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5 भाष् अधिगम में व्याकरण की भूमिका (Language Hindi & Pedagogy CTET & TET Exams)

5 भाष् अधिगम में व्याकरण की भूमिका

भाषा और व्याकरण
भाषा अभिव्यक्ति का साधन है, अशुद्ध भाषा से अभिव्यक्ति या तो अपूर्ण होती है या फिर अशुद्ध अर्थात् अगर भाषा अशुद्ध हो, तो अभिव्यक्ति में बाधा आती है। व्याकरण के माध्यम से हम भाषा को शुद्ध तथा व्यवस्थित करते हैं। एक तरह से देखें तो व्याकरण भाषा को शुद्ध और व्यवस्थित करने वाले नियमों का संग्रह है। कुछ विद्वानों ने व्याकरण को इस प्रकार परिभाषित किया है –
पतंजलि मुनि के मतानुसार ‘‘व्याकरण शब्दानुशासन है।’’
डॉ स्वीट के अनुसार ‘‘व्याकरण भाषा का व्यावहारिक विश्लेषण है।’’ इस प्रकार कहा जा सकता है कि हम व्याकरण द्वारा शुद्ध बोलना, लिखना तथा पढ़ना सीखते हैं।
भाषा शिक्षण में व्याकरण का महत्त्व
भाषा को नियमबद्ध करना कुछ हद तक भाषा की स्वतंत्रता को प्रभावित करता है। इस बात को लेकर विभिन्न शिक्षा पद्धति के विचारकों में मतभेद रहा है। भाषा को व्यवस्थित करने का काम व्याकरण की सहायता से सरल हो जाता है। भाषा में हो रही अशुद्धियों का उपचार व्याकरण से सम्भव है। इसकी सहायता से छात्रों में भाषा के शुद्ध रूप को पहचानने और प्रयोग करने की प्रवृत्ति का विकास होता है।
भाषा शिक्षण में व्याकरण की आवश्यकता: भाषा के मानकीकरण का आधार उसका व्याकरण होता है। सामान्यत: व्याकरण द्वारा भाषा का परीक्षण कर उसकी अशुद्धियों का पता लगाया जाता है। इसलिए भाषा शिक्षण में व्याकरण शिक्षण का अपना एक महत्त्वपूर्ण भाग होता हैं।
व्याकरण शिक्षण के उद्देश्य
ज्ञानात्मक उद्देश्य
साहित्य की विभिन्न विधाओं तथा विभिन्न लेखन शैलियों से छात्रों को परिचित कराना।
► छात्रों को ध्वनियों, ध्वनियों में अन्तर, शब्द योजना, रस, अलंकार, छंद, समास का ज्ञान कराना।
► छात्रों को वाक्य रचना के नियम, शुद्ध वर्तनी, विराम चिह्नों का ज्ञान कराना।
कौशलात्मक उद्देश्य
छात्रों को मुहावरे, लोकोक्ति, शब्द-सूक्ति का प्रसंगानुकूल अर्थ निकालने तथा बलाघात के अनुसार अर्थ बोध कराने योग्य बनाना।
► छात्रों को भाशा के गुण-दोश परखने के योग्य बनाना।
► भाशा-कौशलों सुनना, पढ़ना, लिखना और बोलने का विकास करना।
भावात्मक उद्देश्य
छात्रों में भाशा तथा साहित्य की समीक्षा करने की योग्यता विकसित करना।
► छात्रों में शुद्ध भाशा सीखने तथा इसके प्रयोग करने की रूचि को विकसित करना।
► छात्रों में व्याकरण सम्मत तथा शुद्ध भाशा के प्रयोग के प्रति सम्मान की भावना का विकास करना।
व्याकरण शिक्षण की विधियाँ
पियाज़े के अनुसार– ‘‘बच्चों का संज्ञानात्मक विकास चार चरण में होता है। प्रत्येक चरण में बच्चों के सोचने-समझने की क्षमता अलग होती है।’’ व्याकरण की शिक्षा देने से पहले शिक्षक को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि व्याकरण की शिक्षा बच्चों के संज्ञानात्मक स्तर की हो; जैसे- प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों के भाषा सीखने का आधार अनुकरण होता है, यदि उन्हें व्याकरण के नियम बताए गए, तो उनके लिए ये नीरस पाठ के अलावा कुछ नहीं होगा। अत: शिक्षक को नियम बताने की जगह अभ्यास के माध्यम से बच्चों की भाषा में हो रही अशुद्धियों को दूर करना चाहिए।
व्याकरण की कुछ महत्त्वपूर्ण शिक्षण विधियाँ
निगमन विधि: यह विधि व्याकरण शिक्षण की सबसे प्राचीन विधि है। इस विधि में शिक्षक व्याकरण का नियम बच्चों को बताता है। नियमों का आधार जाने बिना बच्चे उसे याद कर लेते हैं। मनोवैज्ञानिक दृश्टि से यह विधि शिक्षण प्रक्रिया में छात्रों के लिए लाभकारी नहीं होती है। इस विधि को दो भागंो में बाँटा गया है-
सूत्र विधि: नाम के अनुसार यह विधि सूत्रों पर आधारित होती है। शिक्षक व्याकरण के कुछ सूत्र बच्चों के सामने प्रस्तुत करता है और बच्चे उन सूत्रों को याद कर लेते हैं। अरुचिकर होने की वजह से इस विधि का प्रयोग अब शिक्षकों द्वारा नहीं किया जाता।
पुस्तक विधि: इस विधि में शिक्षण का आधार व्याकरण की पाठ्य पुस्तकें होती है। पुस्तक के अंदर व्याकरण के नियम तथा नियमों से संबंधित उदाहरण होते हैं। छात्र इन नियमों को यथा विधि याद करते हैं। सूत्र विधि की तरह ये विधि भी अरुचिकर होती है। सिर्फ नियमों को याद करने मात्र से छात्र उनके प्रयोग के काबिल नहीं बन पाते।
आगमन विधि: यह विधि पूर्णतया छात्र-केंद्रित होती है। इस विधि में उदाहरणों के माध्यम से छात्र नियम तक पहुँचते हैं। यह विधि छात्रों को सोचने और समझने का पूरा समय देती है। मनोवैज्ञानिक दृश्टि से यह विधि उचित मानी गयी है। इसके अंतर्गत उदाहरण देना, उन पर विचार करके नियमों का प्रतिपादन तथा अंत में उदाहरणों द्वारा ही नियमों का परीक्षण भी होता है। इस पूरी प्रक्रिया में शिक्षक केवल उदाहरणों के प्रस्तुतीकरण का काम करता है।
खेल विधि: बालकों को खेल प्रिय होता है। इस विधि का उपयोग व्याकरण की नीरसता को कम करने तथा शिक्षण को रुचिकर बनाने के लिए किया जाता है। इस विधि में शिक्षक पाठ की आवश्यतानुसार खेल के नियम निर्धारित करता है और छात्र रुचि के साथ खेलते समय व्याकरण के नियम सीखते हैं।
विश्लेषणात्मक विधि: आगमन विधि की भाँति ही इस विधि में शिक्षक द्वारा उदाहरण दिए जाते हैं, उन उदाहरणों पर विस्तृत चर्चा द्वारा छात्रों से नियम निकलवाए जाते हैं। इसमें निगमन विधि के जैसे ही नियमों की चर्चा होती है तथा परीक्षण के लिए छात्र नियम से उदाहरण की ओर जाते हैं। इसमें छात्र रुचि के साथ व्याकरण के नियम सीखते हैं। इस विधि को व्याकरण शिक्षण की सबसे उचित विधि माना जाता है।
भाषा संसर्ग विधि: कुछ विद्वानों के अनुसार भाषा-शिक्षण में अलग से व्याकरण की शिक्षा निरर्थक है। उनका मानना है कि व्याकरण की अलग शिक्षा देने की बजाए छात्रों को अच्छे लेखकों की कृति पढ़ाई जाये। उनकी बातचीत ऐसे लोगों से करायी जाये, जिनकी बोलचाल की भाषा शुद्ध हो। इस प्रकार छात्र खुद ही भाषा के शुद्ध रूप को पहचान तथा प्रयोग करना सीख जायेंगे। यह विधि प्रारम्भिक कक्षाओं के लिए अनुकूल है।
समवाय विधि: इस विधि में भाषा की पाठ्य-पुस्तक पढ़ाते समय, शिक्षक पाठ में प्रयक्त हुए वह व्याकरणिक नियम बताता है, जिसका प्रयोग बच्चे अपनी लिखित या मौखिक अभिव्यक्ति में कर सके। यह विधि रुचिकर होती है, परन्तु इससे व्याकरण की पूर्ण शिक्षा नहीं दी जा सकती है।
व्याकरण शिक्षण को रोचक और छात्रानुकूल बनाने के उपाय
शिक्षण विधि का चुनाव करते समय छात्रों के स्तर का विशेष ध्यान
► निगमन विधि का कम से कम प्रयोग
► भाषा संसर्ग विधि का प्राथमिक कक्षाओं में प्रयोग
► शिक्षण सहायक सामग्रियों का उचित प्रयोग, जैसे चार्ट पेपर, फलैश कार्ड, टेप रिकॉर्डर।
► दृश्य-श्रव्य शिक्षण सहायक सामग्री का प्रयोग, जैसे व्याकरण पर आधारित कोई फिल्म या छोटी वीडियो क्लिप
► समन्वय सिद्धांत का पालन, जैसे- गद्य पाठों के अन्दर व्याकरण के नियमों का समन्वय हो।
► शिक्षण सूत्रों को ध्यान में रखकर शिक्षण, जैसे- सरल से कठिन की ओर, उदाहरण से नियम की ओर, ज्ञात से अज्ञात की ओर इत्यादि।
► शिक्षण में विभिन्न क्रिया-कलापों की सहायता से सिखाये गए नियमों का अभ्यास, जैसे- संज्ञा परिवर्तन, रिक्त स्थानों की पूर्ति, इत्यादि।
► शुद्ध भाषा के प्रयोग के लिए प्रोत्साहन।

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