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NIOS art and culture in Hindi for UPSC & State PSC Exams

1. संस्कृति – एक परिचय (NIOS Art & Culture in Hindi)

अंग्रेजी शब्द ‘कल्चर’लेटिन भाषा के ‘कल्ट या कल्टस’से लिया गया है, जिसका अर्थ है जोतना, विकसित करना या परिष्कृत करना और पूजा करना। संक्षेप में किसी वस्तु को यहाँ तक संस्कारित और परिष्कृत करना कि इसका अंतिम उत्पाद हमारी प्रशंसा और सम्मान प्राप्त कर सके। यह ठीक उसी तरह है जैसे संस्कृत भाषा का शब्द ‘संस्कृति’। ‘संस्कृति’शब्द संस्कृत भाषा की धातु ‘कृ’(करना) से बना है। इस धातु से तीन शब्द बनते हैं ‘प्रकृति’(मूल स्थिति), ‘संस्कृति’(परिष्कृत स्थिति) और ‘विकृति’(अवनति स्थिति) जब ‘प्रकृत’या कच्चा माल परिष्कृत किया जाता है तो यह संस्कृत हो जाता है और जब यह बिगड़ जाता है तो ‘विकृत’ हो जाता है।
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उद्देश्य

इस पाठ को पढ़ने के बाद आप:- संस्कृति के विचार और अर्थ को समझ सकेंगे; संस्कृति और सभ्यता के बीच संबंध स्थापित करेंगे संस्कृति और विरासत के मध्य संबंध स्थापित कर सकेंगे, और मानव जीवन में संस्कृति कि भूमिका और प्रभाव का विवेचन कर सकेंगे।
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1.1 संस्कृति की अवधारणा

संस्कृति जीवन की वृद्धि है। जो भोजन आप खाते हैं, जो कपड़े आप पहनते हैं, जो भाषा आप बोलते हैं और जिस भगवान की आप पूजा करते हैं, ये सभी संस्कृति के पक्ष हैं। सरल शब्दों में हम कह सकते हैं की संस्कृति उस विधि का प्रतीक है जिसमें हम सोचते हैं और कार्य करते है। इसमें वे चीजें भी सम्मिलित है जो एक समाज के सदस्य के नाते उत्तराधिकार में प्राप्त की है। एक सामाजिक वर्ग के सदस्य के रुप में मानवों की सभी उपलब्धियाँ संस्कृति कही जा सकती हैं। कला, संगीत, साहित्य, वास्तुविज्ञान, शिल्पकला, दर्शन, धर्म और विज्ञान सभी संस्कृति के पक्ष हैं। तथापि संस्कृति में रीतिरिवाज, परम्पराएँ, पर्व जीने के तरीके, और जीवन के विभिन्न पक्षों पर व्यक्ति विशेष का अपना दृष्टिकोण भी सम्मिलित हैं। इस प्रकार संस्कृति मानव जनित पर्यावरण से सम्बन्ध रखती है जिसमें सभी भौतिक और अभौतिक उत्पाद एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को प्रदान किया जाते हैं। सभी समाज वैज्ञानिकों में एक सामान्य सहमति हैं। कि संस्कृति में मनुष्यों द्वारा प्राप्त सभी आन्तरिक और बाह्य व्यवहारों के तरीके समाहित हैं। ये चिन्हों द्वारा भी स्थानान्तरित किए जा सकते हैं जिनमें मानवसमूहों की विशिष्ट उपलब्धियाँ भी समाहित हैं। इन्हें शिल्पकलाकृतियों द्वारा मूर्त रूप प्रदान किया जाता है। अतः संस्कृति का मूल केन्द्र बिन्दु उन सूक्ष्म विचारों में निहित है जो एक समूह में ऐतिहासिक रूप से उनसे सम्बद्ध मूल्यों सहित विवेचित होते रहते हैं। संस्कृति वह है जिसके माध्यम से लोग परस्पर सम्प्रेषण करते हैं, विचार करते है और जीवन के विषय में अपनी अभिवृत्तियों और ज्ञान को विकसित करते हैं। संस्कृति हमारे जीने और सोचने की विधि में हमारी प्रकृति की अभिव्यक्त है। यह हमारे साहित्य में, धार्मिक कार्यों में, मनोरंजन और आनन्द प्राप्त करने के तरीकों में भी देखी जा सकती हैं। संस्कृति के दो भिन्न उप- विभाग होते हैं- भौतिक और अभौतिक। भौतिक संस्कृति उन विषयों से जुड़ी है जो हमारे जीवन के भौतिक पक्षों से, सम्बद्ध है, जैसे हमारी वेश-भूषा, भोजन, घरेलू सामान आदि। अभौतिक संस्कृति का सम्बध विचारों, आदर्शों, भावनाओं और विश्वासों से है। संस्कृति एक स्थान से दूसरे स्थान तथा एक देश से दूसरे देश में बदलती रहती है। इसका विकास एक स्थानीय, क्षेत्रीय अथवा राष्ट्रीय संदर्भ में विद्यमान ऐतिहासिक प्रक्रिया पर आधारित होता है। उदाहरण के लिए हमारे अभिवादन की विधियों में, हमारे वस्त्रों में, खाने की आदतों में, सामाजिक और धार्मिक रीतिरिवाजों और मान्यताओं में परिचम से भिन्नता हैं। दूसरे शब्दों में, किसी भी देश के लोग अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक परम्पराओं के द्वारा पहचाने जाते हैं।
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1.2 संस्कृति और सभ्यता

संस्कृति और सभ्यता दोनों शब्द प्रायः पर्याय के रूप में प्रयुक्त किया जाता हैं। फिर भी दोनों के अर्थ अलग-अलग हैं। ‘सभ्यता’का अर्थ है जीने के बेहतर तरीके और कभी-कभी अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपने समक्ष प्रकृति को भी झुका देना। इसके अन्तर्गत समाजों को राजनैतिक रूप से सुपरिभाषित वर्गों में संगठित करना भी सम्मिलित है जो भोजन, वस्त्र, संप्रेषण आदि के विषय में जीवन स्तर को सुधारने का प्रयत्न करते रहते हैं। इस प्रकार कुछ वर्ग अपने आप को अधिक सभ्य समझते हैं, और दूसरों को हेय दृष्टि से देखते हैं। कुछ वर्गों की इस मनोवृत्ति ने कई बार संघर्षों को भी जन्म दिया है जिसका परिणाम मनुष्य के विनाशकारी विध्वंस के रूप में हुआ है। इसके विपरीत, संस्कृति आन्तरिक अनुभूति से सम्बद्ध है जिसमें मन और हृदय की पवित्रता निहित है। इसमें कला, विज्ञान, संगीत, और नृत्य और मानव जीवन की उच्चतर उपलब्धियाँ सम्मिहित हैं जिन्हें सांस्कृतिक गतिविधियाँ कहा जाता है। एक व्यक्ति जो निर्धन है, सस्ते वस्त्र पहने है, वह असभ्य तो कहा जाता है परन्तु वह सबसे अधिक सुसंस्कृत व्यक्ति भी कहा जा सकता है। एक व्यक्ति जिसके पास बहुत धन है वह सभ्य तो हो सकता है पर आवश्यक नहीं की वह सुसंस्कृत भी हो। अतः जब हम संस्कृति के विषय में विचार करते है तो हमें यह समझना चाहिए कि यह सभ्यता से अलग है। जैसा कि हमने देखा, संस्कृति मानव के अन्तर्मन का उच्चतम स्तर है। मानव केवल शरीर मात्र नहीं हैं। वे तीन स्तरों पर जीते हैं और व्यवहार करते हैं भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक। जबकि सामाजिक और राजनैतिक रूप से जीवन जीने के उत्तरोत्तर उत्तम तरीकों को तथा चारों ओर की प्रकृति का बेहतर उपयोग ‘सभ्यता’ कहा जा सकता है परन्तु सुसंस्कृत होने के लिए पर्याप्त नहीं है। जब एक व्यक्ति की बुद्धि और अन्तरात्मा के गहन स्तरों की अभिव्यक्ति होती है तब हम उसे ‘संस्कृत’कह सकते हैं।
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1.3 संस्कृति और विरासत

सांस्कृतिक विकास एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है। हमारे पूर्वजों ने बहुत सी बातें अपने पुरखों से सीखी है। समय के साथ उन्होंने अपने अनुभवों से उसमें और वृद्धि की। जो अनावश्यक था, उसको उन्होंने छोड़ दिया। हमने भी अपने पूर्वजों से बहुत कुछ सीखा। जैसे समय बीतता है, हम उनमें नए विचार, नई भावनाएँ जोड़ते चले जाते हैं और इसी प्रकार जो हम उपयोगी नहीं समझते उसे छोड़ते जाते हैं। इस प्रकार संस्कृति एक पीढी से दूसरी पीढी तक हस्तान्तरिक होती जाती है। जो संस्कृति हम अपने पूर्वजों से प्राप्त करते हैं उसे सांस्कृतिक विरासत कहते हैं। यह विरासत कई स्तरों पर विद्यमान होती है। मानवता ने सम्पूर्ण रूप में जिस संस्कृति को विरासत के रूप में अपनाया उसे मानवता की विरासत कहते है एक राष्ट्र भी संस्कृति को विरासत के रूप में प्राप्त करता है जिसे राष्ट्रीय संस्कृति विरासत कहते हैं। सांस्कृतिक विरासत में वे सभी पक्ष या मूल्य सम्मिलित हैं जो मनुष्यों को पीढ़ी दर पीढ़ी अपने पूर्वजों से प्राप्त हुए हैं। वे मूल्य पूजे जाते हैं, संरक्षित किए जाते है और अटूट निरन्तरता से सुरक्षित रखे जाते हैं और आने वाली पीढ़ियाँ इस पर गर्व करती हैं विरासत के संप्रत्यय को स्पष्ट करने के लिए कुछ उदाहरण सहायक सिद्ध होंगे, ताजमहल, स्वामी नारायण मंदिर (गांधी नगर और दिल्ली), आगरे का लाल किला, दिल्ली की कुतुबमीनार, मैसूर महल, दिलवाड़े का जैन मंदिर (राजस्थान), निजामुद्दीन-औलिया की दरगाह, अमृतसर का स्वर्ण मंदिर। दिल्ली का शीशगंज गुरुद्वारा, सांची स्तूप, गोआ में क्रिश्चियन चर्च, इंडिया गेट आदि हमारी विरासत के महत्वपूर्ण स्थान हैं और ये किसी भी प्रकार संरक्षित किये जाने चाहिए। वास्तु संबंधित इन रचनाओं, इमारतों शिल्पकृतियों के अलावा बौद्धिक उपलब्धियाँ, दर्शन, ज्ञान के ग्रन्थ, वैज्ञानिक आविष्कार और खोज भी विरासत का हिस्सा हैं। भारतीय संदर्भ में गणित, खगोल विद्या और ज्योतिष के क्षेत्र में बौधायन, आर्यभट्ट और भास्कराचार्य का योगदान, भौतिकशास्त्र के क्षेत्र में कणाद और वराहमिहिर का, रसायनशास्त्र के क्षेत्र में नागार्जुन, औषधि के क्षेत्र में सुश्रुत और चरक, योग के क्षेत्र में पतञ्जलि हमारी भारतीय सांस्कृतिक के विरासत के प्रगाढ़ खजाने हैं। संस्कृति परिवर्तनशील है लेकिन हमारी विरासत परिवर्तनील नहीं है। हम प्रत्येक जो किसी संस्कृति या निश्चित समूह से संबंध रखते हैं दूसरे समुदाय/संस्कृति से सांस्कृतिक गुणों को ले सकते हैं, लेकिन हमारा जुड़ाव,भारतीय सांस्कृतिक विरासत के साथ नहीं बदलेगा। हमारी भारतीय संस्कृति विरासत हमें एक-दूसरे से बाँधे रखेगी जैसे भारतीय साहित्य और धर्मग्रंथ जैसे- वेद, उपनिषद, गीता और योग आदि ने, सभ्यता की उन्नति में सही ज्ञान, सही क्रिया, व्यवहार और अभ्यास को सभ्यता के परिपूरक के रूप में देकर योगदान किया है।
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1.4 संस्कृति की सामान्य विशेषतायें

अब हम कुछ सामान्य विशेषताओं का विवेचन करेंगे जो संपूर्ण संसार की विभिन्न संस्कृतियों में समान हैं-
1. संस्कृति सीखी जाती है और प्राप्त की जाती है, अर्थात् मानव के द्वारा संस्कृति को प्राप्त किया जाता है इस अर्थ में कि कुछ निश्चित व्यवहार हैं जो जन्म से या अनुवांशिकता से प्राप्त होते हैं, व्यक्ति कुछ गुण अपने माता-पिता से प्राप्त करता है लेकिन सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवहारों को पूर्वजों से प्राप्त नहीं करता हैं। वे पारिवारिक सदस्यों से सीखे जाते हैं, इन्हें वे समूह से और समाज से जिसमें वे रहते हैं उनसे सीखते हैं। यह स्पष्ट है कि मानव की संस्कृति शारीरिक और सामाजिक वातावरण से प्रभावित होती है। जिनके माध्यम से वे कार्य करते हैं।
2. संस्कृति लोगों के समूह द्वारा बाँटी जाती है- एक सोच या विचार या कार्य को संस्कृति कहा जाता है यदि यह लोगों के समूह के द्वारा बाँटा और माना जाता या अभ्यास में लाया जाता है।
3. संस्कृति संचयी होती है- संस्कृति में शामिल विभिन्न ज्ञान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तान्तरित किया जा सकता है। जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, ज्यादा से ज्यादा ज्ञान उस विशिष्ट संस्कृति में जुड़ता चला जाता है, जो जीवन में परेशानियों के समाधान के रूप में कार्य करता है, पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता रहता है। यह चक्र बदलते समय के साथ एक विशिष्ट संस्कृति के रूप में बना रहता है।
4. संस्कृति परिवर्तनशील होती है- ज्ञान, विचार और परम्परायें नयी संस्कृति के साथ अद्यतन होकर जुड़ते जाते हैं। समय के बीतने के साथ ही किसी विशिष्ट संस्कृति में सांस्कृतिक परिवर्तन संभव होते जाते हैं।
5. संस्कृति गतिशील होती है- कोई भी संस्कृति स्थिर दशा में या स्थायी नहीं होती है। जैसे समय बीतता है संस्कृति निरंतर बदलती है और उसमें नये विचार और नये कौशल जुड़ते चले जाते हैं और पुराने तरीकों में परिवर्तन होता जाता है। यह संस्कृति की विशेषता है जो संस्कृति की संचयी प्रवृत्ति से उत्पन्न होती है।
6. संस्कृति हमें अनेक प्रकार के स्वीकृति व्यवहारों के तरीके प्रदान करती है- यह बताती है कि कैसे एक कार्य को संपादित किया जाना चाहिये, कैसे एक व्यक्ति को समुचित व्यवहार करना चाहिए।
7. संस्कृति भिन्न होती है- यह ऐसी व्यवस्था है जिसमें विभिन्न पारस्परिक भाग एक-दूसरे पर आश्रित हैं। यद्यपि ये भाग अलग होते हैं, वे संस्कृति को पूर्ण रूप प्रदान करने में एक दूसरे पर आश्रित होते हैं।
8. संस्कृति अक्सर वैचारिक होती है- एक व्यक्ति से उन विचारों का पालन करने की आशा की जाती है जिससे प्रायः यह एक आदर्श तरीका प्रस्तुत करती है जिससे उसी संस्कृति के अन्य लोगों से सामाजिक स्वीकृति प्राप्त की जा सके।
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1.5 मानव जीवन में संस्कृति का महत्व

संस्कृति जीवन के निकट से जुड़ी है। यह कोई बाह्य वस्तु नहीं है और न ही कोई आभूषणहै जिसे मनुष्य प्रयोग कर सकें। यह केवल रंगों का स्पर्श मात्र. भी नहीं है। यह वह गुण है जो हमें मनुष्य बनाता है। संस्कृति के बिना मनुष्य ही नहीं रहेंगे। संस्कृति परम्पराओं से विश्वासों से, जीवन की शैली से, आध्यात्मिक पक्ष से, भौतिक पक्ष से निरन्तर जुड़ी है। यह हमें जीवन का अर्थ, जीवन जीने का तरीका सिखाती है। मानव ही संस्कृति का निर्माता है और साथ ही संस्कृति मानव को मानव बनाती है। संस्कृति का एक मौलिक तत्व है धार्मिक विश्वास और उसकी प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति। हमें धार्मिक पहचान का सम्मान करना चाहिए, साथ ही सामयिक प्रयत्नों से भी परिचित होना चाहिए जिनसे अन्तः धार्मिक विश्वासों की बातचीत हो सके, जिन्हें प्रायः अन्तः सांस्कृतिक वार्तालाप कहा जाता है। विश्व जैसे-जैसे जुड़ता चला जा रहा है, हम अधिक से अधिक वैश्विक हो रहे हैं और अधिक व्यापक वैश्विक स्तर पर जी रहे हैं। हम यह नहीं सोच सकते कि जीने का एक ही तरीका होता है और वही सत्य मार्ग है। सह- अस्तित्व की आवश्यकता ने विभिन्न संस्कृतियों और विश्वासों के सह- अस्तित्व को भी अवश्यक बना दिया है। इसलिए इससे पहले कि हम इस प्रकार की कोई गलती करें, अच्छा होगा कि हम अन्य संस्कृतियों को भी जानें और साथ ही अपनी संस्कृति को भी भली प्रकार समझें। हम दूसरी संस्कृतियों के विषय में कैसे चर्चा कर सकते हैं जब तक हम अपनी संस्कृति के मूल्यों को भी भली प्रकार न समझ लें। सत्य, शिव और सुन्दर ये तीन शाश्वत मूल्य हैं जो संस्कृति से निकट से जुड़े हैं। यह संस्कृति ही है जो हमें दर्शन और धर्म के माध्यम से सत्य के निकट लाती है। यह हमारे जीवन में कलाओं के माध्यम से सौन्दर्य प्रदान करती है और सौन्दर्यनुभितपरक मानव बनाती है; यह संस्कृति ही है जो हमें नैतिक मानव बनाती है और दूसरे मानवों के निकट सम्पर्क में लाती है और इसी के साथ हमें प्रेम, सहिष्णुता और शान्ति का पाठ पढ़ाती है।

आपने क्या सीखा

1. संस्कृति शब्द लैटिन भाषा के ‘Cult’ या ‘Cultus’ शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ है विकसित करना या परिष्कृत करना।
2. संस्कृति संस्कृत भाषा की धातु ‘कृ’ से लिया गया है जिसका अर्थ है करना।
3. संस्कृति को एक व्यक्ति और विशेष रूप से एक समूह की जीवन, सोच और अनुभवों और उनको संगठित करने, जीवन को बांटने और उत्सव मनाने के एक मार्ग के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।
4. संस्कृति की विभिन्न विशेषतायें हैं संस्कृति एक समूह के द्वारा प्राप्त की जाती हैं, नष्ट की जा सकती है, या बाँटी जाती हैं। यह संचयी है। यह परिवर्तनीय हैं, विविध है और हमें करने योग्य व्यवहारों के विविध तरीके प्रदान करती है, यह परिवर्तित हो सकती है। संस्कृति में भौतिक और गैर- भौतिक दोनों घटक आते हैं।
5.गहन अर्थ में यह संस्कृति ही है जो साहित्य के विविध रूप, संगीत, नृत्य, कलाकृति, स्थापत्य और विभिन्न दूसरी कलाकृतियों, साथ ही बहुत से संगठनों और संरचनाओं को उत्पन्न करती है, जो समाज की क्रियाओं को सुगम और सुव्यवस्थित बनाती है।
6.संस्कृति एक अच्छा जीवन जीने के लिये विचार, आदर्श और मूल्य देती है।
7.आचरण में आत्म-नियंत्रण, दूसरों की भावनाओं, अधिकारों के प्रति उदार हृदय होना संस्कृति की सर्वोत्तम पहचान है।
8.सांस्कृतिक विरासत का अर्थ है संस्कृति के वे सभी पक्ष या मूल्य जो मानव की अगली पीढ़ी को उनके पूर्वजों के द्वारा हस्तान्तरिक किये जाते हैं।
9.वास्तुकला संबंधी रचनायें, स्मारक, बौद्धिक उपलब्धियाँ, दर्शनशास्त्र, ज्ञान के ग्रन्थ, वैज्ञानिक खोज और आविष्कार आदि सभी विरासत के अंग हैं।
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