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14. प्रयोगात्मक तथा व्यावहारिक कार्य (EVS Environment Studies for CTET & TET in Hindi)

14. प्रयोगात्मक तथा व्यावहारिक कार्य

प्रयोगात्मक कार्य

किसी भी विषय को जितना हम पढ़ कर सीखते हैं, उससे कहीं ज्यादा, उसे प्रयोग द्वारा सीख सकते हैं। क्योंकि प्रयोग करते समय हम पूरी तरह केंद्रित रहते हैं। इसमें हमारी समस्त इंद्रियाँ क्रियाशील होती हैं।

पर्यावरण शिक्षण के विभिन्न प्रयोग

पर्यावरण शिक्षण को अधिक प्रभावशाली बनाने में प्रयोगात्मक कार्यों का महत्वपूर्ण स्थान है। जैसे जल का संरक्षण एवं जल को शुद्ध करने के लिए प्रयोगात्मक विधियाँ अपनायी जाती हैं। ग्लोब के प्रयोग द्वारा समस्त भूमंडल (स्थलमंडल, जलमंडल, वायुमंडल) की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। विद्यालय की क्यारियों में पौधे लगाकर उनके बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

प्रयोग प्रदर्शन विधि

प्रयोग प्रदर्शन विधि का अर्थ है ‘प्रयोग करके दिखाना।’ प्रयोग प्रदर्शन विधि में अध्यापक कक्षा में विषय-वस्तु को पढ़ाने तथा समझाने के साथ-साथ उसे प्रयोग करके भी दिखाता है। विद्यालय में प्रयोगशाला के अंदर तथा कक्षा में भी छात्र विभिन्न उपकरणों की मदद से प्रयोग करके देख सकते हैं। इससे बालक अच्छी तरह सीख सकते हैं।

प्रयोग प्रदर्शन विधि के गुण

प्रयोग प्रदर्शन विधि में एक-साथ समस्त कक्षा के विद्यार्थियों को प्रयोग करके दिखाया जा सकता है तथा इससे समय और धन की भी बचत होती है। बच्चों से प्रयोग कराने की अपेक्षा स्वयं करके दिखाने से कक्षा नियंत्रण में रहती है। इस विधि से कठिन प्रयोग को भी सरल बनाया जा सकता है।

प्रयोग प्रदर्शन विधि के दोष

इस विधि में बच्चों को स्वयं प्रयोग करने को नहीं मिलता है। इससे उनमें स्वयं प्रयोग करने और ज्ञान प्राप्त करने की क्षमता का विकास नहीं हो पाता है। यह विधि बच्चों पर अधिक प्रभाव नहीं डाल पाती है क्योंकि इससे प्राप्त ज्ञान अस्थायी होता है।

प्रयोग विधि

यदि किसी भी कार्य को स्वयं करके सीखा जाए, तो इससे प्राप्त ज्ञान स्थायी होता है तथा यह बच्चों के विकास में अधिक प्रभावशाली होता है। प्रयोग, प्रयोगशाला या कक्षा में या कक्षा के बाहर भी किया जाता है। प्रयोग करने के लिए बालक आवश्यक सामग्री के साथ प्रयोगशाला से बाहर से भी प्रयोग कर सकता है। प्रयोग विधि द्वारा बालक अपनी समस्या का हल स्वयं निकाल सकता है।

प्रयोग विधि के गुण

प्रयोग विधि से छात्र को आत्मबल मिलता है। इस विधि का प्रयोग कहीं भी कर सकते हैं। इस विधि में बालक को पूर्ण स्वतंत्रता रहती है।

प्रयोग विधि के दोष

कमजोर छात्र इस विधि का प्रयोग नहीं कर पाते हैं। इस विधि में छात्रों का मूल्यांकन सही ढंग से नहीं हो पाता है।

प्रयोगात्मक तत्व का महत्व

प्रयोग करके सीखना किसी विषय-वस्तु को पढ़कर सीखने से कहीं ज्यादा प्रभावशाली है। प्रयोगिक ज्ञान अधिक टिकाऊ एवं अच्छी तरह याद रहने वाला होता है। अनेक प्रकार के प्रयोगों से छात्र को आनंद की अनुभूति होती है तथा उसके आत्मविश्वास को बल मिलता है। प्रयोगात्मक विधि के दौरान छात्रों को बाहर निकलने का भी अवसर प्राप्त होता है।

चर्चा

पर्यावरण में विभिन्न प्रकार के तत्व उपस्थित होते हैं। जैसे जल, वायु, पेड़-पौधे, जीव-जंतु आदि।
जल: यह एक ऐसा तत्व है जिसके बिना पृथ्वी पर जीवन असंभव है।
यह प्रकृति द्वारा प्रदत्त एक बहुमूल्य उपहार है। जल अमृत के समान है। जल का संरक्षण बहुत ही आवश्यक है अन्यथा आने वाले समय में जल का भारी संकट उत्पन्न हो जाएगा। नदियों, झीलों, तालाबों आदि से लगभग 40% पानी सूख चुका है। अत: इसके संरक्षण का प्रबंध करना चाहिए। जल का संरक्षण निम्न विधियों से किया जा सकता है।
जल संचय: जगह-जगह पर जहाँ जमीन बंजर या ऊसर हो गयी है वहाँ गड्ढा खोदकर बरसात के पानी को इकट्ठा किया जा सकता है। इससे जल धीरे-धीरे रिसकर जमीन के अंदर चला जाएगा।
सिंचाई में होने वाली जलहानि को रोक कर: सिंचाई करते समय यदि पानी को फव्वारों के रूप में प्रयोग किया जाता है, तो पानी की खपत कम होती है। सिंचाई के लिए बनी नहरों तथा नालियों को पक्का बनाने से पानी का ह्रास कम होता है। सुबह तथा शाम में सिंचाई करने से वाष्पीकरण कम होता है।
जलवाहक की रोकथाम: वर्षा के पानी का बहकर नष्ट हो जाना जलवाह कहलाता है। इसे रोकने के लिए पहाड़ों पर सीढ़ीनुमा खेत बनाए जाते हैं। सीढ़ीनुमा खेतों में मेढ़ बनाये जाते हैं जो पानी के बहाव को रोकता है। जलवाह को नालियाँ बनाकर एक बड़े तालाब में पानी को इकट्ठा करके रोका जा सकता है। जल जमाव से भू-भाग का जल स्तर बढ़ता है।
वाष्पीकरण में कमी: पृथ्वी की सतह पर उपस्थित जल का बहुत बड़ा भाग वाष्पित हो जाता है। ठंडे प्रदेशों में मिट्टी की सतह के नीचे ‘एस्फॉल्ट’ के अवरोध बनाकर पानी को रोककर वाष्पन को कम किया जा सकता है। पानी सोखने में बलुई मिट्टी अधिक उपयोगी है। वर्षा के पानी को अनेक प्रकार से संरक्षण कर सकते हैं। साथ ही मिट्टी की उर्वरा शक्ति, मृदा जल व भूजल स्तर में भी सुधार हो सकता है।

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