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अध्याय 8. सामाजिक अध्ययन का अधिगम – मूल्यांकन (Social Science for CTET & TET Exams)

अध्याय 8. सामाजिक अध्ययन का अधिगम – मूल्यांकन

मूल्यांकन की अवधारणा
मूल्यांकन यह जानने की पद्धति है कक्षा में दी जाने वाली शिक्षा कहाँ तक प्रभावशाली रही है और शिक्षा के उद्धेश्यों की प्राप्ति हुई है या नहीं।
► शैक्षणिक कार्यक्रम को सुचारू रूप से बनाये रखने तथा शिक्षा-पद्धति में सुधार के लिए उचित मूल्यांकन आवश्यक है।
► उचित मूल्यांकन के लिए यह जरूरी है कि शिक्षा के उद्देश्यों को ध्यान में रखा जाए।
► मूल्यांकन प्रक्रिया में व्यक्तित्व संबंधी परिवर्तनों एवं शैक्षिक कार्यक्रम के मुख्य उद्देश्यों पर बल दिया जाता है।
► इस प्रक्रिया में पाठ्यवस्तु की निष्पत्ति के अलावा विद्यार्थियों की रुचि, वृत्ति, उनके आदर्श, उनके सोचने का ढंग, काम करने की आदतें तथा व्यक्तिगत एवं सामाजिक अनुकूलता को भी शामिल किया जाता है।
► एडम्स के अनुसार, ”मूल्यांकन निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया विद्यार्थियों की औपचारिक शैक्षिक उपलब्धि तथा विकास संबंधी परिवर्तनों की व्याख्या करता है।
मूल्यांकन का उद्देश्य
विद्यार्थियों ने शिक्षण कुशलताओं तथा योग्यताओं को किस सीमा तक ग्रहण किया है, इसकी जाँच करना।
► मूल्यांकन विद्यार्थियों को उचित एवं व्यावसायिक मार्गदर्शन देने में सहायक होता है।
► विद्यार्थियों की सफलता, विफलता, बाधाएँ तथा कठिनाइयों का समुचित निर्धारण करना।
► मूल्यांकन पाठ्यक्रम सुधार में सहायक होता है।
► इस प्रक्रिया द्वारा शिक्षकों की सफलता एवं कुशलता को मांपा जा सकता है और यह शिक्षण विधियों की जाँच करने में उपयुक्त होता है।
मूल्यांकन पद्धतियाँ
निरीक्षण प्रविधि, घटनावृत, प्रश्नावली, साक्षात्कार और परीक्षा प्रविधि, मूल्यांकन की पद्धतियाँ हैं।
निरीक्षण प्रविधि
इस विधि के द्वारा विद्यार्थियों के विभिन्न प्रकार के व्यवहार सम्बन्ध को जाना जा सकता है।
► निरीक्षण प्रविधि द्वारा विद्यार्थियों के व्यवहार, संवेगात्मक एवं बौद्धिक परिपक्वता को मांपा जा सकता है।
घटनावृत (एनेकडॉटल रिकॉर्ड्स)
घटनावृत अर्थात् किसी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना का वर्णन कर शिक्षक, विद्यार्थियों को जीवन के कुछ महत्त्वपूर्ण प्रसंगों के बारे में संक्षेप में बतलाता है।
► घटनावृत में दिनांक तथा समय का उल्लेख किया जाता होता है। ऐसे प्रामाणिक घटनावृत वास्तव में विश्वसनीय तथा वैधानिक होते हैं।
प्रश्नावली
विद्यार्थियों से उनकी रुचियों व अनिवृत्तियों के बारे में सूचनाएँ प्राप्त करने के लिए प्रश्नावली महत्त्वपूर्ण तथा उपयुक्त प्रविधि है।
► विद्यार्थियों को लिखित प्रश्नों की सूची तैयार करके उत्तर देने का निर्देश दिया जाता है।
► प्रश्नों की संरचना इस प्रकार होती है कि कुछ प्रश्न सूचक उत्तरों के तथा दूसरे बिना सूचक उत्तरों के होते हैं।
► प्रश्नावली संक्षिप्त एवं स्पष्ट होनी चाहिए।
साक्षात्कार
साक्षात्कार प्रविधि की विशिष्ट गुणवत्ता के कारण इसका उपयोग व्यापक रूप से किया जाता है।
► साक्षात्कार द्वारा विद्यार्थियों के साथ प्रत्यक्ष संबंध स्थापित किया जा सकता है। इससे सहयोग का वातावरण बनता है।
► इस प्रविधि द्वारा विद्यार्थियों की रुचियों दृष्टिकोण आदि में हुए परिवर्तनों एवं उनकी व्यक्तिगत विशेषताओं की जांच आसानी से की जा सकती है।
► साक्षात्कार के समय पूर्व नियोजित प्रश्न तथा कुछ औपचारिक स्वरूप के प्रश्न किए जाते हैं।
► साक्षात्कार लेने वाले शिक्षक को साक्षात्कारकर्ता के बारे में प्रारंभिक जानकारी होना चाहिए।
परीक्षा प्रविधि
परीक्षा का उपयोग छात्र के ज्ञान की जांच के लिए किया जाता है।
► छात्रों की परीक्षा किसी बाह्य एजेन्सी, संस्था या व्यक्ति से करवाई जाती है अथवा स्वयं अध्यापक भी परीक्षा लेते हैं।
► परीक्षा विधि में मूल्यांकन का ऐसा स्वरूप होता है।
► प्रश्नों के उत्तरों को उसकी गुणवत्ता के अनुसार संख्या या संकेत रूप देकर श्रेणीबद्ध किया जाता है।
आकलन तथा मूल्यांकन
भारतीय शिक्षा में मूल्यांकन शब्द परीक्षा, तनाव और दुश्चिन्ता से जुड़ा हुआ है।
► स्कूली शिक्षा प्रणाली में मूल्यांकन तथा आकलन प्रक्रिया में कई अवरोध आते हैं।
► वर्तमान में स्कूलों में होने वाले आकलन और वर्तमान बोर्ड की परीक्षाएँ विद्यार्थियों को नकारात्मक रूप से ही प्रभावित करती हैं।
► एक अच्छी मूल्यांकन, सीखने की प्रक्रिया का अभिन्न अंग बन सकती है। इससे विद्यार्थी और शिक्षा तन्त्र दोनों को विवेचनात्मक और आलोचनात्मक प्रतिपुष्टि से फायदा होता है।
आकलन का उद्देश्य
शिक्षा का सरोकार सार्थक तथा उत्पादक जीवन की तैयारी से होता है इसलिए मूल्यांकन प्रक्रिया को आलोचनात्मक प्रतिपुष्टि देना चाहिए।
► इस प्रतिपुष्टि से यह ज्ञात होता है कि शिक्षा में किस प्रकार के सुधार की आवश्यकता है।
► वर्तमान मूल्यांकन प्रक्रिया कुछ ही योग्यताओं को आंकलित कर पाती है।
► विद्यार्थी की उपलब्धि की गुणवत्ता की जांच करना और विभिन्न विषयों में शिक्षक की उपलब्धि का विश्लेषण करना।
► विद्यार्थियों के बीच अधिगम की समझ बनाना।
► मूल्यांकन द्वारा विद्यार्थियों की समस्याओं को पहचानने में मदद मिलती है। इन समस्याओं का समाधान उपचारात्मक शिक्षा द्वारा किया जाता है।
► आकलन प्रक्रिया, अध्यापकों को अच्छे निदानकारी परीक्षणों के लिए योजना बनाने में मदद करती है।
► सुनियोजित आकलन द्वारा विद्यार्थियों को नियमित रूप से उनके काम की प्रतिपुष्टि दी जाती है, जिससे वे शिक्षण के मानकों को प्राप्त कर सकें।
शिक्षार्थियों का आकलन
शिक्षार्थियों की अधिगम की गुणवत्ता और विस्तार का समावेशी आकलन होना चाहिए।
► मूल्यांकन और प्रतिपुष्टि को पुन: परिभाषित करने और उनके नए मानक खोजने की जरूरत है।
► आकलन में, विशिष्ट विषयों में शिक्षार्थियों की उपलब्धि, सीखने के प्रति अभिवृत्तियों, रुचि और स्वयं सीखने की क्षमता को शामिल किया जाता है।
► पाठ्यचर्या को सृजनात्मक, नवप्रवर्तक होना चाहिए ताकि शिक्षार्थियों का सम्पूर्ण विकास हो।
मापन एवं मूल्यांकन में अंतर
मूल्यांकन  मूल्यांकन एक योगात्मक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया द्वारा किसी पूर्व निर्मित शैक्षिक कार्यक्रम अथवा पाठ्यक्रम की
समाप्ति पर विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि ज्ञात की जाती है।
► इसका उद्देश्य मूल्य निर्णयन करना होता है। शैक्षिक सन्दर्भ में मूल्यांकन का उद्देश्य निर्धारित पाठ्यक्रम की समाप्ति पर विद्यार्थियों की उपलब्धि को ग्रेड अथवा अंक के माध्यम से प्रदर्शित करना है।
► यह पाठ्यक्रम की समाप्ति पर होने वाली प्रक्रिया है।
► शिक्षण शास्त्र का हिस्सा है, जो पढ़ने पढ़ाने के अन्त में उपलब्धियों के वर्गीकरण के लिए किया जाता है।
मापन  मापन आकलन मूल्यांकन की एक तकनीक है। इसके द्वारा किसी व्यक्ति या वस्तु में निहित विशेषताओं का आंकिक वर्णन किया जाता है।
► मापन आकलन तथा मूल्यांकन की एक तकनीक है।
► यह कभी भी या कभी-कभी चलने वाली प्रणाली है।
► मापन मुख्य तौर पर व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं जैसे- मानसिक क्षमता, रुझान इत्यादि के लिए किया जाता रहा है।
स्व-आकलन
आकलन की भूमिका उस प्रगति को समझने की होती है जो शिक्षार्थी और शिक्षक निर्धारित लक्ष्यों की दिशा में करते हैं। विद्यार्थियों के लिए ऐसे अवसर उपलब्ध होने चाहिए जिसमें विद्यार्थी परीक्षा तथा मूल्यांकन के भय के बिना पढ़ने की दिशा में प्रेरित हों।
► विद्यार्थियों की मौजूदगी में की गई जांच तथा सुधार कार्य से उन्हें यह प्रतिपुष्टि मिलती है कि उन्होंने क्या सही किया और क्या गलत।
► विद्यार्थियों से इस बारे में जानकारी लेना कि उन्होंने कोई उत्तर क्यों दिया, शिक्षक को आगे जानने और बच्चों की सोच से जुड़ने का अवसर देता है।
► अधिगम के परिणाम के साथ-साथ अधिगम के अनुभवों का भी मूल्यांकन होना चाहिए। व्यक्तिगत व सामूहिक दोनों स्तर पर ऐसे अभ्यास बनाए जा सकते हैं जिनसे बच्चे अपने अधिगम का आकलन करने तथा उस पर सोच-विचार करने में सक्षम हो जाएं। इस प्रकार के अनुभव से उनमें स्व-नियामन की क्षमताएं भी विकसित होती हैं।
► स्व-आकलन की रिपोर्ट कार्ड में प्रत्येक विद्यार्थी के आकलन को शामिल किया जाता है।
► विद्यार्थियों के रिपोर्ट कार्डों पर उनके विषय क्षेत्रों की जानकारी होती है, लेकिन बच्चे के विकास के दूसरे पहलू जैसे – सामाजिक दक्षता, कौशल, स्वास्थ्य, कला आदि की कोई सूचना नहीं दी गयी होती है।
► स्व-आकलन में शिक्षक को इन पहलुओं का भी आकलन करना चाहिए जो विद्यार्थियों के विकास में सहायक सिद्ध होगें।
आकलन का संचालन
आकलन और परीक्षाओं को विश्वसनीय और अधिगम को मापने के वैध तरीकों पर आधारित होना चाहिए।
► यदि परीक्षाएं केवल विद्यार्थियों द्वारा पाठ्य-पुस्तक के ज्ञान को याद करने की क्षमताओं का परीक्षण करती रहेंगी तो पाठ्यचर्या को सीखने की तरफ मोड़ने के सभी प्रयास विफल होगें।
► ज्ञान आधारित विषय क्षेत्रों की परीक्षाओं से यह ज्ञात होना चाहिए कि विद्यार्थियों ने क्या सीखा। इस ज्ञान के द्वारा समस्या को सुलझाने और उसे व्यवहार में लाने की उनकी क्षमता की जांच की जा सकती है।
► आकलन की प्रक्रिया में पाठ्यपुस्तक के सवालों के साथ दूसरी जानकारी को भी शामिल करना चाहिए।
► आकलन के लिए ऐसे प्रश्नों का प्रयोग करना चाहिए जिनके कई उत्तर हों जिससे विद्यार्थियों को चुनौती का सामना करना पड़े। शिक्षकों को ऐसे प्रश्नों पर बल देना चाहिए।
► अच्छे प्रश्न बनाने की क्षमता विकसित करने के लिए जिला एवं राज्य स्तर पर प्रतियोगिताएं आयोजित होनी चाहिए।
► जांचे गए उत्तर-पुस्तिका वापस मिलने पर विद्यार्थियों को अपने उत्तरों को दोबारा लिखना चाहिए। शिक्षक को उन उत्तरों को जाँच करना चाहिए ताकि यह ज्ञात हो सके कि बच्चों ने क्या सीखा और ऐसी कठिन परीक्षा देने से उन्हें क्या लाभ हुआ।

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