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2 अधिगम और अर्जन (Language Hindi & Pedagogy CTET & TET Exams)

2 अधिगम और अर्जन

अधिगम
अधिगम का अर्थ
अधिगम का अर्थ है: सीखना अथवा व्यवहार परिवर्तन। व्यवहार परिवर्तन अनुभव एवं प्रशिक्षण द्वारा होता है। अधिगम एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है तथा किसी भी शिक्षा प्रणाली में अधिगम का महत्त्वपूर्ण स्थान है।
वुडवर्थ के अनुसार- ‘‘नवीन ज्ञान एवं अनुक्रिया को प्राप्त करने की प्रक्रिया, अधिगम प्रक्रिया कहलाती है।’’
एच.एल.और गैरी के अनुसार- ‘‘अधिगम वह प्रक्रिया है, जिससे व्यवहार की शुरुआत या परिवर्तन, अभ्यास और प्रशिक्षण द्वारा होता है।’’
अधिगम के प्रकार
क्रियात्मक अधिगम: इस प्रक्रिया में शारीरिक गतिविधियों द्वारा किसी विषय-वस्तु को सीखा जाता है; जैसे तैराकी सीखना, कम्प्यूटर सीखना आदि।
विचारात्मक अधिगम: समाज में रहते हुए व्यक्ति हर समय कुछ ना कुछ सीखता है। इससे उसके व्यक्तिव में परिवर्तन भी आता है। मनुष्य जो कुछ भी देखता है या सुनता है, उस पर विचार करके, उससे कुछ सीखता है। इस प्रकार के अधिगम को विचारात्मक अधिगम कहते हैं। इस अधिगम में शरीर की अपेक्षा मस्तिष्क का प्रयोग ज्यादा होता है। इस प्रक्रिया में व्यक्ति का एक निश्चित उद्देश्य होता है।
भाषा-अधिगम: भाषा-अधिगम वह प्रक्रिया है, जिसमे मनुष्य अपनी भाषिक क्षमता का विकास कर उसका प्रयोग अपने विचारों को व्यक्त करने तथा सामाजिक सामंजस्य बनाने के लिए करता है। भाषा-अधिगम अपने आप में रहस्यात्मक प्रक्रिया है। किसी बच्चे द्वारा कम उम्र में भाषा के नियमों को समझ लेना तथा उसे अपने व्यवहार में लाना आज भी एक रहस्य है।
विभिन्न मनोवैज्ञानिकों के अनुसार भाषा-अधिगम
भाषा-अधिगम को लेकर मनोवैज्ञानिकों के मत एक-दूसरे से भिन्न हैं।
व्यवहारवादी पॉवलाव और स्किनर के अनुसार- ‘‘भाषा की क्षमता का विकास कुछ शर्तों के अंतर्गत होता है, जिसमें अभ्यास, नकल, रटने जैसी प्रक्रिया शामिल होती है।’’
चॉम्स्की के अनुसार- ‘‘बालकों में भाषा सीखने की क्षमता जन्मजात होती है तथा भाषा मानव मस्तिष्क में पहले से विद्यमान होती है।’’
पियाज़े के अनुसार- ‘‘भाषा परिवेश के साथ अंत:क्रिया द्वारा विकसित होती है।’’
वाइगोत्सकी के अनुसार– ‘‘भाषा-अधिगम में बालक का सामाजिक परिवेश एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बच्चे की भाषा समाज के संपर्क में आने तथा बातचीत करने के कारण होती है।’’
भाषा अर्जन– सीखी हुई भाषा को ग्रहण करना तथा उसे प्रयोग में लाना भाषा अर्जन कहलाता है। अर्जन व्यवहार परिवर्तन की प्रकिया है। अधिगम और अर्जन दोनों सहगामी क्रियाएँ हैं। भाषा अर्जन का सीधा सम्बन्ध परिवेश से होता है, बालक जिस प्रकार के परिवेश में रहता है उसी प्रकार की भाषा अर्जित करता है। भाषा अर्जन की प्रक्रिया सहज और स्वाभाविक होती है। भाषा अर्जन की प्रक्रिया में बालक द्वारा वर्णों, शब्दों को पहचाने तथा उसके प्रयोग की प्रक्रिया शामिल होती है।
चॉम्स्की के अनुसार- ‘‘भाषा अर्जन की क्षमता बालकों में जन्मजात होती है और वह भाषा की व्यवस्था को पहचानने की शक्ति के साथ पैदा होता है।’’
भाषा अर्जन की विधियाँ
अनुकरण: बालक जब भी भाषा के नए नियम या व्याकरण के नियम सुनता है, वह उसे बिना अर्थ जाने दोहराता है। इसके द्वारा वह इन नियमों को आत्मसात कर अपने भाषा प्रयोग में लाने लगता है।
अभ्यास: भाषा के नए नियमों और रूपों का विद्यार्थी बार-बार अभ्यास करते हैं, जिससे नियम उनके भाषा प्रयोग में शामिल हो जाते हैं।
पुनरावृत्ति: बालक भाषा के जिन नियमों या रूपों को बार-बार सुनता है, वही नियम उसे याद हो जाते हैं और वह उसे अपने व्यवहार में लाने लगता है।
भाषा-अधिगम तथा अर्जन को प्रभावित करने वाले कारक
भाषा-अधिगम तथा अर्जन पर निम्न परिस्थितियों का प्रभाव पड़ता है:
परिवेश: बालक अपने परिवारजनों के द्वारा प्रयोग में लायी जाने वाली भाषा का अनुकरण कर अपनी पहली भाषा सीखता है। यह भाषा उसकी अभिव्यक्ति का पहला साधन भी होती है, जो उसे अपने परिवेश द्वारा प्राप्त होती हैं। यदि परिवेश में भाषा का उच्चारण गलत होता है, तो बालक भी गलत उच्चारण सीखता है। इसलिए भाषा अधिगम पर परिवेश का प्रभाव स्पश्ट रूप से देखने को मिलता है।
सीखने की इच्छाशक्ति: बालक को भाषा तब तक नहीं सिखाई जा सकती जब तक उसकी भाषा सीखने की इच्छा ना हो। बालक अपनी पहली भाषा ‘मातृभाषा’ के रूप में सहज रूप से सीख लेता है। लेकिन द्वितीय भाषा को सीखने से पहले उसके अन्दर नई भाषा के प्रति आदर और इच्छाशक्ति का होना नितांत आवश्यक है।
सिखाई जाने वाली भाषा का छात्र के जीवन से सम्बन्ध:
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, बालक उन विषय-वस्तुओं को जल्दी सीख और समझ लेता है, जिसका सम्बन्ध उसके दैनिक जीवन से होता है। अत: सिखाई जाने वाली भाषा का सम्बन्ध यदि छात्र के दैनिक जीवन से जोड़ दिया जाये, तो भाषा-अधिगम की प्रकिया को सरल बनाया जा सकता है।
छात्र की मानसिक तथा शारीरिक स्थिति: छात्र के भाषा-अधिगम की प्रक्रिया में मानसिक और शारीरिक विकास अहम् भूमिका निभाते है। जिस बालक के स्वर तन्त्र का विकास भली-भाँति होता है और अंगों में परिपक्वता होती है, वह भाषा पर नियन्त्रण प्राप्त करता है। इसी प्रकार मानसिक विकास भाषा के विभिन्न प्रयोगों, भावों और रस को समझने में सहायक होता है।
शिक्षण विधि तथा शिक्षक का व्यवहार: शिक्षण विधि अगर छात्र केंद्रित और स्तर के अनकूल न हो, तो वह भाषा अधिगम को प्रभावित करती है। यदि यह भाषा के नियमों को रटने की शिक्षा पर आधारित हो तो वह भाषा-अधिगम को नीरस बना देती है। बच्चों के साथ प्रेम एवं सहानुभूति पूर्ण व्यवहार किया जाए, तो बच्चे सीखने में रुचि लेते हैं।
शब्द-भण्डार का विकास
बालक के भाशा विकास में शब्द-भण्डार बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वर्णों से शब्द तथा शब्दों से वाक्य बनते हैं। वाक्यों से भाशा निर्माण होता है, जिसके माध्यम से व्यक्ति अपने भावों तथा विचारों को प्रकट करता है। विद्यालय में प्रवेश करने के बाद बालकों के शब्द-भण्डार में वृद्धि होती है। नए शब्दों को सीखने से बालकों के शब्द-भण्डार में बहुत विशेशताएँ देखने को मिलती है। बालक के शब्द-भण्डार में दो प्रकार से नए शब्द जुड़ते चले जाते हैं। एक तो जब बालक स्वंय शब्दों का प्रयोग करता है तथा दूसरा उस समय जब बालक किसी अन्य व्यक्ति को शब्द प्रयोग करते हुए देखता है। किसी अन्य व्यक्ति के द्वारा शब्द प्रयोग करते देखते हुए बालक उन शब्दों को समझ लेता है। बालक के शब्द-भण्डार पर उसके आस-पास के परिवेश का भी प्रभाव पड़ता है। विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने प्रयोगों के आधार पर भिन्न-भिन्न आँकड़े प्रस्तुत किए, उन्हीं आँकड़ों के आधार पर बालकों के शब्द-भण्डार में होने वाली वृद्धि को निम्न प्रकार से स्पश्ट किया गया है-
बालकों की आयु बालकों का शब्द-भण्डार

जन्म से 8 माह तक0
9 माह से 12 माह तक 3 से4 शब्द
डेढ़ वर्श तक10 या 12 शब्द
2 वर्श तक272 शब्द
ढाई वर्श तक450 शब्द
3 वर्श तक1 हजार शब्द
साढे़ तीन वर्श तक1250 शब्द
4 वर्श तक1600 शब्द
5 वर्श तक2100 शब्द
11 वर्श तक50000 शब्द
14 वर्श तक80000 शब्द
16 वर्श तक1 लाख से अधिक शब्द

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