7 Hindi Chapter 31 भीष्म शरशय्या पर

Chapter Notes and Summary
दसवें दिन युद्ध में पांडवों ने शिखंडी को आगे करके युद्ध प्रारम्भ किया। शिखंडी की आड़ से अर्जुन ने पितामह पर बाण चलाए। शिखंडी को देखकर पितामह ने प्रत्युत्तर न दिया, क्योंकि वह जानते थे कि शिखंडी ही पूर्व जन्म की अंबा है। अत: शिखंडी ने पितामह का वक्ष-स्थल बींधा डाला। उधार अर्जुन ने पितामह के मर्म स्थानों पर तीक्ष्ण बाण मारे। उनके सारे शरीर में अर्जुन व शिखंडी ने इतने बाण मारे कि शरीर में
उँगली रखने तक को स्थान नहीं बचा था। ऐसे में भीष्म रथ से सिर के बल जमीन पर गिर पड़े। उनका शरीर भूमि से नहीं लगा। वह बाणों के सहारे ऊपर उठा रहा। तब पितामह ने अर्जुन से बाण से उनके सिर के नीचे सिरहाना लगाने को कहा, जिससे उनके सिर को सहारा मिल जाए।
अर्जुन ने तीन बाणों से पितामह के लिए उपयुक्त तकिया बना दिया। इसके बाद पितामह ने अर्जुन से पानी पिलाने को कहा। अर्जुन ने तुरन्त धानुष तानकर भीष्म की दाहिनी बगल में पृथ्वी पर बड़े जोर से एक तीर मारा। बाण पृथ्वी में घुसकर सीधा पाताल में जा लगा। उसी क्षण उस स्थल से जल का एक सोता फूट निकला और पितामह भीष्म ने अमृत के समान मधुर और शीतल जल पीकर अपनी प्यास बुझाई।
वह बहुत ही खुश और प्रसन्न दिखाई दिए। तब भीष्म ने कहा-मैं सूर्य के उत्तरायण होने तक ऐसे ही पड़ा रहूँगा। आप लोगों में से जो भी उस समय तक जीवित रहें, वे आकर मुझे देख जाएँ।
पितामह के शरशय्या पर लेटा हुआ सुनकर कर्ण उनसे मिलने गया। तब भीष्म ने कहा कि बेटा, तुम राधा के पुत्र् नहीं, कुन्ती के पुत्र् हो।
सूर्यपुत्र्! शूरता में तुम स्रष्ण और अर्जुन की बराबरी कर सकते हो। तुम पांडवों में ज्येञ् हो। इस कारण तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम उनसे मित्र्ता कर लो। मेरी यही इच्छा है कि युद्ध में मेरे सेनापतित्व के साथ ही पांडवों के प्रति तुम्हारे वैरभाव का भी आज ही अन्त हो जाए। पितामह की बात सुनकर कर्ण ने बड़ी विनम्रता से कहा-पितामह मैं जानता हूँ कि मैं सूत-पुत्र् नहीं अपितु कुन्ती का पुत्र् हूँ, लेकिन मैं
दुर्योधान का साथ नहीं छोड़ सकता। आप मुझे उसी के पक्ष में लड़ने की अनुमति दें। मैं अपने दोषों के लिए आपसे क्षमा चाहता हूँ।
भीष्म ने कहा-जो तुम्हारी इच्छा हो, वही करो। कर्ण के युद्धक्षेत्र् में आने पर दुर्योधान बहुत प्रसन्न हुआ। वह पितामह के जाने का दु:ख भूल गया। कर्ण से विचार-विमर्श के बाद द्रोणाचार्य को सेनापति बनाया गया। द्रोणाचार्य ने पाँच दिन तक सेनापतित्व किया। वृद्ध द्रोणाचार्य सात्यकि, भीम, अर्जुन, धाृ्यद्युम्न, द्रुपद, काशिराज जैसे सुविख्यात वीरों से अकेले ही भिड़ जाते थे।
दुर्योधान ने सोचा यदि युधिाञ्रि को जीवित पकड़ लिया जाए तो हमारी जीत निश्चित है। उसने द्रोणाचार्य से युधिाञ्रि को जीवित पकड़ कर लाने को कहा।
दुर्योधान युधिाञ्रि को जीवित पकड़ना इसलिए चाहता था कि एक तो युद्ध शीघ्र समाप्त हो जाएगा। युधिाञ्रि को थोड़ा-सा राज्य देकर संधिा कर लेंगे और फिर जुआ खेलकर सहज ही वापिस ले लेंगे। द्रोणाचार्य को दुर्योधान का उद्देश्य अच्छा नहीं लग रहा था किन्तु एक सन्तोष था कि युधिाञ्रि के प्राण न लेने का बहाना मिल गया।
द्रोणाचार्य ने युधिाञ्रि को जीवित पकड़ने की प्रतिज्ञा कर ली। यह जानकर पांडव-पक्ष युधिाञ्रि की रक्षा में लग गया। ‘युधिाञ्रि पकड़े गए’, ‘युधिाञ्रि पकड़े गए’ की आवाज़ से कुरुक्षेत्र् का मैदान गूँज उठा। इतने में यकायक अर्जुन उधार आ पहुँचा। अर्जुन ने भयंकर बाण वर्षा की जिससे आचार्य को पीछे हटना पड़ा। जीवित पकड़ने की इच्छा पूरी न होने से कौरव निराश हो उठे। संधया होते ही ग्यारहवें दिन का युद्ध समाप्त हो गया।

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