस्‌ में होता है।
(b) अर्थ केवल जगत में होता है।
(c) अर्थ न तो मनस में है और न ही जगत में
(d) अर्थ मनस और जगत के बीच साभिप्राय संबंध में होता है।
Ans: (d) हुसर्ल के अनुसार अर्थ मनस और जगत के बीच साभिप्राय संबंध में होता है। वास्तव में हुसर्ल की फनोमेनोलॉजी जगत्‌ के मूल आद्य अर्थों की खोज है। हुसर्ल के अनुसार हमारी चेतना अनिवार्यत: विषयोन्मुख चेतना हैं वह ब्रेन्टानों के विषयपेक्षा सिद्धान्त से प्रभावित है।
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42. नीचे अभिकथन (A) और तर्क (R) दिए गए हैं। उन पर विचार कीजिए और सही कूट चुनिए।
अभिकथन (A) : कान्ट के अनुसार‚ यद्यपि हम प्रत्यक्षत:
परमार्थ का अनुभव नहीं कर सकते‚ अतींद्रिय- प्रत्यय की विशेष श्रेणी फेनॉमिनॉ और नॉमेनॉ‚ के बीच सेतु का कार्य करती है।
तर्क (R) : (i) प्रत्ययों को अतींद्रिय कहा जाता है क्योंकि वे केवल तर्क बुद्धि की उपज होते हैं और न कि मनस्‌ की संवेदन के साथ अन्तर्क्रिया का परिणाम है।
(ii) वे सर्वप्रथम अनुभव से ‘एकीकृत कर देते है’ या ‘संभव बना देते हैं’।
कूट:
(a) (A) और (R) (i)‚ (ii) दोनों सही हैं और (R)‚ (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) (i)‚ सही हैं‚ और केवल (R) (i)‚ (A) की सही व्याख्या है।
(c) (A) और (R) (ii) सही हैं‚ और केवल (R) (ii)‚ (A) की सही व्याख्या है।
(d) (A) और (R) (i)‚ (ii) दोनों गलत हैं और (R) (A) की सही व्याख्या नहीं प्रदान करता है।
Ans: (a) कांट अपनी पुस्तक ‘क्रिटिक ऑफ प्योर रीजन’ में अतीन्द्रिय प्रत्ययवाद’ की स्थापना करता है। वह परमार्थ या स्वलक्षण वस्तुओं और आभास या अनुभूत ज्ञान में भेद करता हैं उसके अनुसार परमार्थ अनुभव नहीं किया जा सकता है। इन्हें संवेदनाओं के स्रोत के रूप में जाना जाता हैं जो स्वत: असंबंध हैं। अतीन्द्रिय प्रत्ययों की विशेष श्रेणी फेनॉमिना (परमार्थ) और नॉमेना
(व्यवहार) के बीच सेतु का कार्य करती है। काण्ट में अपने दर्शन में तर्कबुद्धि (Reason) से उत्पन्न प्रत्ययों को अतीन्द्रिय माना है। क्योंकि संवेदना से उत्पन्न नहीं है। इसतरह (A) और (R) (i)‚ (ii) दोनों सत्य है और (R) (A) की सही व्याख्या है।
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43. सूची – I और सूची – II को सुमेलित कीजिए और निम्नलिखित में से सही कूट चिन्हित कीजिए:
सूची I सूची II
(a) इपॉकी (i) विषयापेक्षी चेतना
(b) आइडॉस (ii) आनुभविक और तत्वमीमांसीय प्राक्‌कल्पनाओं का स्थगन
(c) अंतर्बोध (iii) अपरिवर्ती संरचना
(d) नोएसिस (iv) निष्क्रिय संभावनाओं का सक्रिय पुन:स्वामित्व और एक ही बार में उनका पुनरेकीकरण करना।
कूट:
(a) (b) (c) (d)
(a) (iv) (i) (ii) (iii)
(b) (iii) (ii) (iv) (i)
(c) (i) (iv) (iii) (ii)
(d) (ii) (iii) (iv) (i)
Ans: (d) इपॉकी – आनुभविक और तत्वमीमांसीय प्राक्‌कल्पनाओं का स्थगन आइडॉस – अपरिवर्ती संरचना अंतर्बोध – निष्क्रिय संभावनाओं का सक्रिय पुन:स्वामित्व और एक ही बार में उनका पुनरेकीकरण करना। नोएसिस – विषयापेक्षी चेतना
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44. नीचे दिए गए चिंतन के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन सा कूट सही है? (a), (b), (c) और (d) पर विचार करते हुए उत्तर दीजिए:
चिन्तन : ‘‘…… मनस्‌ और शरीर‚ विस्तार और चिन्तन‚ एकल सर्वसमावेशी यथार्थ के अनेक अपृथक पहलुओं के दो अंश हैं। द्रव्य के सह-अस्तित्व होने के कारण चिन्तन और विस्तार में अन्तर्क्रिया नहीं हो सकती’’।
(a) देकार्त (b) लाइबनिट्‌ज
(c) स्पिनोजा (d) बर्कले
कूट:
(a) स्पिनोजा (b) बर्कले और देकार्त दोनों
(c) लाइबनिट्‌ज (d) स्पिनोजा और बर्कले दोनों
Ans: (a) स्पिनोजा के अनुसार‚ मनस्‌ और शरीर‚ विस्तार और चिन्तन एक सर्वसमावेशी यथार्थ के अनेक अपृथक पहलुओं के दो अंश हैं। द्रव्य के सह – अस्तित्व होने के कारण चिन्तन और विस्तार में अन्तर्क्रिया नहीं हो सकती। बशर्तें डेकार्ट ने विस्तार और विचार‚ मनस्‌ और शरीर को एक दूसरे से पृथक स्वतंत्र द्रव्य मान लिया है इसलिए उनमें अंतर्क्रिया का प्रश्न ही नहीं उठता। इसीलिए स्पिनोजा समानान्तरवाद की स्थापना करता है। और द्रव्यों के द्वैतवाद का निराकरण करके दो समानान्तर गुणों के द्वैत को स्वीकार करता है।
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45. लाइबनिट्‌ज के लिए चिदणु हैं:
(a) केवल अविभाज्य और आध्यात्मिक
(b) केवल अविभाज्य और स्व-क्रियाशील
(c) केवल स्व-क्रियाशील और भौतिक
(d) अविभाज्य‚ स्व-क्रियाशील और आध्यात्मिक
Ans: (d) लाइवनित्ज के चिदणु निरवयव‚ सरल‚ अविभाज्य अविनाशी अैर आध्यात्मिक हैं इन्ही के माध्यम से सम्पूर्ण सृष्टि की रचना हुई है।
(पा. द. का उद्‌भव और विकास- डॉ. हरिशंकर‚ उपाध्याय)
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46. सूची-I और सूची-II को सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर दीजिए:
सूची I सूची II
(a) ह्यूम (i) कारण-कार्य-संबंध का विचार अनिवार्यरूप से एकरूपता से नहीं जुड़ा है।
(b) लॉक (ii) ईश्वर आत्माओं और वस्तुओं का वास्तविक कारण हैं।
(c) बर्कले (iii) आत्मा का शरीर से संबंध पायलट और उसके मशीन के साथ संबंध की तरह का है।
(d) देकार्त (iv) सतत संयोजन का अतीत अनुभव
कूट:
(a) (b) (c) (d)
(a) (i) (iii) (ii) (iv)
(b) (iv) (i) (ii) (iii)
(c) (ii) (i) (iii) (iv)
(d) (iv) (i) (iii) (ii)
Ans: (b) ह्यूम – सतत संयोजन का अतीत अनुभव लॉक – कारण-कार्य-संबंध का विचार अनिवार्यरूप से एकरूपता से नहीं जुड़ा है। बर्वâेले – ईश्वर आत्माओं और वस्तुओं का वास्तविक कारण हैं। देकार्त – आत्मा का शरीर से संबंध पायलट और उसके मशीन के साथ संबंध की तरह का है।
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47. निम्नलिखित में से कौन-सा कूट जॉन लॉक के लिए स्वीकार्य हैं? (a), (b), (c) और (d) पर विचार कर उत्तर दीजिए:
(a) प्रत्ययों की सहमति ज्ञान है।
(b) संवेदनों की सहमति ज्ञान है।
(c) प्रत्ययों की सहमति या असहमति ज्ञान है।
(d) संवेदनों की सहमति या असहमति ज्ञान है।
कूट:
(a) (d) और (c)
(b) (d) और (a)
(c) (c) और (a)
(d) (a) और (b)
Ans: (c) लॉक के अनुसार हमारा ज्ञान प्रत्ययों की सहमति या असहमति पर निर्भर करता हैं अत: विकल्प (c) सत्य है।
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48. निम्नलिखित में से कौन-सा कूट स्पिनोजा के लिए स्वीकार्य है? (a), (b), (c) और (d) पर विचार कर उत्तर दीजिए :
(a) स्वोत्पादक सत्ता के रूप में प्रकृति को नेचुरा नेचुरान्स कहा जाता है।
(b) स्वोत्पादक सत्ता के रूप में प्रकृति को नेचुरा नेचुराटा कहा जाता है।
(c) रचनात्मक उत्पाद के इसके पहलू में प्रकृति को नेचुरा नेचुराटा कहा जाता है।
(d) इसके स्थिर पहलू में प्रकृति को नेचुरा नेचुरान्स के रूप में जाना जाता हैं
कूट:
(a) (a) और (b)
(b) (a) और (c)
(c) (a) और (d)
(d) (b) और (d)
Ans: (b) स्पिनोजा ईश्वर के तीन रूपों का उल्लेख अपने दर्शन में करता है- 1. कार्य-प्रकृति (नेचुरा-नेचुराटा) 2. कारण प्रकृति (नेचुरानेचुरान्स)
3. पररूप (एन्स अब्सॉल्यटम इन्डिटर मिनेरम) ‘Natura Naturata’ यह ईश्वर का विश्वरूप है इसे द्रव्य के विकारों का जगत कहा जाता है। यहाँ रचनात्मक उत्पाद का पहलू है। यह निम्नरूप है। ‘Natura Naturans’ यह ईश्वर का विश्वात्मरूप है। यह स्नोत्पादक सत्ता के रूप में है। यह वस्तुओं का सार्वभौम सिद्धान्त है। यह सक्रिय प्रकृति भी है। यह बुद्धि का स्तर है।
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49. बर्कले के दर्शन में‚ निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा सही नहीं है?
(a) भौतिक वस्तुएँ नहीं है।
(b) हम जिन्हें वस्तुएँ कहते हैं वे केवल प्रत्यय हैं।
(c) ईश्वर हममें प्रत्ययों का सृजन करता हैं।
(d) उड़ने वाले अश्वों के प्रत्यय हैं।
Ans: (d) बर्कले के अनुसार भौतिक वस्तुएं नहीं हैं जो कुछ भी है सब कुछ प्रत्यय है। ईश्वर हममे प्रत्ययों का सृजन करता है। लेकिन बर्कले उड़ने वाले अश्वों के प्रत्ययों को नहीं मानता है।
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50. श्री अरविंद के दर्शन के संबंध में विकास की प्रक्रिया का सही क्रम चुनिए:
(a) विस्तारीकरण‚ उच्चीकरण‚ समाकलन
(b) उच्चीकरण‚ विस्तारीकरण‚ समाकलन
(c) उच्चीकरण‚ समाकलन‚ विस्तारीकरण
(d) समाकलन‚ उच्चीकरण‚ विस्तारीकरण
Ans: (a) श्री अरविन्द के अनुसार विकास की प्रक्रिया में तीन प्रक्रियाएं समाविष्ट है। प्रथम स्तर ‘विस्तारीकरण’ की प्रक्रिया है। यह किसी स्तर के अस्तित्ववान रूपों को समेटना है‚ उसे अपने पूर्णतया विस्तृत रूप में व्यक्त होना है। द्वितीय‚ ‘उच्चीकरण‚’ है जिसमें विकास- प्रक्रिया उच्चतर रूपों की ओर उन्मुख होती है। इस उच्चत्व की ओर उठने में किसी रूप के निषेध का प्रश्न नहीं। अन्त में पूर्णीकरण या समाकलन हैं यह निम्नतर रूपों को समेटती है और उच्चतर बनाती है।
(भारतीय दर्शन की समीक्षात्म रूपरेखा: राममूर्ति पाठक)
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