7 Hindi Chapter 18 संघर्ष के कारण मैं तुनकमिजाज हो गया धानराज

Chapter Notes and Summary
हॉकी के सुप्रसिद्ध खिलाड़ी धानराज पिल्लै जब 35 साल के हो गए तो उनका साक्षात्कार विनीत पाण्डे्य ने लिया। इस साक्षात्कार से धानराज पिल्लै के जीवन के जुड़े अनेक पहलुओं की जानकारी मिलती है। पिल्लै का पुणे से मुम्बई के हीरानंदानी पवई काम्पलैक्स तक का सफर बहत लम्बा व कष्टपूर्ण रहा है। पिल्लै के दोनों भाई हॉकी खेलते थे पर गरीबी के वजह से हॉकी खरीदने की हैसियत नहीं थी। उन्हीं से पिल्लै को शौक लगा। वह साथियों से उधार लेकर काम चलाते थे। उन्हें पहली स्टिक तब मिली जब उनके बड़े भाई को भारतीय कैम्प के लिए चुना गया। तब उन्होंने ‘पिल्लै’ को अपने पुरानी हॉकी दे दी।
पिल्लै ने अपनी जूनियर राष्ट्रीय हॉकी 16 वर्ष की आयु में 1985 में मणिपुर में खेली। 1986 में उन्हें सीनियर टीम में डाल दिया गया और वह मुम्बई चले आए। उस साल उन्होंने व उनके बड़े भाई रमेश ने बेहतरीन खेल खेले। इसी के चलते 1988 के ओलम्पिक के लिए नेशनल कैम्प का बुलावा जरूर आएगा ऐसी उनको उम्मीद थी। 57 खिलाड़ियों की लिस्ट में उनका नाम नहीं था जिससे उन्हें बड़ी मायूसी हुई।
मगर एक साल बाद ही 1989 में ऑलविन एशिया कप के कैम्प के लिए उन्हें चुन लिया गया। धानराज पढ़ने में एकदम फिसड्डी थे। वे दसवीं से आगे नहीं पढ़ सके। अभावग्रस्त जीवन के कारण वह बचपन से ही तुनकमिजाज हो गए। जिंदगी में हर छोटी-बड़ी चीज के लिए जूझना पड़ा, इसलिए वह चिड़चिड़े हो गए थे।
सबसे ज्यादा प्रेरणा उन्हें अपनी माँ से मिली। वह चाहे भारत में रहे या विदेश में, सोने से पहले अपनी माँ से जरूर बात करते, उनकी सबसे बड़ी भाभी कविता भी उनके लिए माँ की तरह थी।
उनके पास सबसे पहली कार एक सेकेंड हैंड महिंद्रा अरमाडा थी, जो उन्हें उनके पहले के इम्प्लॉयर (महिंद्रा ग्रुप) ने दी थी। विदेश में खेलने से जो कमाई हुई उससे उन्होंने 1994 में पुणे के भाऊ पाटिल रोड पर दो बेडरूम का एक छोटा-सा “लैट खरीदा। सन् 1999 में महाराष्ट्र सरकार ने पवई में एक “लैट दिया। जिसे खरीदने की उनकी खुद की हैसियत नहीं हो पाती।
पिल्लै कहते हैं कि मैं काला हूँ बदसूरत हूँ, शायद रंग-रूप के कारण या अलग-अलग रहने की वजह से लोग मुझे घमण्डी कहते हैं। राष्ट्रपति से मिलने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि वे हॉकी की वजह से कितने खास हैं। जैकी श्राफ और नाना पाटेकर जैसे सितारे भी जबरदस्त हॉकी प्रेमी हैं। एक बार प्रेम चौपड़ा ने उनके खेल के स्टाइल की नकल उतारी थी। एक दफा तो रेखा आकर उनके बगल में बैठ गईं और कहा तुम्हारे बारे में बहुत कुछ पढ़ा है। इससे वह इतने उत्साहित हो गए कि सोचने लगे वाह री किस्मत! इतनी बड़ी कलाकार ने मेरे बगल में बैठना पसंद किया।

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