7 Hindi Chapter 34 युधिाञ्रि की चिंता और कामना

Chapter Notes and Summary
अर्जुन जयद्रथ की ओर बढ़ रहा था। दुर्योधान अर्जुन को रोकने के लिए उसका पीछा कर रहा था। पांडव-सेना ने शत्र्ुओं पर जोरदार हमला किया। द्रोण को रोकने के लिए धाृ्यद्युम्न ने आचार्य पर लगातार वार किए। पांडव-सेना तीन भागों में बँटने से कमजोर पड़ गई।
धाृ्यद्युम्न आचार्य के रथ पर चढ़कर वार करने लगा। द्रोण ने पांचाल कुमार पर एक बहुत पैना बाण चलाया। उस बाण को सात्यकि ने काट दिया। इस प्रकार धाृ्यद्युम्न के प्राण बच सके। धाृ्यद्युम्न को उसका सारथी द्रोण से दूर ले गया। सात्यकि आचार्य से भिड़ गया। इसी बीच युधिाञ्रि को पता चला कि सात्यकि पर संकट आया हुआ है, तो उन्होने अपनी सुरक्षा में लगे वीरों को सात्यकि की सुरक्षा करने का आदेश दिया।
उसके बाद वह धाृ्यद्युम्न से बोले कि ुंपद-कुमार! आपको अभी जाकर द्रोणाचार्य पर आक्रमण करना चाहिए, नहीं तो डर है कि कहीं
आचार्य के हाथों सात्यकि का वधा न हो जाएह् युधिाञ्रि ने द्रोण पर हमला करने के लिए धाृ्यद्युम्न के साथ एक बड़ी सेना भेज दी। समय पर कुमुक के पहँुच जाने पर भी परिश्रम के बाद ही सात्यकि को द्रोण के फँदे से छुड़ाया जा सका।
दूसरी ओर श्रीस्रष्ण के पांचजन्य की धवनि सुनकर चिंतित युधिाञ्रि ने सात्यकि व भीम को अर्जुन की सहायता के लिए भेजा। युधिाञ्रि ने भीम से कहा कि मेरा कहना मानकर ही सात्यकि अर्जुन की सहायता को कौरव-सेना से युद्ध करता हुआ गया है। यदि तुम उनको कुशलपूर्वक पाओ तो सिंहनाद करना। मैं समझ लँूगा कि सब कुशल है। भीमसेन ने युधिाञ्रि की रक्षा का भार धाृ्यद्युम्न को सौंप दिया। धाृ्यद्युम्न ने भीम को आश्वासन देते हुए कहा कि तुम किसी प्रकार की चिन्ता न करो और निश्ंिचत होकर जाओ। विश्वास रखो कि द्रोण मेरा वधा किए बिना युधिाञ्रि को नहीं पकड़ सकेंगे। भीमसेन अर्जुन के पास पहँुच गया। अर्जुन को सुरक्षित देखकर भीम को आया देख श्रीस्रष्ण और अर्जुन ने ऐसा सिंहनाद किया कि युधिाञ्रि के मन से शोक के बादल हट गए। युधिाञ्रि कामना कर रहे थे कि अर्जुन जयद्रथ का वधा कर देगा। वह भी सम्भव है कि जयद्रथ -वधा के बाद दुर्योधान सन्धिा कर ले। दुर्योधान भी यहीं आ गया था किन्तु बुरी तरह हारकर उसे मैदान छोड़कर भागना पड़ा। दूसरी ओर दुर्योधान से द्रोण ने कहा कि बेटा, दुर्योधान, तुम्हें हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। तुम जयद्रथ की सहायता के लिए जाओ और वहाँ जो कुछ करना आवश्यक हो, वह करो। आचार्य के कहने पर दुर्योधान कुछ सेना लेकर वापस आया। यहाँ भीम और कर्ण में भयंकर युद्ध हो रहा था। भीमसेन पुरानी बातें याद करके आज धाधाकती आग जैसा तप रहा था। इस युद्ध में भीम के घोड़े व सारथी मारे गए। रथ टूट गया, धानुष कट गया। भीम की ढाल के भी कर्ण ने टुकड़े कर दिए। भीम कर्ण के रथ पर चढ़ गया। कर्ण ने अपने को बचा लिया। भीम मैदान में पड़े हुए रथ, हाथी, घोड़ों को उठाकर कर्ण पर फेंकने लगा। कर्ण बचाव का युद्ध लड़ रहा था। वह चाहता तो भीम को मार देता किन्तु वह कुंती को दी हुई प्रतिज्ञा से बँधा हुआ था।

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