10 Hindi Chapter 3 पर्वत प्रदेश में पावस सुमित्रानन्दन पंत

Chapter Notes and Summary
कविता का परिचय
पहाड़ों की शोभा किसके मन को आका षत नहीं करती? सुदूर हिमालय में जाने का अवसर जिन्हें प्राप्त नहीं होता वे अपने निकटवर्ती पर्वतीय प्रदेश की हरियाली में ही अपने चित्त को रमाते हैं। ऐसे में कोई कविता जब पर्वत प्रदेश की पावस का सुंदर वर्णन करे तो एक अनुभूति-सी होती है—पर्वतीय अंचल के आकर्षक दृश्य को अपने में समेट लेने की। ‘पर्वत प्रदेश में पावस’ कविता प्रकृति के सौंदर्य तथा रूमानी चित्र को सामने लाने की सुंदर प्रक्रिया है। कविता में पर्वत प्रदेश में पावस ऋतु के दौरान प्रकृति के क्षण-क्षण बदलते रूप का चित्र प्रस्तुत किया गया है। पर्वत की लंबी शृंखला के बीच बादलों की क्रीड़ा‚ झरनों की चंचलता तथा इनके बीच आकर्षक दृश्यों को आँखों से देखना जितना सुखद है‚ उतना ही मनोहारी वर्णन इस कविता में मिल जाता है।
‘प्रकृति के सुकुमार कवि’ सुमित्रानंदन पंत ने पर्वतों‚ बादलों तथा झरनों के आकर्षण को लेकर अनेक कविताएँ लिखी हैं। ‘पर्वत प्रदेश में पावस’ ऐसी ही एक कविता है‚ जिसके माध्यम से उनके ‘प्रकृति-प्रेम’ को स्पष्टता मिली है। विभिन्न उपमाओं तथा बिंबों के सहारे कवि पंत ने पर्वतीय प्रकृति का आकर्षक चित्र खींचा है। ‘निराला’ ने पंत के इसी प्रकृति-प्रेम को विश्लेषित करते हुए कहा था कि महान् कवि पंत‚ शेली की तरह विषयों को उपमा के जरिए मधुर-से-मधुर तथा कोमल-से-कोमल बना देते हैं।’ उत्तराखंड के अल्मोड़ा में जन्मे सुमित्रानंदन पंत ने ‘वीणा’‚ ‘पल्लव’‚ ‘युगवाणी’‚ ‘ग्राम्य’‚ ‘स्वर्ण-किरण’ तथा ‘लोकायतन’ जैसे काव्य-संग्रहों की रचना की। उनकी भाषा में तत्सम शब्दों का प्रयोग आकर्षक ढंग से हुआ है। उन्होंने उपमा‚ उत्प्रेक्षा जैसे अलंकारों का सुंदर उपयोग किया है।
कविता का भावार्थ
पावस ऋतु थी‚ पर्वत प्रदेश …………… नीचे जल में निज महाकार।
भावार्थ कविता की इन पंक्तियों में पर्वतीय प्रदेश में वर्षा ऋतु के दौरान होने वाले परिवर्तनों को दर्शाया गया है। वर्षा ऋतु में प्रदेश पर्वत की शोभा अधिक आकर्षक हो जाती है। बादलों का घुमड़ना‚ गरजना और बरस जाना वैसे भी आकर्षक होता है किंतु पर्वतीय प्रदेश में बादलों की यही क्रीड़ा मनमोहक प्रतीत होती है। करधनी की तरह टेढ़े-मेढ़े‚ ऊँचे-नीचे पर्वत शृंखलाओं में ऊपर बादल तथा नीचे हजारों पौधों में खिले फूलों की सुंदरता अवर्णनीय है। घाटियों में खिलती कलियाँ मानो अपनी आँखें खोलकर प्रकृति के इस पल-पल बदलते रूप को आकर्षण के साथ निहार रही हैं। ऊपर घुमड़ते बादल तथा नीचे प्रवाहित झरनों के बीच पर्वत की सुंदर चोटियाँ चित्ताकर्षक दृश्य प्रस्तुत करती हैं।
ऐसा लग रहा है कि पर्वत अपनी हजारों आँखों से नीचे फैले जल में अपने विशाल आकार को निहर रहे हैं। पर्वत के पावों के पास का विशाल तालाब दर्पण के रूप में काम कर पर्वत के प्रतिबिंब को उभार रहा था।
काव्यगत विशेषताएँ
• ‘पल-पल परिवा तत प्रकृतिवेश’ में अनुप्रास अलंकार है।
• कवि ने प्रकृति परिवा तत रूप-सौंदर्य का कम शब्दों में व्यापक वर्णन किया है।
जिसके चरणों में पला ताल ……………… झरते हैं झाग भरे निर्झर!
भावार्थ पर्वतीय प्रदेश में झील तथा झरने सौंदर्य को और बढ़ाने का कार्य करते हैं। कवि कहता है कि उâँची पर्वतीय चोटियों के तल में झीलें अद्भुत दृश्य उपस्थित करती हैं। उनकी विशालता में पर्वत का प्रतिबिंब दिखता है जो उसे एक बड़े दर्पण का रूप प्रदान करता है।
झरने पर्वत के सम्मान में मस्ती के मधुर संगीत गाते हुए‚ उन्मादी स्वर का संचार करते हैं। झरनों की गति से निकलने वाले झाग मोतियों की लड़ी का सौंदर्य उपस्थित करते हैं। कवि ने इस प्राकृतिक सुषमा को एक नई परिभाषा के साथ उपस्थित किया है।
कवि इस पर्वतीय सौंदर्य को जिस रूप में उपस्थित करता है‚ उससे पूरा का पूरा दृश्य ‘लैंडस्कैप’ की भाँति आँखों के सामने घूम जाता है।
पर्वत प्रदेश में पावस
काव्यगत विशेषताएँ
• कवि ‘झर-झर’‚ ‘नस-नस’ जैसे प्रयोगों से भाषा की प्रवाहशीलता को प्रभावी बनाता है। यह पुनरुक्ति अलंकार है।
• इन पंक्तियों में कवि ने प्रकृति के मादक रूप का वर्णन किया है‚ जिसके अंग झील और झरने हैं। ‘दर्पण-सा’ में उपमा अलंकार है।
गिरिवर के उर से उठ-उठ कर …………. फड़का अपार वारिद के पर!
भावार्थ कवि ने इन पंक्तियों में पर्वतीय प्रदेश की अन्यतम सुंदरता को आपसी क्रिया-प्रक्रियाओं के रूप में रखा है। पर्वत की ऊँची चोटियों के हृदय से उठने वाले लंबे-लंबे पेड़ उच्च आकांक्षाओं की तरह ऊँचे उठते प्रतीत होते हैं। ये ऊँचे-ऊँचे पेड़ शांत नेत्रों से आकाश की नीलिमा में खोए हैं। बिना पलक गिराए‚ स्थिर किंतु कुछ चिंतित मानों आकाश का रहस्य सुलझाने में तलीन इन लंबे वृक्षों की मौन सुंदरता कविता में स्पष्ट है। ऐसा प्रतीत होता है कि पर्वत बादलों के पंख लगाकर फड-फड़ाता हुआ आकाश में उड़ चला है। आाशय यह है कि अचानक पहाड़ के समान बहुत अधिक खेत एवं चमकीले बादल आकाश में छा गए हैं। ऐसी स्थिति में मौन तथा कुछ चिंतित मानो आकाश का रहस्य सुलझाने में तल्लीन से वृक्षों में हलचल हुई और उनकी ‘मुख-मुद्रा’ पर ह्रास की पतली-सी रेखा तैर गई।
काव्यगत विशेषताएँ
• ‘उर से उठ-उठ’ में अनुप्रास अलंकार है।
• काव्यांश में ‘दृश्यात्मक बिंब’ उपस्थित किया गया है।
रव-शेष रह गए हैं निर्झर! ……………….. था इंद्र खेलता इंद्रजाल।
भावार्थ वर्षा ऋतु में पर्वतीय प्रदेश का चित्र बदल जाता है। चारों ओर शांति तथा निस्तब्ध वातावरण में केवल पानी के गिरने की आवाज शेष रह जाती है।
लगता है‚ जैसे धरती पर आकाश टूट पड़ा है। वर्षा की तीव्रता में शाल के पेड़ भय से धरती में धँस गए प्रतीत होते हैं। झीलों से धुआँ-सा उठता है‚ जिससे लगता है कि आग लगी है। ऐसा प्रतीत होता है कि बादलों के यान (बादल रूपी यान) में इंद्र घूम-घूमकर अपना जादू चारों ओर फैला रहा है।
कवि पावस ऋतु के इस रूप को दर्शाकर पर्वतीय प्रदेश के शांत तथा नीरव दृश्य को सामने लाता है‚ जिसमें मानसिक शांति तथा चेतना को नया एवं सक्रिय रूप मिलता है।
कक्षा १० हिन्दी ‘ब’
काव्यगत विशेषताएँ
• कविता की इन पंक्तियों में पावस ऋतु के प्रलयकारी रूप को दर्शाने का प्रयास किया गया है।
• कवि ने ‘अनुप्रास अलंकार’ का व्यापक प्रयोग किया है।

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