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UGC NTA NET JRF Subject Philosophy Solved Previous Papers (In Hindi) Book

UGC NTA NET JRF Subject Philosophy Solved Previous Papers (In Hindi) 2012

1. वेदों के पक्ष में दी गई युक्तियों में सम्मिलित है :
(a) रचनाकार की शक्ति (b) रचनाकारों के पात्र
(c) रचनाकारों के उद्देश्य (d) उपरोक्त में से कोई नहीं
Ans: (d) वेद के अध्ययन से हमें लौकिक और अलौकिक विषयों का ज्ञान प्राप्त होता है। वेद ज्ञान के भंडार है। वेद के चार भाग हैपहला ऋग्वेद‚ दूसरा- यजुर्वेद‚ तीसरा- सामवेद‚ चौथा- अथर्ववेद। ज्ञान और सुख की प्राप्ति ही वेद का परम ध्येय है। सामान्यत:
ईश्वर को रचनाकार माना गया है। अत: वेदों के पक्ष में दी गयी युक्तियों में से कोई सम्मिलित नहीं है। ‘भारतीय दर्शन की रूपरेखा- प्रो. हरेन्द्र प्रसाद सिन्हा’
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2. आत्मा की प्रकृति के प्रश्न पर चार्वाक दर्शन शाध्Eिायों को वर्गीकृत किया जा सकता है:
(a) देहात्मवादी (b) प्राणवादी
(c) इन्द्रियात्मवादी (d) उपरोक्त सभी
Ans: (a) चार्वाक आत्मा को शरीर से भिन्न नहीं मानता है। आत्मा और देह के बीच अभेद मिटने के फलस्वरूप चार्वाक के आत्मा सम्बन्धी विचार को देहात्मवाद कहा जाता है। अर्थात आत्मा शरीर है शरीर आत्मा है। भारतीय दर्शन के रूपरेखा- प्रो. हरेन्द्र प्रसद सिन्हा
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3. यज्ञ का हव्य किसके लिए लाभप्रद होता है?
(a) ऋत्विक (b) हव्य का उपभोक्ता
(c) देवता (d) इनमें से कोई नहीं
Ans: (b) ऋग्वैदिक काल में यज्ञ करने की प्रथा प्रचलित थी‚ यज्ञ के समय अग्निकुण्ड में डलने वाली समाग्री को हव्य कहते हैं और यही हव्य अग्नि के माध्यम्‌ से देवताओं को प्राप्त होते हैं। ऐसा माना जाता है। देवता हव्य प्राप्त करने के उपरान्त यज्ञानुरूप फल देने के लिए बाध्य होते थें। ऋत्विक एक नैतिक व्यवस्था है‚ जिसे ‘ऋतम्‌ सत्यं च धर्मा:’ कहा गया है‚ अर्थात ऋत्‌ सत्य है और धर्म भी है। भारतीय दर्शन की समीक्षात्मक रूपरेखा- डॉ. राममूर्ति पाठक
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4. वैदिक शब्द ऋत्‌ का अभिप्राय है-
(a) नैतिक आदेश
(b) सार्वभौमिक आदेश
(c) नैतिक एवं सार्वभौमिक दोनों आदेश
(d) न नैतिक और न ही सार्वभौमिक आदेश
Ans: (c) वेदों में आचार सम्बन्धी सिद्धान्तों का विवेचन ‘ऋत की अवधारणा’ के रूप में हुआ है। वेदो में देवताओं के वर्णन में ‘ऋतस्य गोप्ता’ (ऋत के परिरक्षक) और ऋतायु (ऋत का अभ्यास करने वाला) शब्दों का प्रयोग बार-बार हुआ है। ‘ऋत’ विश्वव्यवस्था के अतिरिक्त नैतिक व्यवस्था के अर्थ में प्रयुक्त हुआ हैं ऋग्वेद में वर्णित ऋत वह नियम है जो संसार में सर्वत्र व्याप्त है एवं सभी मनुष्य एवं देवता उसका पालन करते है। अत: ऋत सत्यं च धर्मा:
अर्थात ऋत सत्य और धर्म हैं। ऋत का संरक्षक (रक्षा करने वाला) वरूण को कहा जाता है।
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5. निम्नलिखित में से कौन सा दर्शनशास्त्री यह विरोध नहीं करता कि ज्ञान के लिए प्रत्यक्ष वैध स्रोत है?
(a) जयराशि भट्ट (b) श्री हर्ष
(c) गौतम (d) नागार्जुन
Ans: (c) न्यायदर्शन के प्रणेता महार्षि गौतम ने ज्ञान प्राप्त करने के चार साधन बताए है‚ प्रत्यक्ष‚ अनुमान‚ शब्द तथा उपमान। उनके अनुसार ज्ञान यथार्थ अनुभव है। गौतम के अनुसार वैध ज्ञान प्राप्त करने में प्रत्यक्ष एक दोत हैं। गौतम की रचना ‘न्यायसूत्र’ में प्रत्यक्ष का लक्षण इस प्रकार है कि ‘इन्द्रियार्थसन्निकर्षेत्पन्नं ज्ञानम्‌ अव्यपदेशम्‌ अव्यभिचारी व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्‌’’ अर्थात इन्द्रियविष् ाय के संपर्क से उत्पन्न होने वाला त्रुटिरहित‚ अव्यपदेश्यम्‌ एवं व्यवसायात्मक ज्ञान प्रत्यक्ष है।
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6. निम्नलिखित में से कौन सा ब्रह्म विहार का अंश नहीं है?
(a) मैत्री (b) दया
(c) मुदिता (d) उपेक्षा
Ans: (b) बौद्ध दर्शन के महायान सम्प्रदाय से सम्बन्धित मोक्ष
(निर्वाण) की अवधारणा है जो मानता है कि निर्वाण प्राप्त व्यक्ति ब्रह्मविहार‚ मैत्री‚ करुणा‚ मुदिता‚ उपेक्षा से सम्पुष्टि होता है। वह हीनयानीयों के स्वकल्याण (स्वमुक्ति) के विपरीत सर्वकल्याण
(सार्वभौमिक मुक्ति) की कामना करता है। भारतीय दर्शन की रूपरेखा- प्रो. हरेन्द्र प्रसाद सिन्हा
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7. बौद्ध सिद्धान्त के प्रतीत्यसमुत्पाद को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है:
(a) कोई स्थायी आत्मा नहीं है।
(b) जो भी है‚ वह क्षणिक है।
(c) यहाँ कुछ तत्वों का उद्‌भव नहीं है।
(d) जिस किसी का उद्‌भव होता है‚ उसका किसी शर्त पर उद्‌भव होता है।
Ans: (d) बौद्ध दर्शन के द्वितीय आर्यसत्य- दु:ख समुदाय के अन्तर्गत बुद्ध का केन्द्रिय सिद्धान्त प्रतीत्यसमुत्पाद आता है जिसे कारणता का सापेक्षता का सिद्धान्त भी कहते हैं (सापेक्ष कारणतावाद)। प्रतीत्य समुत्पाद में प्रतीत्य का अर्थ है ‘अपेक्षा रखकर: या निर्भर या अश्रित रहकर एवं समुत्पाद का अर्थ है –
उत्पत्ति। अत: प्रतीत्यसमुत्पाद का अर्थ हुआ- कारण की अपेक्षा रखकर या कारण पर निर्भर रहकर कार्य की उत्पत्ति। इस प्रकर कार्य सदा कारण सापेक्ष होता है। इस प्रकार जिस किसी का उद्‌भव होता है उसका किसी शर्त पर उद्‌भव होता है। स्रोत- भारतीय दर्शन आलोचन और अनुशीलन – डॉ.
सी.डी. शर्मा
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8. जैन धर्म के अनुसार मुक्ति है:
(a) जन्म और मृत्यु से छुटकारा (b) कर्म से छुटकारा
(c) द्रव्य से छुटकारा (d) उपरोक्त सभी
Ans: (d) जैन दर्शन के अनुसार जीव (आत्मा) के बन्धन का कारण उसमें कर्म-पुदगल का होना है। जैन-दर्शन जीव को ही आत्मा माना गया है। जीव शरीर के साथ संयोग की कामना करता है। शरीर का निर्माण पुद्‌गल कणों से हुआ है। इस प्रकार जीव का पुद्‌गल के साथ संयोग ही बन्धन है। अज्ञान से अभिभूत होने के कारण जीव में वासनाँए निवास करती है। इन वासनाओं के कारण जीव शरार के लिए लालायित रहता है। जीव अपने कर्म के अनुसार ही पुद्‌गल कणों को आकृष्ट करता है। इसलिए आकृष्ट पुद्‌गल कणों को कर्म-पुदगल कहा जाता है। इसी कर्म-पुद्‌गलों से छुटकारा पाना ही मुक्ति है। मुक्ति से जन्म और मृत्यु से छुटकारा मिल जाता है तथा जीव के गुण तथा पर्याय युक्त द्रव्य से भी मोहभंग हो जाता है। स्रोत- भारतीय दर्शन की रूपरेखा- प्रो. हरेन्द्र प्रसाद सिंहा
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9. जैन धर्म के अनुसार मुक्ति को कहा जाता है:
(a) भाव मोक्ष
(b) द्रव्य मोक्ष
(c) भाव मोक्ष और द्रव्य मोक्ष दोनों
(d) न भाव मोक्ष और न ही द्रव्य मोक्ष
Ans: (c) जैन दर्शन में कर्म- पुद्‌गलों से छुटकारा पाना ही मुक्ति है इसके दो भेद होते है। 1. भाव मोक्ष 2. द्रव्य मोक्ष। भावमोक्षजब कर्म-पुद्‌गलों से छुटकारा पाने का विचार मन में उठता है तब उसे भावमोक्ष कहते है‚ तथा जब कर्म-पुद्‌गलों से छुटकारा वास्तविक रूप में मिल जाता है तब उसे द्रव्य मोह या द्रव्यमुक्ति कहते है। स्रोत- भारतीय दर्शन की रूपरेखा – प्रो. हरेन्द्र प्रसाद सिंहा
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10. निम्नलिखित में से कौन सा युग्म संगत है?
(a) शून्यवाद – चन्द्रकीर्ति (b) निर्गुण – रानामुज
(c) सत्कार्यवाद – गौतम (d) कर्मवाद – चार्वाक
Ans: (a) बौद्ध दर्शन के आचार्य नागार्जुन का सिद्धान्त शून्यवाद या माध्यमिकवाद है। चन्द्रकीर्ति ने इसी शून्यवाद को आगे बढ़ाया है। निर्गुण रामानुज को नहीं बल्कि शंकराचार्य को माना जाता है। सत्यकार्यवादी गौतम नहीं बल्कि सांख्य दार्शनिक मानते है। चार्वाक को छोड़कर सभी भारतीय सम्प्रदाय ‘कर्मवाद’ के सिद्धान्त को स्वीकार करते है। स्रोत- भारतीय दर्शन आलोचन और अनुशीलन – डॉ.
चन्द्रधर शर्मा
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11. यह विचार कि प्रत्येक प्रकार के प्रत्यक्ष निर्विकल्पक होते हैं‚ इस विचार को किसने ठीक ठहराया है?
(a) न्याय (b) वैशेषिक
(c) बौद्ध (d) विशिष्टाद्वैत
Ans: (c) न्याय-वैशेषिक दर्शन में प्रत्यक्ष की दो अवस्थाए मानी गयी है – 1. निर्विकल्प प्रत्यक्ष‚ 2. सविकल्प प्रत्यक्ष निर्विकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान की प्रथम्‌ अवस्था है। जब इन्द्रियाँ विषय के सम्पर्क में जाती है‚ तो उससे जो संवेदनाए लाती हैं। उन्ही शुद्ध संवेदनाओं को निवर्किल्प प्रत्यक्ष कहते है। जब ये संवेदनाएँ बुद्धि विकल्पों के माध्यम्‌ से व्यवस्थित हो जाती है तब उनमें नाम‚ जाति‚ कल्पना का समावेश हो जाता है। इसे ही सविकल्पक प्रत्यक्ष कहते है। लेकिन जहां न्याय दर्शन सविकल्प प्रयक्ष को वास्तविक मानता है वहीं बौद्ध दर्शन या बौद्ध दार्शनिक आचार्य दिगनाग निर्विकल्प प्रत्यक्ष को ही वास्तविक प्रत्यक्ष कहते है। स्रोत- भारतीय आलोचन और अनुशीलन- चन्द्रधर शर्मा।
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12. प्रपत्ति इनके बीच का सम्बन्ध है:
(a) जीव और जगत (b) ब्रह्म और जगत
(c) जीव और ईश्वर (d) जीव और ब्रह्म
Ans: (d) विशिष्टाद्वैतवाद के संस्थापक श्री रामानुजाचार्य मोक्ष का एक अन्य मार्ग बताते है इसे प्रपत्तिमार्ग कहते है वैसे तो रामानुज भक्ति को ही मोक्ष का साधन मानते है। लेकिन प्रपत्ति भी एक मोक्ष मार्ग हैं ईश्वर के प्रति अपने को पूर्णतया समर्पण कर देना ही प्रपत्ति हैं यह सर्वसुलभ मार्ग है। जहां जीव ब्रह्म में पूर्णतया समर्पित होता है। स्रोत- भारतयी दर्शन की समीक्षात्मक रूपरेखा- डॉ. राममूर्ति पाठक
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13. वैशेषिका स्कूल के अनुसार सार्वभौमिक ‘गोत्व’ है:
(a) अशाश्वत और कई
(b) शाश्वत और कई
(c) शाश्वत‚ एक और जो कइयों में निवास करता है।
(d) अशाश्वत और एक
Ans: (c) न्याय-वैशेषिक में सामान्य की विशेषताओं को इस प्रकार व्यक्त किया गया है ‘‘नित्यमेकमनेकानुगतं सामान्यतम्‌’’। सामान्य नित्य‚ एक और अनेक वस्तुओं में सामविष्ट है। एक वर्ग के सभी व्यक्तियों में एक ही सामान्य होता है। इसका कारण यह है कि एक वर्ग के विभिन्न व्यक्तियों का एक ही आवश्यक गुण होता है। इस प्रकार मनुष्य का सामान्य गुण मनुष्यत्व और गाय का सामान्य गुण ‘गोत्त्व’ हात्ेा है। सामान्य शाश्वत‚ सार्वभौमिक‚ अनादि और अनन्त है। स्रोत- भारतीय दर्शन की रूपरेखा- प्रो. हरेन्द्र प्रसाद सिन्हा
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14. व्याप्ति को उचित रूप से इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है:
(a) अपरिवर्त्य सहवर्तन (b) कारणात्मक सम्बन्ध
(c) क्रम (d) उपरोक्त में से कोई नहीं
Ans: (a) व्याप्य और व्यापक का सम्बन्ध व्यप्ति है। इसे स्वभाविक सम्बन्ध‚ हेतु और साध्य का नियत साहचर्य सम्बन्ध या अविनाभाव नियम भी कहते है। व्याप्ति अनुमान का प्राण है क्योंकि बिना व्याप्ति ज्ञान के अनुमान सम्भव नहीं है व्याप्ति उपाधिरहित
(अनौपधिक) नियत साहचर्य संबंध है। जैसे- जहाँ धुआ होगा वहाँ आग अवश्य होगी लेकिन यह सम्भव है कि किसी स्थल पर आग हो‚ किन्तु धुआँ न हो जैसे- तपा हुआ आग का गोला। अत: नियत सहचर्य संबंध ही व्याप्ति है। स्रोत-राममूर्ति पाठक
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15. ज्ञान के स्रोत के सम्बन्ध में मीमांसा दर्शन की एक अनूठी खोज है:
(a) अनुपलब्धि (b) अनुमान
(c) तुलनात्मक (d) साक्ष्य
Ans: (a) भारतीय दर्शन में ज्ञान प्राप्त करने के दोत (साधन) कुल छ: प्रमाण (साधन) की चर्चा हुयी हैं प्रत्यक्ष‚ अनुमान‚ शब्द‚ उपमान‚ अर्थापत्ति‚ अनुपलब्धि है। मीमांसा दर्शन अभाव का ज्ञान प्राप्त करने के लिए अनुपलब्धि को स्वतंत्र प्रमाण स्वीकार किया गया है वही न्याय दर्शन अभाव का ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रत्यक्ष प्रमाण स्वीकार करता है और अनुपलब्धि को स्वतंत्र प्रमाण नहीं मानता है उसे प्रत्यक्ष प्रमाण में ही स्वीकार करता है। स्रोत-राममूर्ति पाठक
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16. निम्नलिखित में से कौन सा विकल्प मीमांसा द्वारा स्वीकार्य है?
(a) स्वत: प्रामाण्य‚ स्वत: अप्रामाण्य
(b) परत: प्रामाण्य‚ परत: अप्रामाण्य
(c) स्वत: प्रामाण्य‚ परत: अप्रामाण्य
(d) परत: प्रामाण्य‚ स्वत: अप्रामाण्य
Ans: (c) मीमांसा के अनुसार प्रामाण्य स्वत: है‚ परन्तु अप्रामाण्य परत: है। इसका तात्पर्य यह है कि जिन कारणों से ज्ञान उत्पन्न होता है उन्ही कारणों से ज्ञान के प्रामाण्य की भी उत्पत्ति होती है। अत:
प्रामाण्य स्वतोग्राह्य है‚ परन्तु जिन कारणों से ज्ञान उत्पन्न होता है उन्ही कारणों से ज्ञान का अप्रामाण्य नहीं उत्पन्न होता है। इसके लिए अन्य कारणों की उपेक्षा होती है इसलिए अप्रामाण्य परतोग्राह्य हैं। इसे याद करने की एक साधारण ट्रिक-
स्रोत- प्रमाण परिचय- डॉ. बी.एन. सिंह।
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17. सांख्य का कारणता सिद्धान्त आधारित है:
(a) कार्य का कारण से सम्बन्ध नहीं है।
(b) कार्य पहले से ही कारण में अवस्थित नहीं रहता।
(c) कार्य शून्य से पैदा किया जाता है।
(d) कार्य पहले से ही कारण में अवस्थित रहता है।
Ans: (d) सांख्य के कारणता सिद्धान्त को सत्‌कार्यवाद कहते है। सत्कार्यवादियों के अनुसार कार्य उत्पत्ति के पूर्व अपने कारण में विद्यमान रहता है अत: कार्य कोई नवीन रचना नहीं है बल्कि केवल अव्यक्त का व्यक्त होना है। कारणावस्था अव्यक्ता अवस्था है जबकि कार्यावस्था व्यक्ता अवस्था है अत: कार्य पहले से ही कारण में अवस्थित रहता है। स्रोत- भारतीय दर्शन की समीक्षात्मक रूपरेखा- राममूर्ति पाठक
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18. पतंजलि के अनुसार सास्मिता है:
(a) योग (b) समाधि
(c) आसन (d) प्राणायाम
Ans: (b) समाधि का अर्थ है ध्येय वस्तु में चित्त की विक्षेपरहित एकाग्रता है। समाधि के दो भेद है संप्रज्ञात और असंप्रज्ञात‚ संप्रज्ञात समाधि चार प्रकार की होती हैसवितर्व â – चित्त पदार्थ के सम्पर्क में आकर उसका आकार ग्रहण कर लेता है एवं इस प्रकार वस्तु के स्वरूप का साक्षात्कार करता है अत: सवितर्क समाधि में स्थूल वस्तु की भावना की जाती है। सविचार – जहाँ तन्मात्रा आदि सूक्ष्म वस्तु की भावना की जाती है उसे सविचार समाधि कहते है। सानन्द – सानन्द समाधि में सूक्ष्म सुखात्मक इन्द्रियों की भावना की जाती है। सास्मिता-सास्मित समाधि में नितान्त सूक्ष्म अस्मिता या चित्प्रकाशित बुद्धि की भावना की जाती है। यही योग का चरम लक्ष्य है। स्रोत – भारतीय दर्शन आलोचन और अनुशीलनचन्द्रधरशर्मा
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19. शंकराद्वैत द्वारा प्रतिपादित कारणता के सिद्धान्त को परिपुष्ट किया:
(a) अनुभव (b) तर्क
(c) ग्रंथ (शास्त्र) (d) उपरोक्त सभी
Ans: (b) शंकराचार्य के अनुसार कारणता के सिद्धान्त को पुष्टि करते हुए विवर्तवाद का समर्थन किया है। और तर्को द्वारा उसे परिपुष्ट किया। विक्र्तवाद के अनुसार कारण अपने कार्य का वास्तविक रूपान्तरण न होरक केवल आभासात्मक परिवर्तन परिणाम होता है। अत: शंकर ने कारणता के सिद्धान्त को केवल तर्क द्वारा ही परिपुष्ट किया।
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20. यह सिद्धान्त‚ कि कार्य केवल कारण का प्रत्यक्ष परिणाम होता है‚ इस सिद्धान्त को कहते हैं:
(a) सत्कार्यवाद (b) असत्‌कार्यवाद
(c) परिणामवाद (d) विवर्तवाद
Ans: (d) कार्य अपने कारण रूप में सत्‌ रहता है यह सत्कार्यवाद हैं। कार्य अपने कारण रूप में असत्‌ है यह असत्कार्यवाद हैं। कारण अपने कार्य रूप में वास्तविक परिवर्तन होता है यह यह परिणामवाद है। कारण अपने कार्य रूप में वास्तविक परिवर्तन न होकर न आभासमात्र होता है यह विवर्तवाद हैं इस प्रकार- सांख्य‚ योग‚ वेदान्त सत्कार्यवादी है तथा न्याय-वैशेषिक असत्कार्यवादी हैं। स्रोत- चन्द्रधर शर्मा
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21. निम्नलिखित तर्कों के आधार पर बतलाइए कि डॉ. बी.
आर. अम्बेडकर ने भारत में प्रचलित जाति प्रथा का विरोध क्यों किया?
(a) ……. क्योंकि यह भारतीय राष्ट्र में भेदभाव‚ सामाजिक अन्याय और असमानता को उपजाता है।
(b) ……. क्योंकि यह विदेशी प्रवर्तन है।
(c) …….. क्योंकि यह वैदिक दाय है।
(d) ……. क्योंकि इसका सुझाव स्मृतियाँ देती हैं।
Ans: (a) डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने भारतीय राष्ट्र में भेदभाव तथा असमानता से क्षुब्ध होकर बौध धर्म को ग्रहण कर लिया था उन्हे बौधिष्ठ कहते हैं। उन्होने जाति प्रथा का कट्टर विरोधी माना जाता है।
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22. श्री अरबिन्दो द्वारा स्वीकृत विकास-सिद्धान्त कहा जाता है:
(a) उद्‌गामी विकास (b) यांत्रिक विकास
(c) समग्र विकास (d) उपरोक्त में से कोई नहीं
Ans: (c) श्री अरबिन्द ‘The life Divine’ नामक पुस्तक में वे स्पष्ट कहते है कि आरोह बिना अवरोहण के‚ उत्थान बिना अवतरण के‚ विकास बिना प्रतिविकास के अचिन्त्य है। श्री अरविन्द की दृष्टि में विकास का अर्थ निरन्तर का उच्चतर में विकसित होना और यह तभी सम्भव है जब उच्चतर का निम्नतर में अवतरण हो। इस प्रकार अरबिन्द का विकास समग्र विकास (Integral Theory of Evolution) हैं। स्रोत- राममूर्ति पाठक
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23. ‘‘वह शंकर का अध्ययन हेगली दृष्टिकोण से करता है।’’ यह कथन किसका है?
(a) स्वामी विवेकानन्द (b) श्री अरबिन्दो
(c) डॉ. एस. राधाकृष्णन्‌ (d) जे. कृष्णामूर्ति
Ans: (b) श्री अरबिन्द की स्कूली शिक्षा दार्जिलिंग में हुयी फिर भी उनका लगाव भारतीय भाषा तथा अध्यात्मिकता से रहा है। अरबिन्द पहले उत्कट देशभक्ति से ओतप्रोत स्वतंत्रता सेनानी रहे फिर बाद में गम्भीर अध्यात्मिक विचारक हो गये। वे वेदान्त का अध्ययन जर्मन दार्शनिक हीगल की दृष्टिकोण से किये है। इनकी निम्नलिखित कृतयाँ है- सावित्री‚ एसेज आंन दि गीता‚ लाइफ डिवाइन‚ दि ह्यमन साइकिल आदि। स्रोत-राममूर्ति पाठक
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24. जे. कृष्णामूर्ति के अनुसार सत्य ज्ञान है:
(a) जिसे किसी धार्मिक ग्रंथ ने स्वीकार किया हो।
(b) जिसे गुरुओं द्वारा निर्धारित किया गया हो।
(c) अप्रतिबंधित चेतनता
(d) प्रतिबंधित प्रतिक्रिया
Ans: (c) जे. कृष्णमूर्ति के अनुसार जो वस्तु जैसी है उस वस्तु को वैसे ही जानना ही सत्य ज्ञान है। सत्य ज्ञान किसी के द्वारा प्राप्त नहीं होता है न ही गुरु द्वारा न ही ईश्वर द्वारा। सत्यज्ञान व्यक्ति के अन्तरिक अवाधित चेतना से ही स्वयं से ही प्राप्त किया जा सकता है। वे धार्मिक गुरु‚ धार्मिक पुस्तक‚ परम्पराओं आदि को सत्य ज्ञान प्राप्त करने में बाधक मानते है। उनकी पुस्तक- प्रथम और अन्तिम मुक्ति‚ ज्ञान से मुक्ति‚ आदि है। स्रोत-First and last Freedom- J. Krishnamurti
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25. महात्मा गांधी ने अपनी किस रचना में औद्योगीकरण की आलोचना की?
(a) आत्मकथा (b) हिंद स्वराज
(c) स्वास्थ्य की कुंजी (की टू हेल्थ) (d) हरिजन
Ans: (b) महात्मा गाँधी कहते हैं कि हम उत्पादक चाहते है लेकिन आवश्यकतानुसार। उनका मानना था कि औद्योगीकरण से व्यक्ति की आवश्यकता बढ़ती है और व्यक्ति बेरोजगार होते है जिसके कारण समाज में असमानता बढ़ती है इसलिए वे अपनी रचना ‘हिन्द स्वराज’ में इसकी आलोचना करते थे। उन्होने अपने आत्मकथा सत्य के साथ मेरे प्रयोग लिखी हैं वे दलित वर्गो के उत्थान के लिए ‘हरिजन’ नामक पत्रिका भी निकालते थे। स्रोत- समाज दर्शन का सर्वेक्षण- डॉ. शिव भानु सिंह।
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26. युवा सुकरात ने किस दार्शनिक का साक्षात्कार लिया था?
(a) हेराक्लाइटस (b) प्लेटो
(c) पार्मेनाइडी़ज (d) ़जेनो
Ans: (c) युवा सुकरात ने पार्मेनाइडीज का साक्षात्कार लिया था। इलियाई सम्प्रदाय को एक व्यवस्थित विचारधारा के रूप में स्थापित करने का श्रेय पार्मेनाइडीज (520 ई.पू.) को है। उनके अनुसार सृष्टि का मूल आधार एक अपरिवर्तनशील‚ अद्वितीय‚ अविनाशी और
कूटस्थ विशुद्ध सत्ता (Being) है। स्रोत- पाश्चात्य दर्शन का उद्‌भव और विकास डॉ. हरिशंकर उपाध्याय।
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27. संभूति के सिद्धान्त को किसने स्थापित किया?
(a) प्लेटो (b) पार्मेनाइडी़ज
(c) हेराक्लाइटस (d) सेंट एन्सेल्म
Ans: (c) पार्मेनाइडीज के ही समकालीन हेराक्लाइटस ने पार्मेनाइडीज के ठीक विरूद्ध संभूति (Becoming) के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। उसके अनुसार परिवर्तन ही सत्‌ है स्थिरता और अभेद मिथ्या है‚ भ्रामक है। जगत में कुछ भी शाश्वत नहीं है सब कुछ परिवर्तनशील है। जैसे- एक ही नदी में हम गोता लगाते भी है और नहीं भी लगाते हैं क्योकि वह निरन्तर प्रवाहित हो रहा हैं अत:
सत्‌ क्षणिक एवं परिवर्तनशील है। स्रोत- डॉ. हरिशंकर उपाध्याय
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28. ‘‘मानव सभी वस्तुओं का मापदण्ड है।’’ यह कथन किसका है?
(a) प्लेटो (b) अनाक्सिमेनेस
(c) प्रोटेगोरस (d) ़जेनो
Ans: (c) प्रोटोगोरस का एक सुप्रसिद्ध सिद्धान्त है- मनुष्य प्रत्येक वस्तु का मानदण्ड है (Homo Mensura) प्रोटागोरस का यह कथन सम्पूर्ण सोफिस्ट दर्शन का सार तत्व है। ज्ञानमीमांसीय दृष्टि से प्रत्येक मनुष्य के लिए वही सत्य है‚ जो उसे सत्य प्रतीत होता है। पार्मेनाइडीज‚ हेराक्लाइटस‚ डिमॉक्रिटस आदि दार्शनिकों ने बुद्धि एवं इन्द्रिय में भेद करते हुए तत्व ज्ञान का आधार बुद्धि को माना था। इन्द्रियों के द्वारा केवल स्थूल जगत का सतही ज्ञान हो सकता है किन्तु प्रोटागोरस बुद्धि और इन्द्रियजन्य ज्ञान के इस भेद का निराकरण करता हैं सत्य व्यक्ति की संवेदना और अनुभूति तक ही सीमित है। इससे स्पष्ट है कि सोफिस्ट सत्य को आत्मनिष्ठ
(Subjective) बना देते है। स्रोत- पाश्चात्य दर्शन का उद्‌भव और विकास डॉ. हरिशंकर उपाध्याय
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29. ‘‘शुभ और अशुभ एक हैं’’-ऐसा विश्वास किसका था?
(a) थेली़ज (b) हेराक्लाइटस
(c) अरस्तू (d) अनाक्सिमेनेस
Ans: (b) हेराक्लाइटस के सिद्धान्त को संभूति का सिद्धान्त कहा जाता है। उसने संघर्ष‚ विरोध और समन्वय अर्थात विरोधी शक्तियों के सामन्जस्य सिद्धान्त का भी प्रतिपादन किया इसके अन्तर्गत दो परस्पर विरोधी शक्तियों में समन्वय हो जाता है। विरोधी का अर्थ परिवर्तन है। एक भौतिक तत्व का दूसरे तत्व में परिवर्तन निषेध के द्वारा होता है। गतिशील जीवन के लिए विरोध का होना आवश्य है हेराक्लाइटस ने यह दावा किया कि संघर्ष एवं विरोध प्रकृति तथा विकास के लिए आवश्यक है। हेराक्लाइटस का दर्शन सापेक्षतवादी होने के साथ-साथ बुद्धिवादी है। ‘परिवर्तन-सिद्धान्त’- सापेक्षता का द्योतक है। स्रोत- डॉ. हरिशंकर उपाध्याय
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30. किसने कारणों की संख्या को चार से घटाकर दो कर दिया?
(a) पार्मेनाइडी़ज (b) पाइथोगोरस
(c) प्लेटो (d) अरस्तू
Ans: (d) अरस्तू इन चार कारणों के संयुक्त रूप में किसी कार्य के सम्पादन के लिए अनिवार्य और पर्याप्त मानता है। अरस्तू ने इनमें से तीन कारणो-निमित्त कारण‚ आकारिक कारण और प्रयोजन कारण का अन्तर्भूत आकार (Form) में कर लिया हैं। वास्तव में ये तीनों कारणों आकार के ही भिन्न-भिन्न रूप (अवस्थाए) है। आकारिक कारण किसी वस्तु का सारतत्व या प्रत्यय है। प्रयोजन मूलक कारण उस वस्तु के संप्रत्यय का यथार्थ रूप में रूपान्तरण है। किसी वस्तु का अन्तिम लक्ष्य अपने यथार्थ स्वरूप को प्राप्त करना हैं इस प्रकार अरस्तू समस्त कारणों का अन्तर्भूत आकार (Form) और जड़ द्रव्य
(Matter) इन दो कारणों में कर लेते है। स्रोत- पाश्चात्य दर्शन का उद्‌भव और विकास डॉ. हरिशंकर उपाध्याय
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31. प्लेटो के अनुसार निम्नलिखित में से सत्‌ क्या है?
(a) वस्तुएँ (b) प्रत्यय
(c) आत्मा (d) उपरोक्त में से कोई नहीं
Ans: (b) प्लेटो के अनुसार प्रत्ययों की वास्तविक सत्ता है। रिपब्लिक में प्लेटों ने ‘ज्ञान’ और ‘मत’ में इस दृष्टि से भेद किया हैं कि ज्ञान के विषय प्रत्यय है और मत के विषय प्राकृतिक (दृश्य) वस्तुएं हैं वह ज्ञान के विषयों अर्थात प्रत्ययों को स्थिर‚ अपरिवर्तनशील और वास्तविक सत्ता कहता है। अत: ज्ञान सदैव सत्य अनिवार्य‚ असंदिग्ध और अपरिवर्तनशील होता है। स्रोत- पाश्चात्य दर्शन का उद्‌ीाव और विकास डॉ. हरिशंकर उपाध्याय।
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32. सम्पूर्ण पाश्चात्य दर्शन किसके दर्शन की पाद-टिप्पणी है?
(a) सुकरात (b) अरस्तू
(c) प्लेटो (d) पार्मेनाइडी़ज
Ans: (c) प्राय: प्लेटो दर्शन के उन सभी सिद्धान्तों के आदि प्रवर्तक है जिनका विकास उनके बाद के दार्शनिकों ने किये हैं। यहाँ तक कि मध्यकाल के धर्मपरायण दार्शनिक भी बाइबिल की मान्यताओं पर आधारित विचारधाराओं को प्लेटो अथवा अरस्तू द्वारा समर्थित मानते है। अत: प्लेटों के बारे में ‘ए. एन. ह्वइटहेड’ का यह कथन कि – समस्त दर्शनिक परम्परा प्लेटों के दर्शन पर धारावाहिक टिप्पणी मात्र है। स्रोत- डॉ. हरिशंकर उपाध्याय
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33. ‘एक अपरीक्षित जीवन रहने योग्य नहीं है।’ यह किस दार्शनिक का विचार है?
(a) प्लेटो (b) अरस्तू
(c) सुकरात (d) थेलीज
Ans: (c) सोफिस्टों के सिद्धान्त ‘मनुष्य प्रत्येक वस्तु का मानदण्ड है’ को सुकरात ने खण्डन किया है तथा एक परीक्षित जीवन जीने की वकालत की है। वे कहते हैं कि ज्ञान ही सद्‌गुण हैं ज्ञान अर्थात विवेकयुक्त जीवन ही ज्ञानयुक्त है और ज्ञान ही मूल्य है‚ मूल्य ही ज्ञान है। अत: ज्ञान ही समस्त सत्‌ कर्मों एवं शुभत्व का मूल आधार है। स्रोत- पाश्चात्य दर्शन का इतिहास – डॉ. दयाकृष्ण
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34. सत्ता पर आधारित युक्तियों द्वारा किसने सिद्ध किया कि ईश्वर का अस्तित्व है?
(a) सेंट थामस एक्विनॉस (b) सेंट एन्सेल्म
(c) सेंट ऑगस्टाइन (d) उपरोक्त तीनों
Ans: (b) एनसेल्म के अनुसार ईश्वर एक ऐसी सत्ता है जिससे अधिक महान तत्व की कल्पना नहीं की ज सकती है। एन्सेल्म यह कहता है कि हमारी बुद्धि में निहित ईश्वर का प्रत्यय केवल काल्पनिक नहीं बल्कि एक वास्तविक सत्ता है इससे सिद्ध होता है कि ईश्वर की पूर्णता के पत्यय में उसकी सत्ता निहित है पूर्ण ईश्वर का प्रत्यय होना और उसके अस्तित्व का होना दोनों परस्पर विरोधी सम्प्रत्य है अत: यदि हमारी बुद्धि में पूर्ण ईश्वर का प्रत्यय विद्यमान है तो उसे ईश्वर की सत्ता निश्चित रूप से सिद्ध हो जाती है। स्रोत- पाश्चात्य दर्शन का उद्‌भव और विकास डॉ. हरिशंकर उपाध्याय।
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35. ईश्वर के लिए अचलायमान संचालक की अवधारणा का विकास किसने किया?
(a) सेंट थॉमस एक्विनॉस (b) सेंट एन्सेल्म
(c) अरस्तू (d) प्लेटो
Ans: (c) अरस्तू का ईश्वर एक निरपेक्ष (पूर्ण) आकार है निरपेक्ष आकार होने के कारण ईश्वर ही सृष्टि का निमित्त‚ आकारिक और प्रयोजनमूलक कारण है ईश्वर ही परम लक्ष्य और नि: श्रेयस है चूँकि ईश्वर निमित्तकारण है‚ इसलिए वह समस्त गति एवं संभूति का लक्ष्य कारण अथवा आदि प्रवर्तक है। यद्यपि ईश्वर समस्त विकास‚ परिर्वन‚ गति एवं संभूति का मूल आधार एवं चालक है‚ तथापित वह विकासशील एवं गतिशील नहीं है अरस्तु इसे ‘अथालिक चालक’ (Unmoved mover or prime mover) कहता है। स्रोत- पाश्चात्य दर्शन का उद्‌भव और विकास डॉ. हरिशंकर उपाध्याय
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36. ‘प्रारम्भ में मस्तिष्क एक कोरी स्लेट होता है।’’ यह कथन किसका है?
(a) प्लेटो (b) देकार्त
(c) स्पिनो़जा (d) लॉक
Ans: (d) अनुभव वादी के अनुसार कोई भी ज्ञान जन्मजात नहीं होता जन्म के समय हमारा मस्तिष्क अंधेरी कोठरी या सफेद कागज की भाँति होती है जिससे ज्ञान का प्रकाश अनुभव रूपी खिड़की के माध्यम्‌ से प्रवेश होता है इसीलिए लॉक कहता है कि हमारी बुद्धि में ऐसा कुछ भी नही है जो पहले हमारी इन्द्रियों में नही लॉक के अनुसार ज्ञान अनुभव पर आधारित होता है अत: वैध ज्ञान की प्राप्ति का आधार इन्द्रियानुभव है। लॉक के अनुसार ज्ञान अनुभव पर आधारित होता है अत: ज्ञान अनिवार्य एवं सार्वभौम सत्य न होकर नवीन एवं यथार्थ होता है। स्रोत- पाश्चात्य दर्शन का इतिहास डॉ. दयाकृष्ण
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37. ‘‘तर्क को प्रकृति तक एक शिक्षार्थी के रूप में नहीं बल्कि एक निर्णायक के रूप में पहुँचना चाहिए’’-यह कथन किसका है?
(a) कांट (b) लॉक
(c) हेगल (d) स्पिनो़जा
Ans: (a) कांट के अनुसार इन्द्रिय सम्बेदन बिना बुद्धि विकल्प पंगु है तथा बुद्धि विकल्प बिना इन्द्रिय सम्बेदन अंधे है अपनी इसी मान्यता के आधार पर काण्ट यह कहता है कि ‘‘बुद्धि प्रकृति का निर्माण करती है’’ लेकिन ऐसा वह तत्वमीमांसी आधार पर नहीं कहता जैसे बढ़ई मेज का निर्माण करता है तथा कुम्भकार घड़े का इसका प्रयोग काण्ट शुद्ध रूप से ज्ञानमीमांसी आधार पर करता है जिसके अनुसार बिना बुद्धि के 12 कोटियों से व्यवस्थित किये हुए कोई संवेदन हमारे ज्ञान का आधार नहीं बन सकती। स्रोत- पाश्चात्य दर्शन का उद्‌भव और विकास डॉ. हरिशंकर उपाध्याय
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38. वह दार्शनिक‚ जिसने सामान्य बुद्धिदर्शन का प्रतिरक्षण किया है:
(a) बर्कले (b) हेगल
(c) मूर (d) ग्रीन
Ans: (c) मूर ने दर्शनिक दृष्ट को सामान्य ज्ञान के अनुरूप निरूपित किया। उन्होने अपनी वास्तववादी दृष्टि को सामान्य ज्ञान पर बिठाया तथा बिना किसी हिचक सामान्य ज्ञान के अनुरूप ऐसे तर्को का उपयोग किया। मूर की यह देन है कि उन्होने सामान्य ज्ञान को दार्शनिक प्रतिष्ठा दी। उन्होने अपने लेख ‘A defence of commonsense’ में खीची है वैसे अपने एक भाषण जो ‘Proof of an Eternal world’ के नाम से प्रकाशित लेख है। स्रोत समकालीन पाश्चात्य दर्शन‚ प्रो. बी. के. लाल
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39. निम्नलिखित कथनों में से किसे विटेगिन्सटाइन ने प्रतिपादित किया?
(a) सत्ता दृश्यता हैं।
(b) मैं सोचता हूँ इसलिए मैं हूँ।
(c) मैं हूँ क्योंकि मैं सोचता हूँ।
(d) जहाँ कोई बोल नहीं सकता वहाँ उसे अवश्य चुप रहना चाहिए।
Ans: (d) सत्ता दृश्यता है‚ यह सिद्धान्त अनुभववादी दार्शनिक बर्कले का है। ‘मैं सोचता हूँ इसलिए मैं हूँ’ यह डेकार्ट का सिद्धान्त हैं। विटेगिन्सटाइन के अनुसार – दर्शन भाषा का आलोचनात्मक मात्रा है क्योंकि भाषा अभिव्यक्ति का एक मात्रा साधन है‚ लेकिन भाषा मानवीय भावना‚ विचार को छुपा ले जाती है। जैसे- परिधान
(वध्Eा) का कपड़ा का कार्य शरीर को ढकना है लेकिन कभी-कभी परिधान में शरीर प्रदर्शन के लिए किया जाता हैं इसीलिए विंटेगेंस्टाइन अपनी पुस्तक ‘टैक्टेटस’ में कहा है कि जो कुछ कहा जा सकता है‚ वह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है‚ जिसके विषय में नहीं कहा जा सकता है वहां मौन रहना चाहिए।
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40. भाषायी खेलों के सिद्धान्त से जिस दार्शनिक का सम्बंध है‚ उसका नाम है:
(a) मूर (b) रसेल
(c) विटेगिन्सटाइन (d) विलियम जेम्स
Ans: (c) भाषायी खेल का सिद्धान्त विटगेंस्टाइन है। अपनी पुस्तक इंविस्टीगेशन में किया है उसका कहना था सोचो नहीं‚ देखो। भाषा के अर्थ को न देखे उसके प्रयोग को देखे।
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41. अर्थ के सत्यापनीयता सिद्धान्त का प्रारम्भ किसके द्वारा हुआ?
(a) अस्तित्ववादी (b) तार्किक प्रत्यक्षवादी
(c) दृश्यप्रपंचवादी (d) अर्थक्रियावादी
Ans: (b) तार्किक प्रत्यक्षवादी दार्शनिकों को उद्देश्य तत्वमीमांसा का निरसन करना था। इसके लिए वे सत्यापन सिद्धान्त का प्रयोग करते हैं तार्किक प्रत्यक्षवादी के सत्यापन के दो रूप मिलते है पहला –
मॉरिक श्लिक। दूसरा – ए. जे. एयर। ए.जे. एयर के अनुसार- सत्यापन का प्रयोग एक मापदण्ड के रूप में‚ तथा सत्यापन का अर्थ- केवल और केवल अनुीाव द्वारा सत्यापन है। स्रोत- समकालीन पाश्चात्य दर्शन – प्रो. बी. के. लाल
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42. वह दार्शनिक जिसने देकार्त के द्वैतवाद की आलोचना यह कह कर की कि यह – ‘मशीन में भूत होने का सिद्धान्त’ है-
(a) ए.जे. एयर (b) जी.ई.मूर
(c) बर्ट्रेन्ड रसेल (d) गिल्बर्ट राइल
Ans: (d) गिलबर्ड राइल अपनी पुस्तक ‘The concept of mind’ में लिखा है कि देकार्त के मन शीर संबंध में कोटि दोष
(catgory mistake) है‚ क्योंकि देकार्त एक तरफ मन शरीर को एक दूसरे का विरोधी कहता है और दूसरी ओर उनके बीच संबंध स्थापित करने का प्रयास करता है। इस प्रकार दो स्तर की सत्ताओं का एक स्तर पर लाकर उनके बीच संबंध स्थापित करना कोटि दोष है। अत: वह इसे व्यंग्यात्मक भाषा में ‘the dogmos of ghosh in the moshine’ ‘‘मशीन में स्थित प्रेत का सिद्धन्त कहता है’’ अर्थात शरीर रूपी कोई यंत्र है‚ जिसे मन रूपी प्रेत नियंत्रित कर रहा है। राइल के अनुसार जब तक इस प्रेत को बाहर नहीं किया जायेगा तब तक मन शरीर के संबंध का समाधान नहीं हो सकता इसलिए वह इस समस्या के समाधान के लिए व्यवहारवादी समाधान प्रस्तुत करता है। स्रोत- समकालीन पाश्चात्य दर्शन प्रो. बी. के लाल
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43. किस सिद्धान्त के अनुसार सत्य व्यवहारीक परिणामों पर आधारित है?
(a) संवादिता सिद्धान्त (b) संसक्तता सिद्धान्त
(c) व्यवहारवादी सिद्धान्त (d) अर्थ – विषयक सिद्धान्त
Ans: (c) सत्यता के सम्बन्ध में मुख्यता तीन प्रकार के सिद्धान्त प्रचलित हैं 1. सम्भाव्यता का सिद्धान्त (Correspondence theory) 2. सुसंगत सिद्धान्त (Coherence theory) 3. उपयोगिता का सिद्धान्त (Pragmatic theory) इसे ही व्यवहारिक सिद्धान्त भी कहा जाता है। सत्यता का अर्थ क्रियावादी सिद्धान्त का समर्थन मुख्य रूप से (पीयर्स‚ जेम्स‚ शिलर‚ डीवी आदि अमेरिकी दार्शनिकों ने किया है। इसके अनुसार सत्यता का निर्धारण उसकी उपयोगिता पर ही होता है। अर्थात जो जितना उपयोगी है वह उतना ही सत्य है।
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44. निम्नलिखित युग्मों में से कौन सा युग्म सिद्धान्तत:
संगत नहीं है?
(a) मूर और रसेल (b) पीयर्स और जेम्स
(c) श्लिक और कोर्नप (d) हाइडेगर और हुसर्ल
Ans: (d) मूर और रसेल – समकालीन भाषा विश्लेषणात्मक के दार्शनिक है। पीयर्स और जेम्स तथा शीलर एवं जॉन डीवी- अर्थ क्रियावादी दार्शनिक है। श्लिक और कोर्नप दोनों तार्किक प्रत्यक्षवादी दार्शनिक है। हाइडेगर तथा हुसर्स क्रमश: अस्तित्ववादी तथा फेनोमेनोलॉजी के संस्थापन दार्शनिक हैं अत: दोनों अलग-अलग परम्परा के दार्शनिक है।
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45. ‘वियाना सर्कल’ सम्बंधित है:
(a) तार्किक प्रत्यक्षवाद (b) परिणामवाद
(c) अस्तित्ववाद (d) दृश्यप्रपंचवाद
Ans: (a) तार्किक प्रत्यक्षवद या तार्किक भववाद (Logical empiricesim) का उद्‌भव बीसवी शताब्दी के तीसरे दशक में ‘विएना’ में हुआ। जिसे विएना सर्कल (vienna circle) के नाम से जाना जाता है। इसमें प्रमुख व्यक्ति मौरिज स्लिक (moritz schlick) था। 1921 में वैचारिक पार्टी का रूप मिल गया। बाद में यह Philosophical movement बन गया। स्रोत- बी.के. लाल
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46. रसेल द्वारा निम्नलिखित में से किसे दर्शन का सार माना गया है?
(a) सौंदर्यशास्त्र (b) नीतिशास्त्र
(c) तर्कशास्त्र (d) मूल्यशास्त्र
Ans: (c) रसेल एक गणितज्ञ दार्शनिक है। उसकी पुस्तक का नाम Logical construction तथा Mysticisms logic है। उसके सिद्धान्त का नाम – Logical description
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47. देकार्ट ने प्रारम्भ किया
I. गणित शास्त्रीय पद्धति
II. ईश्वर के अस्तित्व के पक्ष में दिए गए प्रमाण
III. शरीर-मन के सम्बन्धों की व्याख्या
IV. प्राथमिक एवं गौण गुणों के बीच के भेद का प्रारम्भ प्रदत्त कूट से सही उत्तर का चयन कीजिए –
कूट:
(a) केवल I और II सही हैं।
(b) केवल II और III सही हैं।
(c) केवल III और IV सही हैं।
(d) केवल I, II और III सही हैं।
Ans: (d) रेने डेकार्ट एक गणितज्ञ या उसने संदेह पद्धति का प्रयोग साधन के रूप में प्रयोग करके एक स्वयं सिद्ध सत्य की खोज करना चाहता था। इसके लिए उन्होने सर्वप्रथम्‌ गणितीय पद्धति का प्रयोग किया‚ जिससे आत्मा‚ ईश्वर तथा जगत और मन-शरीर सिद्धान्त की व्याख्या किया। प्राथमिक एवं गौण गुणों के बीच का भेद जांन लॉक नामक दार्शनिक ने किया। स्रोत- डॉ. हरिशंकर उपाध्याय।
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48. निम्नलिखित दो कथनों में से पहले को अभिकथन (A) और दूसरे को तर्क (R) कहा गया है।
अभिकथन (A) : पूर्ववर्ती विटेगिन्सटाइन ने अर्थ के चित्र सिद्धान्त को दिया है।
तर्क (R) : पश्चात्वर्ती विटेगिन्सटाइन के लिए भाषा का कार्य तथ्यों का कथन है। इन दोनों कथनों में‚ प्रदत्त कूट से सही उत्तर का चयन कीजिए।
कूट:
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (A) का (R) सही स्पष्टीकरण है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं‚ परन्तु (A) का (R) सही स्पष्टीकरण नहीं है।
(c) (A) सही हैं परन्तु (R) गलत हैं।
(d) (A) सही हैं परन्तु (R) सही हैं।
Ans: (b) विटगेंस्टाइन की पुस्तक ‘टैक्टैटस लॉजिको फिलोसॉफिकल’ भाषा- विश्लेषण पर पहली पुस्तक थी‚ जो 1921 में जर्मन भाषा में छपी थी‚ विटगेस्टाइन के अनुसार – दार्शनिक समस्या भाषा की समस्या है। जगत तथ्यों की समग्रता है न कि वस्तुओं की। इस प्रकार वह पहले भाषा से दार्शनिक समस्या का समाधान करता है तथा बाद में भाषा के प्रयोग से दार्शनिक समस्याओं का समाधान करता है। उसके अनुसार भाषा के अर्थ को मत देखे भाषा को सन्दर्भानुसार देखें। स्रोत- प्रो. वी. के. लाल
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49. निम्नलिखित रचनाओं के सही क्रम का चयन कीजिए।
(a) एन एसे कंसरनिंग ह्यूमन अण्डरस्टैंडिंग‚ मेडिटेशन्स‚ आर्गनान‚ रिपब्लिक
(b) रिपब्लिक‚ मेडिटेशन्स‚ आर्गनान‚ एन एसे कंसरनिंग ह्युमन अण्डरस्टैंडिंग
(c) रिपब्लिक‚ आर्गनान मेडिटेशन्स‚ एन एसे कंसरनिंग ह्यूमन अण्डरस्टैंडिंग
(d) मेडिटेशन्स‚ रिपब्लिक‚ एन एसे कंसरनिंग ह्यूमन अण्डरस्टैंडिंग‚ आर्गनान
Ans: (c) पुस्तक – लेखक रिपब्लिक – प्लेटो मेडिटेशन्स – रेने डेकार्ट एन एसे कंसरलिंग ह्यूमन – जॉन लॉक अण्डर स्टैडिंग डिसकोर्स ऑन दि मेथर्ड – रेने डेकार्ट मोनार्ड – लाइब्नीज
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50. सूची I को सूची II से सुमेलित कीजिए और प्रदत्त
कूट से सही उत्तर का चयन कीजिए। सूची I सूची II
(लेखक) (पुस्तक)
(A) गिल्बर्ट राइल (i) फिलॉसाफिकल स्टडीज
(B) बर्ट्रेन्ड रसेल (ii) आइदर/ऑर
(C) हाइडेगर (iii) दि कंसैप्ट ऑफ माइंड
(D) जी. ई. मूर (iv) एन इनक्वायरी इनटू मीनिंग एण्ड ट्रूथ
कूट:
(A) (B) (C) (D)
(a) (iv) (iii) (ii) (i)
(b) (ii) (i) (iv) (iii)
(c) (iii) (iv) (ii) (i)
(d) (iii) (ii) (iv) (i)
Ans: (*) कोई उत्तर सही नहीं है। लेखक पुस्तक गिल्बर्ट राइल – दि कंसेप्ट ऑफ माइंड बर्टेन्ड रसेल – एन एनक्वायरी इनटू मीनिंग एण्ड टुथ’ हाइडेगर – बीइन एण्ड टाइम जी.ई.मूर – फिलॉसाफिकल स्टडीज किर्केगार्ड – आइदर/ऑर
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