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UGC NTA NET JRF Subject Philosophy Solved Previous Papers (In Hindi) Book

UGC NTA NET JRF Subject Philosophy Solved Previous Papers (In Hindi) 2013

1. नीचे दो कथन दिए गए हैं। एक को अभिकथन (A) और दूसरे को कारण (R) का नाम दिया गया है। इन दोनों के संदर्भ में नीचे दिए विकल्पों में से कौन सा विकल्प तर्कनिष्ठ भाववाद के अनुसार सत्य है?
अभिकथन (A) : तत्वमीमांसा निरर्थक है। कारण (R) : तत्वमीमांसीय कथन सत्यापनीय नहीं है।
कूट:
(a) (A) सत्य हैं और (R) असत्य है और (R)‚ (A) की सही व्याख्या करता है।
(b) (A) और (R) दोनों सत्य हैं‚ और (R)‚ (A) की सही व्याख्या करता है।
(c) (A) और (R) दोनों असत्य हैं‚ और (R)‚ (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(d) (A) असत्य हैं‚ और (R) सत्य है और (R)‚ (A) की सही व्याख्या नहीं प्रदान करता है।
Ans: (b) तर्कनिष्ठ भाववाद में‚ वो कथन जिनका सत्यापन किसी भी प्रकार से नहीं किया जा सकता निरर्थक है। भाववादियों के अनुसार तत्वमीमांसीय कथन का सत्यापन नहीं किया जा सकता है अत: तत्वमीमांसा के कथन निरर्थक होते है।
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2. दिये गये अभिकथन और कारण पर विचार करें और संत ऑगस्टाइन प्रदत्त अशुभ की समस्या के प्रकाश में‚ सही विकल्प बताएँ
अभिकथन (A) : वृहत्तर शुभ के लिए अशुभ आवश्यक है। कारण (R) : अशुभ सकारात्मक नहीं‚ परन्तु व्यक्तिगत शुभ है।
कूट:
(a) (A) और (R) दोनों सत्य हैं और (R)‚ (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सत्य हैं‚ और (R)‚ (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सत्य हैं‚ और (R) असत्य है और (R)‚ (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(d) (A) असत्य हैं‚ और सत्य है और की सही व्याख्या नहीं प्रदान करता है।
Ans: (b) संत आगस्टाइन के अनुसार अशुभ शुभ का अभाव है। सृष्टि में अशुभ का विधान मानव कल्याण के साधन के रूप में हुआ है। अर्थात्‌ वृहत्तर शुभ के लिए अशुभ आवश्यक है। ऑगस्टाइन के अनुसार अशुभ के लिए मनुष्य उत्तरदायी है क्योंकि यह मानव के कदाचार का फल है। अर्थात्‌ अशुभ सकारात्मक नहीं है आभावात्मक परन्तु यह व्यक्तिगत है। अभिकथन (A) भी सत्य है और कारण (R) भी सत्य है। और कारण (R)‚ (A) की सही व्याख्या नहीं है।
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3. नीचे दो कथन दिए गए हैं। एक को अभिकथन (A) और दूसरे को कारण (R) का नाम दिया गया है।
अभिकथन (A) : देकार्त की पद्धति को गणितीय पद्धति कहा जाता है। कारण (R) : उनका लक्ष्य निश्चित तथा स्वत:सिद्ध सत्य प्राप्त करना है। उपर्युक्त दो कथनों के संदर्भ में‚ निम्नलिखित में से कौन सा कोड सही है?
कूट:
(a) (A) सत्य हैं और (R) असत्य है तथा (R)‚ (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत करता है।
(b) (A) और (R) दोनों सत्य हैं‚ किन्तु (R)‚ (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत नहीं करता है।
(c) (A) असत्य है‚ (R) सत्य हैं‚ तथा (R)‚ (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत करताहै।
(d) (A) तथा (R) दोनों असत्य है तथा (R)‚ (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत नहीं प्रदान करता है।
Ans: (b) देकार्त की पद्धति को गणितीय पद्धति कहा जाता है। डेकार्ट अपने दर्शन में गणित से प्रभावित है और दर्शन को भी गणित के समान कुछ स्वयंसिद्धियों पर आधारित करना चाहता था। डेकार्ट का लक्ष्य दर्शन के क्षेत्र में कुछ निश्चित तथा स्वत:सिद्ध सत्य प्राप्त करना था। अभिकथन (A) और कारण (R) दोनों सत्य है परन्तु (R)‚ (A) की सही व्याख्या नहीं है।
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4. कांट के अनुसार ………. विश्वास की उचित विषयवस्तु है।
(a) (फैनोमना) संवृत्ति
(b) (नोमेना) परमार्थ
(c) फैनोमना (संवत्ति) और (परमार्थ) दोनों
(d) न तो फैनोमेना (संवृत्ति) और न ही नोमेना (परमार्थ)
Ans: (b) कांट अपने दर्शन में संवृत्ति (Phenomena) और परमार्थ (Noumena) का विभेद करता है। उसके अनुसार संवृत्ति एक संवेद्य विषय और परमार्थ बौद्धिक चिंतन का विषय है अर्थात्‌ परमार्थ संवेद्य अनुभव का विषय नहीं है। काण्ट के अनुसार परमार्थ विश्वास की उचित विषयवस्तु है।
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5. इनमें से कौन दार्शनिक पर्याप्त कारणता के नियम से सम्बन्धित हैं?
(a) लॉक (b) बर्कले
(c) लाईब्नित्ज (d) प्लेटो
Ans: (c) लाईबनित्ज ईश्वर की सत्ता को सिद्ध करने के लिए ‘पर्याप्त कारणता’ का सिद्धान्त प्रतिपादित करता है। उसके अनुसार केवल उसी वस्तु का अस्तित्व सिद्ध किया जा सकता है जिसका कोई ‘पर्याप्त कारण’ हो। इस सृष्टि का कोई न कोई पर्याप्त कारण अवश्य होगा। सृष्टि का यह पर्याप्त कारण ईश्वर ही हो सकता है। यह एक अनुभव पर आधारित सृष्टि वैज्ञानिक युक्ति ही है।
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6. निम्नलिखित में से कौन इमैन्युल कांट की कृति नहीं है?
(a) क्रिटीक ऑफ प्योर री़जन
(b) फाउंडेशन ऑफ मेटाफिजिक्स ऑफ मोरल्‌स
(c) क्रिटीक ऑफ प्रैक्टिकल री़जन
(d) दी फेनोमेनोलॉजी ऑफ स्पिरिट
Ans: (d) ‘क्रिटिक ऑफ प्योर री़जन’‚ ‘फाउंडेशन ऑफ मेटाफिजिक्स ऑफ मोरल्स‚ ‘क्रिटीक ऑफ प्रैक्टिकल री़जन काण्ट की कृति है’ जबकि दी फेनोमेनोलॉजी ऑफ स्पिरिट हेगेल की कृति है।
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7. रसेल के अनुसर तीन ‘आद्य अवधारणाएँ’ हैं
(a) ‘0’ ‘संख्या’ और ‘अनुक्रम’
(b) ‘तथ्य’‚ ‘अभिकथन’ और ‘तर्क’
(c) ‘तार्किक परमाणुवाद’‚ ‘सामान्य बोध’ और ‘विज्ञान’
(d) ‘ईश्वर’‚ ‘आत्मा’ और ‘विश्व’
Ans: (a) रसेल अपने गणित-दर्शन में कुछ मूल सिद्धान्तों की बात करते हैं। वह अपने प्रारूप सिद्धान्त के अन्तर्गत तीन आद्य अवधारणाओं (Primitive Ides) की बात करते है वे है- 0
(शून्य)‚ संख्या (Number), तथा अनुक्रम (successor) उनके अनुसार इन्हे शुद्ध तार्किक भावों में सफलतापूर्वक रूपान्तरित कर दिया जाय।
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8. नीचे दिए गए कथनों को ध्यान से पढ़े और नीचे दिए विकल्पों में से सही पर चिन्ह लगाए:
I. मूर सामान्य बोध के दार्शनिक है।
II. मूर प्रत्ययवादी है।
III. मूर इन्द्रिय-प्रदत्त के दर्शन का खंडन करते हैं।
IV. मूर यथार्थवादी हैं। कोड:
(a) केवल I सत्य है।
(b) I और II सत्य हैं परन्तु III और IV असत्य हैं।
(c) IV को छोड़कर सभी सत्य हैं।
(d) I और IV सत्य हैं परन्तु II और III असत्य हैं।
Ans: (d) मूर एक यथार्थवादी/वस्तुवादी दार्शनिक है। जो सामान्य ‘बोध’ को अपने दर्शन में महत्वपूर्ण स्थान देते हुए प्रत्ययवादी विचारधारा का खण्डन करते हैं। मूर इन्द्रिय-प्रदत्त के दर्शन को मानते है। उनके अनुसार इन्द्रिय-प्रदत्त शब्द अनेकार्थक है।
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9. सोफिस्टों के नैतिक सिद्धान्त के संन्दर्भ में निम्नलिखित कथनों पर ध्यान दें और नीचे दिए कोडों में से सही पर चिन्ह लगाए:
1. नैतिकता प्राथमिक नैतिक भावना तथा इच्छाओं पर आधारित है।
2. नैतिकता वह है जो अधिकांश लोगों के लिए स्वीकार्य‚ उपयोगी और वांछित है और इसलिए यह प्रथा पर आधारित है।
3. राज्य के नियमों का आधार है ‘शक्ति ही अधिकार है’। कोड:
(a) 1 और 3 सत्य हैं और 2 असत्य है।
(b) 1, 2 और 3 सत्य हैं।
(c) 1 और 2 सत्य हैं और 3 असत्य हैं।
(d) केवल 3 सत्य हैं और 1 और 2 असत्य हैं।
Ans: (b) सोफिस्टो को सापेक्ष नैतिकता का प्रवर्तक माना जाता है। मानव केन्द्रित नैतिक दर्शन की शुरूआत की स्थापना किया। उनके अनुसार –
1. नैतिकता प्राथमिक नैतिक भावना तथा इच्छाओं पर आधारित है
2. नैतिकता वह है जो अधिकांश लोगों के लिए स्वीकार्य‚ उपयोगी और वांछित है और इसलिए यह प्रथा पर आधारित है।
3. राज्य के नियमों का आधार है ‘शक्ति ही अधिकार है’।
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10. निम्नलिखित में से किस दार्शनिक के विचारानुसार ‘‘पृथ्वी बेलनाकार आकृति की है और आकाश में स्वतंत्र घूमती है’’?
(a) अनेक्सीमेनी़ज (b) थेल़िज
(c) अनेक्सीमेंडर (d) अरस्तु
Ans: (c) एनेक्जिमेण्डर की यह अवधारणा थी कि विश्व का केन्द्र पृथ्वी है न कि सूर्य और पृथ्वी बेलनाकार है न कि गोलाकार और इसकी चौड़ाई 1/3 है। इसकी दो सतहें‚ जिनमें एक पर हम रहते हैं और दूसरी सतह इसके पीछे है।
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11. नीचे दिए गए दार्शनिकों के समूहों में से कौन सा प्रकृति तथा परम्परा के बीच अन्तर करने के लिए व्यापक रूप से जिम्मदार था?
(a) सोफिस्टस्‌ (b) आइयोनिस्ट
(c) इलायटिक्स (d) माइलेशियन
Ans: (a) सोफिस्ट विचारकों ने प्रकृतिवादी विचारधारा के स्थान पर मानवकेन्द्रित विचारधारा की स्थापना किया है। यह प्राचीन यूनान में प्रचलित थी।
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12. सोरेन किरकेगार्ड के साथ ‘प्रथम अस्तित्ववादी दार्शनिक’ किसे कहा जाता है?
(a) फ्रेडरिक नीत्शे (b) फ्रांसिस नीत्शे
(c) ज्याँ पाल सार्त्र (d) ़जीन पाल सार्त्र
Ans: (a) सोरेन किर्केगार्ड के साथ-साथ फ्रेडरिक नीत्शे को भी प्रथम अस्तित्ववादी’ दार्शनिक माना जाता है। इसके अतिरिक्त एक्विानास‚ पैसकल आदि का नाम भी अस्तत्ववादी इतिहासकारों ने इसके उद्‌भव के सन्दर्भ में किया है।
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13. सूची-I को सूची – II के साथ सुमेलित करें और नीचे दिए कोडों से सही उत्तर का चयन करें:
सूची I सूची II
(A) परमाणुवाद (i) लॉक
(B) सहज-प्रत्ययों का खंडन (ii) हीगल
(C) बुद्धिवाद (iii) हुर्सल
(D) मनोविज्ञानवाद (iv) डेमोक्रिट्‌स
कूट:
(A) (B) (C) (D)
(a) (iv) (ii) (i) (iii)
(b) (iv) (i) (ii) (iii)
(c) (iii) (i) (ii) (iv)
(d) (iv) (ii) (iii) (i)
Ans: (b) परमाणुवाद – डेमोक्रिट्‌स सहज-प्रत्ययों का खंडन – लॉक बुद्धिवाद – हीगल मनोविज्ञानवाद – हुर्सल
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14. नीचे दिए दो कथनों के प्रकाश में सही विकल्प पर चिन्ह लगाए:
कथन:
I. चरम सत्ता को तर्क के पदों में स्पष्ट किया जा सकता है।
II. चरम तत्व को कारण-कार्य सम्बन्ध के पदों में स्पष्ट किया जा सकता है। विकल्प:
(a) कथन – I हीगल के दर्शन के सन्दर्भ में सत्य है परन्तु कथन – II अद्वैत वेदान्त के सन्दर्भ में असत्य है।
(b) कथन – I वेदान्त दर्शन के संदभ में असत्य है और कथन – II हीगल दर्शन के संदर्भ में असत्य है।
(c) दोनों कथन अद्वैत वेदान्त और हीगल दर्शन के संदर्भ में सत्य है परन्तु दोनों कथन दोनों दर्शन के संदर्भ में असत्य हैं।
(d) कथन – I हीगल के दर्शन और अद्वैत वेदान्त दर्शन के संदर्भ में भी असत्य है।
Ans: (b) ‘चरम सत्ता को तर्क के पदों में स्पष्ट किया जा सकता है।’ कथन वेदान्त दर्शन के सन्दर्भ में असत्य है तथा ‘चरम तत्व को कारण – कार्य सम्बन्ध के पदों में स्पष्ट किया जा सकता है।’ यह कथन हीगल दर्शन के सन्दर्भ में असत्य है।
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15. व्यवहारिकतावाद किसके विरुद्ध प्रतिक्रिया है?
(a) निरपेक्ष प्रत्ययवाद और प्रति-बौद्धिकतावाद
(b) निरपेक्ष प्रत्ययवाद और बौद्धिकतावाद
(c) प्रत्ययवाद और प्रति-बौद्धिकतावाद
(d) उपर्युक्त सभी
Ans: (b) व्यावहारिकतावाद (Pragmatism) का दर्शन अमेरिकी विचारधारा में उत्पन्न अतिशय बुद्धिवाद एवं निरपेक्ष प्रत्ययवाद के विरूद्ध प्रतिक्रिया है। इस दृष्टि से मनुष्य कोरे सिद्धान्तों की रक्षा के लिए व्यावहारिक जीवन के लिए उपयोगी मूल्यों का परित्याग नहीं कर सकता है।
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16. नीचे दो कथन दिए गए हैं। एक को अभिकथन (A) और दूसरे को कारण (R) का नाम दिया गया है। इन दो कथनों के प्रकाश में सही विकल्प को चिन्हित करें:
अभिकथन (A) : डेविड ह्यूम संशयवादी हैं। कारण (R) : उनके अनुसार कारण और कार्य के बीच सम्बन्ध केवल मनोवैज्ञानिक होता है‚ तर्कनिष्ठ नहीं विकल्प:
(a) (A) और (R) दोनों सत्य है और (R)‚ (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सत्य हैं‚ परन्तु (R)‚ (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सत्य है‚ (R) असत्य हैं‚ तथा (R)‚ (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत करता है।
(d) (A) असत्य है‚ (R) सत्य है तथा (R)‚ (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत नहीं करता है।
Ans: (b) डेविड ह्यूम संशयवादी दार्शनिक हैं। वो प्रकृति की एकरूपता और कारण – कार्य नियम पर भी संशय करते है। उनके अनुसार कारण और कार्य के बीच सम्बन्ध केवल मनोवैज्ञानक सम्बन्ध होता है‚ तार्किक नहीं।
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17. रसेल के अनुसार परमाणु है
(a) भौतिक (b) आध्यात्मिक
(c) यह दोनों (d) इनमें से कोई नहीं
Ans: (d) परमाणु (atoms) का अर्थ है वह सरलतम अविभाज्य तत्व जिसका और विभाजन नहीं हो सके। रसेल भी ऐसे अविभाज्य परमाणु की खोज में है। किन्तु उनका कहना है कि जिन परमाणुओं तक वे पहुँचते है‚ वे अणु न तो भौतिक और न ही आध्यात्मिक बल्कि तार्किक परमाणु (Logical atoms) है। इसी कारण उनका परमाणुवाद तार्किक है।
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18. नीचे दिए कथनों : अभिकथन (A) और कारण (R) पर विचार करें और दिए गए विकल्पों में से सही पर चिन्ह लगाए:
अभिकथन (A) : अरस्तू ने अपनी कृति ‘मेटाफिजिक्स’ में पाइथागोरस के संख्या सिद्धान्त की तीव्र आलोचना की है। कारण (R) : अरस्तू की आलोचना द्रव्य और आकार के उनके दर्शन और कारणत्व के सिद्धान्त से अनुसरित हुई है। विकल्प:
(a) (A) और (R) दोनों सत्य है और (R)‚ (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों असत्य हैं‚ और (R)‚ (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सत्य है‚ और (R) असत्य हैं‚ और (R)‚ (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(d) (A) असत्य है‚ और (R) सत्य है और (R)‚ (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत नहीं करता है।
Ans: (a) अरस्तू ने अपनी कृति ‘मेटाफिजिक्स’ में पाइथागोरस के संख्या सिद्धान्त की तीव्र आलोचना की है तथा उनकी आलोचना द्रव्य और आकार के उनके दर्शन और कारणत्व के सिद्धान्त से अनुसरित हुई है।
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19. निम्नलिखित में से कौन से दार्शनिक आत्महत्या को इस आधार पर अस्वीाकर करते हैं कि पुनर्जन्म के चक्र को समाप्त करने के बाजय‚ यह उसे वास्तव में सुदृढ़ करता है?
(a) पाइथागोरस (b) डेमोक्रिटस
(c) हेराक्लीटस (d) प्लेटो
Ans: (a) पाइथागोरस आत्मा के आवागमन सिद्धान्त में विश्वास करते है। उनके अनुसार शरीर आत्मा का बन्दीगृह है। मानव आत्मा एक दैवी सम्पत्ती है। पाइथागोरस ‘आत्महत्या’ की इस आधार पर अस्वीकार करते है कि पुनर्जन्म के चक्र को समाप्त करने के बजाय‚ यह वास्तव में सुदृढ़ करता है।
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20. थेल़िज से जुड़ा जड़जीववाद (या भुतजीववाद) का सिद्धांत बताया है कि
(a) केवल जल में जीवन है।
(b) भौतिक द्रव्य में जीवन है।
(c) भौतिक द्रव्य में जीवन नहीं है।
(d) भौतिक द्रव्य और चित्‌ तत्त्व (स्पिरिट) दोनों में जीवन होता है।
Ans: (b) थेल़िज सर्वचेतन्यवाद या जड़जीववाद में विश्वास करते थे। उनके अनुसार सभी वस्तुएं चेतना एवं जीवन से युक्त है। वह चुम्बक में भी जीवन को स्वीकार करते थे।
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21. ‘विरलन’ तथा ‘संघनन’ का सिद्धान्त किसे प्रदान किया है?
(a) एपीक्योरस (b) अनेक्सीमीनस
(c) थेल़ज (d) हेराक्लीटस
Ans: (b) एनेक्जिमेनीज वायु को जगत का मूल कारण मानते थे। इसी से वह जगत की सृष्टि को मानते है। उनके अनुसार यह सृष्टि ‘विरलन’ और ‘संघनन’ नामक दो प्रक्रियाओं से होती है। विरलीकरण और ‘संघनन’ की यह द्विविध प्रक्रिया क्रमश: तापक्रम में वृद्धि और ह्वास से सम्बन्धित है।
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22. अरस्तू के निम्नलिखित चार कारणों में से किसे प्लेटोनिक रूप का अरस्तूवादी-प्रतिपक्ष कहा जा सकता है?
(a) उपादान कारण (b) निमित्त कारण
(c) आकारिक कारण (d) अन्तिम कारण
Ans: (c) अरस्तू के चार कारणों – उपादान कारण‚ निमित्त कारण‚ आकारिक कारण‚ अन्तिम कारण में से आकारिक कारण को प्लेटोनिक रूप का अरस्तूवादी – प्रतिपक्ष कहा जा सकता है।
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23. किसने ‘उपनिषद’ का अर्थ ‘रहस्यमय उपदेश’ बतलाया है?
(a) पॉल डायसन (b) कीथ
(c) राधाकृष्णन (d) शंकर
Ans: (a) ‘पॉल डायसन’ ने ‘उपनिषद’ का अर्थ ‘रहस्यमय उपदेश’ बतलाया है। पॉल डायसन ने अपने ग्रन्थ ‘फिलासफी ऑफ उपनिषद’ में यह अर्थ निश्चित किया है।
(भारतीय दर्शन का सवेक्षण: संगम लाला पाण्डेय)
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24. वैदिक साहित्य के अनुसार तारों तथा ग्रहों की गतियों का निर्देशन कौन करता है?
(a) परमात्मा की इच्छाशक्ति
(b) देवताओं की इच्छाशाक्ति
(c) ऋत्‌
(d) यज्ञ
Ans: (c) वैदिक साहित्य के अनुसार समस्त ब्रह्माण्डीय नियमों भौतिक पिण्डों की गतियों यथा तारों तथा ग्रहों की गतियों का निर्देशन ‘ऋत्‌’ करता है।
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25. ‘आत्मा देहपरिमाण है’ इस विचार का समर्थन कौन करता है?
(a) बौद्ध (b) चार्वाक
(c) बौद्ध और चार्वाक दोनों (d) जैन
Ans: (d) जैन दर्शन के अनुसार ‘आत्मा’ चीटीं के शरीर में चीटीं के आकार का‚ हाथी के शरीर में हाथी के आकार का होता है। अर्थात्‌ वह जिस शरीर में होता है उसी के आकार का होता है। जैन दर्शन मत को ‘देह परिमाण कहते हैं जो चार्वाकों के देहपरिणामवादी मत से भिन्न है।
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26. बौद्ध-दर्शन में पंच स्कंधों का सही क्रम है।
(a) रूप‚ संस्कार‚ विज्ञान‚ सामान्य और वेदना
(b) रूप‚ संज्ञा‚ वेदना‚ संस्कार और विज्ञान
(c) रूप‚ वेदना‚ संज्ञा‚ संस्कार और विज्ञान
(d) रूप‚ विज्ञान‚ संज्ञा‚ संस्कार और वेदना
Ans: (c) बौद्ध दर्शन में शारीरन्द्रिय के सन्दर्भ में पंच स्कन्धों की चर्चा की गयी है जो रूप‚ वेदना‚ संज्ञा‚ संस्कार और विज्ञान है।
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27. जैन तत्वमीमांसा को जाना जाता है
(a) प्रत्ययवादी बहुतत्त्ववाद के रूप में
(b) यथार्थवादी बहुतत्त्ववाद के रूप में
(c) प्रत्ययवादी एकतत्त्ववाद के रूप में
(d) यथार्थवादी एकतत्त्ववाद के रूप में
Ans: (b) जैन तत्वमीमांसा एक तरह से यथार्थवादी (वस्तुवादी) बहुतत्ववाद है। यह सापेक्षतावादी भी हैं जिसे अनेकान्तवादी कहते है। उसके अनुसार तत्व‚ वस्तु‚ द्रव्य अनेक है और प्रत्येक वस्तु के अनन्त धर्म हैं।
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28. योग दर्शन के अनुसार नियमों‚ का सही क्रम क्या है?
(a) शौच‚ सन्तोष‚ तप‚ स्वाध्याय‚ ईश्वरप्रणिधान
(b) सन्तोष‚ शौच‚ ईश्वरप्रणिधान‚ तप‚ स्वाध्याय
(c) तप‚ स्वाध्याय‚ शौच‚ सन्तोष‚ ईश्वरप्रणिधान
(d) ईश्वरप्रणिधान‚ शौच‚ सन्तोष‚ तप‚ स्वाध्याय
Ans: (a) योग दर्शन अपने अष्टाङ्ग योग में दूसरे अंग ‘नियम’ के पांच प्रकार बताते हैं‚ जो क्रमश: शौच अर्थात्‌ शरीर और चिन्त के मल्लों की शुद्धि; सन्तोष अर्थात आवश्यकता से अधिक वस्तुएं संग्रहित न करना‚ तप अर्थात्‌ भूख-प्यास सर्दी-गर्मी‚ सुख-दु:खादि द्वन्द्वों को सहन करना: स्वाध्याय अर्थात्‌ मोक्षशाध्Eों का अध्ययन और मन्त्र-जाप और ईश्वर – प्रणिधान या ईश्वर का ध्यान एवं स्मरण।
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29. सूची – I को सूची – II के मेलित करें और नीचे दिए सही सुमेलित कोड का चयन करें:
सूची I सूची II
(A) प्रशस्तपाद (i) तत्त्व कौमुदी
(B) वाचस्पतिमिश्र (ii) श्लोकवार्तिक
(C) जयन्त भट्ट (iii) न्याय मंजरी
(D) कुमारिल (iv) पदार्थ धर्म संग्रह
कूट:
(A) (B) (C) (D)
(a) (i) (ii) (iii) (iv)
(b) (iv) (i) (iii) (ii)
(c) (ii) (i) (iii) (iv)
(d) (iv) (ii) (i) (iii)
Ans: (b) प्रशस्तपाद का ‘पदार्थ-धर्म-संग्रह‚ वाचस्पति मिश्र का ‘तत्व- कौमुदी: जयन्त भट्ट की ‘न्याय मंजरी‚ कुमारिल का श्लोकवार्तिक है।
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30. किसके निर्देशन में यज्ञ किया जाता है?
(a) ईश्वर (b) देवता
(c) ऋत्विक (d) यजमान
Ans: (c) यज्ञयागादि के विधिपूर्वक अनुष्ठान के लिए ऋत्विजों
(ऋत्विकों) की आवश्यकता होती है‚ जो चार होते हैं- होता‚ उद्‌गाता‚ अध्वर्यु और ब्रह्मा। जिनका सम्बन्ध क्रमश: ऋक्‌‚ साम‚ यजु तथा अथर्व – संहिता से है।
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31. कपड़े के टुकड़े के रंग का असमवायीकारण है
(a) स्वयं कपड़े का टुकड़ा
(b) कपड़े के टुकड़े का रंग/वर्ण
(c) (a) और (b) दोनों
(d) तागों का रंग
Ans: (d) असमवायिकारण समवायिकारण (उपदानकारण) में समवाय सम्बन्ध से रहते हुए कार्योत्पत्ति में सहायक होता है। यह सदा गुण या कर्म होता है तन्तुरूप‚ पटरूप का असमवायिकारण है अर्थात कपड़े के टुकड़े के रंग का असमवायिकारण तागों (तन्तु) का रंग हैं तन्तु संयोग‚ पट का असमवायिकारण है।
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32. भगवद्‌गीता के निष्काम कर्म के सिद्धान्त का मूल अर्थ है।
(a) अपने आपको ईश्वर का यंत्र समझकर कर्म करना।
(b) बिना किसी आसक्ति के कर्म करना।
(c) दूसरों के लिये कर्म करना।
(d) मोक्ष प्राप्ति के लिए कर्म करना।
Ans: (b) भगवद्‌गीता का कर्मयोग ‘निष्काम कर्म’ की बात करता है। जो कर्म का निषेध न होकर‚ कर्म में फलासक्ति या कामना का निषेध करती है। वासना‚ कामना‚ आसक्ति या फलाकांक्षा कर्ता को बंधन में बांधता है। अत: ‘निष्काम कर्म’ बिना किसी आसक्ति के कर्म करने को कहते है।
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33. मीमांसकों के अनुसार निम्नलिखित श्रुति वाक्यों में शामिल होते हैं :
(a) विधि‚ निषेध‚ तर्कवाक्य
(b) विधि‚ तर्कवाक्य‚ अर्थवाद
(c) विधि‚ निषेध‚ अर्थवाद
(d) तर्कवाक्य‚ अर्थवाद‚ निषेध
Ans: (c) मीमांसकों के अनुसार‚ श्रुति वाक्यों में विधि‚ मंत्र‚ नामधेय‚ निषेध‚ अर्थवाद आदि शामिल है। जो वेदवाक्यों का विषयवस्तु आधारित वर्गीकरण है।
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34. निम्नलिखित में से कौन वेद को चार भागों में विभाजित करता है?
(a) कृष्ण (b) व्यास
(c) मनु (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Ans: (d) वेद को कृष्ण‚ व्यास‚ मनु आदि में से किसी ने चार भागों में विभाजित नहीं किया। कुछ लोग वेद को अपौरूषेय’ कुछ लोग ईश्वर द्वारा नि:सृत मानते है।
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35. जैन दर्शन के अनुसार कौन सा एक तत्त्व का लक्षण नहीं है?
(a) उत्पत्ति (b) क्षय
(c) नित्यता (d) अनित्यता
Ans: (d) जैनदर्शन के अनुसार‚ तत्व अनेक है‚ जिनके अनेक धर्म हैं सत्‌ (Reality) का लक्षण है- उत्पाद‚ व्यय (क्षय) और नित्यत्व युक्त होना। उत्पाद व्यय ध्रौव्य संयुक्त सत्‌ ।
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36. कुमारिल आत्मा को निम्न रूप में स्वीकार करते है:
(a) केवल अंशत: जड़
(b) केवल अंशत: बोधात्मक
(c) अंशत: बोधात्मक एवं अंशत: जड़ दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
Ans: (a) कुमारिल आत्मा को जड़बोधात्मक मानते है। कुमारिल के अनुसार द्रव्य के रूप में आत्मा नित्य‚ अभेदात्मक‚ अचिद्‌रूप तथा गुण-कर्म के रूप में अनित्य‚ भेदात्मक एवं चिद्‌रूप है।
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37. चार्वाक ने अनुमान को स्वीकार नहीं किया‚ क्योंकि
(a) अनुमान के विषय का सत्यापन प्रत्यक्ष द्वारा नहीं किया जा सकता है।
(b) हेतु और साध्य के अनिवार्य संबंध को हम स्थापित नहीं कर सकते।
(c) साधारणत: अनुमान का प्रयोग ईश्वर और आत्मा जैसे काल्पनिक विषयों को सिद्ध करने के लिये किया जाता है।
(d) अनुमान प्रत्यक्ष पर आधारित है।
Ans: (b) चार्वाकों ने प्रत्यक्ष के अलावा कोई प्रमाण स्वीकार नहीं किया। उनके अनुसार अनुमान में व्याप्ति मुख्य आधार है जिसकी स्थापना हेतु और साध्य के अनिवार्य संबंध को दिखाकर की जाती हैं चार्वाकों के अनुसार हेतु और साध्य के अनिवार्य संबंध को स्थापित नहीं किया जा सकता है।
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38. किसने कहा है कि ‘‘पूरा पश्चिमी जगत्‌ ज्वालामुखी पर बैठा है जो कल फूटेगा और उसके टुकड़े-टुकड़े हो जायेगा।’’?
(a) के.सी. भट्टाचार्य (b) राधाकृष्णन्‌
(c) कृष्णमूर्ति (d) विवेकानंद
Ans: (d) स्वामी विवेकानन्द के अनुसार‚ ‘‘पूरा पश्चिमी जगत्‌ ज्वालामुखी पर बैठा है जो कल फूटेगा और उसके टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे।’’
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39. कौन आधुनिक भारतीय दार्शनिक यह प्रतिपादित करता है कि व्यक्तिगत /आन्तरात्मिक विकास के लिए पुनर्जन्म अपरिहार्य है?
(a) गांधी (b) के. सी. भट्टाचार्य
(c) इकबाल (d) श्री अरविन्द
Ans: (d) श्री अरविन्द के अनुसार व्यक्तिगत/ आन्तरात्मिक विकास के लिए पुनर्जन्म अपरिहार्य है। श्री अरविन्द स्पष्ट कहते है कि ईश्वरत्व की उपलब्धि का ढंग जन्म तथा पुनर्जन्मों के मार्गों से होता हुआ क्रमिक उपलब्धि ही हैं। सम्भवत: ईश्वरीय ‘लीला’ का यह उपकरण है। उनके अनुसार‚ व्यक्ति को तब तक शरीर धारण करना है – जन्म‚ पुनर्जन्म लेना है- जब तक वह सृष्टि की अभिव्यक्ति के आध्यात्मिक स्तर को प्राप्त न कर लें।
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40. रामानुज के अनुसार ईश्वर में
(a) सजातीय भेद है (b) विजातीय भेद है
(c) स्वगत भेद है (d) उपरोक्त मे से कोई नहीं
Ans: (c) रामानुज ईश्वर/ब्रह्म में स्वगत भेद को मानते है। शंकर का ब्रह्म सजातीय‚ विजातीय एवं स्वगत सभी प्रकार के भेदों से रहित हैं ईश्वर का जीव और जगत से रामानुज अपृथकसिद्धि सम्बन्ध मानते हैं।
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41. नीचे दो कथन-अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। इन दो कथनों के संदर्भ मे नीचे दिए विकल्पों से सही का चयन करें:
अभिकथन (A) : धर्म के रूप में बौद्धधर्म के मूल तत्त्व हैं:
बुद्ध धम्म और संघ। कारण (R) : बौद्ध दर्शन की तीन मूलभूत विशेषताएँ है: अनेक‚ असत्‌ और दु:ख। विकल्प:
(a) (A) और (R) दोनों सत्य है और (R)‚ (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत करता है।
(b) (A) सत्य है‚ (R) असत्य हैं‚ तथा (R)‚ (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत नहीं करता है।
(c) (A) और (R) दोनों असत्य हैं‚ तथा (R)‚ (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत करता है।
(d) (A) असत्य है‚ (R) सत्य है तथा (R)‚ (A) की सही व्याख्या प्रस्तुत करता है।
Ans: (b) ‘धर्म’ के रूप में बौद्ध धर्म के मूल तत्व है: बुद्ध धम्म‚ और संघ हैं। बौद्ध दर्शन की तीन मूलभूत विशेषताएं अनेक‚ असत्‌ और दु:ख नहीं है।
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42. नीचे दो समूह दिए गए है। समूह-I में ग्रंथों के नाम हैं और समूह-II में लेखकों के नाम हैं। सही सुमेलित कोड का चयन करें :
सूची I सूची II
(A) निरुक्त (i) उदयन
(B) वादविधि (ii) धर्मकीर्ति
(C) आत्मतत्त्वविवेक (iii) वसुबंधु
(D) न्यायबिन्दु (iv) यास्क
कूट:
(A) (B) (C) (D)
(a) (i) (ii) (iii) (iv)
(b) (iv) (iii) (i) (ii)
(c) (ii) (i) (iii) (iv)
(d) (i) (iii) (ii) (iv)
Ans: (b) यास्क का ‘निरूक्त’ वसुबंधु का ‘वादाविधि‚ उदयन का ‘आत्मत एवं विकेक‚ धर्मकीर्ति का ‘न्यायबिन्दु’ नामक ग्रन्थ है।
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43. अद्वैत वेदान्त के प्रथम व्यवस्थित प्रवर्तक हैं
(a) शंकर (b) रामानुज
(c) गौड़पाद (d) वाचस्पति मिश्र
Ans: (c) गौड़पदाचार्य को अद्वैत वेदान्त के प्रथम व्यवस्थित प्रवर्तक माना जाता है। गौड़पदाचार्य वह प्रथम उद्वैत वेदान्ती है जिनकी कोई कृति उपलब्ध होती हैं उन्होंने मान्डूक्य उपनिषद पर भाष्य लिखा जिसे ‘माण्डूक्यकारिका’ या ‘आगमशास्त्र’ कहते हैं।
(भारतीय दर्शन की समीक्षात्मक रूपरेखा: राम मूर्ति पाठक)
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44. स्पिनो़जा देह-मन सम्बन्ध को निम्नलिखित सिद्धान्त के जरिये स्पष्ट करते हैं:
(a) अंत: क्रियावाद
(b) पूर्व-स्थापित सामंजस्यवाद
(c) मनो-दैहिक समानांतरवाद
(d) उपतत्ववाद या अनुघटनावाद
Ans: (c) स्पिनोजा का देह-मन सम्बन्ध मानो-दैहिक समानांतरवाद के नाम से जाना जाता है। डेकार्ट का सिद्धान्त अंत:क्रियावाद तथा लाइबनित्ज का सिद्धान्त पूर्वस्थापित सामंजस्यवाद कहलाता है।
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45. ‘भाषायी-खेल’ का सिद्धान्त निम्नलिखित चिंतक के साथ जुड़ा है:
(a) विट्टगेंस्टीन (b) रसेल
(c) अयर (d) मूर
Ans: (a) ‘भाषायी-खेल’ सिद्धान्त विट्‌गेन्सटाइन का भाषा से सम्बन्धित सिद्धान्त है। विट्‌गेन्सटाइन अपनी पुस्तक ‘फिलॉसफिकल इन्वेस्टिगेसन्स’ अर्थ एवं प्रयोग के सिद्धान्त को देता हैं। उनके अनुसार दार्शनिक समस्याओं के निराकरण की एक विधि यह है उसके भाषीय प्रयोग को देखना‚ जिससे शायद समस्या का निदान हो जाये‚ उलझन समाप्त हो जाय। भाषीय प्रयोगों को देखने की विधि को वे ‘भाषीय खेल’ कहते है।
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46. सूची – I तथा सूची – II को सुमेलित करें तथा नीचे दिए कोडों में से सही विकल्प का चयन करें:
सूची I सूची II
(विचारक) (पुस्तवंâे)
(A) देकार्त (i) ए ट्रीटइ़ज ऑफ ह्यूमन नेचर
(B) स्पिनो़जा (ii) थियोडाइसी
(C) लाइब्नित़्ज (iii) ऐथिका
(D) ह्यूम (iv) मेडीटेशन्‌स
कूट:
(A) (B) (C) (D)
(a) (ii) (iii) (iv) (i)
(b) (ii) (iv) (i) (ii)
(c) (iv) (iii) (ii) (i)
(d) (iii) (iv) (i) (ii)
Ans: (c) देकार्त – मेडीटेशन्‌स स्पिनो़जा – ऐथिका लाइब्नित़्ज – थियोडाइसी ह्यूम – ए ट्रीटाइ़ज ऑफ ह्यूमन नेचर
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47. नैयायिक भ्रम सम्बन्धित निम्नलिखि सिद्धान्त को स्वीकार करते हैं:
(a) सत्‌ – ख्याति (b) असत्‌ – ख्याति
(c) अन्यथा – ख्याति (d) आत्म – ख्याति
Ans: (c) नैयायिकों का भ्रम सिद्धान्त अन्यथाख्यातिवाद हैं। ‘अन्यथा’ का अर्थ है ‘अन्यत्‌ ’ और ‘अन्य रूप में’। दृश्यमान वस्तु
(शुक्ति) का अन्य रूप में (रजत रूप में) प्रत्यक्ष होना और स्मर्यमार्ण वस्तु (रजत) की सत्ता अन्यत्र (बाजार आदि में) होती है।
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48. राधाकृष्णन के अनुसार आत्म का ज्ञान निम्नलिखित विधि के जरिये संभावित है:
(a) बुद्धिमता (b) अंत:प्रज्ञा
(c) अनुभव (d) कल्पना
Ans: (b) राधाकृष्णन अंत:प्रज्ञावादी दर्शनिक है। उनके अनुसार आत्म के ज्ञान का साधन ‘अंत:प्रज्ञा’ है।
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49. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिये और सूचियों के नीचे दिये गये कूट से सही उत्तर चुनिये:
सूची I सूची II
(कार्यकारण सिद्धांत) (सम्प्रदाय)
(A) सत्‌कार्यवाद (i) सांख्य
(B) असत्‌कार्यवाद (ii) विशिष्टाद्वैत
(C) विवर्त्तवाद (iii) न्याय
(D) ब्रह्मपरिणामवाद (iv) अद्वैत-वेदान्त
कूट:
(A) (B) (C) (D)
(a) (i) (iii) (iv) (ii)
(b) (iii) (i) (iv) (ii)
(c) (i) (iii) (ii) (iv)
(d) (iii) (i) (ii) (iv)
Ans: (a) सत्‌कार्यवाद – सांख्य असत्‌कार्यवाद – न्याय विवर्त्तवाद – अद्वैत-वेदान्त ब्रह्मपरिणामवाद – विशिष्टाद्वैत
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50. ईश्वर को ‘नेचुरा नेचुराटा’ किसने कहा है?
(a) लॉक (b) कांट
(c) स्पिनो़जा (d) ह्यूम
Ans: (c) स्पिनोजा अपने दर्शन में ईश्वर को ‘नेचुरा-नेचुराटा’ कहता है। स्पिनोजा ईश्वर के तीन रूपों की चर्चा करता है – ‘नेचुरानेचुराटा‚ ‘नेचुरा-नेचुरान्स’ तथा पररूप (Ens absolutum Indetermiatum)
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