8 Hindi Chapter 4 दीवानों की हस्ती श्री भगवतीचरण वर्मा

Chapter Notes and Summary
प्रस्तुत कविता ‘दीवानों की हस्ती’ कवि श्री भगवतीचरण वर्मा द्वारा रचित है। इस कविता में कवि मस्तमौला प्रवृत्ति के व्यक्तियों के विषय में बताते हुए कह रहे हैं कि हम दीवानों की क्या हस्ती है, हम आज यहाँ है, कल कहाँ चले जाएँ, पता नहीं। हमारे साथ हँसी-खुशी का वातावरण साथ चलता है। हम आँधी-तफूान की तरह धूल उड़ाते हुए आगे बढ़ जाते हैं। सभी परिस्थितियों में हँसी-खुशी और दु:ख में समायोजन करते हुए आगे बढ़ जाते हैं। हमारी कोई पूर्व निश्चित योजना नहीं होती। कब कहाँ चले जाएँ, किस दिशा में आगे बढ़ना है, किस उद्देश्य से कहाँ जाना है? हम इस पर विचार किए बिना आगे बढ़ जाते हैं। संसार को वुळछ खुशी प्रदान कर आगे बढ़ जाते हैं। सुख-दु:ख के अनुभवों का उपयोग कर हम एक भाव से उसे सहन कर अपनी जीवन-यात्र पर आगे बढ़ते चले जाते हैं।
हम भिखमंगों (याचकों) की दुनिया में स्वच्छन्द प्यार (स्नेह) का वितरण कर आगे बढ़ते चले जाते हैं। हम असफलता के भार को धारण कर आगे चले जाते हैं। हमारी दृष्टि में अब अपना और पराया क्या है, आबाद रहें इस दुनिया में रुकने वाले। हम बन्धनों का त्यागकर जीवन के पथ पर यात्र तय करते हुए आगे बढ़ते चले जाते हैं।

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