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3. आवास (EVS Environment Studies for CTET & TET in Hindi)

3. आवास

परिचय

मनुश्य की कुछ सामान्य आवश्यकताएँ होती हैं, जो उसके जीवन-यापन के लिए आवश्यक होती हैं। जैसे – पेट भरने के लिए भोजन, तन ढकने के लिए कपड़ा और रहने के लिए घर। ये मनुश्य की मूल आवश्यकताएँ हैं। इनके बिना जीवन-यापन आसान नहीं है। अपितु इसे दुर्लभ कहा जा सकता है। मनुश्य अपना आवास (घर) ऐसी जगह बनाता है, जहाँ वह तथा उसके परिवार के अन्य सदस्य सुरक्षित रहें तथा वहाँ पर्याप्त मात्रा में भोजन उपलब्ध करा सकें।

विभिन्न प्रकार के मानव आवास

मनुश्य अपनी आवश्यकता के अनुसार तथा आस-पास की जलवायु मौसम और तापमान के आधार पर अपने आवास का निर्माण करता है। जिन स्थानों पर अधिक ठण्ड पड़ती है तथा बर्फबारी होती है, ऐसे स्थानों पर मनुश्य अपने घर शंकवाकार बनाता है ताकि बर्फ घर के ऊपर जमा न हो सके। जहाँ पर केवल अधिक ठण्ड पड़ती है और बर्फबारी नही होती वहाँ की छत समतल तथा कई मंजिल की बनायी जाती है। कुछ जगहों पर जैसे – चांगथांग में पक्के मकान नहीं बनाये जाते हैं। यहाँ पर टेंट से घर बनाते हैं, जिसे रेबो कहा जाता है। श्रीनगर में कई परिवार लकड़ी के डोंगें में रहते हैं। इनकी लम्बाई लगभग 80 फुट तथा चौड़ाई 8-9 फुट होती है। इसमें भी अलग-अलग कमरे होते हैं। कश्मीर में पत्थरों को काटकर एक के ऊपर एक मंजिलें बनायी जाती हैं। प्राचीन काल में, मनुश्य वनों, जंगलों, वृक्षों तथा गुफाओं में रहते थे। परन्तु धीरे-धीरे जब उन्हें ज्ञान हुआ, तो वे बस्तियाँ बना कर रहने लगे। पहले छोटी-छोटी बस्तियों में रहते थे। फिर बड़ी बस्तियाँ बनायी तथा नगरों का निर्माण किया और अपने जीवन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।

विभिन्न प्रकार के पशु आवास

पशु भी मानव की तरह अपने आवास में निवास करता है। इन पशुओं में पालतू पशुओं के आवास मानव निर्मित होते हैं, जबकि जंगली पशु अपने आवास स्वयं निर्मित करते हैं या उन्हें वे प्राकृतिक रूप से उपलब्ध हो जाते हैं। मानव पालतू पशुओं का पालन-पोशण विभिन्न उद्देश्यों के लिए करता है। जबकि, जंगली पशु पारिस्थितिकी तंत्र को बनाये रखने में महत्वूपर्ण योगदान देते हैं। पालतू पशओं में कुत्ता, भैंस, गाय मधुमक्खी, चिड़िया आदि आते हैं। जबकि, जंगली पशुओं में शेर, चीता, हिरण, गैंडा, मगरमच्छ आदि आते हैं। अलग-अलग पशुओं का आवास अलग-अलग होता है।

पर्यावरण – प्राकृतिक पर्यावरण तथा मानवीय

पर्यावरण

पर्यावरण: पर्यावरण शब्द दो शब्दों परि + आवरण से मिलकर बना है। परि का अर्थ है ‘चारों ओर’ तथा आवरण का अर्थ है ‘ढका होना या घिरा होना।’ अर्थात् मनुश्य अपने चारों ओर जिन व्यक्तियों, वस्तुओं तथा स्थानों से घिरा हुआ है उसे पर्यावरण कहते हैं। पर्यावरण प्राकृतिक एवं मानव निर्मित दोनों का मिश्रण होता है।
प्राकृतिक पर्यावरण: प्रकृति से निर्मित वस्तु जैसे – नदी, पहाड़, जल, वायु, ज़मीन, पेड़-पौधे आदि प्राकृतिक पर्यावरण के अन्तर्गत आते हैं। प्राकृतिक वातावरण में स्थलमण्डल, जलमण्डल तथा वायुमण्डल एवं जैवमण्डल शामिल होते हैं। स्थलमण्डल हमें कृशि योग्य भूमि, रहने के लिए ज़मीन, पशुओं को चरने के लिए चारगाह, खनिज सम्पदा तथा वन एंव जंगल, पेड़-पौधे आदि प्रदान करता है। जलमण्डल हमें नदी, झील, समुद्र, जलाशय, महासागर आदि उपलब्ध कराता है। वायुमण्डल को बनाये रखने में पृथ्वी का गुरुत्वाकर्शण बल अपनी अहम भूमिका निभाता है। इममें कई प्रकार की गैसें, धूल-कण एवं जलवाश्प उपस्थित होता है। वायुमण्डल में होने वाला परिवर्तन मौसम एंव जलवायु को प्रभावित करता है। जैव मण्डल के अन्तर्गत पेड़-पौधे और जीव-जन्तु आते हैं।
मानवीय पर्यावरण: प्रकृति में मानव ने जैसे-जैसे विकास किया उसकी आवश्यकताएँ बढ़ती गयीं। प्रारंभ में मानव की आवश्यकताएँ आस-पास की वस्तुओं से पूरी हो जाती थी। परन्तु धीरे-धीरे जैसे वे नयी चीजों को सीखते गया उसकी आवश्यकताएँ बढ़ती गयीं। उसने अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अनेक प्रकार के आविश्कार, निर्माण और कार्य किये। जैसे: फसल उगाना, पहिये का अविश्कार करना, व्यापार आरम्भ करना, साइकिल, कार, हवाई जहाज, मोबाइल, टीवी बनाना आदि।

जैव-विविधता

पृथ्वी पर उपस्थित समस्त जीव-जन्तुओं तथा वनस्पतियों की असंख्य प्रजातियों की विविधता को ’जैव विविधता’ कहते हैं। सम्पूर्ण विश्व की जैव-विविधता का 8 प्रतिशत भारत में है। पृथ्वी पर हमारे जीवन के लिए जैव-विविधता व इसका संरक्षण बहुत ही आवश्यक और महत्वपूर्ण पर्यावरणीय मुद्दा बना हुआ है। पृथ्वी पर इस समृद्ध जैव विविधता को एकत्र होने में लाखों वर्श लग गये। परन्तु जिस प्रकार जातीय क्षति अर्थात् अनेक जीव-जन्तुओं की प्रजाति का विलोपन हो रहा है हम इस सम्पदा को दो-तीन शताब्दी से भी कम समय में खो देंगे।

जैव-विविधता संरक्षण

लुप्त हो रहे वन्य प्राणियों के संरक्षण के लिए कई राश्ट्रीय उद्यानों की स्थापना की गयी तथा कई जंगलों को अभयारण्य घोशित कर दिया गया। जैव विविधता संरक्षण के प्रयास में 14 जीवमण्डल संरक्षित क्षेत्र, 90 राश्ट्रीय उद्यान, 450 से अधिक वन्यजीव अभयारण्य व बहुत से पवित्र उपवनों की स्थापना की गयी है। पृथ्वी की जैव-विविधता की अच्छी तरह देखभाल करना तथा उसकी अगली पीढ़ी को प्रदान करना हमारा नैतिक कर्तव्य है। इस संकट को दूर करने एवं संरक्षण के लिए अन्तर्राश्ट्रीय संघ कार्यरत है।

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