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8. पर्यावरण अध्ययन का महत्व (EVS Environment Studies for CTET & TET in Hindi)

8. पर्यावरण अध्ययन का महत्व

परिचय

पर्यावरण अध्ययन के अंतर्गत विज्ञान और समाज दोनों का अध्ययन किया जाता है। पर्यावरण की घटनाओं को समझने के लिए भौतिकी, रसायन तथा जैविकी, भूगोल, अर्थशास्त्र, संसाधन प्रबंधन आदि को गहराई से अध्ययन करना और समझना होगा। अर्थात् देखा जाए तो पर्यावरण अध्ययन के अंतर्गत समस्त विषयों की जानकारी प्राप्त हो रही है। ऐसे में पर्यावरण अध्ययन हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। आधुनिक युग को विज्ञान का युग कहा जाता है। विज्ञान के क्षेत्र में दिन-प्रतिदिन नये-नये आविष्कार किये जा रहे हैं। नयी दवाओं और औद्योगिक उत्पादों की खोज की जा रही है। इस तरह फूल देने वाले पौधे और कीड़े, जो जीवित प्राणियों के सबसे समृद्ध समूह हैं, मानव के भावी विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनकी सुरक्षा करना हमारा कर्तव्य है। पर्यावरण सभी के लिए आवश्यक है। पर्यावरण व्यक्तियों की आय, आयु, व्यवसाय आदि को प्रभावित करता है तथा मनुष्य भी अपनी क्रियाओं द्वारा पर्यावरण को प्रभावित करता है। पर्यावरण एक सार्वभौमिक विषय है। पर्यावरण विभिन्न अवयवों तथा उनके कार्यकलापों से बना एक जटिल तंत्र है।
एक अशांत प्राकृतिक व सामाजिक वातावरण अक्सर मानव संबंधों में तनाव लाता है, जिससे असहिष्णुता व संघर्ष पैदा होता है। इस दृष्टिकोण से भी पर्यावरण अध्ययन का शिक्षण अनिवार्य होना चाहिए। बच्चों को पर्यावरण व पर्यावरण संरक्षण के प्रति संवेदनशील बनाना भी पर्यावरण अध्ययन का एक अभिन्न अंग है। पिछली सदी में नयी तकनीकों व जीवन शैली से पर्यावरण को नुकसान पहुँचा है और परिणामस्वरुप अमीरी-गरीबी के बीच गहरा असंतुलन आ गया है। अत: पर्यावरण का अध्ययन अत्यधिक अनिवार्य हो गया है, जिससे पर्यावरण का पोषण व संरक्षण किया जा सके। अपने भीतर व अपने प्राकृतिक एवं सामाजिक पर्यावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करते रहना एक मूल मानवीय आवश्यकता है। एक व्यक्ति के व्यक्तित्व का संपूर्ण विकास स्वच्छ और शांतिपूर्ण माहौल से ही संभव है। स्वस्थ जीवन, स्वच्छ पानी, स्वच्छ वायु, स्वच्छ भोजन, उपजाऊ भूमि तथा मानव के विकास के लिए पर्यावरण का अध्ययन अति महत्वपूर्ण है।

एकीकृत पर्यावरण अध्ययन

एकीकृत अध्ययन के अंतर्गत अलग-अलग विषयों के अध्ययन के स्थान पर सभी विषयों के मिश्रित स्वरूप के अध्ययन पर जोर दिया जाता हैं। भूगोल, भौतिकी, रसायन, जीव विज्ञान, पारिस्थितिकी आदि विषयों का अध्ययन एकीकृत उपायों का प्रयोग कर शिक्षक इनकी पाठ्यचर्याओं के मध्य संबंध जोड़ सकते हैं। यदि अध्यापक को जल के बारे में विद्यार्थियों को बताना है तो वह हमारे पर्यावरण में इसकी उपलब्धता, इससे प्राप्त ऊर्जा के संबंध में, रंग, शुद्धता तथा रासायनिक अभिक्रिया के रूप में आदि के बारे में पर्यावरण अध्ययन के माध्यम से बता सकता है। इस प्रकार पानी के बारे में समझाते हुए अध्यापक इस विषय-वस्तु से संबंधित प्राकृतिक विज्ञान के सभी पहलुओं को भी साथ-साथ पढ़ा सकता है। एकीकृत उपागम में एक साथ सभी पहलुओं को समझाने के लिए इसके व्यावहारिक ज्ञान को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। एकीकृत उपागम के महत्व को ही देखकर विज्ञान की पाठ्यचर्या को एकीकृत रूप में पढ़ाने पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है।

एकीकृत पर्यावरण अध्ययन के शिक्षण संबंधी प्रयास

विज्ञान की शिक्षा को ध्यान में रखकर राष्ट्रीय स्तर की पाठ्यक्रम समिति ने एक नीति दस्तावेज तैयार किया जिसका शीर्षक ’द करिकुलम फॉर द टेन ईयर स्कूल: ए फ्रेमवर्क’ था। प्रो. डी.एसकोठारी की अध्यक्षता में शिक्षा आयोग का गठन हुआ तथा वर्ष 1975 में इन्हीं की अध्यक्षता में 10 + 2 +3 पैटर्न को लागू करने का प्रावधान किया गया। इस पैटर्न का विज्ञान के पाठ्यक्रम व पाठ्य पुस्तकों पर सीधा प्रभाव पड़ा। इस प्रयास के अंतर्गत दसवीं तक गणित व विज्ञान के साथ-साथ सामान्य विषयों को अनिवार्य करने को कहा गया। विज्ञान तथा सामाजिक विज्ञान दोनों को पर्यावरण अध्ययन के अंतर्गत पढ़ाने को कहा गया। उच्च माध्यमिक शिक्षा में विज्ञान को विभाजित करके ने पढ़ाया जाए इसे संयुक्त रूप से पढ़ाने को कहा गया। विज्ञान एक है परंतु इसकी भिन्न-भिन्न शाखाएँ हैं। विज्ञान की पाठ्यचर्या को दैनिक जीवन के अनुभवों से जोड़ने का प्रयास करना चाहिए। इसके परिणामों की अपेक्षा प्रक्रियाओं पर अधिक ध्यान देना चाहिए।
एन.सी.एफ. 28 द्वारा बताये गये निर्देशों को बाद में एक पुस्तिका ’प्रथम 10 वर्षों तक की शिक्षा’ उच्च प्राथमिक एवं माध्यमिक स्तर की कक्षाओं के लिए विस्तृत रुप से बताया गया तथा इसे पहली बार गौर
(ध्यान) से समझा गया। राष्ट्रीय शिक्षा नीति सन् 1986 में प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा के लिए एनसीएफ 1988 के लिए मार्ग प्रशस्त किया।

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