10 Hindi Chapter 1 शिवपूजन सहाय माता का अँचल

Chapter Notes and Summary
‘माता का अँचल’ पाठ में सन् तीस के दशक की ग्रामीण संस्कृति का चित्रण किया गया है। बालक तारकेश्वरनाथ के बचपन की मनोहारी लीलाओं का चित्रण लेखक ने किया है। तारकेश्वरनाथ के पिता उसे ‘भोलानाथ’ कहकर पुकारते थे। भोलानाथ रात में अपने पिता के साथ ही सोते थे। पिता सुबह उठकर भोलानाथ को जगाते‚ नहलाते और अपने साथ पूजा पर बिठा लेते थे। पिता उसके माथे पर तीन चंद्राकार रेखाएँ खींचकर तिलक लगाते और भभूत भी। भोलानाथ अपने पिताजी को ‘बाबूजी’ व माँ को ‘मइया’ कहकर पुकारते थे। उनके बाल बहुत लंबे थे‚ भभूत रमाने पर वे ‘बम-भोला’ बन जाते थे। बाबूजी के रामायण पाठ करते समय भोलानाथ आइने में अपना चेहरा निहारते रहते थे। पिताजी का उन पर ध्यान जाने पर मुस्कुरा देते थे। भोलानाथ के पिता पूजा-पाठ करने के पश्चात् राम-राम लिखते थे। उनकी राम नामा-बही पर हजार राम नाम लिखते‚ उसे पाठ करने की पोथी के साथ बाँधते। फिर पाँच सौ बार कागज के टुकड़ों पर राम नाम लिखकर आटे की गोलियों में लपेटते और उन गोलियों को लेकर गंगा जी की ओर चल पड़ते थे। पिता गंगाजी से वापस आते समय भोलानाथ को पेड़ों की डालों पर झूला झुलाते थे। भोलानाथ के बाबूजी कभी-कभी उससे कुश्ती लड़ते थे और उसे खुश करने के उद्देश्य से कुश्ती हार जाते। भोलानाथ उनकी छाती पर लेटकर उनकी मूंछों को उखाड़ने का प्रयत्न करते‚ तो पिता उसके छोटे-छोटे हाथों को चूम लेते और
बालक के दोनों गालों पर बाएँ-दाएँ खट्टा-मीठा चुम्मा लेते और भोलानाथ से तरह-तरह की अठखेलियाँ करते। पिता अपने पुत्र को हाथ से भात खिलाते किंतु माँ को संतुष्टि नहीं मिलती थी। माँ पिता से कहती—तुम बच्चे को थोड़ा-थोड़ा खिलाते हो‚ इससे इसका मन भर जाता है लेकिन पेट नहीं। अत: माँ चिड़िया‚ तोता‚ मैना‚ कोयल आदि के नाम ले-ले कर ज्यादा खिलाने की कोशिश करती‚ तरह-तरह की कहानियाँ सुनाकर बच्चे को दही-भात खिलाती थी। माँ भोलानाथ को गली से पकड़कर लाती और उसके सिर में सरसों का कड़वा तेल डालकर तर कर देती। नाभि और ललाट पर काजल की बिंदी लगाती और चोटी गूँथ देती। रंगीन कुर्ता और टोपी पहनाकर भोलानाथ को ‘कन्हैया’ बना देती। बालक भोलानाथ अपने मित्रों के साथ मिलकर घर के चबूतरे के एक कोने में तरह-तरह के नाटक खेला करता। वहाँ ढेले‚ पत्तों‚ गीली मिट्टी‚ फूटे घड़े के टुकड़ों से मिठाई की दुकान सजाते थे। कभी-कभी वहाँ घरौंदा बनाते थे। धूल की मेड़ दीवार बनती और तिनके‚ दातुन‚ दियासलाई‚ दीया‚ कलछी आदि बनाते। पानी से घी‚ धूल के पिसान तथा बालू की चीनी से भोज तैयार करते। बाबूजी उसकी इन सब क्रियाओं में सहयोग देते थे। कभी-कभी बारात के जुलूस निकाले जाते थे। कनस्तर का तंबूरा और टूटी चूहेदानी की पालकी बनाते। समधी बनकर बकरे की सवारी करते तथा बारात चबूतरे के एक कोने से दूसरे कोने ले जाते थे। कभी-कभी भोलानाथ अपनी मित्र-मंडली के साथ खेती करने का नाटक करते। चबूतरे को खेत बनाते‚ कंकड़ों को बीज और बहुत मेहनत से खेत जोते-बोए जाते। फसल तैयार होते ही हाथों-हाथ काट ली जाती थी। फसल को एक जगह रखकर पैरों से रौंदते थे। इसी बीच बाबूजी आकर भोलानाथ से पूछते—भइया‚ इस साल खेती कैसी रही? फिर सब खेत-खलिहान छोड़कर हँसते हुए भाग जाते थे। जब कभी किसी दूल्हे के आगे परदे वाली पालकी देख‚ लेते तो जोर-जोर से चिल्लाने लगते थे ‘रहरी में रहरी पुरान रहरी‚ डोला के कनिया हमार मेहरी’ इसी पर एक बूढ़े वर ने बालक भोलानाथ को बड़ी दूर खदेड़कर ढेलों से मारा था। आम की फसल में जब आँधी आती है‚ तो आम पेड़ों से गिरने लगते थे। भोलानाथ अपने मित्रों के साथ बागों में चले जाते थे। एक बार एक बूढ़े तिवारी उन्हें घर आते समय मिल गए। बैजू ने उन्हें चिढ़ाना शुरू कर दिया‚ तो उन्होंने खूब पिटाई की और उन्होंने स्कूल में भोलानाथ की शिकायत की‚ जिसके कारण गुरुजी ने उसे खूब पीटा। भोलानाथ के पिता यह खबर सुनकर स्कूल चले आए और अपने बालक को पुचकारने लगे। भोलानाथ ने रो-रोकर बुरा हाल कर रखा था। पिता ने गुरुजी से प्रार्थना की और बेटे को लेकर घर आ गए। रास्ते में ही भोलानाथ अपने मित्रों से खेलने लगा। वहाँ खड़े लोग कहने लगे—‘लड़के और बंदर पराई पीर नहीं समझते।’ एक टीले पर आकर यह मित्र-मंडली चूहे के बिल में पानी डालने लगी। तभी उस बिल में से एक साँप निकल आया। सभी मित्र रोते-चिल्लाते बेतहाशा भाग चले। किसी को कहीं चोट लगी‚ किसी का सिर फूटा तो किसी के दाँत टूटे‚ तो किसी के पैरों के तलवे काँटों से छलनी हो गए। भोलानाथ लहूलुहान होकर घर पहुँचे‚ सीधे माँ की गोद में जाकर उसके आँचल में छिप गए। पिता के बुलाने पर भी उनके पास नहीं गए। अधीर होकर माँ अपने लाल की इस हालत को देख कर पूछती रही कि आखिर उसे क्या हो गया? माँ ने झटपट हल्दी पीसकर भोलानाथ के घावों पर लगाई। घर में कुहराम मच गया। बालक साँ-स-साँ करते हुए काँप रहा था। वह भय के मारे आँखें नहीं खोल पा रहा था। माँ उसे बार-बार गले लगा रही थी। इसी समय उसके पिता दौड़े आए और मइया की गोद से अपनी गोद में लेने लगे। लेकिन बालक ने अपनी माँ का आँचल नहीं छोड़ा‚ माँ से चिपका रहा।

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