9 Hindi Chapter 2 श्रीराम शर्मा स्मृति

Chapter Notes and Summary
‘स्मृति’ एक ऐसी बाल्यावस्था की घटना पर आधारित है‚ जो पाठकों को बरबस ही अपने बचपन की स्मृतियों तक पहुँचा कर उनमें रोमांच पैदा कर देती है। इस पाठ में लेखक ने यह बताया है कि बच्चों की जिज्ञासा एवं उनका क्रियाकलाप किन जोखिमों तक पहुँचा सकता है। ऐसी ही एक घटना का सजीव चित्रण इस पाठ में लेखक ने किया है।
लेखक जब ग्यारह साल का था‚ तभी उसके साथ यह घटना घटी थी। बात कुछ यूँ थी कि कड़ाके की सर्दी का समय था और शाम के साढ़े तीन या चार बजे के आस-पास लेखक अपने साथियों के साथ झरबेरी से बेर तोड़कर खा रहा था। तभी एक आदमी ने आवाज लगाते हुए कहा कि तुम्हारे भाई बुला रहे हैं। लेखक अपने भाई से बहुत डरता था‚ उस पर गलती यह कि शाम के चार बजे तक भी वह घर पर नहीं था। लेखक को इसी बात का डर था कि कहीं भाई उसकी पिटाई न कर दे।
पर घर पहुँचते ही जब भाई ने पत्रों को पकड़ा कर यह कहा कि इन्हें मक्खनपुर डाकखाने में डाल आओ ताकि शाम की डाक से ही चिट्ठियाँ निकल जाएँ‚ तब लेखक की जान-में-जान आई।
लेखक और उसका छोटा भाई अपना-अपना डंडा लेकर‚ धोती में भुनाने के लिए थोड़े चने लिए और चिट्ठियों को लिए चल पड़े। दोनों भाई तेजी से चलने लगे।
उछलते-कूदते वे गाँव के उस कुएँ के पास पहुँच गए जिसमें एक काला साँप गिर गया था। कुआँ कच्चा था और चौबीस हाथ गहरा था। उसमें पानी का नामोनिशान न था। बच्चे चूँकि नटखट होते ही हैं इसलिए मक्खनपुर पढ़ने जाने वाली लेखक की पूरी टोली‚ केवल जिज्ञासावश उस कुएँ में पत्थर फेंकते ताकि उसकी प्रतिध्वनि सुनाई पड़ सके। इसी जिज्ञासावश जब लेखक ने पहला ढेला फेंका‚ तो उसमें से साँप के फुसकार जैसी आवाज आने लगी। झाँककर देखा तो उसमें काला साँप गिरा
नजर आया। तब से प्रतिदिन साँप की क्रोधपूर्ण फुफकार सुनने के लिए ही हम उसमें ढेला फेंका करते।
इस स्मृति को याद करते हुए लेखक की दुबारा इच्छा हुई कि वह आज भी एक ढेला डालता हुआ चले और उसने वैसा ही किया‚ पर जैसे ही झाँककर देखा‚ तो हक्का-बक्का रह गया। उसे समझ ही नहीं आया क्या किया जाए और इसी चक्कर में उसकी टोपी से सारी चिट्ठियाँ कुएँ में गिरती चली गईं और वह साँप को खुली आँखों से देखता रहा। उसको कुछ समझ न आया कि वह क्या करे? एक तरफ भाई की डाँट व पिटाई थी तो दूसरी तरफ जिम्मेदारी का बोझ। उसने चिट्ठियों को निकालने का निर्णय किया और जैसे-तैसे धोती को रस्सी की तरह बाँधकर कुएँ में घुस गया।
कुएँ के बीचो-बीच लटका लेखक साँप को एक प्रतिद्वंद्वी की तरह देखता है फिर उसका ध्यान बँटाने के लिए कभी पैर से मिट्टी गिराता है‚ तो कभी डंडे से दूसरी तरफ फटकारता‚ तो कभी डंडा साँप की पूँछ पर ही पड़ गया। लेखक के हाथ से डंडा छूट गया और चीख ही निकल पड़ी‚ जिससे छोटे भाई को लगा कि वह साँप द्वारा डस लिया गया है। पर अंतत: लेखक जैसे-तैसे साँप को चकमा देकर चिट्ठियाँ निकालने में सफल हो जाता है।
तत्पश्चात् लेखक केवल अपने हाथों के सहारे 36 फुट ऊपर चढ़कर बाहर निकल जाता है। बाहर आकर यह निर्णय लिया जाता है‚ कि कुएँ वाली घटना किसी को भी नहीं बताएँगे। लेखक ने यह बात सन् 1915 में मैट्रीकुलेशन पास करने के उपरांत ही अपनी माँ को बताई और माँ ने उसे प्यार से गोद में एक नन्हीं चिड़ियाँ की भाँति छुपा लिया। इस तरह लेखक का डंडे से किया यह शिकार रोचकपूर्ण होने के साथ-साथ काफी भयानक था‚ जो उसके स्मृति-पटल पर अंकित था।

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