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Bharat evam Vishva Bhugol (India and World Geography in Hindi)

1. ब्रह्मांड और पृथ्वी


ब्रह्मांड की उत्पत्ति एवं विकास

पृथ्वी के ऊपर विस्तृत असीम आकाश को अंतरिक्ष या ब्रह्माण्ड कहते हैं। विश्व की कोई निश्चित सीमा नहीं है। इस कारण पौराणिक धर्म ग्रंथों में इसे असीम ब्रह्माण्ड कहा गया है। द्रव्य और ऊर्जा के सम्मिलित रूप को ब्रह्मांड कहते हैं। हमारी पृथ्वी सौरमंडल की सदस्य है। हमारा सौरमंडल, हमारे ब्रह्मांड का एक मामूली सा हिस्सा है। ये ब्रह्मांड, पृथ्वी से दिखने वाली आकशगंगा का एक हिस्सा है। अनुमान है कि ब्रह्मांड का वर्तमान विस्तार 250 करोड़ प्रकाश वर्ष से भी अधिक है।
रात्रि में हमें आकाश में टिमटिमाते अनगिनत तारे दिखाई देते हैं। इनमें तारे, नक्षत्र, ग्रह, उपग्रह, निहारिका, उल्का धूमकेतु आदि अनेक प्रकार के ठोस एवं गैस पिण्ड शामिल हैं। जिन्हें आकाशीय पिंड कहते हैं। ये सभी पिण्ड गतिशील हैं तथा अपने निश्चित मार्गों पर भ्रमण करते हैं। प्रत्येक पिण्ड गुरुत्वाकर्षण के कारण शून्य में टिका हुआ है। केवल अपवाद के तौर पर कभी-कभी कोई तारा अपना मार्ग भटक जाता है और दूसरे तारे से टकरा जाता है।

पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास

पृथ्वी की उत्पत्ति के संबंध में विभिन्न दार्शनिकों व वैज्ञानिकों ने अनेक परिकल्पनाएँ प्रस्तुत की हैं। इनमें से एक प्रारंभिक एवं लोकप्रिय मत जर्मन दार्शनिक इमैनुअल कान्ट का है।

नीहारिका परिकल्पना

1796 ई॰ में गणितज्ञ लाप्लेस ने इसका संशोधन प्रस्तुत किया जो नीहारिका परिकल्पना के नाम से जाना जाता है।
➤ इस परिकल्पना के अनुसार, ग्रहों का निर्माण धीमी गति से घूमते हुए पदार्थों के बादल से हुआ जो कि सूर्य की युवा अवस्था से संबद्ध थे।

“द्वैतारक सिद्धांत”

बाद में 1900 ई॰ में चेम्बरलेन और मोल्टन ने कहा कि ब्रह्मांड में एक अन्य भ्रमणशील तारा सूर्य के नजदीक से गुजरा।
➤ इसके परिणामस्वरूप तारे के गुरुत्वाकर्षण से सूर्य-सतह से कुछ पदार्थ निकलकर अलग हो गया।
➤ यह तारा जब सूर्य से दूर चला गया तो सूर्य-सतह से बाहर निकला हुआ यह पदार्थ सूर्य के चारों तरफ घूमने लगा और यही धीरे-धीरे संघनित होकर ग्रहों के रूप में परिवर्तित हो गया।
➤ पहले सर जेम्स जींस और बाद में सर हॅरोल्ड जैफरी ने इस मत का समर्थन किया। यद्यपि कुछ समय बाद के तर्क सूर्य के साथ एक और साथी तारे के होने की बात मानते हैं। ये तर्क “द्वैतारक सिद्धांत” के नाम से जाने जाते हैं।

कार्ल वाइजास्कर का सिद्धांत

1950 ई॰ रूस के ऑटो शिमिड व जर्मनी के कार्ल वाइजास्कर ने नीहारिका परिकल्पना में कुछ संशोधन किया, जिसमें विवरण भिन्न था।
समोच्चरेखीय जुताई
➤ इन कणों के घर्षण व टकराने से एक चपटी तश्तरी की आकृति के बादल का निर्माण हुआ और अभिवृद्धि प्रक्रम द्वारा ही ग्रहों का निर्माण हुआ।

वेगनर का महाद्वीपीय विस्थापन (Continental Drift)


सिद्धांत एवं प्लेट विवर्तनिकी

जर्मनी के प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता तथा जलवायु विज्ञान के विशेषज्ञ अल्फ्रेड वेगनर ने महाद्वीपीय विस्थापन का सिद्धान्त सन् 1912 में प्रस्तुत किया था। उनके अनुसार, महाद्वीप स्थिर नहीं रहते बल्कि उनमें विस्थापन होता रहता है। वेगनर के अनुसार, एक समय पर सभी महाद्वीप एक-दूसरे से जुड़े हुये थे। इन जुड़े हुये महाद्वीपों को वेगनर ने पैंजिया कहा।
➤ इस पैंजिया पर छोटे-छोटे आन्तरिक सागरों का विस्तार था। पैंजिया के चारों ओर एक विशाल सागर था जिसका नाम पैंथालसा रखा गया। पैंजिया का उत्तरी भाग लॉरेशिया (उत्तरी अमेरिका, यूरोप तथा एशिया) तथा दक्षिणी भाग का नाम गोण्डवानालैण्ड (दक्षिणी अमेरिका, आस्ट्रेलिया, अफ्रीका तथा अंटार्कटिका) था।
➤ कार्बोनिफेरस युग में महाद्वीपों का विस्थापन आरम्भ हुआ जो लगभग तीस करोड़ वर्ष पूर्व माना जाता है।

वेगनर ने महाद्वीपीय विस्थापन के बारे में दो परिकल्पनायें प्रस्तुत की:

(i) पहली परिकल्पना: यदि महाद्वीप एक जगह पर स्थिर रहे हैं तो जलवायु कटिबंध क्रमश: अपना स्थान बदलते रहे हैं। परन्तु ऐसे विस्थापन के प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिलते। जलवायु कटिबंधों का सम्बन्ध सूर्य तथा पृथ्वी की पारस्परिक परिक्रमा से है जिसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ।
(ii) दूसरी परिकल्पना: यदि जलवायु कटिबंध स्थिर रहे हैं तो महाद्वीपों में विस्थापन हुआ है। वेगनर का पूर्ण विश्वास था कि महाद्वीपों का विस्थापन हुआ है।

महाद्वीपों की उत्पत्ति के संबंध में महाद्वीपीय विस्थापन एवं प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत में अन्तर

महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत
महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत का प्रतिपादन 1912 में जर्मनी के विद्वान एल्फ्ेड वेगनर ने किया था।प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत 1960 और 1970 के दशकों में प्रतिपादित कई सिद्धांतों, परिकल्पनाओं तथा प्रक्रमों का निचोड़ है।
महाद्वीपीय सिद्धांत के अनुसार, पृथ्वी को सियाल (SIAL), सीमा (SIMA) तथा निफेक (NIFE) नामक तीन परतों में बांटा जाता है।प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के अनुसार, पृथ्वी को लिथोस्फियर (Lithosphere), स्थेनोस्फियर (Asthenosphere) तथा मैसोस्फियर (Mesosphere) में बांटा जाता है।
महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के अनुसार, महाद्वीप हल्के परत सियाल के बने हुए हैं और भारी परत सीमा पर तैर रहे हैं।प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के अनुसारए प्लेटें लिथोस्फीयर के सख्त तथा सुदृढ़ भाग हैं, जो स्थेनोस्फीयर पर तैर रहे हैं।
महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के अनुसार, केवल महाद्वीपों में ही गति होती है।प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के अनुसार, केवल महाद्वीपों में ही नहीं बल्कि महासागरों में भी गति होती है।
महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के अनुसार, महाद्वीपों का वर्तमान स्वरूप पेन्जिया के टूटने से बना है। परन्तु यह सिद्धांत इस प्रश्न का उत्तर नहीं देता है कि क्या ये सभी महाद्वीप फिर से एक बड़े महाद्वीप (Supercontinent)के रूप में एकत्रित होंगी या नहीं।प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के अनुसार, सभी महाद्वीप एक बड़े महाद्वीप (Supercontinent) से बने हैं और वे भविष्य में मिलकर फिर से एक बड़े महाद्वीप की रचना कर सकते हैं।
वेगनर के अनुसार, पेन्जिया के टूटने से महाद्वीपों का विस्थापन पश्चिमी तथा उत्तरी दिशा में हुआ है।प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के अनुसार प्लेटों के टूटे हुए टुकड़े सभी दिशाओं में विस्थापित होते हैं।
महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के अनुसार, महाद्वीपों के टूटने के चरणों का कोई विवरण नहीं है।प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के अनुसार महाद्वीप विभिन्न चरणों में टूट कर अलग हुए हैं।
महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत में महाद्वीपों का साधारण रूप में टूटना बताया गया है और किसी प्रकार के किनारों (Margins) का उल्लेख नहीं किया गया है।प्लेटों की गति में विभिन्न प्रकार के किनारों (Margins) को मान्यता दी गई है। अपसरण (Divergent), अभिसरण (Convergent) तथा रूपांतर भ्रंश (Transform Fault) तीन निश्चित किनारे हैं। इन सबकी प्रक्रियाएं भिन्न हैं।
वेगनर ने महाद्वीपीय विस्थापन के लिए अवकल गुरुत्वाकर्षण बल तथा प्लवनशीलता बल (Differential gravitational force and force of buoyancy) तथा ज्वारीय बल (Tidal Force) को उत्तरदायी माना है।प्लेट विवर्तनिकी के लिए कई बल उत्तरदायी माने जाते हैं। इनमें भू-गर्भ में चलने वाली संवहनीय धाराएं, मेंटल प्लूम (Mantle plume), स्लैब खिंचाव (Slab Pull) तथा कटकों का ढकेलना (Ridge Push) आदि प्रमुख हैं। इन बलों में महाद्वीपों को ढकेलने की शक्ति है।



बिग बैंग सिद्धांत (महाविस्फोट सिद्धांत)
इस सिद्धांत का श्रेय ऐडविन हबल नामक वैज्ञानिक को जाता है जिन्होंने कहा था कि ब्रह्मांड का निरंतर विस्तार हो रहा है। जिसका मतलब ये हुआ कि ब्रह्मांड कभी सघन रहा होगा। हालांकि इससे पहले क्या था, यह कोई नहीं जानता. हॉकिंग ब्रह्मांड की रचना को एक स्वत: स्फूर्त घटना मानते थे। हालांकि, प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइजैक न्यूटन मानते थे कि इस सृष्टि का अवश्य ही कोई रचयिता होगा, अन्यथा इतनी जटिल रचना पैदा नहीं हो सकती।
➤ ब्रह्मांड के बारे में बिग बैंग सिद्धांत सबसे विश्वसनीय सिद्धांत है। बिग बैंग सिद्धांत के मुताबिक शून्य के आकार का ब्रह्मांड बहुत ही गरम था। इसकी वजह से इसमें विस्फोट हुआ और वो असंख्य कणों में फैल गया। तब से लेकर अब तक वो लगातार फैल ही रहा है।
➤ ब्रह्मांड के इन टुकड़ों के बाद से अंतरिक्ष और आकाशगंगा अस्तित्व में आए. इस रचना में ही हाइड्रोजन, हीलियम जैसे अणुओं का निर्माण हुआ।
➤ जैसे–जैसे ब्रह्मांड का आकार बढ़ता गया वैसे-वैसे तापमान और घनत्व कम हुआ जिसकी वजह से गुरुत्वाकर्षण बल, विद्युत-चुम्बकीय बल और अन्य बलों का उत्सर्जन हुआ। इसके बाद सौरमंडल बना।
➤ ब्रह्मांड का विस्तार लगातार होता रहता है जिससे तारों और ग्रहों के बनने की प्रक्रिया भी लगातार चलती रहती है। सितारे, तारे और उपग्रह सभी एक दूसरे को अपनी तरफ आकर्षित करते हैं।
➤ ब्रह्मांड कई गुणा जल, बादल, अग्नि, वायु, आकश और अंधकार से घिरा हुआ है।
➤ ब्रह्मांड में अब तक 19 अरब आकाशगंगाएं होने का अनुमान है। सभी आकाशगंगाएं एक-दूसरे से दूर हटती जा रही हैं।

मिल्की वे आकाशगंगा

19 अरब आकाशगंगाओं में से हमारी आकाशगंगा है- मिल्की वे आकशगंगा।
➤ मिल्की वे आकाशगंगा में हमारी पृथ्वी और सूर्य हैं।
➤ मिल्की वे में लगभग 100 अरब तारे हैं। हर तारे की चमक, दूरी और गति अलग-अलग है। आकाशगंगा ब्रह्मांड की परिक्रमा करती रहती है।
➤ आरियन नेबुला हमारी आकाशगंगा के सबसे शीतल और चमकीले तारों का समूह है।
➤ आकाशगंगा का प्रवाह उत्तर से दक्षिण की ओर है।
➤ सूर्य इस ब्रह्मांड का चक्कर लगभग 26,000 वर्षों में पूरा करता है जबकि अपनी धूरी पर सूर्य एक महीने मे एक चक्कर लगाता है।

तारों का निर्माण

प्रारंभिक ब्रह्मांड में ऊर्जा व पदार्थ का वितरण समान नहीं था। घनत्व में आरंभिक भिन्नता से गुरुत्वाकर्षण बलों में भिन्नता आई, जिसके परिणामस्वरूप पदार्थ का एकत्र हुआ। यही एकत्र आकाशगंगाओं के विकास का आधार बना।
➤ एक आकाशगंगा असंख्य तारों का समूह है। आकाशगंगाओं का विस्तार इतना अधिक होता है कि उनकी दूरी हजारों प्रकाश वर्षों में (Light years) मापी जाती है।
➤ एक अकेली आकाशगंगा का व्यास 80 हजार से 1 लाख 50 हजार प्रकाश वर्ष के बीच हो सकता है।
➤ एक आकाशगंगा के निर्माण की शुरूआत हाइड्रोजन गैस से बने विशाल बादल के संचयन से होती है जिसे नीहारिका (Nebula) कहा गया। क्रमश: इस बढ़ती हुई नीहारिका में गैस के झुंड विकसित हुए। ये झुंड बढ़ते-बढ़ते घने गैसीय पिंड बने, जिनसे तारों का निर्माण आरंभ हुआ।
➤ ऐसा विश्वास किया जाता है कि तारों का निर्माण लगभग 5 से 6 अरब वर्षों पहले हुआ।

प्रकाश वर्ष

प्रकाश वर्ष (Light year) समय का नहीं वरन् दूरी का माप है। प्रकाश की गति 3 लाख कि.मी. प्रति सैकेंड है। विचारणीय है कि एक साल में प्रकाश जितनी दूरी तय करेगा, वह एक प्रकाश वर्ष होगा। यह 9.461 × 1012 कि.मी. के बराबर है। पृथ्वी व सूर्य की औसत दूरी 14 करोड़ 95 लाख, 98 हजार किलोमीटर है। प्रकाश वर्ष के संदर्भ में यह प्रकाश वर्ष का केवल 8.311 है।

ग्रहों का निर्माण

ग्रहों के विकास की निम्नलिखित अवस्थाएँ मानी जाती हैं- (i) तारे नीहारिका के अंदर गैस के गुंथित झुंड हैं। इन गुंथित झुंडों में गुरुत्वाकर्षण बल से गैसीय बादल में क्रोड का निर्माण हुआ और इस गैसीय क्रोड के चारों तरफ गैस व धूलकणों की घूमती हुई तश्तरी (Rotating disc) विकसित हुई।
(ii) अगली अवस्था में गैसीय बादल का संघनन आरंभ हुआ और क्रोड को ढकने वाला पदार्थ छोटे गोलों के रूप में विकसित हुआ। ये छोटे गोले संसंजन (अणुओं में पारस्परिक आकर्षण) प्रक्रिया द्वारा ग्रहाणुओं (Planetesimals) में विकसित हुए। संघट्टन (Collision) की क्रिया द्वारा बड़े पिंड बनने शुरू हुए और गुरुत्वाकर्षण बल के परिणामस्वरूप ये आपस में जुड़ गए। छोटे पिंडों की अधिक संख्या ही ग्रहाणु है।
(iii) अंतिम अवस्था में इन अनेक छोटे ग्रहाणुओं के सहवर्धित होने पर कुछ बड़े पिंड ग्रहों के रूप में बने।

चंद्रमा

चंद्रमा पृथ्वी का अकेला प्राकृतिक उपग्रह है।
➤ पृथ्वी की तरह चंद्रमा की उत्पत्ति संबंधी मत प्रस्तुत किए गए हैं। सन् 1838 ई॰ में, सर जार्ज डार्विन ने सुझाया कि प्रारंभ में पृथ्वी व चंद्रमा तेजी से घूमते एक ही पिंड थे।
➤ यह पूरा पिंड डंबल (बीच से पतला व किनारों से मोटा) की आकृति में परिवर्तित हुआ और अंततोगत्वा टूट गया।
➤ उनके अनुसार, चंद्रमा का निर्माण उसी पदार्थ से हुआ है जहाँ आज प्रशांत महासागर एक गर्त के रूप में मौजूद है।
➤ यद्यपि वर्तमान समय के वैज्ञानिक इनमें से किसी भी व्याख्या को स्वीकार नहीं करते।
‘द बिग स्प्लैट’ (The Big Splat) ऐसा विश्वास किया जाता है कि पृथ्वी के उपग्रह के रूप में चंद्रमा की उत्पत्ति एक बड़े टकराव (Giant impact) का नतीजा है जिसे ‘द बिग स्प्लैट’ (The big splat) कहा गया है। ऐसा मानना है कि पृथ्वी के बनने के कुछ समय बाद ही मंगल ग्रह के 1 से 3 गुणा बड़े आकार का पिंड पृथ्वी से टकराया। इस टकराव से पृथ्वी का एक हिस्सा टूटकर अंतरिक्ष में बिखर गया। टकराव से अलग हुआ यह पदार्थ फिर पृथ्वी के कक्ष में घूमने लगा और क्रमश: आज का चंद्रमा बना। यह घटना या चंद्रमा की उत्पत्ति लगभग 4.44 अरब वर्षों पहले हुई।

पृथ्वी का उद्भव

प्रारंभ में पृथ्वी चट्टानी, गर्म और वीरान ग्रह थी, जिसका वायुमंडल विरल था जो हाइड्रोजन व हीलीयम से बना था। यह आज की पृथ्वी के वायुमंडल से बहुत अलग था। अत: कुछ ऐसी घटनाएँ एवं क्रियाएँ अवश्य हुई होंगी जिनके कारण चट्टानी, वीरान और गर्म पृथ्वी एक ऐसे सुंदर ग्रह में परिवर्तित हुई जहाँ बहुत-सा पानी, तथा जीवन के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध हुआ। पृथ्वी की संरचना परतदार है। वायुमंडल के बाहरी छोर से पृथ्वी के क्रोड तक जो पदार्थ हैं वे एक समान नहीं हैं। वायुमंडलीय पदार्थ का घनत्व सबसे कम है। पृथ्वी की सतह से इसके भीतरी भाग तक अनेक मंडल हैं और हर एक भाग के पदार्थ की अलग विशेषताएँ हैं।

ब्रह्मांड में पृथ्वी का स्थान

प्राचीन काल में ऐसा माना जाता था कि पृथ्वी ब्राह्मांड के केन्द्र में है। यूनान का महान दार्शनिक अरस्तू भी मानता था कि पृथ्वी ब्राह्मांड के केन्द्र में अवस्थित है। सूर्य, चन्द्रमा एवं अन्य सभी खगोलीय पिंड पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाते हैं। टालमी ने घोषणा की कि सूर्य, चन्द्रमा एवं तारे पृथ्वी का चक्कर लगाते हैं। क्रिश्चयन चर्च ने भी इस सिद्धांत को आगे बढ़ाने में अपना महत्त्वपूर्ण सहयोग दिया। इस समय तक लोग पृथ्वी केन्द्रिक सिद्धांत के विरुद्ध सोचना भी पाप समझते थे। उनकी मान्यता थी कि ऐसा करने पर भगवान नाराज हो जाएंगे।
लेकिन समय के साथ परिस्थितियों में परिवर्तन आया एवं लोगों ने इस सिद्धांत के विरुद्ध सोचना प्रारम्भ कर दिया। सर्वप्रथम पाइथागोरस एवं पाइलोलौस ने हमें बताया कि पृथ्वी अपने स्थान पर स्थिर नहीं है अपितु अपने अक्ष पर 24 घंटे में एक चक्कर लगाती है। प्रसिद्ध चिंतक आर्रिस्टचिस ने बताया कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है। 1600 में गिओडानों बूनी को जिंदा जला दिया गया क्योंकि उसने पृथ्वी के संदर्भ में प्रचलित मान्यता के विपरीत मत व्यक्त किया था। गैलिलियो एवं कोपरनिकस यह जानते हुए कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है और यही अवधारणा सही है, चुप रहे क्योंकि उन्हें डर था कि इस बात को बताने पर उनकी हानि हो सकती है।
यह एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन का क्षण था जब 17 जनवरी, 1610 को गैलिलियो जो पूडा विश्वविद्यालय का एक प्रमुख गणितज्ञ भी था, ने टेलिस्कोप का आविष्कार किया एवं यह साबित कर दिया कि पृथ्वी अन्य दूसरे पिण्डों के समान एक साधारण पिण्ड है, जो सूर्य के चारों ओर घूमती है।
पृथ्वी

पृथ्वी की अनुमानित आयु4600,000,000 वर्ष
सम्पूर्ण धरातलीय क्षेत्रफल510,100,500 वर्ग कि.मी
भूमि क्षेत्रफल1,48,951,000 वर्ग कि.मी. (पृथ्वी के सम्पूर्ण क्षेत्रफल का 29%)
जलीय क्षेत्रफल361,150,000 वर्ग कि.मी. (पृथ्वी के सम्पूर्ण क्षेत्रफल का 69%)
औसत घनत्व5.52 (पानी के घनत्व के सापेक्ष)
विषुवत् रेखीय व्यास12756 कि.मी.
ध्रुवीय व्यास12713 कि.मी
सूर्य से दूरी1,49,597,900 कि.मी
सूर्य से पृथ्वी तक प्रकाश पहुँचने में लगने वाला समय8 मिनट 18 सेकेण्ड
चन्द्रमा से दूरी384,365 कि.मी
समुद्र तल से पृथ्वी की सर्वाधिक ऊँचाई8,848 मीटर (माउण्ट एवरेस्ट)
समुद्र तल से सागर की सर्वाधिक गहराई11,033 मीटर मैरियाना खाई (प्रशान्त महासागर)


पृथ्वी का भूगर्भिक इतिहास

पृथ्वी की आयु 4500 मिलियन वर्ष मानी गई है। पृथ्वी की आयु के निर्धारण का अध्ययन ‘भूकालक्रम विज्ञान’ (Geochronology) में किया जाता है।
➤ समय का खोजकर्त्ता एडिनबर्ग के प्रसिद्ध भूवैज्ञानिक जेम्स हट्टन को माना जाता है जिन्होंने काल निर्धारण की पारम्परिक विधियों को नकारकर नवीन मानकों का समावेश किया। उन्होंने कहा है कि ‘शैलें पृथ्वी के इतिहास की पुस्तक के पृष्ठ हैं।’
➤ विभिन्न साक्ष्यों तथा जीवाश्मों के आधार पर पृथ्वी के इतिहास का व्यवस्थित क्रम निर्धारित किया गया जिसे ‘मानक भूगर्भिक समय मापनी’ कहा जाता है।
➤ मानक भूगर्भिक समय मापनी में समयावधियों को सोपानानुसार बडे़ से छोटे क्रम में क्रमश: कल्प (Eon), महाकल्प (Era), काल (Period) तथा युग (Epoch) के रूप में प्रदर्शित करते हैं।
➤ सम्पूर्ण समय मापनी को दो कल्पों, क्रीप्टोजोइक तथा फैनेरोजोइक में विभक्त किया गया है। भूगर्भिक इतिहास का 87 प्रतिशत भाग क्रीप्टोजोइक कल्प में सम्मिलित किया गया है। जिसके बारे में अधिक प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती है। शेष समयावधि जिसे फैनेरोजोइक कल्प कहा गया है, में अधिकतम जानकारी मिलती है।
➤ फैनेरोजोइक कल्प को तीन महाकल्पों क्रमश: पुराजीवी (Paleozoic), मध्यजीवी (Mesozoic) तथा नवजीवी (Cenozoic) में विभक्त किया गया है।
➤ पुराजीवी महाकल्प को छ: कालों में विभाजित किया गया है। ये काल क्रमश: केम्ब्रीयन, ओर्डोविसियन, सिलूरियन, डिवोनियन, कार्बोनिफेरस तथा पर्मियन हैं।
➤ केम्ब्रीयन का नामकरण वेल्स के लेटिन नाम केम्ब्रिया से किया गया है। इसमें संसार के प्राचीनतम जीवों के जीवाश्म मिलते हैं। इस समय ट्राइलोबाइट की अधिकता थी।
➤ ओर्डोविसियन काल में विस्तृत ज्वालामुखी उद्गार हुए तथा केलेडोनियन पर्वत निर्माणकारी हलचल हुई। प्रथम बार रीढ़वाले जीवों का अविर्भाव हुआ। संयुक्त राज्य अमेरिका में टेकोनियन पर्वत निर्माणकारी हलचल हुई।
➤ सिलूरियन काल में केलेडोनियन हलचल पूर्ण हुई। सागर तल में उतार चढ़ाव आया। मछलियों का आगमन प्रारंभ हो गया। स्थलीय पौधों का उद्भव भी शुरू हुआ। प्रवाल विस्तृत रूप से विकसित हुये।
➤ डिवोनियन काल को मछलियों की संख्या बढ़ने के कारण ‘मछली युग’ कहते हैं। इसी समय प्रथम उभयचर अस्तित्व में आया।
मरूस्थलों में बलुआ पत्थर बने।
➤ कार्बोनिफेरस काल में मिलने वाली विस्तृत कार्बन की उपलब्धता के कारण ही इसका नामकरण हुआ तथा इसे कोयला युग भी कहते हैं। इस युग की शैलों को पेन्सिलवेनियन एवं मसिसीपियन दो वर्गों में विभक्त किया गया है। इसी काल में आरमोरिकन भू-हलचल हुई। जलवायु परिवर्तन हुआ तथा वृहत स्तर पर दलदलों का विस्तार हुआ जिससे सघन वन विकसित हुये।
➤ कार्बोनिफेरस काल में गोंडवानालैण्ड में हिमानीकरण हुआ।
➤ रूस के पर्म प्रदेश के नाम पर पर्मियन काल का नामकरण किया गया। इस काल में ‘वेरिस्कन’ भू-हलचल हुई तथा पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका में अप्लेशियन पर्वत का निर्माण हुआ।
➤ पर्मियन काल में सरीसृपों का सर्वाधिक विकास होने के कारण इसे ‘सरीसृप युग’ कहा जाता है।
➤ मध्यजीवी महाकाल को तीन कालों ट्रायसिक, जुरासिक एवं क्रिटेशियस में विभक्त किया गया है।
➤ ट्रायसिक काल में गोंडवानालैण्ड परस्पर जुड़ा हुआ था। इसी समय प्रथम स्तनधारी जीव का आगमन हुआ। मछली के आकार वाले मांसाहारी सरीसृप विकसित हुये।
➤ जुरासिक काल का नामकरण हम्बोल्ट ने फ्रांस के जूरा पर्वत के नाम पर किया। इसमें विशाल जीवों का विकास हुआ। इस समय डायनोसोर बहुलता से पाये जाते थे। उड़ने वाले पशु ‘उरंग’ तथा तीन आँख वाली छिपकली ‘स्फेनोडन’ का आगमन भी इसी दौरान हुआ।
➤ क्रिटेशियस काल में विस्तृत दरारों के उद्गार से दक्षिणी भारत के पठारी भाग का निर्माण हुआ। इसी काल में लेरेमाइड भू-हलचल हुई। इस समय ग्रीनलैण्ड एवं आस्ट्रेलिया में हिमावरण बना था।
➤ नवजीवी महाकल्प को दो कालों टर्शियरी एवं क्वाटरनरी तथा छ: युगों में विभक्त किया गया है। नवीन वलित पर्वत मालाएँ इसी महाकल्प में बनी हैं।
➤ तृतीयक काल में अनेक भू-हलचलें हुईं तथा स्थल में उत्थान हुआ। महाद्वीपों का वर्तमान स्वरूप इसी काल में विकसित हुआ। हिमालय, आल्पस, रॉकीज तथा एण्डीज इसी युग में बने।
➤ पुरानूतन (Palaeocene) युग में घोडे़ का जन्म हुआ। खुरवाले जानवरों का विकास आदिनूतन (Oligocene) युग में हुआ। कुछ शाकाहारी जन्तु गाय, भैंस, भेड़, बकरी आदि के पूर्वजों का आगमन शुरू हुआ।
➤ मध्यनूतन (Miocene) युग में आल्पस तथा हिमालय का निर्माण पूर्ण हुआ। मानव के पूर्वज होमोइरेक्टस का आगमन मध्य अफ्रीका में प्रारंभ हो गया था।
➤ अतिनूतन (Pliocene) युग में मेमूथ जंगली भैंसे तथा गैंडे आदि का आधिपत्य रहा।
➤ अत्यन्त नूतन (Pliestocene) युग में महान हिमयुग आया। ‘होमोसेपियन’ मानव का आगमन हुआ। उत्तरी अमेरिका की महान झीलों का निर्माण भी प्लीस्टोसीन हिम युग के उपरान्त हुआ।

पृथ्वी की आंतरिक संरचना

पृथ्वी की आंतरिक संरचना के विषय में हमारी अधिकतर जानकारी परोक्ष रूप से प्राप्त अनुमानों पर आधारित है। तथापि इस जानकारी का कुछ भाग प्रत्यक्ष प्रेक्षणों और पदार्थ के विश्लेषण पर भी आधारित है। पृथ्वी की आंतरिक संरचना के बारे में सर्वमान्य जानकारी भूकम्पीय तरंगों की प्रकृति एवं ज्वालामुखी क्रिया से निसृत पदार्थों द्वारा प्राप्त होती है।
➤ पृथ्वी की उत्पत्ति से संबंधित सिद्धांत एवं घनत्व, दबाव तथा तापमान के द्वारा भी आंतरिक संरचना के बारे में जानकारी प्राप्त होती है।
➤ पृथ्वी का सामान्य घनत्व 5.5 है लेकिन ऊपरी परत का 3 से 3.5 तथा पृथ्वी के अंतरतम का घनत्व 11 है जिसके द्वारा यह अनुमान लगाया जाता है कि बाहरी परत हल्के पदार्थों तथा आंतरिक भाग भारी पदार्थों (लोहा-निकिल) द्वारा निर्मित है।
➤ घनत्व के ऊपरी भाग से अंतरतम की ओर बढ़ने का प्रमुख कारण तो विविध पदार्थों का अंतर है लेकिन ऊपरी पदार्थों के दबाव द्वारा भी घनत्व ऊपर से नीचे की ओर बढ़ता जाता है।
➤ पृथ्वी के ऊपरी भाग से नीचे की ओर जाने पर सामान्यतया तापमान बढ़ता जाता है जिसकी सामान्य दर में प्रति 32 मीटर की गहराई पर 1 डिग्री से. की वृद्धि हो जाती है। अर्थात् प्रति 100 मीटर पर 2 से 3 डिग्री से. तापमान बढ़ जाता है।
➤ तापमान बढ़ने का प्रमुख कारण आंतरिक भाग में रेडियो एक्टिव पदार्थों की उपलब्धता को माना जाता है। इसके अतिरिक्त सूर्य द्वारा तथा ऊपरी पदार्थों के दबाव से भी तापमान में वृद्धि होती है।
➤ तापमान की अधिकता के कारण पृथ्वी का आंतरिक भाग द्रवित एवं पिघली हुई अवस्था में होना चाहिए लेकिन ऊपरी परतों के दबाव के कारण अंतरतम एक ठोस पदार्थ की तरह व्यवहार करता है।
➤ पृथ्वी से सबसे आसानी से उपलब्ध ठोस पदार्थ धरातलीय चट्टानें हैं, अथवा वे चट्टानें हैं, जो हम खनन क्षेत्रों से प्राप्त करते हैं।
➤ दक्षिणी अफ्रीका की सोने की खानें 3 से 4 कि.मी. तक गहरी हैं।
इससे अधिक गहराई में जा पाना असंभव है, क्योंकि उतनी गहराई पर तापमान बहुत अधिक होता है।
➤ खनन के अतिरिक्त वैज्ञानिक, विभिन्न परियोजनाओं के अंतर्गत पृथ्वी की आंतरिक स्थिति को जानने के लिए पर्पटी में गहराई तक छानबीन कर रहे हैं।
➤ संसार भर के वैज्ञानिक दो मुख्य परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं। ये हैं गहरे समुद्र में प्रवेधन परियोजना (Deep ocean drilling project) व समन्वित महासागरीय प्रवेधन परियोजना (Integrated ocean drilling project)।
➤ आज तक सबसे गहरा प्रवेधन (Drill) आर्कटिक महासागर में कोला (Kola) क्षेत्र में 12 कि.मी. की गहराई तक किया गया है।
इन परियोजनाओं तथा बहुत सी अन्य गहरी खुदाई परियोजनाओं के अंतर्गत, विभिन्न गहराई से प्राप्त पदार्थों के विश्लेषण से हमें पृथ्वी की आंतरिक संरचना से संबंधित असाधारण जानकारी प्राप्त हुई है।
➤ पृथ्वी की आंतरिक जानकारी का दूसरा अप्रत्यक्ष स्रोत उल्काएँ हैं, जो कभी-कभी धरती तक पहुँचती हैं। हालाँकि, हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उल्काओं के विश्लेषण के लिए उपलब्ध पदार्थ पृथ्वी के आंतरिक भाग से प्राप्त नहीं होते हैं। परंतु उल्काओं से प्राप्त पदार्थ और उनकी संरचना पृथ्वी से मिलती-जुलती है।
➤ ये (उल्काएँ) वैसे ही पदार्थ के बने ठोस पिंड हैं, जिनसे हमारा ग्रह (पृथ्वी) बना है। अत: पृथ्वी की आंतरिक जानकारी के लिए उल्काओं का अध्ययन एक अन्य महत्वपूर्ण स्रोत है।
➤ अन्य अप्रत्यक्ष स्रोतों में गुरुत्वाकर्षण, चुंबकीय क्षेत्र व भूकंप संबंधी क्रियाएँ शामिल हैं।
➤ पृथ्वी के धरातल पर भी विभिन्न अक्षांशों पर गुरुत्वाकर्षण बल एक समान नहीं होता है। यह (गुरुत्वाकर्षण बल) ध्रुवों पर अधिक एवं भूमध्यरेखा पर कम होता है। पृथ्वी के केंद्र से दूरी के कारण गुरुत्वाकर्षण बल ध्रुवों पर कम और भूमध्यरेखा पर अधिक होता है। गुरुत्व का मान पदार्थ के द्रव्यमान के अनुसार भी बदलता है।
➤ पृथ्वी के भीतर पदार्थों का असमान वितरण भी इस भिन्नता को प्रभावित करता है। अलग-अलग स्थानों पर गुरुत्वाकर्षण की भिन्नता अनेक अन्य कारकों से भी प्रभावित होती है। इस भिन्नता को गुरुत्व विसंगति (GravityAnomaly) कहा जाता है। गुरुत्व विसंगति हमें भूपर्पटी में पदार्थ के द्रव्यमान के वितरण की जानकारी देती है। चुंबकीय सर्वेक्षण भी भूपर्पटी में चुंबकीय पदार्थ के वितरण की जानकारी देते हैं।

भूकंप

साधारण भाषा में भूकंप का अर्थ है- पृथ्वी का कंपन। यह एक प्राकृतिक घटना है। ऊर्जा के निकलने के कारण तरंगें उत्पन्न होती हैं, जो सभी दिशाओं में फैलकर भूकंप लाती हैं। प्राय: भ्रंश के किनारे-किनारे ही ऊर्जा निकलती है। भूपर्पटी की शैलों में गहन दरारें ही भ्रंश होती हैं। भ्रंश के दोनों तरफ शैलें विपरीत दिशा में गति करती हैं। जहाँ ऊपर के शैलखंड दबाव डालते हैं, उनके आपस का घर्षण उन्हें परस्पर बाँधे रहता है। फिर भी, अलग होने की प्रवृत्ति के कारण एक समय पर घर्षण का प्रभाव कम हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप शैलखंड विकृत होकर अचानक एक दूसरे के विपरीत दिशा में सरक जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप ऊर्जा निकलती है और ऊर्जा तरंगें सभी दिशाओं में गतिमान होती हैं।
उद्गम केन्द्र (Focus): वह स्थान जहाँ से ऊर्जा निकलती है, भूकंप का उद्गम केन्द्र (Focus) कहलाता है। इसे अवकेंद्र (Hypocentre) भी कहा जाता है। ऊर्जा तरंगें अलग-अलग दिशाओं में चलती हुई पृथ्वी की सतह तक पहुँचती हैं।
अधिकेंद्र (Epicentre): भूतल पर वह बिंदु जो उद्गम केंद्र के समीपतम होता है, अधिकेंद्र (Epicentre) कहलाता है। अधिकेंद्र पर ही सबसे पहले तरंगों को महसूस किया जाता है। अधिकेंद्र उद्गम केंद्र के ठीक ऊपर (90º के कोण पर) होता है।
भूकंपीय तरंगें (Earthquake Waves)
सभी प्राकृतिक भूकंप स्थलमंडल (Lithosphere) में ही आते हैं।
➤ स्थलमंडल पृथ्वी के धरातल से 200 कि.मी. तक की गहराई वाले भाग को कहते हैं।
➤ भूकंपमापी यंत्र (Seismograph) सतह पर पहुँचने वाली भूकंप तरंगों को अभिलेखित करता है।
भूगर्भिक तरंगें: भूगर्भिक तरंगें उद्गम केंद्र से ऊर्जा के मुक्त के दौरान पैदा होती हैं और पृथ्वी के अंदरूनी भाग से होकर सभी दिशाओं में आगे बढ़ती हैं। इसलिए इन्हें भूगर्भिक तरंगें कहा जाता है।
धरातलीय तरंगें: भूगर्भिक तरंगों एवं धरातलीय शैलों के मध्य अन्योन्य क्रिया के कारण नई तरंगें उत्पन्न होती हैं, जिन्हें धरातलीय तरंगें कहा जाता है। ये तरंगें धरातल के साथ-साथ चलती हैं। तरंगों का वेग अलग-अलग घनत्व वाले पदार्थों से गुजरने पर परिवर्तित हो जाता है।
➤ अधिक घनत्व वाले पदार्थों में तरंगों का वेग अधिक होता है। पदार्थों के घनत्व में भिन्नताएँ होने के कारण परावर्तन (Reflection) एवं आवर्तन (Refraction) होता है, जिससे इन तरंगों की दिशा भी बदलती है।
➤ भूकम्प आने के समय उत्पन्न होने वाली तरंगों के भ्रमण पथ के आधार पर भी आंतरिक संरचना के बारे में जानकारी प्राप्त होती है।
भूकम्पीय तरंगें P (Preliminary Waves), S (Secondary Waves) तथा L (Long Waves) तीन प्रकार की होती हैं। जिनकी भ्रमण गति एवं पथ अलग-अलग होता है।
➤ P तथा S मुख्य तरंगों के अतिरिक्त पीजी तथा एसजी जिनकी जानकारी 1909 में क्रोएशिया की कुल्पा घाटी (KulpaValley) में आए भूकम्प के आधार पर जफेरीज महोदय ने दी तथा P तथा S तरंगों की जानकारी 1923 में आए आस्ट्रिया के भूकम्प में आए अध्ययन के आधार पर कोनार्ड महोदय ने दी।
➤ भूकम्पीय तरंगों में P तरंगें द्रवित भाग में कम वेग से तथा ठोस में तीव्र गति से S तरंगें द्रवित क्षेत्र में विलुप्त हो जाती हैं तथा L तरंगें धरातलीय क्षेत्र पर भ्रमण करती हैं।
➤ मेण्टल क्षेत्र में Pतरंग 7.9 से 8.1 किमी. प्रति सेकण्ड की गति से भ्रमण करती है जो सामान्यतया ऊपरी भू-भाग से 30.35 किमी. की गहराई पर स्थित है। इस भाग को मोहो असम्बद्धता कहा जाता है जिसकी जानकारी मोहोरोविसिक महोदय ने दी थी।
➤ 100 से 200 किमी. की गहराई पर P तरंगों की गति 7 से 8 किमी. के मध्य तथा 2900 किमी. की गहराई पर 13.6 किमी. प्रति सेकण्ड की गति से भ्रमण करती है।
➤ P तरंगें अधिकेन्द्र में विलुप्त हो जाती हैं। अत: यह अनुमान लगाया जाता है कि यह भाग पिघली हुई अवस्था में है।
➤ स्वेस महोदय ने पृथ्वी की आंतरिक संरचना को तीन परतों में विभाजित किया है। परतों के विभाजन में गहराई, घनत्व तथा पदार्थों को प्रमुख आधार माना है।
➤ ऊपरी भूपर्पटी को स्वेस महोदय ने अवसादों से निर्मित बताया है जिसे परतदार शैलों से निर्मित भू-पर्पटी नाम दिया है।
➤ भू-पर्पटी के नीचे प्रथम परत सियाल परत है जिसका निर्माण सिलिका तथा एल्युमिनियम से हुआ है। सिलिका के प्रथम दो अक्षर Si तथा एल्युमिनियम के प्रथम दो अक्षर। को मिलाकर इसका नाम सियाल रखा गया है। इस परत की गहराई 50 से 300 किमी. तथा घनत्व 2.9 माना गया है।
➤ सियाल से नीचे दूसरी परत सीमा (SIMA) है जिसका निर्माण सिलिका तथा मैग्नेशियम से हुआ है। यह परत 1000 से 2000 किमी. गहराई पर स्थित है जिसका घनत्व 2.9 से 4.7 के मध्य है। सीमा परत में मैग्नेशियम, कैल्सियम तथा लोहे के सिलिकेट की अधिकता के कारण इसे क्षारीय पदार्थों की परत भी कहते हैं।
➤ सीमा से नीचे पृथ्वी के केन्द्र तक अर्थात् 6371 किमी. की गहराई तक स्थित परत को निफे परत नाम दिया है, जहां पदार्थों का घनत्व लगभग 11 है। इस परत में निकल तथा फैरियम पदार्थों की अधिकता होने के कारण इसका नाम निफे रखा गया है।
➤ होम्स महोदय ने पृथ्वी की आंतरिक संरचना को दो भागों में विभाजित किया है। ऊपरी भाग को क्रस्ट तथा निचली परत को अध: स्तर कहा है।
➤ क्रस्ट के निर्माण में सियाल परत तथा सीमा परत के ऊपरी भाग को सम्मिलित किया जाता है।
➤ Substratum (अध: स्तर) का निर्माण सीमा परत के आंतरिक भाग से हुआ है।
➤ आंतरिक सियाल, सिलिकेट तथा धातु केन्द्र के रूप में चार परतों में विभाजित किया है।
➤ भूकम्पीय तरंगों के अध्ययन के आधार पर आंतरिक भाग को तीन परतों में बांटा गया है।
➤ स्थल मण्डल जो लगभग 100 किमी. की गहराई तक स्थित है तथा जिसका घनत्व 3.5 है। इस भाग में ग्रेनाइट चट्टान की प्रधानता है।
➤ 2880 किमी. से भूकेन्द्र के मध्य स्थित भाग को बेरीस्फीयर नाम दिया गया है जिसका निर्माण लोहे तथा निकिल जैसे भारी पदार्थों से होने के कारण घनत्व 8 से 11 के मध्य तक पाया जाता है।
➤ सामान्यतया पृथ्वी की आंतरिक संरचना को मोटे तौर पर तीन परतों में विभाजित किया गया है।
क्रस्ट: सबसे ऊपरी परत को जिसकी औसत मोटाई 33 किमी. (महाद्वीपों के नीचे 40 किमी. महासागरीय भाग में 5 से 10 किमी.) है तथा घनत्व 2.8 से 3 के मध्य है, क्रस्ट नाम दिया गया है।
मेंटल परत: क्रस्ट से 2900 किमी. के मध्यवर्ती भाग में स्थित क्षेत्र को मेंटल परत के नाम से जाना जाता है जिसका औसत घनत्व 4.5 से 5.5 के मध्य है। गहराई के आधार पर इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है। 200 किमी. की गहराई तक मोड़ असम्बद्धता, 200 से 700 किमी. तक रेपेटो तथा 700 से 2900 किमी. तक गुटेनबर्ग विकट परत के नाम से जाना जाता है।
अंतरतम (Core): 2900 किमी. से 6371 किमी. के मध्यवर्ती भाग को अंतरतम (Core) नाम दिया गया है। जहां लोहा तथा निकिल पदार्थों की प्रधानता के कारण औसत घनत्व 11 पाया जाता है।

भूकंप के विभिन्न प्रकार विवर्तनिक (Tectonic):
सामान्यत: विवर्तनिक (Tectonic) भूकंप ही अधिक आते हैं। ये भूकंप भ्रंशतल के किनारे चट्टानों के सरक जाने के कारण उत्पन्न होते हैं।
ज्वालामुखीजन्य (Volcanic): एक विशिष्ट वर्ग के विवर्तनिक भूकंप को ही ज्वालामुखीजन्य (Volcanic) भूकंप समझा जाता है। ये भूकंप अधिकांशत: सक्रिय ज्वालामुखी क्षेत्रों तक ही सीमित रहते हैं।
नियात (Collapse): खनन क्षेत्रों में कभी-कभी अत्यधिक खनन कार्य से भूमिगत खानों की छत ढह जाती है, जिससे हल्के झटके महसूस किए जाते हैं। इन्हें नियात (Collapse) भूकंप कहा जाता है।
विस्फोट (Explosion) भूकंप: कभी-कभी परमाणु व रासायनिक विस्फोट से भी भूमि में कंपन होती है। इस तरह के झटकों को विस्फोट (Explosion) भूकंप कहते हैं।
बाँध जनित (Reservoir induced): जो भूकंप बड़े बाँध वाले क्षेत्रों में आते हैं, उन्हें बाँध जनित (Reservoir induced) भूकंप कहा जाता है।

ज्वालामुखी

ज्वालामुखी उद्गार प्रत्यक्ष जानकारी का एक अन्य स्रोत है। जब कभी भी ज्वालामुखी उद्गार से लावा पृथ्वी के धरातल पर आता है, यह प्रयोगशाला अन्वेषण के लिए उपलब्ध होता है। यद्यपि इस बात का निश्चय कर पाना कठिन होता है कि यह मैग्मा कितनी गहराई से निकला है।
➤ ज्वालामुखी क्रिया के समय पृथ्वी के आंतरिक भाग से बाहर निकलने वाले तप्त द्रवित मैग्मा के आधार पर यह अनुमान लगाया जाता है कि अंतरतम में एक ऐसा मण्डल है जहाँ अत्याधिक तापमान के कारण चट्टानें पिघली हुई द्रवित अवस्था में मैग्मा के रूप में पायी जाती हैं जो ज्वालामुखी उद्भेदन के समय दरार में से होकर लावा के रूप में पृथ्वी के धरातल पर आती हैं।

पृथ्वी की आकृति एवं गतियाँ

पृथ्वी सौरमण्डल का एक छोटा ग्रह है। पृथ्वी गोलाकार है। पृथ्वी की इस आकृति को अक्षवध गोलाभ (Oblate Spheroid) कहते हैं, क्योंकि पृथ्वी का भूमध्य रेखीय व्यास 12756 किलोमीटर और ध्रुवीय व्यास 12713 किलोमीटर है। भूमध्य रेखीय परिधि 40,075 किलोमीटर और ध्रुवीय परिधि 40,000 किलोमीटर है। पृथ्वी का पृष्ठीय क्षेत्रफल 510,100,500 वर्ग किलोमीटर है। पृथ्वी के 29% (148,951,000 वर्ग किलोमीटर) क्षेत्र पर स्थलखण्ड व 71% (361,150,000 वर्ग किलोमीटर) क्षेत्र पर जलमण्डल है। पृथ्वी की त्रिज्या 6.370 कि0मी0 है। पृथ्वी की आंतरिक परिस्थितियों के कारण यह संभव नहीं है कि कोई पृथ्वी के केंद्र तक पहुँचकर उसका निरीक्षण कर सके या वहाँ के पदार्थ का कुछ नमूना प्राप्त कर सके।
पृथ्वी सपाट नहीं है
1. अगर पृथ्वी सपाट होती तो सूर्योदय सर्वत्र एक समय ही दिखाई पड़ता, परन्तु ऐसा नहीं है। पूर्व में अवस्थित स्थान सूर्योदय पहले देखते हैं।
2. जब जहाज क्षितिज पर पहुंचता है तो सर्वप्रथम उसका मस्तुल दिखता है फिर पाल एवं सम्पूर्ण भाग। अगर पृथ्वी सपाट होती तो सम्पूर्ण जहाज को एक बार में दिखना चाहिए।

पृथ्वी गोलाकार है

1. चन्द्र ग्रहण के समय जब पृथ्वी की छाया चन्द्रमा पर पड़ती है तो वह चापाकार दिखाई पड़ता है। पृथ्वी शायद ही कभी ऐसी तस्वीर पेश करती है, बल्कि यह हमेशा एक गोलाकार छाया चन्द्रमा पर डालती है जिससे साबित होता है कि पृथ्वी गोलाकार है। गोलाकार ही एक मात्र ऐसी आकृति है जो सर्वदा गोलाकार छाया ही प्रस्तुत करती है।
2. उत्तरी ध्रुव पर ध्रुव तारा हमेशा 90º का ही कोण बनाता है। जबकि तारे पृथ्वी के अक्षय से एक सीधी रेखा पर अवस्थित हैं।
3. दक्षिण की ओर यात्रा करने पर ध्रुव तारे का कोण कम होता जाता है।
4. विषुवत रेखा पर कोण शून्य हो जाता है। यह साबित करता है कि गोले पर यात्रा करना चापाकार होता है।
5. सूर्य, चन्द्रमा एवं अन्य आकाशीय पिण्ड विभिन्न स्थानों से देखने पर गोल दिखते हैं। यह साबित करता है कि पृथ्वी गोल है।
6. आकाश से लिए गए चित्र से सारे संदेह समाप्त हो जाते हैं एवं यह साबित हो जाता है कि पृथ्वी गोल है।

पृथ्वी भूमध्य रेखा पर उभरी हुई है

1671 एक फ्रांसीसी खगोलशास्त्री को गियाना द्वीप (जो दक्षिण अमेरिका के फ्ेंच गुयाना राज्य में है) कुछ महत्त्वपूर्ण खगोलीय निरीक्षण के लिए भेजा गया। उसने घड़ी की पेण्डुलम ठीक उसी प्रकार समायोजित की जिस प्रकार फ्रांस में थी (जब पेण्डुलम छोटा बनाया गया था तब वह तेज धड़कता था जब बड़ा बनाया गया तो वह धीरे धड़कने लगा)। गियाना पहँुचने पर, जो विषुवत वृत्त पर है, उसे पता चला कि उसकी घड़ी में ढाई मिनट कम हो रहा है प्रतिदिन के हिसाब से।
जैसे ही न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण का नियम प्रकाशित हुआ यह विश्लेषण करना आसान हो गया कि घड़ी की रफ्तार का कम होना गुरुत्वाकर्षण की कमी के कारण है।
इससे यह पता चलता है कि विषुवतीय क्षेत्र धु्रवीय क्षेत्रों की तुलना में केन्द्र के ज्यादा समीप हैं।
पृथ्वी पूर्णत: गोल नहीं– 17वीं शताब्दी में सर आइजक न्यूटन ने पृथ्वी को ध्रुवों पर चपटी नारंगी के आकार से मिलती-जुलती बताया। सन् 1903 में जीन्स ने पृथ्वी को नाशपाती के आकार का घोषित किया। कुछ भू-विज्ञेताओं ने पृथ्वी को चतुष्फलक भी बताया। आधुनिक भू-वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी का विषुवत रेखीय व्यास (12,756 कि.मी.) और धु्रवीय व्यास (12,713 कि.मी.) में 43 कि.मी. का अन्तर है। अर्थात् जब पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है तो इस घूर्णन से अपकेन्द्री बल उत्पन्न होता है, जिसके कारण पृथ्वी विषुवत रेखा पर कुछ उभरी हुई तथा ध्रुवों पर कुछ चपटी हो जाती है। इसी के कारण इन दोनों व्यासों में अन्तर उत्पन्न होता है। अत: पृथ्वी को पूर्णत: गोल नहीं माना जा सकता। जॉन हार्सेल का मानना है कि पृथ्वी का आकार न तो नारंगी के समान है और न ही नाशपाती के, बल्कि पृथ्वी पृथ्व्याकार है। पृथ्वी का पृथ्व्याकार होने के कारण उसके किसी भी अक्षांश का पूर्ण वृत्त न होना है।

पृथ्वी की गतियाँ

पृथ्वी सौरमंडल का एक ग्रह है। पृथ्वी और उसकी गतियों के बारें में महत्वपूर्ण तथ्य निम्नलिखित है।
➤ पृथ्वी की दो गतियां हैं: घूर्णन और परिक्रमण
➤ घूर्णन (Rotation) को दैनिक गति भी कहते हैं जबकि परिक्रमण (Revolution) को वार्षिक गति कहते हैं।
➤ पृथ्वी अपने अक्ष पर पश्चिम से पूरब की ओर घूमती रहती है जिसे पृथ्वी की दैनिक गति कहते हैं।
➤ एक घूर्णन पूरा करने में पृथ्वी 23 घंटे, 56 मिनट और 4.09 सेकेंड का समय लेती है।
➤ पृथ्वी की दैनिक गति की वजह से ही दिन और रात होते हैं।
➤ पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमने के साथ-साथ सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करती है जिसे वार्षिक गति कहते हैं।
➤ पृथ्वी सूर्य की एक परिक्रमा 365 दिन 6 घंटे 48 मिनट और 45.51 सेकेंड में पूरा करती है।
➤ पृथ्वी की वार्षिक गति की वजह से मौसम बदलते हैं।
➤ पृथ्वी की धुरी उसकी कक्षा से 66.5 डिग्री तक झुकी होती है।
➤ पृथ्वी की झुकी हुई धुरी और परिक्रमा की गति की वजह से बसंत, गर्मी, ठंड और बरसात की ऋतुएं आती हैं।
➤ जब पृथ्वी सूर्य के बिल्कुल पास होती है तो उसे उपसौर (Perihelion) कहते हैं।
➤ उपसौर की स्थिति 3 जनवरी को होती है। इस दिन पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी 14.70 करोड़ कि.मी. होती है।
➤ जब पृथ्वी सूर्य से अधिकतम दूरी पर होती है तो यह अपसौर (Aphelion) कहलाता है।
➤ अपसौर की स्थिति 4 जुलाई को होती है। ऐसी स्थिति में पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी 15.21 करोड़ कि.मी. होती है।
➤ उपसौर और अपसौर को मिलाने वाली रेखा सूर्य के केंद्र से गुजरती है। इसे एपसाइड रेखा कहते हैं।

घूर्णन के कारण होने वाली घटनाएँपरिभ्रमण के कारण होने वाली घटनाएँ
दिन और रात का होना।मध्याह्वकालीन सूर्य की ऊँचाई में अन्तर।
समय की माप।दिन व रात की लम्बाई में अन्तर।
दिवस के विभिन्न काल (प्रात:, मध्यान) (दोपहर), सायं एवं मध्य रात्रि)।कर्क और मकर रेखाओं का निर्धारण।
ग्लोब पर किसी स्थान की स्थिति निर्धारण।ऋतु परिवर्तन।
आकाश में ग्रहों का पूर्व से पश्चिम की ओर घूमते हुए प्रतीत होना।
प्रचलित पवनों एवं समुद्री धाराओं की दिशा पर प्रभाव।
दैनिक ज्वार-भाटों में समय का अन्तर।



अक्षांश रेखा
अक्षांश, भूमध्यरेखा से किसी भी स्थान की उत्तरी या दक्षिणी ध्रुव की ओर की कोणीय दूरी का नाम है। भूमध्यरेखा को 0° की अक्षांश रेखा माना गया है। अक्षांश रेखाओं से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य इस प्रकार हैं:
➤ ग्लोब पर पश्चिम से पूरब की ओर खींची गईं काल्पनिक रेखाओं को ही अक्षांश रेखाएं कहते हैं। इन्हें अंश में प्रदर्शित किया जाता है।
➤ अक्षांश रेखाओं की संख्या 181 है।
➤ अक्षांश वह कोण है, जो विषुवत रेखा और किसी अन्य स्थान के बीच पृथ्वी के केन्द्र पर बनती हैं।
➤ विषुवत रेखा को शून्य अंश की स्थिति में माना जाता है। यहां से उत्तर की ओर बढ़ने वाली कोणिक दूरी को उत्तरी अक्षांश और दक्षिण की दूरी को दक्षिणी अक्षांश कहते हैं।
➤ इसकी अधिकतम सीमा पर ध्रुव है, जिन्हें 90° उत्तरी अक्षांश या दक्षिणी अक्षांश कहा जाता है।
➤ पृथ्वी पर किसी भी देश या जगह की स्थिति का निर्धारण उस स्थान के अक्षांश और देशांतर से ही होता है।
➤ सभी अक्षांश रेखाएं समानान्तर होती हैं।
➤ दो अक्षांशों के बीच की दूरी जोन के नाम से जानी जाती है।
➤ दो अक्षांशों के बीच की दूरी 111 किमी होती है।
➤ भूमध्य रेखा के उत्तर में 23 1 2 ° अक्षांश को कर्क रेखा माना गया है, जबकि दक्षिण में 23 1 2 ° अक्षांश को मकर रेखा माना गया है।

देशान्तर रेखा

उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव को मिलाने वाली 360 रेखाओं को देशांतर रेखाएं कहा जाता है। यह ग्लोब पर उत्तर से दक्षिण की ओर खींची जाने वाली काल्पनिक रेखा है। देशांतर रेखाओं से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य इस प्रकार हैं: पृथ्वी पर दो अक्षांशों की कोणीय दूरी को देशांतर कहा जाता है।
➤ ये रेखाएं समानान्तर नहीं होती हैं।
➤ ये रेखाएं उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव पर एक बिन्दु पर मिल जाती हैं।
➤ ध्रुवों से विषुवत रेखा की ओर बढ़ने पर देशान्तरों के बीच की दूरी बढ़ती जाती है।
➤ विषुवत रेखा पर इसके बीच की दूरी अधिकतम 111.32 होती है।
➤ ग्रीनविच वेधशाला से गुजरने वाली रेखा को 0°देशांतर माना जाता है।
➤ इसकी बाईं ओर की रेखाएं पश्चिमी देशांतर और दाहिनी ओर की रेखाएं पूर्वी देशांतर कहलाती हैं।
➤ दो देशांतर रेखाओं के बीच की दूरी गोरे नाम से जानी जाती है।
➤ शून्य अंश अक्षांश और शून्य अंश देशांतर अटलांटिक महासागर में अवस्थित है।

गोलार्द्ध

गोलार्द्ध पृथ्वी के मानचित्र के वे दो हिस्से हैं जो भूमध्य रेखा द्वारा उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्धों में बराबर विभाजित किए जाते हैं।
➤ ग्रीनविच से 180° पूर्व तक पूर्वी गोलार्द्ध और 180° पश्चिम तक पश्चिमी गोलार्द्ध कहलाता है।
➤ चुंकि पृथ्वी की आकृति गोलाकार है और वृत्त को 360°में विभाजित किया जाता है। इस प्रकार 360° घूमने में पृथ्वी को एक दिन-रात अर्थात् 24 घण्टे लगते हैं। अत: 1° की दूरी तय करने में पृथ्वी को 4 मिनट लगते हैं।
अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा
अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा प्रशान्त महासागर के बीचों-बीच 180° याम्योत्तर पर उत्तर से दक्षिण की ओर खींची गई एक काल्पनिक रेखा है। इस रेखा को पार करते समय एक दिन बढ़ा अथवा घटाकर तिथि परिवर्तन किया जाता है।
➤ इस रेखा का निर्धारण 1884 में वाशिंगटन में संपन्न एक सम्मेलन में किया गया।
➤ जब कोई जलयान पश्चिम की ओर यात्रा करता है तो एक दिन जोड़ दिया जाता है जैसे सोमवार के स्थान पर मंगलवार और तिथि 27 के स्थान पर 28 मानी जाएगी और जब पूर्व दिशा में यात्रा की जाती है तो एक दिन छोड़ दिया जाता है और वहाँ सोमवार के स्थान पर दूसरा दिन भी सोमवार ही होता है और तिथि भी 27 ही रहती है।

मानक समय

मानक समय वह समय है, जो किसी देश या विस्तृत भू-भाग के लोगों के व्यवहार के लिये स्वीकृत होता है। यह उस देश के स्वीकृत मानक याम्योत्तर के लिये स्थानीय माध्य समय होता है।
हमारे अपने स्थानों के समय ‘स्थानीय समय’ कहलाते हैं। इनसे हमारी समय संबंधी स्थानीय आवश्यकता तो पूर्ण हो जाती है, किंतु ये अन्य स्थानों के लिये उपयोगी नहीं होते। इसीलिये ‘मानक समय’ की आवश्यकता पड़ती है।

ग्रहण

किसी खगोलीय पिण्ड के प्रकाश के मार्ग में किसी अन्य खगोलीय पिण्ड के आ जाने के कारण उसकी छाया उस पिण्ड पर पड़ती है, जिस कारण ग्रहण होता है। पृथ्वी और चन्द्रमा की गतियों के कारण सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण की स्थिति उत्पन्न होती है।

सूर्य ग्रहण

सूर्य ग्रहण अमावस्या के दिन होता है, परन्तु हर एक अमावस्या को नहीं होता। इसका कारण यह है कि पृथ्वी तथा चन्द्रमा कि कक्षतलों में लगभग 5°का झुकाव है। सूर्य ग्रहण तभी होता है जब अमावस्या की चन्द्रमा पृथ्वी की कक्षतल में आ जाता है। ऐसा कभी-कभी ही होता है।
? सूर्य ग्रहण के समय चन्द्रमा, पृथ्वी और सूर्य के बीच में आ जाता है।
इस कारण सूर्य का प्रकाश पृथ्वी के कुछ भाग पर नहीं पहुँच पाता। दूसरे शब्दों में यह कह सकते हैं कि चन्द्रमा के बीच में आ जाने के कारण चन्द्रमा की परछाई पृथ्वी पर पड़ती है और जहाँ-जहाँ परछाई पड़ती है वहाँ से सूर्य दिखाई नहीं देता। जब सूर्य का आंशिक भाग नहीं दिखाई देता तो उसे खण्ड सूर्य ग्रहण कहते हैं। जब चन्द्रमा सूर्य को पूरा ढक लेता है तो पूर्ण-सूर्य ग्रहण होता है।

चन्द्र ग्रहण

जब पृथ्वी चाँद और सूर्य के बीच में ठीक सीध में आ जाए तो पृथ्वी की छाया चन्द्रमा पर पड़ती है, जिस कारण उस पर अंधेरा छा जाता है।
इसे चन्द्र ग्रहण कहते हैं। चन्द्र ग्रहण सदा पूर्णिमा को होता है, परन्तु हर पूर्णिमा को नहीं होता। इसका कारण यह है कि पृथ्वी तथा चन्द्रमा के कक्षतलों में लगभग 5° का परस्पर झुकाव है। चन्द्र ग्रहण उसी पूर्णिमा को होता है, जब चन्द्रमा पृथ्वी के कक्ष तल में होता है। ऐसा कभी- कभी ही होता है। जब चन्द्रमा का केवल कुछ भाग पृथ्वी की परछाई में आता है तो इसे आंशिक चन्द्र ग्रहण कहते हैं। जब चन्द्रमा का पूरा प्रकाशित भाग पृथ्वी की परछाई में आ जाता है तो इसे पूर्ण चन्द्र ग्रहण कहते हैं।

चन्द्रकलाएं

चन्द्रमा के पास अपना प्रकाश नहीं होता, वह केवल सूर्य द्वारा उत्सर्जित प्रकाश का परावर्तन करता है जैसे कि स्वयं हमारी पृथ्वी करती है। इसी परावर्तन के कारण वह चमकता है। यही कारण है कि एक समय में चंद्रमा का एक ही भाग दिखता है जिस पर सूर्य का प्रकाश पड़ता है। पृथ्वी से चन्द्रमा का सम्पूर्ण भाग महीने में मात्र एक बार, पूर्णिमा को दिखाई देता है। इसी प्रकार महीने में एक बार चन्द्रमा दिखाई नहीं देता, यह अमावस्या कहलाता है। अमावस्या से पूर्णमासी तक चन्द्रमा का दिखाई देने वाला प्रकाशित भाग प्रतिदिन बढ़ता जाता है जब कि पूर्णमासी से आमवस्या तक यह शनै: शनै: घटता जाता है। चन्द्रमा की बदलती हुई यही आकृतियां चन्द्रकलाएं कहलाती हैं। महीने के पहले पखवाड़े में चन्द्रमा बढ़ता जाता है जिसे शुक्ल पक्ष कहा जाता है, जबकि महीने के आखिरी पखवाड़े में चन्द्रमा घटता जाता है जिसे कृष्ण पक्ष कहा जाता है।
// पृथ्वी के धरातल का निर्माण करने वाले पदार्थों पर अपक्षय की प्रक्रिया के पश्चात् भू-आकृतिक कारक जैसे– प्रवाहित जल, भूमिगत जल, वायु, हिमनद तथा तरंग अपरदन करते हैं। अपरदन धरातलीय स्वरूप को बदल देता है। निक्षेपण प्रक्रिया अपरदन प्रक्रिया का परिणाम है और निक्षेपण से भी धरातलीय स्वरूप में परिवर्तन आता है।
➤ साधारण शब्दों में छोटे से मध्यम आकार के भूखंड भू-आकृति कहलाते हैं। बहुत सी संबंधित भू-आकृतियाँ मिलकर भूदृश्य बनाती हैं, जो भूतल के विस्तृत भाग हैं।
➤ प्रत्येक भू-आकृति की अपनी भौतिक आकृति, आकार व पदार्थ होते हैं जो कि कुछ भू-प्रक्रियाओं एवं उनके कारकों द्वारा निर्मित हैं।
➤ अधिकतर भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ धीमी गति से कार्य करती हैं और इसी कारण उनके आकार बनने में लंबा समय लगता है।
➤ प्रत्येक भू-आकृति का एक प्रारंभ होता है। भू-आकृतियों के एक बार बनने के बाद उनके आकार, आकृति व प्रकृति में बदलाव आता है जो भू-आकृतिक प्रक्रियाओं व कार्यकर्ताओं के लगातार धीमे अथवा तेज गति के कारण होता है।
➤ जलवायु संबंधी बदलाव तथा वायुराशियों के ऊर्ध्वाधर अथवा क्षैतिज संचलन के कारण, भू-आकृतिक प्रक्रियाओं की गहनता से या स्वयं ये प्रक्रियाएँ स्वयं परिवर्तित हो जाती हैं, जिनसे भू-आकृतियाँ रूपांतरित होती हैं।
➤ विकास का यहाँ अर्थ भूतल के एक भाग में एक भू-आकृति का दूसरी भू-आकृति में या एक भू-आकृति के एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होने की अवस्थाओं से है। इसका अभिप्राय यह है कि प्रत्येक भू-आकृति के विकास का एक इतिहास है और समय के साथ उसका परिवर्तन हुआ है।
➤ एक स्थलरूप विकास की अवस्थाओं से गुजरता है जिसकी तुलना जीवन की अवस्थाओं-युवावस्था, प्रौढ़ावस्था तथा वृद्धावस्था से की जा सकती है।
➤ स्थलरूपों का अनुक्रमिक (Sequential) विकास होता है। प्रत्येक भू-आकृतिक कारक एक विशेष प्रकार का स्थलरूप समुच्चय (Assemblage) बनाता है। यही नहीं, प्रत्येक प्रक्रिया व कारक अपने द्वारा बनाए गए स्थलरूपों पर अपनी एक अनोखी छाप छोड़ते हैं।
➤ अधिकतर भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ बहुत धीरे-धीरे (जिन्हें महसूस न किया जाए) कार्य करती हैं और उन्हें उनके परिणाम द्वारा ही देखा या मापा जा सकता है। ये परिणाम कुछ और नहीं अपितु स्थलरूप और उनकी विशेषताएँ हैं। अत: इन स्थलरूपों का अध्ययन ही हमें इनकी प्रक्रियाओं और कारकों के विषय में बताएगा जिन्होंने इन्हें निर्मित किया है या कर रहे हैं।

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