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7 भाषा कौशल (Language Hindi & Pedagogy CTET & TET Exams)

7 भाषा कौशल

भाषा कौशल
मनुष्य अपने भावों एवं विचारों की अभिव्यक्ति बोलकर या लिखकर करता है तथा दूसरों के विचारों को सुनकर या पढ़कर ग्रहण करता है। ये चारों क्रियाएँ (सुनना, बोलना, पढ़ना, लिखना) भाषा से जुड़ी हैं। इन क्रियाओं के प्रयोग की क्षमता को भाषा कौशल के नाम से जाना जाता है। इनका विकास भाषा शिक्षण का मुख्य लक्ष्य होता है। भाषा कौशल चार प्रकार के हैं:
(1) श्रवण-कौशल
(2) मौखिक अभिव्यक्ति कौशल
(3) पठन कौशल
(4) लेखन कौशल
भाषायी कौशलों के शिक्षण का महत्त्व
भाषायी कौशलों के विकास द्वारा बालक को सहज अभिव्यक्ति हेतु सक्षम बनाया जाता है।
► इसके द्वारा छात्र के व्यक्तित्व का विकास होता है।
► सुनकर या पढ़कर सही अर्थ को समझने की शक्ति का विकास होता है।
► बालक को लिपि का ज्ञान होने से वह अपनी अभिव्यक्ति मौखिक भाषा के साथ-साथ लिखित भाषा में भी कर सकता है।
► सही अर्थ समझने तथा बोलने से छात्र का आत्मविश्वास बढ़ता है।
भाषा कौशल तथा उनका शिक्षण
श्रवण-कौशल: सुनकर अर्थ को समझने की क्षमता ही श्रवण-कौशल है। इसके बाद ही अन्य भाषायी कौशलों का विकास होता है। किसी व्यक्ति द्वारा जब बोलकर भाव तथा विचार प्रकट किए जाते हैं, तो हम सुनकर उन भावों तथा विचारों को ग्रहण करते हैं, यही प्रक्रिया ‘श्रवण कौशल’ कहलाती है।
श्रवण-कौशल के उद्देश्य
श्रोता में सुनकर अर्थ ग्रहण करने की भावना का विकास करना।
► श्रोता में मूल ध्वनियों एवं ध्वनि समूहों में अन्तर करने की योग्यता का विकास करना।
► श्रोता में धैर्यपूर्वक सुनने की आदत का विकास करना।
► श्रवण की जाने वाली सामग्री का अर्थ ग्रहण करने की योग्यता का विकास करना।
► भावों और तथ्यों का मूल्यांकन कर सकने की क्षमता विकसित करना।
► श्रोता में सुनने की तत्परता व ध्यान।
► भाशा तथा साहित्य जगत के प्रति रूचि उत्पन्न करना।
► श्रवण की जाने वाली सामग्री के भावाभिव्यक्ति के ढ़ंग को समझ सकने की क्षमता का विकास करना तथा इस सामग्री को आवश्यकतानुसार अपने दैनिक जीवन में प्रयोग करने की दक्षता का विकास करना।
श्रवण-कौशल की शिक्षण विधियाँ
श्रवण-कौशल शिक्षण की मुख्य विधियाँ निम्न हैं-
(1) प्रश्नोत्तर विधि
(2) कहानी के द्वारा शिक्षण
(3) श्रुतलेख विधि
(4) भाषण विधि
(5) दृश्य-श्रव्य सामग्री का प्रयोग
प्रश्नोत्तर विधि: अध्यापक द्वारा छात्रों से उनके दैनिक जीवन और विषय पर आधारित प्रश्न पूछने से यह पता चलता है कि छात्र कक्षा में ध्यान से सुन रहे हैं या नहीं।
कहानी सुनना और सुनाना: बच्चों को कहानियाँ पसंद होती हैं। कक्षा में कहानी सुनाने से छात्रों का ध्यान पूर्णत: कक्षा में लाया जा सकता है। वे धैर्यपूर्वक शिक्षक की बात सुनते हैं, जिससे उनकी श्रवण शक्ति का विकास होता है।
श्रुतलेख: इस विधि के माध्यम से श्रवण तथा लेखन दोनों कौशलों का विकास एक साथ होता है। इसमें छात्र – अध्यापक द्वारा बोले गए शब्दों तथा वाक्यों को सुनकर लिखते हैं।
भाषण: जब हम कोई भाषण सुनते हैं, तो उसके अर्थ को भी ग्रहण करते हैं। इस प्रकार यह विधि श्रवण-कौशल के विकास में सहायक होती है।
दृश्य-श्रव्य सामग्री का प्रयोग: भाषा शिक्षण में दृश्य-श्रव्य सामग्री का प्रयोग शिक्षण को रुचिकर बनाता है, जिससे छात्र ध्यान से विषय को सुनते हैं और ग्रहण करते हैं। विभिन्न प्रकार के साधनों द्वारा छात्रों के श्रवण कौशल का विकास किया जाता है। जैसे: रेडियो, चलचित्रों तथा दूरदर्शन के प्रयोग द्वारा इन विधियों का प्रयोग करके श्रवण-कौशल का विकास किया जा सकता है।
मौखिक अभिव्यक्ति कौशल शिक्षण
मौखिक अभिव्यक्ति: व्यक्ति द्वारा बोलकर अपने विचार या भावनाओं को व्यक्त करना मौखिक अभिव्यक्ति कहलाता है।
मौखिक अभिव्यक्ति कौशल के शिक्षण की विधियाँ
बालक की मौखिक अभिव्यक्ति को स्पश्ट, सहज, मधुर तथा प्रभावशाली बनाने के लिए अध्यापक निम्न शिक्षण विधियों का प्रयोग भाषा की कक्षा में कर सकता है।
(1) वार्तालाप
(2) प्रश्नोत्तर
(3) चित्र-वर्णन
(4) कहानियों के द्वारा शिक्षण
(5) कविताओं के द्वारा
(6) वाद-विवाद
(7) अनुच्छेद-सार
(8) भाषण
(9) नाटक मंचन के द्वारा
वार्तालाप: भाषा शिक्षण के दौरान शिक्षक को चाहिए कि वह बच्चों से विषय पर आधारित बातचीत करें। बच्चों को उनके विचार बताने के लिए प्रेरित करें। परस्पर बातचीत में छात्र जब अपने विचारों को स्वतंत्र रूप से प्रस्तुत करते हैं, तब उनकी मौखिक अभिव्यक्ति का विकास तेजी से होता है।
प्रश्नोत्तर: अध्यापक द्वारा प्रश्नों को पूछने तथा छात्रों द्वारा उसका उत्तर देने के लिए मौखिक भाषा प्रयोग में लायी जाती है। शिक्षक को भाषा की कक्षा में प्रश्नोत्तर विधि का प्रयोग करना चाहिए। यह विधि छात्रों का ध्यान विषय की तरफ लाने में सहायक होती है तथा मौखिक अभिव्यक्ति को भी सुदृढ़ करती है।
चित्र-वर्णन: चित्रों के माध्यम से भाषा के शिक्षण को रुचिकर बनाया जा सकता है। प्राथमिक स्तर पर बच्चे चित्रों को देखकर उसका वर्णन आसानी से कर सकते हैं। वर्णन के दौरान उनके द्वारा मौखिक भाषा प्रयोग में लायी जाती है, जो मौखिक अभिव्यक्ति के विकास में सहायक होती है।
कहानी सुनना और सुनाना: प्राथमिक स्तर पर बच्चे कहानी सुनने में रुचि लेते हैं। यह विधि श्रवण-कौशल और मौखिक अभिव्यक्ति कौशल दोनों का एक साथ विकास करने में शिक्षक की सहायता करती है। इस विधि में अध्यापक कक्षा में पाठ पर आधारित कहानी सुनाता है। जब छात्र कहानी को सुनकर उसे अपनी भाषा में शिक्षक को सुनाते हैं, तो इस क्रिया द्वारा उनके मौखिक कौशल का विकास होता है।
कविता-पाठ: कविताओं द्वारा प्राथमिक स्तर पर भाषा शिक्षण को रुचिकर बनाया जा सकता है। बच्चे लयात्मक ध्वनियों, गीतों, कविताओं को सुनना पसंद करते हैं और उन्हें ये गीत और कविता बार-बार सुनने-बोलने से याद भी हो जाती है। शिक्षक को चाहिए कि छात्रों की इस रुचि का प्रयोग शिक्षण विधि में करें।
अनुच्छेद सार: छात्रों के द्वारा अनुच्छेदों को पढ़कर उन्हें अपने शब्दों में व्यक्त करने से उनकी मौखिक अभिव्यक्ति का विकास होता है।
वाद-विवाद: यह विधि मौखिक अभिव्यक्ति को स्वतंत्र रूप से विकसित करती है। वाद-विवाद विधि में छात्र मौखिक भाषा के माध्यम से अपने विचारों को प्रस्तुत करता है। इसके द्वारा बालक की मौखिक अभिव्यक्ति को तर्क का आधार भी मिलता है। इस विधि के प्रयोग से अध्यापक सुगमता से छात्रों के विचारों को समझ लेता है।
भाषण विधि: भाषण मौखिक अभिव्यक्ति के विकास में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस विधि में छात्र को अध्यापक द्वारा विषय देकर उस पर बोलने के लिए कहा जाता है। किसी विषय पर कक्षा या स्कूल के समारोह में सभी छात्रों के सामने बोलने से बालक का आत्मविश्वास भी बढ़ता है। जब छात्र भाषण का अभ्यास बोलकर करता है, तो उसकी मौखिक अभिव्यक्ति का भी विकास होता है।
नाटक का प्रयोग: नाटक मंचन में मौखिक भाषा का प्रयोग किया जाता है। यह विधि छात्र के मौखिक अभिव्यक्ति का विकास पूर्णरूप से करने में सहायक होती हैं। छात्र इस विधि में ध्यान लगाकर मौखिक अभिव्यक्ति के विशेष रूपों को सीखते हैं।
पठन कौशल (सस्वर वाचन, मौन वाचन)
पठन कौशल: किसी विषय-वस्तु को पढ़कर उसके अर्थ को समझने की क्षमता पठन कौशल कहलाता है।
यह दो प्रकार के हैं:
(1) सस्वर वाचन
(2) मौन वाचन
पठन कौशल के प्रकार तथा विधियाँ
सस्वर वाचन: बोलकर पढ़ते समय अर्थ को पहचानना या समझना सस्वर वाचन कहलाता है। भाषा शिक्षण के प्रारम्भ में वर्णों का सस्वर वाचन करा कर बच्चों को वर्णों की पहचान कराई जाती है।
सस्वर वाचन के गुण
शुद्ध उच्चारण, उचित ध्वनि निर्गम, उचित बल एवं विराम, उचित लय एवं गति, उचित हाव-भाव, उचित वाचन मुद्रा, स्वर माधुर्य, प्रभाविकता, स्वाभाविकता इत्यादि सस्वर वाचन के गुण होते हैं।
सस्वर वाचन के उद्देश्य: सस्वर वाचन के उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
(1) प्रारम्भिक स्तर पर छात्रों को लिपि का ज्ञान कराना।
(2) छात्रों के उच्चारण को शुद्ध करना।
(3) छात्रों को उचित लय गति तथा आरोह-अवरोह के साथ पढ़ने में सक्षम बनाना।
(4) छात्रों की पठन योग्यता को विकसित करके उनकी सामाजिक योग्यता को बढ़ाना।
(5) छात्रों को कविता के भाव और रस समझने के योग्य बनाना।
(6) पढ़कर विषय-वस्तु का अर्थ समझने के योग्य बनाना। मौन वाचन: भाषा के लिखित रूप को बिना बोले पढ़कर अर्थ समझने की प्रक्रिया को मौन वाचन कहते हैं। इस विधि में आँख और मस्तिष्क के तालमेल द्वारा अर्थग्रहण की प्रक्रिया पूर्ण होती है।
मौन वाचन का उद्देश्य
स्वयं अध्ययन के विकास को बल देना
► बोलने के प्रति रुचि का विकास करना
► तेजी से पढ़कर अर्थ समझने की शक्ति का विकास
पठन कौशल शिक्षण की विधियाँ
पठन या वाचन कौशल का शिक्षण बालक को अपने ज्ञान की वृद्धि करने में सहायता प्रदान करता है। पठन कौशल का विकास एक क्रम में होता है, जिसमें सबसे पहले बालक को वर्णों, संकेतों का परिचय कराया जाता है। वर्णों की पहचान के बाद ही बालक पठन की क्रिया प्रारम्भ कर सकता है। पठन कौशल के शिक्षण के अंतर्गत बच्चों को वाचन के लिए तैयार करना शामिल है।
अक्षर-ज्ञान करने की निम्न विधियाँ
वर्णोंच्चारण विधि: अध्यापक द्वारा लिखे वर्णों का छात्रों द्वारा उच्चारण किया जाता है। इस विधि में पहले वर्ण फिर मात्राओं की शिक्षा दी जाती है।
अक्षर ज्ञान विधि: इस विधि में वर्णमाला के अक्षरों का बोध क्रम में कराया जाता है। व्यंजन की शिक्षा स्वर की शिक्षा के बाद दी जाती है। इस विधि में वर्णों पर आधारित चित्रों या संज्ञात्मक शब्दों के माध्यम से बालकों को अक्षरों का बोध कराया जाता है।
ध्वनि साम्य विधि: इस विधि में एक समान ध्वनि करने वाले शब्दों के माध्यम से छात्रों को वर्णों का ज्ञान दिया जाता है; जैसे-नमक:दमक, कल:बल, धन:मन इत्यादि।
वर्णन विधि: इस विधि में शब्दों पर आधारित चित्र दिखा कर शिक्षा दी जाती है। चित्र के नीचे उसका नाम अंकित होता है। चित्रों को देखकर बच्चे आसानी से शब्दों के साथ ताल-मेल बना पाते हैं।
वाक्य-विधि: इस विधि में अध्यापक द्वारा लिखे हुए वाक्य को पढ़ा जाता है और फिर छात्र, अध्यापक का अनुकरण कर वाक्य में आये शब्दों को सीखते हैं।
कहानी-कविता के द्वारा: रुचि के साथ अक्षरों और वर्णों का बोध करने में यह विधि सहायक होती है।
संयुक्त विधि के द्वारा: उपर्युक्त लिखित सभी विधियों के कुछ गुण और कुछ दोष होते हैं। इन विधियों के अच्छे गुणों का एक साथ प्रयोग करके शिक्षण को रुचिकर बनाना संयुक्त विधि कहलाती है।
पठन सम्बन्धी त्रुटियाँ
► अशुद्ध उच्चारण।
► पढ़ते समय अटक-अटक कर पढ़ना या
पढ़ते समय गति का अभाव।
► पढ़ते समय अनुचित मुद्राएं, पुस्तक को
आँखों के पास या दूर रखना।
► पाठ्य-सामग्री का कठिन होना।
► संयुक्ताक्षरों सम्बन्धी त्रुटियाँ।
► दृश्टि दोश के कारण अक्षरों का ठीक से
दिखाई न देना।
► पठन सम्बन्धी मार्ग-दर्शन का अभाव।
► भावानुकूल आरोह-अवरोह का अभाव।
► अध्यापक का व्यवहार।
पठन सस्वर वाचन व्यक्तिगत वाचन ( शिक्षक का आदर्श वाचन)
सामूहिक वाचन (छात्रों द्वारा समूह में किया जाने वाला वाचन)
लेखन कौशल तथा इसके उद्देश्य
लेखन कौशल: लिखकर अपने भावों को अभिव्यक्त करने की क्षमता को लेखन कौशल कहते हैं।
लेखन कौशल का शिक्षण: कभी-कभी मनुष्य जिन बातों को किसी कारणवश बोलकर अभिव्यक्त नहीं कर पाता, तो वह उन बातों को लिखित भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त कर सकता है। इसके लिए लिपि ज्ञान होना आवश्यक है। लेखन-कौशल शिक्षण के अंतर्गत लिपि का ज्ञान तथा उसके प्रयोग का शिक्षण दिया जाता है।
लेखन कौशल की शिक्षण विधियाँ
कुछ रोचक कार्यों के माध्यम से प्राथमिक अवस्था में बालकों को लिखने के लिए तैयार किया जा सकता है। कक्षा का वातावरण चार्टों द्वारा रुचिपूर्ण करके, जमीन या बालू पर उँगलियों के द्वारा वर्ण बिन्दुओं को जोड़कर, वर्ण बनाकर दिखाना, खेल-खेल में वर्णों को लिखने का ज्ञान देकर इत्यादि।
अनुकरण विधि: इस विधि में अध्यापक द्वारा लिखे वर्णों का छात्रों द्वारा लिखकर अनुकरण किया जाता है और इस प्रकार वर्णों की रचना सीखते हैं।
संश्लेषणात्मक विधि: इस विधि के अंतर्गत रेखाओं को मिलाकर वर्णों की रचना सिखाई जाती है। छात्र पहले रेखाओं का निर्माण सीखते है, फिर उन रेखाओं को मिलाकर वर्ण का निर्माण सीखते हैं। इस विधि को रेखा विधि के नाम से भी जाना जाता है।
पेस्टालॉजी की रचनात्मक प्रणाली: इस विधि में अक्षरों को टुकड़ों में तोड़कर उन्हें छात्रों की सहायता से वापस जोड़कर वर्णों की रचना सिखाई जाती है।
माण्टेसरी विधि: यह विधि श्रीमती माण्टेसरी द्वारा दी गयी है जो तीन वर्ष के बच्चों को लिखना सिखाने का प्रस्ताव देती है। यह विधि उँगलियों के प्रयोग पर आधारित होती है। इसमें लिखे शब्द पर पेन्सिल चलाने का अभ्यास कराके छात्र को स्वतंत्र लेखन के लिए प्रेरित किया जाता है।
सुलेख: यह लेखन कौशल को प्रभावी बनाने के लिए प्रयोग में लायी जाती है। इसमें पहले से लिखे हुए गद्यांशो को देखकर लिखने का अभ्यास कराया जाता है।
लेखन कौशल शिक्षण का उद्देश्य
बच्चों की लिखावट को सही कराना।
► बच्चों को अक्षरों की सही समझ कराना।
► छात्रों को विराम चिह्नों के प्रयोग का ज्ञान देने के साथ उनका उचित प्रयोग सिखाना।
► लेखन में सही मुहावरे, सूक्ति, लोकोक्ति का प्रयोग सिखाते हुए उनके लेखन को प्रभावशाली बनाना।
► छात्रों को लिखित अभिव्यक्ति के योग्य बनाना।
► लेखन कार्यों में छात्र की रुचि जगाना।
► छात्र में साहित्य के प्रति सकारात्मक सोच का विकास कराना।

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