10 Hindi Chapter 1 बड़े भाई साहब प्रेमचंद

Chapter Notes and Summary
‘बड़े भाई साहब’ हिंदी के प्रसिद्ध तथा लोकप्रिय कहानीकार प्रेमचंद की रचना है। इस पाठ में प्रेमचंद ने परिवार के दो सगे भाइयों के आपसी संबंधों के माध्यम से एक ऐसी सामाजिक संरचना तथा मनोविज्ञान को पकड़ने की कोशिश की है‚ जिसमें एक पूरी पीढ़ी अपने ऊपर लादी गई अपेक्षाओं के कारण आदर्श स्थापित करने के फेर में अपने बचपन को तिरोहित कर लेती है।
‘बड़े भाई साहब’ कहानी में कथानायक के बड़े भाई उम्र की दृष्टि से तो छोटे ही हैं किंतु परिवार में बड़ा होने के कारण बड़ी-बड़ी अपेक्षाएँ उनसे की जाती हैं। बड़ा होने के नाते बड़े भाई भी अपनी जिम्मेदारियों को समझते हैं। वे सदा उस आदर्श की स्थापना के प्रति सचेत रहते हैं‚ जो छोटे भाई के लिए एक मिसाल बन सके।
कहानी के बड़े भाई अपने छोटे भाई से पाँच साल बड़े हैं‚ किंतु केवल तीन दरजे आगे पढ़ते हैं। बड़े भाई साहब ज्ञान के मामले में जल्दबाजी पसंद नहीं करते। वे भवन को आलीशान बनाने के लिए बुनियाद मजबूत बनाना चाहते हैं।
चौदह साल के बड़े भाई साहब नौ साल के अपने छोटे भाई की डाँट-डपट तथा निगरानी को अपनी पूरी जिम्मेवारी मानते हैं। छोटे भाई के लिए उनके आदेशों का पालन करना ही ‘अनुशासन’ है‚ ऐसा बड़े भाई साहब का मानना है।
अध्ययनशील ‘बड़े भाई’ किताबी कीड़ा हैं। वह हमेशा अपनी किताबों से चिपके रहते हैं‚ जबकि छोटे भाई का पढ़ने में जरा भी मन नहीं लगता। वह हॉस्टल से निकलकर मैदान में साथियों के साथ खेल-कूद में मग्न रहता है। कमरे में आते ही बड़े भाई का क्रोधित चेहरा देख छोटे भाई के प्राण सूख जाते हैं। बड़े भाई का लंबा लेक्चर शुरू हो जाता है। बड़े भाई साहब अपनी लताड़ में छोटे भाई को जीवन तथा अध्ययन की ऐसी-ऐसी बातें बताते‚ जो उनके काम की होतीं।
लताड़ सुनकर दुखी होने वाला छोटा भाई कुछ घंटों के लिए अनुशासित हो जाता। टाइम-टेबिल बनाकर अपने अध्ययन को व्यवस्थित करने का प्रयास करता किंतु टाइम-टेबिल बना लेना एक बात है और उस पर अमल करना दूसरी बात।
अगले ही दिन उस टाइम-टेबिल की अवहेलना भी शुरू हो जाती।
सालाना परीक्षा में बड़े भाई असफल रहते हैं और छोटा भाई अपने वर्ग में ‘प्रथम’ आता है। छोटा भाई बड़े भाई की अध्ययनशीलता का मजाक उड़ाना चाहता है किंतु जल्दी ही उसे अपनी मर्यादा का बोध होता है। उनके दुख तथा उदास चेहरे के कारण छोटे भाई को बड़े भाई से हमदर्दी होती है। अब छोटे भाई और बड़े भाई के बीच मात्र दो कक्षाओं का अंतर रह जाता है। इस बार बड़े भाई साहब छोटे भाई को लंबा उपदेश देते हुए उसे अहंकार के प्रति सचेत करते हैं।
रावण और शैतान की परिणति बताते हुए सचेत करते हैं। अपनी कक्षा की पढ़ाई का भयंकर चित्र उसके सामने रखते हैं। ज्योमेट्री तथा अलजेब्रा संबंधी कठिनाई से छोटे भाई को परिचित कराते हुए बहुत-सी ऐसी बातें भी बताते हैं जो कहीं-न-कहीं उसकी सहायता ही करती हैं।
अगले साल की वा षक परीक्षा में बड़े भाई साहब अत्यधिक परिश्रम के बाद भी पुन: असफल हो जाते हैं और छोटा भाई पुन: अपने वर्ग में प्रथम आता है।
बड़े भाई साहब अब कुछ नरम पड़े और कनकौआ के लिए दौड़ते छोटे भाई को पकड़ा तो फिर उसे उपदेश सुनाने लगे। इस बार छोटे भाई को अपनी लघुता का अनुभव हुआ तथा बड़े भाई के प्रति श्रद्धा उपजी। बड़े भाई ने छोटे भाई को गले लगाते हुए कहा‚‘‘मैं कनकौए उड़ाने को मना नहीं करता। मेरा भी जी ललचाता है‚ लेकिन करूँ क्या‚ खुद बेराह चलूँ‚ तो तुम्हारी रक्षा कैसे करूँ। यह कर्त्तव्य भी तो मेरे सिर है।’’ (स्पर्श 2, ‘बड़े भाई साहब’‚ पृष्ठ सं. 63)
उसी समय एक कटा हुआ कनकौआ भाइयों के ऊपर से गुजरा। उसकी डोरी लटक रही है। लड़कों का झुंड उसके पीछे है। बड़े भाई साहब लंबे हैं‚ उन्होंने उछलकर उसकी डोरी पकड़ ली और बेतहाशा हॉस्टल की ओर भागे।

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