10 Hindi Chapter 1 हरिहर काका मिथिलेश्वर

Chapter Notes and Summary
परिवार वह जगह है‚ जहाँ अपनों के बीच सुख-दुख‚ आपदा-विपदा‚ रोग-बीमारी तथा हर्ष-विषाद में लोग एक-दूसरे के काम आते हैं। यहाँ लोग एक-दूसरे की उन्नति की प्रेरणा बनकर विकास की ओर अग्रसर होते हैं। परिवार प्रेम और शांति का पर्याय होता है। दुनिया की बेगानगी के बीच परिवार मनुष्य को चैन तथा सुख के दो पल देने में सक्षम होता है।
धर्मस्थल आस्था के केंद्र होते हैं। अपनेपन को सहजता‚ सह्य्दयता तथा सहयोग की भावना से वैश्विक बनाने की समझ तथा संस्कार यहीं से प्राप्त होते हैं। चिंता के पल में मनुष्य इन आस्था के केंद्रों से राहत पाते हैं‚ शांति का अनुभव करते हैं। लेकिन कभी किसी मामले में परिवार और धर्मस्थल अपने मूल स्वभाव को तिलांजलि देकर नई भूमिका में आ जाएँ तो स्थिति चिंताजनक तथा दुखद हो जाती है।
‘हरिहर काका’ कहानी में कहानीकार मिथिलेश्वर ने एक ऐसी स्थिति को दर्शाया है‚ जिसके कारण पारिवारिक जीवन तथा आस्था के केंद्र धर्मस्थलों से विश्वास उठने लगता है। खून के रिश्ते तथा धर्म के ध्वजवाहकों की स्वार्थलोलुपता जब सामने आ जाए‚ तो रिश्तों की बुनियाद के साथ धार्मिक प्रतीकों का ताना-बाना हिल जाता है।
हरिहर काका एक नि:संतान विधुर हैं। उनकी अवस्था ऐसी हो चली है कि उन्हें ‘वृद्ध’ कहा जा सकता है। परिवार के नाम पर तीन सगे भाइयों का भरा-पूरा संयुक्त परिवार है। हरिहर काका के पास पंद्रह बीघा जमीन है‚ जिसकी पैदावार संयुक्त परिवार का ही हिस्सा है। यही जमीन ही उनकी यातना का कारण भी है।
गाँव में एक ठाकुरबारी है। ठाकुरबारी के जिम्मे कुछ जमीन है जो गाँव वालों द्वारा ही दान में दी गई है। ठाकुरबारी में ठाकुरजी के मंदिर के अतिरिक्त आस-पास की जमीन पर खेती होती है। यहाँ एक महंत तथा कुछ साधु निवास करते हैं। गाँव की राजनीति में ठाकुरबारी का महत्व अत्यधिक होता है।
हरिहर काका अपने संयुक्त परिवार में प्राय: उपेक्षित हैं। उन्हें भोजन-पानी की समस्या का सामना भी करना पड़ता है। घर के अन्य लोगों की अपेक्षा उन्हें रूखा-सूखा भोजन दिया जाता है। एक दिन अच्छे भोजन की चाह के बाद मिले चावल‚ मट्ठा और अचार को फेंकने के बाद परिवार से हरिहर काका के मोहभंग की शुरूआत होती है। परिवार के प्रति हरिहर काका के मोहभंग का फायदा उठाने का निर्णय ठाकुरबारी के महंत ने लिया। उसने हरिहर काका को लोक-परलोक तथा अगले जन्मों में सुख की लालसा का हवाला देकर जमीन हथियानी चाही‚ किंतु उनके पारिवारिक सदस्यों की वजह से महंत तत्काल किसी निर्णय पर पहुँचने में सक्षम नहीं था। महंत द्वारा हरिहर काका को लोक-परलोक सुधारने की दुहाई देने की बात से उनके भाई सचेत हो गए। अब उनके संबंधों में नयापन आया। हरिहर काका की खूब आवभगत होने लगी। अच्छा भोजन तथा आदेश-पालन के लिए लोग सदैव तत्पर रहने लगे। महंत को जब अपनी रणनीति असफल दिखी‚ तो एक रात उसके द्वारा हथियारों के बल पर हरिहर काका का अपहरण कर लिया गया। सवेरे तक पुलिस के आने पर हरिहर काका को ठाकुरबारी के एक कमरे से मुक्त कराया जा सका। महंत तथा उनके आदमी हरिहर काका के अँगूठे का निशान लेकर निकल गए थे। वहाँ से मुक्त होने के बाद महंत के खिलाफ हरिहर काका ने रिपोर्ट दर्ज कराई।
महंत के चंगुल से छूटने के बाद हरिहर काका के परिजनों ने अतिरिक्त सुरक्षा की व्यवस्था की। दलान के बदले घर के भीतर एक कमरे में उन्हें जगह दी गई। हरिहर काका की सुरक्षा में हथियारबंद लोगों को लगा दिया गया।
परिवार के लोग उनसे जल्दी-से-जल्दी जमीन उनके नाम लिख देने की बात करने लगे। हरिहर काका को यातनाओं के बाद ज्ञान हो गया था। वे जीवन में जमीन किसी को लिखकर शेष जीवन कुत्तों-सा व्यतीत करना नहीं चाहते थे। वे परिवार के लोगों को टालते रहे तथा कहते रहे कि मरने के बाद जमीन पर उन्हीं का कब्जा होगा‚ फिर लिखने का कोई मतलब नहीं है।
एक दिन जब परिवार के लोग समझाकर थक गए‚ तो उन्होंने हरिहर काका के साथ मारपीट शुरू कर दी। हो-हल्ला सुनकर गाँव के लोग जमा होने लगे।
उसी समय ठाकुरबारी का महंत भी पुलिस वालों को लेकर आ गया। ठाकुरबारी के महंत तथा हरिहर काका के भाइयों की अलग-अलग पैरवी की वजह से उन्हें
हरिहर काका
चार पुलिस कर्मियों की सुरक्षा दी जाने लगी। हरिहर काका ने एक आदमी को खाना बनाने के लिए रख लिया तथा उनका जीवन आराम से कटने लगा। महंत तथा हरिहर काका के परिवार के लोग उनकी आवभगत में लग गए।
कहानीकार मिथिलेश्वर ‘हरिहर काका’ कहानी के माध्यम से एक ऐसी विडंबना को सामने लाते हैं‚ जिसमें ग्रामीण जीवन की सादगी को लोगों की स्वार्थी दृष्टि का ग्रहण लग गया है। न तो परिवार को उसके एक सदस्य की चिंता है और न धर्म संस्था को एक धार्मिक व्यक्ति की। मनुष्य का अध:पतन इस कहानी के माध्यम से सामने आया है। परिवार और मंदिर दोनों स्वार्थों से संचालित होने लगे हैं। परिवार के भ्रातृभाव पर स्वार्थ हावी हो गया है। धर्म की आड़ में स्वार्थी तत्त्वों ने अपना विस्तार किया है। ‘हरिहर काका’ कहानी वर्तमान सामाजिक जीवन के यथार्थ को उजागर करती है।गिरगिट

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