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UGC NTA NET JRF Subject Philosophy Solved Previous Papers (In Hindi) Book

UGC NTA NET JRF Subject Philosophy Solved Previous Papers (In Hindi) 2015

1. नीचे दो कथन दिए गए है एक अभिकथन (A) और दूसरा तर्क (R) के रूप में हैं। (A) और (R) पर विचार करते हुए सही कूट चुने:
अभिकथन (A) : तैजस्‌ में आत्मा सूक्ष्म वस्तुओं को ग्रहण करता है।
तर्क (R) : स्वप्नावस्था में आत्मा स्वयं काल्पनिक वस्तुओं का निर्माण करता है।
कूट:
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R),(A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही है लेकिन (R) गलत है।
(d) (A) गलत है लेकिन (R) सही है।
Ans. (a) : माण्डूक्योपनिषद में आत्मा के पारमार्थिक स्वरूप को जाग्रत‚ स्वप्न‚ एवं सुषुप्ति से भी परे तुरीय नामक एक चतुर्थ अवस्था बताया गया है। आत्मा की चार अवस्थाये मानी गयी है। स्वप्नावस्था में आत्मा जाग्रतावस्था की स्मृति से स्वयं काल्पनिक वस्तुओं का निर्माण करती हैं यह अवस्था ‘तैजस्‌’ कहलाती है। तैजस में आत्मा सूक्ष्म वस्तुओं का आनन्द (engoy) लेती है। (A) और (R) दोनों सही है। और (R), (A) की व्याख्या करता है।
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2. उपनिषद्‌ में हिरण्यगर्भ’ को ………. के रूप में भी जाना गया है।
(a) विश्वकर्मा (b) प्रजापति
(c) सहदााक्ष (d) सहदाशीर्ष
Ans. (b) : उपनिषद्‌ में ‘हिरण्यगर्भ’ को ‘प्रजापति के रूप में भी जाना जाता है। ‘प्रजापति’ का अर्थ है− ‘अपन्यों का स्वामी’। परवर्ती संहिताओं और ब्राह्मण में प्रजापति को तत्वत: देवताओं का मूर्धन्य‚ सबका जनक‚ देवताओं और असुरों का पिता तथा प्रथम यजमान माना गया है। उन्हें विशेष रूप से ब्रह्मन्‌ (ब्रह्मा) का तादात्म बताया गया है। ‘हिरण्यगर्भ-सूक्त’ (ऋग्वेद 10,121) में उन्हें हिरण्यगर्भ कहा गया हैं जिसका अर्थ है। ‘स्वर्णिम बीज’।
(भारतीय दर्शन- डॉ. नन्दकिशोर देवराज)
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3. सही क्रम का चयन करें:
(a) अर्थ‚ काम‚ धर्म‚ मोक्ष
(b) अर्थ‚ धर्म‚ काम‚ मोक्ष
(c) मोक्ष‚ धर्म‚ अर्थ‚ काम
(d) धर्म‚ अर्थ‚ काम‚ मोक्ष
Ans. (c) : भारतीय दर्शन में चार पुरुषार्थ माने गये हें जो क्रमश:
धर्म‚ अर्थ‚ काम‚ मोक्ष है। मानव जीवन के चार परम लक्ष्यों में ‘मोक्ष’ पुरुषार्थ को सबसे अन्त में रखा गया है। ‘मोक्ष’ को ‘परम पुरुषार्थ’ कहा गया है। जो मानव जीवन का ‘चरम आदर्श’ है।
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4. सूची-I को सूची- II से सुमेलित करें तथा नीचे दिये
कूट से सही उत्तर का चयन करें। सूची-I सूची-II
(A) नैगम नय (i) जहाँ सामानय गुण पूर्णत:
वास्तविक समझे जाते हैं एवं विशेष का अवास्तविक के रूप में निषेध हो जाता हैं।
(B) संग्रह नय (ii) जहाँ वस्तुएँ सामान्य और विशेष गुणोंवाली समझी जाती हैं और हम उनमें भेद नहीं कर पाते।
(C) व्यवहार नय (iii) जहाँ यथार्थ का क्षण के साथ अभिज्ञान किया जाता है।
(D) ऋजुसूत्र नय (iv) जहाँ वस्तुओं को केवल मूर्त विशेष समझा जाता है।
कूट:
(A) (B) (C) (D)
(a) (i) (ii) (iii) (iv)
(b) (iv) (iii) (ii) (i)
(c) (ii) (i) (iv) (iii)
(d) (iii) (ii) (iv) (i)
Ans. (c) :
(A) नैगम नय – जहाँ वस्तुएँ सामान्य और विशेष गुणोंवाली समझी जाती हैं और हम उनमें भेद नहीं कर पाते।
(B) संग्रह नय – जहाँ सामानय गुण पूर्णत: वास्तविक समझे जाते हैं एवं विशेष का अवास्तविक के रूप में निषेध हो जाता हैं।
(C) व्यवहार नय – जहाँ वस्तुओं को केवल मूर्त विशेष समझा जाता है।
(D) ऋजुसूत्र नय – जहाँ यथार्थ का क्षण के साथ अभिज्ञान किया जाता है।
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5. सूची- I को सूची- II से सुमेलित करें तथा नीचे दिये
कूट से सही उत्तर का चयन करें। सूची-I सूची-II
(a) वसुबन्धु (i) महायान सूत्रालंकार
(b) असंग (ii) विग्रह व्यावर्तिनी
(c) नागार्जुन (iii) महायान श्रद्धोत्पाद शास्त्र
(d) अश्वघोष (iv) विज्ञप्तिमात्रता सिद्धि
कूट:
(a) (b) (c) (d)
(a) (iv) (i) (ii) (iii)
(b) (ii) (iii) (i) (iv)
(c) (iii) (iv) (ii) (i)
(d) (i) (ii) (iii) (iv)
Ans. (a) :
वसुबन्ध – विज्ञप्तिमात्रता सिद्धि असंग – महायान सूत्रालंकार नागार्जुन – विग्रह व्यावर्तिनी अश्वघोष – महायान श्रद्धोत्पाद शास्त्र
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6. अन्योन्य अभाव की अवधारणा का प्रतिपादन किया गया है:
(a) सांख्या द्वारा (b) न्याय द्वारा
(c) विशिष्टाद्वैत द्वारा (d) अद्वैत द्वारा
Ans. (b) : न्याय दर्शन में अनोन्य अभाव की अवधारणा का प्रतिपादन मिलता है। आभाव का ही एक रूप है। दो वस्तुओं का परस्पर अर्थात दो वस्तुओं के तादात्म्य का आभाव अन्योन्यभाव है जैसे घट पट नहीं है। यदि अन्योन्याभाव न हो तो सारी वस्तुएं अभिन्न हो जायेगी।
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7. दिये गये अभिकथन (A) तथा तर्क (R) पर विचार कीजिए तथा नीचे दिये गये विकल्पों से सही उत्तर का चयन कीजिए:
अभिकथन (A) : आत्मा की न उत्पत्ति होती है न ही विनाश।
तर्क (R) : यह उत्पत्ति विनाश से परे है।
कूट:
(a) (A) तथा (R) दोनों सत्य हैं और (R),(A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) तथा (R) दोनों असत्य हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(c) (A) तथा (R) दोनों सत्य हैं लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(d) (A) असत्य है और (R) सत्य है‚ लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या है।
Ans. (a) : यहां यह स्पष्ट नहीं कि यह किस दर्श्न के आलोक में पूछा जा रहा है परन्तु यदि नास्तिक दर्शनों की आत्मा की व्याख्या को छोड़कर‚ आस्तिक सम्प्रदाय की आत्मा की अवधारणा को ग्रहण किया जाये तो यह कथन (A) और तर्क (R) दोनों सही हैं और
(R), (A) की व्याख्या है।
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8. सूची- I को सूची- II से सुमेलित करें तथा नीचे दिये
कूट से सही उत्तर का चयन करें। सूची-I सूची-II
(a) विनाशपूर्व घट का अभाव (i) अन्योन्या भाव
(b) विनाश के पश्चात्‌ (ii) अत्यंता भाव
(c) पट की भांति नहीं (iii) प्रागभाव
(d) तरल-घट की भांति नहीं (iv) प्रध्वंसा भाव
कूट:
(a) (b) (c) (d)
(a) (i) (ii) (iii) (iv)
(b) (ii) (iii) (iv) (i)
(c) (iv) (iii) (ii) (i)
(d) (iii) (iv) (i) (ii)
Ans. (d) :
विनाशपूर्व घट का अभाव – प्रागभाव विनाश के पश्चात्‌ – प्रध्वंसा भाव पट की भांति नहीं – अन्योन्या भाव तरल-घट की भांति नहीं – अत्यंता भाव
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9. पूर्व-मीमांसा के अनुसार आकृति का तात्पर्य है:
(a) विशेष (b) संस्थान
(c) समवाय (d) गुण
Ans. (b) : पूर्व-मीमांसा में ‘आकृति’ का तात्पर्य संस्थान से है। इसको भ्रमवश ‘जाति’ भी कह दिया जाता है। लेकिन मीमांसक शब्द को जाति कहते है‚ उनके अनुसार शब्द का अर्थ न तो व्यक्ति है और न आकार (आकृति)।
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10. रामानुज के अनुसार निर्गुण का अर्थ है:
(a) कल्याण गुण रहित
(b) अकल्याण गुण रहित
(c) लक्षण रहित
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Ans. (b) : रामानुज के अनुसर ब्रह्म सगुण है। परमतत्व को निर्गुण कहने का कोई प्रमाणिक ज्ञान नहीं है। निर्गुण ब्रह्म की कल्पना श्रुतिसम्मत नहीं श्रुति में वर्णित निर्गुण शब्द प्रकृति के गुणों से रहित सत्ता के अर्थ में है। रामानुज के अनुसार ‘निर्गुण’ का अर्थ अकल्याण गुण रहित है। रामानुज अपने दर्शन में ‘निर्गुण ब्रह्म’ की शंकर की अवधारणा का खण्डन करते हैं।
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11. मायावाद के विरुद्ध सप्तानुपपत्ति (सात शास्त्रीय आपत्ति) को किसने प्रख्यापित किया?
(a) वल्लभ (b) मध्व
(c) रामानुज (d) निम्बार्क
Ans. (c) : शंकर का ‘माया-सिद्धान्त’ का रामानुज द्वारा खण्डन किया गया है। जिसे ‘सप्तानुपत्ति (सात शास्त्रीय आपत्ति) कहा जाता है। रामानुज माया’ को ब्रह्म की वास्तविक शक्ति मानते हैं जिसके द्वारा ब्रह्म सृष्टि की रचना करता है। यह शंकर के मत के विपरीत है। ‘माया’ को रामानुज ब्रह्म की प्रकृति कहते है।
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12. शंकर के दर्शन को कहा जाता है:
(a) एकतत्ववाद (b) समग्र अद्वैतवाद
(c) अद्वैतवाद (d) उपर्युक्त सभी
Ans. (c) : शंकर के वेदान्त दर्शन को ‘अद्वैतवाद’ के नाम से जाना जाता हैं शंकर के अद्वैतवाद के अनुसार पारमार्थिक दृष्टि से ब्रह्म ही एकमात्र सत्‌ है‚ जगत्‌ मिथ्या है और जीव ब्रह्म से अभिन्न है।
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13. विशिष्टाद्वैत दर्शन केवल अनुमोदन करता है…….।
(a) जीवनमुक्ति का (b) विदेहमुक्ति का
(c) दोनों का (d) उपर्युक्त में से किसी का नहीं
Ans. (b) : विशिष्टाद्वैत दर्शन‚ रामानुजाचार्य के नाम के साथ ज्यादा जाना जाता है। यह मोक्ष की अवस्था को अशरीरी अर्थात्‌ विदेहमुक्ति को ही मानते है। रामानुज के अनुसार ‘मोक्ष अप्राप्त की प्राप्ति’ हैं विशिष्टाद्वैत दर्शन में जीवन्मुक्ति को अस्वीकार किया गया है। रामानुज की धारणा है कि क्योंकि जीवात्मा का शरीर-धारण कर्म के ही कारण है। अत: जब तक शरीर रहेगा तब मोक्ष नहीं मिल सकता है।
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14. कौन-सा कथन सत्य नहीं है?
(a) मध्व उत्कट बहुतत्त्ववाद के समर्थन हैं।
(b) मध्व प्रबल वस्तुवादी हैं।
(c) मध्व एक महान ईश्वरवादी हैं।
(d) मध्व ब्रह्म-जीव अभेदवाद के समर्थन हैं।
Ans. (d) : मध्वाचार्य का दर्शन द्वैतवाद का समर्थक हैं ये भी वेदान्ती है। महत्व उत्कट बहुतत्ववादी और प्रबल वस्तुवादी है। वह महान ईश्वरवादी भी है। वह जगत्‌ सत्य है। मध्वाचार्य ने अपने दर्शन में पुंचविध नित्य भेद को स्वीकार किये हैं वह ब्रह्म जीव के अभेदवाद के प्रबल विरोधी हैं और शंकर के अद्वैतवाद के विरोधी।
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15. न्याय के अनुसार कार्य जाना जाता है:
(a) कारण (b) प्रगभाव प्रतियोगी
(c) असमवायी कारण (d) कारण
Ans. (b) : न्याय असत्कार्यवाद है। इसके अनुसार कार्य नई सृष्टि हैं। कार्य उत्पत्ति से पूर्व कारण में विद्यमान नहीं रहता। कार्य अपने प्रागभाव को प्रतियोगी होता है। कार्य अपने प्रागभाव का आभाव है। कार्य की सत्ता का आरम्भ उसकी उत्पत्ति के साथ ही होता हैं भारतीय दर्शन: आलोचन और अनुशीलन चन्द्रधर शर्मा
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16. ज्ञान स्वयं में सत्य होना चाहिए‚ यह विचार प्रतिपादित है:
(a) न्याय द्वारा (b) वेदान्त द्वारा
(c) मीमांसा द्वारा (d) जैन द्वारा
Ans. (c) : मीमांसा दर्शन ज्ञान के प्रमाण्य के सम्बन्ध में स्वत:
प्रमाण्यवादी हैं। उसके ज्ञान स्वयं में सत्य होता है उसके लिए किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं हैं। अज्ञान के सम्बन्ध में मीमांसक परत: उपप्रामाण्य को मानते है।
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17. चेतना आत्मा का एक आगंतुक गुण है‚ स्वीकार किया गया है:
(a) वेदान्त द्वारा (b) पूर्व मीमांसा द्वारा
(c) न्याय द्वारा (d) सांख्य द्वारा
Ans. (c) : न्याय दर्शन में चेतना को ‘आत्मा’ का आगन्तुक गुण स्वीकार किया गया है। न्याय दर्शन मुक्तावस्था में आत्मा को ज्ञान और चैतन्य रहित जड़ और अभौतिक द्रव्य मानता है। यह अन्यान्य भारतीय दर्शनों से एकदम अलग मान्यता हैं।
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18. निम्नलिखित में कौन-सा कथन सही है?
(a) अपृथक्‌सिद्धि है‚ ब्रह्म का जीव के साथ सम्बन्ध।
(b) अपृथक्‌सिद्धि है‚ ब्रह्म का जीव और जगत के साथ सम्बन्ध।
(c) अपृथक्‌सिद्धि है‚ ब्रह्म का केवल जगत के साथ सम्बन्ध।
(d) अपृथक्‌सिद्धि कोई सम्बंध है ही नहीं।
Ans. (b) : अपृथक सिद्धि रामानुजाचार्य के विशिष्टाद्वैत दर्शन में ब्रह्म का जीव और जगत से सम्बन्ध बतलाने के लिए प्रयुक्त एक प्रकार का सम्बन्ध हैं। रामानुज के अद्वैत अर्थात्‌ ब्रह्म तथा द्वैत अर्थात जीव एवं जगत‚ में अपृथकसिद्धि सम्बन्ध हैं। क्योंकि इन्हें एक-दूसरे से पृथक नहीं किया जा सकता है। इसीलिए रामानुजाचार्य का वेदान्त हैतुविशिष्ट-अहैतु कहलाता है।
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19. न्याय का कारणता सिद्धान्त कहा जाता है:
(a) विवर्तवाद (b) असत्कार्यवाद
(c) सत्कार्यवाद (d) यदृच्छावाद
Ans. (b) : न्याय का कारण-सिद्धान्त असत्कार्यवाद कहलाता है। न्याय-वैशेषिक दर्शन के अनुसार कार्य उत्पत्ति से पूर्व अपने कारण में विद्यमान नहीं रहता है। अर्थात्‌ कारण में कार्य उत्पत्ति से पूर्व असत्‌ होता है। अर्थात्‌ कार्य की सत्ता का प्रारम्भ उसकी उत्पत्ति से ही प्रारम्भ होती है। यही असत्कार्यवाद है।
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20. नीचे दो कथन दिये गये हैं जिनमें एक को अभिकथन
(A) कहा गया है तथा दूसरे को तर्क (R)। नीचे दिये गये कूटों से सही उत्तर का चयन करें।
अभिकथन (A) : ‘‘अभ्यास वैराग्यभ्याम्‌ तन्निरोध:’’।
तर्क (R) : सतत्‌ अभ्यास और अनासक्ति के द्वारा चित्त वृत्ति का निरोध।
कूट:
(a) (A)‚(R) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों गलत हैं।
(c) (A) और (R) परस्पर व्याघातक हैं।
(d) (A) सही हैं‚परंतु (R) गलत है।
Ans. (a) : अभ्यास और वैराग्य दोनों की आवश्यकता पर योग दर्शन में बताया गया है। महर्षि पतन्जलि ने उत्तम साधकों की चिन्तवृत्ति-निरोध के लिए ‘अभ्यास-वैराग्य’ को उपय के रूप में बतलाया है। सतत्‌ अभ्यास और अनासक्ति के द्वारा चित्त वृत्ति का निरोध किया जा सकता है।
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21. ईश्वर को परम अंह के रूप में कल्पित करने से इकबाल का तात्पर्य है:
(a) प्रकाश के रूप में ईश्वर
(b) एक गत्यात्मक और सर्जनात्मक जीवन
(c) अनन्त सर्जनात्मक सम्भावनाएँ
(d) जगत की एक सर्जनात्मक प्रगति
Ans. (a) : इकबाल के अनुसार ईश्वर एक परम अहं (supreme ego) है‚ जो अपनी सर्जनात्मकता में सृष्टि का दिशा-निर्देश करता हैं। इकबाल कुरान के ईश्वर को प्रकाश-रूप कहे जाने की व्याख्या अपने दर्शन में करते हैं। प्रकाश की उपमा से सतत गतिशीलता पूर्ण गत्यात्मकता का बोध होता है। इकबाल का कहना है कि ‘प्रकाश’ की उपमा उस ‘परम अहं’ के स्वरूप को समझने के लिए निकटतम उपमा है।
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22. निम्नलिखित में से कौन सा युग्म सही है?
(a) पर्सनाल्टी‚ हिन्द स्वराज-गाँधी
(b) द लाइफ डिवाइन‚ इस्ट एण्ड वेस्ट-श्री अरविन्द
(c) साधना‚ पर्सनाल्टी – टैगोर
(d) इस्ट एण्ड वेस्ट इन रिलिजन‚ दी ह्यूमन सायकिल –
राधाकृष्णन्‌
Ans. (c) : ‘साधना’‚ ‘पर्सनाल्टी’ टैगोर की रचनाएं हैं। ‘दी ह्यूमन सायकिल’‚ ‘द लाइफ डिवाइन’- श्री अरविन्द; ‘इस्ट एण्ड वेस्ट’‚ ‘इस्ट एण्ड वेस्ट इन रिलिजन’- राधाकृष्णन; ‘हिन्द स्वराज’-गांधी
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23. सूची- I को सूची- II से सुमेलित करें तथा प्रदत्त कूट के आधार पर सही उत्तर चुनें:
सूची-I सूची-II
(लेखक) (ग्रन्थ)
(a) के. सी. भट्टाचार्य (i) दी आइडियल ऑफ ह्यूमन यूनिटी
(b) राधाकृष्णन्‌ (ii) दी सीक्रेट्‌स ऑफ सेल्फ
(c) इकबाल (iii) स्टडीज इन वेदान्तिज्म
(d) श्री अरविन्द (iv) दी रीकवरी ऑफ फेथ
कूट:
(a) (b) (c) (d)
(a) (iii) (iv) (ii) (i)
(b) (i) (ii) (iii) (iv)
(c) (ii) (iv) (i) (iii)
(d) (iv) (i) (ii) (iii)
Ans. ():
के. सी. भट्टाचार्य – स्टडीज इन वेदान्तिज्म राधाकृष्णन्‌ – दी रीकवरी ऑफ फेथ इकबाल – दी सीक्रेट्‌स ऑफ सेल्फ श्री अरविन्द – दी आइडियल ऑफ ह्यूमन यूनिटी
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24. अन्त: अनुभूति एवं प्रज्ञा एक दूसरे के पूरक हैं निम्न में से किसके अनुसार?
(a) बर्गसॉ (b) कान्ट
(c) राधाकृष्णन्‌ (d) अम्बेडकर
Ans. (c) : राधाकृष्णन के अनुसार‚ अन्त:अनुभूति एवं प्रज्ञा एक दूसरे के पूरक हैं राधाकृष्णन के अनुसार अन्त: अनुभूति से प्राप्त ज्ञान प्रामाणिक ज्ञान है। बौद्धिक ज्ञान (Intellect, प्रज्ञा) कभी भी पूर्ण नहीं होता जबकि प्रतिभ ज्ञान (Intnition) एक पूर्ण ज्ञान हैं प्रज्ञा (बौद्धिक ज्ञान) के ज्ञान की सत्यता की परीक्षा की जाती है परन्तु अन्त: अनुभूति (प्रज्ञा) से प्राप्त ज्ञान की नहीं। दर्शन पुज:एक महन दृष्टि – विनोद तिवारी
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25. किसके अनुसार ‘मुमुक्षुत्व’ अमरता के पक्ष में एक साक्ष्य है?
(a) शंकर (b) रामानुज
(c) राधाकृष्णन्‌ (d) विवेकानन्द
Ans. (d) : स्वामी विवेकानंद के अनुसार ‘मुमुक्षत्व’ मृत्यु की इच्छा नहीं हैं ‘मुमुक्षत्व’ – मुक्त होने की हमारी प्रबल उत्कठा हैं‚ जो अमरता के पक्ष में एक साक्ष्य हैं। यह दुखरहित जीवन की इच्छा है। इस इच्छा की विषयवस्तु के रूप मे मृत्यु से परे की किसी स्थिति को स्वीकारना पड़ता है। मुमुक्षत्व अमरता की इच्छा हैं‚ अत: इस इच्छा के अनुरूप इसके इच्छित वस्तु- अमरता को स्वीकारना पड़ता है।
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26. सूची-I को सूची-II से सुमेलित करें तथा नीचे दिये हुए कूट से सही विकल्प का चयन करें:
सूची-I सूची-II
(A) लाइब्नित्ज (i) जगत चिदणुओं का समूह है।
(B) विट्‌गेंसटाइन (ii) जगत अणुओं का समूह है।
(C) ह्यूम (iii) जगत संस्कारों का समूह है।
(D) बर्कले (iv) जगत प्रत्यक्षों का समूह है।
कूट:
(a) (A) और (iv) (b) (B) और (i)
(c) (C) और (iii) (d) (D) और (ii)
Ans. (b) :
लाइब्नित्ज – जगत्‌ चिदणुओं का समूह है। विट्‌गेंसटाइन – जगत्‌ तथ्यों की समग्रता है वस्तुओं की नहीं। ह्यूम – जगत्‌ संस्कारों का समूह है। बर्कले – जगत्‌ प्रत्ययों का प्रत्यक्ष्य हैं।
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27. सूची- I को सूची- II से सुमेलित करें तथा नीचे दिये गये कूटों से गलत विकल्प का चयन करें:
सूची-I सूची-II
(A) लॉक (i) अन्तरक्रियावाद
(B) लाइबनित्ज (ii) सर्वेश्वरवाद
(C) स्पिनो़जा (iii) बहुलवाद
(D) देकार्त (iv) विज्ञानवाद
कूट:
(a) (C) और (ii) (b) (D) और (i)
(c) (A) और (iv) (d) (B) और (iii)
Ans. (c) : देकार्त अन्तर क्रियावाद‚ स्पिनोजा सर्वेश्वरवाद‚ तथा लाइबनित्ज बहुलवाद को मानते है लेकिन विज्ञानवादी बर्कले को कहा जाता है और लाॉक प्रत्यय प्रतिनिधित्ववादी कहा जाता हैं। लॉक विज्ञानवाद (Idealism) को नहीं मानते हैं।
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28. सही विकल्प का चयन करें:
बुद्धिवादियों के लिए जन्मजात प्रत्यय हैं-
(a) नित्य
(b) आकस्मिक
(c) दोनों नित्य और आकस्मिक
(d) न तो नित्य न आकस्मिक
Ans. (a) : बुद्धिवादी आत्मा (मन) में ज्ञान को जन्म से निगूढ़ मानते है। इसे ही जन्म जात प्रत्यय कहते हैं उनके अनुसार जन्मजात प्रत्यय शाश्वत (Eternal‚ नित्य) होते है। यह प्रागनुभविक भी होते है।
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29. सही विकल्प का चयन करें:
अन्तरक्रियावाद के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया था:
(a) लाइब्नित़्ज द्वारा (b) देकार्त द्वारा
(c) बर्कले द्वारा (d) स्पिनो़जा द्वारा
Ans. (b) : मन और शरीर सम्बन्ध की समस्या को हल करने के लिए बुद्धिवादियों ने कई सिद्धान्त दिया। डेकार्ट ने अंतक्रियावाद‚ स्पिनाजो ने समानान्तरवाद तथा लाइबनित्ज ने पूर्व स्थापित सामंजस्य का सिद्धान्त प्रतिपादित किया हैं।
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30. कौन यह स्वीकार करता है कि किसी वस्तु की सत्ता उसके अनुभव पर निर्भर करती है?
(a) प्लेटो (b) ह्यूम
(c) बर्कले (d) लॉक
Ans. (c) : बर्कले के अनुसार‚ ‘सत्ता दृश्यता है’ अर्थात्‌ वस्तु की सत्ता उसके अनुभव पर निर्भर करती है। अर्थात जो कुछ भी दृश्य है वह अनुभव के अन्तर्गत है । और जो अनुभव के अन्तर्गत है उसकी सत्ता है।
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31. सूची-I को सूची-II के साथ्ज्ञ सुमेलित करें और नीचे दिए गए कूटों में से सही उत्तर चुनें:
सूची-I सूची-II
(A) लॉक (i) प्रागनुभविक संश्लेषी निर्णय
(B) बर्कले (ii) आनुभविक संश्लेषी निर्णय
(C) ह्यूम (iii) प्रत्ययों का ज्ञान
(D) कांट (iv) संवेदनाओं का ज्ञान
कूट:
(a) (A) और (iii) (b) (D) और (i)
(c) (C) और (ii) (d) (B) और (iv)
Ans. (b) : लॉक‚ संवेदनाओं के ज्ञान को‚ बर्कले प्रत्ययों के ज्ञान को और कांण्ट प्रागनुभविक संश्लेषी निर्णय को मानते है।
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32. सही विकल्प का चयन करें:
पूर्व स्थापित सामंजस्य संबंध है-
(a) मन और शरीर के मध्य
(b) ईश्वर और प्रकृति के मध्य
(c) गुण और पर्याय के मध्य
(d) चिदणुओं के मध्य
Ans. (d) : लाइबनित्ज के अनुसार चिदणुओं के स्वभाव में ही यह पूर्व-स्थापित सामंजस्य निहित हैं कि प्रत्येक चिदणु पूर्व-स्थापित सामंजस्य के नियम से संचालित होता है। इसके अतिरिक्त लाइबनित्ज ने आत्मा और शरीर के संबंध की समस्या को अपने प्रसिद्ध ‘पूर्व-स्थापित’ सामंजस्य के नियम के द्वारा हल करने का प्रयास किया।
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33. सूची-I को सूची-II से सुमेलित करें तथा नीचे दिये गये कूट से सही विकल्प का चयन करें:
सूची-I सूची-II
(A) वाक्‌ क्रिया (i) विट्‌गेन्स्टाइन
(B) भाषा खेल (ii) एयर
(C) अर्थ का सत्यापन सिद्धांत (iii) पीयर्स
(D) अर्थ का उपचारात्मक सिद्धांत (iv) राइल
कूट:
(A) (B) (C) (D)
(a) (i) (ii) (iii) (iv)
(b) (iv) (iii) (ii) (i)
(c) (iii) (ii) (iv) (i)
(d) (ii) (iii) (iv) (i)
Ans. (d) : वाक्‌ क्रिया सिद्धान्त जे.एल. ऑस्टिन ने दिया है। भाषा खेल सिद्धान्त विट्‌गेन्सटाइन का है। अर्थ का सत्यापन सिद्धान्त एयर का है। अर्थ का उपचारात्मक सिद्धान्त।
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34. सही विकल्प का चयन करें:
(a) हीगेल एक निरपेक्ष विज्ञानवादी है तथा हुसर्ल अतीन्द्रिय विज्ञानवाद का समर्थन करता है।
(b) हीगेल एक बुद्धिवादी है तथा स्पीनोजा एक वस्तुवादी है।
(c) हुसर्ल अतीन्द्रिय विज्ञानवाद का समर्थन करता है तथा कांट एक अनुभववादी है।
(d) हीगेल एक निरपेक्ष विज्ञानवादी है किंतु हुसर्ल विज्ञानवाद का खण्डन करते हैं।
Ans. (a) : हीगेल द्वारा प्रस्तुत विज्ञानवाद निरपेक्ष सत्‌ का वर्णन करने के कारण निरपेक्ष विज्ञानवाद हैं हुसर्ल अपने फेनोमेनोलॉजी एक तरह से अतीन्द्रिय विज्ञानवाद के तत्व उभरकर आते है।
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35. जी. ई. मूर के अनुसार जब भी दार्शनिक सिद्धान्त और सामान्य बुद्धि के बीच टकराव होता है तो इस बात की संभावना अधिक होती है कि:
(a) दार्शनिक सिद्धान्त की तुलना में सामान्य बुद्धि भटक जाती है।
(b) सामान्य बुद्धि को तुलना में तर्क भटक जाता है।
(c) तर्क और सामान्य बुद्धि दोनों भटक जाते हैं।
(d) तर्क और सामान्य बुद्धि में से कोई नहीं भटकता।
Ans. (c) : मूर सामान्य बुद्धि के आधार पर दार्शनिक प्रत्ययों की व्याख्या का समर्थक हैं। उसके अनुसार जब भी दार्शनिक सिद्धान्त और सामान्य बुद्धि के बीच टकराव होता है तो इस बात की संभावना अधिक होती है कि तर्क और समान्य बुद्धि दोनों भटक जाये।
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36. रसेल के दर्शन के संदर्भ में दिए गये अभिकथन (A) और तर्क (R) पर विचार करें और नीचे दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प चुनें:
अभिकथन (A) : सामान्य कथन अस्तित्वपरक नहीं हैं।
तर्क (R) : अणु न तो मानसिक हैं न ही भौतिक। विकल्प:
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं लेकिन (R),(A) की सीधी व्याख्या नहीं प्रदान करता है।
(b) (A) और (R) दोनों गलत हैं लेकिन (R), (A) की सीधी व्याख्या प्रदान करता है।
(c) (A) सही है‚ (R) गलत है और (R), (A) की सीधी व्याख्या प्रदान करता है।
(d) (A) गलत है‚ (R) सही है लेकिन (R), (A) की सीधी व्याख्या नहीं प्रदान करता है।
Ans. (a) : रसेल के दर्शन में यह दोनों कथन कि ‘सामान्य कथन अस्तित्वपरक नहीं है तथा ‘अणु न तो मानसिक है न ही भौतिक’ सत्य हैं। परन्तु एक दूसरे की व्याख्या नहीं करते है। रसेल के अनुसार जो कई विशेषों में समान हो वह सामान्य हैं।
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37. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन अस्तित्ववाद और गीता के अनुसार सत्य है?
(a) हम कर्त्ता और भोक्ता हैं‚ साक्षी-मात्र नहीं।
(b) हम साक्षी-मात्र हैं‚ कर्त्ता अथवा भोक्ता नहीं।
(c) हम कर्त्ता‚ भोक्ता और साक्षी है।
(d) ऊपर दीये गए विकल्पों में से कोई भी स्वीकार्य नहीं है।
Ans. (d) : गीता और अस्तित्ववाद दोनों को साथ-साथ यह मान्य नहीं है कि−
1. हम कर्त्ता और भोक्ता हैं‚ साक्षी मात्र नहीं।
2. हम साक्षी-मात्र है‚ कर्ता अथवा भोक्ता नहीं।
3. हम कर्त्ता‚ भोक्ता और साक्षी सभी है। गीता मैं आत्मा का कर्त्ता‚ भोक्ता‚ ज्ञाता‚ माना गया है। यह अपने पारमार्थिक स्वरूप में शुद्ध साक्षिचैतन्य है।
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38. इनमें से कौन ‘उत्कट अनुभववादी’ कहा जाता है?
(a) एयर (b) लॉक
(c) जेम्स (d) मूर
Ans. (c) : एयर को तार्किक प्रत्यक्षवादी या तार्किक अनुभववादी‚ लॉक का अनुभववाद संवेदनवाद‚ प्रत्यय प्रतिनिधित्ववाद‚ मूर भाषाविश्लेष् ाणवादी तथा विलियम जेम्स का अनुभववाद उत्कट अनुभववाद कहलाता है।
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39. सीमित अर्थ में ‘इपोखे’ का अर्थ है:
(a) वस्तुओं के अस्तित्व में विश्वास
(b) वस्तुओं के अस्तित्व में अविश्वास
(c) बाह्य विश्व के अस्तित्व से संबंधित निरपेक्ष निर्णय प्राप्त करना।
(d) वस्तुओं के अस्तित्व विषयक निर्णयों का स्थगन।
Ans. (d) : हुसर्ल अपने फेनोमेनोलॉजी में ‘शुद्ध सार भाव’ तक पहुँचने के लिए विभिन्न प्रकार के विश्वासों से मुक्त होने के लिए कुछ विधियां बताते है‚ जिसे फेनोमेनालाजी की विधि कहते हैं। फेनोमेनालॉजी की विधि को असंबंधन (Epoche) तथा विभिन्न स्तरों के उपचयन (Reduction) की विधि कही जाती हैं‚ उसी सीमित अर्थ में इपोखे (असंबंधन) का अर्थ है−वस्तुओं के अस्तित्व विषयक निर्णयों का स्थगन करना। ‘असंषधन’ अलग रखने का प्रयत्न करना है। कोष्टीकरण (Bracketing) विमुख होना (Detachment), असम्बोधन (Disconnection) इसी विधि में प्रयुक्त है।
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40. हाइडेगर के अनुसार ‘केयर’ के तीन पक्ष क्या है?
(a) तथ्यता‚ संभाव्यता‚ गिरावट
(b) तथ्यता‚ सावधानी‚ अनुशासन
(c) सावधानी‚ अनुशासन‚ सेवा
(d) सेवा‚ सावधानी‚ तथ्यता
Ans. (c) : हाइडेगर के अनुसार मानव के जगत के साथ संबंधित होने का तार्किक स्वरूप यह ‘उद्वेगपूर्ण लगाव’ (Care an concern) है। यदि यह ‘केयर’ (लगाव) न हो तो अस्तित्व की अनुभूति ही न रहे। हाइडेगर ने ‘लगाव’ (केयर) के तीन लक्षणों का उल्लेख किया हैं तीनों को क्रमश: तथ्यता (Facticity)‚ संभावना
(Possibility)‚ तथा ‘गिरावट’ (Fallen ness) कहा जाता है।
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41. मूर विश्लेषण करता है:
(a) भाषा (b) भाषायी तथ्य
(c) भाषेतर तत्व (d) इनमें सभी
Ans. (c) : मूर के अनुसार‚ जिसका विश्लेषण हो रहा है वह भाषीय तत्व नहीं बल्कि भाषा के इतर कोई तत्व (extra linguistic entity) हैं। इस भाषेतर तत्व को वह संप्रत्यय (Concept) प्रस्थापना (proposition) भाव (idea) आदि कहते हैं। परन्तु ये भाषीय अथवा शाब्दिक उक्तियां नहीं हैं
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42. निम्नलिखित में से कौन सा युग्म सही सुमेलित नहीं है?
(a) साइकोलॉजिज्म – हुस्सर्ल
(c) मशीन में प्रेत – डेकार्ट
(a) डेसिन – हाइडेगर
(c) बुद्धिवाद – हेगल
Ans. (b) : ‘मशीन में प्रेत’ सिद्धान्त गिल्बर्ट राइल’ के दर्शन से सम्बन्धित है‚ जो डेकार्ट के मन-शरीर’ सम्बन्ध सिद्धान्त की आलोचना है। गिल्बर्ट राइल के अनुसार यह कहना कि मन और शरीर दो विरूद्ध कोटियां हैं‚ और फिर दोनों के परस्पर अन्तक्रिया की बात करना और शरीर को मन में स्थापित कर देना यह ‘मशीन में प्रेत’ की तरह हैं।
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43. सूची-I को प्लेटों के कार्यों के सन्दर्भ से सूची-II से सुमेलित करें और सही कूट का चयन करे:
सूची-I सूची-II
(a) मेनो (i) सुकरात के जीवन और मृत्यु
(b) गारजियस (ii) ज्ञान की प्रकृति और निर्देश
(c) एपोलॉजी एण्ड क्रेटो (iii) सद्‌गुण और आत्म नियंत्रण
(d) करमाइड्‌स (iv) वक्रपटुता के अध्ययन से जुड़ा
कूट:
(a) (b) (c) (d)
(a) (ii) (iv) (iii) (i)
(b) (iv) (ii) (i) (iii)
(c) (ii) (iv) (i) (iii)
(d) (iii) (i) (iv) (ii)
Ans. (c) : प्लेटों के ‘मेनो’ डॉयलॉग में ज्ञान और उसकी प्रकृति एवं निर्देश के बारे में बताता है‚ ‘गारजियस’ में वाक्‌पटुता (rhetic) का अध्ययन‚ एपोलॉजी एण्ड क्रेटो में सुकरात के जीवन और मृत्य से सम्बन्धित है तथा करमाइड्‌स में सद्‌गुण तथा आत्मनियन्त्रण की बात करता हैं।
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44. थॉमस एक्वीनॉस के संदर्भ में नीचे दिये गये कथनों पर विचार कीजिए और सही कूट का चयन कीजिए:
(i) एक्वीनॉस सार्वभौमिक पुद्‌गलाकारवाद एवं आकारों की अनेकता के सिद्धान्त का निषेध करते हैं।
(ii) मनुष्य के पास एक बौद्धिक आत्मा है जो एक सारभूत आकार के रूप में कार्य करती हैं।
(iii) केवल ईश्वर ही ऐसा है जो सर्वथा संघटकविहीन है। उसका सार उसके होने में है।
कूट:
(a) केवल (ii) और (iii) सही है।
(b) केवल (i) और (ii) सही हैं।
(c) केवल (i) और (iii) सही है।
(d) सभी (i), (ii) और (iii) सही है।
Ans. (d) : एक्वीनॉस अपने दर्शन में सार्वभौमिक पुद्‌गलाकारवाद एवं आकारों की अनेकता के सिद्धान्त का निषेध करते हैं उनके अनुसार‚ मनुष्य के पास बौद्धिक आत्मा है जो एक सारभूत आकार के रूप में कार्य करती है तथा ईश्वर का सार उसके होने में है यह संघटक विहीन नित्य (शाश्वत) है।
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45. संत आगस्टाइन के दर्शन के आलोक में निम्नलिखित
अभिकथन (A) और तर्क (R) पर विचार करें और सही
कूट चुनें:
अभिकथन (A) : शुभत्व के सोपानों का सत्‌ के सोपानों से तादात्म्य है।
तर्क (R) : यदि किसी विशेष वस्तु में शुभत्व नहीं हैं तो इसमें किसी भी रूप में सत्‌ नहीं है। विकल्प:
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं लेकिन (R), (A) की सही व्याख नहीं है।
(c) (A) सही है‚ और (R) गलत है।
(d) (A) और (R) दोनों गलत हैं।
Ans. (b) : आगस्टाइन के अनुसार प्रत्येक सत्‌ वस्तु शुभ है या शुभत्व की अभिव्यक्ति हैं। शुभ के न होने पर अशुभ होता है क्योंकि शुभ के न होने पर वह नहीं हो सकता है जो होना चाहिए था। आगस्टाइन के दर्शन के सन्दर्भ में यह कथन कि शुभत्व के सोपानों का सत्‌ के सोपानों से तादात्म्य है सत्य है‚ और यह भी किसी विशेष वस्तु में यदि शुभत्व नहीं होती इसमें किसी भी रूप में सत्‌ नहीं है‚ सत्य हैं‚ परन्तु यह पहले कथन की सही व्याख्या नहीं है।
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46. ‘तीन श्रेणी के मनुष्य’ – बुद्धि के प्रेमी‚ सम्मान के प्रेम और अर्जन के प्रेमी- सिद्धांत प्रतिपादित किया गया:
(a) पाइथागोरस (b) हेराक्लाइटस
(c) अरस्तू (d) ल्यूसिपस्‌
Ans. (a) : साधना और ज्ञान की दृष्टि से पाइथागोरस ने व्यक्तियों को तीन श्रेणियों में विभक्त किया। उनकी तुलना ओलम्पिक में भाग लेने वाले खिलाड़ियों से की हैं। ओलम्पिक खेलों में तीन प्रकार के व्यक्ति यथा-ग्राहक (क्रेता-विक्रता)‚ खिलाड़ी‚ दर्शक भाग लेते थे जिन्हे क्रमश; निम्नतम‚ मध्यम‚ उत्तरी श्रेणी का कहा गया। उसके अनुसार संसार में भी तीन प्रकार के व्यक्ति यथा- अर्जन के प्रेमी
(लवर्स ऑवगेन)‚ सम्मान के प्रेमी (लवर्स आव ऑनर) तथा बुद्धिया ज्ञान के प्रेमी (लवर्स आव विजडम) पाये जाते हैं।
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47. निम्नलिखित में से कौन सी पुस्तकें प्लेटों द्वारा लिखी गई हैं?
(i) रिपब्लिक
(ii) लॉ़ज
(iii) पॉलिटिक्स
(iv) क्रीटो
कूट:
(a) केवल (i) और (iv)
(b) केवल (ii), (iii) और (iv)
(c) केवल (ii) और (iv)
(d) केवल (i), (ii) और (iv)
Ans. (d) : ररिपब्लिक‚ लॉज‚ क्रीटो प्लेटो के द्वारा लिखित पुस्तके है। ‘पॉलिटिक्स’ अरस्तु द्वारा लिखित पुस्तक है।
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48. निम्नलिखित कथनों को सावधानीपूर्वक पढ़े और फलवाद के संदर्भ में सही विकल्प का चयन करें :
अभिकथन:
(a) ‘अर्थ’ शब्द का अर्थ है बोध की प्रांजलता।
(b) अर्थ की उत्पत्ति प्रायोगिक प्रक्रिया में होती है।
(c) मन तात्त्विक वस्तु है।
(d) ज्ञान एक क्रिया है। विकल्प:
(a) ऊपर लिखे सभी कथन सही हैं।
(b) केवल (i), (ii) और (iii) सही है। लेकिन (iv) गलत है।
(c) केलव (i), (ii) और (iv) सही है लेकिन (iii) गलत है।
(d) केलव (ii), (iii) और (iv) सही है लेकिन (i) गलत है।
Ans. (c) : फलवाद (Pragmatism) का दर्शन पर्स और जेम्स की अनुभवादी मान्यताओं पर आधारित हैं जिसमें मन को तात्विक वस्तु नहीं माना जाता हैं। ‘अर्थ’ शब्द का अर्थ है बोध की प्रांजलता और इसकी उत्पत्ति प्रायोगिक प्रक्रिया में होती हैं। फलवाद में ज्ञान को एक क्रिया (activity) माना गया है।
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49. सूची- I को सूची- II के साथ सुमेलित करें और नीचे दिए गए कूटों में से सही विकल्प चुनें:
सूची-I सूची-II
(A) स्पिनो़जा (i) प्रतिनिधित्ववाद
(B) देकार्त (ii) समानान्तरवाद
(C) लॉक (iii) संशयवाद
(D) ह्यूम (iv) सर्वेश्वरवाद
कूट:
(a) (C) और (i) (b) (B) और (iv)
(c) (A) और (iii) (d) (D) और (ii)
Ans. (a) : स्पिनोजा का दर्शन सर्वेश्वरवादी और समानान्तरवादी लॉक का प्रत्यय प्रतिनिधित्ववाद तथा ह्यूम का संशयवाद हैं डेकार्ट बुद्धिवाद अंतक्रियावाद और निमित्तश्वरवाद के समर्थन है।
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50. सूची- I को सूची- II के साथ सुमेलित करें और नीचे दिए गए कूटों में से सही विकल्प चुनें:
सूची-I सूची-II
(A) देकार्त (i) द्वैतवाद
(B) स्पिनो़जा (ii) बहुतत्त्ववादी
(C) लाइबऩिज (iii) सर्वेश्वरवादी
(D) लॉक (iv) प्रत्ययवादी
कूट:
(a) (D) और (iv) (b) (B) और (iii)
(c) (A) और (ii) (d) (C) और (i)
Ans. (b) : देकार्त का दर्शन द्वैतवाद‚ स्पिनोजा का सर्वेश्ववारद‚ लाइबनित्ज का बहुलवाद तथा लॉक का दर्शन प्रत्यय प्रतिनिधित्ववाद है। ‘प्रत्ययवाद’ बर्कले‚ हीगेल आदि का दर्शन है।
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