10 Hindi Chapter 4 सर्वेश्वर दयाल सक्सेना मानवीय करुणा की दिव्य चमक

Chapter Notes and Summary
प्रस्तुत संस्मरण फादर कामिल बुल्के पर लिखा गया है। फादर कामिल बुल्के का जन्म बेल्जियम (यूरोप) के रैम्स चैपल शहर में हुआ था। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के अंतिम वर्ष में पहुँचकर उन्होंने संन्यास ले लिया था और वे भारत में आकर बस गए थे। उन्होंने भारत को ही अपनी कर्मभूमि बनाया। वे हिंदी के कट्टर समर्थक थे। वे हिंदीभाषियों द्वारा हिंदी की दुर्दशा देखकर दुखी होते थे। वे हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखना चाहते थे। प्रसिद्ध ‘अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोश’ कामिल बुल्के द्वारा तैयार किया गया था। फादर बुल्के संन्यासी थे परंतु संन्यासियों की तरह न रहकर सबके दुख-दर्द में शामिल होते थे। लेखक के साथ फादर के अंतरंग संबंध थे। लेखक का यह मानना है कि जब तक रामकथा है‚ इस विदेशी साधु को याद किया जाएगा तथा उनको हिंदी भाषा तथा बोलियों के अगाध प्रेम का उदाहरण माना जाता रहेगा। फादर कामिल बुल्के के हृदय में सदा ही दूसरों के लिए प्यार रहा है। ईश्वर में उनकी अटूट आस्था थी। बीमारी के कारण उनकी मृत्यु से लेखक सर्वेश्वर दयाल सक्सेना विचलित हैं। आकर्षक व्यक्तित्व वाले फादर के साथ लेखक का पैंतीस वर्षों का संबंध रहा है। फादर को याद करते ही मन उदास हो जाता है। उनसे बात करने में एक तरह की पवित्रता का अहसास होता था। वे हँसी-मजाक में भी निर्लिप्त भाव से शामिल होते थे। उत्सव या किसी संस्कार के अवसर पर वे बड़े भाई या किसी पुरोहित जैसे नजर आते थे। उनकी आँखों में सदा वात्सल्य का ही भाव रहता था।
फादर अध्ययनशील व्यक्ति थे। उनको कभी क्रोध नहीं आता था‚ हाँ वे कभी-कभी आवेश में आ जाते थे। इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में थे तभी उन्होंने संन्यासी बनने की ठान ली। उनका भरा-पूरा परिवार था। वे संन्यास लेने के बाद भारत में बस गए और इसे ही अपना देश समझने लगे। उनकी जन्म-भूमि बेल्जियम (यूरोप) में रैम्स चैपल थी। परिवार के साथ उनका पत्र व्यवहार चलता रहता था। अपने अभिन्न मित्र रघुवंश को वह उन चिट्ठियों को दिखाया करते थे। उनके पिता व्यवसायी थे व छोटा भाई पादरी बन गया था। उनकी बहन बहुत जिद्दी थी। जिद के कारण उसने बहुत देर से शादी की। भारत आने से पहले उन्होंने ‘जिसेट संघ’ में दो साल तक पादरियों के बीच रहकर धर्माचार की पढ़ाई की। फिर नौ-दस वर्षों तक दार्जिलिंग में पढ़ते रहे। कोलकाता से बी ए और इलाहाबाद से एम ए किया। प्रयाग विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में रहकर अपना शोध-प्रबंध पूरा किया। बाद में वे सेंट जेवियर्स कॉलेज‚ राँची में हिंदी व संस्कृत विभाग के अध्यक्ष हो गए और ‘अंग्रेजी-हिंदी शब्दकोश’ का निर्माण किया तथा ‘बाइबिल’ का भी अनुवाद किया। सैंतालिस वर्षों तक भारत में सेवा करने के बाद 73 वर्ष की उम्र में उनका देहांत हो गया। फादर बुल्के यद्यपि संन्यासी थे लेकिन परंपरावादी संन्यासी नहीं। वे जिस किसी से भी संबंध जोड़ते थे‚ उसे अंत तक निभाते थे। अनेक वर्षों बाद भी वे जब भी दिल्ली आते‚ लेखक से मिले बिना नहीं जाते थे। लेखक भी ‘परिमल’ के उन दिनों को याद करता है‚ जिसमें सब एक पारिवारिक बंधन में बँधे थे। उस परिवार में फादर बुल्के किसी ऊँचाई पर देवदारु की छाया जैसे दिखाई देते थे। चाहे हँसी-मजाक हो या गोष्ठी की बहस‚ लेखक की रचनाओं संबंधी चर्चा हो या किसी के घर का उत्सव‚ सभी जगह उपस्थित होकर अपनी ममता और प्यार लुटाते थे। हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखने की उन्हें विशेष चिंता थी। हिंदी भाषी द्वारा हिंदी की ही उपेक्षा देखकर वे बहुत दुखी होते थे और झुंझलाते थे। दिल्ली में ही वे बीमार रहे और यहीं 18 अगस्त‚ 1982 की सुबह दस बजे उनका निधन हो गया। फादर की देह को कब्र में लिटाया गया और राँची के फादर पास्कल तोयना ने उनका अंतिम संस्कार किया। उनके जीवन और कर्म पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उन्होंने कहा कि ‘फादर बुल्के’ धरती में जा रहे हैं। इस धरती से ऐसे और रत्न पैदा हों। लेखक ने उन्हें हमेशा मानवीय करुणा की दिव्य चमक में खड़ा पाया।

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