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6 भाषायी विविधता वाले कक्षा-कक्ष की समस्याएँ (Language Hindi & Pedagogy CTET & TET Exams)

6 भाषायी विविधता वाले कक्षा-कक्ष की समस्याएँ

भाषा-शिक्षण की चुनौतियाँ
हिन्दी भाषा की शिक्षा देते समय शिक्षक को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इन चुनौतियों का समाधान करके शिक्षक अपने शिक्षण को प्रभावी और छात्र केन्द्रित बनाता है।
विभिन्न भाषिक परिवेश: एक कक्षा में विभिन्न भाषिक पृश्ठभूमि के छात्र होते हैं। प्राथमिक स्तर पर शिक्षक द्वारा एक भाषा माध्यम से पढ़ाना निश्चय ही चुनौतीपूर्ण कार्य है। विद्यार्थियों के परिवेश का प्रभाव उनके उच्चारणों में स्पश्ट रूप से दिखाई देता है।
विद्यार्थी की मानसिक समस्या: भय और संकोच के कारण विद्यार्थी का भाषा अधिगम प्रभावित होता है। भय और संकोच के कारण ही, वे कक्षा में अपनी समस्या शिक्षक को नहीं बता पाते।
विद्यार्थियों का मानसिक स्तर: विद्यार्थियों के मानसिक स्तर को परखे बिना विद्यार्थियों की प्रोन्नति अगली कक्षा में कर देना शिक्षक के लिए बड़ी चुनौती है। इस दशा में शिक्षक यह निर्धारित नहीं कर पाता कि विद्यार्थी की शिक्षा कहाँ से शुरू की जाये। इस अवस्था में विद्यार्थी का अपेक्षित पूर्वज्ञान शैक्षिक स्तर के अनुकूल नहीं होता।
विद्यार्थी की शारीरिक समस्या: कक्षा में कुछ ऐसे विद्यार्थी भी होते हैं, जिन्हें बोलने और सुनने में समस्या होती हैं। ये शारीरिक दोष भाषिक कौशलों के विकास में बाधक होते हैं, जिसके कारण भाषा-शिक्षक को पढ़ाने में कठिनाई होती है।
वर्तनी सम्बन्धी त्रुटियाँ: कक्षा में छात्रों की कॉपी आदि जाँच करते समय अक्सर यह देखा जाता है कि कुछ छात्रों की कॉपियों में वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियाँ होती हैं। शिक्षकों को छात्रों के वर्तनी की ओर भी अधिक ध्यान देने की आवश्यकता होती है।
शिक्षण सम्बन्धी कुछ विकार: सामान्य बुद्धिलब्धि होने के बावजूद भी कुछ विद्यार्थियों को भाषा सीखने में समस्या होती है। इन समस्याओं को शिक्षण सम्बन्धी विकार के रूप में वर्र्गीकृत किया गया है। ये विकार निम्न हैं:
(क) डिस्ग्राफिया: यह लेखन कौशल से सम्बन्धित विकार है। इस विकार से ग्रसित बच्चों की मौखिक अभिव्यक्ति सामान्य होती है, परन्तु लिखित अभिव्यक्ति में गलतियाँ पाई जाती हैं। इस विकार में विद्यार्थी दूसरों की नक़ल करके लिखने में भी गलतियाँ करते हैं।
(ख) डिस्लेक्सिया: यह पठन कौशल से सम्बन्धित विकार है। इसमें विद्यार्थी को एक समान दिखने वाले अक्षरों को पढ़ने तथा समझने में परेशानी होती है। इस विकार में विद्यार्थी वर्णों को व्यवस्थित करके शब्दों के निर्माण में कठिनाई महसूस करता है।
(ग) डिस्कैल्कुलिया: इस विकार से ग्रस्त छात्रों को गणित विषय समझने में परेशानी होती है। उन्हें अंकों को पहचानने में परेशानी होती है।
(घ) मंदबुद्धि: कक्षा में सभी छात्रों का बौद्धिक स्तर भिन्न होता है। कुछ छात्र पढ़ने में बहुत तेज़ तथा कुछ कमज़ोर होते हैं। छात्रों का बुद्धिमान या मंदबुद्धि होना अनुवांशिकता के आधार पर हो सकता है। मंदबुद्धि छात्र भी कक्षा का हिस्सा होते हैं। अत: शिक्षकों को उनके लिए कुछ ऐसे प्रयास करने चाहिए, जिससे उन्हें विषयों को समझने में आसानी हो। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक वैश्लर ने बुद्धि का परीक्षण इस प्रकार किया है-
तालिका: बुद्धिलब्धि परीक्षण
बुद्धिलब्धि छात्रों के प्रकार
130 या इससे अधिक अति बुद्धिमान
120–129 बुद्धिमान
110–199 औसत से थोड़ा अधिक
90–109 औसत
80–89 औसत से कुछ कम
70–79 मंदबुद्धि तथा औसत से कम की सीमा पर (Border line)
69 या इससे कम मंदबुद्धि
► (यह सारणी वैश्लर द्वारा प्रकाशित तृतीय संस्करण (1997) पर आधारित है।)
► (औसत से थोड़ा कम या अधिक प्रथम संस्करण के सामान्य से अधिक तथा कम (Bright and Dull Normal) पर आधारित है। मंदबुद्धि मानसिक अक्षमता पर आधारित है।)
साधन सम्बन्धी समस्या: निम्न साधनों की कमी भाषा शिक्षण को प्रभावित करती है-
चॉक तथा श्यामपट्ट: भाषा की कक्षा में मौखिक कार्यों के साथ-साथ लिखित कार्य भी होते हैं। शिक्षक लिखने के लिए चॉक तथा श्यामपट्ट का प्रयोग करता है। इन दोनों की कमी उसकी शिक्षण प्रक्रिया को बाधित करती है। कभी-कभी कुछ स्कूलों के श्यामपट्ट की पुताई कई महीनों तक नहीं की जाती, जिससे शिक्षक को उस पर लिखने तथा विद्यार्थियों को पढ़ने में कठिनाई होती है।
कक्षा में छात्रों की संख्या: कभी-कभी एक ही कक्षा में 50 से 100
तक बच्चों का दाखिला हो जाता है। इन सभी छात्रों पर एक समान ध्यान देते हुए प्रभावी शिक्षण करना शिक्षक के लिए चुनौतीपूर्ण कार्य है। सामान्य तौर पर कक्षा में 30 से 40 छात्र ही होने चाहिए।
कक्षा की स्थिति एवं प्रकाश: कक्षा में पर्याप्त जगह का होना शिक्षण सहायक गतिविधियों को क्रियान्वित करने में सहायक होता है। अगर कक्षा में जगह की कमी हो, तो शिक्षक नाटक मंचन, खेल जैसी गतिविधियों का प्रयोग कक्षा में नहीं करवा पायेगा। कक्षा में प्रकाश आने की जगह (खिड़कियाँ, दरवाजे) यदि सही दिशा में ना हो, तो श्यामपट्ट पर लिखी विषयवस्तुओं को पढ़ने में विद्यार्थियों को परेशानी होती है।
स्कूल और भाषा शिक्षण: स्कूलों में भाषा शिक्षण की अपेक्षा गणित और विज्ञान की शिक्षा को अधिक महत्व दिया जाता है। समय-सारिणी में भाषा कक्षा की अवधि तथा सप्ताह में इसकी आवृत्ति कम होती है, इसकी वजह से विद्यार्थी भाषा के महत्व को नहीं समझ पाते।
हिंदी शिक्षण तथा बहुभाषिकता
बहुभाषिकता: एक या एक से अधिक भाषा को सहजता के साथ बोलने वाले सक्षम व्यक्ति को बहुभाषी कहते हैं। भारत में 100 से ज्यादा भाषाएँ बोली और समझी जाती है। 2001 की जनगणना के अनुसार, भारत में 1300 से अधिक मातृभाषाएं बोली जाती है। बहुभाषिकता हमें अपने वर्ग के अलावा दूसरे देश, प्रदेश के लोगों के साथ विचारों का आदान-प्रदान करने में सक्षम बनाती है। केवल एक भाषा बोलने वाला व्यक्ति अपने गाँव या प्रदेश तक सीमित रह जाता है; जैसे- यदि कोई उत्तर भारतीय व्यक्ति केवल हिंदी जानता है, तो उसे दक्षिण भारतीय व्यक्ति के साथ विचारों के आदान-प्रदान में कठिनाई महसूस होगी।
हिंदी शिक्षण में बहुभाषिकता की जरूरत
कक्षा में कई भाषिक पृश्ठभूमि के बच्चे आते हैं, जो एक ही वस्तु को अलग-अलग नाम से बोलते तथा पहचानते हैं; जैसे- कोई पेड़ को पेर बोलता है, तो कोई बेटे को मोड़ा। अलग- अलग भाषिक पृश्ठभूमि होने के कारण इन बच्चों के उच्चारणों में भिन्नता पाई जाती है। कभी-कभी इन बच्चों का इनके भाषिक पृश्ठभूमि के आधार पर सहपाठियों द्वारा मजाक उड़ाया जाता है, जिससे यह बच्चे अपने आप को कक्षा से अलग पाते हैं। सामान्य बुद्धिलब्धि होने के बाद भी यह बच्चे कक्षा में पीछे हो जाते हैं। इसलिए शिक्षक को कक्षा में बहुभाषिकता का प्रयोग करना चहिए, जिससे सभी छात्रों को एक-दूसरे की भाषा समझने का अवसर मिले तथा वह अपनी मातृभाषा के अलावा अन्य भाषाओं का आदर भी करें।
बहुभाषी कक्षा के गुण
विद्यार्थियों के संज्ञानात्मक विकास में सहायक होती है।
► बच्चों को अन्य भाषाओं के प्रति संवेदनशील बनाती है।
► विद्यार्थियों के शब्द भंडार की वृद्धि में सहायक होती है।
► विभिन्न भाषिक परिवेश से आये हुए विद्यार्थियों को उनकी मातृभाषा के अलावा कई भाषाओं का ज्ञान मिलता है।
► शिक्षक द्वारा विभिन्न भाषा या शब्दों के प्रयोग से सभी छात्र उसकी बातों को भली-भांति समझ पाते हैं और शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया सुचारु रूप से चलती है।
► बच्चों की मातृभाषा या मातृभाषा के शब्दों का प्रयोग यदि शिक्षण में किया जाए, तो विद्यार्थी को विषय की समझ जल्दी हो जाती है।
► विद्यार्थी अपनी मातृभाषा में उन प्रश्नों के उत्तर भी दे पाता है, जिनका उत्तर उसे मानक भाषा में देने में कठिनाई होती है।
► विद्यार्थियों के शब्द भंडार की वृद्धि में सहायक होती है।
► विद्यार्थी अपने विचारों को स्वतंत्र रूप से व्यक्त कर पाते हैं, जिससे उनकी मौखिक अभिव्यक्ति का विकास होता है।
► परस्पर बातचीत के द्वारा भाषा शिक्षण छात्रों के अनुकूल बनता है।
► बच्चों को अन्य भाषाओं के प्रति संवेदनशील बनाती है।
► विभिन्न भाषिक परिवेश से आये हुए विद्यार्थियों को उनकी मातृभाषा के अलावा कई भाषाओं का ज्ञान होता है।
► विद्यार्थियों की मातृभाषा की अवहेलना किए बिना मानक भाषा की शिक्षा दी जाती है।

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