10 Hindi Chapter 2 कमलेश्वर जॉर्ज पंचम की नाक

Chapter Notes and Summary
‘जॉर्ज पंचम की नाक’ एक व्यंग्यात्मक निबंध है। इसमें सरकारी तंत्र का मजाक उड़ाया गया है। हम जिस इंग्लैंड के गुलाम रहे‚ उसकी रानी के सम्मान के लिए भारत की सरकार अपमानपूर्ण हरकतें करती है‚ यह दिखाना इस निबंध का उद्देश्य है। इंग्लैंड की रानी एलिजाबेथ द्वितीय ने अपने पति के साथ भारत आने का निश्चय किया। अखबारों में इसकी चर्चा प्रारंभ हो गई। एलिजाबेथ का दरजी भी परेशान हो गया कि हिंदुस्तान‚ पाकिस्तान और नेपाल के दौरे पर रानी कब क्या पहनेंगी? एलिजाबेथ के साथ दौरे के लिए फोटोग्राफरों की फौज भी तैयार हो रही थी। भारतीय अखबारों में समाचार आया कि रानी ने हल्के नीले रंग का सूट बनवाया है‚ जिसका रेशमी कपड़ा भारत से मंगवाया गया है‚ जिस पर चार सौ पौंड का खर्चा आया है। रानी की जन्म-पत्री‚ प्रिंस फिलिप के कारनामे‚ उनके नौकरों‚ बावर्चियों‚ खानसामों‚ अंगरक्षकों के साथ-साथ शाही महल के कुत्तों की भी तसवीरें छापी गईं। रानी के आगमन को लेकर पूरे भारत में सनसनी थी। तहलका मचा था कि आखिरकार रानी पाँच हजार रुपये का जो सूट पहनकर आने वाली है‚ उसके स्वागत में कुछ तो धूमधाम होनी चाहिए। देखते ही देखते दिल्ली की काया पलट होने लगी। सड़कें जवान हो गईं‚ बुढ़ापे की धूल साफ हो गई। इमारतें सुंदरियों की भाँति सजने लगीं। नई दिल्ली खुशी से झूम उठी और कहने लगी ‘‘वो आए हमारे घर‚ खुदा की रहमत कभी हम उनको‚ कभी अपने घर को देखते हैं।’’
अचानक एक परेशानी सामने आई—जॉर्ज पंचम की मूर्ति की नाक गायब थी। पहले भी इस नाक के लिए राजनीतिक आंदोलन और बहसें हो चुकी थीं। परंतु जैसा होता है‚ राजनीतिक आंदोलनों का कोई हल नहीं निकल सका। कुछ राजनीतिक दल नाक को काटना चाहते थे‚ कुछ बने रहने देना चाहते थे। आखिरकार एक दिन यह हादसा हो गया। हथियारबंद जवानों की गश्त के होते हुए भी इंडिया गेट के सामने लगी जॉर्ज पंचम की मूर्ति की नाक काट दी गई। अब सवाल यह था कि रानी के आगमन पर जॉर्ज की नाक न दिखी‚ तो यह अपनी नाक कटाने जैसा होगा। देश के शुभचिंतकों की एक बैठक बुलाई गई। सभी ने कहा कि रानी के आने तक कटी हुई नाक वापस लग जानी चाहिए। उच्च स्तर पर सलाह-मशविरे हुए। आखिरकार एक मूर्तिकार को फौरन दिल्ली बुलाया गया। मूर्तिकार यूँ तो कलाकार था‚ पर पैसे से लाचार था। मूर्तिकार से जॉर्ज पंचम की नाक लगाने को कहा गया। मूर्तिकार ने हुक्कामों के चेहरे पर बदहवासी और आँसू देखे‚ तो उसने नाक लगाने के लिए हामी भर दी और उनसे पूछा कि यह लाट कब बनी और कहाँ? इस लाट के लिए पत्थर कहाँ से लाया गया। पुरातत्व विभाग की फाइलों को खोला गया परंतु पता चला कि फाइलें सब कुछ हजम कर चुकी हैं। मूर्तिकार से कहा गया‚ जो भी हो यह काम तुम्हारे भरोसे है। एक खास कमेटी इस कार्य के लिए बना दी गई। मूर्तिकार ने सुझाव दिया कि मैं देश भर के पर्वतों पर जाकर पत्थर की किस्म का पता लगाऊँगा और पत्थर खोज लाऊँगा। मूर्तिकार हिंदुस्तान के हर पहाड़ पर गया‚ चप्पा-चप्पा खोज डाला पर उस किस्म का पत्थर कहीं नहीं मिला। उसे लगा कि यह पत्थर विदेशी है। उस मूर्तिकार ने हार नहीं मानी। उसने सभापति की सहमति से अन्य नेताओं की मूर्तियों से जॉर्ज पंचम की नाक का मिलान करना शुरू कर दिया। वह दिल्ली से बंबई पहुँचा। वहाँ दादा भाई नौरोजी‚ गोखले‚ तिलक‚ शिवाजी‚ आदि सबकी नाकें टटोलीं‚ नापीं फिर गुजरात की तरफ गया‚ वहाँ गाँधी‚ सरदार पटेल‚ विट्ठल भाई पटेल‚ महादेव देसाई की मूर्तियों को परखा‚ बंगाल में जाकर गुरुदेव रवींद्रनाथ‚ सुभाष चन्द्र बोस‚ राजा राममोहन राय आदि को भी देखा। बिहार होता हुआ उत्तर प्रदेश की तरफ आया। वहाँ चंद्रशेखर आजाद‚ बिस्मिल‚ मोतीलाल नेहरू‚ मदन मोहन मालवीय की लाटों के पास होकर मद्रास पहुँचा। सत्यमूर्ति को देखा। पंजाब में लाला लाजपतराय और भगत सिंह की लाटों से भी सामना हुआ। आखिर में दिल्ली पहुँचकर उसने बयान दिया—‘‘पूरे हिंदुस्तान की परिक्रमा कर आया‚ सब मूर्तियाँ देख आया‚ सबकी नाकों का नाप लिया पर जॉर्ज पंचम की इस नाक से सभी बड़ी निकलीं।’’ सभी हताश हो गए परंतु मूर्तिकार ने साहस नहीं छोड़ा। उसने फिर सुझाव दिया कि बिहार सेक्रेटरिएट के सामने सन् 1942 में शहीद होने वाले बच्चों की मूर्तियाँ स्थापित हैं। शायद उनमें से किसी की नाक फिट हो जाए। परंतु उन सबकी नाकें भी बड़ी मिलीं। राजधानी में रानी के स्वागत की सारी तैयारियाँ पूरी हो चुकी थीं। जॉर्ज पंचम की लाट को मल-मल कर नहलाया गया था‚ परंतु नाक नहीं थी। सरकारी हुक्कामों में खलबली मची। अबकी बार उसने एक नयी योजना पेश की। उसने कहा—‘‘चालीस करोड़ जनता में से कोई एक जिंदा नाक काटकर लगा दी जाए।’’ यह सुझाव सुनकर सन्नाटा छा गया। मूर्तिकार ने कहा—‘‘नाक चुनना मेरा काम है‚ आपकी सिर्फ इजाजत चाहिए।’’ इजाजत दे दी गई। अगले दिन अखबार में छप गया कि नाक का मसला हल हो गया है। नाक लगने से पहले हथियारबंद पहरेदारों की तैनाती हुई। मूर्ति के आसपास का तालाब साफ किया गया। उसकी रवाब निकाली गई। ताजा पानी डाला गया ताकि जिंदा नाक सूखने न पाए। आखिरकार अंतिम दिन चुपचाप जॉर्ज पंचम की लाट में नाक लग गई। सब अखबारों में छपा कि जॉर्ज पंचम को जिंदा नाक लगाई गई है…… यानि नाक जो पत्थर की कतई नहीं लगती। लेकिन उस दिन देश में कहीं भी किसी उद्घाटन की खबर नहीं छपी‚ कहीं कोई फीता नहीं कटा था। कोई सभा नहीं हुई थी। किसी का कोई अभिनंदन नहीं हुआ था। कोई मानपत्र नहीं दिया गया था। कोई स्वागत समारोह नहीं हुआ था‚ न ही कोई चित्र छपा था। सब अखबार खाली थे। पता नहीं ऐसा क्यों हुआ? नाक तो एक ही चाहिए थी और वह भी बुत के लिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *