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4 भाषा के कार्य एवं इसके विकास में बोलने एवं सुनने की भूमिका (Language Hindi & Pedagogy CTET & TET Exams)

4 भाषा के कार्य एवं इसके विकास में बोलने एवं सुनने की भूमिका

शिक्षण
शिक्षण वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से शिक्षक शिक्षार्र्थी के व्यवहार में वांछित परिवर्तन करने का प्रयास करता है। शिक्षण का उद्देश्य पूर्वनिर्धारित होता है। सीखने वाले का व्यवहार परिवर्तन शिक्षण से हुए अनुभवों के आधार पर होता है। कुछ शिक्षाविदों के अनुसार शिक्षण की परिभाषा इस प्रकार है:
एच॰ सी मौरीसन के अनुसार- ‘‘शिक्षण वह प्रक्रिया है, जिसमें अधिक विकसित व्यक्तित्व का व्यक्ति कम विकसित व्यक्तित्व के व्यक्ति के संपर्क में आता है और कम विकसित व्यक्तित्व की अग्रिम शिक्षा के लिए विकसित व्यक्तित्व की व्यवस्था करता है।’’
फर्रेंट के अनुसार- ‘‘शिक्षण अधिगम को सुगम बनाने वाली प्रक्रिया है।’’
वेल्स के अनुसार- ‘‘शिक्षण प्रक्रिया के अंतर्गत शिक्षक कई क्रियाओं का वहन एक साथ करता है; जैसे- प्रश्न पूछना, व्याख्यान देना, छात्रों की उपस्थिति का नियमित आकलन, छात्रों की प्रगति का ध्यान तथा उन्हें प्रेरित करना। इसके साथ ही छात्रों की पृश्ठभूमि की जानकारी भी रखता है।’’ शिक्षण में शिक्षक एक उत्प्रेरक की भांति काम करता है, जो अधिगम की गति को उचित दिशा देता है। शिक्षण की प्रकिया में सीखने वाले के अतिरिक्त किसी और साधन, माध्यम या व्यक्ति का होना जरूरी है। शिक्षार्र्थी अपने व्यवहार में वही परिवर्तन लाता है, जो उसने शिक्षण के दौरान सीखा या समझा होता है। इसलिए शिक्षण की प्रक्रिया सहज और छात्र केन्द्रित होनी चाहिए।
शिक्षण के प्रकार
शिक्षण के उद्देश्य की दृष्टि से। (ज्ञानात्मक शिक्षण, भावात्मक शिक्षण, क्रियात्मक शिक्षण)।
► शिक्षण के स्तरों की दृष्टि से। (स्मृति स्तर, बोध स्तर, चिन्तन स्तर)।
► शिक्षण की क्रियाओं की दृष्टि से। (प्रस्तुतीकरण, प्रदर्शन तथा कार्य करना)।
► शासन के अनुसार शिक्षण के रुप। (एकतांत्रिक शिक्षण, प्रजातान्त्रिक शिक्षण)।
► शिक्षण की व्यवस्था की दृष्टि से। (औपचारिक तथा अनौपचारिक शिक्षण)।
► शिक्षण के स्वरुप की दृष्टि से। (वर्णात्मक शिक्षण, उपचारी शिक्षण)।
भाषा शिक्षण
भाषा शिक्षण एक पूर्वनिर्धारित उद्देश्य के साथ किया जाता है। भाषा अनुकरण द्वारा सीखी जाती है। बालक के विद्यालय आने से पूर्व उसके द्वारा सीखी गयी भाषा का आधार अनुकरण होता है, जिसमें सामान्यत: त्रुटियाँ पाई जाती है। इन त्रुटियों का निवारण कर बालक को स्पश्ट तथा सहज अभिव्यक्ति के काबिल बनाना भाषा शिक्षण का प्रथम उद्देश्य है।
भाषा शिक्षण के उद्देश्य: भाषा शिक्षण को हम सामान्यत: सुनने, बोलने, लिखने और पढ़ने के सन्दर्भ में देखते हैं, जबकि भाषा शिक्षण का उद्देश्य इस से भिन्न है। भाषा शिक्षण के उद्देश्य निम्न हैं-
► सुनकर समझने की क्षमता का विकास
► पढ़कर समझने की क्षमता का विकास
► सहज अभिव्यक्ति करने की क्षमता का विकास
► स्पश्ट एवं अर्थपूर्ण लेखन क्षमता का विकास
► भाषा का वैज्ञानिक आधार समझने की क्षमता का विकास
► बच्चों की सृजनात्मक क्षमता का विकास
► संवेदनशीलता का विकास
मातृभाषा के रूप में हिंदी शिक्षण का उद्देश्य
छात्रों को भाषायी कौशलों के लिए आवश्यक भाषा तत्त्वों (वर्णों, शब्द, वाक्य एवं लिपि आदि) का स्पष्ट ज्ञान कराना।
► छात्रों को मातृभाषा की पाठ्यपुस्तकों में निहित प्रकृति एवं मानव जीवन के विभिन्न पक्षों से सम्बन्धित सामान्य ज्ञान कराना।
► छात्रों में भाषा की पाठ्य-पुस्तकों और साहित्य रचनाओं में निहित ज्ञान प्राप्त करने के प्रति रुचि विकसित करना।
► छात्रों में मातृभाषा सीखने एवं उसके साहित्य के अध्ययन के प्रति रुचि विकसित करना।
► छात्रों में मातृभाषा एवं उसके साहित्य के प्रति स्थायी भाव का निर्माण करना।
प्राथमिक स्तर पर भाषा-शिक्षण के उद्देश्य
प्राथमिक स्तर पर भाषा शिक्षण के उद्देश्य निम्न हैं-
► छात्रों को वर्णों का ज्ञान देना
► स्तरानुकूल शब्दों को समझने और बोलने की शक्ति का विकास कराना
► सस्वर वाचन की क्षमता का विकास कराना
► प्राथमिक स्तर की पाठ्य पुस्तक को पढ़कर समझने की शक्ति का विकास कराना
► स्पश्ट एवं स्वच्छ लेखन शक्ति का विकास कराना
► कविताओं के भाव के अनुसार वाचन की शक्ति का विकास
► लिपि का बोध कराना
► उनके शब्दकोश की वृद्धि करना
► नवीन शब्दों के अर्थ को समझने की शक्ति का विकास करना
► भाषा शिक्षण के माध्यम से उनकी अभिव्यक्ति को स्पश्ट एवं सहज बनाना
प्राथमिक स्तर पर भाषा शिक्षण
शिक्षा का माध्यम: प्राथमिक स्तर पर शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होनी चाहिए, क्योंकि विद्यालय आने से पूर्व बालक को मातृभाषा की समझ होती है। यदि शिक्षा का माध्यम मातृभाषा है, तो वह विषय-वस्तु को आसानी से समझ सकता है।
उदाहरणों के माध्यम से शिक्षण: भाषा-शिक्षण में जितना हो सके शिक्षक को उदाहरणों का प्रयोग करना चाहिए, जिससे छात्रों को समझने में मदद मिले और वह विषय-वस्तु को आसानी से समझ पाए। यदि कोई विद्यार्थी किसी विषय को नहीं समझ पाता है, तो उसे विषय संबंधित उदाहरणों के माध्यम से समझना चाहिए।
खेल विधि का प्रयोग: भाषा शिक्षण को रोचक बनाने के लिए शिक्षक को प्राथमिक स्तर पर खेल विधि का प्रयोग करना चाहिए, जिससे छात्रों में भाषा सीखने की रुचि पैदा हो और खेल के माध्यम से वे भाषा के नियमों को भी सीखे।
उचित शिक्षण सहायक सामग्री का प्रयोग: प्राथमिक स्तर पर बच्चों की समझ को बढ़ाने के लिए शिक्षक को विषय पर आधारित चित्रों तथा दृश्य-श्रव्य सामग्री का प्रयोग करना चाहिए। कभी-कभी छात्र जिन बातों को शब्दों के माध्यम से नहीं समझ पाते, उसे चित्रों के माध्यम से आसानी से समझ सकते हैं।
भाषा विकास को प्रभावित करने वाले कारक
किसी छात्र के भाशा विकास पर कई कारकों का प्रभाव पड़ता है। कुछ प्रमुख कारकों का वर्णन निम्नलिखित प्रकार से किया जा रहा है-
बुद्धि: बुद्धि का छात्र के भाशा विकास पर बहुत प्रभाव पड़ता है। जिन छात्रों का बौद्धिक स्तर उच्च होता है उन छात्रों का भाशा विकास कम बुद्धि वाले छात्रों की अपेक्षा अधिक होता है। औसत से अधिक बुद्धि वाले छात्रों अर्थात् उच्च बौद्धिक स्तर वाले छात्रों का शब्द-भण्डार अधिक विकसित होता है।
लिंगीय भिन्नता: लिंगीय भिन्नता भी भाशा विकास को प्रभावित करने का एक महत्वपूर्ण कारक है। ऐसा माना जाता है कि लड़कियों का भाशा विकास लड़कों की अपेक्षा अधिक होता है।
स्वास्थ्य: स्वास्थ्य का भी बच्चों के भाशा विकास पर प्रभाव पड़ता है। जिन बालकों का स्वास्थ्य अच्छा होता है उनका भाशा विकास उचित रूप से होता है।
परिवार का आकार: छोटे तथा बड़े परिवार में भी भाशा विकास में भिन्नता पाई जाती है। छोटे परिवार में माँ-बाप बच्चों के भाशा विकास पर अधिक सजगता से ध्यान देते हैं जिससे उनका भाशा विकास, बड़े परिवार के बच्चों की अपेक्षा अधिक होता है।
परिपक्वता: बच्चे के भाशा विकास में परिपक्वता का महत्वपूर्ण योगदान होता है। उच्चारण अवयवों जिह्वा, ओश्ठ, तालु, कंठ में परिपक्वता आने पर भाशा पर नियन्त्रण होता है। यदि उच्चारण अवयव पूर्णत: परिपक्व नहीं होंगे तो उच्चारण में बाधा उत्पन्न होगी जिससे भाशा विकास में समस्या आएगी।
व्यक्तित्व: भाशा विकास को प्रभावित करने में व्यक्तित्व मुख्य कारक है। जो बालक दूसरे लोगोंं से अधिक बातचीत करेगा वह शीघ्रता से भाशा सीखेगा। बर्हिमुखी स्वभाव वाले बालकों में भाशा कौशल शीघ्रता से विकसित होते हैं। इसके विपरीत जो छात्र कम बातचीत करेगा या अन्तर्मुखी स्वभाव का होगा, उसका भाशा विकास कम होगा।
परिवेश या सामाजिक-आर्थिक स्थिति: छात्र के परिवेश का प्रभाव उसके व्यक्तित्व पर पड़ता है। यही बात भाशा विकास पर भी लागू होती है। ग्रामीण और शहरी परिवेश की तुलना करने पर स्पश्ट होता है कि शहर के बच्चों का भाशा विकास, ग्रामीण बच्चों की अपेक्षा अधिक होता है।
द्विभाषिक स्थिति: द्विभाशी स्थिति बच्चे के भाशा विकास पर प्रभाव डालती है। जैसा कि नाम से ही स्पश्ट है कि दो भिन्न भाशाओं को बोलने वाले व्यक्ति। जैसे- यदि पिता अंग्रेज़ी बोलने वाला हो तथा माता हिन्दी बोलने वाली हो तो बच्चे के लिए किसी एक भाशा को सीखना मुश्किल हो जाता है।
संवेगात्मक तनाव: संवेगों का बच्चे पर बहुत प्रभाव पड़ता है। जिस बच्चे के संवेगों का कठोरता से दमन किया जाएगा, वह बच्चा भयभीत रहेगा तथा अपने भावों व विचारों को प्रकट करने में घबराएगा। अत: उस बच्चे में भाशा विकास देर से होगा।
बहुजन्म: एक साथ अधिक संतानें पैदा होने से भी भाशा विकास प्रभावित होता है। ऐसी स्थिति में बच्चे एक-दूसरे का अनुकरण करते हैं तथा भाशा सीखने में बाधा उत्पन्न होती है। बच्चे दूसरे की नकल करके भाशा सीखते है।
भाषा विकास में सुनने की भूमिका
भाशा कौशल के चार कौशलों में श्रवण, प्रथम भाशा कौशल है। किसी भी ध्वनि या बातचीत को पहले सुना जाता है फिर सुनकर उसका जवाब दिया जाता है। श्रवण तथा वाचन महत्वपूर्ण भाशा कौशल है। प्राथमिक स्तर पर भाशा शिक्षण के लिए छात्रों को सस्वर कविता या कहानी को सुनाया जाता है। श्रवण या सुनने के माध्यम से छात्रों में शुद्ध उच्चारण का विकास होता है। छात्रों को प्रमुख भाशिक विधाओं जैसे- कविता, कहानी, वार्तालाप आदि सुनाया जाता है। सुनने की क्रिया द्वारा छात्र वाक्यों को क्रमबद्ध रूप से व्यवस्थित कर कविता या कहानी को पूरा कर सकता है। इससे छात्र के शब्द-भण्डार में वृद्धि होती है। विभिन्न विधाओं के भावों को समझकर उनका अर्थग्रहण करने की क्षमता का विकास होता है। दूसरे व्यक्तियों के भावों व विचारों को समझा जाता है। सुनने के माध्यम से एक समान प्रतीत होने वाली ध्वनियों में अन्तर करने में सहायता मिलती है। व्यक्ति को अच्छा वक्ता बनने से पहले अच्छा श्रोता बनना भी आवश्यक होता है। सुनने की प्रक्रिया भाशा विकास में बहुत महत्वपूर्ण है।
भाषा विकास में बोलने की भूमिका
श्रवण कौशल के बाद वाचन या बोलना आता है। जिस प्रकार सुनकर बालक दूसरों के भावों व विचारों को ग्रहण करता है उसी प्रकार बोलकर बालक अपने भावों व विचारों को प्रकट करता है। बोलने के माध्यम से बालक शब्दों के उच्चारण, उनके प्रयोग को सीखता है। बोलने से बालक की झिझक भी दूर होती है। प्रारंभिक कक्षाओं में बोलने का महत्व अधिक है। पढ़ने से बोलना तथा पढ़ने के बाद लिखने की क्रिया होती है। बोलने से भाशा प्रवाह में पटुता, प्रवीणता व कुशलता का विकास होता है। भाशा पर पकड़ भी बनती है। जब बालक किसी कविता या कहानी को बोलता है तो उसी के भावानुरूप प्रस्तुतिकरण करने की योग्यता का विकास होता है। बोलने से बालक में सुनकर प्राप्त किए गए ज्ञान का मूल्यांकन करने में सहायता मिलती है। बालक के बोलने पर उच्चारण सम्बन्धी त्रुटियां को पहचानने में सहायता मिलती है। जिससे शिक्षक उच्चारण पर विशेश ध्यान देकर उसमें सुधार हेतु कार्य कर सकता है।

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