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9 शिक्षण-सहायक सामग्री (Language Hindi & Pedagogy CTET & TET Exams)

9 शिक्षण-सहायक सामग्री

शिक्षण-सहायक सामग्री
शिक्षण के उद्देश्यों की पूर्ति के साथ-साथ उसे प्रभावी और सफल बनाने के लिए जिन सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है, उसे शिक्षण-अधिगम सहायक सामग्री कहते हैं। इसके द्वारा विषय को समझने में आसानी होती है। कुछ विद्वानों ने इस विषय पर अपने विचार इस प्रकार प्रकट किए हैं:
एलविन स्ट्राँग के अनुसार: ‘‘सहायक सामग्री के अंतर्गत उन सभी सामग्री को सम्मिलित किया जाता है। जिसकी सहायता से छात्रों की पाठ में रुचि बनी रहती है तथा वे उसे सरलतापूर्वक समझते हुए अधिगम के उद्देश्य को प्राप्त कर लेते हैं।’’
डेण्ड के अनुसार: ‘‘सहायक सामग्री वह सामग्री है, जो कक्षा में या अन्य शिक्षण परिस्थितियों में लिखित या बोली गई पाठ्य सामग्री को समझने में सहायता प्रदान करती है।’’ इन विचारों के आधार पर कहा जा सकता है कि शिक्षण सहायक सामग्री वह सामग्री है, जिनके द्वारा अध्ययन या अध्यापन को सरल तथा प्रभावशाली बनाया जाता है।
शिक्षण-अधिगम सहायक सामग्री तथा उसके प्रकार
चित्र: शिक्षण-अधिगम सहायक सामग्री श्रव्य सामग्री: जिन सामग्रियों के प्रयोग से सुनकर ज्ञान प्राप्ति में सहायता मिले, उन्हें श्रव्य सामग्री कहते हैं। दूसरे शब्दों में कहे, तो सुनकर ज्ञान को प्राप्त करने में सहायक सामग्री को श्रव्य सामग्री कहते हैं। टेप रिकॉर्डर, रेडियो, रिकॉर्ड प्लेयर, टेलीफोन इत्यादि का प्रयोग भाषा शिक्षण को प्रभावी बनाने के लिए किया जाता है।
दृश्य सामग्री: शिक्षण प्रक्रिया में प्रयोग में लायी जाने वाली दृश्य सामग्री देखकर ज्ञान प्राप्त करने में सहायता मिलती है। प्रारम्भिक स्तर पर विद्यार्थियों को चित्रों के माध्यम से शिक्षा देना प्रभावकारी माना जाता है। इन्हें देखकर विद्यार्थी विषय को आसानी से समझ जाते हैं। श्यामपट्ट, फ्लैश-कार्ड, रेखाचित्र, चार्ट, के प्रयोग से शिक्षक भाषा की कक्षा को रुचिकर एवं प्रभावी बनाता है।
दृश्य-श्रव्य साधन: मनोविज्ञान का मानना है कि शिक्षण प्रक्रिया में विद्यार्थी यदि शिक्षण के दौरान एक से ज्यादा इन्द्रियों का प्रयोग एक साथ करे, तो शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया प्रभावी होती है। इसी बात को ध्यान में रखकर भाषा शिक्षण में दृश्य-श्रव्य सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है।
शिक्षण-अधिगम सहायक सामग्री
श्रव्य सामग्री (टेपरिकॉर्डर, रेडियो, टेलीफोन इत्यादि)
दृश्य सामग्री (नक्शा,फ्लैशकॉर्ड,चार्ट इत्यादि)
श्रव्य-दृश्य सामग्री (टीवी, चलचित्र, सी.डीइत्य ादि)
टेलीविज़न: टेलीविज़न दृश्य-श्रव्य सामग्री के अंतर्गत आने वाला प्रभावशाली साधन है, जिसके द्वारा भाषा शिक्षण में देखने और सुनने का कार्य एक साथ संभव हो पाता है। टेलीविज़न पर प्रसारित कार्यक्रमों के माध्यम से विद्यार्थी स्वत: ही भाषा के कई रूपों को बिना सिखाये ही सीख लेता है; जैसे- फिल्मों के गीतों को सुनकर, वह उन्हें याद कर लेता है। इस बात को ध्यान में रखकर दूरदर्शन पर कई कार्यक्रम प्रसारित किये जाते हैं, जो विद्यार्थी को रूचि के साथ सीखने में सहायता प्रदान करते है।
फिल्म: फिल्म मनोरंजन का अच्छा साधन है। यह न सिर्फ मनोरंजन अपितु ज्ञान के विकास में भी सहायक है। फिल्मों के माध्यम से बच्चों की कल्पनाशक्ति का विकास होता है। कुछ फिल्में कहानी तथा उपन्यास के आधार पर भी बनाई जाती हैं। कुछ ज्ञानवर्धक फिल्में इस प्रकार हैं- एडिसन एंड लियो, तारें जमीं पर, आई एम कलाम, स्टेनली का डब्बा, ग्रैविटी, नन्हें जैसलमेर, बम-बम बोले, पाठशाला इत्यादि।
रेडियो: रेडियो श्रव्य सामग्री का एक प्रकार है। दूरदर्शन की भाँति रेडियो पर भी ज्ञानवर्धक कार्यक्रम प्रसारित होते हैं परंतु टीवी तथा स्मार्टफोन के आने से इनका प्रयोग कम होने लगा है।
ग्रामोफोन तथा लिंग्वाफोन: ग्रामोफोन तथा लिंग्वाफोन श्रव्य सामग्री है। ग्रामोफोन के द्वारा रिकॉर्डिग की जाती है। इसके माध्यम से उच्चारण सम्बन्धी दोष को दूर किया जा सकता है।
टेप-रिकॉर्डर: भाषा-शिक्षण में टेप-रिकॉर्डर एक आवश्यक सामग्री है। इसके माध्यम से महत्त्वपूर्ण जानकारी, भाषण, कविता, कहानी इत्यादि को सुनकर अभ्यास किया जा सकता है। यह दृष्टिहीन विद्यार्थियों के अध्ययन में अति महत्त्वपूर्ण हैं।
हिंदी शिक्षण में पाठ्यपुस्तक
पाठ्यपुस्तक: पाठ्यक्रम के अनुसार शैक्षिक उद्देश्यों को ध्यान में रखकर पाठ्यपुस्तकों का निर्माण होता है। पाठ्यपुस्तकें शिक्षक तथा छात्र दोनों के ज्ञान का स्त्रोत होती है। यह शिक्षण को एक व्यस्थित रूप देने का काम करती है। पाठ्य-पुस्तक स्वाध्ययन का सर्वोत्तम साधन होती है। पुस्तक लेखन का कार्य सदियों से चला आ रहा है।
► पाठ्यक्रम को व्यस्थित और सुचारू रूप से चलाने में पाठ्यपुस्तक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
► विषय सम्बन्धित सारी पठन सामग्री का एक जगह संयोजन होने के कारण यह शिक्षक तथा छात्रों के लिए सहायक सिद्ध होती है।
► भाषा कौशलों के विकास में पाठ्यपुस्तक सहायक होती है।
► स्वाध्ययन का सर्वोत्तम साधन पाठ्यपुस्तक को माना गया है।
► छात्रों की रुचि के विकास में पाठ्यपुस्तक सहायक होती है।
► पाठ्यपुस्तकों में आने वाली कहानियाँ छात्रों का मनोरंजन करने के साथ-साथ पठन कौशल का भी विकास करती है।
► परीक्षणों के निर्माण में शिक्षक की सहायक होती है।
हिंदी की अच्छी पाठ्यपुस्तक के गुण
हिंदी शिक्षण में पाठ्यपुस्तक का प्रयोग भाषा शिक्षण के लक्ष्यों को सरलता से पूरा करने के लिए किया जाता है। यह छात्रों के मानसिक तथा बौद्धिक स्तर को ध्यान में रखकर बनायी जाती है।
► एक अच्छी पाठ्यपुस्तक के गुण निम्नलिखित है-  एक अच्छी पाठ्यपुस्तक पूरे पाठ्यक्रम को एक व्यस्थित क्रम में प्रस्तुत करती है।
► एक अच्छी पाठ्यपुस्तक शिक्षण के नियमों जैसे- सरलता से कठिनता की ओर, उचित और सरल उदाहरण के प्रयोग इत्यादि का ध्यान रखती है।
► एक अच्छी पाठ्यपुस्तक भाषायी कौशलों के क्रमिक विकास को ध्यान में रखकर लिखी जाती है।
► साहित्य की विभिन्न विधाओं, जैस- गद्य, पद्य आदि को सरलता से कठिनता के क्रम में प्रस्तुत करती है।
► पाठ्यपुस्तक की भाषा अपने आप में स्पश्ट तथा सरल होती है, जिसे पढ़ने से पाठ का अर्थ स्वत: समझ में आ जाता है। यह छात्रों के भाषा स्तर को ध्यान में रखकर लिखी गयी होती है।
यह व्याकरणिक नियमों को ध्यान में रखकर लिखी जाती है।
बाल साहित्य तथा हिंदी शिक्षण
बच्चों के मानसिक स्तर, सोच, उम्र आदि को ध्यान में रखकर बाल साहित्य की रचना की जाती है। बच्चों की रुचि को ध्यान में रखते हुए बाल साहित्य में जातक कथाओं, कविताओं का समायोजन होता है। बाल साहित्य बच्चों का मनोरंजन करने के साथ उनके चरित्र के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
बाल साहित्य का महत्त्व
बाल साहित्य बच्चों के मानसिक विकास में सहायक होता है।
► बालपन की कल्पना शक्ति के विकास में बाल साहित्य की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।
► बच्चो को भाषा शिक्षण के द्वारा जिज्ञासु बनाने में सहायक होता है।
► बच्चों के चरित्र के विकास में सहायक होता है।
► बच्चोंं में भाषा के प्रति संवेदना विकसित करने में सहायक होता है।
► भाषा की विभिन्न छटाओं के माध्यम से बालसाहित्य विद्यार्थी में रोचकता जगाने का काम करता है।
► यह विद्यार्थी को विविधतापूर्ण भाषिक सामग्री पढ़ने का अवसर प्रदान करता है।
► बाल साहित्य बच्चों को भाषा की बारीकियों और सौंदर्य का परिचय देता है, जिससे विद्यार्थी भाषा की विभिन्न विधाओं का रसास्वादन कर पाते है।
सहायक सामग्री प्रयोग के उद्देश्य
छात्रों में पाठ तथा विशय-वस्तु के प्रति रुचि उत्पन्न करना जिससे वे सक्रियता से शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में भाग लें।
► पाठ में शामिल तथ्यात्मक सूचनाओं को रोचक व सरल तरीके से प्रस्तुत करना।
► विशेश आवश्यकता वाले बालकों को यथा- मंद बुद्धि बालक, तीव्र बुद्धि बालक, सृजनात्मक बालक आदि की योग्यता व आवश्यकतानुसार शिक्षा देना।
► कठिन विशय को सरल व सहज रूप में प्रस्तुत करना।
► छात्रों का ध्यान पाठ की ओर आकर्शित करना।
► अमूर्त पदार्थों को मूर्त रूप देना।
पाठ योजना
शिक्षण प्रक्रिया शुरू करने से पूर्व पाठ को पढ़ाने की विधि तथा उसके द्वारा पूरे होने वाले शैक्षिक उद्देश्यों का निर्धारण लिखित रूप में शिक्षक द्वारा किया जाता है, जिसे पाठ योजना के नाम से जाना जाता है। पाठ योजना में शिक्षक अपने कक्षा अनुसार पाठ पढ़ाने की विधि, अवधि, उद्देश्यों का निर्धारण कक्षा में जाने से पूर्व करता है। पाठ-योजना शिक्षक की सहायिका होती है, जो उसे अपने शिक्षण को प्रभावी, छात्र केन्द्रित तथा समय से पूरा करने में सहायता करती है। पाठ योजना बनाते समय ध्यान देने योग्य बातें:
उद्देश्यों का निर्धारण: शैक्षिक उद्देश्यों के निर्धारण से पूर्व शिक्षक को निम्न बातो का ध्यान रखना चाहिए-
पाठ की विषय वस्तु: पाठ पढ़ने से छात्रों को होने वाले लाभ को ध्यान में रखकर शिक्षक को अपनी शैक्षिक विधि का चुनाव करना चाहिए।
समयावधि: कक्षा की समयावधि सीमित होती है। इस सीमित समय में शिक्षक को विद्यार्थियों के पूर्व ज्ञान की जाँच के साथ-साथ पढ़ाए गए पाठ का अभ्यास भी कराना होता है। इन सभी कार्यों को इस सीमित समय में कैसे करना है, इस बात को ध्यान में रखकर पाठ-योजना का निर्माण किया जाता है। पाठ योजना की समयावधि स्पष्ट होनी चाहिए।
शिक्षण विधि तथा संसाधन: शिक्षण विधि का चुनाव कक्षा का स्तर, जगह, साधनों की उपयुक्तता, कक्षा में विद्यार्थियों की संख्या, साहित्यिक विधाओं को पढ़ाने से होने वाले लाभ इत्यादि को ध्यान में रखकर करना चाहिए। शिक्षण गतिविधियों को लागू करने से पहले साधनों तथा कक्षा में जगह का विशेष ध्यान रखा जाता है। शिक्षण में अनेक प्रकार की सामग्री का प्रयोग किया जाता है, जैसे- पुस्तक, अभ्यास पुस्तिका, श्यामपट्ट, चॉक, चित्र इत्यादि। पाठ योजना बनाते समय इन वस्तुओं का ध्यान रखना आवश्यक है। शिक्षण विधि का लक्ष्य स्पश्ट होना चाहिए।
विद्यार्थी: शिक्षण का एकमात्र उद्देश्य विद्यार्थी के व्यवहार में परिवर्तन लाना है। अत: पाठ योजना का निर्माण करते समय केन्द्र में विद्यार्थी को ही रखना चाहिए। शिक्षण पूर्ण रूप से विद्यार्थी पर ही आधारित होनी चाहिए। पाठ योजना छात्रों के पूर्वज्ञान को ध्यान में रखकर बनानी चाहिए।
पाठ योजना में आने वाले सामान्य तथा विशिष्ट उद्देश्य
सामान्य उद्देश्य: साहित्यिक विधाओं को पढ़ाने से हिन्दी शिक्षण के जिन सामान्य उद्देश्यों की पूर्ति होती है। उन्हें पाठ योजना का सामान्य उद्देश्य कहा जाता है। सामान्यत: प्रत्येक साहित्यिक विधाओं के सामान्य उद्देश्य मिलते जुलते होते है; जैसे- गद्य शिक्षण के सामान्य उद्देश्य निम्न हैं-
(1) शुद्ध उच्चारण की क्षमता का विकास
(2) वाचन कौशल का विकास
(3) कल्पना शक्ति का विकास
(4) मौन वाचन की क्षमता का विकास
(5) साहित्य में रुचि बढ़ाना
(6) लिखने की विभिन्न शैलियों से परिचित कराना
(7) तर्क की क्षमता का विकास करना
विशिष्ट उद्देश्य: पाठ को पढ़ाने से जिन विशिश्ट उद्देश्यों की पूर्ति होती है, उन्हें पाठ योजना के विशिश्ट उद्देश्य कहा जाता है। प्रत्येक स्तर पर पाठों के विशिश्ट उद्देश्य बदलते रहते हैं। पाठ योजना के विशिश्ट उद्देश्य पाठ एवं विषय पर आधारित होते हैं।
प्राथमिक स्तर पर गद्य शिक्षण के विशिष्ट उद्देश्य
(1) बालकों को पाठ में आये नवीन शब्दों का उच्चारण एवं अर्थबोध कराना।
(2) पाठ में प्रयुक्त मुहावरों के अर्थ से बालकों को परिचित कराना।
(3) पाठ के विभिन्न पात्रों से बालकों को परिचित कराना।
(4) बालकों में प्रश्न चिह्न, पूर्णविराम तथा अर्धविराम चिह्नों के अनुसार गति के साथ पढ़ने की क्षमता का विकास करना।
(5) बालकों में पाठ को पढ़कर पाठ के मूल बिंदु तथा सन्देश को समझने की क्षमता का विकास करना।
कविता शिक्षण (पद्य)
कविता शिक्षण के सामान्य उद्देश्य:
(1) बालकों में कविता के रसास्वादन की क्षमता का विकास
(2) उचित लय तथा गति के साथ वाचन का विकास
(3) बालकों में कल्पना की क्षमता को विकसित करके उन्हें कविता के सौन्दर्य से परिचित कराना
(4) शब्द भंडार में वृद्धि करना
(5) बालकों को काव्य सौन्दर्य से परिचित कराना
(6) उचित आरोह-अवरोह के साथ वाचन की क्षमता का विकास
कविता शिक्षण के विशिष्ट उद्देश्य
कविता के श्रवण तथा वाचन द्वारा बालकों को आनंद की अनुभूति कराना।
► कविता में प्रयुक्त भावों को समझने की क्षमता का विकास कराना।
► कविता में आए नवीन शब्दों तथा छंदों से बालकों को परिचित कराना।
► बालकों को कंठस्थ करके कविता वाचन के लिए प्रेरित कराना।
► स्वर, लय और ताल के साथ कविता पढ़ने के लिए प्रेरित कराना।

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