10 Hindi Chapter 1 साखी कबीर

Chapter Notes and Summary
कविता का परिचय
कबीर ज्ञानमार्गी संत थे। उनकी कविताएँ मानवीय संवेदना की उदात्त मनोवृत्तियों को सामने लाने का कार्य करती हैं। कबीर की ‘साखी’ एक संदेश है।
इसमें उन्होंने ‘रहनी’ अर्थात् सामान्य ‘जीवन के भाव-बोध’ को अंकित किया है।
ईश्वर की सर्वव्यापकता और ‘अहम्-इदम्’ के समाहार को साखियों में महत्त्व दिया गया है। प्रत्येक प्रकार के आडंबरों का निषेध करते हुए कबीर ने ‘प्रेम’ को सर्वाधिक उपयोगी माध्यम बताया है‚ जिसके द्वारा ईश्वर का साक्षात्कार संभव है।
कबीर का जन्म 1398 ई० में काशी के निकट लहरतारा नामक स्थान में हुआ। उन्होंने अपने जीवन का अंतिम समय मगहर में बिताया। ‘राम’ और ‘रहीम’ की एकता में विश्वास करने वाले इस महान् संत ने‚ हिंदू-मुस्लिम विद्वेष की वजह को समाप्त करने के लिए ईश्वर को ‘पिंडे-पिंडे ब्रह्मांडे च’ बताया। उनके अनुसार ईश्वर मनुष्य के शरीर में निवास करता है‚ जरूरत है उसे पहचानने की। ‘साखी’ इस पहचान को ही स्पष्ट करने वाले वचन हैं। ‘साखी’ साक्षी का अपभ्रंश रूप है।
कबीर ने अपनी साखी द्वारा भेदभाव मुक्त मनुष्यता की कल्पना की है। उनकी दुनिया में आडंबर‚ विषमता‚ रूढ़ियों तथा कर्मकांडीय व्यवस्थाओं पर प्रहार किया गया है। कबीर अपनी सामान्य भाषा में सहजता के साथ जनता को संबोधित करते हैं‚ यही उनकी कविता की शक्ति भी है। जनभाषा में दार्शनिक अभिव्यक्तियों को सहज ढंग से स्पष्ट करने के कारण ही कबीर लोकप्रिय हुए।
विभिन्न संप्रदायों को मानने वालों ने कबीर को अपना मार्गदर्शक माना।
कबीर की ‘साखी’ बाबू श्याम सुंदर दास द्वारा संगृहीत ‘कबीर ग्रंथावली’ में संकलित है। कबीर के ‘बीजक’ को धार्मिक-आध्यात्मिक महत्त्व दिया जाता है उनके कई पद ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ में भी संकलित हैं।
पद्य भाग
‘साखी’ वस्तुत: ‘दोहा’ छंद है‚ जिसमें 24 मात्राएँ‚ 13 तथा 11 मात्राओं के विश्राम पर रखी जाती हैं। प्रस्तुत पाठ में सत्य की साक्षी प्रक्रियाओं के माध्यम से कबीर जीवन के तत्वज्ञान को सामने रखते हैं। इसमें ऐसी प्रवृत्तियों को स्थान मिला है‚ जो जीवन को सौहार्दपूर्ण बना सकती हैं।
साखी का भावार्थ
ऐसी बाँणी ……………………………………….. सुख होइ॥
भावार्थ कबीर प्रस्तुत ‘साखी’ में वाणी अर्थात् वचन के महत्त्व को सामने रखते हैं। उनका मानना है कि हमारी बोली ऐसी होनी चाहिए‚ जिससे किसी को भी कष्ट न हो‚ जो किसी के मन पर चोट न कर सके अर्थात् व्यक्ति को मृदुभाषी तथा शालीन होना चाहिए। वचन की मधुरता मनुष्य को स्वयं भी शीतल करती है तथा दूसरे भी सुख का अनुभव करते हैं। इससे मन का अहंकार दूर होता है।
कबीर का मानना है कि मधुर वचन एक ओर यदि स्वयं को शांति तथा सुख देते हैं तो दूसरों को भी प्रसन्न रखने का माध्यम बनते हैं। वस्तुत: यह जीवन को सुखद तथा प्रेममय बनाने में सहयोग देते हैं।
काव्यगत विशेषताएँ
• इस पद (साखी) में दैनिक जीवन के महत्त्वपूर्ण पहलू को अभिव्यक्त किया गया है।
मधुर वचन के महत्त्व को दर्शाया गया है।
• 24 मात्राओं के इस दोहे में क्रमश: 13 तथा 11 मात्राओं की पंक्तियाँ हैं।
कस्तूरी कुंडलि ……………………………………. देखै नाँहिं॥
भावार्थ कबीर ने इस ‘साखी’ में कस्तूरी मृग के बिंब के माध्यम से मनुष्य की प्रवृत्ति को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। उनके अनुसार मनुष्य उस कस्तूरी मृग की तरह इधर-उधर भ्रमणशील है‚ जो अपने अंदर व्याप्त ‘कस्तूरी’ की सुगंध को पहचान नहीं पाता। मनुष्य अपने अंदर व्याप्त ईश्वर को न पहचान कर‚ पूजा‚ आडंबरों तथा आराधना स्थलों में मारा-मारा फिरता है। जबकि ईश्वर हर जगह विद्यमान है‚ वह घट-घट में समाया हुआ है‚ किंतु दुनिया अपनी अज्ञानता के कारण उसे पहचान नहीं पाती। मनुष्य हरदम कस्तूरी मृग की तरह भटकता रहता है‚ पर यह रहस्य जान नहीं पाता कि कस्तूरी अर्थात् ईश्वर उसकी कुंडलि अर्थात् आत्मा में विद्यमान है।
काव्यगत विशेषताएँ
• कबीर ने बिंब तथा प्रतीक के प्रयोग द्वारा सामान्य भाषा में गूढ़ रहस्य को समझाने का प्रयास किया है।
• ‘घटि घटि’ में अनुप्रास अलंकार है।
जब मैं था ……………………………….. दीपक देख्या माँहि॥
भावार्थ कबीर इस ‘साखी’ में उस मैं अर्थात् अहंकार की बात कर रहे हैं‚ जिसने उन्हें ईश्वर से दूर कर दिया‚ लेकिन ज्ञान के दीपक ने कबीर में ऐसी ज्योति फैला दी है‚ जिससे वे स्वयं में और ईश्वर में अंतर नहीं कर पाते। ईश्वर के अस्तित्व का सर्वव्यापीकरण इस पद द्वारा हुआ है।
कबीर मानते हैं कि जिस ईश्वर की तलाश में मैं भटक रहा था‚ उसे जानकर सारा अंधकार दूर हो गया है। यह हमारी आंतरिक प्रक्रिया में अंतर्निहित है। उनके अनुसार‚ इसका ज्ञान होने पर कि ईश्वर सर्वव्याप्त सत्ता है‚ सारी अंध-आस्थाओं एवं रूढ़ियों का नाश संभव है। इसके लिए जिस दीपक की आवश्यकता है‚ वह मनुष्य के अंदर ही स्थित है। अहंकार‚ ईर्ष्या व लोभ जैसे दुर्गुणों को नष्ट कर ‘प्रेम’ के माध्यम से मनुष्य ‘हरि’ में एकाकार हो सकता है और तब हरि और स्वयं में कोई अलगाव नहीं रहता।
काव्यगत विशेषताएँ
• इस पद में ‘दीपक’ तथा ‘अंधकार’‚ क्रमश: ‘ज्ञान’ एवं ‘रूढ़ियों’ के प्रतीक रूप हैं।
• कबीर की भाषा ‘खड़ी बोली’ है‚ जिसका प्रमाण दोहे की प्रथम पंक्ति से मिल जाता है। भूतकालिक सहायक क्रिया ‘था’ का प्रयोग कबीर की विशेषता है।
सुखिया सब संसार ……………………………. जागै अरू रोवै॥
भावार्थ कबीर ने ‘साखी’ के इस दोहे में संसार की अज्ञानता पर दुख प्रकट किया है। खाना और सोना मोह-माया में संलग्न दुनियावी प्रक्रिया है। यह थोड़े
साखी
समय के लिए व्यक्ति को आनंदित अवश्य करती है किंतु इस क्षणभंगुर विश्व में इसका कोई स्थान नहीं है। संसार के मिथ्या‚ रागात्मक प्रवृत्तियों में संलग्न रहने से मनुष्य का जीवन दुखमय है। कबीर अपने बारे में बताते हैं कि वह दुखी हैं क्योंकि वह जागरण की अवस्था में हैं। जागना और रोना ‘मानवता’ को सुखी देखने की चिंता के कारण हैं। कबीर के जागरण और रुदन का कारण यह भी है कि वह मनुष्य की वास्तविक दशा को अपनी आँखों से देख रहे हैं। कबीर का यह व्यवहार ‘सर्वजन हिताय’ है‚ ‘स्वांत: सुखाय’ नहीं।
काव्यगत विशेषता
• कबीर सामान्य वाणी में विराट को बाँधते हैं। संसार की व्यर्थता को नहीं समझ‚ अधिकांश व्यक्तियों द्वारा स्वयं को आग में परवाने की तरह जलाने की प्रक्रिया को देखकर कबीर दुखी हैं।
बिरह भुवंगम तन बसै‚ मंत्र न लागै कोइ।
राम बियोगी ना जिवै‚ जिवै तो बौरा होइ॥
भावार्थ कबीर इस ‘साखी’ में ईश्वर के प्रति प्रेम की उस प्रक्रिया को प्रदा शत करते हैं‚ जिसके विरह में साधक का जीवन निरर्थक हो जाता है। उनके अनुसार‚ ईश्वर से मिलन न हो पाने की दशा में ‘विरह’ व्याप्त हो जाता है। यह विरह उस सर्प की तरह अपना विष शरीर में छोड़ता है‚ मानो वह शरीर में ही रहता हो। इस विष का कोई निदान नहीं सूझता।
कबीर मानते हैं कि ईश्वर का वियोग असहनीय होता है। ऐसा विरही जीवित नहीं रहता‚ यदि जीवित रहता भी है तो उसका जीवन पागल व्यक्ति की तरह निरर्थक है। उन्होंने ईश्वर से विमुख मनुष्य की दशा का वर्णन इस पद में किया है।
काव्यगत विशेषताएँ
• ‘सर्प’ को विरह का प्रतीक बताना कबीर के काव्यशास्त्रीय ज्ञान की आलोचना करने वालों को जवाब है।
• ‘राम’ को ईश्वर की जगह रखना एक महत्त्वपूर्ण संवाद को विस्तार देता है अर्थात् कबीर ‘राम’ के सर्वव्यापी‚ निर्गुण स्वरूप को मान्यता देते हैं।
निदंक नेड़ा राखिये ………………………………… करै सुभाइ॥
भावार्थ कबीर ने इस पद में ‘रहनी’ की एक प्रवृत्ति को स्पष्ट किया है।
उनका मानना है कि मनुष्य को नैतिक होना चाहिए। आलोचना करने वाले हमारे स्वभाव तथा मनोवृत्ति को क्रमश: परिमार्जित करते हैं‚ इसलिए उन्हें अपने से दूर नहीं करना चाहिए तथा ऐसे लोगों की बातों पर गंभीरतापूर्वक ध्यान देने की जरूरत होती है। ऐसे आलोचक बिना साबुन-पानी के हमारी आंतरिक शुद्धता के निर्माण में सहायक होते हैं। वे हमारे अवगुणों को दूर करते हैं।
कबीर ने मन-मस्तिष्क की निर्मलता के लिए आलोचकों की उपयोगिता को इस पद में सिद्ध किया है।
काव्यगत विशेषताएँ
• ‘निंदक नेड़ा’ में अनुप्रास अलंकार है।
• कबीर ने सामान्य जीवन प्रक्रिया के भीतर व्यक्तित्व निर्माण की चेतना को स्पष्ट किया है।
पोथी पढ़ि पढ़ि ……………………………… पढ़ै सु पंडित होइ॥
भावार्थ कबीर ने इस पद में ‘ज्ञान’ के सही अर्थ को समझाया है। उनके अनुसार‚ ग्रंथों को पढ़ने भर से कोई ज्ञानी नहीं हो जाता‚ ज्ञानवान होने के लिए ‘प्रेम’ की परिभाषा को जानना अधिक महत्त्वपूर्ण है। इस ढाई अक्षर के शब्द में जो शक्ति है‚ वह मोटे-मोटे ग्रंथों में भी नहीं है। ‘प्रेम’ अर्थात् ‘ईश्वर के प्रति अहैतुक प्रेम’ जो अंतत: मानवता से जोड़ता है। बिना किसी भेदभाव के मनुष्य के अस्तित्व को मानने वाला ही एक-दूसरे से ‘प्रेम’ का भाव रखता है और वही उचित मायनों में ‘पंडित’ अर्थात् ज्ञानी है।
काव्यगत विशेषताएँ
• कबीर के काव्य की यह विशेषता है कि वह व्यंग्यात्मक तरीके से समाज की विसंगतियों को सामने लाते हैं। इस पद में भी तथाकथित ‘ज्ञानी’ वर्ग पर व्यंग्य किया गया है। कबीर ‘प्रेम’ को सही अर्थों में ज्ञान की प्रक्रिया से जोड़ते हैं।
• ‘पोथी पढ़ि पढ़ि’ में अनुप्रास अलंकार है।
साखी
हम घर जाल्या …………………………… जे चलै हमारे साथि॥
भावार्थ कबीर ने इस पद में उस ‘घर को जलाने’ की बात कही है‚ जो मद‚ मोह‚ लोभ‚ ईर्ष्या जैसे दुर्गुणों से निर्मित है और इस घर में घृणा तथा विद्वेष का वास है। रूढ़ियाँ तथा अंध-आस्थाएँ इस घर को घेरे रहती हैं। कबीर जन सामान्य को संबोधित करते हुए कहते हैं कि उन्होंने तो अपना ऐसा घर जला दिया। अब मशाल हाथ में थामे बढ़ रहा हूँ‚ अब उसका जलाऊँगा‚ जो मेरी शर्तों पर मेरे साथ चलने को तैयार होगा अर्थात् जो अपनी सांसारिक वासनाओं को नष्ट करने के लिए सहमत होगा। कबीर सामाजिक तथा आध्यात्मिक विसंगतियों को समाप्त करने का निरंतर प्रयास करने वाले क्रांतिदर्शी महापुरुष थे। इस पद के द्वारा समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व तथा समान विचार के लोगों को आगे आने की चुनौती देते हुए कबीर ने अपनी वाणी को स्पष्ट किया है।
काव्यगत विशेषता
• कबीर की भाषा ‘पंचमेल खिचड़ी’ है और उसका प्रमाण यह पद है। इसमें कई भाषाओं के शब्द एक साथ मिल जाते हैं। ब्रजभाषा तथा खड़ी बोली के शब्दों की सुंदरता सहज ही देखी जा सकती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *