9 Hindi Chapter 3 के विव्रळम सिंह कल्लू कुम्हार की उनाकोटी

Chapter Notes and Summary
‘कल्लू कुम्हार की उनाकोटी’ एक यात्रा वृत्तांत है। लेखक त्रिपुरा की यात्रा पर जाता है‚ एक टी वी कार्यक्रम की शूटिंग करने। यहाँ वह विभिन्न स्थितियों से अवगत होता है। यहाँ के रीति-रिवाज‚ मान्यताएँ‚ आधुनिक कृषि परंपरा‚ घरेलू उद्योग-धंधों जैसी अनेक सांस्कृतिक विशेषताओं से रू-ब-रू होता है।
इस पाठ में लेखक ने पहले अपने बारे में बताया है कि किस तरह वह सामान्य व्यक्तियों से अलग है‚ जो सुबह-सुबह लोधी गार्डन में सैर को जाते हैं अथवा चाय के साथ सुबह-सुबह अखबार की चुस्कियाँ लेते हैं। जाड़े की सुबह एक धमाके की आवाज के साथ लेखक की आँख खुलती है। उसे लगा कि कहीं क्या फूटा। खिड़की से बाहर झाँका तो पाया कि बादल बिखरे हुए सैनिकों की तरह एक-दूसरे से टकरा रहे थे अर्थात् बारिश की पूरी संभावना थी। इस गर्जन-तर्जन ने लेखक को तीन साल पहले उनाकोटी की एक शाम की स्मृति में पहुँचा दिया।
लेखक दिसंबर 1999 में ‘ऑन द रोड‘ शीर्षक से तीन खंडों वाली एक टी वी शृंखला बनाने के सिलसिले में त्रिपुरा की राजधानी अगरतला गया था। दरअसल यह यात्रा राष्ट्रीय राजमार्ग-44 के माध्यम से त्रिपुरा की विकास संबंधी गतिविधियों की जानकारी के लिए थी। लेखक ने बताया कि त्रिपुरा की सीमा तीन तरफ से बांग्लादेश से तथा उत्तर-पूर्वी सीमा मिजोरम से जुड़ी है। सोनमुरा‚ वेलोनिया‚ सबरूम और कैलास शहर बांग्लादेश की सीमा से जुड़े हुए होने के कारण बांग्लादेश से लोगों की अवैध आवाजाही है। इस कारण से वहाँ की जनसंख्या में भारी इजाफा हुआ है। स्थानीय आदिवासियों में इस बात का असंतोष भी है। लेखक ने शूटिंग के बहाने त्रिपुरा के उज्जयंत महल के इतिहास पर भी निगाह डाली है।
लेखक के अनुसार त्रिपुरा में बहुधार्मिक समाज होने के कारण‚ अलग-अलग धर्मों एवं विचारों की झलक दिखाई देती है। अगरतला के टीलियामुरा कस्बे में ही
लेखक की मुलाकात स्थानीय कोक बारोक बोली के प्रसिद्ध लोक गायक एवं संगीत नाटक अकादमी द्वारा पुरस्कृत हेमंत कुमार जमातिया से हुई। वहाँ के संगीत से प्रभावित लेखक को अचानक प्रसिद्ध संगीतकार एस डी बर्मन की याद आ गई‚ जो त्रिपुरा के राजपरिवार से संबंधित थे। यहीं पर एक और गायिका मंजु ऋषिदास भी हुई हैं। अपनी शूटिंग के दौरान लेखक को त्रिपुरा में सशस्त्र क्रांति के दो-चार उदाहरण भी दिखे‚ जिससे लेखक के मन में डर सा बैठ गया। सी आर पी एफ के सुरक्षा काफिले के साथ चलते हुए लेखक को त्रिपुरा की प्रमुख नदी मनु का विहंगम सौंदर्य दिखा। इसी दौरान लेखक ने जाना कि त्रिपुरा में अगरबत्तियों के लिए बाँस की पतली सींकें तैयार की जाती हैं।
उत्तरी त्रिपुरा जिले के जिलाधिकारी से लेखक को त्रिपुरा की कृषि व्यवस्था की जानकारी मिली और साथ ही उनाकोटी में शूटिंग करने का आग्रह भी। उनाकोटी का नाम आते ही लेखक जिज्ञासा से भर उठता है। लेखक को पता चला कि उनाकोटी सबसे बड़े शैव तीर्थों में से एक है। दंतकथा के अनुसार उनाकोटी में शिव की एक कोटि (एक करोड़) से एक कम मूर्तियाँ हैं। यह इलाका दस वर्ग किलोमीटर से ज्यादा क्षेत्र में फैला हुआ है। यहाँ पहाड़ों को अंदर से काटकर विशाल आधार में मूर्तियाँ बनाई गई हैं। यहीं लेखक को कल्लू कुम्हार की अद्भुत शक्ति का पूर्ण परिचय मिलता है‚ जो लेखक के मन में गहरा प्रभाव छोड़ जाता है।

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