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UGC NTA NET JRF Subject Philosophy Solved Previous Papers (In Hindi) Book

UGC NTA NET JRF Subject Philosophy Solved Previous Papers (In Hindi) 2012

1. चित्त और अचित्त ब्रह्म के दो भाग हैं‚ इस विचार को किसने ठीक ठहराया है?
(a) शंकर (b) मध्व
(c) रामानुज (d) जैमिनि
Ans: (c) रामानुज के अनुसार जब चित्‌ और अचित दोनों ब्रह्म का अंश है तब भौतिक विकार का अर्थ हुआ ब्रह्म का विकार। इस तरह ब्रह्म का परिणामी होना सूचित होता है। इसी प्रकार जब जीव ब्रह्म के वास्तविक अंश है। जिस तरह शरीरिक विकारों या त्रुटियों से आत्मा प्रभावित नहीं होता। उसी तरह जगत्‌ के विकारों या त्रुटियों से ईश्वर प्रभावित नहीं होता‚ वह (ईश्वर या ब्रह्म) उन सबसे परे हैं कभी-कभी रामानुज इस विषय को समझने के लिए राजा और प्रजा की उपमा देते हैं। राजा की आज्ञा के पालन या उल्लंघन से प्रजा को जो सुख-दु:ख होता है उसका भागी राजा नहीं होता। स्रोत- भारतयी दर्शन-दत्ता और चटर्जी
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2. एक वध्Eा और उसके धागों के बीच कारणता है
(a) असमवायि (b) समवायि
(c) असमवायि और समवायि दोनों (d) निमित्त
Ans: (b) न्याय दर्शन में तीन प्रकार के कारण माने गये हैं ये है:
1. उपादान कारण
2. असमवायी कारण
3. निमित्त कारण उपादान कारण उस द्रव्य को कहा जाता है जिसके द्वारा कार्य का निर्माण होता है। असमवायी कारण उस गुण या कर्म को कहते है जो उपादान कारण में समवेत रहकर कार्य की उत्पत्ति में सहायक होता है। निमित्त कारण उस कारण को कहा जाता है‚ जो द्रव्य से कार्य उत्पन्न करने में सहायक होता है। समवाय सम्बन्ध के पाँच भेद बताये गये हैं‚ ये हैं- अवयव-अवयवी सम्बन्ध‚ गुण-गुणी –
सम्बन्ध‚ क्रिया-क्रियावन सम्बन्ध‚ सामान्य-विशेष सम्बन्ध और विशेष-नित्य द्रव्य सम्बन्ध मेज तथा उसके अवयवों का सम्बन्ध अवयव-अवयवी सम्बन्ध है‚ फलत: समवाय सम्बन्ध है मेज तथा उसके रंग का सम्बन्ध गुण-गुणी समबन्ध है‚ फलत: समवाय सम्बन्ध इसी प्रकार मेज तथा मेजत्व का सम्बन्ध सामान्य-विशेष सम्बन्ध है अत: यह भी समवाय सम्बन्ध है। स्रोत- भारतीय दर्शन की समीक्षात्मक रूपरेखा- डॉ. राममूर्ति पाठक
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3. आत्मन्‌ और मनस्‌ का सम्बन्ध है।
(a) समवाय (b) संयोग
(c) स्वरूप (d) उपरोक्त में से कोई नहीं
Ans: (b) न्याय दर्शन के अनुसार आत्मा विभु हैं। चेतना आत्मा का आगुन्तुक गुण है अत: मुक्त आत्मा आध्यात्मिक जड़ हैं जबकि न्याय मन को परमाणु मानती है‚ जो नित्य है। लेकिन आत्मा के संयोग से ही सुख-दु:ख का ज्ञान होता है। इस प्रकार आत्मा एवं मन का संबंध संयोग संबंध है। स्रोत- भारतीय दर्शन- दल और चट्‌र्जी
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4. निम्नलिखित में से कौन सा नित्य द्रव्य नहीं है?
(a) आकाश (b) काल
(c) सावयव (d) निरवयव
Ans: (c) द्रव्य नौ प्रकार के होते हैं-
1. पृथ्वी 2. अग्नि 3. वायु 4. जल 5. आकाश 6. दिक्‌ 7. काल 8.
आत्मा 9. मन। इन द्रव्यों में से प्रथम पाँच यानी पृथ्वी‚ जल‚ वायु‚ अग्नि और आकाश को पंचभूत (Five physical elements) कहा जाता है प्रत्येक का एक-एक विशिष्टि गुण होता है पृथ्वी का विशेष गुण ‘गन्ध’ है। जल का विशेष गुण ‘रस’ है। वायु का विशेष गुण ‘स्पर्श’ है। अग्नि का विशेष गुण ‘रूप’ है तथा आकाश का विशेष गुण ‘शब्द’ है। वैशेषिक का कहना है जिस भूत के गुण का ज्ञान जिस इन्द्रिय से होता है वह इन्द्रिय उसी भूत से निर्मित है। वैशेषिक के मतानुसार पृथ्वी‚ जल‚ वायु तथा अग्नि के द्रव्य दो प्रकार के होते हैं- 1. नित्य 2. अनित्य। पृथ्वी जल वायु और अग्नि के परमाणु नित्य है और उनसे बने कार्य द्रव्य अनित्य हैं। आकाश निरवयव है। निरवयव होने के कारण यह उत्पादन और विनाश से परे है। एक होने के कारण यह सामान्य से रहित है। ‘काल’ भी ‘दिक्‌’ की तरह नित्य और सर्वव्यापी है। मन को वैशेषिक ने नित्य माना है मन‚ आकाश‚ काल‚ दिक्‌ आदि से भिन्न है। इस भिन्नता का कारण यह है कि न मन सक्रिय है जबकि आकाश‚ काल‚ दिक्‌ इत्यादि निष्क्रिय है। स्रोत- भारतयी दर्शन की रूप रेखा- प्रो. हरेन्द्र प्रसाद सिन्हा
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5. किस सत्ता का खण्डन नहीं किया गया है?
(a) व्यावहारिक
(b) पारमार्थिक
(c) व्यावहारिक और पारमार्थिक दोनों
(d) न व्यावहारिक और न ही पारमार्थिक
Ans: (b) संशोधित उत्तर-(d) भारतीय दर्शन में ऐसा लगता है कि परमार्थिक सत्ता का खण्डन व्यवहारिक सत्ता से होता है और व्यवहारिक सत्ता का खण्डन परमार्थिक सत्ता से होता है। लेकिन यह सही नहीं है। न ही व्यवहारिक सत्ता का खण्डन सम्भव है और न ही पारमार्थिक सत्ता का खण्डन सम्भव है। बल्कि दोनों सत्ता अपनी-अपनी दृष्टिकोणों से सत्य है।
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6. मन द्वारा वस्तु को प्रसारित किया जाता है‚ इस विचार का पक्षधर कौन है?
(a) देकार्त (b) स्पिनो़जा
(c) लाइबनीत्ज (d) ह्यूम
Ans: (c) इस पूर्व-स्थापित सामञ्जस्य के नियम से लाइबनित्ज ने देहात्मसमस्या का भी समाधान किया है। देह और आत्मा‚ जड़ और चेतन नाम दो विरुद्ध द्रव्य या दो विरुद्ध गुण नहीं है। सुप्त चेतन को ही जड़ कहते हैं‚ अत: इनमें कोई विरोध नहीं। चेतना के अतिरिक्त अन्य कोई सत्ता नहीं। देह के चिदणु-समूह में एक केन्द्रिय चिदणु‚ जो अधिक क्रियाशील और अधिक विकसित चैतन्य होता है‚ ‘आत्मा’ कहलाता है। सारे चिदणु अपने अन्तरंग नियमों के आधार पर विकसित होते रहते है प्रत्येक चिदणु अपने नियम पर चल रहा है। देह के चिदाणु और आत्मा-चिदणु परस्पर निर्भर नहीं है और न इनमें कोई क्रिया प्रतिक्रिया ही हो सकती है और न ये समानान्तर गुण है। इनमें केवल पूर्वस्थापित एकतन्त्रता है। स्रोत: पाश्चात्य दर्शन‚ चन्द्रधर शर्मा
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7. निम्नलिखित कथनों में से ह्यूम के इस कथन के प्रसंग में कि ‘आत्मा एक कल्पित वस्तु’ है‚ सही कथन का चयन कीजिए।
(a) आत्मा अहम्‌ हैं
(b) आत्मा अवास्तविक ‘मैं’ सत्त्व है।
(c) आत्मा इन्द्रिय संस्कारों का साहचार्य मात्रा है।
(d) आत्मा एक साक्ष्य है।
Ans: (c) ह्यूम के अनुसार ह्यूम का उत्तर है कि संवेदना या विज्ञान के अतिरिक्त अन्य किसी का ज्ञान नही हो सकता इसलिए अन्तर्बोध की कल्पना व्यर्थ हैं वस्तुजगत में हम विशेष संवेदनों और विशेष विज्ञानों के आगे नहीं जा सकते और इनके द्वारा न अन्य जीवों का बोध होता है और न ईश्वर का। अत: जीवों की और ईश्वर की कल्पना कोरी कल्पना है‚ वास्तविक तथ्य नहीं। हमें अपनी आत्मा की भी प्रत्यक्ष अनुभूति नहीं होती। जिनकी हमें अनुभूति होती है वे है पृथक-पृथक विशेष और क्षणिक संवेदना या विज्ञान। इस विज्ञानों के किसी नित्य और एक अधिष्ठान की प्रतीति हमें नहीं होती। इन क्षणिक विज्ञानों की धारा निरन्तर वह रही है। इनमें आनन्तर्य तो है‚ किन्तु तादात्म्य और नित्यत्व नहीं। अनुभव कभी नित्य संवेदना या नित्य विज्ञान उपस्थित नहीं करता। अत: नित्य आत्मा का विज्ञान या संवेदन भी हो सकता। स्रोत- पाश्चात्य दर्शन चन्द्रधर शर्मा
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8. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित करें और प्रदत्त
कूट से सही क्रम का चयन कीजिए:
सूची I सूची II
(दार्शनिक) (सिद्धान्त)
(A) स्पिनो़जा (i) ईश्वर के प्रति बौद्धिक प्रेम
(B) लाइबनित्ज (ii) अचालित संचालक
(C) अरस्तू (iii) संप्रत्यक्ष की अतीन्द्रिय एकता
(D) कांट (iv) पूर्व स्थापित सामंजस्य
कूट:
(A) (B) (C) (D)
(a) (i) (iv) (ii) (iii)
(b) (ii) (i) (iii) (iv)
(c) (iii) (ii) (i) (iv)
(d) (iv) (iii) (ii) (i)
Ans: (a) स्पिनोजा – ईश्वर के प्रति बौद्धिक प्रेम लाइबनित्ज – पूर्व स्थापित सामंजस्य अरस्तू – अचालित संचालक कांट – संप्रत्यय की अतीन्द्रिय एकता दोत पाश्चात्य दर्शन का इतिहास‚ डॉ. दयाकृष्ण
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9. शंकर के आत्मा के दर्शन का आधार है
(a) द्वैतवाद (b) अद्वैतवाद
(c) अर्ह एकत्ववाद (d) बहुत्त्ववाद
Ans: (b) शंकर का मत विशुद्ध अद्वैतवाद है उनके अनुसार एक विषय का दूसरे विषय में भेद‚ ज्ञाता-ज्ञेय का भेद तथा जीव और ईश्वर का भेद‚ ये सब माया की सृष्टि है। उनका विचार है कि वस्तुत: एक ही तत्व है। आत्मा और परमात्मा वस्तुत: एक है वह स्वत: प्रकाश‚ अनंत चैतन्य स्वरूप है। अनंत आत्मा वस्तुत:
जीवात्मा की तरह भासित होता है‚ उसका कारण है अविद्याजनित शरीर के साथ संबंध है।
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10. निम्नलिखित कारणों में से कौन सा अरस्तू के दर्शन से सम्बन्धित नहीं है?
(a) आवश्यक (b) आकारिक
(c) भौतिक (d) निमित्त
Ans: (a) अरस्तू ने चार कारण स्वीाकर किये है।
1. उपादान कारण
2. निमित्त कारण
3. आकारिक कारण
4. प्रोयोजन मूलक कारण अत: अरस्तू ने बाद में दो ही कारण स्वीकार किया
1. निमित्त कारण (Form)
2. भौतिक कारण (matter)
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11. बौद्धों के अनुसार प्रमा है
(a) अजन्ता तत्त्वार्थ ज्ञान (b) तद्‌वती ततप्रकारकम्‌ ज्ञानम्‌
(c) समयक्‌ ज्ञानम्‌ (d) उपरोक्त में से कोई नहीं
Ans: (*) उत्तर सही नहीं दिया गया है। बाद में हटा दिया गया। बौद्धों के अनुसार परिवर्तन ही सत्‌ है इसलिए कहा गया है। सर्वम्‌ अनित्यम्‌ सर्वम्‌ अनात्मन निर्माणम्‌ शान्तम्‌ यह त्रिसूत्री शिक्षा बौद्धदर्शन का आधार स्तम्भ है।
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12. सूची – I को सूची – II के साथ सुमेलित कीजिए और प्रदत्त कूट से सही क्रम का चयन कीजिए:
सूची I सूची II
(A) अख्याति (i) न्याय
(B) अनिर्वचनीय ख्याति (ii) कुमारिल
(C) विपरीत ख्याति (iii) प्रभाकर
(D) अन्यथा ख्याति (iv) अद्वैत वेदान्त
कूट:
(A) (B) (C) (D)
(a) (i) (ii) (iii) (iv)
(b) (iii) (iv) (ii) (i)
(c) (i) (iii) (ii) (iv)
(d) (ii) (i) (iii) (iv)
Ans: (b) अख्याति – प्रभाकर अनिर्वचनीय ख्याति – अद्वैत वेदान्त विपरीत ख्याति – कुमारिल अन्यथा ख्याति – न्याय
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13. उस कूट का चयन कीजिए जो सुमेलित नहीं है:
(a) उपमान‚ भूयोदर्शन‚ विवरण
(b) व्याकरण‚ कोश‚ विवरण
(c) कोश‚ आप्तवाक्य‚ वाक्यशेष
(d) व्याकरण‚ कोश‚ आप्तवाक्य
Ans: (a) सभी शब्द में निहत अर्थ के स्पष्टीकरण का साधन है‚ इसे शक्तिग्रहोपाय भी कहते हैं। यह सात है- 1. उपमान‚ 2.
व्याकरण‚ 3. कोश‚ 4. आप्तवाक्य‚ 5. वाक्यशेष 6. विवरण‚ 7.
सिद्धपद सन्निध्य। इसमे से भूयोदर्शन‚ चार्वाक के दर्शन को कहा जाता है। यह भौतिकवादी है।
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14. निम्नलिखित में से अनविताभिधानावादिन कौन है?
(a) गौतम (b) शंकर
(c) प्रभाकर (d) कुमारिल
Ans: (c) मीमांसा दर्शन में शब्दार्थ संबंध के दो सिद्धान्त प्रचलित है। पहला – कुमारिल भट्ट का अभिनाविधानवाद (अभिहितान्वयवाद) दूसरा – प्रभाकर का – अनविताभिधानावादिन (अन्विताभिधानवाद) है। तात्यर्यवाद नैयायिक जयन्तभट्ट का मत है।
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15. निम्नलिखित में से किसका यह विश्वास है कि ज्ञान की कारण सामग्री वैधता की कारण सामग्री भी है?
(a) गौतम (b) कनाड़
(c) कुमारिल (d) नागार्जुन
Ans: (c) मीमांसा के अनुसार प्रामाण्य स्वत: है‚ परन्तु अप्रामाण्य परत: है। इसका तात्पर्य यह है कि जिन कारणों से ज्ञान उत्पन्न होता है उन्ही कारणों से ज्ञान के प्रामाण्य की भी उत्पत्ति होती है। अत:
प्रामाण्य स्वतोग्राह्य है‚ परन्तु जिन कारणों से ज्ञान उत्पन्न होता है उन्ही कारणों से ज्ञान का अप्रामाण्य नहीं उत्पन्न होता है। इसके लिए अन्य कारणों की अपेक्षा होती है इसलिए अप्रामाण्य परतोग्राह्य है।
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16. प्रमा का शाब्दिक अर्थ है‚ वह अनुभव जो है
(a) वास्तविक (b) अवास्तविक
(c) संशयपूर्ण (d) उपरोक्त सभी
Ans: (a) यथार्थज्ञान को भारतीय दर्शन में प्रमा कहते हैं। यर्थाथ अनुभव ही प्रमा है। स्मृतिभिन्न ज्ञान को अनुभव कहते हैं। अनुभव दो प्रकार का होता है- यथार्थ और अयथार्थ। किसी वस्तु को जो वह है‚ उसी रूप में ज्ञान यथार्थ अनुभव है और किसी वस्तु का जो वह नहीं है उस रूप में ज्ञान अयथार्थ अनुभव है। प्रमा चार प्रकार की होती है- प्रत्यक्ष‚ अनुमिति‚ उपमिति‚ और शब्द ज्ञान। यह चार प्रमाणों से उत्पन्न होती है जिन्हे क्रमश: प्रत्यक्ष‚ अनुमान‚ श्ब्द तथा उपमान प्रमाण कहते है। स्रोत- डॉ.सी.डी. शर्मा
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17. न्याय दर्शन में ‘हेतु’ और साध्य के बीच अभेद्य सम्बन्ध को कहते हैं।
(a) परामर्श (b) अनुमान
(c) व्याप्ति (d) तुलना
Ans: (c) न्याय दर्शन के अनुसार अनुमान एक प्रमाण है। व्यापि अनुमान का ‘प्राण’ नाड़ी (Nerve) है जिसके अभाव में अनुमान सम्भव नहीं है। वस्तुत: व्याप्ति ही अनुमान प्रमाण से प्राप्त ज्ञान
(अनुमिति) की प्रमाणिकता का निर्णायक हैं व्याप्ति का अर्थ है- हेतु और साध्य का व्यापक संबंध। यह हेतु और साध्य का अनौपाधिक नियत साहचर्य संबंध है जैसे‚ जहाँ धुँआ होता है वहाँ आग होती हैयह एक व्याप्तिवाक्य है और धुएं (हेतु) और आग (साध्य) के नियत साहचर्य-संबंध का कथन करता है।
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18. न्यायदर्शन में किसी नाम और किसी वस्तु के बीच सम्बन्ध का ज्ञान कहलाता है
(a) प्रत्यक्ष ज्ञान (b) अनुमान
(c) तुलना (d) प्रमाण
Ans: (c) न्याय दर्शन का चरम उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करना है। मोक्ष की अनुभूति तत्व-ज्ञान अर्थात वस्तुओं के वास्तविक स्वरूप को जानने से हो सकती है। न्याय दर्शन में सोलह पदार्थों की व्याख्या की गयी है। जो निम्न है- प्रमाण‚ प्रमेय‚ प्रमाता‚ संशय‚ प्रयोजन‚ दृष्टन्त‚ सिद्धान्त‚ अवयव‚ तर्क‚ निर्णयवाद‚ जल्प‚ वितण्डा‚ हेत्वाभास‚ हल‚ जाति‚ निग्रह-स्थान। स्रोत- प्रो. हरेन्द्र प्रसाद सिन्हा
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19. शंकर के अनुसार मिथ्या ज्ञान है
(a) ब्रह्मण (b) आत्मन
(c) जीव (d) माया
Ans: (d) मायावाद केवल अद्वैत वेदान्त का सिद्धान्त है इन्होने महत्वपूर्ण ग्रन्थ ‘ब्रहमसूत्र भाष्य’ की शुरूआत ही अध्यास भाष्य से किया है आचार्य के दर्शन में माया शब्द का प्रयोग मुख्यत: दो अर्थो में किया गया है-
1. यह ब्रह्म तक पहुचने का एक सोपान है।
2. ब्रह्म के एकत्व एवं जगत के नानात्व में संबंध माया के द्वारा ही संभव है। यद्यपि आचार्य शंकर माया‚ अविद्या‚ भ्रम‚ अध्यास‚ अनिर्वचनीय ख्याति आदि में कोई भेद नहीं करते है। स्रोत- डॉ. चन्द्रधर शर्मा
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20. किसी भ्रम के कारण किसी वस्तु पर दूसरी का आरोपित करना कहलाता है
(a) आत्मख्यातिवाद्‌ (b) अन्यथाख्यातिवाद्‌
(c) अख्यातिवाद्‌ (d) असतख्यातिवाद्‌
Ans: (b) किसी वस्तु पर दूसरे वस्तु जो यहाँ नहीं है कही और है
(स्मृति आदि है) का आरोपण ही अन्यथाख्यातिवाद है। आत्मख्यातिवाद – नागार्जुन का है। अख्यातिवाद – प्रभाकर की मीमांसा है। असतख्यातिवाद – कुमारिल की मीमांसा है। दोत- राममूर्ति पाठक
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21. भारतीय दर्शन के अनुसार ख्याति का अर्थ है
(a) भ्रम का सिद्धान्त (b) सत्य का सिद्धान्त
(c) असत्यता का सिद्धान्त (d) उपरोक्त में से कोई नहीं
Ans: (a) भारतीय दर्शन में ख्यातिवाद को भ्रम का सिद्धान्त कहते है। सभी भारतीय सम्प्रदाय अपनी-अपनी मान्यता के अनुसार भ्रम
(ख्यातिवाद) की व्याख्या करते है। सत्ख्यातिवाद – रामानुज अख्यातिवाद – प्रभाकर मीमांसा विपरीत ख्यातिवाद – कुमारिल भट्‌ट अन्यथाख्यातिवाद – न्याय – वैशेषिक दर्शन आत्मख्यातिवाद – नागार्जुन (माध्यामिकवादी) (बौद्ध दर्शन) असत्खतिवाद – विज्ञानवादी (बौद्ध दर्शन) अनिवर्चनीय ख्यातिवाद – शंकराचार्य (अद्वैतवादी) सद्‌ासत्‌ख्यातिवाद – सांख्या एवं योग दर्शन।
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22. बौद्व ज्ञान-मीमांस में सविकल्प प्रत्यक्ष है
(a) कभी-कभी वैध (b) सदैव वैध
(c) किसी प्रकार वैध नहीं (d) अनिर्धार्य
Ans: (c) बौद्ध दर्शन प्रमाण व्यवस्था को स्वीकार करता है इसके अनुसार प्रमेय दो है- स्वलक्षण और सामान्य। पहला प्रत्यक्ष का विषय है तो दूसरा अनुमान का। इन दोनों क्षेत्र पूर्णत: पृथक है‚ जो स्वलक्षण है‚ वह सामान्य नहीं हो सकता तथा जो सामान्य है‚ वह स्वलक्षण नही हो सकता। एक के क्षेत्र में दूसरे का प्रवेश पूर्णत:
वर्जित या निषिद्ध है। यही प्रमाण व्यवस्था है। स्रोत- प्रमाण- परिचय – डॉ. बी. एस. सिंह पृष्ठ
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23. व्यापित को ठीक तरह से इस प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है
(a) नियत साहचर्य (b) कारणात्मक सम्बन्ध
(c) क्रम (d) उपरोक्त में से कोई नहीं
Ans: (a) व्यापित और व्यापक का संबंध व्यक्ति हैं इसे स्वभाविक संबंध‚ हेतु और साध्य का नियतसाहचर्य संबंध या अविनाभाव नियम भी कहते हैं। व्यापित अनुमान का प्राण है क्योंकि उपाधिरहित
(अनौपाधिक) नियत साहचर्य संबंध है। जैसे जहाँ धुआ होगा वहॉ आग अवश्य होगा‚ लेकिन यह सम्भव है कि किसी स्थल पर आग हो‚ किन्तु धुऑ न हो। जैसे आग का गोला‚ अत: नियत सहचर्य संबंध ही व्याप्ति है। स्रोत- राममूर्ति पाठक।
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24. न्याय के अनुसार कारण की अनुमिती है
(a) पक्षधर्मता ज्ञान (b) भूयोदर्शन
(c) व्याप्ति ज्ञान (d) सादृश्य ज्ञान
Ans: (c) अनुमान के लिए दो शर्ते आवश्यक हैं।
1. हेतु एवं साध्य के बीच अनिवार्यता का ज्ञान पहले से हो।
2. पुन: हेतु का दर्शन हो। अनुमान का प्राण व्याप्ति है। दो घटनाओं के बीच नियत एवं अनिवार्य सम्बन्ध को व्याप्ति कहते हैं। यह हेतु एवं साध्य के बीच का अनिवार्य ज्ञान देता है। जो कारण से कार्य का अनुमान करता है तथा कार्य से कारण का ज्ञान भी करवाता है। स्रोत- चन्द्रधर शर्मा।
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25. नाद शाश्वत है क्योंकि इसमं नादत्व है जो उदाहरण है
(a) विरुद्ध हेत्वाभाषा (b) स्वभिकार हेत्वाभाषा
(c) एक वैध अनुमान (d) असिद्ध हेत्वाभाषा
Ans: (b) हेत्वाभासा अर्थात हेतु के आभास को हेत्वाभास कहते हैं। सत्यभिचार जिसे अनैकांतिक भी कहते है। हेतु केवल सपक्ष एवं पक्ष में होना चाहिए परन्तु यहाँ पर हेतु पक्ष‚ सपक्ष‚ विपक्ष सभी जगह व्याप्त होता है।
1. साधारण‚ जिसमें हेतु पक्ष‚ सपक्ष एवं विपक्ष तीनों में ही होता है। अत: यहाँ पर अतिव्याप्य दोष हो जाता है। जैसे- पर्वत प्रमेय होने के कारण वहिनमान है।
2. असाधरणतया यहाँ पर हेतु केवल पक्ष में होता है‚ न सपक्ष में न विपक्ष में अत: यहाँ पर अव्याप्त दोष है जैसे शब्द शब्दत्व के कारण नित्य है।
3. अनुपसंहारी-यहाँ हेतु इतना व्यापक होता है कि अन्वय एवं व्यतिरेक के लिए कोई स्थान नहीं छोड़ता जैसे सभी प्रमेय होने के कारण अनित्य है। प्रमेय (object) स्रोत- भारतीय दर्शन की रूपरेखा- रामामूर्ति पाठक
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26. जैन नीतिशास्त्र में समयक्‌ दर्शन का अर्थ है
(a) सम्यक्‌ प्रत्यक्ष
(b) सत्यानुभूति
(c) तीर्थङ्‌करों के ज्ञान का सम्मान करना
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं
Ans: (c) सम्यक्‌ दर्शन-जैन दर्शन ज्ञान के लिए ‘आस्था’ पर बल देता है। जैन दर्शन‚ धर्म एवं इसके तीर्थकरों के उपदेशों में दृढ़ विश्वास सम्यक्‌ दर्शन है। इसकी आवश्यकता संशय के निवारण के लिए होती है। सम्यक्‌ दर्शन का उदय दर्शनावरणीय कर्मों के विनाश से होता है। उल्लेखनीय है कि सम्यक्‌ दर्शन अन्धविश्वास नहीं है। जैन दार्शनिक मणिभद्र का कथन है कि न महावीर के प्रति मेरा पक्षपात है और न कपिल आदि अन्य दार्शनिकों के प्रति द्वेष है मैं केवल तर्कसंगत वचन को स्वीकार करता हूँ वह चाहे जिस किसी का हो। इस प्रकार जैन में सम्यक्‌ दर्शन बौद्धिक श्रद्धा है जो सम्यक्‌ ज्ञान के लिए आवश्यक है। स्रोत- भारतीय दर्शन की समीक्षात्मक रूपरेखा राममूर्ति पाठक
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27. सूची – I को सूची – II के साथ सुमेलित कीजिए एवं सही सुमेलित कूट का चयन कीजिए:
सूची I सूची II
(A) ब्राह्मण (i) शैक्षणिक कार्य
(B) क्षत्रिय (ii) देश के लिए संघर्ष करना
(C) वैश्य (iii) अन्य वर्गों की सेवा करना
(D) शूद्र (iv) व्यवसाय
कूट:
(A) (B) (C) (D)
(a) (i) (ii) (iii) (iv)
(b) (ii) (i) (iii) (iv)
(c) (i) (ii) (iv) (iii)
(d) (i) (iii) (ii) (iv)
Ans: (c) ब्राह्मण – शैक्षणिक कार्य क्षत्रिय – देश के लिए संघर्ष करना वैश्य – व्यवसाय शूद्र – अन्य वर्गों की सेवा करना
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28. पुरुषार्थ के चार प्रकारों का सही क्रम क्या है?
(a) अर्थ‚ काम‚ धर्म‚ मोक्ष (b) कम‚ अर्थ‚ धर्म‚ मोक्ष
(c) धर्म‚ अर्थ‚ काम‚ मोक्ष (d) मोक्ष‚ धर्म‚ अर्थ‚ काम
Ans: (c) बैदिक काल में पुरूषार्थों का उदय हो चुका था‚ किन्तु उस समय केवल अर्थ‚ धर्म‚ एवं काम की ही प्रधानता रही मोक्ष को अधिक महत्व नहीं दिया गया। उपनिषदों में चारों पुरुषार्थ क्रमश:
धर्म‚ अर्थ‚ काम‚ मोक्ष‚ में मोक्ष को अधिक प्रमुखता दी गयी। उपनिषद्‌कारों ने ‘मोक्ष’ का ही अन्तिम ध्येय माना तथा धर्म‚ अर्थ‚ काम को उसका साधन स्वीाकर किया। स्रोत- प्रो. हरेन्द्र प्रसाद सिन्हा।
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29. आश्रम धर्म का सही क्रम है
(a) गृहस्थ‚ वानप्रस्थ‚ ब्रह्मचर्य‚ संन्यास
(b) वानप्रस्थ‚ गृहस्थ‚ ब्रह्मचर्य‚ संन्यास
(c) ब्रह्मचर्य‚ गृहस्थ‚ वानप्रस्थ‚ संन्यास
(d) ब्रह्मचर्य‚ वानप्रस्थ‚ संन्यास‚ गृहस्थ
Ans: (c) ऋग्वैदिक काल में ही वर्णाश्रम-धर्म प्रचलन में था। चार वर्णाश्रम हैं-
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1. ब्रह्मचर्याश्रम- 25 वर्ष तक‚ ऋषि के साथ रहकर शिक्षाग्रहण करना‚ इसमें मनुष्य के सम्पूर्ण शारीरिक एवं मानसिक विकास होता है।
2. गृहस्थ आश्रम – 25 से 50 तक‚ उचित उपायों द्वारा धनोपार्जन तथा संयमित सुख-भोग काल होता है।
3. वानप्रस्थ आश्रम – 50 से 75 वर्ष तक इस काल में समाज संग तथा योग आदि क्रिय करके अंतिम आश्रम के लिए तैयार होना।
4. संन्यास आश्रम – 75 से 100 वर्ष तक अपनी अध्यात्मिक उन्नति एवं मुक्ति के लिए प्रयास। स्रोत- डॉ. सी. डी. शर्मा
30. ब्रह्म विहार की अवधारणा निम्नलिखित में किसमें उल्लेखित है?
(a) अद्वैत वेदान्त
(b) द्वैत वेदान्त
(c) द्वैत एवं अद्वैत वेदान्त दोनों में
(d) बौद्ध मत
Ans: (d) बौद्ध दर्शन के महायान सम्प्रदाय से संबंधित मोक्ष
(निर्वाण) की आवधारणा है जो मानता है कि निर्वाण प्राप्त व्यक्ति ब्रह्मविहार‚ मैत्री‚ करुणा‚ मुदिता उपेक्षा से सम्पुष्टि होता है। वह हीनयानियों के स्वकल्याण (स्वमुक्ति) के विपरीत सर्वकल्याण
(सार्वभौमिक मुक्ति) की कामना करता हैं स्रोत- भारतीय दर्शन की रूपरेखा- प्रो. हरेन्द्र प्रसाद सिन्हा
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31. निम्नलिखित में से उस समूह को चुनिए जिसमें कांट की नैतिकता के तीन मूल सिद्धान्त हैं:
(a) स्वतन्त्रता‚ संकल्प और अन्त:प्रज्ञा
(b) स्वतन्त्रता‚ ईश्वर और अमरता
(c) स्वतन्त्रता‚ ज्ञान और संवेग
(d) आवश्यकता‚ वर्गणा और संवेदन शक्ति
Ans: (b) कांट का कथन है कि ‘‘आस्था को स्थान प्रदान करने के लिए मैने (अतीन्द्रिय) ज्ञान का निषेध आवश्यक समझा’’ का वस्तुत: यही अर्थ है- हठवादी तत्व-मीमांसा का यह अभिमान कि वह अतीन्द्रिय को भी जान सकती है‚ नैतिकता को असुरक्षित बना देता है इसलिए ज्ञान का निषेध करके कांट प्राकृतिक ज्ञान के आगे एक ‘रिक्त स्थान’ छोड़ देता है और वह ‘रिक्त स्थान’ व्यवहारिक बुद्धि के नियमों का कार्य स्थल है। व्यावहारिक बुद्धि की यह माँग है कि वह ‘रिक्त स्थान’ स्वतंत्रता‚ ईश्वर तथा अमरता के विश्वास से पूरित हो‚ क्योंकि इनके अभाव में नैतिक जीवन असंभव हो जाएगा। स्रोत- कांट का दर्शन सभाजीत मिश्र।
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32. दर्शन की योग विचारधारा के अनुसार घृणा और आसक्ति का सम्बन्ध है
(a) क्लेश (b) चित्तभूमि
(c) यम (d) नियम
Ans: (a) योग दर्शन में पॉच प्रकार के क्लेश माने गये है अविधा‚ अस्मिता‚ राग द्वेष एवं अभिनिवेश। इन क्लेशों के कारण सत्व‚ रजस एवं तमस्‌ गुणों में परिणाम उत्पन्न होते रहते हैं। ये गुण अन्योन्याश्रित है अविद्या से राग आदि की उत्पत्ति होती है और राग आदि से अविद्या की। इस प्रकार ये पारस्परिक सहयोग से जीव के कर्मविपाक को उत्पन्न करते है। इनमें अविद्या सर्वाधिक महत्वपूर्ण है‚ क्योंकि उसी से अन्य क्लेशों की उत्पत्ति होती है। स्रोत- भारतीय दर्शन की समीक्षात्मक रूपरेखा- राममूर्ति पाठक
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33. चार्वाक द्वारा किस नैतिक मापदण्ड को चुना गया?
(a) अन्त; प्रज्ञात्मक (b) तर्कबुद्धि वादात्मक
(c) सुखवादात्मक (d) आत्मपूर्णतावाद
Ans: (c) प्रत्यक्ष के क्षेत्र के बाहर किसी भी वस्तु को यथार्थ नहीं मानने के फलस्वरूप चार्वाक को प्रत्यक्षवादी (Positivist) कहा जाता है। सुख अथवा काम को जीवन का अन्तिम ध्येय मानने के कारण चार्वाक को सुखवादी (Hedonist) कहा जाता हैं। स्रोत- प्रो. हारेन्द्र प्रसाद सिन्हा।
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34. एक व्यक्ति जो सुख की प्राप्ति चाहता है‚ परन्तु इसमें असफल रहता है तो उस व्यक्ति को किस प्रकार के विरोधाभास का सामना करना है?
(a) आत्मपूर्णतावाद (b) सुखवाद
(c) निग्रहवाद (d) परार्थवाद
Ans: (b) मनुष्य वास्तव में सुख की नहीं अपितु उन वस्तुओं की इच्छा करता है जिनसे उसे सुख प्राप्त होता है अथवा हो सकता है उदाहरणार्थ भूखा होने पर मनुष्य मूलत: भोजन की इच्छा करता है उससे प्राप्त होने वाले सुख की नहीं। इसलिए सिजविक के उपयोगितावाद को बौद्धिक उपयोगितावाद कहा जाता है अनेक विचारकों ने उसे अंत: प्रज्ञात्मक ‘उपयोगितावाद’ की संज्ञा दी है। सिजविक के अनुसार सुख प्राप्त करने के लिए कर्म करते समय सुख को भूल जाना आवश्यक होता है। इसे ही ‘सुख का विरोधाभास’ कहा जाता है। स्रोत- वेद प्रकाश वर्मा
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35. उस कूट को चुनिए जिसमें दण्ड के दो सिद्धन्त हैं।
(a) प्रतिक्रियात्मक एवं पुनराश्वासनता
(b) प्रतिशोधात्मक एवं सुधारात्मक
(c) निषेधात्मक एवं प्रतिक्रियात्मक
(d) पुनराश्वासनता एवं प्रतिशोधात्मक
Ans: (b) दण्ड के तीन सिद्धान्त है।
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1. प्रतिशोधात्मक सिद्धानत – जिसमें आँख के बदले आँख और दॉत के बदले दॉत का दण्ड दिया जता है। इसे प्रतिफलात्मक सिद्धान्त भी कहता है।
2. प्रतिक्रियात्मक सिद्धान्त- इसमें दण्ड भेड चुराने के लिए नहीं बल्कि भेड़ की चोरी फिर से न हो इसलिए समाज में दण्ड का भय व्याप्त रहे।
3. सुधारात्मक सिद्धान्त – दण्ड इसलिए दिया जाता है कि व्यक्ति का सुधार हो। इसमें मृत्यु दण्ड नहीं दिया जाता है। व्यक्ति को सुधारने के लिए दण्ड दिया जाता है।
36. निम्नलिखित में से किसने ‘सती प्रथा’ का विरोध करके महिलाओं के उद्धार के लिए कार्य किया?
(a) दयानन्द सरस्वती (b) राजा राम मोहन राय
(c) महात्मा गांधी (d) वल्लभ भाई पटेल
Ans: (b) सतीप्रथा से मुक्ति दिलाने वाले‚ ब्रह्म समाज की स्थापना करने वाले राजा राम मोहन राय थे। जिन्हे आधुनिक समाज का जनक भी कहा जाता है। भारतीय समाज में एक कुप्रथा प्रचलित थी जिसमें किसी भी महिला के पति की मृत्यु होने उस महिला को चिता में जला दिया जाता था जिसे सतीप्रथा कहा जाता है। लेकिन सतीप्रथा का वास्तविक अर्थ था कि पति के वियोग से स्त्री के शरीर का ताप इतना अधिक हो जाता था कि शरीर जल जाया करता था उसे सती कहा गया लेकिन बाद में महिलाओं को जबरन चिता पर सती किया जाने लगा। इसी का विरोध सर्वप्रथम राजा राममोहन राय ने किया था।
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37. कॉन्ट ने नैतिक सिद्धान्तों का उल्लेख किसमें किया है?
(a) द क्रिटिक ऑफ प्योर री़जन
(b) द क्रिटिक ऑफ प्रैक्टिकल री़जन
(c) रिली़जन विद-इन द लिमिट्‌स ऑफ री़जन
(d) इनमें से कोई नहीं
Ans: (b)
1. द क्रिटिक ऑफ प्योर रीजन यह कांट की पुस्तक है इसमें बुद्धि के द्वारा ज्ञान प्राप्त करने के मापदण्डों का उल्लेख किया गया है जो एक ज्ञानमिमांसी पुस्तक है।
2. द क्रिटिक ऑफ पै्रक्टिकल रीजन यह भी कांट की पुस्तक हैं इसमें नैतिक सिद्धान्तों का उल्लेख किया गया है। इसी में कांट ने नैतिकता की पूर्व तीन मान्यताए स्वतंत्रता‚ ईश्वर‚ अस्तित्व एवं आत्मा की अमरता को स्वीकार्य किया है।
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38. निम्नलिखित में से रिक्त स्थान की पूर्ति करें:
अन्त: प्रज्ञावाद‚ अन्त:प्रज्ञात्मता ………….. है।
(a) के समकक्ष (b) के समान
(c) से भिन्न (d) इनमें से कोई नहीं
Ans: (c) अन्त: प्रज्ञावाद का समर्थन 17वीं शताब्दी के दार्शनिकों ने किया। कडवर्थ‚ क्लार्क‚ बोलस्टन‚ रीड‚ प्राइस‚ शेफ्टसबरी‚ मार्टिन्यू‚ बटलर‚ जी.ई.मूर‚ प्रिचर्ड‚ रॉस आदि क नाम उल्लेखनीय हैं अन्त: प्रज्ञावादी यह मानते है कि हमें अपनी अन्त: प्रज्ञाद्वारा इस बात का साक्षात्‌ ज्ञान हो जाता है कि कौन-सा कर्म अथवा नियम नैतिक दृष्टि से उचित या अनुचित है। अन्त: प्रज्ञात्मक साक्षात्‌ ज्ञान की सीमा के सम्बन्ध में अन्त: प्रज्ञावादियों में मतभेद है। कुछ अन्त:प्रज्ञावादइी अन्त प्रज्ञा को बौद्धिक ही मानते है कुछ अन्त: प्रज्ञा को मुख्यता भावनात्मक मानते हैं। स्रोत- वेद प्रकाश वर्मा
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39. निरपेक्ष आदेश निर्देशित करता है……..
(a) सोपाधिक
(b) निरुपाधिक
(c) उपर्युक्त (a) और (b) दोनों नहीं
(d) उपर्युक्त (a) और (b) दोनों
Ans: (b) इस भांति आचरण करो कि तुम्हारी इच्छा का नियम उसी समय सार्वभौम आदेश की स्थापना करने वाले सिद्धान्त बन सके। नैतिकता का आदेश ऐसा आदेश है जे कि विवेकयुक्त इच्छा रखने वाले मनुष्यों के आचरण को निश्चित रूप से नियन्त्रित करता है। यह आदेश किन्ही परिणामों को प्राप्त करने के उद्देश्य से नहीं दिया जाता; यह हमारी इच्छा को प्रागनुभविक रूप से तथा हमारे कार्यों के नियमों के आकार को निर्धारित करता है। कांट का यही निरपेक्ष आदेश है। स्रोत- कांट का दर्शन- समाजीत मिश्र
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40. निम्नलिखित में से कौन सी पद्धति नैतिकता के आधार स्वरूप ईश्वर मीमांसा‚ सुख या व्यावहारिक परिणामों को नहीं मानती है?
(a) वास्तववाद (b) अन्त: प्रज्ञावाद
(c) समीक्षात्मक आदर्शवाद (d) उपयोगितावाद
Ans: (c) काण्ट को समीक्षात्मक आदर्शवादी कहा जाता है क्योंकि काण्ट किसी कर्म के परिणाम के आधार पर उचित-अनुचित या शुभ-अशुभ नहीं मानता है वह कर्म के स्वयं किये जाने योग्य मानता है वह कहता है वही कर्म नैतिक रूप से उचित है जो कर्त्तव्य प्रेरणा से किया गया हो। कर्त्तव्य के लिए कर्त्तव्य का सिद्धान्त देता है। स्रोत- नीतिशास्त्र का सर्वेक्षण-संगम लाल पण्डेय।
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41. न्याय युक्ति की आकृति का निर्धारण किसकी स्थिति से होता है?
(a) मुख्य पद (b) मध्यम्‌ पद
(c) गौण पद (d) युग्मक
Ans: (b) मध्यम पद दोनों आधार वाक्यों में होता है और माध्यम पद की स्थिति से ही न्यायवाक्य की आकृति का पता लगया जाता है कुल 4 प्रकार की आकृतियां होती है। प्रथाम आकृति
म. वि.
उ. म.
उ. वि.
द्वितीय आकृति वि. म.
उ. म.
उ. वि.
ततृी य आकृति
म. वि.
म. उ.
उ. वि.
चतुर्थ आकृति वि. म.
म. उ.
उ. वि.
स्रोत- तर्कशास्त्र एक परिचय कोपी कोहेन
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42. वैध न्याय युक्ति में ‘मध्य पद’ अनिवर्यत: व्याप्त रहता है
(a) मुख्य आधारवाक्य (b) गौण आधारवाक्य
(c) किसी भी एक आधारवाक्य में (d) निष्कर्ष वाक्य
Ans: (c) किसी भी वैध मानक निरपेक्ष न्यायवाय में मध्यम पद कम से कम एक एक आधार वाक्य में अवश्य प्राप्त होना चाहिए। अन्यथा अव्याप्त मध्यम पद दोष होगा। स्रोत- तर्कशास्त्र एक परिचय- कोपी कोहेन
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43. सत्य और असत्य अभिलक्षित करते हैं
(a) प्रतिज्ञप्ति (b) युक्तियाँ
(c) (a) और (b) दोनों (d) न (a) और न ही(b)
Ans: (a) तर्कशास्त्र में सत्यता (Truth) एवं असत्यता (Falsity) का प्रयोग कर्तवक्यों (Propositions) के लिए किया जाता है। सत्यता‚ असत्यता तर्कवाक्यों के गुण है। तर्क वाक्य सत्य या असत्य हो सकते है। इसी प्रकार युक्ति के भी अपने विशिष्ट गुण है। युक्ति के लिए वैधता (Validity) एवं अवैधता (Invalidity) का प्रयोग किया जाता हैं। वैधता‚ अवैधता‚ निगमनात्मक युक्तियों की विशेषताए है। जो युक्तियाँ तर्कवाक्य का ढाँचा होती है वे युक्तियां तर्कवाक्यों के सत्य या असत्य होने के अनुसार वैध या अवैध नहीं होती हैं। यदि सभी तर्कवाक्य सत्य हो तो यह निश्चित नहीं करता कि युक्ति भी वैध होगी क्योंकि असत्य तर्कवाक्यों से बनी युक्ति भी वैध हो सकती है और सत्य तर्कवाक्य से बनी युक्ति भी वैध हो सकती है। स्रोत- तर्कशास्त्र के सिद्धान्त अविनाश तिवारी
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44. सार्वभौमिक नकारात्मक प्रतिज्ञप्तियों में निम्नलिखित में से कौन सा/से पद व्याप्त होते हैं?
(a) उद्देश्य पर
(b) विधेय का पद
(c) न उद्देश्य और न ही विधेय पद
(d) कर्त्ता और विधेय पर दोनों
Ans: (d) 1. सभी दार्शिनिक चिन्तनशील प्राणी हैं। विन्ध्यात्मक सर्वव्यापी ‘A’
2. कोई दार्शनिक चिन्तनशील प्राणी नहीं हैं निषेधात्मक सर्वव्यापी ‘E’
3. कुछ दर्शिनिक चिन्तनशील प्राणी है। विन्धात्मक अंश व्यापी ‘I’
4. कुछ दार्शीनिक चिन्तनशील प्राणी नहीं है। निषेधात्मक अंश व्यापी ‘O’ A तर्कवाक्य का उद्देश्य पद व्याप्त होता है और विधेय अव्यापत रहता है ‘E’ तर्कवाक्य का उद्देश्य एवं विधेय दोनों पद व्याप्त होता है। ‘I’ तर्कवाक्य में कोई पद व्याप्त नहीं होता तथा ‘O’ तर्कवाक्य का उद्देश्य अव्याप्त होता है‚ जबकि विधेय पद व्याप्त होता हैं। स्रोत- दर्शन पुज विनोद तिवारी
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45. निम्नलिखित युग्मों से कौन सा युग्म E और O प्रतिज्ञप्ति को इंगित करता है?
(a) कोई भी मनुष्य अच्छा नही है; कुछ मनुष्य अच्छे नहीं हैं।
(b) सभी मनुष्य अच्छे हैं; कुछ मनुष्य अच्छे हैं।
(c) सभी मनुष्य अच्छे हैं; कोई मनुष्य अच्छा नहीं है।
(d) कुछ मनुष्य अच्छे हैं; कुछ मनुष्य अच्छे नहीं हैं।
Ans: (a) निरूपधिक तर्क वाक्य प्राय: वर्गो (classes) के बारे में कथन होते है। इसमें तर्क वाक्य के वर्गों के बीच विभिन्न संबंधों का विधि या निषेध किया जाता है।
1. सभी दर्शनिक चिन्तनशील प्राणी हैं विन्ध्यात्मक सर्वव्यापी ‘A’
2. कोई दार्शनिक चिन्तनशील प्राणी नहीं हैं। निषेधात्मक सर्वव्यापी ‘E’
3. कुछ दार्शनिक चिन्तनशील प्राणी है। विन्ध्यात्मक अंश व्यापी ‘I’
4. कुछ दार्शनिक चिन्तनशील प्राणी नहीं है। निषेधात्मक अंश व्यापी ‘O’ स्रोत- दर्शन पुज- विनोद तिवरी
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46. विपरीतात्मक तर्कवाद के युग्म का चयन कीजिए:
(a) आई (I), ओ (O) का तर्कवाद
(b) ए (A), ई (I) का तर्कवाद
(c) ए (A), ओ (O) का तर्कवाद
(d) ई (E), आई (I) का तर्कवाद
Ans: (b) जब दो सर्वव्यापी तर्कवाक्य एक साथ सत्य नहीं हो सकते किन्तु असत्य हो सकते है‚ तो उसे विपरीत कहा जाता है। पहचान- जब समान उद्देश्य एवं विधेय पद वाले दो सर्वव्यापी तर्कवाक्य A और E के गुण भिन्न हों‚ तो उसमें विपरीत का संबंध होता है। जैसे- सभी जानवर स्तनपायी है (A) और‚ कोई जानवर स्तनपायी नहीं है (E) यहाँ A तर्कवाक्य का जो उद्देश्य एवं विधेय पद है‚ वही उद्देश्य और विधेय पद E का भी है किन्तु A तर्कवाक्य का गुण स्वीकारात्मक है और E तर्कवाक्य का निषेधात्मक इसलिए इन दोनों सर्वव्यापी तर्कवाक्यों A और E में विपरीत का संबंध है। स्रोत- तर्कशास्त्री एक परिचय कोपी कोहन।
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47. p v q मिथ्या है जबकि
(a) p सत्य है और q सत्य है।
(b) p सत्य है और q मिथ्या है।
(c) p मिथ्या है और q सत्य है।
(d) p मिथ्या है और q मिथ्या है।
Ans: (d) विकल्प वाक्य का सत्यता मूल्य तब सत्य होता है जब उनके दोनों विकिल्पावयवों में कम से कम एक सत्य हो अर्थात्‌ दोनों विकल्पावयवों के असत्य होने पर विकल्प वाक्य का सत्यता मूल्य असत्य होता है। विकल्प अर्थात ‘या’ को ‘U’ प्रतीक से प्रदर्शित किया जाता है। P q Pvq T T T T F T F T T F F F स्रोत- तर्कशास्त्र का परिचय – कोपी कोहेन
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48. कथन का वह रूप‚ जिसमें केवल सत्य ही स्थानापन्न उदाहरण हैं‚ कहलाता है
(a) पुनरुक्ति (b) व्याघात्‌
(c) आपातिक (d) आपादन
Ans: (a) वाक्य आकार तीन प्रकार को होता है-
1. पुनकर्थन (Tautology)
2. व्याघातक (Contradiation) एवं
3. संभाव (contingent)
1. पुनकर्थन – जिस वाक्य – आकार के केवल सत्य प्रतिस्थापन उदाहरण हों‚ उसे पुनकर्थन वाक्य आकार कहते है॥
2. व्याघातक – जिस वाक्य आकार का प्रतिस्थापन उदाहरण केवल असत्य हो‚ उसे व्याघातक वाक्य आकार कहते हैं।
3. संभाव्य – जिस वाक्य आकार का प्रतिस्थापन उदाहरण सत्य एवं असत्य दोनों हो उसे संभाव्य वाक्य-आकार कहते है। स्रोत- प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र एक अध्ययन अविनाश तिवरी
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49. यदि A और B सत्य कथन हैं और X और Y असत्य कथन हैं‚ तो संयुक्त कथन ~ (A v X) है।
(a) सत्य (b) असत्य
(c) संशयपूर्ण (d) उपरोक्त में से कोई नहीं
Ans: (b) = ~ (A . X) जहाँ दिया गया है कि A = T सत्य = ~ (T . F) X = F असत्य = ~ T . ~ F = F . T = F संयुक्त कथन असत्य है। क्योंकि सूत्र छोटा है p q p . q T T → T T F → F F T → F F F → F
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50. निम्नलिखित युक्तियों को पढ़िए:
(i) यदि मैं भारत का राष्ट्रपति हूँ तो मैं प्रसिद्ध हूँ। मैं भारत का राष्ट्रपति नहीं हूँ। अत: मैं प्रसिद्ध नहीं हूँ।
(ii) यदि मौसम बढ़िया है तो मैच होगा। मौसम बढ़िया नहीं है। अत: मैन नहीं होगा। प्रदत्त कूट से उपरोक्त युक्तियों का युक्ति रूप का चयन कीजिए:
(a) p ⊃ q ~ p ∴ q
(b) p . q p ∴ q
(c) p ⊃ q ~ p ∴ ~ q
(d) p ^ q ~ ~ q ∴ p
Ans: (c) अनुमान के नियम में मोड्‌स टोलेन्स (शेषवत्‌ अनुमान) का नियम एक महत्वपूर्ण नियम हैं इस नियम के अनुसार P q ~ p ~ p ⊃होता है। जहाँ p ⊃ q एक सोपाधिक वाक्य है जिसमें ‘याद’ और ‘तो’ होता है। स्रोत- अविनाश तिवारी
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51. निम्नलिखित में से कौन सा धर्म अपने ‘धार्मिक ग्रंथ’ को ‘ईश्वरीय वाणी’ मानकर पूजा करता है?
(a) हिंदू धर्म (b) ईसाई धर्म
(c) जैन धर्म (d) सिख धर्म
Ans: (d) सभी धार्मिक ग्रंथ प्रामाणित माने जाते है‚ हिंदू धर्म‚ ईसाई धर्म‚ जैन धर्म‚ सिख धर्म सभी का अपना-अपना प्रामाणिक शास्त्र है लेकिन स्लामधर्म कुरान को ईश्वरवाणी मानता है लेकिन पूजा नहीं करता है वही सिख धर्म का ग्रंथ ‘गुरुबानी’ को ईश्वर की वाणी मानकर पूजा की जाती हैं पारसी धर्म में अग्नि की पूजा की जाती है।
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52. निम्नलिखित धर्मों के युग्मों से किस युग्म को निरीश्वरवादी स्वरूप माना जा सकता है?
(a) जूडा धर्म – ईसाई धर्म
(b) इस्लाम – जोरास्प्रीयन धर्म
(c) जैन धर्म- बौद्ध धर्म
(d) हिंदू धर्म – सिख धर्म
Ans: (c) आधुनिक भारतीय साहित्य में आस्तिक एवं नास्तिक पदों का एक अन्य अर्थ प्राप्त होता है इसमें ईश्वर की सत्ता में विश्वास करने वाला आस्तिक कहलाता है और ईश्वर की सत्ता में विश्वास न करने वाला नास्तिक। इस दृष्टि से चार्वाक‚ जैन एवं बौद्ध दर्शनों के साथ सांख्य एवं मीमांसा दर्शन भी नास्तिक दर्शन की कोटी में आता है‚ क्योंकि ये भी निरीश्वरवादी हे इसके अतिरिक्त अन्य सभी विचारधारांए (योग‚ न्याय‚ वैशेषिक एवं वेदान्त) ईश्वरवादी होने के कारण आस्तिक दर्शन की कोटि में आती है। स्रोत- भारतीय दर्शन की समीक्षात्मक रूपरेखा राममूर्ति पाठक
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53. निम्नलिखित धर्मों के समूह में से कौन सा समूह उद्धारणा की अवधारणा में विश्वास है?
(a) जैन धर्म और इस्लाम
(b) इस्लाम और ईसाई धर्म
(c) हिंदू धर्म और ईसाई धर्म
(d) बौद्ध धर्म और जैन धर्म
Ans: (b) इस्लाम और ईसाई धर्म का धार्मिक ग्रंथ क्रमश: कुरान तथा बाइबिल है दोनों धर्म में समानता दिखाई देता हैं दोनों ही धर्म परम आत्मा के जन्म को स्वीकार करते है।
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54. निम्नलिखित में से कौन सा धर्म-समूह सिमेटिक धर्म समूह है?
(a) इस्लाम-जैन धर्म- जूडा धर्म
(b) जैन धर्म- बौद्ध धर्म- सिख धर्म
(c) हिंदू धर्म- इस्लाम – ईसाई धर्म
(d) जूडा धर्म- ईसाई धर्म- इस्लाम
Ans: (d) जैसे बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म को सिमेटिक धर्म माना जाता है वैसे ही जूडा धर्म‚ ईसाई धर्म तथा इस्लाम धर्म को सिमेटिक धर्म कहा जाता है। भारतयी दर्शन में भी चार्वाक‚ बौद्धजैन धर्म की नास्तिक धर्म कहा जाता है तथा बौद्ध तथा जैन धर्म का ेश्रवण परम्परा का माना जाता है। स्रोत- राममूर्ति पाठक।
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55. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिए प्रदत्त
कूट से सही उत्तर का चयन कीजिए :
सूची I सूची II
(A) हिंदू धर्म (i) बाइबल
(B) जोरास्ट्रीयन धर्म (ii) अवेस्ता
(C) जैन धर्म (iii) भगवद्‌गीता
(D) ईसाई धर्म (iv) तत्त्वार्थसूत्र
कूट:
(A) (B) (C) (D)
(a) (iv) (ii) (iii) (i)
(b) (i) (iv) (iii) (ii)
(c) (ii) (iv) (iii) (i)
(d) (iii) (ii) (iv) (i)
Ans: (d) सूची I – सूची II हिंदू धर्म – भगवद्‌गीता जोरास्ट्रीयन धर्म – अवेस्ता जैन धर्म – तत्त्वार्थसूत्र ईसाई धर्म – बाइबल
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56. ‘‘ऑन डीनोटिंग’’ नामक प्रसिद्ध निबन्ध का लेखन कौन है?
(a) कूआइन (b) डेविडसन
(c) रस्सेल (d) फ्रेगे
Ans: (c) रसेल अपने वर्णन सिद्धान्त की चर्चा अपने लेख Om Demoting (mind, 1905) में करता है। रसेल कहता है कि कुछ पद ऐसे होते है जो लगता तो है कि किसी वस्तु को सूचित करते है लेकिन उसकी वस्तु सूचकता भ्रामक होती है रसेल मानता है कि कुछ पद ऐसे होते है जिनके अनुरूप वस्तु है तथा जो हमारे प्रत्यक्ष के विषय है। ऐसे पदों को रसेल नाम कहता है‚ उसके अनुसार नाम है तो नामी है और नामी है तो नाम हैं लेकिन जो नाम की तरह प्रतीत होते है लेकिन नाम नहीं होते‚ उनका वर्ण्न करना होता है। स्रोत- प्रो. वी. के. लाल
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57. फ्रेगे निम्नलिखित में से किसमें भेद करता है?
(a) संवेदना और सामान्य बुद्धि
(b) संवेदना और संदर्भ
(c) संवेदना और सत्यावस्था
(d) संवेदना और असंवेदना
Ans: (b) फ्रेगे संवेदना तथा संन्दर्भ में अन्तर करता है। वही विटगेस्टाइन दोनों में अन्तर नहीं करता है फ्रेगे Sencse तथा Reference में अन्तर करता है।
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58. जे. एल. ऑस्टिन केव अनुसार स्थान-निर्धारण कार्य एक कर्म है
(a) व्याकरणबद्ध और बुद्धिमतापूर्ण कुछ कहना
(b) उच्चरित करने के लिए करना
(c) कुछ कहने से कुछ करना
(d) उपरोक्त सभी
Ans: (a) आस्टिन अपने वाक्‌ क्रिया सिद्धान्त का प्रतिपादन करता है। इसका वर्णन उसकी पुस्तक- ‘हाऊ टू डॅ थिंग्स विद वर्डस’ में मिलता है। इस प्रकार आस्ट्रिन समग्र वाक्‌ स्थिति में समग्र वाक्‌ क्रिया सिद्धान्त का प्रतिपादन करता है। आस्टिन अपने वाक्‌ क्रिया सिद्धान्त को तीन भागों में विभक्त करता है।
1. लोकेशनरी क्रिया Locutionary Act
2. इलोकेशनरी क्रिया Illocutionary Act
3. परलोकेशनरी क्रिया Perlocutionary ACT
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59. यह किसकी मान्यता है कि भाषा वाक्य से वाक्य के आधार पर नहीं अपितु समग्र रूप से कार्य करती है?
(a) फ्रागे (b) रस्सेल
(c) प्रारम्भिक विट्टिग्नस्टीन (d) कूआइन
Ans: (d) W.V.O. Quine मूलत: अनुभववादी दार्शनिक थे। Quine के अनुसार अनुभव से स्वतंत्र ज्ञान की संकल्पना असम्भव है क्योंकि अनुभव ही ज्ञान का आधार है अत: अनिवार्य ज्ञान की सम्भावना नहीं है। इस मान्यता की स्थापना क्वाइन अपने एक पुस्तक Two Dogmas of Empiricism: Form a Logical Point of View में करते है। स्रोत- प्रो. वी. के. लाल
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60. पी.एफ. स्ट्रासन की आत्म विद्या को कहते हैं
(a) विवरणात्मक (b) संशोधात्मक
(c) आदर्शात्मक (d) शून्य वादात्मक
Ans: (a) स्ट्रासन के अनुसार हमारा अनुभव इतिहास विकासधारा के अनुसार बदलता रहता है‚ परन्तु कुछ समप्रत्यय ऐसे है जिनमें केई परिवर्तन नहीं होता‚ ऐसे समप्रत्यय को स्ट्रासन मूल समप्रत्यय कहते है। इसमें से एक समप्रत्यय व्यक्ति का समप्रत्यय है। इसी आत्म विद्या को स्ट्रासन विवरणात्मक समप्रत्यय कहता है। व्यक्ति न तो शरीर है न है ही केवल आत्मा है और न ही शरीर एवं आत्मा दोनों का योग हैं स्ट्रासन के अनुसार व्यक्ति का समप्रत्यय एक मूल का समप्रत्यय है। स्रोत- प्रो. वी. के. लाल
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61. निम्नलिखित में से वह दार्शनिक कौन है जो दृश्य प्रपंचवादी नहीं है?
(a) ब्रेनटानो (b) मीनोंग
(c) हुस्सर्ल (d) क्वाइन
Ans: (d) कूआइन एक तार्किक अनुभववादी दार्शनिक हैं हुस्सर्ल एक फेनोमेनोलॉजिस्ट है‚ ब्रेनटानों एक मनोवैज्ञानिक दार्शनिक हैं मीनोंग एक विश्लेषणवादी है।
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62. लॉजिकल इन्वेस्टीगेशन का लेखन कौन है?
(a) विट्टिग्नस्टीन (b) हस्सर्ल
(c) ड्रूम्मट्ट (d) हीडेगर
Ans: (b) लेखक – पुस्तक हुस्सर्ल – लॉजिकल इन्वेस्टीगेंशन हाइडेगर – बीइन एण्ड टाइम विटगेंस्टाइन – फिलोसोफिकल इन्वेस्टीगेंशन और टैक्टेटस।
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63. हस्सर्ल का प्राग्नुभविक दृश्य प्रपंचात्मक आकृत्यंतर का उद्देश्य किसको खोजना है?
(a) इंद्रियानुभविक आत्मा (b) दृश्यप्रपंचात्मक अहम्‌
(c) अन्तर-व्यक्तिनिष्ठ अहम्‌ (d) प्रग्‌नुभविक अहम्‌
Ans: (d) हुर्सल की फेनोमेनोलाजी शुद्ध रूप से ज्ञानमीमांसीय अन्वेषण है। लेकिन जब वह विभिन्न प्रकार के अपचयन
(Reductions) से वस्तु के सारतत्व (essence) तक पहुचता है। हुसर्रल इसे Immanent कहता है क्योंकि ये चेतना को प्रदत्त होते है। ये Transcendent है। यही वस्तु का आद्य अर्थ है यदि इसी प्रकार के अर्थों को पकड़ा जा सके‚ तो हमें अपने ज्ञान का वास्तविक आधार मिल सकता है। इस प्रकार वह दृश्य प्रपंचात्मक आकृत्यंतकरण का उद्देश्य प्राग्रनुभविक अहम्‌ की खोज कहता है। स्रोत- प्रो. बी. के. लाल
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64. शब्द शब्दार्थ मीमांसा के अन्तर्गत आ जाता है
(a) मूल पाठ की समझ (b) मूल पाठ की व्याख्या
(c) (a) और (b) दोनों (d) न (a) और न ही (b)
Ans: (c) हेर्मोन्यूटिक्स कला‚ समझ का सिद्धान्त है। व्याख्या के सामान्य सिद्धान्त जर्मन दार्शनिक और धर्मशास्त्री फ्रेडरिक श्लेस्माकर द्वारा रखे गये थें यूरोपीय दार्शनिकों मार्टिन हाइडेगर और गैडामर की 20 शदी काम करता हैं के बीच .Avtora .v अवटोरा‚ वी. जी.
दार्शनिक सिद्धान्त में मानविकी की एक विधि से हेर्मेनेयूटिक्स बदल गया। बाद में गैडामर ने शब्दार्थ-मीमांसीय मानववाद की व्याख्या की है।
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65. शब्दार्थ-मीमांसीय मानववाद का प्रतिपादक है
(a) हीडेगर (b) गाडामेर
(c) रोनाल्ड बार्थेस (d) रिचर्ड रोरटी
Ans: (b) शब्द शब्दार्थ मीमांसा को हेर्मेनेयुटिक्स के रूप में जाना जाता है। हेर्मेनेयुटिक्स (व्युत्पत्तिशास्त्र भी कहते है) दार्शनिक पाठ प्रौद्योगिकी एवं प्राचीन शास्त्र‚ धर्म‚ इतिहास‚ भाषा विज्ञान‚ मनोविज्ञान और साहित्यिक सिद्धान्त के दार्शनिक प्राणाली हैं। यह पाठ खुद के अनुसार पाठ की व्याख्या और सक्षम के एक सिद्धान्त के रूप में वर्णित किया जाता है। अर्थात मूलपाठ की समझ तथा उसकी व्याख्या दोनों की कार्यों के लिए हेर्मेनेयुटिक्स पद्धति का प्रयोग किया जाता है। इसके मुख्य दार्शनिक गैडामर‚ इमली बेट्रटी‚ हाइडेगर‚ श्लेस्माकर‚ डिरिडा आदि है।
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66. अद्वैत वेदान्त में माया है
(a) वास्तविक
(b) अवास्तविक
(c) वास्तविक और अवास्तविक दोनों
(d) न वास्तविक और न ही अवास्तविक
Ans: (d) माया जड़ है और अपनी सत्ता के लिए बह्य पर आश्रित हैं माया अनादि है किन्तु (Infinite) नहीं है। माया ब्रह्म की स्वाभाविक शक्ति हैं। जिससे वह इन नाम-रूपमय प्रपंचात्मक जगत्‌ को उत्पन्न करता है। माया सदसद्विलक्षण एवं अनिवर्चनीय है। माया अध्याय हैं। माया विवर्तमाल (Appearance only) है। और इसकी व्यावहारिक सत्ता (Empirical reality) है। माया का आश्रय और विषय वहा हैं। माया विज्ञान-निरस्या (Removeable) by right knowledge) है। माया की दो शक्तियाँ हैं आवरण (concealmet) और विक्षेप (Projection)। आवरण का अर्थ है।‚ ढॅकना‚ छिपाना और विक्षेप का अर्थ है।‚ उस पर दूसरी वस्तु को आरोपित करना। माया आवरण-शक्ति से ब्रह्म की एकता को छिपा देती हैं या उसके वास्तविक स्वरूप को ढक लेती है। और विक्षेप शक्ति के द्वारा ब्रह्म के स्थान पर प्रपंचात्मक जगत का आरेाप करके उसका अन्यथा आभास कराती है। दोत – राममूर्ति पाठक।
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67. रामानुज के अनुसार जीवात्मा है
(a) सर्वत्र है (b) अणु के आकार की है।
(c) मध्यम आकार की है। (d) उपरोक्त में से कोई नहीं।
Ans: (b) जीवात्मा शरीर ‘मन’ इन्द्रियों से भिन्न है। जीवात्मा ईश्वर पर आश्रित है। ईश्वर जीवात्मा का संचालक हैं जीवात्मा संसार के भिन्न-भिन्न विषयों का ज्ञान प्राप्त करता हैं। इसलिये वह ज्ञाता है वह संसार के भिन्न-भिन्न कर्मों में भाग लेता है। इसलिए वह कर्ता हैं। जीव अपने कर्म का फल भोगता हैं। वह अपने शुभ – अशुभ कर्मों के अनुसार सुख और दु:ख को प्राप्त करता है। जीव को कर्म करने में पूरी स्वतंत्रता है जीव नित्य है। जीव अनेक है रामानुज के अनुसार जीवात्मा चेतना द्रव्य है। चैतन्य आत्मा का गुण धर्म है आत्मा चेतना से उसी प्रकार संबंधित है जिस प्रकार विशेष्य विशेषण से जीवात्मा रामानुज के मतानुसार 3 प्रकार होते है- 1. बुद्ध जीव 2.
मुक्त जीव 3. नित्य जीत स्रोत- भारतीय दर्शन प्रो. हरेन्द्र प्रसाद सिंह
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68. रामानुज के अनुसार आत्मा और परमत्मा के बीच का सम्बन्ध है
(a) तादात्म्य (b) भेद
(c) तादात्म्य और भेद दोनों (d) न तादात्म्य और न ही भेद
Ans: (c) तादात्म्य और भेद दोनों के अनुसार जीव स्वरूपत: ब्रह्म से भिन्न है। किन्तु ब्रह्म एवं जीव में ‘अपृथक्‌ सिद्धि सम्बन्ध है। इसका अर्थ है कि जीव (और जगत भी) ईश्वर के बिना नहीं रह सकते और ईश्वर जीव और जगत के बिना नहीं रह सकते उल्लेखनीय है कि अपृथक सिद्धि सम्बन्ध संयोग एवं समवाय से भिन्न है। संयोग दो स्वतन्त्र वस्तुओं का सम्बन्ध है। इनमें सम्बन्धित एक दूसरे कके बिना भी रह सकती है। जैसे-मेज एवं पुस्तक में संयोग सम्बन्ध है। समवाय वो अयुतद्धि वस्तुओं का सम्बन्ध है। जिसमें एक दूसरी पर आश्रित होती है। किन्तु दूसरी पहले पर आश्रित नहीं होती। द्रव्य और गुण में अंगी एवं अंग में सम्बन्ध समवाय है। रामानुज दर्शन में अपृथक सिद्धि एक विलक्षण सम्बन्ध है। ईश्वर जीव के बिना नहीं रह सकते और जीव ईश्वर के बिना नहीं रह सकते। यद्यपि जीव स्वरूपत: बह्य से भिन्न हैं यद्यिपि ब्रह्म से उसका सम्बन्ध अविच्छेद्य है। पुन: ब्रह्म एवं जीव में विशेष्य –
विशेषण‚ अंशी-अंश एवं आत्मा – शरीर जैसा सम्बन्ध हैं ब्रह्म विशेष्य हैं जीव विशेषण है। ब्रह्म अंशी है और जीव अंश है‚ ब्रह्म आत्मा है और जीव उसका आन्तरिक शरीर है।
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69. रामानुज के अनुसार मोक्ष का अर्थ है‚
(a) परमात्मा और आत्मा के बीच तादात्म्य
(b) परमात्मा और आत्मा के बीच समानता
(c) परमात्मा और आत्मा के बीच तादात्म्य और समानता दोनों
(d) परमात्मा और आत्मा के बीच न तादात्म्य और न ही समानता
Ans: (b) रामानुज की मान्यता है कि मोक्ष प्राप्त होने पर मुक्तात्मा ईश्वर के स्वरूप को प्राप्त करता है‚ यद्यपि वह उसके स्वरूप को नहीं प्राप्त करता (ब्रह्मणोभाव: न तु स्वरूपैक्यम्‌) यह सर्वज्ञ हो जाता है और उसे सदैव अन्तर्दृष्ट द्वारा ईश्वर का ज्ञान होता है।
(परिपूर्णब्र्‌ह्मानुभवम्‌) अर्थात मुक्तात्मा ब्रह्मभाव को तो प्राप्त होता है‚ किन्तु उसका पृथक व्यक्तित्व भी बना रहता है। उसका व्यक्तित्व ब्रह्म में विलीन नही होता। उसका पृथक अस्तित्व मोक्ष का विरोधी नहीं है: तात्पर्य यह है कि मुक्ति का अर्थ जीवात्मा का परमात्मा से एकाकार होना नहीं है‚ अपितु जीवात्मा का शुद्ध निर्मल ज्ञान से युक्त होना तथा दोषरहित होकर ब्रह्म-सदृश (ब्रह्म-प्रकार) होना। स्रोत- राममूर्ति पाठक
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70. शंकर द्वारा स्वीकृत त्रुटि सिद्धान्त को कहा जाता है
(a) अख्यातिवाद (b) अनिर्वचनीयख्यातिवाद
(c) अन्यथाख्यातिवाद (d) सत्‌ख्यातिवाद
Ans: (b) भारत के प्रत्येक दार्शनिक सम्प्रदाय ने प्रमा (सम्यक्‌ ज्ञान) के साथ भ्रम (मिथ्या ज्ञान) का भी निरूपण किया है। प्रभाकर के भ्रम विषयक मत को अख्यातिवाद कहते हैं। कुमारिल भट्ट के भ्रम विषयक मत को विपरीत ख्यातिवाद कहते हैं। अन्यथाख्यातिवाद न्याय-वैशेषिकों का मत है। सत्ख्यातिवाद रामानुज का भ्रम विषयक मत है।
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71. गांधीजी के अनुसार राज्य का राजनीतिक एवं आर्थिक संगठन‚ निम्नलिखित में से‚ किस पर आधारित होना चाहिए?
(a) यांत्रिक एवं भौतिक सनतुष्टि की उन्नति
(b) व्यक्ति का नैतिक एवं बौद्धिक विकास
(c) राज्य का पूर्ण नियन्त्रण और पूर्ण दिशा-निर्देश
(d) वर्करों का प्रतिनिधित्व
Ans: (b) गाँधी जी अनुसार व्यक्ति का अध्यात्मिक तथा बौद्धिक विकास हो तभी व्यक्ति का भौतिक विकास सम्भव हो सकता है। गाँधी जी व्यक्ति के सर्वाङ्गीण विकास चाते थे। राज्य का राजनीति नैतिक होना चाहिए तथा धर्म के सारतत्व से बंधा होना चाहिए बिना नैतिकता के राजनीतिक राज्य कल्याणकारी नहीं हो सकता है। अत:
राज्य का राजनीतिक एवं आर्थिक संगठन‚ व्यक्ति के नैतिक एवं बौद्धिक विकास पर आधारित होना चाहिए।
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72. समस्त सामाजिक समस्याओं का समाधान गांधीजी की दृष्टि में निहित है
(a) इस धरती पर रामराज्य स्थापित हो
(b) सम्पूर्ण अद्वितीय मानववादी दृष्टिकोण
(c) सम्पूर्ण आत्मत्याग
(d) सभी के लिए पूर्ण प्रेम और संवेदना
Ans: (a) गाँधी के अनुसार समस्त सामाजिक समस्याओं का समाधान इस धरती पर रामराज्य स्थापित होने से हो सकता है। इसी अहिंसक रामराज्य की अवधारणा पर गाँधी को कल्पना आधारित आदर्शवादी का आक्षेप लगाया जाता है। बैद्धों ने स्वीकार किया कि सभी के लिए पूर्ण प्रेम और संवेदना से ही ब्रह्मविहार सम्भव है। गीता ने सम्पूर्ण आत्मत्याग की शिक्षा दिया है। हाइडेगर तथा सार्त एक सम्पूर्ण अद्वितीय मानववादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं।
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73. गांधीजी ने ‘सर्वोदय’ के सिद्धान्त को विकसित किया
(a) हेनरी डेविड और थॉरो की रचनाओं से प्रभावित होकर
(b) श्रीमद्‌ राजचन्द्र की रचनाओं से प्रभावित होकर
(c) रस्किन की रचनाओं से प्रभावित होकर
(d) लियो टॉलस्टाय की रचनाओं से प्रभावित होकर
Ans: (c) गाँधी जी पर जॉन रस्किन की पुस्तक Un to The lost का पर्याप्त प्रभाव पड़ा। गाँधी के अनुसार सर्वोदय में सभी का उदय होना है गरीब को अपनी गरीबी से निकलना है वही अमीर व्यक्तियों को अपनी अमीरी के अहंकार से निकलना है। अर्थात सर्वोदय में अपने-अपने स्तर से सभी का उदय होना है अर्थात सभी का सम्पूर्ण विकास होना है। स्रोत – गाँधी का एक समग्र मूल्यांकन – प्रदीप सिंह
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74. गांधी के अनुसार हिंसा के ढंग को होना पड़ेगा।
(a) अन्यों से बिलकुल भी अन्तर्ग्रस्त न होना।
(b) अन्यों से झगड़ों में अन्तर्ग्रसत न होना।
(c) दुश्मन की अवज्ञा करना और ऐसा करते हुए उसका हृदय परिवर्तन करना उसे जीतना।
(d) उपरोक्त सभी।
Ans: (c) गाँधी के अहिंसा में कोई कमजोर व्यक्ति अहिंसक नहीं हो सकता है। गांधी के अनुसार यदि तुम्हारा शत्रु भूखा है‚ तो उसे रोटी दो‚ यदि प्यासा है‚ तो पानी दो‚ यदि वह असफल है‚ तो उस पर हंसो मत तथा यदि वह ठोकर खाकर गिरता है‚ तो तुम्हारा हृदय प्रसन्न नहीं होना चाहिए लेकिन दु:श्मन की अवज्ञा करना तथा उसका हृदय परिवर्तन कर उसे जीतना चाहिए। अत: अहिंसा का दूसरा मूल आधार धैर्य है और उसके बिना अहिंसा के मार्ग पर चलना संभव नहीं है।
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75. अहिंसा प्रेम विधि के रूप में है
(a) उन्हें प्रेम करना जो स्नेही हैं।
(b) उन्हें प्रेम करना जो उसकी पसन्द के हैं।
(c) उन्हें प्रेम करना जो उसे घृणा करते हैं।
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं।
Ans: (c) गाँधी के अनुसार अहिंसक अपने प्रतिद्वन्द्वी की अच्छाई को स्वीकार करने व उसके अपराध को क्षमा करने के लिए हमेशा तैयार रहता है‚ वह बुराई से घृणा करता है बुराई करने वाले से नहीं‚ वह स्वयं सहर्ष कष्ट कर लेता है पर अपने प्रतिद्वन्दी को कष्ट नहीं देता। इस प्रकार अहिंसा का मूल आधार प्रेम है और शांतिपूर्ण विरोध करते हुए अपनी प्रतिद्वन्दी का हृदय परिवर्तन करने की आशा करता है।

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