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8 भाष् बोध में प्रवीणता का मूल्यांकन (Language Hindi & Pedagogy CTET & TET Exams)

8 भाष् बोध में प्रवीणता का मूल्यांकन

भाषायी कौशलों का मूल्यांकन
मूल्यांकन: शिक्षण प्रक्रिया में पूर्वनिर्धारित पाठ्यक्रम को पूरा करने के बाद शिक्षक द्वारा छात्रों की शैक्षिक उपलब्धि की जाँच की प्रक्रिया मूल्यांकन के नाम से जानी जाती है। इसके लिए शिक्षक तरह-तरह के परीक्षणों का प्रयोग करता है। इन परीक्षणों से शिक्षक को छात्रों के सीखने की क्षमता तथा तरीकों का भी पता चलता है। साधारण शब्दों में कहा जाए तो, ‘मूल्यांकन निरंतर चलने वाली ऐसी प्रक्रिया है, जिससे सीखने वालों की क्षमता का पता लगाया जाता है।’ इसके अलावा इस प्रक्रिया से हमें यह पता चलता है कि छात्र किस विषय में कमज़ोर है तथा उसे सुधार की कितनी आवश्यकता है?
सी.सी. रास के अनुसार– मूल्यांकन का प्रयोग बच्चे के संपूर्ण व्यक्तित्व अथवा शिक्षा की समूची स्थितियों की जाँच प्रक्रिया के लिए किया जाता है।
भाषा शिक्षण में मूल्यांकन की आवश्यकता
भाषा शिक्षण के उद्देश्यों की पूर्ति में मूल्यांकन का योगदान महत्त्वपूर्ण होता है। भाषा शिक्षण के पूर्व निर्धारित लक्ष्यों की पूर्ति कितनी हुई है, इसका पता मूल्यांकन द्वारा ही लगाया जाता है। इसके आधार पर ही शिक्षक नए शिक्षण उद्देश्यों का निर्धारण करता है।
► मूल्यांकन के आधार पर शिक्षक को शिक्षण विधियों के चुनाव में सहायता मिलती है। शिक्षक द्वारा प्रयोग में लाई गयी शिक्षण विधि ने भाषा शिक्षण के उद्देश्यों की पूर्ति कितनी की है, इसका पता मूल्यांकन के द्वारा चलता है।
► कक्षा में पढ़ाये गए विषय-वस्तु को छात्र ने कितना ग्रहण किया इसका पता मूल्यांकन से चलता है।
► मूल्यांकन के द्वारा छात्रों की बुद्धिलब्धि ज्ञात होती है।
► विषय-वस्तु को समझने में आने वाली बाधा के कारणों का पता मूल्यांकन द्वारा लगाया जाता है।
► मूल्यांकन के द्वारा छात्रों के मानसिक तथा बौद्धिक स्तर का पता चलता है।
भाषा शिक्षण में परीक्षण
परीक्षण: विभिन्न विधियों को प्रयोग करके छात्रों के ज्ञान और क्षमता का आकलन को ‘परीक्षण’ कहा जाता है। इसके तीन प्रकार हैं –
अभिरुचि परीक्षण: इस परीक्षण के अंतर्गत विद्यार्थी के द्वितीय भाषा सीखने की रुचि और क्षमता की जाँच की जाती है।
कसौटी-संदर्भित परीक्षण: इस परीक्षण के अंतर्गत यह पता लगाया जाता है कि जिन उद्देश्यों को पूर्वनिर्धारित करके भाषा शिक्षण किया गया है, उनकी पूर्ति कहाँ तक हुई है। निदानात्मक तथा उपलब्धिपरक परीक्षण इस परीक्षण के अंतर्गत आते हैं।
मानक संदर्भित परीक्षण: इस परीक्षण द्वारा यह पता लगाया जाता है कि छात्र सीखी हुई भाषा का प्रयोग करने में कितना सक्षम है। यह परीक्षण वैश्विक भाषा क्षमता की जाँच करता है।
इस परीक्षण के अंतर्गत दिए जाने वाले प्रश्न निम्न प्रकार के होते हैं-
► वस्तुनिश्ठ प्रश्न
► मिलान चिह्न
► वर्णात्मक प्रश्न
► उचित-अनुचित कथन की जाँच करना
► वाक्यों को पूरा करना इत्यादि परीक्षण के अंतर्गत होने वाले कार्य: परीक्षण के अंतर्गत निम्न कार्य होते हैं-
अनुत्पादक परीक्षण कार्य: वाक्यों का अनुवाद करना, क्लोज टेस्ट, सुनकर लिखना (श्रुतलेख), वाक्यों को क्रम से लगाना इत्यादि अनुत्पादक परीक्षण कार्य की श्रेणी में आते हैं।
उत्पादन परीक्षण कार्य: जोड़े मिलाना, वाक्यों को क्रमबद्ध करना, बहुवैकल्पिक प्रश्न इत्यादि उत्पादन परीक्षण कार्य की श्रेणी में आते हैं।
पोर्टफोलियो परीक्षण कार्य: शिक्षण प्रक्रिया के विशेष काल में शिक्षार्थी द्वारा किए गए रचनात्मक और सृजनात्मक कार्यों के विवरण का कार्य इस परीक्षण के अंतर्गत आता हैं।
भाषा के मूल्यांकन में सतत् और व्यापक मूल्यांकन का महत्त्व
इसके द्वारा शिक्षण सत्र के प्रारंभ से लेकर अंत तक बालक के भाषा सीखने के हर पक्षों की जाँच सरलता से की जा सकती है।
► यह प्रक्रिया बालकों में परीक्षा का भय कम करने में सहायक होती है।
► भाषा सीखने के आरम्भ में आने वाली बाधाओं को पहचान कर उनके निवारण में सतत् मूल्यांकन की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है।
► भाषा के सृजनात्मक और रचनात्मक कार्यों के मूल्यांकन में सतत् मूल्यांकन की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है।
► छात्रों के भाषा सीखने की क्षमता तथा तरीकों की जानकारी सतत् और व्यापक मूल्यांकन के द्वारा शिक्षक को सरलता से मिल जाती है।
► सीखने-सिखाने की प्रक्रिया के बीच-बीच में अवलोकन के द्वारा भाषा का आकलन उचित तरह से किया जा सकता है।
हिन्दी के मूल्यांकन हेतु प्रयोग की जाने वाली विधियाँ
1. परीक्षा: परीक्षा विद्यालयों में मूल्यांकन के लिए प्रयोग में लायी जाने वाली सबसे प्रचलित विधि है। इस विधि में प्रश्नों को लिखित या मौखिक रूप में पूछ कर उत्तरों के अध्ययन द्वारा छात्र की क्षमता का मूल्यांकन किया जाता है।
2. निरीक्षण: प्राथमिक स्तर पर छात्रों के व्यवहार को जाँचने के लिए इस विधि का प्रयोग किया जाता है क्योंकि इस स्तर पर किसी प्रकार की कोई भी परीक्षा नहीं होती है। इस विधि में छात्रों के व्यवहार तथा क्रियाकलापों का निरीक्षण कर मूल्यांकन किया जाता है।
3. संचयी आलेख: इस विधि के अंतर्गत अध्यापक द्वारा छात्रों की प्रगति का आलेख तैयार किया जाता है। छात्रों द्वारा विद्यालय में की गई सभी गतिविधियों का वर्णन इस आलेख में किया जाता है।
4. घटनावृत्त (एनेकडोटल आलेख): विद्यालयों में हो रहे क्रिया-कलापों, घटनाओं में छात्र का क्या योगदान रहा है। यह सब इस आलेख द्वारा पता लगाया जाता है।
5. जाँच सूची: इस विधि का प्रयोग इस बात का पता लगाने के लिए किया जाता है कि छात्र भाषा सीखने में रुचि ले रहे हैं या नहीं। इसका संबंध भावात्मक पक्ष से है।
6. रेटिंग स्केल: इस विधि का प्रयोग प्राथमिक स्तर के लिए नहीं किया जाता है। इस विधि के अंतर्गत दी गई पंक्ति पर छात्रों को निर्णय देने होते हैं। प्राथमिक स्तर पर विद्यार्थी निर्णय लेने में समर्थ नहीं होते हैं। अत: उच्च कक्षा के अतिरिक्त प्राथमिक स्तर पर यह विधि अप्रासंगिक है।
भाषा के विभिन्न कौशलों का मूल्यांकन
श्रवण कौशल का मूल्यांकन: इस मूल्यांकन के अंतर्गत बालक की सुनकर समझने की शक्ति का आकलन किया जाता है। इसके लिए निम्न विधियाँ प्रयोग में लायी जाती हैं-
श्रुतलेख: इस विधि में अध्यापक द्वारा बोले गए वाक्यों या शब्दों को छात्र सुनकर लिखते हैं, जिनके आधार पर छात्रों का मूल्यांकन होता है।
प्रश्न विधि: इस विधि में अध्यापक द्वारा मौखिक रूप से पूछे गए प्रश्नों के उत्तरों के आधार पर छात्रों का मूल्यांकन होता है। छात्र पूछे गए प्रश्नों का अर्थ क्या समझता है, इस विधि में इस बात का मूल्यांकन किया जाता है।
मौखिक अभिव्यक्ति कौशल का मूल्यांकन– मौखिक अभिव्यक्ति कौशल के मूल्यांकन के अंतर्गत इस बात की जाँच की जाती है कि बालक बोलकर अपने विचारों को अभिव्यक्त करने में कितना सक्षम है। मौखिक अभिव्यक्ति कौशल के मूल्यांकन का प्रभावकारी तरीका यह है कि छात्र को अपने अनुभवों को स्वतंत्र बोलने का मौका दिया जाए। निम्न तरीकों के द्वारा शिक्षक बालक की मौखिक अभिव्यक्ति कौशल का मूल्यांकन करता है-
► पढ़े गए पाठ या दैनिक जीवन पर आधारित प्रश्न पूछकर शिक्षक द्वारा बालक की मौखिक अभिव्यक्ति कौशल की जाँच की जाती है।
► शिक्षक द्वारा छात्रों को पढ़े हुए पाठ का वर्णन अपने शब्दों में करने के लिए कहा जाता है। उनके वर्णन की शुद्धता और स्पष्टता के आधार पर बालक की मौखिक अभिव्यक्ति का मूल्यांकन किया जाता है।
► वाद-विवाद मौखिक अभिव्यक्ति कौशल के मूल्यांकन का एक उपयुक्त साधन है, जिसके द्वारा बालक की स्वतंत्र मौखिक अभिव्यक्ति का मूल्यांकन किया जाता है। परीक्षा लिखित लघु उत्तर वस्तुनिष्ठ निबंधात्मक प्रायोगिक मौखिक
► साक्षात्कार द्वारा भी मौखिक अभिव्यक्ति का मल्ू याकं न किया जाता है।
► प्रारम्भिक स्तर पर मौखिक अभिव्यक्ति कौशल के परीक्षण द्वारा शिक्षक बालक के मानसिक और भाषिक स्तर के विकास की स्थिति का पता लगाता है।
लेखन कौशल का मूल्यांकन करते समय ध्यान देने योग्य बातें– प्रारम्भिक स्तर पर लेखन कौशल का मूल्यांकन करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए-
(1) लिखते समय छात्र शुद्ध वर्तनी का प्रयोग कर रहे हैं या नहीं।
(2) छात्र अपने लेखन में विराम चिह्नों का उचित प्रयोग कर रहे हैं या नहीं।
(3) व्याकरण की दृष्टि से छात्रों द्वारा लिखे गए वाक्य शुद्ध है या नहीं।
(4) छात्र विषय के अनुरूप लिख रहे हैं या नहीं। इसे जाँचना भी अनिवार्य है।
(5) छात्र लेखन द्वारा अपने विचारों को व्यक्त कर रहे हैं या नहीं।
लेखन कौशल के मूल्यांकन में परीक्षाओं की भूमिका– बच्चों की लिखित भाषा का परीक्षण करने के लिए परीक्षाओं में प्रश्नों के विशेषत: दो रूप देखने को मिलते हैं-
लघुउत्तरीय प्रश्न– इन प्रश्नों में छात्रों को 15-20 शब्दों में उत्तर लिखने होते हैं। इसके द्वारा वाक्य-रचना की योग्यता का मूल्यांकन किया जाता है।
उदाहरण: मोहन गाँव में क्या करता था?
निबंधात्मक प्रश्न– इन प्रश्नों का उत्तर विस्तार से देना होता है।
शब्दों की सीमा बालक के स्तरानुसार दी जाती है। इनकी संख्या प्रश्नपत्र में कम होती है। यह छात्रों की लिखित अभिव्यक्ति के मूल्यांकन में शिक्षक की सहायता करती है।
उदाहरण: अपने जीवन से जुड़ी किसी घटना का वर्णन करो।
पठन कौशल का मूल्यांकन– पठन कौशल मूल्यांकन के अंतर्गत बालक के पढ़ कर समझने की क्षमता का आकलन किया जाता है।
यह विधि छात्रों के मानसिक विकास का भी मूल्यांकन करती है। इस मूल्यांकन को बोधशक्ति का मूल्यांकन भी कहते हैं। निम्न कार्यों के द्वारा शिक्षक पठन कौशल का मूल्यांकन करता है-
मौखिक परीक्षाओं के द्वारा– पाठ या शिक्षण पाठ्यक्रम की समाप्ति पर अध्यापक द्वारा कक्षा में मौखिक परीक्षा का आयोजन किया जाता है, जिसमें अध्यापक पाठ पर आधारित प्रश्न मौखिक रूप में छात्र से पूछता है। छात्र को प्रश्नों का उत्तर मौखिक भाषा में देना होता है।
यह विधि प्राथमिक कक्षाओं में भाषा के मूल्यांकन की सबसे अच्छी विधि है।
लिखित परीक्षाओं के द्वारा– अध्यापक ऐसे प्रश्नपत्र का निर्माण करता है, जिससे पठन कौशल का मूल्यांकन हो सके; जैसे-प्रश्नपत्र में अपठित गद्यांश के संयोजन का उद्देश्य यह होता है कि छात्र पढ़कर गद्यांश का अर्थ समझे तथा उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दें।
अच्छी परीक्षा के गुण
वैधता– जब परीक्षा द्वारा निर्धारित उद्देश्यों का मापन किया जाता है, तो उसे वैध कहा जाता है।
विश्वसनीयता– अच्छी परीक्षा का एक गुण विश्वसनीयता को माना जाता है। परीक्षा का विश्वसनीय होना आवश्यक है।
वस्तुनिष्ठता– वस्तुनिश्ठता, परीक्षा का एक अन्य महत्वपूर्ण गुण माना जाता है। वस्तुनिश्ठ परीक्षा प्रामाणिक होती है। इसमें एक या दो शब्दों तथा किसी विशेश निर्धारित चिहृ के द्वारा उत्तर देते हैं।
विभेदीकरण– विभेदीकरण अच्छी परीक्षा का एक गुण है। विभेदीकरण का अर्थ है कि विभेद या अंतर स्पश्ट करना। इसके द्वारा निम्न व उच्च कक्षाओं के छात्रों में विभेद किया जाता है।
प्रश्न-पत्र का निर्माण एवं ब्लू प्रिन्ट
शिक्षण अधिगम प्रक्रिया के दौरान, अध्यापक द्वारा प्रयोग की गयी शिक्षण विधियाँ उचित थी या नहीं, अधिगम के लिए निर्धारित उद्देश्य प्राप्त पूरे हुए या नहीं, इनको जाँचने के लिए मूल्यांकन किया जाता है। मूल्यांकन के लिए प्रश्न-पत्र का निर्माण किया जाता है। प्रश्न-पत्र बनाने से पूर्व एक योजना बनाई जाती है जिसमें प्रश्नों का उद्देश्य, प्रकार, अंकों का विभाजन आदि बातों को ध्यान में रखा जाता है, इसे ही ब्लू प्रिन्ट कहा जाता है। इसलिए, मूल्यांकन हेतु प्रश्न-पत्र का निर्माण ध्यानपूर्वक करना चाहिए। ब्लू प्रिन्ट से अध्यापक को यह जानने में मदद मिलती है कि किस पाठ या इकाई से कितने अंक के प्रश्न पूछे जाएगें। इसमें आवश्यकतानुसार परिवर्तन भी किया जा सकता है। प्रश्न-पत्र बनाते समय ध्यान में रखी जाने वाली बातें निम्नलिखित है-
► प्रश्न-पत्र में कितने प्रश्न ज्ञानात्मक हों, कितने अवबोधात्मक हों, कितने प्रश्न अनुप्रयोगात्मक हों, ये सब पहले से ही निर्धारित होने चाहिए।
► प्रश्न-पत्र में प्रश्नों के प्रकार का निर्धारण होना चाहिए। प्रश्न-पत्र में वस्तुनिश्ठ, लघुउत्तरात्मक या निबंधात्मक सभी प्रकार के प्रश्न पूछे जाने चाहिए।
► पाठ्यक्रम में शामिल प्रत्येक इकाई का विशय-वस्तु के आधार पर अंकों का निर्धारण करना चाहिए।
► प्रश्न-पत्र बनाते समय प्रश्नों के कठिनाई स्तर का भी ध्यान रखना आवश्यक है जैसे- सरल प्रश्न, सामान्य प्रश्न तथा कठिन प्रश्न। साथ ही यह निर्धारित कर लेना चाहिए कि किन प्रश्नों में विकल्प दिया जाएगा अथवा नहीं।
► प्रश्न-पत्रों में खण्डों का विभाजन किया जाना आवश्यक है।
► प्रश्न-पत्र में समय का स्पश्ट उल्लेख तथा उत्तर देने से संबधित स्पश्ट निर्देश अवश्य देने चाहिए।

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