10 Hindi Chapter 3 मधु कांकरिया साना साना हाथ जोड़ि

Chapter Notes and Summary
‘साना-साना हाथ जोड़ि’ एक यात्रा वृत्तांत है। इसमें लेखिका मधु कांकरिया ने पूर्वोत्तर भारत के सिक्किम राज्य की राजधानी गंगटोक (गंतोक) और उसके आगे हिमालय की यात्रा का रोचक वर्णन किया है। हिमालय के अनंत सौंदर्य का ऐसा अद्भुत वर्णन लेखिका ने किया है कि मानो हिमालय का पल-पल परिवर्तित सौंदर्य हम अपनी आँखों से निहार रहे हों। इस यात्रा वृत्तांत की विशेषता यह है कि लेखिका अपने सामाजिक दायित्व के प्रति सजग है और मेहनतकश लोगों के प्रति उसके मन में सम्मान का भाव है। लेखिका गंतोक शहर को देखकर इतनी सम्मोहित हो जाती है कि वह शून्य में खो जाती है। गंतोक मेहनतकश लोगों का ऐसा शहर है‚ जिसका सब कुछ सुंदर है—सुबह‚ शाम‚ रात। अचानक एक प्रार्थना लेखिका के होठों को छूने लगी‚ जो उसने एक नेपाली युवती से सीखी है—साना-साना हाथ जोड़ि‚ गर्दहु प्रार्थना। हाम्रो जीवन तिम्रो कौसेली … (छोटे-छोटे हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रही हूँ कि मेरा सारा जीवन अच्छाइयों को समर्पित हो)। सुबह लेखिका को ‘यूमथांग’ नामक स्थान के लिए जाना था। गंतोक से 149
किलोमीटर की दूरी पर यूमथांग था। लेखिका को बर्फ से ढकी चोटियों को देखने का बहुत शौक था। उनके ड्राइवर-कम-गाइड जितेन नार्गे ने बताया कि ‘यूमथांग’ यानि घाटियाँ‚ सारे रास्ते हिमालय की गहनतम घाटियाँ और फूलों से लदी वादियाँ मिलेंगी आपको! जीप पर जाते समय रास्ते में लिखी हुई सफेद बौद्ध पताकाएँ मिलीं। नार्गे ने बताया कि यहाँ बुद्ध की बड़ी मान्यता है। जब भी किसी बुद्धिस्ट की मृत्यु होती है
उसकी आत्मा की शांति के लिए शहर से दूर किसी पवित्र स्थान पर एक सौ आठ श्वेत पताकाएँ फहरा दी जाती हैं। इन्हें उतारा नहीं जाता। ये धीरे-धीरे अपने आप नष्ट हो जाती हैं। कई बार किसी नए कार्य की शुरूआत में भी ये पताकाएँ लगा दी जाती हैं‚ पर वे रंगीन होती हैं। रास्ते में जीप में से ही ‘कवी-लांगस्टॉक’ नामक स्थान देखा‚ जहाँ ‘गाइड’ फिल्म की शूटिंग हुई थी। एक धर्म-चक्र देखा। नार्गे ने बताया—यह धर्म-चक्र है—प्रेयर व्हील। इसको घुमाने से सारे पाप धुल जाते हैं। यहाँ पर एक ऐसा पत्थर है जो लेप्याचार और भुटिया‚ सिक्किम की इन दो स्थानीय जातियों का स्मरण करवाता है। लेखिका सोचने लगी—पहाड़ हो या मैदान … तमाम वैज्ञानिक प्रगतियों के बावजूद इस (भारत) देश की आत्मा एक है। लोगों की आस्थाएँ‚ विश्वास‚ अंधविश्वास‚ पाप-पुण्य की धारणाएँ एक जैसी हैं। गाड़ी जैसे-जैसे ऊँचाई पर चढ़ने लगी‚ बाजार और बस्तियाँ पीछे छूटने लगीं। चलते-चलते स्वेटर बुनती युवतियाँ और भारी-भरकम कार्टूनों को पीठ पर ढोते बौने बहादुर दृश्य से ओझल होने लगे। हिमालय अब अपने विराट वैभव के साथ दृष्टिगोचर हो रहा था। रास्ते जलेबी की तरह घुमाव लेने लगे। घाटियाँ गहरी और वादियाँ चौड़ी होने लगीं। बीच-बीच में फूल मुस्कराने लगे। सभी सैलानी झूमकर गाने लगे—‘‘सुहाना सफर और ये मौसम हँसीं … ।’’ सारे परिदृश्य को अपने भीतर भर लेने की इच्छा से लेखिका खिड़की से सिर निकालकर गगनस्पर्शी पर्वत-शिखरों को देखती‚ तो कभी दूध की धार की तरह झर-झर गिरते प्रपातों को और कभी गुलाबी पत्थरों के बीच इठलाकर बहती तिस्ता नदी को‚ जिसका सौंदर्य अपनी चरम सीमा पर था। रास्ते में एक झरना जिसे सभी ने कैमरे में कैद किया था‚ वह था ‘सेवन सिस्टर्स वॉटर फॉल’। इसे देखकर ऐसा लगा कि भीतर के सभी तामसिक विचार एवं दुष्ट वासनाएँ इसकी निर्मल धारा में बह गए। जितेन ने लेखिका से कहा कि ‘आगे इससे भी सुंदर नजारे मिलेंगे।’ हिमालय का रूप पल-पल बदल रहा था। कहीं हरियाली तो कहीं हल्का पीलापन और कहीं पथरीला। कहीं चटकी धूप‚ कहीं बादलों की चादर। लेखिका ‘माया’ और ‘छाया’ के इस अनूठे खेल को निहार रही थी। वहाँ अपने को निरंतर दे देने की अनुभूति कराते पर्वत‚ झरने‚ फूल‚ घाटियों के दुर्लभ नजारे थे। पहली बार अहसास हुआ—‘‘जीवन का आनंद है यही चलायमान सौंदर्य।’’ यूँ लगता था मानो हम ईश्वर के बहुत निकट हैं। लेखिका सम्मोहित-सी आगे निकल आने पर देखती है कि कुछ पहाड़ी औरतें पत्थरों पर बैठी पत्थर तोड़ रही थीं। कइयों की पीठ पर बँधी डोको (टोकरी) में उनके बच्चे भी बँधे हुए थे। कुछ कुदाल को भरपूर ताकत के साथ जमीन पर मार रही थीं। मातृत्व और श्रम साधना साथ-साथ हो रही थी। वह सड़कों को चौड़ा करने का दु:साध्य कार्य कर रही थीं। इन पत्थर तोड़ती पहाड़िनों के हाथों में पड़े ठाठे (गाँठ के निशान) एक ही कहानी कह रहे थे—आम आदमी की कहानी हर जगह एक-सी है कि सारी मलाई एक तरफ और सारे अभाव‚ सारे आँसू‚ यातना और वंचना एक तरफ। लेखिका को सिक्किम सरकार का बोर्ड याद आया‚ जिस पर लिखा था—एवर वंडर्ड टू डिफाइंड डैथ टू बिल्ड दी रोड्स। इन रास्तों को बनाने में इन्होंने मौत को भी झुठलाया है। लेखिका सोच रही थी कि मेरे देश की आम जनता‚ कितना कम लेकर‚ समाज को कितना अधिक वापिस लौटा देती है। तभी वे श्रम-सुंदरियाँ किसी बात पर खिलखिलाकर हँस पड़ीं। लेखिका को लगा मानो ‘खंडहर ताजमहल बन गया हो।’ जीप फिर से ऊँचाइयाँ चढ़ने लगी। रास्ते में बच्चों को भी स्कूल से आते देखा। ये बच्चे प्रतिदिन साढ़े तीन किलोमीटर की पहाड़ी चढ़कर स्कूल जाते हैं। यहाँ का जीवन बहुत कठोर है। नीचे तराई में केवल एक ही स्कूल है। ये बच्चे केवल पढ़ते नहीं‚ अपनी माताओं के साथ मवेशियों को चराते हैं‚ पानी भरते हैं‚ लकड़ियों के भारी गट्ठर ढोते हैं। आगे रास्ता संकरा हो रहा है। बस केवल एक जीप जितनी चौड़ाई। जरा संतुलन बिगड़े तो … जगह-जगह चेतावनी देते बोर्ड—धीरे चलाएँ‚ घर में बच्चे आपका इंतजार कर रहे हैं। यूमथांग पहुँचने के लिए रात भर लायुंग में पड़ाव लेना था। गगनचुंबी पहाड़ों के तल में सांस लेती एक नन्हीं सी शांत बस्ती सारी दौड़-धूप से दूर निश्चिंत सो रही थी। हम तिस्ता नदी के किनारे पर बसे लकड़ी के एक छोटे-से घर में ठहरे। तिस्ता नदी के जल को अंजलि में लेकर लेखिका ने प्रार्थना की कि भीतर का सारा हलाहल‚ सारी तामसिकताएँ इसी धारा में बह जाएँ। जितेन ने अपने साथियों सहित नाच-गाना प्रारंभ कर दिया‚ तो सभी सैलानी मस्ती के रंग में आ गए और गोल-गोल घेरा बनाकर नाचने लगे। लेखिका की सखी मणि ने भी जानदार नृत्य प्रस्तुत किया। लायुंग की सुबह शांत और सुरम्य थी। लेखिका को उम्मीद थी कि यहाँ बर्फ मिलेगी‚ परंतु निराशा हुई‚ यद्यपि वे सी लेवल से 14,000 फीट की ऊँचाई पर थे। एक सिक्किमी युवक ने बताया कि 500 फीट ऊपर कटाओ में बर्फ मिल सकती है। ‘कटाओ’ भारत का स्विट्जरलैंड है‚ जो अभी टूरिस्ट स्पॉट नहीं बना है। यह लायुंग से 500 फीट की ऊँचाई पर था और वहाँ का सफर करीब दो घंटे का था। रास्ता खतरनाक था‚ फिर धुंध और बारिश भी थी। जीप जैसे बादलों को चीरकर निकल रही थी। खतरे के एहसास ने सभी को मौन कर दिया था। केवल सैलानियों के साँस लेने की आवाजें ही सुनाई दे रही थीं। करीब आधे रास्ते बाद धुंध छँटी तो सन्नाटा टूटा। नार्गे ने उत्साहित होकर कहा—‘कटाओ हिंदुस्तान का स्विट्जरलैंड है।’ मणि ने प्रतिवाद किया—‘नहीं‚ स्विट्जरलैंड भी इतनी ऊँचाई पर नहीं है और न ही इतना सुंदर।’ कटाओ के निकट पहुँचने पर पहाड़ों पर कहीं-कहीं बर्फ नजर आने लगी। नार्गे ने उत्तेजित होकर कहा—‘देखिए एकदम ताजा बर्फ है‚ लगता है रात में गिरी है यह बर्फ।’ थोड़ी और आगे बढ़ने पर पूरी तरह बर्फ से ढके पहाड़ दिख रहे थे। ये पहाड़ चाँदी जैसे चमक रहे थे। सबके मन प्रसन्न हो उठे। जितेन तो प्रसन्नता के मारे झूमकर गाने लगा—‘‘तिम्रो माया सैंधे मलाई सताऊँछ’’ (तुम्हारा प्यार मुझे सदैव रुलाता है।) चहुँओर बिखरी बर्फीली सुंदरता सभी का मन मोहने लगी। सभी जीप से उतरकर बर्फ पर कूदने लगे। कई सैलानी बर्फ पर लेटकर हर पल की रंगत को कैमरे में कैद करने में लग गए। ऐसा लग रहा था मानो इसी विभोर कर देने वाली दिव्यता के बीच हमारे ऋषि-मुनियों ने वेदों की रचना की होगी। जीवन के सत्य को खोजा होगा … सर्वे भवंतु सुखिन: का महामंत्र पाया होगा। मणि कह रही थी‚ ये हिम शिखर हमारे जल स्तंभ हैं। प्रकृति कितनी सुंदरता से सारा इंतजाम करती है। वह सर्दियों में बर्फ सहेजकर‚ गर्मियों में जल धारा बनकर प्यास बुझाती है। कृतज्ञता से माथा नवाकर कहा—जाने कितना ऋण है‚ इन नदियों का हम पर। लगा कि संसार स्वप्न-सा सुंदर है‚ लेकिन पत्थर तोड़ती पहाड़िनों का ध्यान आते ही मन पर एक उदासी छा गई। थोड़ा और आगे जाने पर फौजी छावनियाँ दिखाई पड़ीं। चीन की सीमा थोड़ी ही दूर है। लेखिका ने एक फौजी से पूछा—इस कड़कड़ाती ठंड में आपको बहुत तकलीफ होती होगी। फौजी ने उदासीन हँसी से कहा—आप चैन की नींद सो सकें‚ इसलिए हम यहाँ पहरा दे रहे हैं। वहीं एक बोर्ड पर लिखा था—‘वी गिव अवर टुडे फॉर योर टुमारो।’ लेखिका का मन पिघलने लगा। पौष माह (जनवरी) में जब यहाँ पेट्रोल को छोड़कर हर चीज जमने लगती है‚ ये जवान तब भी यहाँ तैनात रहते हैं। यह यात्रा लेखिका के लिए जैसे एक खोज यात्रा थी। जितेन ने नेपाल के माओवादी संघर्ष के बारे में बताया कि माओवादियों पर हैलीकॉप्टर से बम बरसाये जाते थे। लेकिन जैसे ही उनका कोई साथी मरता‚ तो पीठ पर बँधी बड़ी टोकरी ‘डोको’ में उसका शव डाल लेते। मजाल कि सरकार के हाथ एक भी डैड बॉडी लगी हो। यूमथांग की घाटी में ढेरों-ढेर प्रियुता और रूडोड्रेंडो के फूल खिल रहे थे। जितेन ने बताया कि पंद्रह दिनों में ही पूरी घाटी फूलों से इतनी भर जाएगी कि मानो फूलों की सेज बिछी हो। यूमथांग में चिप्स बेचती एक युवती से लेखिका ने पूछा—क्या तुम सिक्किमी हो? तो उसने कहा—नहीं मैं इंडियन हूँ। लेखिका को सुनकर अच्छा लगा। सिक्किम के लोग भारत के साथ मिलकर खुश हैं—काश‚ कश्मीर के साथ भी ऐसा सहज विलय हो जाता। जितेन तरह-तरह की जानकारियाँ दे रहा था। उसने बताया कि पहाड़ी कुत्ते सिर्फ चाँदनी रात में भौंकते हैं। एक जगह उसने बताया कि यहाँ एक पत्थर है‚ जिस पर गुरुनानक के फुट प्रिंट हैं। कहते हैं—गुरुनानक की थाली से छिटककर थोड़े चावल वहाँ गिरे थे। वहाँ चावल की खेती होती है। खेदुम की ओर इशारा करके उसने बताया कि यहाँ देवी-देवताओं का वास है‚ जो भी यहाँ गंदगी फैलाएगा‚ वह मर जाएगा। उसने बताया कि वे पहाड़‚ नदी‚ झरने की पूजा करते हैं। इन्हें कभी गंदा नहीं करते। उसने बताया कि यूमथांग पहले टूरिस्ट स्पॉट नहीं था। कैप्टन शेखर दत्ता के दिमाग में आया कि यहाँ सिर्फ फौजियों को रखने का क्या लाभ? घाटियों में से रास्ते निकालकर इसे टूरिस्ट स्पॉट बनाया जा सकता है। लेखिका मन ही मन कह रही थी—हाँ रास्ते अभी बन रहे हैं। नए-नए स्थानों की खोज अभी जारी है। मनुष्य की इस असमाप्त खोज का नाम सौंदर्य है।

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