10 Hindi Chapter 7 पतझर में टूटी पत्तियाँ रविंद्र केलकर

Chapter Notes and Summary
प्रस्तुत पाठ ‘पतझर में टूटी पत्तियाँ’ के अंश ‘गिन्नी का सोना’ आदर्श और व्यवहार की विचार चेतना को स्पष्ट करता है। लेखक का मानना है कि आदर्श शुद्ध सोना है तथा व्यावहारिकता ताँबा है। शुद्ध सोने में थोड़ा-सा ताँबा मिलाकर ही गहने बनाये जाते हैं। यह सोना शुद्ध सोने से अधिक चमकदार तथा मजबूत होता है।
शुद्ध आदर्श भी शुद्ध सोने की तरह है जिसमें व्यावहारिकता का अंश मिलाकर ‘प्रैक्टिकल आइडियालिस्ट’ बनते हैं। गाँधीजी के बारे में माना जाता है कि वे ‘प्रैक्टिकल आइडियालिस्ट’ थे। ‘प्रैक्टिकल आइडियालिस्ट’ एक ओर आदर्श को महत्त्व देता है तो दूसरी ओर व्यावहारिकता के महत्त्व को पहचानता है‚ उसकी कीमत को जानता है। गाँधीजी यदि केवल आदर्श को लेकर चलते तो परिणाम वह नहीं मिलता‚ जो मिला‚ लेकिन व्यावहारिकता को अपनाकर उन्होंने देश का नेतृत्व किया।
व्यावहारिकता को अपनाना अच्छी बात हो सकती है किंतु समाज में सफलता के लिए आदर्श को आगे रखना होता है। समाज के पास जो मूल्य हैं‚ जिन पर हमारा अस्तित्व टिका है‚ वह आदर्श की वजह से ही संभव हुआ है। यदि आदर्श समाज से विलुप्त हो जाए‚ तो व्यवहारवादी सामाजिक मूल्यों को उस रूप में बचा कर शायद ही रख सकते हैं।
‘गिन्नी का सोना’ वस्तुत: जागरूक तथा सक्रिय नागरिक बनने की प्रेरणा देता है। यह जीवन में अपने लिए सुख-सुविधाएँ जुटाने वालों को नहीं‚ बल्कि उन लोगों को महत्त्व देता है‚ जो जगत को जीने तथा रहने के योग्य बनाते हैं।
II.
झेन की देन
प्रस्तुत पाठ ‘पतझर में टूटी पत्तियाँ’ के अंश ‘झेन की देन’ बौद्ध दर्शन में वा णत ‘ध्यान’ से प्रभावित जापानियों के जीवन तथा उनकी व्यस्ततम दिनचर्या के बाद आत्मिक शांति के पल को सामने लाता है।
लेखक का एक मित्र मानता है कि जापान के 80 प्रतिशत लोग मानसिक रोगों के शिकार हैं। मानसिक रोगों का कारण वहाँ की दिनचर्या है। लोग लगातार काम करते जाते हैं। महीने भर का काम एक दिन में करने की तेजी से उन्हें अपने दिमाग को तेज रफ्तार के साथ दौड़ाना पड़ता है। इससे तनाव बढ़ता है और तनाव से मानसिक रोग।
जापान के लोग व्यस्त जीवन के बीच ऐसी जगहों की तलाश कर लेते हैं‚ जहाँ शांति तथा सन्नाटे में दो पल गुजार कर मानो सारी थकावट दूर कर लें।
‘टी सेरेमनी’ ऐसी ही एक जगह है जहाँ चाय बनाने की परंपरागत पद्धति को अपनाया जाता है। इस जगह पर एक साथ तीन व्यक्तियों से अधिक प्रवेश नहीं कर सकते हैं। ऐसी जगह पर लोग भूतकाल तथा भविष्य को भूल कर केवल वर्तमान में जीते हैं। चाय पीने की इस प्रक्रिया को झेन परंपरा की बड़ी देन माना जाता है।
वस्तुत: झेन की परंपरा ने जापानियों को जीने का नया अंदाज दिया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *