10 Hindi Chapter 5 दोहे बिहारी

Chapter Notes and Summary
कवि का परिचय
बिहारी की कविता में शृंगार रस की प्रधानता है। उन्होंने केशवदास से काव्य ज्ञान ग्रहण किया। उनकी कविताओं में नायक‚ नायिका तथा अन्य पात्रों की चेष्टाओं एवं हाव-भाव का सुंदर चित्र प्रस्तुत किया गया है। बिहारी ने शृंगारपरक दोहों की रचना की। दोहों में नायक-नायिका के हाव-भाव के अतिरिक्त लोक-व्यवहार‚ नीति ज्ञान इत्यादि विषयों पर भी बिहारी ने बहुत कुछ लिखा है।
बिहारी अपने दोहों में कम-से-कम शब्दों में अधिक-से-अधिक अर्थ भरने की कला में निपुण हैं। इसी कारण आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने बिहारी को ‘गागर में सागर’ भरने वाला कवि बताया है और उनके दोहों की अर्थ-गंभीरता को देखते हुए‚ ‘देखन में छोटे लगैं‚ घाव करें गंभीर’ भी कहा गया है।
बिहारी ने केवल एक ग्रंथ ‘बिहारी सतसई’ की रचना की। ‘बिहारी सतसई’ में सात सौ दोहे संकलित हैं। ‘दोहा’ जैसे छोटे-से छंद में कवि बिहारी ने गहरी अर्थव्यंजना तथा प्रभाव को दर्शाया है। बिहारी के दोहों में प्रेम तथा भक्ति को अधिक महत्व मिला है। कुछ नीति संबंधी दोहे भी शामिल किए गए हैं।
बिहारी के दोहों की भाषा ब्रजभाषा है। वह शुद्ध तथा मानक ब्रजभाषा है।
बिहारी ने ब्रजभाषा को महत्त्वपूर्ण काव्य-शैली से युक्त साहित्यिक भाषा बना दिया। उनके दोहों में बुंदेलखंडी शब्दों के अतिरिक्त पूर्वी बोलियों के प्रयोग भी मिल जाते हैं।
पाठ्य पुस्तक में संकलित ‘दोहे’ जगन्नाथ दास रत्नाकर की रचना ‘बिहारी रत्नाकर’ से लिए गए हैं।

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दोहों का भावार्थ
सोहत ओढ़ै पीतु पटु ………………………. आतपु पर्यौ प्रभात॥
भावार्थ प्रस्तुत दोहे में कवि बिहारीलाल ने कृष्ण के रूप-सौंदर्य का मोहक वर्णन किया है। उनके अनुसार‚ श्रीकृष्ण के साँवले सलोने शरीर पर पीले वस्त्र शोभायमान हो रहे हैं। इन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता है‚ मानो नीलमणि पर्वत पर प्रात:कालीन सूर्य की किरणें अपना प्रकाश बिखेर रही हैं।
बिहारी ने श्रीकृष्ण के मनोहारी रूप का वर्णन करने के लिए यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार का सुंदर प्रयोग किया है। नीलमणि पर्वत में श्रीकृष्ण के शरीर तथा उनके पीले वस्त्रों में प्रात:कालीन सूर्य किरणों की संभावना प्रकट की गई है।
काव्यगत विशेषताएँ
• बिहारी ने छोटे-से दोहे में कृष्ण के सौंदर्य का सुंदर चित्रण किया है।
• नीलमणि पर्वत में कृष्ण के शरीर तथा सूर्य प्रकाश में पीतांबर की संभावना उत्पन्न करना उत्प्रेक्षा अलंकार का सुंदर उदाहरण है।
कहलाने एकत बसत ……………………….. दीरघ-दाघ निदाघ॥
भावार्थ कवि ने इस दोहे में ग्रीष्म ऋतु की तीक्ष्णता को सामने रखा है।
भीषण गर्मी के कारण सभी परेशान हैं। इस गर्मी से बचने के लिए सभी अपनी शत्रुता भूल जाते हैं। साँप एवं मोर तथा मृग एवं बाघ एक-दूसरे के शत्रु हैं किंतु छाया तथा शीतलता पाने की कामना से सब एक साथ निवास कर रहे हैं। इस प्रचंड गर्मी में जंगल का हिंसक वातावरण तपोवन के समान शांत एवं पवित्र बन गया है।
बिहारी ने इस पद में गर्मी की भीषणता के साथ प्राणियों की एकता को दर्शाकर मनुष्यों को शिक्षा दी है कि हमें भी आड़े समय में शत्रुता को भूलकर एक-दूसरे का भला सोचना चाहिए।
कक्षा १० हिन्दी ‘ब’
काव्यगत विशेषताएँ
• कवि बिहारीलाल ने ‘ग्रीष्म’ का वर्णन करते हुए‚ वन्य-जगत के प्राणियों के व्यवहार को भी चित्रित करने का प्रयास किया है।
• इस पद में ‘दीरघ-दाघ निदाघ’ में छेकानुप्रास अलंकार को स्थान दिया गया है।
बतरस-लालच लाल की …………………….. दैन कहैं नटि जाइ॥
भावार्थ कवि बिहारी ने इस दोहे में नायिका के ‘हाव’ अर्थात् ‘चेष्टाओं’ का सुंदर चित्रण किया है। नायिका राधा नायक कृष्ण के साथ बातचीत के आनंद में लीन रहने के लिए उनकी बाँसुरी छिपा लेती है। कृष्ण जाने के लिए अपनी बाँसुरी राधा से माँगते हैं। राधा बाँसुरी देने से साफ मना कर देती है‚ लेकिन भौंहों में कुटिल मुस्कान इस बात की पुष्टि करती है कि बाँसुरी राधा के पास ही है। सौगंध खाने के बाद भी उसकी चेष्टाएँ बता देती हैं कि वह कृष्ण के सान्निध्य सुख को और प्राप्त करना चाहती है।
कवि ने इन दो पंक्तियों में नायिका के मनोभाव का ऐसी गहराई के साथ वर्णन किया है‚ जो अन्यत्र संभव नहीं है।
काव्यगत विशेषताएँ
• कवि ने इस दोहे में नायक-नायिका के भावों को मोहकता के साथ सामने रखा है।
• ‘लालच लाल’ में अनुप्रास अलंकार है।
कहत‚ नटत‚ रीझत‚ खिझत ………………… नैननु हीं सब बात ॥
भावार्थ बिहारी ने इस दोहे में नायक-नायिका के प्रणय-निवेदन की सांकेतिक भाषा को सामने रखा है। परिजनों के बीच भवन के आँगन में बैठी नायिका तथा द्वार पर खड़े नायक के बीच इशारों में बातें हो रही हैं। नायक के कुछ कहने पर नायिका का मना करना‚ नायक का रीझना (मोहित होना) और इससे नायिका के खीझ जाने से नायक-नायिका के नयनों का मिलना‚ जिससे नायक का चेहरा खिल जाता है और उसके खिले हुए चेहरे को देखकर नायिका शरमा जाती है।
नायक-नायिका का यह संपूर्ण प्रेम-संप्रेषण आँखों-ही-आँखों में हो जाता है। इस प्रकार नायक-नायिका परिजनों से भरे भवन में बिना कुछ बोले नयनों की भाषा से ही बातें करने में सफल हो जाते हैं।
काव्यगत विशेषताएँ
• बिहारी ने इस दोहे के अंतर्गत नायक-नायिका के विस्तृत प्रेमालाप को सहजता एवं सटीकता के साथ सामने रखा है।
• ‘कहत‚ नटत‚ रीझत‚ खिझत‚ मिलत‚ खिलत‚ लजियात’ में ‘त’ की बार-बार आवृत्ति हुई है। यह वृत्यानुप्रास अलंकार का सुंदर उदाहरण है।
• यह दोहा ‘गागर में सागर’ को सही अर्थों मे चरितार्थ करता है।
बैठि रही अति सघन बन …………………….. छाँहों चाहति छाँह॥
भावार्थ कवि ने जेठ मास की भयंकर गर्मी व प्रकोप को इस दोहे में दर्शाया है। उनके अनुसार‚ ऐसी गर्मी है कि छाया भी छाँह प्राप्त करना चाहती है। दूसरों को शीतलता प्रदान करने वाली छाया भी गर्मी से व्याकुल हो जाती है तथा जंगल में एवं घरों में जाकर छिप गई है तथा कहीं दिखाई नहीं देती। ऐसे में बिहारी की काव्य-नायिका कभी सघन वन में जाती है तो कभी घर के भीतर किसी कोने में छिपकर बैठ जाती है। स्वयं को इस भीषण गर्मी से बचाने के लिए वह इधर-उधर भागती रहती है। जेठ की दोपहर ऐसी ही होती है। वस्तुत: कवि ने ग्रीष्म ऋतु के ताप से बेचैन नायिका की चंचलता को यहाँ चित्रित किया है।
काव्यगत विशेषता
• कवि बिहारीलाल जेठ की दोपहर का चित्र सामने लाकर नायिका की मनोभावना को उभारते हैं‚ वह नायक से मिलन की आकांक्षा पाले रहती है। जेठ की दोपहर वस्तुत: नायिका के प्रेमेच्छा का प्रतीक है।
कागद पर लिखत न बनत ……………………. मेरे हिय की बात॥
भावार्थ नायिका को अपने प्रेम भरे हृदय की बात आँसू‚ पसीने एवं कंपकंपी के कारण कागज पर पत्र के रूप में लिखना संभव नहीं हो पा रहा है। संदेश भेजने में भी उसे लज्जा का अनुभव हो रहा है। इस प्रकार नायिका अपने प्रेम को अभिव्यक्त नहीं कर पाती‚ किंतु नायक का हृदय नायिका के हृदय की सारी बातें समझने में समर्थ है। वस्तुत: प्रेम अनुभूति का विषय है‚ जिसे व्यक्त करने में नायक-नायिका सक्षम न होते हुए भी एक-दूसरे के मन की बात जान लेते हैं।
कक्षा १० हिन्दी ‘ब’
काव्यगत विशेषता
• दोहा 24 मात्राओं का एक छंद है‚ जिसमें 13 तथा 11 मात्राओं के बाद क्रमश: विश्राम होता है।
प्रकट भए द्विजराज कुल ……………………… केसव केसवराइ।
भावार्थ इस दोहे में कवि बिहारी लाल ने अपना परिचय दिया है। बिहारी का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बाद में उन्होंने अपना निवास ब्रजमंडल में बनाया। कवि अपने आराध्य श्रीकृष्ण से अपने कष्टों को हरने की प्रार्थना करते हैं।
उनका मानना है कि उनके कष्टों का निवारण श्रीकृष्ण या फिर उनके पिता (बिहारी के पिता) ‘केशवराय’ ही कर सकते हैं।
इस दोहे में बिहारी ने अपना परिचय देते हुए‚ ईश्वर तथा पिता की महानता का गुणगान भी किया है।
काव्यगत विशेषताएँ
• ‘केसव केसवराइ’ में अनुप्रास अलंकार है।
• बिहारी ने इस दोहे में दैन्य भाव के साथ ईश्वर का स्मरण किया है।
जपमाला‚ छापैं‚ तिलक ………………………… साँचै राँचे रामु॥
भावार्थ कवि ने इस दोहे में धार्मिक रूढ़ियों तथा अंधविश्वासों को व्यर्थ माना है। उसके अनुसार‚ माला जपने‚ छापा-तिलक लगाने भर से कोई काम सिद्ध नहीं हो सकता‚ यदि मन ही शुद्ध नहीं है। हृदय की कालिमा लेकर तीर्थ-यात्रा करना व्यर्थ है क्योंकि ईश्वर का निवास शुद्ध तथा सत्य से पूर्ण आत्मा में ही होता है।
मन में ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति-भावना होने से ही ईश्वर प्राप्ति संभव है।
बिहारी इस पद के माध्यम से नीति का उपदेश देते हुए ढोंग करने वालों को सचेत करते हैं। ईश्वर को पाने के लिए मनुष्य को सच्चे हृदय का होना जरूरी है।
काव्यगत विशेषताएँ
• ‘साँचे राँचे’ में वृत्यानुप्रास अलंकार है।
• बिहारी के इस दोहे में ‘ब्रजभाषा’ है‚ जिसमें तत्सम शब्द ‘वृथा’ का प्रयोग हुआ है।
दोहे

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