Chapter 8. समावेशी बच्चों हेतु निर्देशन एवं परामर्श

निर्देशन का अर्थ‚ उद्देश्य‚ प्रकार एवं आवश्यकता तथा क्षेत्र

निर्देशन का अर्थ एवं परिभाषा− निर्देशन का तात्पर्य एक ऐसी प्रक्रिया से है‚ जिसमें एक व्यक्ति को इस प्रकार सहायता प्रदान की जाती है कि वह अपनी जन्मजात तथा अर्जित क्षमताओं को समझते हुए उनका उपयोग अपनी समस्याओं को स्वयं हल करने में कर सके। इस प्रकार निर्देशन में दो व्यक्ति होते हैं। एक वह जिसको निर्देशन प्रदान किया जाता है तथा दूसरा वह जो निर्देशन करता है।
स्किनर के अनुसार− ‘‘निर्देशन‚ नवयुवकों को अपने से‚ दूसरों से और परिस्थिfतयों से सामंजस्य करना सीखने के लिए सहायता देने की प्रक्रिया है।’’
जोन्स के अनुसार− ‘‘निर्देशन का अर्थ है− प्रदर्शन करना‚ इंगित करना‚ सूचित करना तथा पथ प्रदर्शन करना। इसका अर्थ सहायता करने से अधिक है।’’
क्रो एवं क्रो के अनुसार− ‘‘निर्देशन लक्ष्य करना नहीं है। वह अपनी विचारधाराओं को दूसरों पर आरोपित नहीं करता है‚ वह दूसरों के कार्यों को अपने ऊपर नहीं लेता है‚ वरन निर्देशन तो वह सहायता है जो एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को प्रदान करता है।
इस सहायता से वह व्यक्ति अपने जीव का मार्ग स्वयं ही प्रशस्त करता है‚ अपनी विचारधारा का विकास करता है‚ अपने निर्णय को निश्चित करता है तथा अपना दायित्व संभालता है।’’
निर्देशन के उद्देश्य निर्देशन वस्तुत: एक उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है। अत: इसके कुछ निश्चित उद्देश्य होने स्वाभाविक ही है। निर्देशन के प्रमुख उद्देश्य निम्नवत होते हैं−
(i) व्यक्ति को उसकी योग्यताओं व शक्तियों का ज्ञान कराना
(ii) व्यक्ति को उसकी योग्यताएँ व क्षमताएँ विकसित करने में सहायता देना
(iii) व्यक्ति को उसकी योग्यताओं व क्षमताओं के अनुरूप शैक्षिक व व्यवसायिक अवसरों की जानकारी देना
(iv) व्यक्ति को अपने वातावरण के साथ अच्छा समायोजन करने में सहायता प्रदान करना
(v) व्यक्ति को अपनी समस्याओं का स्वयं समाधान करने योग्य बनाना।
निर्देशन के प्रकार− निर्देशन के निम्न प्रकार होते हैं-
1. व्यक्तिगत निर्देशन− यह निर्देशन व्यक्तिगत कठिनाइयों से सम्बन्धित होता है। इसमें निम्नलिखित बातों का होना आवश्यक है−
• छात्रों को उनकी समस्याओं का ज्ञान कराना और उन्हें समुचित निर्देशन देना
• छात्रों के संतुलित विकास में सहायता करना
• छात्रों को अध्ययन के सम्बन्ध में मार्गदर्शन करना
• छात्रों को वातावरण से सामंजस्य स्थापित करने में व्यक्तिगत रूप से सहायता करना
2. शैक्षिक निर्देशन− जोन्स के अनुसार शैक्षिक निर्देशन का अर्थ उस व्यक्तिगत सहायता से‚ जो छात्रों को इस कारण से प्रदान की जाती है कि वे अपने लिए उपयुक्त पाठ्‌यक्रम‚ पाठ्‌य−विषय एवं विद्यालयी जीवन का चयन कर सकें और उनसे समायोजन कर सकें।
शैक्षिक निर्देशन का सम्बन्ध शिक्षा और अध्ययन से होता है‚ इसमें निम्नलिखित बातें सम्मिलित होती हैं−
• पाठ्य विषयों का चयन करते समय छात्रों का मार्गदर्शन करना
• विद्यालय में प्रवेश के समय छात्रों को आवश्यक और उचित निर्देशन देना।
• छात्रों को भावी योजना बनाने में सहायता देना और अन्य उच्च शिक्षा संस्थाओं के सम्बन्ध में सूचना देना
• छात्रों को ज्ञानार्जन तथा अध्ययन की विधियाँ बताना।
• छात्रों की पारिवारिक पृष्ठभूमि‚ शैक्षिक उपलब्धि तथा रुचियों और क्षमताओं की जानकारी प्राप्त कर उन्हें आवश्यकता तथा परिस्थिति के अनुसार सहायता या मार्गदर्शन देना।
3. स्वास्थ्य निर्देशन− स्वास्थ्य निर्देशन का सम्बन्ध विशेष रूप से छात्र की निम्नलिखित स्वास्थ्य सुरक्षा सम्बन्धित बातों से हैं−
• छात्रों को स्वास्थ्य जीवन के महत्त्व के विषय में बताना
• छात्रों को उत्तम स्वस्थ आदतों के विषय में जानकारी देना
• स्वास्थ्य को हानि पहुँचाने वाली आदतों को छोड़ने के विषय में उचित निर्देशन देना
• छात्रों को प्राथमिक उपचार के विषय में जानकारी कराना और उसका प्रशिक्षण देना
• विशिष्ट आवश्यकता वाले बच्चों को विशेष सूचना प्रदान करना
• छात्रों को काम−शिक्षा की स्तरानुकूल वांछित जानकारी प्रदान करना।
4. सामाजिक निर्देशन− इसमें छात्रों को सामाजिक सम्बन्धों का निर्देशन दिया जाता है।
इस निर्देशन में निम्नलिखित बाते होती हैं−
• छात्रों को सामाजिक समायोजन के विषय में आवश्यक परामर्श देना
• छात्रों को विभिन्न सामाजिक व्यवहारों के विषय में विभिन्न सूचनाएँ प्रदान करना
• छात्रों को विद्यालय के सामाजिक जीवन का ज्ञान कराना
• विद्यालय में होने वाले विभिन्न कार्यक्रमों के आयोजन को संगठित करने में छात्रों की सहायता करना
5. व्यावसायिक निर्देशन− व्यावसायिक निर्देशन के अंतर्गत छात्रों को वे सुझाव दिये जाते हैं‚ जिन्हें ग्रहण करके वे अपने भविष्य के लिए व्यवसाय का चुनाव करते हैं। इस विषय में निम्नलिखित बातों पर ध्यान दिया जाता है−
• किसी छात्र या व्यक्ति विशेष को ऐसे सहायता देना कि वह अपने लिए उचित व्यवसाय का चुनाव ठीक प्रकार से कर सके।
• छात्रों को विभिन्न व्यवसायों के विषय में जानकारी कराना
• विभिन्न व्यवसायों के गुण एवं दोषों की सूचना प्रदान करना
• छात्रों की रुचियों‚ योग्यताओं तथा क्षमताओं से सम्बन्धित व्यवसायों की जानकारी प्राप्त करना और उसके आधार पर छात्रों को निर्देशन देना
• छात्रों को विभिन्न व्यवसायों से सम्बन्धित प्रशिक्षण केन्द्रों की सूचना प्रदान करना।
निर्देशन की विधियाँ−
छात्रों को निर्देशन प्रदान करने के लिए दो विधियाँ प्रयोग की जाती हैं−
1. वैयक्तिक सम्पर्क विधि
2. सामूहिक विधि
निर्देशन के सोपान−
1. साक्षात्कार 2. प्रश्नावली 3. संचित अभिलेखों का अध्ययन 4. मनोवैज्ञानिक परीक्षण 5. अनुस्थापन वार्तालाप 6. पारिवारिक दशाओं का अध्ययन 7. पार्श्व चित्र 8. अनुगामी कार्यक्रम
निर्देशन की आवश्यकता एवं क्षेत्र−
वर्तमान समय में औद्योगीकरण‚ नगरीकरण‚ जनसंख्या विस्फोट के परिणाम स्वरूप समाज में जो परिवर्तन हुए उनके कारण आज निर्देशन की आवश्यकता और भी बढ़ गयी है और यह सत्य है कि जैसे−जैसे समाज की जटिलता बढ़ती जायेगी वैसे−वैसे निर्देशन की आवश्यकता बढ़ती जायेगी।
निर्देशन की आवश्यकता को निम्नलिखित तीन दृष्टिकोणों से प्रस्तुत कर सकते हैं−
1. सामाजिक आर्थिक दृष्टिकोण से आवश्यकता
2. मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से आवश्यकता
3. शैक्षिक दृष्टिकोण से आवश्यकता
1. सामाजिक आर्थिक दृष्टिकोण से निर्देशन की आवश्यकता−
औद्योगीकरण तथा नगरीकरण • संयुक्त परिवार प्रणाली का विघटन • पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव • परिवर्तित सामाजिक मूल्य • जनसंख्या वृद्धि • व्यवसायों की बहुलता
2. मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से निर्देशन की आवश्यकता−
वैयक्तिक भिन्नताओं को समझना • समायोजन • व्यक्तित्व का विकास • संवेगात्मक समस्याएँ
3. शैक्षिक दृष्टिकोण से निर्देशन की आवश्यकता−
पाठ्‌यक्रम का चयन • अपव्यय एवं अवरोधन रोकने के लिए • बढ़ती छात्र संख्या • अनुशासन हीनता की समस्या • विद्यालय में समायोजन की समस्या

परामर्श का अर्थ‚ उद्देश्य‚ प्रकार एवं आवश्यकता तथा क्षेत्र

परामर्श का अर्थ एवं परिभाषा− परामर्शदाता परामर्श चाहने वाले व्यक्ति की समस्या या कठिनाई को समझने का प्रयास करता है तथा उससे विचारों का आदान−प्रदान करके उसकी समस्या का समाधान करने में सहायता प्रदान करता है। इस प्रकार की सहायता परामर्श कहलाती है।
रोजर्स के अनुसार− ‘‘परामर्श किसी व्यक्ति के साथ लगातार प्रत्यक्ष सम्पर्क की वह कड़ी है जिसका उद्देश्य व्यक्ति को उसकी अभिवृत्तियों तथा व्यवहार में परिवर्तन लाने में सहायता प्रदान करना है।’’
मायर्स के अनुसार− ‘‘परामर्श का तात्पर्य दो व्यक्तियों के सम्पर्क से है‚ जिसमें एक को किसी प्रकार की दूसरे व्यक्ति द्वारा सहायता प्रदान की जाती है।’’
डॉ. सीताराम जायसवाल के अनुसार− ‘‘निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि परामर्श का मूल तत्त्व दो व्यक्तियों के बीच ऐसा सम्पर्क है‚ जिसमें एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को स्वयं को समझने में सहायता देता है।’’
परामर्श के उद्देश्य−
रूथ स्ट्रैंग के अनुसार− ‘‘परामर्श का उद्देश्य आत्मपरिचय या आत्मबोध है।’’
डन्समूर के अनुसार− ‘‘परामर्श का उद्देश्य छात्र को अपनी कठिनाइयों को हल करने की योजना बनाने में सहायता देना है।’’
राबर्ट्‌स के अनुसार− ‘‘परामर्श का उद्देश्य परामर्श लेने वाले को अपनी शैक्षिक‚ व्यावसायिक और वैयक्तिक समस्याओं को समझने में सहायता देना है।’’
जे.पी. अग्रवाल के अनुसार− ‘‘परामर्श का उद्देश्य है छात्र को अपनी विशिष्ट योग्यताओं और उचित दृष्टिकोणों का विकास करने में सहायता देना।’’
परामर्श के प्रकार−
1. नैदानिक परामर्श− नैदानिक परामर्श का सम्बन्ध व्यक्ति के सामान्य कार्य सम्बन्धी असमायोजनों से है। इसमें साधारण कार्य सम्बन्धी असायोजन का निदान व उपचार किया जाता है।
2. मनोवैज्ञानिक परामर्श− परामर्शदाता विभिन्न मनोवैज्ञानिक विधियों का प्रयोग कर परामर्श प्रार्थी की कठिनाइयों को समझने का प्रयास करता है और उसकी मानसिक समस्याओं का समाधान करने में सहायता करता है।
3. शैक्षिक परामर्श− शैक्षिक परामर्श छात्र को अपनी शिक्षा एवं अध्ययन में सफलता प्राप्त करने तथा पाठ्‌यक्रमों एवं विषयों का उचित चुनाव करने के लिए दिया जाता है।
4. सामाजिक परामर्श− इसका उद्देश्य परामर्श प्रार्थी को सामाजिक कुशलताओं का विकास करने में सहायता देना है।
5. व्यावसायिक परामर्श− व्यावसायिक परामर्श व्यक्ति की उन समस्याओं का समाधान करने में सहायता करता है‚ जो किसी व्यवसाय के चुनाव या उसके लिए तैयारी करते समय उसके सम्मुख आती है।
परामर्श की विधियाँ−
व्यक्तिगत परामर्श
• समूह परामर्श परामर्श की आवश्यकता एवं क्षेत्र−
छात्रों की वर्तमान समस्याओं को हल करने में सहायता देने के लिए
• विशेष योग्यताओं तथा उचित दृष्टिकोण को प्रोत्साहित एवं विकसित करने के लिए।
• छात्रों को अपने उत्तरदायित्व को समझने में सहायता देना
• शैक्षिक तथा व्यावसायिक चयन की योजना बनाने में छात्रों की सहायकता करने के लिए।
• छात्रों को सामाजिक और संवेगात्मक सामंजस्य स्थापित करने में सहायता करने के लिए।

परामर्श में सहयोग देने वाले विभाग/संस्थाएँ

मनोविज्ञानशाला उत्तर प्रदेश इलाहाबाद
मनोविज्ञानशाला उत्तर प्रदेश इलाहाबाद की स्थापना आचार्य नरेन्द्र देव समिति की संस्तुति के आधार पर लाउदर रोड‚ इलाहाबाद में सन्‌ 1947 में की गयी। वर्तमान में यह राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद उत्तर प्रदेश लखनऊ की ब्यूरो ऑफ साइकोलॉजी नामक इकाई के रूप में एक विशिष्ट संस्था है।
• मनोविज्ञानशाला उत्तर प्रदेश इलाहाबाद‚ संस्था का अध्यक्ष पदेन निदेशक कहलाता है। इसमें वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक के भी पद सृजित किये गये हैं।
• इस संस्था का मुख्य उद्देश्य है प्राथमिक एवं माध्यमिक स्तर के शिक्षकों को शिक्षण‚ निर्देशन एवं परामर्श प्रदान करने हेतु‚ मनोवैज्ञानिक रूप से सक्षम बनाने हेतु प्रशिक्षण देना तथा छात्रों को व्यावसायिक व वैयक्तिक निर्देशन प्रदान करना।
मनोविज्ञानशाला के प्रमुख कार्य−
1. निर्देशन− शैक्षिक निर्देशन • वैयक्तिक निर्देशन • बाल निर्देशन • व्यावसायिक निर्देशन
2. प्रशिक्षण− निर्देशन सेवाओं के लिए उपयुक्त मनोवैज्ञानिक तैयार हो सकें‚ इसके लिए मनोविज्ञानशाला में एक सत्रीय कोर्स का प्रशिक्षण दिया जाता है। इसे डिप्लोमा इन गाइडेन्स साइकोलॉजी कहा जाता है।
3. सेवाकालीन प्रशिक्षण
शिक्षा विभाग के अधिकारियों को इस संस्था द्वारा एक−एक सप्ताह का प्रशिक्षण दिया जाता है।
• समय−समय पर प्रदेश तथा अन्य प्रदेशों के विद्यायों‚ महाविद्यालयों‚ शिक्षण संस्थाओं के शिक्षकों‚ जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों के प्रशिक्षकों‚ प्रवक्ताओं आदि को मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण दिया जाता है।
4. चयन कार्य− मनोविज्ञानशाला राज्य सरकार एवं केन्द्र सरकार के विभिन्न विभागों के चयन आदि प्रक्रिया में आवश्यकतानुसार सहायता प्रदान करती है। जैसे− पुलिस विभाग‚ स्पोर्ट्‌स कॉलेज आदि।
5. राष्ट्रीय प्रतिभाखोज परीक्षा का आयोजन− यह संस्था राष्ट्रीय प्रतिभा खोज परीक्षा के आयोजन एवं संचालन में प्रादेशिक स्तर पर नोडल एजेन्सी के रूप में कार्य करती है।
6. शोध कार्य− मनोविज्ञानशाला मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के निर्माण अनुशीलन तथा मानकीकरण का कार्य करती है। जैसे थीमेटिक एपरसेप्शन परीक्षण (TAT) का भारतीय स्थिति में अनुकूलन किया गया है। कुछ विदेशी अशाब्दिक परीक्षणों के मानक तैयार किये गये हैं।
7. प्रकाशन कार्य− इस संस्था से ‘व्यावसायिक सूचना’‚ ‘आपका बालक’ जैसे त्रैमासिक समाचार पत्र प्रकाशित होते रहे हैं‚ एवं समय−समय पर मनोवैज्ञानिक समस्याओं से युक्त ‘बलाघात’‚ ‘उत्कर्ष’ आदि पुस्तकें भी प्रकाशित की जाती है। यहाँ से अनेक शोध एवं निष्कर्ष भी प्रकाशित किये जाते हैं।
8. अनुवर्ती कार्य− छात्रों को सामूहिक तथा वैयक्ति रूप से दिये गये निर्देशन का अनुवर्ती अध्ययन भी किया जाता है।
मण्डलीय मनोविज्ञान केन्द्र
मनोविज्ञानशाला उत्तर प्रदेश इलाहाबाद ने अपनी सेवाओं के विस्तार करने एवं उन्हें सर्वसुलभ बनाने हेतु मण्डल स्तर पर ‘मण्डलीय मनोविज्ञान केन्द्र की स्थापना की है। इसके प्रमुख कार्य निम्न हैं−
• यह मनोविज्ञानशाला उत्तर प्रदेश इलाहाबाद द्वारा किये जा रहे कार्यों की मण्डलीय स्तर पर सेवा प्रदान करता है।
• छात्रों को व्यवसाय चुनने में परामर्श देता है।
• विशेष आवश्कता वाले बच्चों को परामर्श देता है।
• छात्रों की मनोवैज्ञानिक समस्याओं के निवारण हेतु परामर्श देता है।
जिला चिकित्सालय
सम्पूर्ण प्रदेश भर में जिला चिकित्सालायों में मुख्य चिकित्साधिकारी के नेतृत्व में एक ‘विशेषज्ञ डाक्टरों की समिति’ होती है जो विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए विकलांगता आदि का परीक्षण करके सेवाओं में आरक्षण का लाभ प्रदान कराते हैं। यह विशेषज्ञ डॉक्टरों की समिति विशिष्ट आवश्यकता वाले बच्चों के लिए समुचित उपकरण जैसे− चश्मा आदि प्रदान करने की संस्तुति करती है एवं उन्हें तथा अन्य जनों को भी व्यावसायिक परामर्श देती है।
जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान में प्रशिक्षित डायट मेंटर
बालकों को परामर्श एवं निर्देशन प्रदान करने हेतु प्रत्येक जिले में ‘जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान में मनोविज्ञान विभाग होते हैं‚ जो छात्रों व शिक्षकों को मनोवैज्ञानिक परामर्श देने का कार्य करते हैं।
यद्यपि इस संस्था का मुख्य कार्य तो अध्यापकों को प्रशिक्षण देना है लेकिन यहाँ उन्हें शिक्षण हेतु मनोवैज्ञानिक विधियों का भी प्रशिक्षण दिया जाता है।
पर्यवेक्षण एवं निरीक्षण तंत्र
निर्देशन कार्यकर्ता के समूहों में यदि हम ध्यान से देखें तो ज्ञात होता है कि विद्यालय के सामाजिक कार्यकर्ता का स्थान अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। विद्यालय का सामाजिक कार्यकर्ता बालक के परिवार एवं विद्यालय के मध्य एक सेतु का कार्य करता है। जैसा कि हम जानते हैं कि बालक की समस्याओं के लिए उनका पारिवारिक एवं सामाजिक वातावरण‚ साथीगण एवं मित्रगण आदि सभी उत्तरदायी होते हैं। विद्यालय के परामर्शदाता को बालक के घर की स्थिति‚ माता− पिता का व्यवहार‚ उसके आस−पास के परिवेश के बारे में जानकारी देने का कार्य विद्यालय का सामाजिक कार्यकर्ता ही करता है।
बालकों के निर्देशन एवं परामर्श का कार्य एकमात्र विद्यालय के द्वारा ही नहीं सम्भव है बल्कि अन्य बहुत से अभिकरण इसमें अपेक्षित सहयोग प्रदान करते हैं। जैसे− चिकित्सक‚ मनोचिकित्सक एवं बालक से सम्बन्धित अन्य लोग।
समुदाय एवं विद्यालय की सहयोगी समितियाँ
विद्यालय में निर्देशक की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। छात्रों की प्रगति सम्बन्धी समस्याओं के समुचित निराकरण के लिए विद्यालय में परामर्श सेवा का विधान होना चाहिए। सामान्यत: विद्यालय परामर्श सेवा संगठन के तीन प्रारूप माने जाते हैं−
1. रेखा संगठन
2. कर्मचारी संगठन
3. रेखा कर्मचारी मिश्रित संगठन
1. रेखा संगठन− यह संगठन छोटे विद्यालयों के लिए उपयुक्त माना जाता है। इस संगठन में विद्यालय के अधीक्षक‚ प्रधानाचार्य‚ अध्यापकगण की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इस प्रकार के संगठन में अधिकार क्रम से कर्मचारियों में ऊपर से नीचे तक एक सीधा स्तरीकरण होता है। विद्यालय का अधीक्षक उत्तरदायित्व एवं अधिकार की दृष्टि से सबसे ऊपर इसके बाद प्रधानाचर्य‚ अध्यापक फिर छात्रों का क्रम आता है। छोटे विद्यालय के परामर्श संगठन में परामर्श समिति का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। यह विद्यालय के निर्देशन कार्यक्रम की योजना तैयार करने संगठित करने आदि का कार्य करती है।
2. कर्मचारी संगठन− इसमें मुख्य प्रशासकीय अधिकार कार्यक्षेत्रों के शीर्ष अधिकारी को सौंपे जाते हैं। इस संगठन से यह लाभ है कि प्रत्येक वर्ग के कर्मचारी अपने−अपने कार्यों में विशेष दक्षता प्राप्त कर लेते हैं। विशेषज्ञ यद्यपि प्रशासनिक अधिकारी के नियंत्रण में कार्य करते हैं किन्तु परामर्श व्यवस्था की प्रक्रिया एवं नीति निर्धारण में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।
3. रेखा कर्मचारी मिश्रित संगठन− बड़े आकार के विद्यालयों में रेखा कर्मचारी मिश्रित संगठन की आवश्यकता होती है।
यहाँ विद्यालय अधीक्षक को सलाह प्रदान करने के उद्देश्य से सहायक अधीक्षक होते हैं। ये सहायक अधीक्षक 4 हो सकते हैं−
1. प्रशासकीय शोधकार्य के लिए छात्रों को सेवायें देने वाले सहायक अधीक्षक
2. विशिष्ट सेवाओं के लिए सहायक अधीक्षक
3. अध्यापन सहायक अधीक्षक
4. विद्यालय के कर्मचारियों से सम्बन्धित सहायक अधीक्षक ये चारों ही सहायक अधीक्षक परस्पर सहयोगपूर्ण ढंग से कार्य करते हैं एवं विद्यालय अधीक्षक को परामर्श योजना सम्बन्धी सुझाव भेजते हैं। इस संगठन में उपर्युक्त दोनों रेखा एवं कर्मचारी संगठन पद्धति के लाभ विद्यमान रहते हैं।
रेखा के क्रम से स्वास्थ्य निदेशक के अधीन चिकित्सक‚ मनोचिकित्सक एवं नर्सों की सेवाएँ आती हैं। छात्रों के लिए आवश्यक सेवा कर्मचारियों में मनोवैज्ञानिक‚ सामाजिक कार्यकर्ता अथवा समाज सेवक‚ उपस्थिति अधिकारी तथा विद्यालय दर्शन के लिए आये हुए अध्यापक सम्मिलित होते हैं। ये सभी लोग कर्मचारी सेवाओं के सहायक अधीक्षक के अंतर्गत कार्य करते हैं।
प्रधानाध्यापकों के अधीन अध्यापक गण‚ निर्देशन विशेषज्ञ आते हैं।
इसी प्रकार अन्य कर्मचारी परस्पर मिल−जुलकर कार्य करते हैं‚ अधिकार एवं कर्तव्य की दृष्टि से किसी भी स्थान उच्च या निम्न नहीं होता है।
सरकारी एवं गैर सरकारी संगठन
वर्ष 1972 में उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा अधिनियम के अस्तित्व में आने के बाद प्राथमिक विद्यालयों को स्थानीय निकायों के अधीन रखा गया। उत्तर प्रदेश शासन द्वारा संविधान के 73वें संशोधन की मूल भावना को दृष्टिगत रखते हुए 1 जुलाई 1999 को ग्राम पंचायतों को प्राथमिक विद्यालयों‚ अनौपचारिक शिक्षा तथा प्रौढ़ शिक्षा के कार्य स्थानान्तरित करने का निर्णय लिया गया। पंचायत राज अधिनियम के अंतर्गत ‘ग्राम शिक्षा समिति’ को प्रभावी बनाया गया। इसके माध्यम से सामुदायिक सहभागिता सहयोग तथा समन्वय पर बल प्रदान किया गया।
प्रारम्भिक शिक्षा में पंचायतों तथा स्थानीय निकायों की भूमिका− राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में शिक्षा के प्रबन्ध के संदर्भ में आम जनता को सम्मिलित करने की पहल को महत्ता दी गयी। इसमें गैर सरकारी संगठनों का सहयोग एवं स्वैच्छिक प्रयास भी सम्मिलित है।
लोगों की भागीदारी का अर्थ है− सभी स्तरों पर शैक्षिक प्रक्रियाओं के साथ गैर सरकारी संगठनों तथा स्वैच्छिक संगठनों से भी अधिक माता−पिता‚ विकासात्मक एजेन्सियों‚ नियोक्ताओं‚ व्यावसायिक रूप से सक्षम शिक्षकों तथा वित्त व्यवस्था करने वाले निकायों के प्रतिनिधियों को सम्मिलित करना।
प्रारम्भिक शिक्षा में पंचायतों तथा स्थानीय निकायों को शामिल करने के लाभ− लोगों की सहभागिता शैक्षिक संस्थाओं तथा समुदाय के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित करने‚ शिक्षा की उपयोगिता तथा कोटि में सुधार करने‚ अनुपस्थिति एवं कर्तव्यहीनता को कम करने‚ समुदाय की संसाधनों तक अधिक पहुँच तथा शैक्षिक संस्थाओं के प्रबन्ध को बेहतर ढंग से अनुशासित करने की ओर ले जायेगी। साथ ही इससे शैक्षिक संस्थाओं में स्थानीय राजनीति तथा सत्ता के दखल को भी दूर रखा जा सकेगा।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार प्रारम्भिक शिक्षा के प्रबन्ध में निम्नलिखित पर बल प्रदान किया जायेगा−
1. जिला शिक्षा बोर्डों‚ जिला शिक्षा तथा प्रशिक्षण संस्थानों की स्थापना
2. प्रबन्ध का विकेन्द्रीकरण
3. स्वायत्तता की व्यवस्था
4. संस्थाओं‚ पद्धतियों तथा शिक्षकों का दायित्व निश्चित करना राष्ट्रीय शिक्षा नीति एवं कार्ययोजना 1992 में सभी स्तरों पर शिक्षा की आयोजना तथा प्रबन्ध के विकेन्द्रीकरण और इस प्रक्रिया में जनसहभागिता के महत्त्व पर बल प्रदान किया गया है। विकेन्द्रीकरण का अभिप्राय है− जिला‚ उपजिला तथा पंचायत स्तरों पर निर्णय लेने में लोगो के चुने हुए प्रतिनिधियों की लोकतांत्रिक सहभागिता।
पंचायती राज सम्बन्धी 1991 के संविधान संशोधन विधेयक में जिला उपजिला और पंचायत स्तरों पर लोकतांत्रिक विधि से चुने गये निकाय स्थापित करने की परिकल्पना की गयी। संविधान की 11वीं अनुसूची में अन्य बातों के साथ−साथ पंचायती राज निकायों को अधोलिखित दायित्व सौंपने का प्रावधान है− प्राथमिक तथा माध्यमिक स्कूलों सहित शिक्षा तकनीकी प्रशिक्षण‚ व्यावसायिक शिक्षा‚ प्रौढ़ शिक्षा‚ गैर औपचारिक शिक्षा‚ पुस्तकालय तथा सांस्कृतिक क्रियाकलाप।
जिला स्तर के निकाय− इस विधान के अन्तर्गत एक ऐसा जिला स्तर का निकाय गठित किया जाए जो अनौपचारिक तथा प्रौढ़ शिक्षा और उच्चतर माध्यमिक स्तर तक स्कूली शिक्षा सहित सभी शैक्षिक कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के लिए जिम्मेदार हो। इस निकाय में निम्नलिखित को प्रतिनिधित्व प्राप्त हो− (1) शिक्षाविदों (2)
महिलाओं (3) युवकों के प्रतिनिधि (4) अभिभावकों के प्रतिनिधि (5)
अनुसूचित जातियों/जनजातियों के प्रतिनिधि (6) अल्पसंख्यकों (7)
जिले की उपयुक्त संस्थाओं के प्रतिनिधि।
इस निकाय में शहरी क्षेत्रों तथा छावनियों में कार्य कर रही लोकतांत्रिक संस्थाओं (नगर परिषद्‌ तथा छावनी बोर्डों) के प्रतिनिधि होने चाहिए। उक्त जिला निकाय को आयोजन तथा प्रबन्ध की जिम्मेदारी सौंपी जाये। यह निकाय जिला स्तर पर विभिन्न शैक्षिक कार्यक्रमों के कार्यान्वयन का प्रशिक्षण तथा निरीक्षण करेगा।
‘जिला निकाय’ जिला स्तर पर प्रारम्भिक शिक्षा‚ अनौपचारिक शिक्षा तथा प्रौढ़ शिक्षा के सभी कार्यक्रमों में पर्याप्त पाठ्‌यचर्या एवं शैक्षिक निवेशों के लिए जिला शिक्षा तथा प्रशिक्षण संस्थान तथा अन्य संस्थाओं की विशेषज्ञता प्राप्त करेगा।
प्रारम्भिक शिक्षा में राज्य सरकारों की भूमिका− राष्ट्रीय शिक्षा नीति कार्ययोजना‚ 1986 के अनुसार राज्य सरकारें मानव संसाधन विकास से सम्बन्धित सभी कार्यकलापों के समेकन के लिए एक कार्य ढाँचा तैयार करने के सम्बन्ध में विचार करेंगी। यह समेकन राज्य शिक्षा सलाहकार बोर्ड के माध्यम से किया जायेगा। राज्य सरकारें केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड की रूपरेखा के अनुसार इस बोर्ड की स्थापना करेंगी। इसमें सुविख्यात शिक्षाविदों तथा विशेषज्ञों के अलावा संस्थागत तथा संगठनात्मक प्रतिनिधि होंगे। इसमें समाज के कमजोर वर्ग− विशेष रूप से महिलाएँ‚ अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति तथ अल्पसंख्यकों को भी प्रतिनिधित्व प्रदान किया जायेगा।
यह बोर्ड सभी मानव संसाधन विकास कार्यक्रमों को समन्वित करने वाले एक प्रमुख निकाय के रूप में कार्य करेगा।
प्राथमिक तथा उच्च शिक्षा को उन्नत बनाने के लिये केन्द्रीय सरकार ने राज्यीय शिक्षा संस्था स्थापित करने की योजना प्रस्तावित की। केन्द्र सरकार ने इस योजना को 1963−64 में प्रस्तावित किया था। प्राय: सभी राज्यों तथा संघशासित प्रदेशों में इस योजना के अनुसार राज्य शिक्षा संस्थान स्थापित हो चुके हैं। विद्यालय शिक्षकों‚ प्रधानाध्यापकों एवं इसके अतिरिक्ति विशिष्ट शैक्षिक कार्यक्रमों से सम्बद्ध उपर्युक्त रैंक के जिला स्तर के अधिकारी व प्रमुख शिक्षा अधिकारी‚ शिक्षा निकाय का मुख्य शिक्षा अधिकारी होगा।
ग्राम शिक्षा समिति
संविधान संशोधन विधेयक के अन्तर्गत किसी ग्राम या ग्रामों के समूह के लिए पंचायतें बनाई जायेंगी। इस पंचायत में चुने हुए प्रतिनिधि होंगे। इसके अतिरिक्त प्रत्येक पंचायत एक ग्राम शिक्षा समिति गठित कर सकती है जो ग्राम स्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में निर्धारित कार्यक्रमों के प्रशासन के लिए जिम्मेदार होगी। इन ग्राम शिक्षा समितियों का मुख्य उत्तरदायित्व व्यवस्थित रूप से घर−घर सर्वेक्षण करके और अभिभावकों के साथ समय−समय पर विचार− विमर्श करके गाँव में सूक्ष्म स्तर की योजना तैयार करना है एवं विद्यालय मानचित्रण भी करना है। कार्ययोजना 1992 के अनुसार राज्य सरकारें ग्राम शिक्षा समिति को निम्नलिखित कार्य सौपने पर विचार करें−
• ग्राम समुदाय के बीच जागरूकता बढ़ाना तथा उसे पोषित करना‚ जिसके साथ यह सुनिश्चित किया जा सके कि इसमें सभी वर्गों के लोग सम्मिलित होंगे।
• स्कूलों और केन्द्रों के कारगर तथा नियमित कार्यों का निरीक्षण एवं प्रबन्धन करने के लिए शिक्षक अनुदेशन तथा समुदाय की सहभागिता को बढ़ावा देना विभिन्न राज्यों में ग्राम शिक्षा समितियों की स्थापना की जा चुकी है। ये समितियाँ समुदाय तथा प्रारम्भिक शिक्षा प्रणाली के बीच मिलन बिन्दु की (Inerface) भूमिका निभाती हैं। ये समितियाँ मुख्यत: निम्नलिखित कार्य करती हैं−
• समुदाय को गतिशील बनाना
• अभिभावकों को प्रेरित करना कि वे अपने बच्चों को नियमित विद्यालय भेंजे।
• प्रारम्भिक बाल देख−भाल तथा शिक्षा के प्रबन्धन में सहायता प्रदान करना।
• वैकल्पिक केन्द्रों को स्थापित करना।
• ‘ग्राम निर्माण समिति’ बनाना जो विद्यालय भवन तथा कक्षा−कक्षों के निर्माण तथा उसके निरीक्षण करने का कार्य करें। यह समिति ‘ग्राम शिक्षा समिति’ की देख−रेख में श्रमिकों‚ निर्माण सामग्री आदि की व्यवस्था करती है।
इसके साथ ही निर्माण कार्य का निरीक्षण भी करती है।
• विद्यालय के लिए दान प्राप्त करना।
• ग्राम के शैक्षिक कार्यक्रमों का आयोजन करना।
• घर−घर सर्वेक्षण के माध्यम से सूक्ष्म आयोजन तैयार करना।
• नामांकन धारण तथा शाला त्याग की दर में कमी लाने के लिए कार्य करना।
• शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए विद्यालय की सुविधाओं को उन्नत बनाना।
प्रारम्भिक शिक्षा में गैर सरकारी संगठनों की भूमिका
राष्ट्री य शिक्षा नीति‚ कार्य योजना 1986 के अनुसार अनौपचारिक शिक्षा‚ शिशु देखभाल‚ प्रौढ़ शिक्षा‚ विशिष्ट आवश्यकता वाले बच्चों की शिक्षा सहित प्रारम्भिक शिक्षा जैसे कार्यक्रमों के सफल कार्यान्वयन के लिए सबसे निचले स्तरों पर शिक्षा के कार्यक्रमों में जनता की सहभागिता तथा सहयोग अपेक्षित है। इसी प्रकार स्वैच्छिक संगठनों तथा सक्रिय सामाजिक कार्यकर्त्ताओं का सहयोग भी व्यापक रूप से अपेक्षित है। सरकार और स्वैच्छिक एजेंसियों के बीच वास्तविक भागीदारी के सम्बन्ध में सुनिश्चित कदम उठायेगी। इसके साथ ही समय−समय पर उनसे आवश्यकतानुसार परामर्श भी प्राप्त किया जायेगा। कार्यक्रम के क्रियान्वयन में सहभागिता करने के लिए उन्हें अपेक्षित सुविधाएँ दी जायेंगी। 1990 से 1993 तक राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों में गैर सरकारी संगठनों द्वारा 9485 से अधिक अनौपचारिक शिक्षा केन्द्र संचालित किये जा रहे थे। गैर सरकारी संगठन प्रारम्भिक शिक्षा कार्यक्रमों के संचालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं। निजी स्कूलों ने अपने प्रयासों से विद्यार्थियों की एक अच्छी संख्या को आकृष्ट कर रखा है।
सरकार की नीतियों एवं कार्यक्रमों के सफल संचालन से साक्षरता की स्थिति में पर्याप्त सुधार हुआ है। आज आवश्यकता इस बात की भी है कि हमें स्वयं व्यक्तिगत स्तर पर जागरुक होना होगा एवं अपने कर्त्तव्यों का ईमानदारी पूर्वक निर्वाह करना होगा। तभी शिक्षा का समुचित रूप से विकास हो सकेगा एवं सरकार के प्रयासों का वास्तविक प्रतिरूप दिखाई देगा। सरकार ने शिक्षा के विकास के लिए जो मानक तय किये हैं हमें उन पर खरा उतरना होगा तभी शिक्षा समुचित रूप से जन−जन तक पहुँच पायेगी। प्रबुद्ध जनों ने देश के विकास के लिए जो स्वप्न देखें हैं वे तभी साकार हो पायेंगे।

बाल−अधिगम में निर्देशन एवं परामर्श का महत्व

बच्चे क्या पढ़ें अथवा बालकों के लिए उनकी क्षमता‚ प्रवृत्ति‚ संसाधन को दृष्टिगत रखते हुए क्या अधिगम करें− यह सुझाना बाल अधिगम कहलाता है। किसी समस्या या क्रिया का अधिगम तब किया जा सकता है जब उस समस्या के सम्बन्ध में जागरूक हो। किसी समस्या के अधिगम के लिए यह आवश्यक है कि अधिगमकर्ता के स्नायु इतने विकसित और परिपक्व हों कि वह समस्या का अधिगम कर सके। बाल शिक्षुओं के स्नायु और मस्तिष्क इतने परिपक्व नहीं होते हैं कि किसी समस्या का सरल विधि द्वारा अधिगम कर सकें।
बाल शिशुओं में जागरूकता नहीं के बराबर पायी जाती है। कुछ अध्ययनों के द्वारा यह स्पष्ट हुआ है कि यद्यपि बाल अधिगम बहुत कठिन है‚ परन्तु फिर भी सहज एवं सरल परिस्थितियों में बाल शिशुओं को अधिगम कराया जा सकता है।
शिक्षा के उपक्रम का उद्देश्य बच्चों को अधिगम कराना (सीखना) है। सिखाने की इस प्रक्रिया को शिक्षण‚ अनुदेशन‚ निर्देशन‚ परामर्श आदि क्रिया−कलापों से पूरा किया जाता है। बालकों को पर्याप्त व शीर्घ अधिगम करने के लिए बच्चों को दिया जाने वाला अनुदेशन निर्देशन परामर्श कहलाता है।
निर्देशन एवं परामर्श का महत्त्व-
शैक्षिक (अधिगम) के महत्त्व को बताते हुए विभिन्न विद्वानों ने अपना मत अग्र प्रकार से प्रकट किया है−
ब्रेबर के अनुसार− ‘‘शैक्षिक निर्देशन चेतनामिभूत प्रयत्न है‚ जिनके द्वारा व्यक्ति के बौद्धिक विकास में सहायता प्रदान की जाती है। कोई भी चीज जो शिक्षण या सीखने के साथ की जाती है। शैक्षिक निर्देशन के अंतर्गत आती है।’’
रूथ स्ट्रैंग के अनुसार− ‘‘व्यक्ति को शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने का उद्देश्य छात्र को उपयोगी कार्यक्रम को चुनने तथा उसमें प्रगति करने में सहायता देना है।’’ बाल अधिगम में परामर्श−निर्देशन का क्षेत्र तथा आवश्यकता बालक− बालिकाओं को उचित मार्गदर्शन‚ परामर्श करना ही महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है। शैक्षिक निर्देशन एवं परामर्श निम्नलिखित दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं−
• भावी शिक्षा कार्यक्रम के चयन में।
• अधिगम हेतु पाठ्‌य विषयों का चयन में
• विद्यालय में समायोजन करने हेतु।
• अधिगम प्रक्रिया में वांछित प्रगति करने हेतु।
• रोजगार के अवसर हेतु शिक्षण करने हेतु।
• अपव्यय व अवरोधन को रोकने हेतु।
• अधिगम में निर्मित ‘सीखने का पठार’ के न बनने देने तथा यदि बन गया है तो उसे समाप्त करने हेतु परामर्श तथा निदेशन किया जाता है।
• अधिगम को स्थायी व व्यावहारिक स्वरूप (बोध स्तर) प्रदान करने हेतु।
• अधिगम करने की विधियाँ अपनाने हेतु परामर्श दिया जाता है।
• अधिगम में मन न लगने पर परामर्श व निर्देशन की व्यवस्था की जाती है।
बाल अधिगम में परामर्श के पात्र− बाल अधिगम में कई तत्व काम करते हैं जैसे− बालक स्वयं‚ शिक्षक‚ पाठ्‌यक्रम वातावरण व अभिभावक या पारिवारिक आर्थिक स्थिति। बाल अधिगम को श्रेष्ठ स्थायी बनाने के लिए इसमें निम्नलिखित को भी परामर्श दिया जाता है−
• शिक्षकों को • अभिभावकों को • बच्चों को बाल अधिगम को स्थाई बनाने हेतु
उपर्युक्त लोगों को भी परामर्श दिया जाता है ताकि वे बाल अधिगम में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर सकें। निर्देशन व परामर्श बाल अधिगम को स्थायी व सुगम बनाता है।

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