You are here
Home > Books > 6. चीजें जो हम बनाते तथा करते हैं (EVS Environment Studies for CTET & TET in Hindi)

6. चीजें जो हम बनाते तथा करते हैं (EVS Environment Studies for CTET & TET in Hindi)

6. चीजें जो हम बनाते तथा करते हैं

पदार्थ

जिन वस्तुओं में अपना भार होता है तथा जो स्थान घेरती हैं, उन्हें पदार्थ कहते हैं। हमारे आस-पास जितनी भी वस्तुएँ दिखाई देती हैं, उनका कुछ न कुछ भार होता है तथा वे स्थान भी घेरती हैं अर्थात् समस्त वस्तुएँ पदार्थों से मिलकर बनी हुई हैं।

पदार्थ की विभिन्न अवस्थाएँ

मुख्य रूप से पदार्थ की तीन अवस्थाएँ होती हैं। वे हैं: ठोस, द्रव तथा गैस। किसी भी पदार्थ की अवस्था में परिवर्तन करके उसके ताप में परिवर्तन कर किया जा सकता है। जैसे ठोस का ताप परिवर्तित कर द्रव, द्रव का ताप परिवर्तित कर गैस तथा गैस को पुन: द्रव तथा ठोस में बदला जा सकता है। कुछ ऐसे भी ठोस पदार्थ होते हैं, जो बिना द्रव में परिवर्तित हुए सीधे गैस में बदल जाते हैं और गैस से ठोस में। जैसे: मोमबत्ती, कपूर आदि।
ठोस पदार्थ: वे पदार्थ जिनकी आकृति तथा आयतन दोनों सामान्य ताप पर निश्चित रहता है, उन्हें ठोस पदार्थ कहते हैं। जैसे: कॉपी, पेन, कुर्सी, टेबल आदि।
द्रव पदार्थ: वे पदार्थ जिनका सामान्य ताप पर आयतन स्थिर रहता है परंतु वे आकृति बदलते रहते हैं, द्रव पदार्थ कहलाते हैं। जैसे: पानी, तेल, दूध आदि। द्रव पदार्थ को जिस बर्तन में डालते हैं वह उसी बर्तन का रूप ले लेता है परंतु उसका आयतन नहीं बदलता है। जैसे एक गिलास में पानी को लेते हैं। जब उस पानी को गिलास में रखते हैं, तो उसकी आकृति गिलास की तरह होती है और जब उसे बाल्टी में डाल देते हैं, तो बाल्टी के आकार की हो जाती है। परंतु पानी एक ही गिलास रहता है। अर्थात् द्रव की आकृति अनिश्चित तथा आयतन निश्चित होता है।
गैस अवस्था: गैस अवस्था में न तो पदार्थ की आकृति निश्चित होती है और न ही इसका आयतन निश्चित होता है। गैस के कण बहुत दूर-दूर होते हैं। ये एक-दूसरे से स्वतंत्र होते हैं। जैसे: ऑक्सीजन, हाइड्रोजन, हीलियम आदि इसके उदाहरण हैं।

मिश्रण

दो या दो से अधिक पदार्थों को जब आपस में मिलाया जाता है, तो उससे जो नया पदार्थ प्राप्त होता है, उसे मिश्रण कहते हैं। मिश्रण में पदार्थ एक निश्चित अनुपात में नहीं मिले होते हैं। ये द्रव, ठोस तथा गैस अवस्था में पाये जाते हैं। जैसे जल में कई प्रकार के पदार्थ पाये जाते हैं। इसमें हाइड्रोजन, ऑक्सीजन के साथ कई सारी अशुद्धियाँ भी पायी जाती हैं। जैसे: क्लोरीन, आयरन आदि। वायु अनेक गैसों का मिश्रण है। इसमें नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड आदि अनेक गैस उपस्थित होती हैं।

शुद्ध एवं अशुद्ध पदार्थ

शुद्ध पदार्थ: वे पदार्थ जो केवल एक प्रकार के अणुओं से मिलकर बने होते हैं, उन्हें शुद्ध पदार्थ कहते हैं। जैसे चीनी तथा नमक के कण आदि। शुद्ध पदार्थ का अपना एक निश्चित गुण होता है, जो परिवर्तित नहीं होता है। जैसे चीनी मीठी होती है और नमक खारा या नमकीन होता है। पदार्थ की शुद्धता की जांच उसके क्वथनांक, घुलनशीलता, विशिष्ट घनत्व तथा द्रवणांक आदि आधार पर की जाती है।
अशुद्ध पदार्थ: वे पदार्थ जो भिन्न-भिन्न अणुओं से मिलकर बने होते हैं तथा जिनका क्वथनांक, घुलनशीलता, विशिष्ट घनत्व तथा द्रवणांक का मान निश्चित मान से भिन्न हो, अशुद्ध पदार्थ कहलाते हैं। जैसे पानी का क्वथनांक 100C होता है। लेकिन यदि इसमें कोई अन्य पदार्थ मिला दिया जाए तो इसका क्वथनांक 100C से भिन्न हो जाएगा।

पृथक्करण की विधियाँ

मिश्रण में उपस्थित अवयवों को कुछ विशेष गुणों के आधार पर पृथक किया जाता है। इस पृथक्करण की विधियाँ निम्न दी गयी हैं: चुनना: मिश्रण में उपस्थित अवयवों को रंग, आकार, रूप आदि को देखकर अलग किया जा सकता है। इस विधि का अधिकतर प्रयोग तभी किया जाता है जब एक पदार्थ के साथ अन्य पदार्थ कम मात्रा में मिले होते हैं। जैसे चावल में उपस्थित कंकड़, धान, कीडे-मकोड़े आदि को चुन कर अलग कर लिया जाता है।
औसाना: इस विधि का प्रयोग किसान फसलों में उपस्थित धूल, मिट्टी, भूसा आदि को अलग करने में करते हैं। इस विधि में पदार्थों अर्थात्
मिश्रण को एक पात्र में लेकर हवा में कुछ ऊँचाई से गिराते हैं जिससे इसमें उपस्थित अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं।
चालनी: जब किसी मिश्रण के अवयव अलग-अलग आकार के होते हैं तो उन्हें कई छेद वाले पात्र से भी अलग (पृथक) किया जा सकता है। जैसे बालू में उपस्थित कंकड़, आटे में उपस्थित चोकर आदि।
चुंबक द्वारा पृथक्करण: यदि किसी मिश्रण में चुंबकीय पदार्थ अर्थात् लोहे के कण उपस्थित हों, तो उसे चुंबक के द्वारा पृथक किया जा सकता है। मिश्रण में चुंबक को घुमाने से उसमें मिले हुए समस्त लोह पदार्थ चुंबक से चिपककर मिश्रण से पृथक हो जाते हैं।
अवसादन: मिश्रण में उपस्थित धूल, मिट्टी के कणों को पृथक करने के लिए अवसादन का प्रयोग किया जाता है। इस विधि में मिश्रण में जल मिला दिया जाता है जिससे भारी अवयव नीचे तली में बैठ जाते हैं और धूल तथा मिट्टी के कण पानी के साथ बह जाते हैं।
छानना: इस विधि का प्रयोग विभिन्न आकार के अघुलनशील ठोस के कणों को द्रव से पृथक किया जाता है। जैसे चाय बन जाने पर चाय को छानते हैं जिससे द्रव पदार्थ नीचे केतली में और चाय की पत्ती ऊपर छन्नी में पृथक हो जाती है।
वाष्पीकरण: इस विधि का प्रयोग द्रव में घुलनशील ठोस पदार्थों को पृथक करने में किया जाता है। जैसे पानी में धुली चीनी तथा नमक को वाष्पीकरण के द्वारा पृथक किया जा सकता है।
भारण: पानी में उपस्थित धूल तथा मिट्टी के बारीक कणों को पृथक करने के लिए भारण विधि का प्रयोग किया जाता है। जैसे नदी तथा तालाब व झील के पानी में जो बारीक मिट्टी के कण होते हैं, उन्हें नीचे तली में बैठने में काफी समय लगता है क्योंकि इनका भार बहुत हल्का होता है। तब इसे शुद्ध करने के लिए इसमें फिटकरी मिला दी जाती है जिससे फिटकरी पानी में घुलकर धूल, मिट्टी के कणों का भार बढ़ा देती है और वे नीचे तली में बैठ जाती है। इससे पानी साफ दिखाई देने लगता है।
आसवन: पानी को गर्म करके वाश्प रूप में प्राप्त करने तथा वाश्प को पुन: द्रव रूप में प्राप्त करने की प्रक्रिया को आसवन कहते हैं। डॉक्टर दवा में द्रव घोलने के लिए आसवन विधि का प्रयोग करते हैं।

मानव निर्मित वस्तुएँ

मानव ने अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अनेक प्रकार की वस्तुओं का निर्माण किया है। जैसे: ईंधन, उर्वरक, काँच, प्लास्टिक, चुंबक आदि।

ईंधन तथा इनका वर्गीकरण

ईंधन

वे पदार्थ जो वायु की उपस्थिति में जलाने पर ऊष्मा एवं प्रकाश उत्पन्न करते हैं, ईंधन कहलाते हैं। जैसे लकड़ी, कोयला, एलपीजी आदि।

ईंधनों का वर्गीकरण

ईंधन मुख्यत: तीनों रूपों में पाया जाता है: ठोस ईंधन: लकड़ी, कोयला आदि द्रव ईंधन: पेट्रोल, डीजल, केरोसिन गैस ईंधन: प्राकृतिक गैस, कोल गैस आदि अच्छे ईंधन के लक्षण: अच्छा ईंधन सस्ता और सरलता से उपलब्ध होना चाहिए तथा वह प्रदूषण रहित अर्थात् कम से कम धुआँ और राख के साथ-साथ उच्च ऊष्मीय मान वाला होना चाहिए।

प्रमुख उपयोगी ईंधन

कोयला

कोयला मुख्यत: कार्बन, हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन के अणुओं से मिलकर बना होता है। इसमें सल्फर भी बहुत कम मात्रा मौजूद होता है। कोयला वृक्षों के अवशेष से प्राप्त होता है। यह मुख्यत: तीन रूपों में पाया जाता है। जो हैं: भूरा कोयला, बिटुमिनस कोयला तथा एंथ्रेसाइट। सबसे उत्तम किस्म का कोयला एंथ्रेसाइट होता है। कोयले को हवा की अनुपस्थिति में जलाने पर कोक की प्राप्ति होती है तथा भंजक आसवन विधि द्वारा कोयला से कोलतार भी प्राप्त किया जाता है।

प्राकृतिक गैस

प्राकृतिक गैस में मुख्यत: मीथेन 4 (cH ) पाया जाता हैं। मीथेन का प्रयोग कारखानों में किया जाता है। यह आसानी से जलता है। मीथेन हाइड्रोजन गैस प्राप्त करने का अच्छा साधन है। जिससे प्रयोग खाद्य का निर्माण करने में किया जाता है।

तरल पेट्रोलियम गैस

तरल पेट्रोलियम गैस ब्यूटेन गैस का द्रव रूप है। ब्यूटेन गैस को उच्च दाब देकर द्रव में परिवर्तित किया जाता है तथा एक सिलेंडर में भर दिया जाता है। इसका प्रयोग घरों में भोजन पकाने हेतु किया जाता है। इसके रिसाव का पता लगाने के लिए इसमें एक दुर्गन्धयुक्त पदार्थ एथिल मर्केप्टन मिला दिया जाता है। यह अत्यंत ज्वलनशील पदार्थ है और आग बहुत तेजी से पकड़ता है।

कोल गैस

कोल गैस एक विशेष गंध वाली रंगहीन गैस होती है, जो वायु के साथ मिलकर विस्फोटक पदार्थ का निर्माण करती है। इसे कोयले के भंजक आसवन विधि द्वारा प्राप्त किया जाता है।

जल गैस

जल गैस, कार्बन मोनोऑक्साइड एवं हाइड्रोजन का मिश्रण होता है जिसे लाल तप्त कार्बन पर जलवाष्प प्रवाहित करके प्राप्त किया जाता है। इस गैस की खोज स्वीडन के शीले नामक वैज्ञानिक ने 1972 में की थी। इसका प्रयोग अमोनिया एवं मेथिल एल्कोहल के उत्पादन में किया जाता है। इस गैस से अत्यधिक मात्रा में ऊष्मा की प्राप्ति होती है।

प्रमुख ईंधनों के मुख्य अवयव

ईंधन मुख्य अवयव
कोयला कार्बन तथा कार्बन के यौगिक प्राकृतिक गैस मीथेन, एथेन, प्रोपेन, ब्यूटेन पेट्रोलियम हाइड्रोकार्बन केक कार्बन एलपीजी ब्यूटेन, प्रोपेन, आइसो-ब्यूटेन जल गैस कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रोजन

काँच

काँच एक अक्रिस्टलीय, भंगुर अतिशीतित द्रव है। यह सिलिका में, धातु सिलिकेटों अथवा बोरो सिलिकेटों के समांगी मिश्रण से बनाया जाता है। सिलिका का गलनांक बहुत उच्च 1700°c होता है। इसके गलनांक को कम करने के लिए इसमें सोडा भस्म मिलाया जाता है। कम गलनांक (850°c) पर काँच द्रव में विलय होता है। यदि सिलिका में सोडा भस्म के साथ चूना भी मिला दिया जाए तो यह जल मे अविलेय हो जाता है। काँच को रंगीन बनाने के लिए संक्रमण धातुओं के ऑक्साइडों का प्रयोग किया जाता है।

काँच के गुण

► काँच एक अतिशीतित द्रव है जिसका गलनांक व क्वथनांक उच्च नहीं होता है।
► काँच ऊष्मा का कुचालक होता है।
► कांच रासायनिक अभिक्रिया में बहुत सी अभिक्रियाओं के प्रति सक्रिय नहीं होता है।
► कांच का प्रयोग सोडियम हाइड्रॉक्साइड तथा पोटैशियम हाइड्रोक्साइड के पात्रों को ढकने मे नहीं किया जाता है।
► काँच हाइड्रोक्लोरिक अम्ल मे, 2 6 H sif के कारण घुल जाता है। अत: HF के विलयन का प्रयोग काँच के ऩिक्षारण के लिए किया जाता है।

वस्त्र

मनुष्य को अपना तन ढकने के लिए वस्त्र की आवश्यकता होती है। वस्त्रों का निर्माण रेशों, सूत, ऊन, रेशम तथा विभिन्न प्रकार के कृत्रिम रेशों द्वारा किया जाता है। वस्त्रों के निर्माण में उपयोगी रेशे, सूत, रेशम, ऊन आदि पौधे तथा जंतुओं से प्राप्त होते हैं। कुछ रेशों का निर्माण मानव निर्मित होता है। जैसे नायलॉन पॉलिएस्टर आदि।

कुछ पादप रेशे

कपास

कपास एक प्रकार का पौधा है जिसे खेतों में उगाया जाता है तथा इनके फल नींबू की तरह दिखाई देते हैं। जब फल पक जाते हैं तो यह खुल जाते हैं तथा रेशे दिखाई देने लगते हैं जिसे हाथों से निकाल लिया जाता है। इसमें बीज उपस्थित होता है जिसे कंकतन विधि द्वारा पृथक कर लिया जाता है। रेशों से धागा बनाया जाता है। इस प्रक्रिया को कताई कहते हैं। कताई के बाद धागे का प्रयोग वस्त्र बनाने में किया जाता है। कपास का प्रयोग रजाई, गद्दों में भरने के लिए तथा अस्पतालों में भी किया जाता है।

जूट

जूट को पटसन पौधे के तने से प्राप्त किया जाता है। इसकी खेती वर्षा के समय की जाती है। इसकी फसल को काटने के बाद इसके तने को पानी में कुछ दिनों तक डुबो दिया जाता है। जिससे पटसन के तने गल जाते हैं और इसके छिलके को अलग कर लिया जाता है। जूट का प्रयोग टाट के बोरी, सूतली, दरी आदि बनाने में किया जाता है। जूट के अच्छे किस्म वाले धागे का प्रयोग कृत्रिम सिल्क बनाने में किया जाता है।

संश्लिष्ट तंतु

रासायनिक पदार्थों की छोटी ईकाइयों को जोड़कर एक शृंखला तैयार की जाती है, जिसे संश्लेषित रेशा कहते हैं। रेयॉन, पॉलिएस्टर, नायलॉन आदि संश्लेषित रेशे हैं।
रेयॉन: रेयॉन एक मानव निर्मित रेशा है, जिसे प्राकृतिक स्रोत काश्ठ लुगदी से प्राप्त किया जाता है। यह सिल्क की तरह दिखाई देता है। इसे रंगों की कई किस्मों में रंगा जा सकता है।
नायलॉन: नायलॉन रेशे का निर्माण कोयला, जल व वायु से किया जाता है। यह प्रबल, प्रत्यस्थ तथा हल्का होता है। यह प्रथम संश्लेषित रेशा है जो चमकीला तथा घुलने में आसान होता है। इसका प्रयोग रस्सा, तंबू, मोजे, ब्रश, कारों की सीट के पट्टे, स्लीपिंग बैग, पर्दे व पैराशूट बनाने में किया जाता है।
पोलिएस्टर: पोलिएस्टर एक ऐसा संश्लेषित रेशा है, जिससे बने कपड़े में सिकुड़न आसानी से नहीं पड़ती है। यह सरलता से घुल जाता है। इसका प्रयोग बोतल, बर्तन, तार आदि के निर्माण में किया जाता है।
एक्रिलिक: एक्रिलिक एक ऐसा संश्लेषित रेशा है, जो ऊन की तरह दिखाई देता है तथा इसका प्रयोग स्वेटर, शॉल, कंबल आदि बनाने में किया जाता है।

सूती धागे का निर्माण

धागों का निर्माण करने के लिए रेशों को ऐंठते हैं जिससे रेशे पास-पास आ जाते हैं और धागे का निर्माण करते हैं। धागा बनाने के लिए कताईली का प्रयोग किया जाता है। बड़े स्तर पर धागों का निर्माण करने के लिए मशीनों का प्रयोग किया जाता है। प्राप्त धागों से वस्त्र बनाया जाता है।

ऊन

ऊन भेड़, बकरी, ऊँट आदि के बालों से बनाया जाता है। इन जानवरों के बालों से बने कपड़ों में से हवा नहीं गुजरती है। अत: ठंडक में इन कपड़ों का उपयोग किया जाता है। तिब्बत व लद्दाख के क्षेत्रों में याक की ऊन उपलब्ध होती है। उत्तम गुणवत्ता वाले शॉल व पश्मीना शॉल बनाने के लिए कश्मीरी बकरियों के ऊन का इस्तेमाल किया जाता है। उनके के मुख्य उत्पादक देश ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड हैं।

उर्वरक

फसल के अच्छे उत्पादन के लिए उर्वरक का प्रयोग किया जाता है, जो मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढ़ाता है।

उर्वरक के प्रकार

उर्वरक मुख्यत: दो प्रकार के होते हैं। पहला प्राकृतिक और दूसरा कृत्रिम। जीव-जंतुओं तथा पेड़-पौधों के अपशिष्ट से प्राकृतिक उर्वरक तैयार होता है तथा रासायनिक क्रिया के द्वारा कृत्रिम उर्वरक तैयार किया जाता है। यूरिया, कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट, कैल्शियम साइनाइड, सुपर फास्फेट ऑफ लाइम, अमोनियम फास्फेट, पोटैशियम कार्बोनेट, पोटैशियम क्लोराइड आदि कृत्रिम उर्वरक हैं।

प्लास्टिक

प्लास्टिक कार्बनिक योगिक से बनाया जाता है। इसके निर्माण में कार्बन, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन तथा अन्य तत्वों का प्रयोग किया जाता है। यह ऐसे पदार्थों का समूह है जिसे आसानी से मोड़ा जा सकता है तथा किसी भी वस्तु की आकृति प्रदान की जा सकती है। ताप के आधार पर प्लास्टिक को दो भागों में बांटा गया है।
थर्मोप्लास्टिक: ऐसे प्लास्टिक जो कम ताप पर ही अर्थात् जैसे ही गर्म करना शुरू किया जाता है पिघल या सिकुड़ जाते हैं थर्मोप्लास्टिक कहलाते हैं। जैसे- पॉलीथीन, नायलॉन आदि।
थर्मोसेटिंग प्लास्टिक: ऐसा प्लास्टिक जिसे एक बार गर्म करके किसी दूसरे आकार में बदल दिया गया हो या पुन: उसे किसी अन्य आकार में बदला जा सके उसे थर्मोसेटिंग सेटिंग प्लास्टिक कहते हैं। जैसे- बैकेलाइट, फिनॉल रेजिन, पोलिएस्टर, यूरिया आदि। बैकेलाइट का प्रयोग रेडियो, टीवी के कवर आदि बनाने में किया जाता है। पॉलीथीन पर अम्ल या क्षार का प्रभाव नहीं पड़ता। इससे बोतल, पाइप, खिलौने, तार के ऊपर के आवरण आदि बनाये जाते हैं।

चुंबक

चुंबक एक ऐसा पदार्थ है जो लोहे तथा लोहे के टुकड़ों को अपनी और आकर्षित करता है। चुंबक में दो ध्रुव पाये जाते हैं। एक उत्तरी ध्रुव और एक दक्षिणी ध्रुव। अगर चुंबक को स्वतंत्रता पूर्वक लटकाया जाए तो यह सदा उत्तर और दक्षिण दिशा में ठहरता है। चुंबक दो प्रकार के होते हैं। पहला प्राकृतिक चुंबक तथा दूसरा कृत्रिम चुंबक।
प्राकृतिक चुंबक: धातु-खनिजों तथा अयस्कों से प्राप्त चुंबक प्राकृतिक चुंबक कहलाते हैं। धातु-खनिज तथा अयस्क से मैग्नेटाइट प्राप्त होता है। मैग्नेटाइट के टुकड़ों को प्राकृतिक चुंबक कहा जाता है।
कृत्रिम चुंबक: मानव द्वारा निर्मित चुंबक को कृत्रिम चुंबक कहा जाता है। कृत्रिम चुंबक शक्तिशाली होते हैं। यह मुख्यत: लौह-इस्पात से बनाये जाते हैं।

Top
error: Content is protected !!