7 Hindi Chapter 11 द्रौपदीस्वयंवर

Chapter Notes and Summary
जिस समय पांडव एकचक्रा नगरी में ब्राह्मण के रूप में रह रहे थे, उसी समय मालूम हुआ कि पाँचाल-नरेश द्रुपद अपनी पुत्री द्रौपदी का स्वयंवर कर रहे हैं। पाण्डव भी माता वुंळती के साथ पांचाल देश में पहुँचकर एक कुम्हार की झोंपड़ी में ब्राह्मण वेश में रहने लगे। इस वेश में
कोई उनको पहचान नहीं पाता था। स्वयंवर-मंडप में दूर-दूर से अनेक वीर आए थे। धाृतराष्ट्र के सभी पुत्र्, कर्ण, श्रीस्रष्ण, शिशुपाल, जरासंधा, शल्य जैसे प्रसिद्ध वीर उपस्थित थे। पाँचों पांडव भी ब्राह्मणों के मधय जाकर बैठ गए। राजा द्रुपद ने घोषणा की कि जो लक्ष्य का बेधान करेगा, द्रौपदी उसी के गले में वरमाला डालेगी। काफी ऊँचाई पर सोने की एक मछली टाँगी थी। उसके नीचे तेजी से एक यंत्र् घूम रहा था जिसे वहाँ रखे एक बड़े भारी धानुष से बींधाना था।
स्वयंवर-मंडप में अपने भाई धाृष्टुद्युम्न के साथ द्रौपदी ने प्रवेश किया, इसके बाद एक-एक करके राजकुमार उठते और धानुष पर डोरी चढ़ाते, हारते और अपमानित होकर लौट जाते। कितने ही सुप्रसिद्ध वीरों को इस तरह मुँह की खानी पड़ी। शिशुपाल, जरासंधा, शल्य व दुर्योधान जैसे पराक्रमी राजकुमार तक असफल हो गए। जब कर्ण की बारी आई, तो सभा में एक लहर-सी दौड़ गई। सबने सोचा, अंग-नरेश जरूर सफल हो जाएँगे। कर्ण ने धानुष उठाकर खड़ा कर दिया और तानकर प्रत्यंचा भी चढ़ानी शुरू कर दी। डोरी के चढ़ाने में अभी बालभर की ही कसर रह गई थी कि इतने में धानुष का डंडा उसके हाथ से छूट गया तथा उछलकर उसके मुँह पर लगा। अपनी चोट सहलाते हुए कर्ण अपनी जगह पर जा बैठे। इसके बाद ब्राह्मण में से एक तरुण उठा। उसने धानुष पर डोरी चढ़ाई, बाण साधा और पाँच बाण लक्ष्य की ओर मारे।
लक्ष्य टूटकर नीचे गिर पड़ा। सभा में कोलाहल मच गया। बाजे बज उठे। राजकुमारी द्रौपदी ने वरमाला अर्जुन के गले में डाल दी। युधिाष्ठिर, नकुल, सहदेव समाचार देने माँ के पास चले गए। भीम जानबूझकर रुका रहा। कुछ राजकुमारों ने शोर-शराबा किया। श्रीस्रष्ण, बलराम व कुछ अन्य राजाओं ने विप्लव करने वाले राजाओं को शान्त किया। भीम और अर्जुन द्रौपदी को लेकर कुम्हार की कुटिया की ओर चल दिए।
द्रुपद-पुत्र् धाृष्टद्युम्न ने भी चुपके से भीम-अर्जुन व द्रौपदी का पीछा किया। कुम्हार की कुटिया में पाँचों भाइयों एवं वुंळती को देखकर उसने लौटकर राजा द्रुपद को बताया कि बहन द्रौपदी उस युवक की मृगछाला पकड़कर जब जाने लगी, तो मैं भी उनके पीछे हो लिया। वे एक कुम्हार की झोंपड़ी में जा पहँुचे। वहाँ अग्नि-शिखा की भाँति एक तेजस्वी स्त्री बैठी हुई थी और उनके मधय जो बातें हुई उनसे मुझे ज्ञात हुआ कि वे अवश्य ही वारणावत के लाक्षागृह से बचकर आए पाण्डव हैं। यह सत्य जानकर द्रुपद को अत्यधिाक प्रसन्नता हुई। उन्होंने पाण्डवों को महल में बुलाकर वास्तविकता ज्ञात की। द्रुपद अर्जुन को अपने दामाद के रूप में पाकर बहुत प्रसन्न था। तब वुंळती की आज्ञा से द्रौपदी का विवाह पाँचों पाण्डवों से हो गया।

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