8 Hindi Chapter 7 क्या निराश हुआ जाए हजारी प्रसाद द्विवेदी

Chapter Notes and Summary
ह्रक्या निराश हुआ जाएह् लेखक श्री हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित निबन्धात्मक लेख है। लेखक इस पाठ के माध्यम से सभी को वर्तमान की कठिन परिस्थितियों के होने के बावजूद निराश न होकर, अपितु उसका डटकर सामना करने की प्रेरणा देना चाहता है। भारतवर्ष सदा कानून को धर्म के रूप में देखता आ रहा है। आज एकाएक कानून और धर्म में अन्तर कर दिया गया है। धर्म को धोखा नहीं दिया जा सकता, परन्तु कानून को दिया जा सकता है। यही कारण है कि जो लोग धर्म भीरु हैं, वे कानून की त्र्ुटियों से लाभ उठाने में संकोच नहीं करते। आज बेईमानी, धोखेबाजी से लोग उन्नति कर रहे हैं व सच्चाई, ईमानदारी समाज से लुप्त होती जा रही है, परन्तु लेखक ने अपने जीवन की ऐसी घटनाओं को उदाहरण बनाया है, जो लोगों में व्याप्त निराशा को दूर करने का सन्देश देती है। पहली घटना में रेलवे स्टेशन पर टिकट लेते समय लेखक बचे हुए रुपये लेना भूल जाता है, पर वुळछ समय बाद टिकट वंळडक्टर लेखक को ढूँढ़ते हुए आता है व रुपये लौटाते समय उसके चेहरे पर सन्तोष का भाव होता है, जबकि दूसरी घटना में बस यात्र के समय अचानक बस के खराब होने पर यात्र्यिों को बस चालक व वंळडक्टर का डावुळओं से मिले होने का सन्देह होना, जबकि वंळडक्टर स्वयं जाकर दूसरी बस का प्रबन्ध करता है। वह लेखक के बच्चों के लिए दूध व पानी भी लाता है।
लेखक कहते हैं जीवन में ऐसी अनेक घटनाएँ हुईं हैं, जिन्हें वे भूल नहीं सकते। महान भारतवर्ष को पाने की सम्भावना बनी हुई है, बनी रहेगी। मेरे मन को निराश होने की जरूरत नहीं है।

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