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अध्याय 9 अधिगम का मूल्यांकन (Child Development & Pedagogy for CTET & TET in Hindi)

अध्याय 9 अधिगम का मूल्यांकन

मूल्यांकन

► आंकलन एक संक्षिप्त तथा मूल्यांकन एक व्यापक प्रक्रिया है। मूल्यांकन प्रक्रिया के अंतर्गत शिक्षण विधि, शैक्षिक उददे्श्य तथा शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को जानकर छात्र को उचित निर्देश दिए जाते हैं। शिक्षण अधिगम प्रक्रिया के दौरान शिक्षकों तथा शिक्षार्थियों में वांछनीय सुधार लाने के लिए मूल्यांकन की प्रक्रिया अपनाई जाती है।
सीसी रोस के अनुसार, ‘‘शिक्षार्थियों के संपूर्ण व्यक्तित्व तथा स्थितियों की जांच प्रक्रिया के लिए मूल्यांकन का प्रयोग किया जाता है।’’
कवालेंन तथा हन्ना के अनुसार, ‘‘विद्यालय में शिक्षार्थियों के व्यवहार परिवर्तनों का संकलन करने तथा उनकी व्याख्या करने की प्रक्रिया को मूल्यांकन कहते हैं।’’
कोठारी आयोग (1964–1966) के अनुसार, ‘मूल्यांकन निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है, जो शिक्षा प्रणाली का अभिन्न अंग है तथा जिसका शैक्षिक उद्देश्यों से घनिश्ठ संबंध है। यह शिक्षार्थी की आदतों तथा अध्यापक के पढ़ाने की पद्धतियों पर गहरा प्रभाव डालती है तथा इस प्रकार यह शैक्षिक उपलब्धि के मापन एवं सुधार में सहायक होता है।’
डांडेकर के अनुसार, ‘‘शिक्षार्थी ने किस सीमा तक किन उद्देश्यों को प्राप्त किया है यह जानने के लिए मूल्यांकन कार्य किया जाता है।’’

मूल्यांकन के उद्देश्य

► शिक्षार्थियों के व्यवहारों एवं आचरण परिवर्तन का मूल्यांकन करना।
► शिक्षार्थियों की कुशलताओं, योग्यता आदि का मूल्यांकन कर उनका ग्रेडिंग, वर्गीकरण तथा प्रोन्नति करना।
► शिक्षार्थियों की सभी कठिनाइयों का निर्धारण करना तथा दोषों को जानना।
► उपचारात्मक शिक्षण प्रदान करना।
► शिक्षार्थियों के चहुमुखी विकास को निरंतर गति प्रदान करना।
► मूल्यांकन से अध्ययन और अध्यापन दोनों का मापन कर सकते हैं।
► मूल्यांकन द्वारा प्रयोजन, शिक्षण विधियों की उपयोगिता एवं विद्यालय की समस्त क्रियाओं का अवलोकन करना।

मूल्यांकन का महत्व

► शिक्षार्थियों को अधिगम की ओर प्रेरित करता है।
► शिक्षार्थियों के व्यक्तिगत मार्गदर्शन में सहायता करता है।
► शिक्षण के उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक है।
► शिक्षार्थियों की कमजोरियों को जानने में सहायक होता है।
► शिक्षार्थियों की प्रगति में सहायक है।
► शैक्षिक व व्यावसायिक मार्गदर्शन में सहायक है।

मूल्यांकन प्रक्रिया या मूल्यांकन के पद

► मूल्यांकन के उद्देश्यों का चयन कर उसका निर्धारण करना।
► व्यवहारगत उद्देश्यों का निर्धारण तथा विश्लेषण।
► मूल्यांकन प्रविधियों का चयन करना।
► मूल्यांकन प्रविधियों का प्रयोग एवं परिणाम निकालना।
► परिणामों की सरल व्याख्या करना।

मूल्यांकन की प्रकृति

मूल्यांकन एक सतत प्रक्रिया है। मूल्यांकन शिक्षण प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है। इसका सीधा संबंध शिक्षा के उद्देश्य से होता है। यह बालकों के परिणामों की गुणवत्ता के आधार पर उनके भावी कार्यक्रमों का निर्धारण करता है। मूल्यांकन का प्रमुख प्रयोजन व्यवहारगत परिवर्तन की दिशा प्रकृति एवं स्तर के संबंध में निर्णय करना है। यह शिक्षा के उद्देश्यों को प्राप्त करने की सीमा का निर्धारण करता है।

विद्यालय आधारित मूल्यांकन

► शिक्षक जब विद्यालय द्वारा बनाये गये दिशा-निर्देशों के अनुसार शिक्षार्थियों का मूल्यांकन करता है तो उसे विद्यालय आधारित मूल्यांकन कहते हैं। मूल्यांकन के लिए विद्यालय के बाहर होने वाली परीक्षा प्रणालियों को लागू करने के कारण उपयुक्त मूल्यांकन नहीं हो पाता है क्योंकि वे परीक्षा प्रणाली विद्यालय के उन शिक्षार्थियों को केंद्र में रखकर नहीं बनाई जाती है। विद्यालय परीक्षा परीक्षण की विभिन्न प्रक्रियाएँ जैसे पूर्व परीक्षण/प्रवेश परीक्षण, इकाई परीक्षण, नैदानिक परीक्षण, संयुक्त इकाई परीक्षण, आवधिक परीक्षण तथा वार्शिक परीक्षण आयोजित करता है। विद्यालय आधारित मूल्यांकन प्रणाली में शिक्षार्थी के विकास की जाँच करते हैं तथा व्यवस्थित तरीके से संज्ञानात्मक, भावात्मक एवं कार्य-निश्पादन का बहुआयामी मूल्यांकन किया जाता है। यह मूल्यांकन प्रणाली शिक्षार्थियों को अधिगम के लिए प्रेरित करती है और उसकी व्यक्तिगत योग्यताओं, शैक्षणिक प्रगति एवं विकास के लिए आधार का कार्य करती है।
► मूल्यांकन प्रणाली का महत्व शिक्षार्थियों में ज्ञान की समझ विकसित करने, कक्षा कक्ष प्रबंधन, प्रभावी शिक्षार्थी शिक्षक संवाद, निर्देशों की संरचित अध्यापन एवं सीखने पर जोर देने वाली गतिविधियों से है। मूल्यांकन के लिए शिक्षार्थियों एवं शिक्षकों की कक्षा में नियमित उपस्थिति आवश्यक है और इससे समझ के साथ पढ़ने के अध्ययन को महत्व मिलता है। छात्र अपने अध्ययन में कितनी प्रगति कर रहे हैं और इसके साथ-साथ शिक्षा के संपूर्ण लक्ष्य को प्राप्त करने के मामले में व्यवस्था का निष्पादन कैसा है, इसके लिए मूल्यांकन पर आधारित कक्षा के साथ व्यापक स्तर पर उपलब्धि सर्वेक्षण को जानने की भी आवश्यकता होती है।

विद्यालय आधारित मूल्यांकन की विशेषताएँ

इसमें शिक्षार्थी की अध्ययन प्रगति का आंकलन करना, शिक्षक की प्राथमिक भूमिका है। कक्षा में शिक्षार्थियों के नियमित और निरंतर मूल्यांकन से अभिप्राय बच्चों और माता-पिता तथा शिक्षक को प्रतिक्रिया देना है। इसमें शिक्षार्थियों की अध्ययन समस्याओं का समाधान किया जाता है। अध्ययन मूल्यांकन तंत्र पर आधारित एक शैक्षिक वातावरण वाली कक्षा में शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों ही सीखने पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। विद्यालयों में शिक्षार्थियों के विभिन्न आयामों का निरंतर मूल्यांकन किया जाता है ताकि सुधार की प्रक्रिया का समावेश किया जा सके। मूल्यांकन प्रणाली शिक्षार्थियों के भविश्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाई जाती है।

विद्यालय आधारित मूल्यांकन की तकनीक

राश्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिशद् (NCERT) के अनुसार, विद्यालय मूल्यांकन के लिए निम्नलिखित तकनीकें अपनायी जाती हैं:
मूल्यांकन तकनीक

शिक्षार्थीविषयमूल्यांकन तकनीकेंमूल्यांकन के साधन
शैक्षिकपाठ (curricular)
कार्यकलाप के क्षेत्र:
► ज्ञान
► अवबोध
► ज्ञान का प्रयोग
► कौशल आदि
► लिखित
► मौखिक
► प्रायोगिक
► प्रश्नपत्र
► निदान परीक्षण
► मानकीकृत उपलब्धि परीक्षण
► प्रदत्त कार्य (assignment)
► प्रश्नावली
गैर-शैक्षिकशारीरिक स्वास्थ्य:
► स्वास्थ्य संबंधी मूल ज्ञान
► शारीरिक स्वास्थ
► स्वास्थ्य जाँच
► शिक्षक द्वारा
अवलोकन
► निर्धारण मापनी
► डॉक्टर के उपकरण
आदतें:
► स्वास्थ्य संबंधी आदतें
► अध्ययन संबंधी आदतें
► कार्य सबं ध्ं ाी आदत ें
अवलोकन► वृत्तांत लेखन द्वारा
► जाँच सूची द्वारा
अभिरुचियाँ:
► कलात्मक अभिरूचि
► वैज्ञानिक अभिरूचि
► सामाजिक अभिरूचि
अवलोकन► वृत्तांत लेखन द्वारा
► जाँच सूची द्वारा
► निर्धारण मापनी
अभिवृत्तियाँ:
► अध्ययन के प्रति अभिवृत्ति
► शिक्षकों के प्रति अभिवृत्ति
अवलोकन► वृत्तांत लेखन द्वारा
► जाँच सूची द्वारा
► निर्धारण मापनी

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन

शिक्षार्थियों के अधिगम या सीखने की प्रक्रिया का लगातार मूल्यांकन करने को सतत एवं व्यापक मूल्यांकन कहते हैं। मूल्यांकन प्रक्रिया में शिक्षार्थियों से अर्थपूर्ण प्रश्न पूछे जाते हैं। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (NCERT) के अनुसार, सतत एवं व्यापक मूल्यांकन में निर्धारित शैक्षिक उद्देश्य शामिल होने चाहिए। मूल्यांकन करने के लिए प्रश्नों को आधार बनाते हैं। मूल्यांकन द्वारा यह देखा जाता है कि कक्षा में प्रदान किए गए अधिगम अनुभव कितने प्रभावशाली हैं और व्यवहार परिवर्तन की प्रक्रिया कितने अच्छे ढंग से पूर्ण हो रही है।

मूल्यांकन के प्रकार

रचनात्मक मूल्यांकन

अधिगम का मूल्यांकन रचनात्मक मूल्यांकन पर आधारित होता है अर्थात् जब शिक्षार्थी के सीखने की प्रक्रिया के बीच में ही यह जांचा जाता है कि वह कितना सीख रहा है। जैसे भाशा सीखाने के बीच में ही उससे अक्षरों तथा शब्दों का उच्चारण करवा कर यह देखा जाता है कि वह कितना सीख रहा है। शिक्षार्थियों की लगातार प्रतिपुष्टि के लिए रचनात्मक मूल्यांकन सहायक सिद्ध होता है। रचनात्मक मूल्यांकन में अध्यापक पढ़ाते समय यह जांच करते हैं कि शिक्षार्थियों ने कितनी अनुभूति-अभिव्यक्ति एवं ज्ञान ग्रहण किया है। रचनात्मक मूल्यांकन, किसी विशय के शिक्षण के बीच में से किया जाता है। रचनात्मक मूल्यांकन सामान्य अधिगम समस्याओं के लिए प्राथमिक उपचार का कार्य करता है।

संकलनात्मक या योगात्मक मूल्यांकन

शिक्षार्थी अध्ययन अवधि के अंत में कितने अच्छे ढंग से सीखने के उद्देश्य को प्राप्त कर पाया है। इसका मूल्यांकन, संकलनात्मक या योगात्मक मूल्यांकन द्वारा होता है। पाठ्यक्रम समाप्त होने के बाद कितना सीखा गया है, इस बात का मूल्यांकन यहाँ किया जाता है। शिक्षक पढ़ाने के बाद यह देखता है कि शिक्षार्थियों को पढ़ाया गया पाठ कितना याद रहता है। जैसे किसी पाठ को पढ़ाने के बाद शिक्षक जब शिक्षार्थियों से प्रश्न करता है तो वह संकलनात्मक मूल्यांकन कहलाता है। जैसे जब शिक्षक शिक्षार्थियों को भ्रमण के लिए लेकर जाता है और बाद में स्कूल वापस आने पर प्रश्न करता है तो वह जांच रहा है कि शिक्षार्थियों ने वहां क्या-क्या सीखा, परंतु यह मूल्यांकन भ्रमण के बीच में न कर अंत में करते हैं। शिक्षार्थियों को ग्रेड देने, उनके कार्यों को प्रमाणित करने, पाठ्यक्रम का मूल्यांकन करने तथा शिक्षक की योग्यता के विशय में निर्णय लेने के लिए भी सकं लनात्मक मल्ू याकं न का उपयोग किया जाता है।

नैदानिक मूल्यांकन

कक्षा में शिक्षण के दौरान शिक्षार्थियों के अधिगम से जुड़ी ऐसी कठिनाइयाँ जो अनसुलझी रह गयी हैं या जिनका समाधान नहीं हो पाया है, उनसे संबंधित समस्याओं के मूल्यांकन करने को नैदानिक मूल्यांकन कहते हैं। नैदानिक मूल्यांकन द्वारा जो शिक्षार्थी असफल हो रहे हैं उन शिक्षार्थियों की असफलता का कारण ढूंढा जाता है। यदि शिक्षार्थी शिक्षण की निर्धारित विधियों जैसे अध्ययन सामग्री, श्रव्य-दृश्य साधन के उपयोग के बावजूद पठन, गणित या अन्य विशय में असफल रहता है तो उसे विस्तृत निदान की आवश्यकता होती है। नैदानिक मूल्यांकन शिक्षार्थियों की समस्याओं के अन्तर्निहित कारणों का पता लगाता है। इसमें विशेश रूप से निर्मित नैदानिक परीक्षणों एवं विभिन्न अवलोकनात्मक तकनीकों का उपयोग किया जाता है। नैदानिक मूल्यांकन का प्राथमिक लक्ष्य सीखने की समस्याओं के कारणों का निर्धारण करना एवं उपचारात्मक कार्यवाही के लिए योजना बनाना है।

मूल्यांकन की विधियाँ

मनोवैज्ञानिक परीक्षण: किसी शिक्षार्थी की मानसिक तथा व्यवहारात्मक विशेषताओं के मापन के लिए मनोवैज्ञानिक परीक्षण करते हैं।
व्यक्ति अध्ययन: इस विधि में शिक्षक किसी शिक्षार्थी के मनोवैज्ञानिक गुणों तथा मनो-सामाजिक परिवेश के संदर्भ में उसके मनोवैज्ञानिक इतिहास आदि का गहनता से अध्ययन करता है।
प्रेक्षण: कक्षा में शिक्षार्थी की व्यवहारगत घटनाओं तथा शिक्षण अधिगम प्रक्रिया का अवलोकन या प्रेक्षण कर अभिलेख या रिपोर्ट बनायी जाती है।
आत्म-प्रतिवेदन: इस विधि में शिक्षार्थी स्वयं अपने विश्वासों, मतों आदि के बारे में तथ्यात्मक सूचनाएँ प्रस्तुत करता है।
संचित अभिलेख पत्र: शिक्षार्थियों के व्यक्तित्व एवं व्यवहार के विभिन्न पक्षों में आए परिवर्तनों एवं उपलब्धियों को एक ही प्रपत्र में लिखकर सुरक्षित रखा जाता है यह संचित अभिलेख पत्र कहलाता है। जैसे बच्चों या शिक्षार्थियों का शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, नैतिक, मनोवैज्ञानिक अभिलेख तैयार करना।
घटनावृत्त: स्कूल में घटित होने वाली दैनिक घटनाओं का विवरण भी शिक्षार्थियों के व्यवहार परिवर्तन का मूल्यांकन करने में सहायता करता है। उन घटनाओं में किस शिक्षार्थी की क्या उपलब्धि हुई, इस बात का विवरण शिक्षार्थियों की भाषागत उपलब्धियों को मापने में सहायता करता है। जैसे किसी प्रतिस्पर्धा या घटना का लेख तैयार करना।
निर्धारण मापनी: शिक्षार्थियों की योग्यताएं एवं उपलब्धि किस स्तर की है, इस बात का निर्धारण करने के लिए निर्धारण मापनी जैसे ग्रेड देने का प्रयोग किया जाता है।
पोर्टफोलियो: एक निश्चित अवधि में शिक्षार्थियों द्वारा किए गए कार्यों के संग्रह को पोर्टफोलियो कहते हैं। ये रोजमर्रा के काम भी हो सकते हैं या फिर शिक्षार्थी के कार्यों के नमूने भी हो सकते हैं। जैसे शिक्षार्थियों के भाषा विकास का रिकॉर्ड रखना।

बाह्य मूल्यांकन

विद्यालय के अतिरिक्त कोई बाहरी संस्था या बोर्ड जब शिक्षार्थियों के अधिगम का मूल्यांकन करता है तो उसे बाह्य मूल्यांकन कहते हैं। जैसे विभिन्न मान्यता प्राप्त विद्यालय बोर्ड द्वारा चयन परीक्षाएँ ली जाती हैं, इन परीक्षाओं को बाह्य मूल्यांकन कहते हैं। बाह्य मूल्यांकन की प्रक्रिया में विद्यालय के शिक्षकों का कोई सीधा संबंध नहीं होता है। इन परीक्षाओं के परिणामों का प्रयोग अनेक उद्देश्यों के लिए किया जाता है। किसी शिक्षार्थी का वास्तविक परीक्षण एक समय सीमा में प्रश्नों को हल करने तक सीमित रहता है। विद्यालय भी मूल्यांकन करने के लिए परीक्षाओं का आयोजन करता है परंतु यदि प्रश्नों को बनाने तथा अंक देने का कार्य बाहरी संस्था करती है तो उसे बाह्य मूल्यांकन कहते हैं अर्थात् शिक्षार्थियों के मूल्यांकन में यदि शिक्षक सम्मिलित नहीं हो तो उसे बाह्य मूल्यांकन कहते हैं।

आन्तरिक मूल्यांकन

विद्यालय के शिक्षकों द्वारा शिक्षार्थियों के लिए परीक्षा आयोजित करने, प्रश्न बनाने एवं मूल्यांकन करने की प्रक्रिया को आंतरिक मूल्यांकन कहते हैं। कक्षा की अधिगम क्रियाओं में सीधी भागीदारी, शिक्षक द्वारा प्रश्न-पत्र बनाने तथा उसी शिक्षक द्वारा उत्तर-पुस्तिकाओं का मूल्यांकन ये तीन आंतरिक मूल्यांकन के आधार हैं। शिक्षार्थियों के लिए विभिन्न परीक्षण, परीक्षणों का उचित सापेक्ष मूल्यांकन तथा उनकी योग्यताओं का वर्गीकरण, आंतरिक मूल्यांकन के गुण हैं।

मानक आधारित मूल्यांकन

कोई शिक्षार्थी कक्षा के अन्य शिक्षार्थियों की अपेक्षा कितना आगे या पीछे है, यह देखने के लिए कक्षा या किसी वर्ग के स्तर को ध्यान में रखकर मूल्यांकन किया जाता है। यह वर्ग एक मानक वर्ग होता है जिसके संदर्भ में ही परिणाम को देखा जाता है। मूल्यांकन की यह प्रक्रिया कुछ प्रश्नों के आधार पर की जाती है। इस प्रक्रिया को ही मानक संदर्भित मूल्यांकन कहते हैं। कक्षा के परीक्षण, सार्वजनिक परीक्षाएँ तथा विशेश मानक पर आधारित होते हैं। जैसे कक्षा में सबसे बुद्धिमान शिक्षार्थी कौन है यह जानने के लिए एक शिक्षार्थी की उपलब्धि को उसी प्रकार के अन्य शिक्षार्थियों की उपलब्धि से तुलना कर देखते हैं। इसलिए चयन संबंधी निर्णय हमेशा मानक आधारित होते हैं। यदि यह मानक आधारित नहीं हों तो प्राप्त परिणाम गलत सिद्ध हो सकते हैं।

मानदंड आधारित मूल्यांकन

शिक्षार्थी की ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया शून्य से शुरू होकर पूर्ण उपलब्धि तक चलती रहती है। ज्ञान प्राप्ति की इस प्रक्रिया में शिक्षार्थी किस स्थान पर है इसकी गणना करने के लिए मानदंड आधारित मूल्यांकन को अपनाया जाता है। शिक्षार्थी की आयु के अनुसार सीखने का मानदंड निर्धारित किया जाता है। जैसे एक 5 वर्श के शिक्षार्थी को अक्षर की पहचान होनी चाहिए। इसी तरह प्राथमिक कक्षाओं के लिए न्यूनतम अधिगम स्तर NCERT ने तैयार किया है। यह न्यूनतम अधिगम स्तर किसी शिक्षार्थी के मूल्यांकन का मानदंड बन सकता है।

प्रदत्त कार्य या गृह कार्य द्वारा मूल्यांकन

► शिक्षार्थियों को सीखाने तथा उनके अधिगम प्रक्रिया का मूल्यांकन करने के लिए शिक्षक प्रदत्त कार्य का उपयोग करते हैं।
► शिक्षार्थियों को शिक्षण के लिए निर्धारित समय-सीमा के बाद कुछ कार्य करने को दिये जाते हैं। जैसे – अवलोकित आंकड़ों को प्रस्तुत करना, विशय के महत्वपूर्ण भागों को अपने शब्दों में लिखना आदि। इन सभी योग्यताओं एवं कौशलों के मूल्यांकन करने के लिए शिक्षक, शिक्षार्थियों को निर्देश देते हैं जिन्हें वे अपने घर पर पूरा करते हैं।
► प्रदत्त कार्य कक्षा में पढ़ाये गये पाठ का विस्तार होता है। इससे कक्षा में पढ़ाये गये पाठ का अतिरिक्त अभ्यास भी होता है।
► इन प्रदत्त या गृह कार्य से शिक्षार्थियों की अवधारणाओं एवं ज्ञान में वृद्धि होती है।
► प्रदत्त कार्यों से शिक्षार्थियों को स्व-मूल्यांकन का अवसर मिलता है तथा यह ज्ञान होता है कि विद्यालय में पढ़ाये गये संप्रत्ययों को वे कितना समझ पाये हैं। प्रदत्त कार्यों को करने के लिए शिक्षार्थियों को उस विशय से संबंधित पाठ को पढ़ने तथा अधिगम अनुभवों का विश्लेशण करने की आवश्यकता होती है। इस प्रक्रिया द्वारा शिक्षार्थी अपने विशय का विस्तृत अध्ययन कर पाता है।

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