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3 भाषा-शिक्षण के सिद्धान्त (Language Hindi & Pedagogy CTET & TET Exams)

3 भाषा-शिक्षण के सिद्धान्त

भाषा-शिक्षण के सिद्धान्त
वाइगोत्सकी के अनुसार- ‘‘बालकों के भाषा सीखने में समाज तथा परिवार एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है’’ अर्थात् अपने परिवेश से बालक अपनी क्रियाशीलता द्वारा विभिन्न ध्वनियों को सुनकर उनका अनुकरण कर बोलना सीखता है। फिर शब्दों या वाक्यों का अर्थ समझने का प्रयास करता है। इसी क्रम में अपने शब्दों को व्यवस्थित कर उत्तर देने की कोशिश करता है। भाषा बाल-विकास में सहायक होती है। शिक्षक को बालक की इस प्रवृत्ति का ध्यान रखते हुए शिक्षण नीति अपनानी चाहिए।
भाषा शिक्षण का महत्त्व
बालक अपने परिवेश से भाषा सीखता है, परन्तु कुछ सामाजिक या सांस्कृतिक विभिन्नताओं के कारण उसकी भाषा मे अशुद्धियाँ पाई जाती हैं। इन अशुद्धियों के कारण कभी-कभी बालक अपनी भावनाओं को सही रूप से अभिव्यक्त नहीं कर पाता। भाषा शिक्षण द्वारा इन अशुद्धियों को दूर करके बालक को स्वतंत्र अभिव्यक्ति हेतु सक्षम बनाया जाता है। भाषा सीखने का स्वाभाविक क्रम है:
(1) सुनना
(2) बोलना
(3) पढ़ना
(3) लिखना
शिक्षण के सामान्य सिद्धांत
रुचि का सिद्धांत: बालक के सीखने का मूल आधार उसकी रुचि होती है, बिना रुचि के बालक को भाषा नहीं सिखाई जा सकती। बालक का मन भी उसी कार्य मे ज़्यादा लगता है, जिसमें उसकी रुचि हो, इसलिए शिक्षक को चाहिए कि वह बालक की रुचि को जान लें और उसी के अनुसार शिक्षण विधि तथा शिक्षण सहायक सामग्री का प्रयोग करके अपना शिक्षण रुचिकर बनाएँ। जैसे प्रारम्भिक कक्षाओं में बालकों की रुचि खेलने में अधिक होती है, शिक्षक इस दशा में खेल विधि का प्रयोग कर सकता है।
अभ्यास का सिद्धान्त: भाषा कौशलों के विकास में अभ्यास के सिद्धांत का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। अभ्यास द्वारा भाषा कौशलों को बेहतर बनाया जा सकता है। जैसे लेखन कौशल के विकास हेतु प्रारम्भिक कक्षा के शिक्षक को चाहिए कि वह छात्रों को लेख आधारित कार्य दें।
अनुकरण का सिद्धान्त: बालकों में अनुकरण करने का स्वभाव होता है और प्रारम्भिक अवस्था में वे अनुकरण द्वारा ही सीखते हैं। भाषा सीखने में वे इसी प्रकृति का सहारा लेते हैं। शिक्षक जैसी भाषा बोलता या लिखता है, बच्चे वैसा ही अनुकरण द्वारा सीखते हैं। इसलिए शिक्षक को व्याकरण का उचित ज्ञान होना आवश्यक है।
बालकेन्द्रिता का सिद्धान्त: शिक्षण करते समय अध्यापक को ध्यान रखना चाहिए कि शिक्षण का केन्द्र बालक हो। अध्यापक को बालक के स्वभाव, स्तर क्षमता एवं रुचि आदि को ध्यान में रखकर अध्यापन कार्य करना चाहिए।
आवृत्ति का सिद्धान्त: मनोवैज्ञानिका ें के अनुसार सीखी हुई बात को जितना अधिक दोहराया जाता है। वह उतनी ही अधिक स्मरण रहती है और क्रिया को जितनी बार दोहराया जाता है, उसमें उतना ही अधिक कौशल प्राप्त होता है। भाषा कौशलों के विकास में यह सिद्धान्त बहुत महत्वपूर्ण है।
वैयक्तिक भिन्नता का सिद्धान्त: कक्षा-कक्ष में सभी छात्रों में शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक आधार पर भिन्नता पायी जाती है। संज्ञानात्मक या रचनात्मक विकास के आधार पर छात्रों की वैयक्तिक भिन्नता को स्पष्ट देखा जा सकता है, इसी तरह सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश के आधार पर उनकी भाषाओं में भिन्नता पायी जाती है। अत: शिक्षक को चाहिए कि शिक्षण के दौरान वैयक्तिक भिन्नता को ध्यान में रखकर शिक्षा प्रदान करें।
शिक्षण सूत्रों का सिद्धान्त: अनेक शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षण कब, किस रूप में और कैसे किया जाए इस सम्बन्ध में अपने अनुभव एवं निर्णयों को सूत्र रूप में प्रकट किया; जैसे ज्ञात से अज्ञात की ओर, सरल से जटिल की ओर, मूर्त से अमूर्त की ओर, पूर्ण से अंश की ओर, विशिष्ट से सामान्य की ओर, आगमन से निगमन की ओर, विश्लेषण से संश्लेषण की ओर, इन्हें ही आज शिक्षण सूत्र कहा जाता है। भाषा अध्यापक को इनका उचित ज्ञान होना चाहिए।
चयन का सिद्धान्त: हिन्दी भाषा शिक्षण के लिए कब किस सिद्धान्त या पद्धति का सहारा लिया जाए, इसकी सटीक जानकारी अध्यापक को होनी चाहिए। शिक्षण विधि का चयन करने से पहले अध्यापक को चाहिए कि वह कक्षा के छात्रों की योग्यता का विशेष ध्यान रखें। अध्यापक को पाठ सरल, सहज एवं सटीक बनाने के लिए बहुमुखी प्रयास करना चाहिए और जो शिक्षण विधि अधिक प्रभावकारी हो, उसका चयन करना चाहिए।
पुनर्बलन का सिद्धान्त: अमेरिकी मनोवैज्ञानिक बी. एफ. स्किनर ने सीखने की प्रक्रिया का बारीकी से अध्ययन किया। उसने देखा कि सीखने की प्रक्रिया के दौरान जब सीखने वाले को सफलता मिलती है, तो उसे बड़ा सन्तोष मिलता है। इस संतोष से उसमें आगे सीखने के लिए उत्साह उत्पन्न होता है और सीखने में बल मिलता है। इसे उन्होंने पुनर्बलन के सिद्धान्त के रूप में प्रतिपादित किया है।
नियोजन का सिद्धान्त: शिक्षण प्रारम्भ करने से पहले शिक्षण में लगने वाली सामग्री, विधि तथा समय का पूर्व अनुमान ही नियोजन का सिद्धांत है। यह शिक्षण में काफी लाभकारी सिद्ध होता है। इसके द्वारा विषय और पाठ के लक्ष्यों की पूर्ति सुगमता से की जा सकती तथा उचित समय पर पाठ्यक्रम पूरा किया जा सकता है।
सहानुभूति पूर्ण व्यवहार का सिद्धान्त: शिक्षण में शिक्षक का शिक्षार्थियों के प्रति व्यवहार बहुत मायने रखता है। बच्चों के साथ प्रेम एवं सहानुभूति पूर्ण व्यवहार किया जाए, तो बच्चे सीखने में रुचि लेते हैं। बच्चों के प्रति प्रेम का अर्थ है, उनके विकास के प्रति सचेत एवं समर्पित होना। बच्चों के प्रति सहानुभूति का अर्थ है, जैसा बच्चे अनुभव कर रहे हैं, वैसा ही शिक्षक अनुभव करें एवं उनकी भावनाओं की कद्र करें।
जीवन से सम्बन्ध जोड़ने का सिद्धान्त: मनोवैज्ञानिकों ने यह स्पष्ट किया कि बच्चे उन विषयों एवं क्रियाओं में अधिक रुचि लेते हैं, जो उनके वास्तविक जीवन से सम्बन्धित हो। अत: पाठ्य सामग्री अथवा सिखाई जाने वाली क्रिया का सम्बन्ध बच्चों के जीवन से अवश्य होना चाहिए।
परिपक्वता का सिद्धान्त: परिपक्वता से तात्पर्य स्वर तन्त्र की परिपक्वता से है, जिसमें बालक की जीभ, गला, तालु, होंठ, तथा स्वर यन्त्र इत्यादि आते हैं। जिसके स्वर तन्त्र का विकास भली-भाँति होता है और अंगों में परिपक्वता होती है। वह भाषा पर नियन्त्रण प्राप्त करता है।
भाषा-शिक्षण के उद्देश्य
भाशा का मानव जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। मानव के सम्पूर्ण कार्य व्यापार के सम्प्रेशण का माध्यम भाशा है। बालक के परिवार तथा परिवेश में सीखी गई भाशा परिमार्जित तथा व्याकरणसम्मत नहीं होती। भाशा शिक्षण की प्रक्रिया में भाशा के उद्देश्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भावाभिव्यक्ति का माध्यम: भाशा शिक्षण के चार कौशल है: सुनना, बोलना, पढ़ना, लिखना। भाशा के माध्यम से बालक की सुनने, बोलने, पढ़ने तथा लिखने की क्षमता का विकास होता है। भाशा वक्ता द्वारा कही गई बात को समझने की क्षमता का विकास करती है। भाशा शिक्षण का एक मुख्य उद्देश्य है कि व्यक्ति विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार अपनी बात को सम्प्रेशित कर सकें। ध्वनियों का ज्ञान, वर्तनी का ज्ञान, नए शब्दों को पढ़कर भाव ग्रहण करना, शुद्ध व स्पश्ट उच्चारण, उचित गति व प्रवाह, लिपि का ज्ञान, सुंदर लेखन का अभ्यास आदि भाशा शिक्षण के उद्देश्य है।
सृजनात्मक उद्देश्य: भाशा-शिक्षण का उद्देश्य बालक में सृजनात्मकता या रचनात्मकता का विकास करना भी है। इसका अर्थ है कि कुछ मौलिक या नया सृजन कार्य। विभिन्न भाशिक विधाओं कहानी, नाटक, कविता आदि की रचना करके बालक अपनी मौलिक प्रतिभा का सृजन कर सकते हैं।
विषयानुसार भाषा समझने की क्षमता का विकास: बालकों में विभिन्न विशयों के अनुसार भाशा को समझने की क्षमता का होना आवश्यक है। प्रत्येक विशय की अपनी विशिश्ट भाशिक अभिव्यक्ति होती है, जो उस विशय को अन्य विशय से अलग करती है। इस क्षमता का विकास करना भी भाशा शिक्षण का उद्दश्े य है। जैसे- गणित, विज्ञान, संगीत, खेल-कूद आदि विशयों की भाशा समझने में बालक समर्थ हों।
संवेदनशीलता का विकास: भाशा-शिक्षण का उद्देश्य बालक में संवेदनशीलता का विकास करना भी है। भाशा के माध्यम से बालक को अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित करवाया जाता है। मानव-प्रेम, सहृयता व संवेदनशीलता का विकास करना, सामाजिक-सास्ंकृतिक मूल्यों में आस्था विकसित करना आदि भाशा शिक्षण का कार्य है। इसके अतिरिक्त भाशा का वैज्ञानिक अध्ययन, सहज तथा सार्थक अभिव्यक्ति की क्षमता का विकास करना, भाशा व साहित्य के प्रति बालकों में रूचि उत्पन्न करना है।

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