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Bharat ki Rajvyavstha & Samvindhan (Indian Polity in Hindi) Laxmikant Summary

Lesson 1. संविधान ऐतिहासिक पृष्ठभूमि


संविधान क्या है?

हर समाज के भी कुछ मूलभूत नियम होते हैं। उन्हीं से समाज का स्वरूप तय होता है और अलग-अलग समाजों के बीच फ़र्क पता चलता है। बड़े समाजों में कई अलग-अलग समुदाय एक साथ रहते हैं। वहाँ नियमों को आम सहमति के ज़रिए तय किया जाता है। आधुनिक देशों में यह सहमति आमतौर पर लिखित रूप में पाई जाती है। जिस दस्तावेज़ में हमें ऐसे नियम मिलते हैं उसे संविधान कहा जाता है।

संविधान की ज़रूरत क्यों पड़ती है?

संविधान कई उद्देश्यों की पूर्ति करता है। पहला, यह दस्तावेज़ उन आदर्शों को सूत्रबद्ध करता है जिनके आधार पर नागरिक अपने देश को अपनी इच्छा और सपनों के अनुसार रच सकते हैं। यानी संविधान ही बताता है कि हमारे समाज का मूलभूत स्वरूप क्या हो। देश के भीतर आमतौर पर कई समुदाय रहते हैं। उनके बीच कई बातें समान होती हैं लेकिन ज़रूरी नहीं कि वे सारे मुद्दों पर एक-दूसरे से सहमत हों। संविधान नियमों का एक ऐसा समूह होता है जिसको एक देश के सभी लोग अपने देश को चलाने की पद्धति के रूप में अपना सकते हैं। इसके ज़रिए वे न केवल यह तय करते हैं कि सरकार किस तरह की होगी बल्कि उन आदर्शों पर भी एक साझी समझ विकसित करते हैं जिनकी हमेशा पूरे देश में रक्षा की जानी चाहिए।
संविधान का दूसरा मुख्य उद्देश्य होता है देश की राजनीतिक व्यवस्था को तय करना। लोकतांत्रिक समाजों में प्राय: संविधान ही ऐसे नियम तय करता है जिनके द्वारा राजनेताओं के हाथों सत्ता के इस दुरुपयोग को रोका जा सकता है। भारतीय संविधान देश के सभी व्यक्तियों को समानता का अधिकार देता है। हमारा संविधान कहता है कि धर्म, नस्ल, जाति, लिंग और जन्मस्थान के आधार पर देश के किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता। इस प्रकार समानता का अधिकार भारतीय संविधान में दिया गया एक मौलिक अधिकार है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारतीय संविधान के निर्माण की भी एक लम्बी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि रही है। 1757 ई. की प्लासी की लड़ाई और 1764 ई. के बक्सर के युद्ध को अंग्रेजों द्वारा जीत लिए जाने के बाद बंगाल पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने शासन का शिकंजा कसा। इसी शासन को अपने अनुकूल बनाए रखने के लिए अंग्रेजों ने समय पर कई एक्ट पारित किए, जो भारतीय संविधान के विकास की सीढ़ियां बनीं। प्रमुख अधिनियम एवं चार्टर इस प्रकार हैं-
वे निम्न हैं:

1773 ई. का रेग्यू्‌लेटिंग एक्ट:
➤ कम्पनी के समस्त भारतीय क्षेत्रों को एक सूत्र में बांधने के लिए इस अधिनियम के द्वारा बंगाल के गवर्नर को गवर्नर जनरल बना दिया गया।
➤ यह व्यवस्था की गई कि मद्रास और बम्बई के गवर्नर, गवर्नर जनरल के अधीन रहेंगे। बंगाल के गवर्नर जनरल को इन प्रान्तीय सरकारों पर नियन्त्रण रखने का अधिकार भी दिया गया।
➤ गवर्नर जनरल की सहायता के लिए एक चार सदस्यों वाली कार्यकारिणी परिषद्‌ की व्यवस्था भी की गई।
➤ अधिनियम द्वारा कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था की गई, जिसमें एक मुख्य न्यायाधीश तथा तीन अन्य न्यायाधीश रखे जाने थे।

1784 ई. का पिट्‌स इंडिया एक्ट:

➤ इस अधिनियम के द्वारा दोहरे शासन का प्रारम्भ हुआ-(i) व्यापारिक मामलों के लिए कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स एवं (ii) राजनीतिक मामलों के लिए बोर्ड ऑफ कण्ट्रोलर।
बोर्ड ऑफ कण्ट्रोलर में 6 सदस्य थे और ये भारत सरकार की देख-रेख करते थे। गवर्नर जनरल की परिषद्‌ तीन सदस्यीय कर दी गई। बम्बई और मद्रास प्रेसीडेंसी को (युद्ध, राजस्व एवं अन्य मामलों के सम्बन्ध में) गवर्नर जनरल और इसकी परिषदों के अधीन कर दिया गया।

1793 ई. का चार्टर अधिनियम:

इसके द्वारा नियंत्रण बोर्ड के सदस्यों तथा कर्मचारियों के वेतन आदि को भारतीय राजस्व में से देने की व्यवस्था की गई।

1813 ई. का चार्टर अधिनियम:

➤ कम्पनी के अधिकार पत्र को 20 वर्षों के लिए और बढ़ा दिया गया।
➤ कम्पनी के भारत के साथ व्यापार करने के एकाधिकार को छीन लिया गया, किन्तु उसे चीन के साथ व्यापार और पूर्वी देशों के साथ चाय के व्यापार के सम्बन्ध में 20 वर्षों के लिए एकाधिकार प्राप्त रहा। भारतीय व्यापार सभीब्रिटिश प्रजाजनों के लिए खोल दिया गया, यद्यपि उन्हें कुछ विशेष सीमाओं के अधीन कार्य करना पड़ता था।
➤ शिक्षा के प्रसार के लिए 1 लाख रुपए वार्षिक देने की बात कही गई। कम्पनी की सेवाओं में जाने से पहले इंग्लैण्ड में प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई।

1833 ई. का चार्टर अधिनियम:

➤ कंपनी के व्यापारिक अधिकार पूर्णत: समाप्त कर दिए गए।
➤ अब कंपनी का कार्य ब्रिटिश सरकार की ओर से मात्र भारत का शासन करना रह गया।
➤ बंगाल के गवर्नर जनरल को भारत का गवर्नर जनरल कहा जाने लगा।
➤ भारतीय कानूनों का वर्गीकरण किया गया तथा इस कार्य के लिए विधि आयोग की नियुक्ति की व्यवस्था की गई।

1853 ई. का चार्टर अधिनियम:

➤ इस अधिनियम के द्वारा डायरेक्टरों की संख्या 18कर दी गई जिसमें से 6 क्राउन द्वारा मनोनीत होते थे।
➤ बंगाल के लिए लेफ्टिनेंट गवर्नर नियुक्त किया गया, डलहौजी को पहला वास्तविक गवर्नर जनरल बनाया गया, कम्पनी की नियुक्ति एवं वापस बुलाने के अधिकार की समाप्ति हुई।
➤ सीधे भर्ती प्रणाली की शुरुआत हुई और नियन्त्रण बोर्ड को भारतीय सिविल सर्विसेज के सदस्यों को एक प्रतियोगी परीक्षा द्वारा भर्ती का अधिकार दिया गया।
गवर्नर जनरल की परिषद्‌ में एक और सदस्य जोड़ा गया, अब इसके सदस्यों की संख्या 12 हो गई।

1858 ई. का चार्टर अधिनियम

बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल और कोर्ट ऑफ डायरेक्टर की समाप्ति। भारत का शासन कम्पनी से लेकर ब्रिटिश क्राउन के हाथों सौंपा गया।
➤ भारत राज्य सचिव (भारत मन्त्री) की नियुक्ति जो ब्रिटिश कैबिनेट का सदस्य होता था उसके सहयोग के लिए 8सदस्यों की एक भारत परिषद्‌ की नियुक्ति क्राउन द्वारा की गई।
चार्ल्स वुड पहला भारतीय मन्त्री था। गवर्नर जनरल को वायसराय कहा गया (कैनिंग अन्तिम गवर्नर और प्रथम वायसराय था)। इस अधिनियम द्वारा ब्रिटिश सरकार का नियन्त्रण बढ़ाया गया।

1861 ई. का भारत शासन अधिनियम

➤ गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी परिषद का विस्तार किया गया,
➤ विभागीय प्रणाली का प्रारंभ हुआ,
➤ गवर्नर जनरल को पहली बार अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्रदान की गई।
➤ गवर्नर जरनल को बंगाल, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत और पंजाब में विधान परिषद स्थापित करने की शक्ति प्रदान की गई।

1892 ई. का भारत शासन अधिनियम

परोक्ष निर्वाचन प्रणाली को मान्यता।
➤ व्यवस्थापिकाओं की शक्तियों में वृद्धि।
➤ वार्षिक बजट पर बहस करने का अधिकार।
➤ बजट पर बहस एवं कार्यपालिका के समक्ष सवाल करने का अधिकार दिया गया, परन्तु वोट का अधिकार प्राप्त नहीं था।

1909 ई० का भारत शासन अधिनियम (मार्ले-मिंटो सुधार)

➤ इसे मॉर्ले-मिण्टो सुधार भी कहा गया।
➤ भारतीयों की भारत सचिव एवं गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी परिषदों में नियुक्ति।
➤ केन्द्रीय विधान परिषद्‌ के सदस्यों की संख्या 16 से 60 कर दी गई।
➤ प्रान्तीय विधान परिषदों के आकार में वृद्धि।
➤ प्रान्तीय विधान परिषदों में पहली बार गैर-सरकारी सदस्यों का बहुमत।
➤ केन्द्रीय और प्रान्तीय विधान परिषदों को पहली बार बजट पर वाद-विवाद करने, सार्वजनिक हित के विषयों पर प्रस्ताव पेश करने, पूरक प्रश्न पूछने और मत देने के अधिकार मिले।

1919 ई० का भारत शासन अधिनियम (मांटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार)

➤ केंद्र में द्विसदनात्मक विधायिका की स्थापना की गई- प्रथम राज्य परिषद तथा दूसरी केंद्रीय विधान सभा। राज्य परिषद के सदस्यों की संख्या 60 थी; जिसमें 34 निर्वाचित होते थे और उनका कार्यकाल 5 वर्षों का होता था। केंद्रीय विधान सभा के सदस्यों की संख्या 145 थी, जिनमें 104 निर्वाचित तथा 41 मनोनीत होते थे। इनका कार्यकाल 3 वर्षों का था। दोनों सदनों के अधिकार समान थे। इनमें सिर्फ एक अंतर था कि बजट पर स्वीकृति प्रदान करने का अधिकार निचले सदन को था।
➤ प्रांतों में द्वैध शासन प्रणाली का प्रवर्तन किया गया। इस योजना के अनुसार प्रांतीय विषयों को दो उपवर्गों में विभाजित किया गया- आरक्षित तथा हस्तांतरित।
आरक्षित विषय – वित्त, भूमिकर, अकाल सहायता, न्याय, पुलिस, पेंशन, आपराधिक जातियां, छापाखाना, समाचारपत्र, सिंचाई, जलमार्ग, खान, कारखाना, बिजली, गैस, वायलर, श्रमिक कल्याण, औद्‌योगिक विवाद, मोटरगाड़ियां, छोटे बंदरगाह और सार्वजनिक सेवाएं आदि।
हस्तांतरित विषय –
शिक्षा, पुस्तकालय, संग्रहालय, स्थानीय स्वायत्त शासन, चिकित्सा सहायता।
➤ सार्वजनिक निर्माण विभाग, आबकारी, उद्‌योग, तौल तथा माप, सार्वजनिक मनोरंजन पर नियंत्रण, धार्मिक तथा अग्रहार दान आदि।
➤ आरक्षित विषय का प्रशासन गवर्नर अपनी कार्यकारी परिषद के माध्यम से करता था; जबकि हस्तांतरित विषय का प्रशासन प्रांतीय विधान मंडल के प्रति उत्तरदायी भारतीय मंत्रियों के द्वारा किया जाता था।
➤ द्वैध शासन प्रणाली को 1935 ई० के एक्ट के द्वारा समाप्त कर दिया गया। भारत सचिव को अधिकार दिया गया कि वह भारत में महालेखा परीक्षक की नियुक्ति कर सकता है।
➤ इस अधिनियम ने भारत में एक लोक सेवा आयोग के गठन का प्रावधान किया।

1935 ई० का भारत शासन अधिनियम:

➤ 1935 ई० के अधिनियम में 451 धाराएं और 15 परिशिष्ट थे। इस अधिनियम की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं: अखिल भारतीय संघ: यह संघ 11 ब्रिटिश प्रांतों, 6 चीफ कमिश्नर के क्षेत्रों और उन देशी रियासतों से मिलकर बनना था, जो स्वेच्छा से संघ में सम्मलित हों। प्रांतों के लिए संघ में सम्मिलित होना अनिवार्य था, किंतु देशी रियासतों के लिए यह ऐच्छिक था। देशी रियासतें संघ में सम्मिलित नहीं हुईं और प्रस्तावित संघ की स्थापना संबंधी घोषणा-पत्र जारी करने का अवसर ही नहीं आया।
प्रांतीय स्वायत्तता: इस अधिनियम के द्वारा प्रांतों में द्वैध शासन व्यवस्था का अंत कर उन्हें एक स्वतंत्र और स्वशासित संवैधानिक आधार प्रदान किया गया।
केंद्र में द्वैध शासन की स्थापना: कुछ संघीय विषयों [सुरक्षा, वैदेशिक संबंध, धार्मिक मामले] को गवर्नर जनरल के हाथों में सुरक्षित रखा गया। अन्य संघीय विषयों की व्यवस्था के लिए गवर्नर-जनरल को सहायता एवं परामर्श देने हेतु मंत्रिमंडल की व्यवस्था की गई, जो मंत्रिमंडल व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी था।
संघीय न्यायालय की व्यवस्था: इसका अधिकार क्षेत्र प्रांतों तथा रियासतों तक विस्तृत था। इस न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश तथा दो अन्य न्यायाधीशों की व्यवस्था की गई। न्यायालय से संबंधित अंतिम शक्ति प्रिवी काउंसिल (लंदन) को प्राप्त थी।
ब्रिटिश संसद की सर्वोचता: इस अधिनियम में किसी भी प्रकार के परिवर्तन का अधिकार ब्रिटिश संसद के पास था। प्रांतीय विधान मंडल और संघीय व्यवस्थापिका में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं कर सकते थे।
भारत परिषद का अंत: इस अधिनियम के द्वारा भारत परिषद का अंत कर दिया गया।
सांप्रदायिक निर्वाचन पद्धति का विस्तार: संघीय तथा प्रांतीय व्यवस्थापिकाओं में विभिन्न सम्प्रदायों को प्रतिनिधित्व देने के लिए सांप्रदायिक निर्वाचन पद्धति को जारी रखा गया और उसका विस्तार आंग्ल भारतीयों – भारतीय ईसाइयों, यूरोपियनों और हरिजनों के लिए भी किया गया। इस अधिनियम में प्रस्तावना का अभाव था।
इसके द्वारा बर्मा को भारत से अलग कर दिया गया। अदन को इंग्लैंड के औपनिवेशिक कार्यालय के अधीन कर दिया गया और बरार को मध्य प्रांत में शामिल कर लिया गया।

1947 ई० का भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम

➤ ब्रिटिश संसद में 4 जुलाई, 1947 ई० को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम प्रस्तावित किया गया, जो 18 जुलाई, 1947 ई० को स्वीकृत हो गया। इस अधिनियम में 20 धाराएं थीं। अधिनियम के प्रमुख प्रावधान निम्न हैं –

दो अधिराज्यों की स्थापना:

➤ 15 अगस्त, 1947 ई० को भारत एवं पाकिस्तान नामक दो अधिराज्य बना दिए जाएंगे, और उनको ब्रिटिश सरकार सत्ता सौंप देगी।
➤ सत्ता का उत्तरदायित्व दोनों अधिराज्यों की संविधान सभा को सौंपा जाएगा।
➤ भारत एवं पाकिस्तान दोनों अधिराज्यों में एक-एक गवर्नर जनरल होंगे, जिनकी नियुक्ति उनके मंत्रिमंडल की सलाह से की जाएगी।
संविधान सभा का विधान मंडल के रूप में कार्य करना- जब तक संविधान सभाएं संविधान का निर्माण नई कर लेतीं, तब तक वह विधान मंडल के रूप में कार्य करती रहेंगी।
➤ भारत-मंत्री के पद समाप्त कर दिए जाएंगे।
➤ 1935 ई० के भारतीय शासन अधिनियम द्वारा शासन जब तक संविधान सभा द्वारा नया संविधान बनाकर तैयार नहीं किया जाता है; तब तक उस समय 1935 ई० के भारतीय शासन अधिनियम द्वारा ही शासन होगा।
➤ देशी रियासतों पर ब्रिटेन की सर्वाेपरिता का अंत कर दिया गया।
उनको भारत या पाकिस्तान किसी भी अधिराज्य में सम्मलित होने और अपने भावी संबंधों का निश्चय करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई।

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